Thursday, 30 April 2020

कोरोना से बचाव के लिए शारीरिक दूरी बनाए रखना व्यवहार में लाना होगा

नई दिल्ली। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने गुरुवार को कहा कि यह स्पष्ट है कि लॉकडाउन को हटाने के बाद भी सोशल डिस्टेंसिंग की अवधारणा बनी रहेगी। एक संवाददाता सम्मेलन में जारी लॉकडाउन के आगे बढ़ाए जाने के सवाल के जवाब में स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने कहा कि मंत्रालय मामलों की संख्या को देखते हुए राज्य सरकारों के साथ समन्वय कर रहा है।

यह पूछे जाने पर कि लॉकडाउन के आगे बढ़ाए जाने को लेकर स्वास्थ्य मंत्रालय का क्या विचार है? उन्होंने कहा, "स्वास्थ्य मंत्रालय की तरफ से हम इसे लेकर बेहद स्पष्ट हैं कि हमें अपनी दैनिक दिनचर्या में शारीरिक दूरी की अवधारणा को अपनाने की बात को सुनिश्चित करनी होगी, ताकि हम संक्रमण की श्रंखला को तोड़ सकें। इसी के साथ रोकथाम के उपायों पर भी ध्यान देना आवश्यक है।"

उन्होंने आगे यह भी कहा, "हालांकि हम सफल हुए हैं, लेकिन हम चिंतित भी हैं। इसलिए हम राज्यों के साथ समन्वय कर रहे हैं और जहां अधिक मामलों के होने की पुष्टि हुई है, वहां हम शारीरिक दूरी पर ज्यादा जोर दे रहे हैं।"

उन्होंने कहा कि पिछले 24 घंटों में 1,718 नए मामले सामने आए हैं, जिन्हें लेकर कुल मामलों की संख्या अब 33,050 है। उनके मुताबिक, "पिछले 24 घंटों में देश में 630 मरीज ठीक हो चुके हैं। रिकवरी रेट अब 25.19 है, जो 14 दिन पहले 13.06 थी। इसमें सुधार देखा गया है।"



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'बीपी की दवाएं खाने वाले लोगों में कोरोना का खतरा कम होता है'

नई दिल्ली। ब्लड प्रेशर (बीपी) की दवाएं खाने वाले मरीज दूसरे लोगों की तुलना में कोरोना वायरस से ज्यादा सुरक्षित हैं। अप्रैल में आई सर्कुलर रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक चीन के नौ अस्पतालों के जब 1128 मरीजों पर परीक्षण हुआ तो यह बात सामने आई। यह कहना है वरिष्ठ फिजीशियन डॉ. वीएस उपाध्याय का।

बीएचयू से एमबीबीएस और एमडी की डिग्री लेने के बाद 30 वर्ष से अधिक का चिकित्सकीय अनुभव रखने वाले डॉ. वीएस उपाध्याय ने आईएएनएस से कहा कि ब्लड प्रेशर की लिप्रिल, इरिटेल, टैजलाक जैसी दवाएं कोरोना संक्रमित मरीजों में लाभप्रद साबित होती हैं।

डॉ. उपाध्याय ने कारण बताते हुए कहा कि कोरोना वायरस हमारे फेफड़े के रिसेप्टर (ग्राही) पर आक्रमण करता है। जबकि जो लोग ब्लड प्रेशर की दवाएं खाते हैं, उनका रिसेप्टर दवाओं के माध्यम से पहले ही ब्लॉक रहता है। जिससे कोरोना वायरस का फेफड़े के रिसेप्टर पर आक्रमण सफल नहीं हो पाता जिससे 70 प्रतिशत मामलों में मौत नहीं होती।

वरिष्ठ फिजीशियन डॉ. वीएस उपाध्याय ने बताया कि कोरोना संक्रमित रोगियों में 20 प्रतिशत मरीज आंत से संबंधित होते हैं। यानी ऐसे मरीजों में डायरिया, पेट दर्द, उल्टी की शिकायत होती है। इनमें चेस्ट इंफेक्शन जैसे खांसी, सांस, गले में खरास नहीं रहता है।

डॉ. उपाध्याय ने कहा कि सुखद बात यह है कि कोरोना संक्रमित सौ लोगों में से 80 लोगों में माइल्ड केस यानी हल्के मामले होते हैं। जो संबंधित व्यक्ति के इम्यून सिस्टम तथा एंटी कोविड 19 दवाओं की वजह से ठीक हो जाते हैं। मात्र 15 प्रतिशत मरीजों को ही ऑक्सीजन थेरेपी की जरूरत होती है। कोरोना वायरस के केवल पांच प्रतिशत केस ही सीरियस होते हैं। जिसमें फेफड़े में सूजन यानी 'एआरडीएस' हो जाता है। ऐसे व्यक्तियों को वेंटिलेटर तथा प्लाज्मा थेरेपी और एंटी कोविड 19 दवाओं की जरूरत होती है।

डॉ. वीएस उपाध्याय के मुताबिक, सांस की तकलीफ होने पर मरीजों को तुरंत डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए। कोरोना वायरस के मामलों को देखते हुए अस्पतालों में वेंटेलिटर सुविधाओं के विस्तार की जरूरत है।

नवनीत मिश्र

आईएएनएस



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जानिए क्या है न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर (एनईटी) बीमारी, जिससे हुआ इरफान खान का निधन

बॉलीवुड के मशहूर व दिग्गज अभिनेता इरफान खान के इस तरह अचानक चले जाने से उनके प्रशंसक बेहद दुखी हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बुधवार को उनके निधन के बाद उस दुर्लभ बीमारी के बारे में बताने की कोशिश की, जिससे वह जिंदगी की जंग हार बैठे। इस बीमारी का नाम न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर (एनईटी) है। इरफान को अपनी इस बीमारी का पता साल 2018 में चला और उन्होंने अमेरिका में इसका इलाज भी कराया। न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर मानव शरीर में कहीं भी हो सकता है। यह एक ऐसी स्थिति है, जिसमें तंत्रिकाओं से हार्मोन्स निकालने वाली अन्त:स्त्रावी ग्रंथियों की कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से विकसित होने लगती हैं और धीरे-धीरे शरीर के बाकी हिस्सों में भी फैलने लगती हैं।

यह ज्यादातर फेफड़े, अपेन्डिक्स, छोटी आंत, मलाशय और अग्नाशय को प्रभावित करता है। कैंसर का रूप न लेने वाली यह बीमारी काफी घातक होती है।

नई दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में वरिष्ठ सलाहकार (न्यूरोलॉजी) डॉ. पी.एन.रेनजेन ने आईएएनएस को बताया, "एनईटी की शुरुआत विशिष्ट कोशिकाओं में होती है, जो न्यूरोएंडोक्राइन कोशिकाओं के नाम से जाना जाता है। इनमें हार्मोन बनाने वाली कोशिकाओं और तंत्रिका कोशिकाओं के समान विशेषताएं होती हैं और ये पूरे शरीर में पाए जाते हैं।"

सामान्य तौर पर इसके लक्षण पहले समझ में नहीं आते हैं। डॉ. रेनजेन आगे कहते हैं, "इसके लक्षण शरीर में ट्यूमर की स्थिति और क्या यह अतिरिक्त हार्मोन का उत्पादन कर रहा है, इस पर निर्भर है। न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर के विकास में शरीर में दर्द हो सकता है, जिसे हम इसके संकेत के आधार पर ले सकते हैं। त्वचा में गांठ, डायट और व्यायाम के बिना वजन का कम होना और थकान भी इसके लक्षण हैं।" भारत में यह बीमारी प्रति एक लाख व्यक्तियों में महज दो लोगों को होती है।



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11 वीं कक्षा की स्कूली छात्रा ने बनाया वायरस किलिंग मास्क

प्रतिभा उम्र की सीमा से बंधी हुई नहीं होती। कोरोना वायरस के संक्रमण से निपटने के लिए सभी अपने-अपने स्तर पर प्रयास कर रहे हैं। इसी कड़ी में पश्चिम बंगाल के बर्दवान की एक 11वीं कक्षा की छात्रा ने भी कोविड-19 वायरस को रोकने के लिए खास मास्क बनाया है। दिगंतिका बोस ने एक 'वायरस किलिंग' मास्क बनाया है जो संक्रमण को रोकने और पहली कतार में संक्रमितों का इलाज कर रहे चिकित्सकों को सुरक्षा प्रदान करेगा। विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार की ओर से आयोजित एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए दिगंतिका ने इस मास्क का डिजायन तैयार किया है। उनका डिजायन इस प्रतियोगिता के अंतिम चरण के लिए भी चुना गया है। अगर उनका बनाया मास्क परीक्षण में सफल हो जाता है तो इसे रोगियों और चिकित्सा एवं नर्सिंगकर्मियों के लिए उपलब्ध करवाया जाएगा।

11 वीं कक्षा की स्कूली छात्रा ने बनाया वायरस किलिंग मास्क

दिगंतिका का कहना है कि कोविड-19 वायरस से संक्रमित रोगी इस मास्क का उपयोग करता है तो छींकने या खांसने से निकलने वाली बूंदे (ड्रॉपलेट्स)में मौजूद वायरस नष्ट हो जाएगा। इस मास्क का प्रोटोटज्ञइप तैयार करने में उन्हें एक सप्ताह का समय लगा। दिगंतिका के अनुसार मास्क में दोनों तरफ वॉल्व और फिल्टर लगा हुआ है। सांस लेने पर हवा वाल्वसे फिल्टर होकर फेफड़ों तक पहुंचती है। साथ ही है यह फिल्टर वायरस को शरीर में प्रवेश करने से पहले ही नष्ट कर देता है। इसी तरह रोगी के छींकने या खांसने पर वायरस से भरी बूंदे मास्क से जुड़े एक दूसरे वॉल्व में प्रवेश कर बाहर निकलती हैं जिससे वायरस का लिपिड प्रोटीन नष्ट हो जाता है।



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इनके शोध से खुल सकते हैं कोरोना वायरस के संभावित इलाज के दरवाज़े

नोवेल कोरोना वायरस का संभावित इंलाज या वैक्सीन खोजने का प्रयास दुनिया भर के वैज्ञानिक कर रहे हैं। इन्हीं में से एक हैं डॉ. काइली वागस्टाफ , जिनका शोध जल्द ही कोरोना वायरस का एक संभावित उपचार विकसित कर सकती है। दरअसल डॉ. काइली उस शोध का नेतृत्व कर रही हैं जो कोविड-19 का संभावित इलाज विकसित करने के काफी करीब है। इस अध्ययन के अनुसार, उनकी बनाई 'इवरमेक्टिन' नामक दवा की एक ही खुराक कोरोना वायरस को शरीर में कोशिकाओं के माध्यम से विकसित होने से रोक देगी। अध्ययन के अनुसार पहले से ही उपलब्ध एंटीपैरासिटिक दवा पर किए शोध में सामने आया कि यह 48 घंटे के भीतर कोरोना वायरस को नष्ट करने में सक्षम है। हालांकि अब भी इस दवा का मनुष्यों पर होने वाले प्रभाव की जांच करना बाकी है।

इनके शोध से खुल सकते हैं कोरोना वायरस के संभावित इलाज के दरवाज़े

पीटर डोहर्टी इंस्टीट्यूट ऑफ इंफेक्शन एंड इम्युनिटी के साथ ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न स्थित मोनाश विश्वविद्यालय के बायोमेडिसिन डिस्कवरी इंस्टीट्यूट केसहयाग से इस संभावित इलाज की खोज की गई है। मोनाश विश्वविद्यालय की वरिष्ठ शोधकर्ता डॉ. काइली के अध्ययन में सामने आया कि 'इवरमेक्टिन' एक एंटी-पैरासिटिक (परजीवी नाशक) दवा है। प्रयोगशाला में इसदवा ने न केवल कोरोनोवायरस को नष्ट करती है बल्कि वायरस को कोशिकाओं तक फैलने से भी रोकती है। फिलहाल अध्ययन के निष्कर्ष का क्लिीनिकल परीक्षण किया जा रहा है। हालांकि मानव पर इस दवा का क्या असर हागा इसके लिए अब भी मानव परीक्षण किया जाना है। डॉ. काइली ने बताया कि दवा में वे कौन से तत्व और यौगिक हैं जो वायरस को नष्ट करने में सक्षम हैं इस पर अब भी शोध चल रहा है। डॉ. काइली बीते 18 सालोंंं से कोशिकाओं पर शोध कर रही हैं। उन्होंने बताया कि यह दवा न केवल कोरोना वायरस पर प्रभावी है बल्कि एचआइवी, डेंगू, इन्फ्लएंजा और ज़ीका वायरस पर भी असरदार साबित हुई है।



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CORONA GOOD NEWS : अमरीका ने खोज ली कोरोना के इलाज की दवा

अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सलाहकार व नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इंफेक्शियस डिजीज के प्रमुख डॉ. एंथनी फॉसी ने व्हाइट हाउस में मीडिया को बताया कि इस दवा का अमरीका, यूरोप और एशिया के 68 स्थानों पर 1063 लोगों पर परीक्षण किया गया। इसके परिणाम अब सामने आ गए हैं। यह कोरोना के संक्रमण को रोकने में कारगर है। इससे पहले शिकागो में इस दवा का परीक्षण 125 कोरोना संक्रमितों पर किया गया था। इसमें 123 लोगों के ठीक हुए थे।

31 फीसदी तेजी से रिकवरी
डॉ. फॉसी ने कहा कि रेमडेसिविर के प्रयोग से कोरोना के मरीज 31 फीसदी ज्यादा तेजी से ठीक हुए। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इन्फेक्शियस डिजीज दवा के परीक्षण के परिणामों की और गहन समीक्षा कर रही है। यदि रिकवरी तेजी से होती है तो इससे मरीज तेजी से रिकवर होंगे। उनके गंभीर होने का खतरा भी टलेगा।

डब्ल्यूएचओ का टिप्पणी से इनकार
पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा था कि इस दवा बहुत कारगर नहीं है। लेकिन क्लीनिकल ट्रायल के बाद डब्ल्यूएचओ के वरिष्ठ अधिकारी माइकल रेयान ने कोई टिप्पणी करने से मना कर दिया है।

इबोला के लिए किया था विकसित
अमरीका की बायोफार्मास्युटिकल कंपनी गिलियड साइंसेज ने इबोला के इलाज के लिए रेमडेसिविर दवा बनाई थी। अफ्रीका में क्लीनिकल ट्रायल में यह फेल हो गई थी। इसके बाद इस दवा को किसी बीमारी के इलाज में प्रयोग की अनुमति नहीं दी गई। हालांकि फूड एंड ड्रग डिपार्टमेंट ने इसको कोरोना के इलाज के लिए मंजूरी नहीं दी है।

इसलिए अमरीका चिंतित
दुनियाभर में कोरोना वायरस से अब तक 32 लाख से ज्यादा लोग संक्रमित हो चुके हैं और दो लाख 28 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। इसमें सबसे ज्यादा अमरीका में 1,064572 लोग संक्रमित व 61,669 संक्रमितों की मौतें हो चुकी हैं।



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अपने यूट्यूब चैनल से बताती हैं ऐसे रखें कोरोना संक्रमण से घर को सुरक्षित

लेकिन महिलाएं अपने घर को किस तरह नियमित साफ-सफाई से ही संक्रमण मुत रखें यह बताने के लिए एक अमरीका के नेब्रास्का की रहने वाली शाना वॉन नॉरिंग ने खास यू-ट्यूब चैनल बनाया है। यहां वे घर को कोरोना वायरस से बचाने के टिप्स और सफाई के सही डिस-इन्फेक्शन तरीके पर रोज वीडियो अपलोड करती हैं जो काफी उपयोगी हैं।
दरअसल वॉन एक हाउसमेड हैं और सालों से सफाई की बारीकियों से लोगों को परिचित कराती रही हैं। कोरोना प्रकोप के दौरान जब लोग अपने घरों में लॉकडाउन हैं तो उन्होंने अपने यू-ट्यूब चैनल के माध्यम से लोगों को सफाई का सही तरीका और घर को संक्रमण मुक्त करने के बारे में जागरूक करने की सोची। सोशल मीडिया और यू-ट्यूब चैनल के माध्यम से वे अब लोगों तक बेहद काम के टिप्स शेयर कर रही हैं।

अपने यूट्यूब चैनल से बताती हैं ऐसे रखें कोरोना संक्रमण से घर को सुरक्षित

उन्होंने एक आठ वीडियो की श्रृंखला में वे अपने घर को वायरस से बचाने के लिए दरवाज़े के हैंडल, लाइट स्विच, पायदान, सामान लाने की बकेट, जूते, बाहर पहनकर गए कपड़ों और ऐसी ही अन्य चीजों को ठीक से साफ करने की सलाह देती हैं क्योंकि इससे वायरस के घर में प्रवेश करने की आशंका बनी रहती है। उनका का कहना है कि ये बहुत साधारण बातें हैं लेकिन नियमित दिनचर्या में हम इन पर बहुत ज्यादा ध्यान नहीं देते और यही हमारे वायरस के संपर्कमें आने का कारण बनती हैं।



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दुनिया के ये 5 कोरोना वॉरियर हैं वैक्सीन बनाने के सबसे करीब

कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के लिए एक टीका या संभावित उपचार विकसित करना एक बेहद दुष्कर, श्रमसाध्य और धीमी गति से किया जाने वाला विस्तृत प्रयास है। एक ऐसे यौगिक का पता लगाना जो वायरस को नष्ट करने या कम करने का काम करता है, फिर जानवरों पर इसका परीक्षण करना और उसके बाद इसे मानव उपयोग के लिए विभिन्न नैदानिक परीक्षणों पर परखने में वर्षों लग सकते हैं। यहां तक कि वायरोलॉजी और महामारी विज्ञान में शीर्ष विशेषज्ञ भी अभी इस वायरस का कोई पुख्ता इलाज नहीं ढूंढ पाए हैं। एशिया से लेकर यूरोप, उत्तरी अमेरिका और अफ्रीका तक कोरोना संक्रामक रोग विशेषज्ञ टीके का परीक्षण कर रहे हैं। वायरस के लिए नए परीक्षण विकसित कर रहे हैं या प्रकोप को नियंत्रित करने के लिए नवीन सार्वजनिक स्वास्थ्य रणनीतियों को विकसित कर रहे हैं। आइए जानते हैं इनमें से कुछ कोरोना नायकों के बारे में-

दुनिया के ये 5 कोरोना वॉरियर हैं वैक्सीन बनाने के सबसे करीब

साराह गिल्बर्ट (ब्रिटेन)
इम्यूनोलॉजिस्ट साराह गिल्बर्ट वर्तमान में कोरोना वायरस से दुनिया को बचाने वाले उन अग्रणी संकट नायकों में से एक हैं जो वायरस का संभावित टीका बनाने के सबसे करीब हैं। वे ऑक्सफोर्ड के जेनर इंस्टीट्यूट में वे नोवेल कोरोनावायरस के टीके के नैदानिक परीक्षणों की जांच कर रही हैं। गिलबर्ट का कहना है कि उन्हें टीका बनाने के लिए एक बार में करीब 5.7 करोड़ (57 मिलियन ) चीजें छाननी पडीं, जो वायरस का एक संभावित टीका तैयार कर सकती थीं। गिल्बर्ट ने मर्स कोरोना वायरस के लिए भी सऊदी अरब में मानव परीक्षण किया था। जैसे ही शंघाई के वैज्ञानिकों ने वायरस के लिए आनुवांशिक अनुक्रम जारी किया, गिल्बर्ट की टीम ने चूहों में परीक्षण करने के लिए कोविड-19 के खिलाफ एक टीका बनाना शुरू कर दिया। उन्होंने मर्स वैक्सीन की उसी तकनीक का उपयोग करते हुए कोविड-19 वैक्सीन बनाने का काम शुरू कर किया। गिल्बर्ट उन शोधकर्ताओं में भी शामिल थीं जिन्होंने 2015 में विश्व स्वास्थ्य संगठन के लिए इबोला और मर्स के खिलाफ टीके विकसित करने में मदद की। दुनियाभर में कोविड-19 वायरस की वैक्सीन विकसित करने वाले लगभग तीन दर्जन वैज्ञानिकों में गिल्बर्ट शीर्ष 10 वैज्ञानिकों में से एक हैं।

दुनिया के ये 5 कोरोना वॉरियर हैं वैक्सीन बनाने के सबसे करीब

आन्द्रे कालिल (अमरीका)
कोरोना का एक टीका तैयार होने में अब भी 12 से 18 महीने का समय है लेकिन इस बात की उम्मीद की लगातार बढ़ रही है कि वैज्ञानिलक जल्द ही कोई कारगर वैक्सीन बना लेंगे। ऐसी ही एक उम्मीद हैं नेब्रास्का मेडिकल सेंटर विश्वविद्यालय में निमोनिया में विशेषज्ञता रखने वाले 54 वर्षीय चिकित्सक और वैज्ञानिक आंद्रे कालिल जो अपने स्तर पर कोरोना के टीके के नैदानिक परीक्षणों (क्लिीनिकल ट्रायल्स) को करीब से देख रहे हैं। ब्राजील में जन्मे संक्रामक रोग विशेषज्ञ अमरीका में विकसित हो रही कोरोना वैक्सीन बनाने का काम कर रहे हैं। वे यह निर्धारित करने पर ध्यान लगा रहे हैं कि क्या रेमेडिसविर नामक एक प्रयोगात्मक दवा कोरोनोवायरस रोगियों पर प्रभावी है या नहीं। दर्जनों अस्पतालों में 100 से अधिक रोगियों के साथ परीक्षण कर चुके आन्द्रे को एक या दो सप्ताह में प्रारंभिक परिणाम मिल जाएंगे। उन्हें विश्वास है कि रेमेडिसविर एक गेम चेंजर हो सकती है। जैसे ही कालिल ने जनवरी में चीन में कोरोनावायरस के बारे में पढ़ा उन्होंने संभावित उपचारों की जांच शुरू कर दी। आन्द्रे का कहना है कि रेमेडिसविरसार्स और मर्स जैसे कोरोना वायरस के खिलाफ प्रभावी रही है ऐसे में कोविड-19 के इलाज में भी इससे सफलता मिलने की उम्मीद है। संक्रामक रोग विशेषज्ञ कालिल कहते हैं कि उन्होंने 2014-16 में आए इबोला के प्रकोप से महत्वपूर्ण सबक सीखे। लेकिन सरकारें अब भी वहीं गलती दोहरा रहीं हैं।

दुनिया के ये 5 कोरोना वॉरियर हैं वैक्सीन बनाने के सबसे करीब

माइकल रेयान (डब्ल्यूएचओ)
एक ट्रॉमा सर्जन के रूप में प्रशिक्षित आयरलैंड निवासी रेयान 1996 से महामारी विशेषज्ञ के रूप में काम कर रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन में कोरोनोवायरस का नेतृत्व करने वाले और संयुक्त राष्ट्र में आपातकालीन स्वास्थ्य स्थिति कार्यक्रम के प्रमुख माइकल रेयान कहते हैं कि कोरोना ने हमारे सामने अब तक की सबसे बड़ी चुनौती पेश की है। उस पर परेशानी यह है कि हम अब भी उन्हीं पुरानी दवाओं का उपयोग और पुन: परीक्षण करने को विवश हैं जिनका उपयोग हम 20 वर्षों से करते आ रहे हैं। डब्ल्यूएचओ के 194 सदस्य देशों में महामारी पर नियंत्रण पाना और इस दौरान महामारी से लडऩे के लिए देशों को तैयार करने के लिए विकासशील उपचार विधि और स्टॉक पाइलिंग संसाधनों को विकसित करना रेयान का काम है। दुनिया ने पिछले साल कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में इबोला महामारी को रोकने के लिए लगभग 1 बिलियन डॉलर खर्च किए, लेकिन आसपास के देशों ने 65 मिलियन डॉलर का केवल पांचवां हिस्सा ही प्राप्त हो सका जो उन्होंने अमीर देशों से अगले प्रकोप की तैयारी के लिए आर्थिक मदद के लिए अनुरोध किया था। उनका प्रमुख काम धनी राद्यट्रों से महामारी के उपचार संबंधी खर्च जुटाना और गरीब देशों तक उस मदद को पहुंचाना है।

दुनिया के ये 5 कोरोना वॉरियर हैं वैक्सीन बनाने के सबसे करीब

अमाडू अल्फा सल्ल (सेनेगल)
अफ्रीका महाद्वीप के 46 देशों की कुल 1.2 बिलियन आबादी में अभी 5 हजार से ज्यादा कोरोना संक्रमित मामले हैं। इन देशों की नाजुक स्वास्थ्य प्रणाली पहले से ही मलेरिया, एचआईवी और इबोला से जूझ रही है। कोविड-19 से इसे और अधिक खतरा पैदा हो गया है। अफ्रीका को कोरोना समेत अन्य खतरनाक वायरस से बचाने का जिम्मा 50 वर्षीय संक्रामक रोग विशेषज्ञ अमाडू अल्फा सल्ल का है जो एक वैश्विक अनुसंधान केंद्र इंस्टीट्यूट पॉश्चर की सेनेगल शाखा का नेतृत्व करते हैं। जनवरी में जब सल्ल ने चीन में कोरोना के बारे में सुना तो उन्होंने तभी से तैयारी शुरू कर दी थी। उप-सहारा देश नाइजीरिया में 27 फरवरी को पहला कोरोना मामला सामने आने पर सल्ल ने दो प्रमुख प्रयोगशालाओं में एक साथ परीक्षणों की शुरुआत की। फ्रांस और ब्रिटेन में वायरोलॉजी और सार्वजनिक स्वास्थ्य का अध्ययन करने वाली सल्ल ने वायरस जनित प्रकोपों पर दुनिया भर की सरकारों को सलाह देते हैं। वे अपने अफ्रीकी सहयोगियों के साथ 18 घंटे से भी ज्यादा काम कर रहे हैं ताकि कोरोना का संभावित टीका बनाया जा सके। अभी ब्रिटेन में अपने एक साझेदार वैज्ञानिक के साथ सल्ल कोविड-19 के लिए संभावित टीका विकसित करने पर काम कर रहे हैं। टीके के परीक्षण परिणाम के आधार पर वे कहते हैं कि अगर यह टीका सफल रहा तो मात्र 10 मिनट में वायरस को खत्म कर सकता है। हालांकि टीका बनाने की लागत एक बड़ी चुनौती है। साथ ही उनका उद्देश्य कमजोर स्वास्थ्य प्रणालियों वाले देशों के लिए भी इस टीके को सस्ता बनाना है। उनकी परीक्षण तकनीक अन्य बीमारियों के लिए काम करने के लिए भी डिज़ाइन की गई है।

दुनिया के ये 5 कोरोना वॉरियर हैं वैक्सीन बनाने के सबसे करीब

लियो यी सिन (सिंगापुर)
कोरोना वायरस का सफलतापूर्वक नियंत्रण करने के लिए सिंगापुर के चिकित्सकीय और प्रबंधकीय मॉडल की दुनिया भर में प्रशंसा की जा रही है। सिंगापुर के इस सफल मॉडल के पीछे संक्रामक रोगों के राष्ट्रीय केंद्र की कार्यकारी निदेशक लियो यी सिन की भूमिका कोसबसे महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है। 2003 में सार्स और 2009 में स्वाइन फ्लू से लोहा ले चुकी सिन का अनुभव उनके देश के बहुत काम आ रहा है। जनवरी की शुरुआत में वुहान से वायरस की खबरें सामने आने पर उन्होंने देश में तुरंत वायरस नियंत्रण की शुरुआत की। क्योंकि वे जानती थी कि चीन और सिंगापुर के बीच व्यापक संबंधों को देखते हुए इसे अनिवार्य रूप से लागू करना पड़ेगा। 60 वर्षीय सिन कहती हैं कि हमने सिंगापुर में 23 जनवरी को पहला मामला सामने आने से पहले ही अपना परीक्षण तंत्र विकसित कर लिया था और बड़े पैमाने पर जांच करने के लिए तैयार थे।

दुनिया के ये 5 कोरोना वॉरियर हैं वैक्सीन बनाने के सबसे करीब

सिंगापुर ने रोजाना 2 हजार से अधिक परीक्षण कर सकता है। सिन के केंद्र में शोधकर्ताओं ने तुरंत पॉजिटिव रोगियों में वायरस का अध्ययन शुरू किया। वे जल्द ही वैक्सीन विकसित करने की उममीद कर रही हैं। उन्होंने सिंगापुर के स्वास्थ्य मंत्रालय के लिए एक रणनीति बदलाव की सलाह देते हुए कहा कि चिकित्सकों के जरिए वे पूरे देश में वायरस के लक्षण नजर आने पर प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम पांच दिन की चिकित्सा अवकाश केसाथ क्वारनटाइन में रहने की सलाह दें ताकि वे घर पर रहें और बीमारी न फैले। उनके नेतृत्व में संक्रमित लोगों के संपर्कों को ट्रेस और अलग करते हुए सिंगापुर ने रैपिड परीक्षण की रणनीति अपनाई। 5.7 मिलियन की आबादी वाले सिंगापुर ने बिना स्कूलों या शॉपिंग मॉल को बंद किए ही वायरस के प्रसार को सीमित करने में कामयाब रहा है।



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इस डिजाइनर ने प्लास्टिक बबल से बनाया कोरोना शील्ड ताकि संक्रमण से बच सकें

दुनिया के ज्यादातर हिससों में अब भी लॉकडाउन है लेकिन कुछ जहग दूट भी मिल रही है। ऐसे में लोग धीरे-धीरे अब अपनी सामान्य दिनचर्या की ओर वापस लौटने लगे हैं। लेकिन कोरोनोवायरस का डर अभी भी बना हुआ है। संक्रमण की चपट में आने से बचने के लिए एक डिजायनर ने खास 'बबल शील्ड' बनाई है जजो सौर ऊर्जा से चलती है। इटली के एक डिज़ाइन स्टूडियो की डिजायनर एकातेरिना शचीना ने 'लिबरो' ने एंटी-कोरोनावायरस सुरक्षात्मक उपकरणों का एक प्रोटोटाइप बनाया है जिसे लोग बाहर जाने पर पहन सकते हैं। यह एक आवरण की तरह हमारे चारों ओर सुरक्षा घेरा बना देता है ताकि संक्रमण हम तक न पहुंचे। यह उपकरण सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा के साथ ही बबल शील्ड में जा रही हवा को भी फिल्टर कर देता है। जिससे सुनिश्चित होता है कि इसे पहनने वाला कोविड-19 वायरस से सुरक्षित है और स्वच्छ हवा में सांस ले रहा है।

इस डिजाइनर ने प्लास्टिक बबल से बनाया कोरोना शील्ड ताकि संक्रमण से बच सकें

ये फीचर बनाते इसे खास
यह बबल शील्ड एक थर्मिक-वेल्डेड एटफी से बनी है जो एक प्रकार का फ्लोरीन-आधारित प्लास्टिक है। इसमें ऊपर से नीचे तक एक जिप लगी है जिससे इसे आसानी से पहना और उतारा जा सकता है। इसके बैकपैक में एक बैटरी पैक भी है जो इसमें लगे पंखे और एयर पंप कंप्रेसर जैसे उपकरणों को चलाता है। इससे ही हवा फिल्टर और वेंटिलेशन होता है। इतना ही नहीं यह प्रोटोटाइप सौर ऊर्जा से चलता है। इसका डिजायन केवल कोरोना वायरस से ही बचाव नहीं करता है बल्कि यह प्रदूषण से बचने का भी उपाय भी है। इसलिए इसे कोरोनोवायरस के बाद भी इस्तेमाल किया जा सकता है। हवा को फिल्टर करने के लिए शील्ड का मैकेनिज्म इसकी सतह पर पराबैंगनी विकिरण नेटवर्क का उपयोग करता है जो कोरोनोवायरस को मारता है। यह एक बैकपैक की तरह पहना जा सकता है और आसानी से फोल्ड कर बैग में भी रखा जा सकता है।

इस डिजाइनर ने प्लास्टिक बबल से बनाया कोरोना शील्ड ताकि संक्रमण से बच सकें

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देश को कोविड-19 के संक्रमण से बचाने वाली टीम के ये हैं 'कोरोना वारियर्स'

कोरोना वायरस निपटने में जिस तरह भारत ने अभी तक समझदारी दिखाई है विश्व स्वास्थ्य संगठन समेत पूरी दुनिया उसकी कायल हो गई है। कोरोनोवायरस से निपटने के लिए जनता कफ्र्यू, 21 दिन के लॉकडाउन, लॉकडाउन 2.0 और महाकफ्र्यू जैसे उपाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्ययोजना में देखने को मिले हैं। लेकिन इन समझदारी भरे फैसलों को लेने से पहले स्वयं प्रधानमंत्री जिन लोगों से चर्चा करते हैं उनके बारे में हम बहुत कम जानते हैं। देश को कोरोना वायरस के प्रकोप से बचाने के पीछे 30 से अधिक डॉक्टरों और वैज्ञानिकों की एक टीम का दिमाग है जो दो विशेष टीमों के रूप में दिनरात हमारी सुरक्षा के लिए काम कर रहे हैं।

देश को कोविड-19 के संक्रमण से बचाने वाली टीम के ये हैं 'कोरोना वारियर्स'

वैज्ञानिकों और चिकित्सकों की दो टीम
संक्रमण को रोकने, तुरंत उपाय करने, हॉटस्पॉट न बनने देने, लॉकडाउन के दौरान तेजी से जांच परीक्षण करने और इलाज में तीव्रता जैसे लक्ष्य लेकर दो टीमों का गठन किया गया था। एक टीम में देश के शीर्ष वैज्ञानिक हैं जो वैक्सीन बनाने ओर संभावित इलाज खोजने में लगे हुए हैं जबकि दूसरी टीम में चिकित्सक हैं जो देशभर के अस्पतालों और डॉक्टर्स से संपर्क कर उन्हें जरूरी गाइडलाइन उपलब्ध करवा रहे हैं। टीम का मुख्य कार्य कोरोना महामारी के संबंध में प्रत्येक तकनीकी नीति निर्णय पर पीएम को सलाह देना है। यह प्रकोप की प्रकृति का आकलन करने और संक्रमण को कैसे नियंत्रण में रखा जाए पर भी काम कर रहे हैं। 18 मार्च को गठित पहला समूह नीती अयोग के सदस्य डॉ. वी.के.पॉल की अगुवाईमें 20 अन्य सदस्य केसाथ काम कर रहा है। वहीं दूसरी टीम की सह-अध्यक्षता पॉल और प्रधान मंत्री के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार के.विजयराघवन और नौ अन्य सदस्य कर रहे हैं। दोनों टीमें मिनट-टु-मिनट प्रणाली के आधार पर प्रधान सचिव के साथ पीके मिश्रा के संपर्क में हैं जो प्रधानमंत्री मोदी को जानकारी देते हैं।

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कोरोना टास्क फोर्स
वीके पॉल के नेतृत्व वाली इस टीम को कोरोना टास्क फोर्स भी कहा जाता है जिसमें स्वास्थ्य विशेषज्ञ शामिल हैं। पॉल के अलावा इस टीम में स्वास्थ्य सचिव प्रीति सूदन, एम्स निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया, भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ्र(आईसीएमआर) के महानिदेशक बलराम भार्गव और सूक्ष्म जीव विज्ञान में स्वास्थ्य विशेषज्ञ शामिल हैं। वैज्ञानिक और आईसीएमआर संक्रामक रोग विशेषज्ञ डॉ. रमन गंगाखेड़कर और डॉ. निवेदिता गुप्ता भी टास्क फोर्स का हिस्सा हैं। इनके अलावा टीम में आईसीएमआर के इंस्टीट्यूट ऑफ एपिडेमियोलॉजी के सदस्य भी शामिल हैं जो बीमारी के गणितीय मॉडलिंग को संभालते हैं और कोरोनावायरस की प्रकृति और प्रसार का निर्धारण करते हैं। यह समूह वायरस के प्रभावों का भी आकलन कर रहा है।

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क्रियान्वयन की जिम्मेदारी इन पर
दूसरी टीम विज्ञान एजेंसियों, वैज्ञानिकों और नियामक निकायों के बीच समन्वय और कोविड-19 वायरस से संबंधित क्रियान्वयन के लिए त्वरित निर्णय लेने का काम करती है। टीम में संयुक्त रूप से वी.के. पॉल और के. विजयराघवन के अलावा, आईसीएमआर शोधकर्ता, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ, जैव प्रौद्योगिकी, वैज्ञानिक, औद्योगिक अनुसंधान केंद्र, के शोधकर्ता, रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन के सचिव शामिल हैं। यह समूह विज्ञान, प्रौद्योगिकी और अनुसंधान से संबंधित मामलों को तय करने में पीएम मोदी की सहायता कर रहा है। उदाहरण के लिए सभी राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं को भारत में कोविड-19 के नैदानिक परीक्षण करने की अनुमति देने का निर्णय लेने में इसी टीम की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। केन्द्र सरकार ने अलग-अलग क्षेत्रों के एक्सपट्र्स को साथ लेकर स्पेशल टीम बनाई है जो फैसले लेने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मदद करती है। आइए जानते हैं प्रधानमंत्री के इन सभी सेनापतियों के बारे में जो देश को इस वायरस महामारी से बचाने के लिए अथक प्रयास कर रहे हैं।

देश को कोविड-19 के संक्रमण से बचाने वाली टीम के ये हैं 'कोरोना वारियर्स'

01. प्रीति सूदन: इतनी महत्त्वपूर्ण की एक्सटेंशन दिया
हाल ही एक्सटेंशन पाने वाली कोरोना टास्क फोर्स की सबसे मजबूत कड़ी में से एक स्वास्थ्य सचिव प्रीति सूदन लगातार राज्यों के संपर्क में रहीं और वहां के हालातों का जायजा लिया। केन्द्र से लेकर राज्यों तक वे दोनों के बीच की अहम कड़ी हैं और केंद्र के सभी विभागों के साथ तालमेल बिठाकर काम को गति प्रदा करती हैं ताकि सरकार की सभी त्वरित नीतियां समय पर क्रियान्वित हो सकें। चीन के वुहान शहर से 645 भारतीय छात्रों को सही-सलामत निकालने के बाद वे प्रधानमंत्री की विश्वासपात्रों में शामिल हो गईं। आंध्र प्रदेश कैडर की 1983 बैच की प्रीति जून 2019 में स्वास्थ्य सचिव बनी थीं। केरल में आई बाढ़ में भी उन्होंने अपनी सूझबूझ का परिचय दिया था।

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02. डॉ.वी के पॉल: टास्क फोर्स के सेनापति
कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए बनाई गई कोरोना टास्क फोर्स के कर्ताधर्ता नीति आयोग के सदस्य डॉ. वीके पॉल हैं। इस टीम के सदस्यों के साथ मिलकर वे कोरोना वायरस प्रभावित राज्यों में आपातकालीन सेवाएं, फ्रंटलाइन में संक्रमितों के इलाज में जुटे चिकित्सकों और नर्र्सिंगकर्मियों के लिए महत्त्वपूर्ण चिकित्सकीय पीपीई किट, उपकरण और दवाओं के निर्बाध वितरण को सुनिश्चित कर रहे हैं। कोरोना वायरस को लेकर देश में चल रही शोध टीमों के भी वे सदस्य हैं और उन्हें जरूरीसलाह भी दे रहे हैं। इस टीम ने ही प्रयोगशाला परीक्षण शुरू करने का सुझाव दिया था।

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03. के. विजयराघवन: टीका बनाने पर है जोर
पद्म श्री सम्मान से नवाजे जा चुके कृष्णास्वामी विजयराघवन भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार हैं। वीके पॉल के साथ मिलकर वे देश की वैज्ञानिक संस्थाओं का नेतृत्व कर रहे हें जो कोरोना का संभावित इलाज और टीका बनाने पर काम कर रही है। उन्होंने विकासात्मक जीव विज्ञान, आनुवंशिकी और न्यूरोजेनेटिक्स पर शोधकार्य किया है। उनका शोध मुख्य रूप से उन महत्वपूर्ण सिद्धांतों और तंत्रों पर केंद्रित है जो विकास के दौरान तंत्रिका तंत्र और मांसपेशियों को नियंत्रित करते हैं। उनकी टीम में टीम में आईसीएमआर के इंस्टीट्यूट ऑफ एपिडेमियोलॉजी के सदस्य भी शामिल हैं जो बीमारी के गणितीय मॉडलिंग को संभालते हैं और कोरोनावायरस की प्रकृति और प्रसार का निर्धारण करते हैं।

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04. बलराम भार्गव: परीक्षण की जिममेदारी संभल रहे
आज इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च का नाम हर कोई जानता है। यह संस्थान ही आज पूरे देश में कोरोना वायरस से संबंधित आंकड़े जुटाने और देशभर में संक्रमितों की पहचान करने के लिए वृहद स्तर पर परीक्षण कर रहा है। इस महत्त्वपूर्ण काम की देखरेख भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के महानिदेशक बलराम भार्गव पर है। मरीजों के प्रतिदिन आंकड़े आईसीएमआर की सहमति से ही जारी किए जाते हैं। देश में जो दो दर्जन कोरोना वैक्सीन पर काम हो रहा है उसका नेतृत्व भी भार्गव और उनकी टीम पर ही है।

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05. सीके मिश्रा: कोरोना से लड़ रहे हैं सीधी लड़ाई
1983 बैच के प्रशासनिक अधिकारी सी.के. मिश्रा पर वर्तमान में देश की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। वे फिलहाल देश में कोरेाना वायरस का पता लगाने, रैपिड टेस्टिंग, संक्रमितों के लिए तेजी से सुविधा संपन्न अस्पतालों को तैयार करने और क्वारंटीन प्रक्रिया की व्यवस्था संभाल रहे हैं। उनका काम किसी भी तरह देश में कोरोना वायरस के प्रसार को रोकना है। मिश्रा इस दुरूह काम में कितने सफल हुए हैं इसका अंदाजा देश में अब तक के हालातों को देखकर लगाया जा सकता है। महाशक्ति अमरीका ने भी जिस कोरोना वायरस के सामने घटने टेक दिए हैं वहीं भारत केे कोरोना नियत्रण का लोहा आज पूरी दुनिया मान रही है। सीके मिश्रा को स्वास्थ्य, शिक्षा, उद्योग और बिजली के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण सुधारों के लिएभी पहचाना जाता है। इतना ही नहीं उन्होंने बिहार के सबसे कठिन ग्रामीण क्षेत्रों में भी पोलियो उन्मूलन में अहम भूमिका निभाई है।

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पोर्टेबल वेंटिलेटर और ऑक्सीजन उपकरण के बाद नासा वैज्ञानिकों ने दिया एक और बेहतरीन उपकरण

हाल ही अमरीकी स्वास्थ्य विभग की मदद को कोरोना से जंग में उतरी नासा अब रोज कुछ न कुछ नया लेकर आ रही है। वाइटल वेंटिलेटर और ऑक्सीजन हुड बनाने के बाद अब नासा के इंजीनियर माइक बटगिएग ने एयरोस्पेस वैली पॉजिटिव प्रेशर हेलमेट बनाया है जिसका कैलिफोर्निया के एंटीलोप वैली अस्पताल में डॉक्टरों ने सफल परीक्षण किया है। नासा ने इसी सप्ताह से इस खास प्रेशर हेलमेट की 500 यूनिट का उत्पादन शुरू कर दिया है। कैलिफोर्निया स्थित नासा के आर्मस्ट्रांग फ्लाइट रिसर्च सेंटर ने एंटीलोप वैली हॉस्पिटल, लैंकेस्टर शहर, वर्जिन गैलेक्टिक, द स्पेसशिप कंपनी, एंटीलोप वैली कॉलेज और एंटीलोप वैली टास्क फोर्स के सदस्यों के साथ महत्वपूर्ण चिकित्सा उपकरणों की कमी को दूर करने के लिए मिलकर काम कर रही है।

पोर्टेबल वेंटिलेटर और ऑक्सीजन उपकरण के बाद नासा वैज्ञानिकों ने दिया एक और बेहतरीन उपकरण

नासा के प्रशासक जिम ब्रिडेनडाइन ने बताया कि हमारा पहला प्रोजेक्ट एयरोस्पेस वैली पॉजिटिव प्रेशर हेलमेट कोविड-1 हल्के लक्षणों वाले रोगियों के उपचार के लिए ऑक्सीजन हेलमेट का निर्माण करना था। इस हेल्मेट का इस्तेमाल करने से रोगियों को वेंटिलेटर की जरुरत नहीं पड़ती। डिवाइस निरंतर एक वायुमार्ग दबाव वाली मशीन की तरह कार्य करता है ताकि रोगी के संक्रमित फेफड़ों तक पर्याप्त ऑक्सीजन पहुंचाई जा सके।

पोर्टेबल वेंटिलेटर और ऑक्सीजन उपकरण के बाद नासा वैज्ञानिकों ने दिया एक और बेहतरीन उपकरण

इसके अलावा नासा ने अपनी ओहियो स्थित ग्लेन रिसर्च सेंटर के इंजीनियरों की मदद से एक भूतल परिशोधन प्रणाली (सर्फेस डिकंटैमिनेशन सिस्टम) भी विकसित किया है। यह उपकरण एक घंटे के भीतर एंबुलेंस में मौजूद वायरस को नष्ट कर देता है। इसकी लागत वर्तमान में उपयोग होने वाली प्रणालियों की लागत का एक फीसदी है। नासा वैज्ञानिक इसे एएमबीयू स्टैट कहते हैं जिसका उपयोग वर्तमान में पुलिस कारों और अन्य क्षेत्रों में किया जा रहा है। यह हवा में मौजूद वायरस के कणों को मार देता है। अब नासा कोविड-19 पर इस उपकरण की प्रभावशीलता को ज्यादा मारक बनाने के लिए अतिरिक्त शोध कर रहा है।



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कोविड-19 : आईटीआई कटक और पुणे ने बनाए रोबोट, महामारी के खिलाफ मिल सकेगी मदद

नई दिल्ली | कोरोनावायरस संक्रमण के दौरान देश मे कई तरह के प्रयोग और खोजे हो रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट स्किल इंडिया के अनुरूप कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय के तहत आने वाले आईटीआई कटक और पुणे ने रोबोट विकसित किए हैं। आईटीआई कटक ने एसएके रोबोटिक्स के सहयोग से रोबोट बनाया है, जबकि आईटीआई पुणे ने स्वयं इसको विकसित किया है।

आईटीआई द्वारा तैयार किए गए दोनों रोबोट स्वास्थ्य कर्मियों को संकट काल में हर संभव मदद उपलब्ध कराएंगे। माना जा रहा है कि इस तरह के विकास से युवाओं को स्किल के साथ, नए इनोवेशन के लिए भी प्रेरणा मिलेगी।

इस बारे में केंद्रीय कौशल विकास और उद्यमिता मंत्री महेंद्र नाथ पांडेय ने कहा, "आईटीआई कटक ने एक ऐसे रोबोट का विकास किया है, जो कोविड -19 की लड़ाई में बेहतर भूमिका निभा सकता है। इससे सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन किया जा सकेगा और इसमें मदद मिलेगी। मंत्रालय इस तरह के विचार को आगे बढ़ने का प्रयास करता रहेगा।"

उन्होंने आगे कहा कि यह प्रशंसनीय इनोवेशन न सिर्फ स्वास्थ्य कर्मियों को सहायता प्रदान करने का एक अच्छा उदहारण साबित होगा बल्कि देश के युवाओं को खुद के भीतर उद्यमशीलता की भावना के साथ ही अनुसंधान के क्षेत्र में आगे जाने के लिए उन्हें प्रेरित करेगा।"

कौशल विकास मंत्री के मुताबिक स्किल इंडिया आज अभ्यर्थियों को कौशल युक्त बना रहा है। इससे इनोवेशन फॉर इंडिया के रास्ते पर आगे चलने के लिए प्ररेणा भी मिल रहा है। उन्होंने कहा, "इस दिशा में आगे बढ़कर हम प्रधानमंत्री मोदी के कथन के अनुसार आत्मनिरभर बन सकेंगे।" कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय ने जानकारी दी है कि इस तरह के सकारात्मक प्रयास को बढ़ाने के लिए मंत्रालय हर संभव कोशिश कर रहा है। मंत्रालय ने उम्मीद जाहिर कर कहा कि इस प्रकार के प्रयोग से और संस्थानों को प्रेरणा मिलेगी।



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covid-19: कोरोना वायरस को हराएगा सुपर हीरो, जानें इसके बारे में

कोरोना वायरस को मात देने के लिए सुपर हीरो आगे आया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा भी इन सुपर हीरो पर ध्यान दिया जा रहा है ताकि संक्रमण को आसानी से हराया जा सके। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने भी सुपर पावर के साथ चलने की बात की है। इतना ही नहीं कोविड-19 के सुपर हीरो से नाम से एक पोस्टर भी जारी किया है, जिसमें साबुन, मास्क और अल्कोहल वाले हैण्ड सैनिटाइजर को वायरस से मुकाबला करने वाले सुपर हीरो के रूप में दिखाया गया है।

पोस्टर के माध्यम से यह सन्देश दिया जा रहा है कि कोरोना के संक्रमण से सुरक्षित रहना है तो साबुन और पानी से बार-बार अच्छी तरह से हाथ धोएं। बाहर से जब भी घर के अंदर आयें तो हाथों को अच्छी तरह से धोना कतई न भूलें। नाक, मुंह व आँख को न छुएं ।

इसी तरह कोविड-19 के दूसरे सुपर हीरो मास्क को भी बहुत अहम बताते हुए इसका उपयोग खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाने के लिए करने को कहा गया है। कोरोना का वायरस खांसने व छींकने से निकलने वाली बूंदों के संपर्क में आने से दूसरे व्यक्ति को संक्रमित कर सकता है, इसलिए खांसते या छींकते समय नाक व मुंह को ढककर रखें। मास्क को आसानी से घर पर भी बनाया जा सकता है।

वहीं, अल्कोहल आधारित सैनिटाइजर भी कोरोना की जंग में अहम भूमिका निभा रहे हैं। कोरोना को फैलने से रोकने के साथ ही कीटाणुओं को खत्म करने और खुद को सुरक्षित रखने में इनका इस्तेमाल बहुत ही प्रभावी है। पोस्टर में बताया गया है कि इन तीनों सुपर हीरो को अतिरिक्त ताकत सोशल डिस्टेंशिंग के पूर्ण पालन से मिलती है।



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Wednesday, 29 April 2020

यहां जानिए क्यों इतना खतरनाक होता है न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर

बॉलीवुड एक्टर इरफान खान को न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर (एनईटी) था। वर्ष 2018 में इरफान खान ने खुद ही ट्वीट कर इसकी जानकारी शेयर किए थे। इसका इलाज उन्होंने लंदन में करवाया था। वर्ष 2019 अप्रेल में वे इलाज कराकर देश वापस लौटे थे। डॉक्टर्स की मानें तो एनईटी बहुत खतरनाक बीमारी है। इस बीमारी में लक्षण बहुत कम या देरी से दिखते हैं। इसलिए जान जाने का खतरा बढ़ जाता है। वैसे तो यह बीमारी 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में अधिक होती है। जानते हैं एनईटी बीमारी के बारे में।

क्या है न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर
यह एक प्रकार का दुर्लभ ट्यूमर है जो शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकता है। यह हार्मोन्स बनाने वाली ग्रांथियों से संबंधित कैंसर होता है। इसमें हार्मोन बनाने वाली कोशिकाएं और नर्व दोनों ही प्रभावित होती हैं। अधिकांश न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर फेफड़े, अपेंडिक्स, छोटी आंत, रेक्टम और अग्नाशय में होते हैं। एनईटी में ज्यादातर मामलों में फेफड़े पहले संक्र्रमित होते हैं जिससे शरीर के दूसरे अंगों को ऑक्सीजन कम मिलने लगती है। कई बार ये ट्यूमर बिना कैंसर के भी हो सकते हैं।
एनईटी के संभावित लक्षण
न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर के हर मरीज में अलग-अलग लक्षण दिख सकते हैं। जिस अंग पर इसका दुष्प्रभाव पड़ता है उससे संबंधित लक्षण पहले दिखते हैं। जैसे हाई ब्लड प्रेशर की शिकायत के साथ, एंग्जाइटी अटैक, बुखार, सिरदर्द, अधिक पसीना आना, मितली, उल्टी, दिल की धडकऩों का अनियंत्रित तरीके से धडकऩा आदि लक्षण दिखते हैं। जिनके आंतों में संक्रमण होता है तो उसमें पेट दर्द, पीलिया, गैस्ट्रिक अल्सर, आंतों में परेशानी और वजन घटने जैसे लक्षण दिख सकते हैं। अगर दिमाग में होता है तो लकवा या नर्वस सिस्टम से जुड़े लक्षण दिखते हैं। वहीं कुछ मरीजों में शुगर लेवल अचानक से बढ़ या घट जाता है।

जल्दी पहचान होने पर इलाज संभव
इस बीमारी के कारणों का पता नहीं है। इसलिए बचाव नहीं किया जा सकता है। अगर बीमारी की पहचान जल्दी हो जाए तो इलाज संभव है। इस बीमारी के तीन स्टेज होते हैं। ग्रेड एक, दो और तीन। अगर ग्रेड एक में बीमारी की पहचान होती है तो दवाइयों के साथ सर्जरी से ट्यूमर को हमेशा के लिए निकाल दिया जाता है। इसके बाद मरीज 5-10 साल जीवन व्यतीत कर सकता है। वहीं ग्रेड तीन में लक्षण दिखते हैं तो रेडियोथैरेपी और कीमोथैरेपी की भी जरूरत होती है। इसमें इलाज के बाद भी मरीज एक-दो जीवित रहता है।
डॉ. संदीप जसूजा, मेडिकल सुपीरिटेंडेंट, स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट, जयपुर



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Tuesday, 28 April 2020

इस देश ने खुद को कोरोना वायरस से मुक्त घोषित किया

दुनिया भर में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों के बढ़ते मामलों के बीच 26 अप्रेल को न्यूजीलेंड के प्रधानमंत्री जैसिंडा अर्डर्न ने अपने देश से 'कोरोना उन्मूलन' की घोषणा करते हुए कहा कि हमने यह लड़ाई जीत ली है। प्रधानमंत्री जैसिंडा दावा करती हैं कि सरकार ने देश में कोरोना वायरस के सामुदायिक प्रसारण को रोक दिया है। लेकिन उन्होंने वायरस को कैसे रोका इस बारे में उन्होंने ज्यादा कुछ नहीं बताया है। अब इस घोषणा के बाद सरकार देश में लॉकडाउन में ढील देने की तैयारी कर रही है। बीते कई दिनों में कोई नया मामला दर्ज नहीं होने पर पीएम अर्डर्न ने कहा कि देश अब सामान्य दिनचर्या में वापस आ सकता है। इस बीच मंगलवार से गैर-आवश्यक व्यवसाय, स्वास्थ्य सेवा कार्यालय और शिक्षा गतिविधियों को फिर से शुरू किया जाएगा। हालांकि न्यूजीलैंड के नागरिकों को अब भी अपने घरों से अनावश्यक बाहर जाने के लिए मना किया गया है।

कोरोना उन्मूलन को ऐसे समझें-
पीएम अर्डर्न ने कहा कि उनका यह कदम अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने के लिए है। वे अब भी लोगों को फिजिकल डिस्टैंसिंग के लिए कह रही हैं। वहीं न्यूजीलैंड के स्वास्थ्य महानिदेशक एशले ब्लूमफील्ड ने सरकार की कार्रवाई के बारे में कहा कि हाल के दिनों में नए मामलों की गिरावट के आधार पर हमारा अनुमान है कि देश ने कोरोना उन्मूलन के लक्ष्य को प्राप्त कर लिया है। उन्होंने यह भी कहा कि कोरोना उन्मूलन की घोषणा का यह मतलब नहीं है कि अब कोई नया मामला सामने नहीं आएगा लेकिन अब हम यह जानते हैं कि वह कहां से आएगा।

कैसे पाया कोरोना पर काबू-
पीएम अर्डर्न ने कहा कि न्यूजीलैंड उन देशों में से एक है जिन्होंने देश में पहली बार पॉजिटिव कॉरोनोवायरस केस मिलने पर लॉकडाउन लागू किया था।यही कारण कि हमारे यहां कोरोना से हुई मौतों का आंकड़ा बेहद कम है। हमने समझदारी फैसले वायरस के सामुदायिक संप्रेषण की सिथति में आने से पहले ही अपनी सीमाओं को बंद कर दिया, लॉकडाउन, क्वारनटाइन,सेल्फ आइसोलेशन, रैपिड टैस्ट और कड़ी निगरानी से इस पर काबू पाया और ज्यादा क्षेत्रों तक फैलने नहीं दिया। इससे देश में हॉटस्पॉट बन ही नहीं पाए। उन्होंने बताया कि लोगों को कम से कम लोगों के बीच रहने को कहा गया था यानी जितना हो सके अकेले या गिनती के लोगों के साथ लॉकडाउन का पालन करें। सभी से कम से कम ६ फीट की दूरी बनाए रखें। इन सब उपायों के एकदम सही समय पर क्रियान्वित होने से देश आज खुद को कोरोना उन्मूलन की घोषणा करने में सक्षम बना पाया है।



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कोरोना वायरस के प्रसार पर नजर रखने के लिए बनाया मैप

हाल ही सोशल मीडिया दिग्गज फेसबुक के मालिक मार्क जुकरबर्ग ने बताया कि कोरोना वायरस से मुकाबला करने में वे भी अपना योगदान दे रहे हैं। उनकी कंपनी और कार्नेगी मेलन विश्वविद्यालय ने साथ मिलकर दुनिया भर में संभावित कोविड-19 मामलों के प्रसार पर नजऱ रखने में मदद कर रहे हैं। खासकर उन देशों में जहां अभी तक कोरोना के प्रसार को रोकने का कोई ठोस उपाय नहीं किया जा सका है। फेसबुक ने कार्नेगी मेलन विश्वविद्यालय के साथ मिलकर एक खास डिजिटल मैप भी बनाया है जिससे यह पता चलता है कि अमरीका सहित किन देशों में लोग कोरोना से ज्यादा संक्रमित लक्षणों का अनुभव कर रहे हैं। कंपनी ने एक लगातार अपडेट होने वाले सर्वेक्षण डेटा के आधार पर कार्नेगी मेलन के साथ मिलकर इस डिजिटल मैप को विकसित किया है। यह मैप खास रंग और उभरी हुई आकृति के साथ क्षेत्रीय स्तर तक नोवेल कोरोना वायरस के लक्षणों वाले अनुमानित आंकड़े प्रतिशत में दिखाता है।

फेसबुक को उम्मीद है कि वायरस के संबंध में हमारी समझ बढ़ाने में मैप का यह डेटा उपयोगी हो सकता है। क्योंकि वायरास के संक्रमण को रोकने के लिए पहले यह जानना बहुत जरूरी है कि यह कैसे फैल रहा है। इससे स्थानीय प्रशासन और सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारियों के लिए वेंटिलेटर और पीपीई जैसे आवश्यक संसाधनों के वितरण में भी आसानी होगी। शोधकर्ताओं का मानना है कि महामारी के इस दौर में सार्वजनिक निर्णय लेने में यह सर्वेक्षण मानचित्र महत्वपूर्ण उपकरण साबित हो सकता है। फेसबुक का कहना है कि इस सर्वेक्षण में 18 वर्ष से अधिक आयु के अमरीकी फेसबुक उपयोगकर्ताओं का एक नमूना भी शामिल है। अब कंपनी ने इस तकनीक को अलग-अलग देशों के अनुसार तैयार करने के लिए अतिरिक्त शोध शुरू कर दिया है। क्योंकि दुनिया भर में फेसबुक के 2 अरब यानी 2 बिलियन से अधिक सक्रिय उपयोगकर्ता हैं। इससे डिजिटल मैप पर प्रदर्शित होने वाला डेटा व्यावहारिक साबित हो सकता है। गोपनीयता संबंधी चिंताओं पर कंपनी का कहना है कि केवल कार्नेगी मेलन शोधकर्ता व्यक्तिगत सर्वेक्षण डेटा को देख सकते हैं। फेसबुक का कहना है कि वह रोज नए मामलों की जानकारी के साथ मैप को अपडेट करने की योजना बना रहा है।



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दुनियाभर में 30 लाख के पार पहुंची कोरोना मरीजों की संख्या

वाशिंगटन। जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के अनुसार, दुनिया भर में पुष्टि किए गए कोविड-19 मामलों की संख्या 30 लाख के पार हो गई है। मंगलवार की सुबह तक, कुल मामलों की संख्या 3,041,517 थी। विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर सिस्टम्स साइंस एंड इंजीनियरिंग (सीएसएसई) ने अपने ताजा अपडेट में इसका खुलासा किया है।

वहीं वैश्विक स्तर पर मौत का आंकड़ा बढ़कर 211,159 हो गया है। अमेरिका में स्थिति अब भी भयावह बनी हुई है। यहां अब तक 9,88,451 मामले सामने आ चुके हैं और 56,245 मौतें हो चुकी हैं। ये दोनों आंकड़े लंबे समय से दुनिया में शीर्ष पर बने हुए हैं।

सीएसएसई डेटा में दिखाया गया है कि कोविड-19 से बुरी तरह प्रभावित अन्य देशों में मामलों की संख्या की बात करें तो स्पेन 229,422 मामलों के साथ दूसरे स्थान पर है। इसके बाद इटली में 199,414 मामले, फ्रांस में 165,964 मामले, जर्मनी में 158,758 मामले, यूके में 158,348 मामले और तुर्की में 112,261 मामले हैं। मृत्यु दर को लेकर बात करें तो इटली में 26,977 मौतें हो चुकी हैं। वहीं स्पेन में 23,521 मौतें, फ्रांस में 23,293 मौतें और यूके में 21,092 मौत हो चुकी हैं।



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Monday, 27 April 2020

वायरस टेस्टिंग स्वाब के खत्म होने पर इन डॉक्टर्स ने निकाला ये तरीका

बोस्टन में इजरायली डीकोनैस चिकित्सा केन्द्र पर कोरोना वायरस टैस्ट में उपयोग होने वाली स्वाब स्टिक खत्म होने पर चिकित्सकों ने जांच परीक्षण रोकने की बजाय एक नया तरीका अपनाया। उनके पास केवल एक सप्ताह का ही स्टॉक बचा था। ऐसे में 43 वर्षीय डॉ. रैमी अर्नौट ने मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के अपने पुराने सहपाठियों से संपर्क किया। तब उनके दोस्तों ने 3डी प्रिंटर्स की सहायता से सैकड़ों स्वाब के नमूनों को जांचना शुरू किया। टीम का कहना है कि 3डी प्रिंटर प्रोटोटाइप से स्वाब के नमूने जांचने की यह गति अगले सप्ताह तक प्रतिदिन एक लाख तक पहुंच जाएगी। फिलहाल अभी वे चार 3डी प्रिंटर्स पर जांच परीक्षण कर रहे हैं। दरअसल नाक के रास्ते 6 इंच अंदर तक जानेवाली खास नासोफेरींजल स्वैब स्टिक की कमी को फिलहाल इस तरह से पूरा किया जा रहा है।

एमआइटी में अर्नौट के दोस्तों ने 22 दिन में दिनरात मेहनत कर चार उच्च गुणवत्ता वाले 3डी प्रिंटर बनाने में कामयाब हो गए जिससे जांच की गति में की नहीं आई। प्रत्येक प्रोटोटाइप को कम से कम 20 बार दोबारा बनाना पड़ा। अमरीका की खाद्य और औषधि प्रशासन यानी एफडीए ने भी इन प्रोटोटाइप डिजाइन को आपातकालीन उपयोग प्राधिकरणों को देने के लिए कहा है ताकि वहां भी इनका उपयोग किया जा सके।



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कोरोना मरीजों के लिए जानलेवा बन रही रक्त का थक्का जमने की समस्या

अटलांटा स्थित इमोरी विय्रवविद्यालय स्वास्थ्य विभाग में चिकित्सकों के सामने कोरोनावायरस से जुड़ी एक रहस्यमयी बीमारी का सामना करना पड़ रहा है। विभाग के क्रिटिकल केयर सर्जन डॉ. के्रग कूपरस्मिथ ने बताया कि उनके अस्पताल में थक्का-रोधी मशीन पर रखने के बावजूद मरीजों में खून के थक्के बनना बंद नहीं हो रहे। स्टाफ के अन्य सदस्यों ने बताया कि शहर के अन्य अस्पतालों में इलाज करा रहे गंभीर संक्रमण के रोगियों में भी यही बीमारी देखेन को मिल रही है।

कोरोना वायरस के संक्रमण से पीड़ित इन सभी मरीजों में से 40 फीसदी मरीजों में खून के थक्के बनना बंद नहीं हो रहे। चिकित्सकों का कहना है कि ऐसा प्रतीत होता है कि कोरोना वायरस ने अपने आपको बदल लिया है और यह म्यूटेंट वायरस श्वसन तंत्र पर ही नहीं बल्कि हमारे शरीर के अन्य महत्त्वपूर्ण अंगों को भी प्रभावित करता है। इस बीमारी से पीड़ित रोगी की रक्त वाहिनी में ऑक्सीजन का स्तर इतना कम हो जाता है कि वे मूर्छित हो रहे हैं और ज्यादा गंभीर स्थितियों में उनकी मृत्यु भी हो रही है। ऑटोप्सी की रिपोर्ट में कुछ रोगियों के फेफड़ों में सैकड़ों माइक्रोक्लॉट्स से भरे हुए थे। बड़े आकार के रक्त के थक्के बनने से मस्तिष्क या हृदय पर स्ट्रोक या दिल का दौरा पड़ सकता है।



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Covid-19: घरेलू जानवरों में भी सामने आ रहे कोरोना पॉजिटिव मामले

चीन के वुहान शहर में चमगादड़ और पेंगोलिन से कोराना वायरस फैलने की अब भी पुष्टि नहीं हो सकी है लेकिन इस बीच कोविड-19 नोवेल कोरोना वायरस ने जानवरों को भी संक्रमित करना शुरू कर दिया है। अमरीका का न्यूयॉर्क शहर इस समय कोरोना प्रकोप का केन्द्र बना हुआ है। दो हफ्ते पहले यहां के जू में एक तीन वर्षीय बाघिन में कोरोना वायरस के होने की पुष्टि हुई थी। इसके बाद हाल ही में शहर की दो पालतू बिल्लियों में भी कोरोनोवायरस का परीक्षण पॉजिटिव आया है। अमरीका के पशु एवं कृषि विभाग और रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र ने भी इसकी पुष्टि की है। दोनों बिल्लियों में सांस लेने में परेशानी के लक्षण दिखाई देने पर इनकी जांच की गई थी। इनमें से एक बिल्ली का मालिक भी कोरोना पॉजिटिव है जबगकि दूसरी बिल्ली के मालिक का भी कोरोना परीक्षण करवाया गया है। अमरीका में 8 लाख से ज्यादा पालतू पशु रहते हैं जबकि कोरोना से अब तक देश में 45 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। लेकिन अमरीकी चिकित्सा विभाग का कहना है कि अब भी इस बात के पुख्ता प्रमाण नहीं हें कि यह वायरस जानवरों से इंसानों में फैलता है।

लेकिन कुछ विशेषज्ञ कोरोना के बढ़ते मामलों में पालतू जानवरों के मालिकों और जानवरों के संपर्क में आने वाले लोगों के पॉजिटिव होने पर सवाल उठाते हैं। वहीं अन्य देशों में भी कुछ पालतू जानवर कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। इनमें हांगकांग और बेल्जियम में एक्र-एक पालतू बिल्ली और दो श्वान शामिल हैं। श्वानों में वायरस के लक्षण नहीं दिखे लेकिन बिल्लियों में ये लक्षण स्पष्ट थे। ऐसे ही चीन के वुहान में 102 आवारा और आश्रयस्थलों में रहने वाले जानवरों में से 15 फीसदी में रक्त के नमूनों वायरस पाया गया था। यहां भी प्रयोगशाला में ऊदबिलाव और बिल्लियों में वायरस बेहद गंभीर था और दोनों ही इंसानों की तरह प्रतिक्रिया कर रहे थे। जबकि कुत्तों में वायरस का असर न के बराबर था वहीं सूअर, मुर्गियां और बतख बिल्कुल भी संक्रमित नहीं हुए थे। अध्ययन में केवल बिल्लियों में ही बीमारी के लक्षण नजर आए। वहीं बिल्लियां एक-दूसरे को भी संक्रमित करने में सक्षम थीं। इसलिए अगर आपके घर में भी पालतू बिल्ली है तो उसे मास्क लगाएं, इम्यूनिटी बढ़ाने वाले टीके लगवाएं और खुद भी सावधानी बरतें।



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coronavirus: 'कोरोना को कमजोर कर सकती है गर्मी, प्रतिरक्षा में बीसीजी वैक्सीन मददगार'

नई दिल्ली। धूप और गर्मी में कोरोनावायरस के फैलने का खतरा कम हो सकता है और बीसीजी वैक्सीन भी संक्रमण से आंशिक प्रतिरक्षा प्रदान कर सकती है। यह बात अमेरिका के यूपीएमसी शेडीसाइड पेंसिलवेनिया में डिस्चार्ज प्लानिंग के निदेशक रवि गोडसे ने आईएएनएस के साथ एक ईमेल साक्षात्कार में कही। गोडसे ने गंभीर रोगियों के लिए प्लाज्मा थेरेपी के उपयोग की सिफारिश भी की है।

साक्षात्कार के प्रमुख अंश:

प्रश्न: हाल ही में व्हाइट हाउस ने कहा कि कोरोनावायरस का प्रसार गर्मी के महीनों में कम हो सकता है। मई और जून में देश के अधिकांश हिस्सों में गर्मी चरम पर होगी। क्या आपको लगता है कि उच्च तापमान प्रकोप को रोकने में मदद करेगा?

उत्तर: गर्मी के महीनों में वायरल बीमारियां दूर हो जाती हैं। यह प्रवृत्ति अमेरिका जैसे देशों में अलग होती है, जहां अलग-अलग मौसम के साथ अत्यधिक ठंड (ज्यादातर राज्यों में) होती है और गर्मी भी होती है। गर्मियों में जहां सामाजिक गतिविधि अक्सर बाहरी स्थानों पर होती है, वहीं सर्दियों में गतिविधियां अधिकतर भीड़ वाले स्थानों और घर के अंदर होती हैं।

गर्मियों में आद्र्रता ऊपर भी जा सकती है, जिसका अर्थ है कि हवा में अधिक पानी की बूंदें होगी। अगर हवा पानी से संतृप्त या नम है और कोई व्यक्ति ऐसी हवा में वायरस की बूंदों को छींक के जरिए बाहर निकालता है तो संभावना है कि बूंदें जमीन पर तेजी से गिरेंगी, जिससे कम संक्रामक होने की संभावना है। इस तरह से इसका संक्षिप्त उत्तर है हां। क्योंकि इस लिहाज से गर्मी व धूप बेहतर हो सकती है।

प्रश्न: हाल ही में स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि प्रकोप को रोकने के प्रयासों ने भारत को तीसरी स्टेज या सामुदायिक संक्रमण के चरण में जाने से बचाया है। कई वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा कि कोविड-19 रोग नियंत्रण में है। देश में 20,000 से अधिक सक्रिय मामलों के साथ, क्या आपको लगता है कि चीजें नियंत्रण में हैं?

उत्तर: भारत एक बड़ा और आबादी वाला देश है और संभवत: अमेरिका के समान व्यवहार करेगा (हालांकि भारत में कम विदेशी यात्री हैं)। अमेरिका में सैन फ्रांसिस्को इंडियानापोलिस से बहुत अलग है; न्यूयॉर्क लास वेगास से अलग है। इसी तरह अगरतला मुंबई से अलग है और चेन्नई शिमला से अलग है। इसलिए भारत ऐसा व्यवहार करेगा जैसे कि अलग-अलग राज्य अलग-अलग राष्ट्र हों।

यह संभव है कि बीसीजी वैक्सीन (पहले से ही सभी भारतीयों को दी गई है) आंशिक प्रतिरक्षा प्रदान कर सकती है। मौसम मदद कर सकता है।

प्रश्न: प्लाज्मा थेरेपी पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?

उत्तर: गंभीर रोगियों के लिए प्लाज्मा का उपयोग करें। अगर हमें तीन सप्ताह में इसकी आवश्यकता है तो आज ही प्लाज्मा को इकट्ठा करना शुरू करें।

प्रश्न: अगर ठीक होकर दोबारा से बीमारी के चपेट में आने वाली स्थिति नहीं होती है और जुलाई में मामलों की संख्या में भारी वृद्धि नहीं होती है तो क्या यह कोरोना के खिलाफ एक बड़ी सफलता मानी जाएगी ?

उत्तर: एक ठीक हुए मरीज या समुदाय में होने वाले मामले के संदर्भ में दोबारा से ग्रस्त होने की बात की जा सकती है। जब कोई मरीज संक्रमित हो जाता है तो वह पहले आईजीएम, फिर आईजीजी एंटीबॉडी विकसित करता है। कुछ वायरल बीमारियों में (जैसे चिकन पॉक्स) सुरक्षा आजीवन हो सकती है। हमें नहीं पता है कि कोरोना के लिए आईजीजी सुरक्षा ठीक हो चुके मरीजों में कब तक रहेगी। अगर यह टिकाऊ है तो फिर से बीमारी से ग्रस्त नहीं होना चाहिए।

प्रश्न: हमें इस वायरल संक्रमण पर सीमित अनुभव है। इन परिस्थितियों में क्या हम कह सकते हैं कि लोग इस संक्रमण से बचने के लिए स्थायी एंटीबॉडी विकसित करेंगे?

उत्तर: इसके बारे में हमें केवल परीक्षण द्वारा पता चलेगा। एंटीबॉडी परीक्षण एक उपकरण होगा और इसे बिना कोई परवाह किए नियोजित करने की आवश्यकता है। अगर वायरस के खिलाफ आईजीजी विकसित होती है, ऐसे लोगों में भविष्य में बीमारी से प्रतिरक्षा दिखाई देगी। इससे देश को खोलने (लॉकडाउन) और अर्थव्यवस्था को फिर से शुरू करने में मदद मिलेगी। याद रखें कि वैक्सीन भी आने वाली है, जो कि कृत्रिम रूप से भी स्थायी एंटीबॉडी को प्रेरित करने की कोशिश करेगी।

प्रश्न: कोविड-19 के साथ कई अनिश्चितताएं हैं। एक बड़ी अनिश्चितता यह है कि क्या लोगों को फिर से वायरस हो सकता है। साक्ष्यों से पता चलता है कि ऐसा हो सकता है। कितने समय में हम वैक्सीन प्राप्त कर सकते हैं? इस वैक्सीन के बाद क्या हम कह सकते हैं कोरोनोवायरस के खिलाफ युद्ध जीत लिया गया है?

उत्तर: हमें यह जानने से पहले कि लोग पुन: संक्रमित हो रहे हैं, यह जानने की आवश्यकता है कि क्या वे पहले संक्रमित थे। क्या होगा, अगर उक्त व्यक्ति का किया गया पहला पॉजिटिव परीक्षण ही गलत हो? इसमें भ्रम की पर्याप्त गुंजाइश है। अगर कोई पहले परीक्षण में पॉजिटिव, दूसरे में नेगेटिव और तीसरे परीक्षण में फिर से पॉजिटिव पाया जाता है तो आप उन तीन परीक्षणों में से किसी में त्रुटि की संभावना को तो शामिल करेंगे ही। इस तरह की परिस्थिति में आप वास्तव में नहीं जान पाएंगे।

जल्द ही वैक्सीन आने की संभावना है। ऐसी कई दवाएं भी हैं, जिनसे बीमारी को काटने की कोशिश की जा रही है।

सुमित सक्सेना

आईएएनएस



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रोज 20 मिनट सफाई करने से मूड होगा अच्छा, बीमारियों से भी बचाव

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय (अमरीका) में हुए अध्ययन में कहा गया है कि कोई अगर रोजाना 20 मिनट सफाई करता है तो वह मानसिक रूप से हल्कापन महसूस करता है। मूड खराब नहीं होता है। दूसरी तरफ सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन का कहना है कि रोजाना घर में झाड़ू लगाने के साथ पोछा लगाते हैं तो सांस संबंधी रोगों से बचाव होता है। पोछे के साथ छोटे डस्ट पार्टिकल भी निकल जाते हैं जो झाड़ू से नहीं निकल पाते हैं। हैल्थ से जुड़े एक्सपर्ट का मानना है कि पोछा लगाना अच्छा एरोबिक्स है। इससे पूरे शरीर का व्यायाम होता है। फेफड़ों को सीधा लाभ मिलता है। एक घंटे तक सफाई करने पर 150-250 कैलोरी एनर्जी बर्न होती है। फ्लोरिडा स्टेट विश्वविद्यालय के शोध के अनुसार, बेडरूम और लिविंग एरिया में रोज पोछा लगाने से एलर्जी और सांस संबंधी रोगों से बचाव होता है। जुकाम, छींक, लाल दाने निकल आने जैसी समस्याओं में भी बचाव होता है।



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Sunday, 26 April 2020

POST CORONA : लॉकडाउन के बाद कोरोना से बचने के लिए अपनाएं ये आदतें

जैसा की हम सभी जानते हैं की पूरी दुनिया इस समय कोरोना महामारी से जूझ रही है। इस दौरान जब हम लंबे समय से अपने घर में है तो यह बहुत आवश्यक है की हम अपने आपको तन व मन से पूर्ण रुप से स्वस्थ रखें क्योंकि स्वस्थ रहकर ही हम कोरोनो से लड़ सकेंगे। इसके लिए संतुलित भोजन करें, नियमित व्यायाम करें। मन में नकारात्मकता न आने दें। खुद पर भरोसा रखें ताकि किसी भी स्थिति में आप उसका मुकाबला कर सकें।
ये लक्षण आएं तो खुद को करें क्वारेंटाइन
यदि आपको सांस संबंधी दिक्कत व कफ वाली खांसी आती है तो सबसे पहले अपने आप को घर में एक कमरे में क्वारेंटाइन कर लें। अधिक से अधिक तरल पदार्थ लें। विटामिन सी से जुड़ी चीजें खूब लें। यदि सांस में दिक्कत, खांसी में खून, कई दिनों तक तेज बुखार रहता है तो तुरंत अपने चिकित्सक को दिखाएं। जरूरी सलाह का पूरी तरह से पालन करें।
लॉकडाउन के बाद क्या सावधानियां बरतनी जरूरी
3 मई के लाॅकडाउन के बाद भी यदि हमें स्वस्थ व सुखद जीवन जीना है तो हमें सोशल डिस्टेंसिंग की पालना करनी होगी। क्योंकि कोरोना की संक्रामकता दर इससे पहले के वायरस की अपेक्षा बहुत ज्यादा व तीव्र है। इसलिए थोड़ी सी लापरवाही से यह फिर आ सकती है। इसलिए हमें खुद, परिवार व समाज के लिए सभी सावधानियों का पालन करना है। नियमित हाथ धोना है। मास्क लगाना है। बाहर थूकना नहीं है। आसपास साफ-सफाई का भी ध्यान रखना है। यदि इन बातों का ध्यान रखेंगे तो महामारी को हमेशा के लिए खत्म हो सकती है। ऐसा बिल्कुल नहीं है की 3 मई के बाद अगर लाॅकडाउन खत्म हो जाता है तो हमारा जीवन सामान्य हो जाएगा। हमें बाहर निकलने पर भी कई सारी सावधानियां बरतनी होगी। स्वयं व आसपास भी निगरानी रखनी होगी। यदि को संक्रमित दिखता है तो तुरंत हेल्पलाइन नंबरों पर कॉल कर स्वास्थ्य विभाग को सूचित करना है।
एक्सपर्ट : डॉ. रवी कांत पोरवाल, संक्रामक रोग विशेषज्ञ, जयपुर



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SPECIAL REPORT : नेपाल में कोरोना से क्यों नहीं हुई एक भी मौत

नेपाल में जरूरी सामान की दुकानें सुबह छह से नौ के बीच खुलती हैं। मास्क पहनना अनिवार्य नहीं लेकिन लोग खुद मास्क पहनते हैं। मित्रों व रिश्तेदारों से मिलना-जुलना बंद है। आवारा पशुओं को खाने-पीने की चीजें एनजीओ मुहैया करा रहे हैं। 24 मार्च को दूसरा केस आते ही भारत से एक दिन पहले लॉकडाउन घोषित कर दिया।
सुविधाओं का अभाव लेकिन इन कदमों से रोका प्रसार
ट्रैवेल हिस्ट्री

पहले जिनकी ट्रैवेल हिस्ट्री थी व उनके सम्पर्क में आए लोगों की स्क्रीनिंग, टेस्टिंग की गई।
रैपिड टेस्ट

देश में अब तक 9 हजार से ज्यादा पीसीआर टेस्ट किए गए हैं। 38 हजार से ज्यादा रैपिड टेस्ट किए गए हैं।
विमानों की आवाजाही पर रोक

लॉकडाउन के साथ ही यूरोप समेत पश्चिम एशिया के जापान, कोरिया, इरान, तुर्की व मलेशिया से आने वाले विमानों को प्रतिबंधित किया।
सेमिनार, कार्यक्रम रद्द: मंदिरों, मस्जिदों, चर्च, गुरुद्वारों सहित सार्वजनिक स्थलों पर 25 से अधिक लोगों के एकसाथ एकत्र होने पर प्रतिबंध लगा दिया है।
फिर भी बढ़ाया लॉकडाउन
पहला केस 15 फरवरी को आया था। ब्रिटेन से लौटी बुजुर्ग महिला संक्रमित मिली। पीएम केपी शर्मा ओली ने संक्रमण काबू में रहने के बावजूद लॉकडाउन को अग्रिम आदेशों तक बढ़ा दिया है।
भारत ने की मदद

नेपाल में जरूरी दवाओं व उपकरणों की कमी थी, जिसके चलते भारत ने 3.2 लाख पैरासिटामोल व 2.5 लाख हाइड्रोक्लोरोक्वीन की डोज व अन्य चीजें भेजी हैं।
इम्युनिटी की हो रही चर्चा
नेपाल में अब तक कम संक्रमण के मामलों की वजह नेपालियों की मजबूत रोग प्रतिरोधक क्षमता को बताया जा रहा है। वहां के कई डॉक्टरों का कहना है कि मजबूत इम्युनिटी से लोगों में कोरोना का असर कम है। जो लोग संक्रमित हैं उनमें गंभीर लक्षण नहीं दिख रहे है। इसलिए अभी तक एक भी मौत नहीं हुई है। जिन संक्रमितों का इलाज हो रहा है उनमें हल्के लक्षण वाले मरीज ज्यादा हैं।



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कोरोनावायरस का खात्मा कर सकती है से नशीली चीज, वैज्ञानिक लगे जांच में

coronavirus Update: कोरोनावायरस से दुनियाभर में अब तक जहां 29 लाख से ज्यादा लोग संक्रमित हुए हैं, वहीं भारत में संक्रमितों की संख्या 24 हजार का आकड़ा पार कर गई है। दुनियाभर के वैज्ञानिक कोविड-19 का इलाज तलाश करने के लिए बड़े पैमाने पर काम कर रहे हैं। इसी कड़ी में, कई अध्ययनों में इस बात का दावा किया जाता रहा है कि स्मोकिंग करने वाले लोगों में कोरोना के संक्रमण होने का ज्यादा खतरा रहता है। लेकिन हाल ही में फ्रांस में हुए एक अध्ययन में इसके उल्ट निष्कर्ष सामने आएं हैं।


फ्रांस में हुई इस ताजा अध्ययन के मुताबिक, निकोटीन (Nicotine) लोगों को कोरोनोवायरस (Coronavirus) से बचा सकता है। पेरिस के एक शीर्ष अस्पताल के शोधकर्ताओं ने 343 कोरोनोवायरस रोगियों की जांच की, जिसमें से 139 लोगों में बीमारी के हल्के लक्षण देखने को मिले थे। रिसर्च टीम में शामिल जाहिर अमौरा ने बताया कि इनमें से सिर्फ पांच फीसदी लोग धूम्रपान करते थे। पिछले महीने इंग्लैंड के एक जर्नल में छपी रिसर्च के अनुसार, चीन में कोरोना की चपेट में आए 1000 लोगों में 12.6 फीसदी लोग धूम्रपान करते थे।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, चीन के मरीजों की अनुमानित जनसंख्या के मुकाबले धूम्रपान करने वालों की संख्या कम है।

शोध के को-राइटर और फ्रांस के पाश्चर इंस्टीट्यूट से न्यूरोबायोलॉजिस्ट जीन-पियरे चेंजक्स इस बारे में कहते है कि यह शोध यह बताता है कि निकोटिन यानी तंबाकू कोशिकाओं के संग्राहकों पर चिपक जाता है और इस तरह से कोरोना वायरस को कोशिकाओं में प्रवेश करने से रोका जा सकता है। यानी अगर तंबाकू का प्रयोग किया जाए तो शरीर में वायरस को पहुंचने से रोकना आसान होगा।

शोधकर्ताओं को अब फ्रांस के स्वास्थ्य विभाग से इसके क्लिनिकल ट्रायल के लिए अनुमति मिलने का इंतजार है। वह लोग पेरिस के पिटी सलपेट्रिअर अस्पताल के स्वास्थ्यकर्मियों पर निकोटीन पैच का इस्तेमाल करने की योजना बना रहे हैं, जहां से इस रिसर्च की शुरूआत हुई थी। वह देखना चाहते हैं कि क्या यह पैच स्वास्थ्यकर्मियों को कोरोना के संपर्क में आने से बचा रहे हैं।

शोधकर्ताओं के अनुसार उनकी रिसर्च का मकसद लोगों को धूम्रपान करने के लिए प्रोत्साहित करना हरगिज नहीं है। सिगरेट में पाया जाने वाला निकोटीन कोरोनावायरस से लड़ सकता है लेकिन निकोटीन शरीर को भी नुकसान पहुंचाता है। इसलिए इसे केवल उपचार के लिए ही इस्तेमाल किया जाएगा।



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Covid-19: क्या ऊंट के शरीर में मिले एंटीबॉडीज से कोरोना का इलाज संभव हो पाएगा ?

नोवेल कोरोना वायरस का इलाज ढूंढ रहे वैज्ञानिक अब कह रहे हैं कि ऊंट के खून में पाए जाने वाले अणु या मॉलीक्यूल्स कोरोनोवायरस रोगियों को ठीक कर सकते हैं। इससे पहले ऊंट की ही एक बौनी प्रजाति लामाओं के शरीर में पाए जाने वाले एंटीबॉडीज पहले भी सार्स और मर्स जैसे गंभीर कोरोना वायरस के इलाज में कारगर साबित हुए हैं। वैज्ञाकिों को अपने शोध में यह भी पता चला है कि कोविड-19 वायरस से संक्रमित होने पर ऊद बिलावों (फैरेट्स या पोलकैट) की भी इंसानों की ही तरह एक समान प्रतिक्रिया होती है।

लामा के शरीर की एंटीबॉडीज की खोज 1989 में की गई थी। बेल्जियम के घेंट स्थित लामा इंस्टीट्यूट ऑफ बायोटेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों का मानना है कि लामा के रक्त से प्राप्त एंटीबॉडीज नए कोरोना वायरस के संबंध में यह माना जा रहा है कि यह वायरस के संक्रमण को बेअसर कर सकते हैं। लामा एंटीबॉडीज का इससे पहले एचआइवी अध्ययन में भी उपयोग किया जा चुका है जो कई प्रकार की बीमारियों और वायरस से लडऩे में कारगर साबित हुआ है। मनुष्यों की तुलना में कैमलिड एंटीबॉडी छोटे होते हैं जो एक नैनो-टेक्नॉलॉजी के रूप में काम करते हैं। ये सूक्ष्म मॉलीक्यूल्स दवाओं को वायरस पर ज्यादा प्रभावी तरीके से असर करने में मदद करते हैं।



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इम्यूनिटी बूस्ट करने के साथ मधुमेह में भी फायदेमंद है गुडुची

Giloy Benefits In Hindi: कोरोनावायरस से दुनियाभर में अब तक जहां 29 लाख से ज्यादा लोग संक्रमित हुए हैं, वहीं भारत में संक्रमितों की संख्या 24 हजार का आकड़ा पार कर गई है। दुनियाभर के वैज्ञानिक कोविड-19 का इलाज तलाश करने के लिए बड़े पैमाने पर काम कर रहे हैं। लेकिन अभी इसमें सफलता नहीं मिली है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कोरोनावायरस कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों में जल्दी फैलता है। इसलिए इससे बचाव के लिए जरूरी है कि अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत रखा जाए। इम्यून सिस्टम को मजबूत रखने में पोषण युक्त आहार का बहुत महत्व होता है। लेकिन भारत की प्रचीन चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद में भी इम्यूनिटी को मजबूत रखने के लिए कई नुस्खे दिए गए हैं। जिसमें से एक है गिलोय का सेवन। जी हां, आयुर्वेद के अनुसार गिलोय के पत्तों में कई औषधीय गुण होते हैं जो शरीर को बैक्टीरिया और इंफेक्शन बचाने में मदद करते हैं। प्रतिदिन सुबह गिलोय के पत्तों के पानी का सेवन करने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। आइये जानें गिलोय के पत्तों का पानी पीने के अन्य फायदों के बारे में -

- गिलोय एक ऐसी औषधि होती है, जो कई तरह के मर्ज में लाभकारी साबित होती है। गिलोय की टहनियों, बीजों और पत्तियों के इस्तेमाल से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और बीमारियों से बचाव होता है। गिलोय इंसान को रोगों से लड़ने कि ताकत प्रदान करती है। नीम के पेड़ पर चढ़ी हुई गिलोय सबसे लाभकारी और अच्छी मानी जाती है। गिलोय को गुडुची, भी कहते हैं इसका वैज्ञानिक नाम टीनोस्पोरा कोर्डीफोलिया है। वात, पित्त और कफ से संबंधित बीमारियों में एनीमिया, बुखार, बवासीर, खांसी, एसिडिटी, मधुमेह में फायदा मिलता है। तनाव, चिंता, घबराहट, दमा, मुहांसे, लिवर, पीलिया, कब्ज और खून की कमी में इसका जूस लेना फायदेमंद है।


- गिलोय मे कई तरह के गुणों की भरमार होती है। गिलोय सूजन कम करने, शुगर को नियंत्रित करने, गठिया रोग, रक्त शोधन के अलावा कई अन्य तरह के रोगों में लाभकारी होती है। ये खून की कमी, पीलिया और कुष्ठ रोगों के इलाज में भी फायदेमंद है। गिलोय के डंठल का ही प्रयोग करना चाहिए। गिलोय की तासीर गर्म होती है अधिक मात्रा में गिलोय का सेवन न करें, इससे मुंह में छाले हो सकते हैं।

- गिलोय में कैल्शियम, प्रोटीन, फॉस्फोरस पाया जाता है। इसके तनों में स्टार्च की अच्छी मात्रा होती है। गिलोय का काढ़ा और जूस भी पिया जा सकता है। शरीर में जलन होने पर आंवला के साथ इसका जूस लेने से लाभ होता है।



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ये सेंसर कपड़ों पर फिट होकर फेफड़ों और दिल पर रखता निगरानी

कोरोना वायरस के संक्रमित रोगी के फेफड़ों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचता है। संक्रमण के चलते इन अंगों की कार्य क्षमता घट जाती है और ये धीरे-धीरे काम करना बंद कर देते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी कहा है कि संक्रमित रोगी के ठीक होने के बाद पुन: संक्रमित होने की आशंका रहती है। ऐसे में कई बार बिना लक्षण प्रकट किए भी संक्रमण शरीर में फैल जाता है। ऐसे में अस्पताल से घर लौटे संक्रमित व्यक्ति की सेहत को पल-पल मॉनिटर करना जरूरी हो जाता है। इस काम में अब जॉर्जिया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों का बनाया बहुत ही छोटा सेंसर महत्त्वपूर्ण उपकरण साबित हो सकता है। इसे बटन की तरह कपड़ों पर टांका जा सकता है। यह कोरोना संक्रमित व्यक्ति के ठीक हो जाने पर उसके फेफड़ों और हृदय गति पर निगरानी कर सकता है। इससे चिकित्सकों को उसके सेहत की हर पल की जानकारी मिल सकती है। यह लेडी बग कीट जितना है और किसी इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम की तरह काम करता है। यह हृदय की विद्युत गतिविधि को रिकॉर्ड करने के लिए त्वचा से जुड़ी इलेक्ट्रोड पैच को ट्रैक करते हैं जिससे फेफड़ों के काम करने की गति और दिल की धड़कनों की लय का पता चलता है। साथ ही यह रक्त प्रवाह और अन्य अंगों के स्वास्थ्य के बारे में भी महत्त्वपूर्ण जानकारी देता है। जॉर्जिया टेक स्कूल के इलेक्ट्रिकल एंड कंप्यूटर इंजीनियरिंग के प्रोफेसर फारूख अयाजी ने बताया कि इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम से फेफड़ों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती लेकिन यह उपकरणयह भी कर सकता है।

अयाज़ी ने बताया कि इस सेंसर में सिलिकॉन की दो बहुत बारीक परतें हैं जो कि केवल 270 नैनोमीटर यानी लगभग मानव बालों जितनी पतली हैं। ये सिलिकॉन परतें इलेक्ट्रोड के रूप में कार्य करती हैं जो शरीर से अलग-अलग ध्वनियों और कंपन के जवाब में प्रवाह की स्थिति दर्शाती हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार यह डिवाइस शरीर के बाहर से उत्पन्न होने वाली ध्वनियों को अलग करने में सक्षम है और उन्हें पठनीय इलेक्ट्रॉनिक आउटपुट में परिवर्तित कर देता है। लेकिन डिवाइस शरीर के अंदर से आने वाली आवाज़ों के लिए बहुत संवेदनशील है। यह कपड़ों के ऊपर से भी शरीर की हल्की सी हरकत, कंपन या हलचल को भी पहचान लेता है।



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