Monday, 31 August 2020

बादाम खाएंगे तो दवाइयों से दूर रहेंगे, जानें इसके फायदे

बादाम स्वादिष्ट मेवों में से एक है लेकिन लोगों में इसे खाने को लेकर कई भ्रम हैं। आइए जानते हैं कि बादाम को किस तरह से खाकर इसके पोषक तत्वों का लाभ पूरी तरह से लिया जा सकता है।
कितने खाएं
एक वयस्क को एक दिन में पांच से छह बादाम खाने चाहिए। पांच साल तक के बच्चे को दो और एक साल के बच्चे को सिर्फ एक बादाम ही खिलाना चाहिए।
भीगे बादाम
बादाम को भिगोकर खाने की सलाह उन लोगों के लिए होती है जो कि इसे ठीक से चबा नहीं सकते वरना सामान्य व्यक्ति छिलके वाले बादाम खा सकता है। बादाम को पूरी तरह से चबा कर खाना चाहिए।
दिल को मजबूती
बादाम हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता और याददाश्त को बढ़ाता है। दिल को मजबूत करता है और बच्चों के मस्तिष्क का विकास करता है।
मोटापा
बादाम खाने से वजन नहीं बढ़ता क्योंकि इसमें मौजूद वसा कोलेस्ट्रोल लेवल को नहीं बढ़ाती है। साथ ही इसमें जिंक, विटामिन ई, पोटेशियम और मैगनीशियम जैसे कई पोषक तत्व होते हैं जो हमें फिट बनाते हैं।
स्नैक्स व डॉक्टर के खर्च में कमी
अगर सर्दी या जुकाम हो गया है तो बादाम को तवे पर सेककर या नमक में सेककर स्नैक्स की तरह खाएं। इससे आपके स्नैक्स का खर्च और सामान्य दवाइयों का खर्च दोनों ही बचेगा।
इस तरह खाएं
बादाम और मुनक्कों को पीस कर खाएं।
बादाम का हल्वा बनाकर खा सकते हैं।
गोंद के लड्डू में बादाम मिलाकर भी खाए जा सकते हैं।
किसी भी फल के जूस में पीसकर लें।
बादाम शेक बनाकर पिएं।
पूडिंग में मिलाकर भी खा सकते हैं।
बादाम को तवे पर सेककर स्नैक्स की तरह भी खा सकते हैं।
अगर महंगे बादाम नहीं खा सकते तो मूंगफली खाएं।



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सेहतमंद और फिट रहने के लिए करें ये स्पेशल वर्कआउट

अगर आप वर्कआउट के पुराने तरीकों से ऊब चुके हैं, तो अपनी जरूरत के मुताबिक आजमा सकते हैं दुनिया के दूसरे हिस्सों में प्रचलित ये अनूठे और मजेदार वर्कआउट्स। लेकिन फिटनेस एक्सपर्ट की राय जरूर लें
हूला हूप वर्कआउट-
हॉलीवुड सेलीब्रिटीज के बीच हूप्नोटिका के नाम से मशहूर यह लेटेस्ट वर्कआउट वेट लॉस के लिए असरदार माना जाता है। इससे पूरे शरीर का वर्कआउट हो जाने की वजह से यह न सिर्फ शरीर का लचीलापन और संतुलन सुधारता है बल्कि हाथ-पैरों की मांसपेशियों को मजबूत करते हुए उनकी टोनिंग भी करता है। कमर के आस-पास हूप को घुमाते हुए पैर के अंगूठों पर दबाव देने और हाथों को ऊंचा रखने से जो मूवमेंट होते हैं उनसे शरीर और हूप को संतुलित रखने के लिए जिस एकाग्रता की जरूरत होती है उससे दिमाग की अच्छी एक्सरसाइज हो जाती है। इससे कैलोरी तो बर्न होती ही है, तनाव भी कम होता है।
ट्रेडमिल योगा
यह वर्कआउट ट्रेडमिल वॉकिंग (5 किमी प्रति घंटे की गति पर) और रेगुलर योगा का फ्यूजन यानी ट्रोगा है। इससे शरीर के ऊपरी हिस्से का लचीलापन बढ़ता है, पैरों की मांसपेशियां मजबूत होती हैं और शरीर को कार्डियो वर्कआउट मिलता है। ट्रेडमिल वॉक से स्टेमिना बढ़ता है और योग मुद्राएं लचीलापन एवं ब्रीदिंग पैटर्न सुधारती हैं। इसमें ट्रेडमिल पर वॉक करते हुए हाथों की स्ट्रेचिंग और योग मुद्राएं की जाती हैं।
डॉग योगा-
डो गा के नाम से प्रचलित यह वर्कआउट अमरीका में लेटेस्ट फिटनेस के्रज है। डॉग में स्ट्रेचिंग की आदत होती है। इस वर्कआउट में कुत्ते के साथ इंसान भी योगा करते हैं। इसमें कुत्ते को अपने पोज सिखाए जाते हैं और उसके साथ मनोरंजन करते हुए, बिना बोरियत के योगा करते हैं। इससे पेट के साथ बॉन्डिंग तो इम्पू्रव होती ही है, डॉग और उसका मालिक दोनों फिट भी रहते हैं। लेकिन डॉग को सही ट्रेनिंग भी जरूरी है।
रेट्रो रनिंग-
पीछे की ओर दौड़ लगाने वाली यह एक्सरसाइज यूरोप और जापान में लोकप्रिय है। सामान्य दौड़ के 1000 कदम और बैकवार्ड रनिंग के 100 कदम बराबर असर करते हैं। इससे कमर दर्द या घुटनों के दर्द से भी बचाव होता है। यह पिंडलियों को भी मजबूत करती है।



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खानपान से जुड़ी इन बातों का ध्यान रखकर पेट के रोगों से बचें

खानपान की आदतों में यदि इन बातों का ध्यान रखा जाए तो पेट के रोगों के होने की आशंका कम हो जाती है।
भोजन के बाद घूमें : भोजन के बाद 15-20 मिनट अवश्य घूमें। इससे बहुत से रोगों से बचाव तो होता ही है साथ ही नींद भी अच्छी आती है।
रेशे युक्त आहार लें: यह कब्ज, अपच, बवासीर, कोलेस्ट्रोल, मोटापा आदि रोगों से बचाता है। रेशा चोकर युक्त आटा, सलाद, हरी सब्जियां, फल, चावल, दाल आदि में पाया जाता है।
नशा न करें: धूम्रपान, तम्बाकू एवं शराब का सेवन पेट के रोगों के साथ-साथ शरीर के अन्य रोगों का भी कारण होता है।
नियमित व्यायाम करें
नियमित रूप से व्यायाम,योगा करने एवं पैदल घूमने से पाचन शक्ति अच्छी रहती है व मानसिक तनाव कम होता है।
खाना चबा-चबा कर खाने से भोजन में लार अच्छी तरह मिल जाता है, जिससे भोजन का पाचन अच्छी तरह से होता है, भोजन निगलने से गैस, कब्ज, एसिडिटी होने लगती है।



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ऐसे जानें, आंखें बताती है आपकी सेहत के बारे में

आंखें बहुत कुछ कहती हैं। ये कहना बिल्कुल भी गलत नहीं है क्योंकि हमें कई बार किसी बीमारी का पता नहीं चलता लेकिन आंखें उसकी गवाही पहले से ही देने लगती हैं। आज भी हमारे यहां ज्यादातर कई बीमारियों का अंदेशा आंखों के बदलते रंग-ढंग से ही लगाया जाता है।
उभरी हुई आंख-
आंखों के उभरी हुई दिखने की वजह थाइरॉयड हो सकता है। थाइरायड ग्रंथि की अति सक्रियता के कारण आंखों में उभार आता है। आंखे उभरी हुई दिख रही हों और उसके साथ थकान, वजन कम होना या बढऩा, बार-बार भूख लगना जैसे लक्षण दिखें तो तुरंत डॉक्टरी सलाह से अपना टेस्ट कराना चाहिए।
लटकी पलकें-
वैसे तो सामान्य तौर पर लटकी पलकें बुढ़ापे की ही निशानी होती है। लेकिन कुछ मामलों में ये गंभीर स्ट्रोक या फिर ट्यूमर जैसी गंभीर बीमारियों का संकेत भी हो सकती हैं। पलकों के लटकने के साथ- साथ अगर आवाज में लडख़ड़ाहट के लक्षण हो तो ये पैरालिसिस का इशारा भी हो सकता है। ऐसे में खानपान पर पूरा ध्यान और साथ में पर्याप्त व्यायाम बेहद जरूरी होता है।
पीली आंख-
ये लिवर में होने वाली बीमारियों का इशारा करती हैं। पीलिया या जॉन्डिस, लिवर से ही संबंधित बीमारी हैं। लिवर की बीमारियों से जब खून में बिलरुबीन (लाल रक्त कोशिकाओं का घटक जो मूत्र से उत्सर्जित होता है) इसकी मात्रा बढ़ जाती है तो आंखों के सफेद हिस्से का रंग पीला पड़ जाता है।
पुतलियों के पास सफेद छल्ले-
ये दिल के बीमार होने का संकेत हैं। अगर पुतलियों के चारों ओर सफेद छल्ले दिख रहे हैं तो इसका मतलब शरीर में कोलेस्ट्रॉल का स्तर ऊंचा होना है। पलकों के आस-ह्यपास या उसकी त्वचा के नीचे सफेद वसा जमा हो तो ये भी गंभीर दिल की बीमारियों का संकेत हो सकता है।
असामान्य पुतली-
सामान्य तौर पर दोनों आंखों की पुतलियां एक जैसी होती हैं। लेकिन अगर इनमें असामान्यता दिखे तो ये ब्रेन ट्यूमर, स्ट्रोक जैसी बीमारियों का संकेत हो सकती हैं। कई बार दवाइयों या फिर नशीले पदार्थ लेने से भी पुतलियों में असामान्यता हो जाती है।
लाल आंख-
खुजली के साथ लाल आंखे और साथ में छींकें आ रही हों। नाक बंद हो। नाक से पानी गिर रहा हो तो ये एलर्जी का लक्षण है। ऐसे में एलर्जी के कारणों से बचना चाहिए क्योंकि किसी भी इंसान को किसी भी चीज से एलर्जी हो सकती है। बिना किसी खुजली के आंखों के लाल दिखने की वजह हाई ब्लड प्रेशर की शिकायत भी हो सकती है। वैसे सामान्य तौर पर आंखों पर सूजन और रक्त वाहिकाओं के फैलने के कारण हमारी आंखें लाल होती हैं।



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जानिए देसी औषधि शीतलचीनी और दाल चीनी के फायदों के बारे में

शीतलचीनी काली मिर्ची जैसी होती है। इसे कच्ची अवस्था में तोड़कर सुखा लेते हैं। जीभ पर रखने से ठंडक महसूस होती है, इसीलिए इसे शीतलचीनी या कबाबचीनी भी कहते हैं। यह पंसारी या जड़ी-बूटी की दुकान पर आसानी से मिल जाती है। गर्म पानी में शीतलचीनी का तेल डालकर उसकी भाप सूंघने से सांस के रोग ठीक होते हैं। मुंह के छाले होने पर पांच ग्राम छोटी इलायची व कत्था मिलाकर चूर्ण बना लें, दिन में दो बार लें। खांसी होने पर इसकी एक से चार ग्राम मात्रा शहद के साथ लेने से आराम मिलता है।
दांतों में कीड़े नहीं लगने देती दालचीनी
छोटी-सी दालचीनी टुकड़े के ढेरों फायदे हैं। अगर मुंह से दुर्गंध आती हो तो दालीचीनी का एक टुकड़ा दिन में दो बार चूसें। दांतों में कीड़े न लगे इसके लिए दालचीनी पाउडर को पानी में मिलाकर गरारे करें। दालचीनी के पाउडर में नींबू मिलाकर पेस्ट बना लें, अब इसे चेहरे पर लगाएं इससे कील मुहांसों की समस्या दूर होगी। अगर बाल गिरते हों तो शहद में दालचीनी पाउडर मिलाकर बालों में लगाएं और इसे 10-15 मिनट के बाद धो लें, बाल झडऩा बंद हो जाएंगे। दालचीनी पेस्ट का लेप माथे पर करने से सिरदर्द में आराम मिलता है।



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Sunday, 30 August 2020

फूड पॉइजनिंग हो जाए तो करें होम्योपैथी इलाज

खानपान में गड़बड़ी की वजह से फूड पॉइजनिंग, उल्टी व दस्त की शिकायत हो जाती है। होम्योपैथी में इसका इलाज इस प्रकार है।
इलाज: उल्टी-दस्त होने पर डिहाइड्रेशन की समस्या हो जाती है ऐसे में आर्सेनिक एलबम दी जाती है। अधिक प्यास लगना, उल्टी-दस्त होना, शरीर व माथा ठंडा पडऩा जैसे लक्षणों में वेरेट्रम एलबम दवा मरीज को लेनी होती है। पूरा शरीर ठंडा पडऩे के बाद भी अगर रोगी कुछ ओढऩा ना चाहता हो और उसे सांस लेने में दिक्कत हो तो उसे कैंफर मदर टिंचर बताशे या चीनी के साथ दिया जाता है। दूषित फल खाने से पेट में ऐंठन व दर्द हो तो नक्सवोमिका देते हैं।
विशेषज्ञ की राय-
इस मौसम में शरीर को पानी की बहुत जरूरत होती है इसलिए खूब पानी पीएं। जितना संभव हो सके बाहर के खाने से बचना चाहिए। ज्यादा तला-भुना या मसालेदार भोजन ना करें। बाजार में बिकने वाले जूस पीने की बजाय फल खाएं या घर में जूस बनाकर पीएं।



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कमर में दर्द, पैरों में झनझनाहट रहे तो हो सकते ही ये समस्या, ऐसे करते हैं इसका इलाज

सियाटिक नर्व रीढ़ (कमर) से निकलने वाली स्पाइनल नर्व से मिलकर बनती है। यह पैर की मांसपेशियों को कंट्रोल करती है और पैरों में दर्द/छूना/तापमान/कंपन संबंधी सूचना स्पाइनल कॉर्ड तक पहुंचाती है। इससे जुडऩे वाली स्पाइनल नर्व पर किसी प्रकार का दबाव आता है तो इससे कमर में दर्द होता है जो कि पैर में करंट की तरह महसूस होता है इसे सियाटिका(आम बोलचाल में साइटिका) कहते हैं।
लक्षण: कमर में दर्द रहना, एक पैर में सुन्नपन रहना, पंजे में कमजोरी आना, एक पैर में पंजे तक दर्द जाना, पेशाब करने में तकलीफ।
इलाज : अगर सियाटिका का कारण स्लिप ***** है तो इसका इलाज माइक्रोलम्बर डिसकेक्टमी से होता है। इस तकनीक में मात्र एक या डेढ़ इंच का चीरा कमर में लगाया जाता है और जो नस दबी होती है केवल उसी के आस-पास की मामूली हड्डी और ***** को माइक्रोस्कोप की मदद से हटाया जाता है। इससे रीढ़ की हड्डी की बनावट में कुछ बदलाव नहीं आता और मरीज को ऑपरेशन के बाद दर्द से छुटकारा मिल जाता है।
इससे पहले बड़े चीरे से ऑपरेशन किया जाता था और अधिक मात्रा में हड्डी वडिस्क निकाली जाती थी जिससे रीढ़ में विकार आने की आशंका रहती थी। ऐसे व्यक्ति जिन्हें कमर और पैर में दर्द रहते हुए छह सप्ताह से अधिक हो गए हों तथा जिन्हें आराम व दर्द निवारक दवाओं से विशेष आराम नहीं आया हो, माइक्रोलम्बर डिसकेक्टमी से इलाज करा सकते हैं। माइक्रोलम्बर डिसकेक्टमी के लिए उपयुक्त वहडिस्क होती है जो कि बीचों-बीच न होकर एक किनारे पर हो।
प्रमुख कारण-
स्लिपडिस्क के कारण दबाव।
स्पाइनल कैनाल का सिकुडऩा।
रीढ़ की हड्डी में वर्टिब्रा का एक दूसरे पर खिसकना।



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​मरीज को गंभीर स्थिति कौन सी सर्जरी करानी चाहिए!

लेप्रोस्कोपिक सर्जरी गॉल ब्लैडर (पित्त की थैली), पेल्विस, अपर और लोवर जीआई ट्रैक्ट, थोरेक्स सर्जरी, अपेंडिक्स, हर्निया के साथ बड़ी और छोटी आंत का सफल ऑपरेशन संभव है।

पाइल्स और फेफड़ों में एमआइएस
पाइल्स और फेफड़ों में किसी तरह की समस्या होने पर पहले ओपेन सर्जरी की जाती थी। अब पाइल्स में स्टेपल टेक्नीक का इस्तेमाल किया जा रहा है जिसमें पाइल्स (बवासीर) को स्टेपलर सर्जरी इक्वीपमेंट से ऑपरेट कर निकाल दिया जाता है। इसी तरह सीने, फेफड़े और हृदय संबंधी समस्या में मिनिमल इनवेसिव सर्जरी (एमआइएस) का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसमें बहु छोटे छेद की मदद से बीमारी को अलग कर दिया जाता है। इसे मेडिकली वीडियो असिस्टेड थोरेसिक सर्जरी भी कहते हैं।

क्रिटिकल स्थिति में ज्यादा कारगर
स्त्री रोगों में भी लेप्रोस्कोपी सर्जरी का बेहतर इस्तेमाल हो रहा है। गर्भावस्था से बचने के लिए आइयूसीडी लगाने का काम भी लेप्रोस्कोप से हो रहा है। इसमें सिंगल पंचर की मदद से इस प्रोसीजर को किया जाता है। इसी तरह ओवेरियन सिस्ट को भी पंचर कर निकाला जाता है। एक्टोपिक प्रेगनेंसी गर्भधारण के बाद बच्चा बच्चेदानी की बजाए ट्यूब में लग जाता है। तीन महीने के गर्भावस्था में ये समस्या पता चलती है। ऐसे में मां की जान बचाने के लिए सोनोग्राफी के बाद लेप्रोस्कोप से भू्रण को एबॉर्ट करा दिया जाता है। ऐसी स्थिति में पहले लेप्रोटॉमी की जाती थी जिसमें बड़ा चीरा लगाकर भू्रण को हटाया जाता था।



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क्या होती है लेप्रोस्कोपिक सर्जरी, क्यों मिलता है जल्दी आराम

लेप्रोस्कोपिक सर्जरी के लिए रोगी को सबसे पहले ओटी में शिफ्ट किया जाता है। इसके बाद एनेस्थेसिया (बेहोशी) दी जाती है। इसके बाद सबसे पहले रोगी के पेट में पोर्ट से छेद कर कार्बनडाईऑक्साइड गैस भरी जाती है जिससे रोगी का पेट फूल जाता है। इसके बाद तीन और छेद की मदद से एक से एचडी कैमरा और दो छेद से सर्जरी उपकरण डाले जाते हैं। कंसोल की मदद से चिकित्सक पेट के भीतर उपकरणों की हर मूवमेंट पर नजर रखते हैं और उस हिस्से को काट-काट कर निकालते हैं जो बीमारी का कारण होता है।
इसलिए मानी जाती सुरक्षित
लेप्रोस्कोपी सर्जरी से गॉल ब्लैडर (पित्त की थैली), पेल्विस, अपर और लोवर जीआई ट्रैक्ट, थोरेक्स सर्जरी, अपेंडिक्स, हर्निया के साथ बड़ी और छोटी आंत का सफल ऑपरेशन संभव है। लेप्रोस्कोप से ऑपरेशन में मरीज की रिकवरी फास्ट होती है। इस सर्जरी को तय करने से पहले रोगी की स्थिति, उसका स्वास्थ्य और बीमारी की गंभीरता के आधार पर तय किया जाता है। ये सर्जरी ओपेन सर्जरी की तुलना में बहुुत सरल है और मरीज को लंबे समय तक बैड रेस्ट नहीं करना पड़ता है।

एक से डेढ़ एमएम का लगता है चीरा
इस सर्जरी में रोगी के पेट पर एक से डेढ़ सेमी. का गोल छोटा चीरा (इंसिजन) लगाया जाता है। ऑपरेशन के बाद इसे बंद करने के लिए दो से तीन टांके लगाते हैं। जबकि ओपेन सर्जरी में पांच से पंद्रह इंच का चीरा लगाया जाता है। ओपेन सर्जरी में रोगी को 25 से 30 दिन तक आराम करना पड़ता है। टांके में संक्रमण होने का खतरा होने के साथ उसके किसी कारण टूटने की वजह से भी परेशानी होने लगती है।



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मैसूर के अस्पताल में कोविड-19 के वैक्सीन पर ट्रायल शुरू

मैसूर । ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय द्वारा विकसित कोविशील्ड वैक्सीन का नैदानिक परीक्षण मैसूर के जेएसएस अस्पताल में शुरू कर दिया गया है। एक अधिकारी ने रविवार को इस बात की जानकारी दी है।
उन्होंने आईएएनएस को बताया, "शनिवार को हमारे अस्पताल में कोविशील्ड के नैदानिक परीक्षण की शुरूआत की गई। यह कर्नाटक का एकमात्र ऐसा संस्थान है, जिसे इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) द्वारा चुना गया है। अस्पताल में कोरोनोवायरस के एक रोगी पर वैक्सीन के प्रभाव की जांच की जाएगी।" देश के अन्य 16 संस्थानों में इसी तरह के परीक्षण चल रहे हैं।
इस अस्पताल का नाम जगदगुरु श्री शिवरात्रि (जेएएस) है, जो नंजनगुड़ में काबिनी नदी के तट पर स्थित है और इसे सुत्तुर गांव में सुत्तुर मठ द्वारा संचालित किया जाता है। अस्पताल में 1,800 बिस्तरों की सुविधा है।
एक बार जब तीन चरणों में ट्रायल की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी, तो इसे सत्पायन के लिए प्रस्तुत किया जाएगा।इसके बाद पुणे स्थित सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा ब्रिटिश बहुराष्ट्रीय दवा और बायोफार्मास्युटिकल कंपनी एस्ट्राजेनेका के साथ साझेदारी में वैक्सीन उम्मीदवार का उत्पादन किया जाएगा, भारत में जिसका संचालन केंद्र बेंगलुरु में है।



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वायु प्रदूषण से भी होती है हाई-ब्लडप्रेशर, हाईपरटेंशन में की समस्या

नई दिल्ली । उत्तर भारत के एक बड़े क्षेत्रीय हिस्से के लिए वायु प्रदूषण एक गंभीर मुद्दा है। वहीं बीते साल सर्दियों के मौसम में प्रदूषण के कारण दिल्ली-एनसीआर में स्वास्थ्य आपातकाल लगा दिया गया था। कथित तौर पर वायु प्रदूषण के तत्व, विशेष रूप से पीएम 2.5, बड़े पैमाने पर हृदय रोग के लिए खतरा उत्पन्न करता है।
कई शोधों में पीएम 2.5 और ब्लड प्रेशर की समस्या के आपस में जुड़े होने के साक्ष्य सामने आए हैं। वहीं दिल्ली में एक नए शोध ने हाई ब्लडप्रेशर(बीपी) और हाईपरटेंशन पर पीएम 2.5 के अल्पकालिक और दीर्घकालिक प्रभाव के वैज्ञानिक प्रमाण प्रस्तुत किए हैं।
यह शोध अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन की प्रमुख पत्रिका सकुर्लेशन में प्रकाशित हुआ था। इस शोध के अनुसार, सामने आए आंकड़ें बड़े पैमाने पर पर्यावरणीय वायु प्रदूषण को हाई सिस्टोलिक बीपी, और हाईपरटेंशन कारक माना गया है।
प्रोजेक्ट में शामिल लेखकों में से एक और इसके प्रमुख इंवेस्टिगेटर व पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन इंडिया में रिसर्च एंड पॉलिसी के वाईस प्रेसीडेंट डॉ. दोराईराज प्रभाकरण ने कहा, "भारत में वायु प्रदूषण के एक मार्कर के रूप में पीएम 2.5 और हाइपरटेंशन के संपर्क को जोड़ने वाले बहुत कम या कोई सबूत नहीं हैं। यह अपनी तरह का पहला शोध है, जिसमें महामारी विज्ञान साक्ष्य प्रदर्शित किए गए हैं, जिसमें पीएम 2.5 की वजह से हाई ब्लडप्रेशर और हाइपरटेंशन के खतरे को दिखाया गया है।"
यह शोध भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा सेंटर फॉर क्रॉनिक डिजीज कंट्रोल एंड पीएचएफआई में हार्वड टी. एच. चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के सहयोग से स्थानीय प्रतिनिधियों पर किया गया। इस शोध में भारत में हृदय रोगों (सीवीडी) पर पीएम 2.5 के हानिकारक प्रभावों के मजबूत सबूत सामने आए हैं।की
प्रभाकरण ने आगे कहा, "शोध के निष्कर्षों से पता चला है कि वायु प्रदूषण के अल्प और दीर्घकालिक दोनों जोखिमों ने हाईब्लडप्रेशर और हाईपरटेंशन के खतरे को बढ़ता है, खासकर आबादी के कुछ वर्गों (मोटापे से ग्रस्त) को यह बहुत प्रभावित करता है।"
शोध में बताया गया है कि देश में होने वाली मौतों में सर्वाधिक मौतें हृदय रोगों से संबंधित होती हैं, ऐसे में इन बीमारियों के प्रमुख कारक को कम करने में वायु प्रदूषण नियंत्रण महत्वपूर्ण साबित होगा।
शोध में शामिल एक शोधकर्ता ने कहा, "जब तक हम वायु की गुणवत्ता के सुरक्षित स्तर तक नहीं पहुंचते तब तक अरिद्मियाज के जोखिम वाले लोगों, दिल की बीमारी से ग्रसित लोगों को खासतौर पर बाहर जाने से और पीएम 2.5 के संपर्क में आने से बचने की आवश्यकता है और यदि संभव हो तो एन 95 मास्क का प्रयोग करना चाहिए।"
सुमित सक्सेना

(आईएएनएस)



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CORONA VACCINE : मॉडर्ना इस देश को देगी कोरोना वैक्सीन की 4 करोड़ खुराक

न्यूयॉर्क. अमेरिका की बायोटेक कंपनी मॉडर्ना ने इस बात की पुष्टि की है कि उसके द्वारा बनाई जा रही कोविड-19 की संभावित वैक्सीन की चार करोड़ खुराक की आपूर्ति जापान को कराए जाने पर बात चल रही है। इस समझौते की शर्तों के तहत, वैक्सीन एमआरएनए-1273 की आपूर्ति मॉडर्ना द्वारा की जाएगी और टेकेडा फार्मास्युटिकल कंपनी लिमिटेड द्वारा साल 2021 के शुरुआती चरण में इसे जापान में वितरित किया जाएगा, बशर्ते वैक्सीन ने विनायक अनुमोदन प्राप्त कर लिया हो।

जापान के स्वास्थ्य, श्रम और कल्याण मंत्रालय ने भी शुक्रवार को इस पर हो रही चर्चा का ऐलान किया। इसी हफ्ते मॉडर्ना ने यूरोपीय संघ के लक्ष्य के एक हिस्से के रूप में यूरोप को सुरक्षित और प्रभावी कोविड-19 के वैक्सीन की पहुंच यथाशीघ्र कराने के लिए एमआरएनए-1273 की आठ करोड़ खुराक की आपूर्ति कराए जाने को लेकर संघ से हो रही बात की भी पुष्टि की है। अमेरिकी सरकार ने इस महीने की शुरुआत में मॉडर्ना की संभावित कोविड-19 वैक्सीन एमआरएनए-1273 की दस करोड़ खुराक के निर्माण और वितरण के लिए कंपनी के साथ 150 करोड़ डॉलर का सौदा किया है।



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Saturday, 29 August 2020

कान पर लगी चोट को नजरअंदाज न करें, हो सकता खतरनाक

अचानक चोट लगने, गिरने या थप्पड़ से पड़े दबाव को कई बार कान का पर्दा सहन नहीं कर पाता और फट जाता है। वहीं, इससे आंतरिक भाग में स्थित महत्वपूर्ण संरचनाएं भी असामान्य हो सकती हैं। हेयरपिन व तीली से कान साफ करते हुए या जोर का धमाका (जैसे ब्लास्ट) होने पर भी चोट का खतरा रहता है। इस तरह अचानक कान में लगी चोट से सुनने में कमी, चक्कर, बेचैनी, घबराहट और कान से रक्तस्राव, भारीपन व सीटी सुनाई देने जैसी आवाज वाले लक्षण होने लगते हैं। मजाक-मजाक में या किसी भी रूप में बच्चों/बड़ों के कान पर नहीं मारना चाहिए। कान से वैक्स निकालने के लिए तीली या ईयरबड का प्रयोग करना गलत है।
इलाज व सावधानी-
चोट लगने पर कान में संक्रमण व गीलापन न होने दें। कान में ईयर ड्रॉप या अन्य द्रव्य न डालें, पानी से बचाएं। संक्रमण रोकने के लिए डॉक्टर एंटीबायोटिक व दर्द निवारक दवाएं देते हैं। ज्यादातर मामलों में चोट या थप्पड़ आदि से पर्दे में हुआ छेद 3-4 हफ्ते में खुद ही भर जाता है। कुछ ही मामलों में सर्जरी की जरूरत पड़ती है।



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ये खास टिप्स जान लेंगे तो अच्छी सेहत भी मिलेगी और खुश भी रहेंगे

यदि आप इमोशनली फिट नहीं हैं तो पूर्ण रूप से स्वस्थ नहीं माने जाएंगे। शोध बताते हैं कि इंसान को ज्यादातर बीमारियां शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक गड़बड़ी से होती हैं। अगर आप रोजमर्रा के जीवन में कुछ आदतों को अपना लेंगे तो इमोशनली काफी मजबूत बन सकते हैं।
आत्मसम्मान का महत्व-
आपको खुद का और दूसरों का सम्मान करना चाहिए। अगर आप खुद को कमजोर और सताया हुआ इंसान समझते हैं तो आप डिप्रेशन के शिकार हो सकते हैं। ऐसे दोस्त बनाएं जो आपकी तरक्की में मदद करें और आत्मसम्मान को बढ़ाने में मदद करें।
बहस से बचें-
बहस के दौरान व्यक्ति खुद को समझदार साबित करने की कोशिश करता है और भूल जाता है कि इससे पछतावे के सिवाय कुछ हासिल नहीं होता। जिस व्यक्ति में बहस करने की आदत होती है उसका दिमाग शांत नहीं रहता। बहस से बचने के लिए जरूरी है कि आप पूरी बात सुनें और शब्दों पर काबू रखें।
खूबियों पर करें गौर-
खुद को पॉजिटिव इंसान बनाएं। इसके लिए अपनी खूबियों पर गौर करें। कमियों को लेकर अफसोस न करें। अतीत पर रोना खुद की सेहत बिगाडऩा ही है। अगर आप हार नहीं मानते और खुद को खुश रखते हैं तो आप इमोशनली हैल्दी रह सकते हैं। मानसिक स्वास्थ्य एक ऐसा खजाना है जिसे लगातार अभ्यास के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए जीवन के प्रति सकारात्मक नजरिए के साथ आगे बढ़ें और स्वस्थ रहें क्योंकि सेहतमंद शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है। इसके अलावा ईश्वर का धन्यवाद करना न भूलें।
तनाव को रखें काबू-
तनाव से घबराने वाला इंसान मानसिक रूप से परेशान हो जाता है। उसे लगता है कि दुनिया में सिर्फ दुख ही दुख हैं। आपको अपने गुस्से को प्रेम में परिवर्तित करना चाहिए। आपको हमेशा बदला लेने की भावना के बजाय क्षमा करना सीखना चाहिए।
बुरी आदतों से रहें दूर -
शराब, धूम्रपान और ड्रग्स का सेवन करने से खुद पर नियंत्रण कम हो जाता है और ज्यादा गुस्सा करने लगते हैं । इससे सोचने-समझने की क्षमता भी प्रभावित होती है और सही फैसले नहीं ले पाते। भावनाओं पर नियंत्रण के लिए जरूरी जरूरी है कि जीवन में बुरी आदतों से दूर रहा जाए।
पोषक तत्वों का रखें खयाल-
मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए जरूरी है कि भोजन में हर तरह के पोषक तत्व सही मात्रा में हों। आपके भोजन में फैटी एसिड, विटामिन बी, कैल्शियम, मैगनीशियम जरूर होने चाहिए।



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काम के साथ रखें खानपान का ध्यान तभी सुधरेगी सेहत

वर्कप्लेस पर सबसे आगे रहने की चाह में युवा एक्जिक्यूटिव्स को न खाने की सुध है, न सोने की। खाली पेट भागते-दौड़ते दफ्तर पहुंचते हैं और चाय-कॉफी व चिप्स से दिन गुजार देते हैं। खाने-पीने में लापरवाही से एसिडिटी होने लगती है। स्थिति यही बनी रहे तो धीरे-धीरे लिवर प्रभावित होकर वजन व कोलेस्ट्राल बढ़ सकता है। यही रोग धमनियों में रुकावट का कारण बनते हैं। 35 की उम्र के बाद इन रोगों के लक्षण दिखने लगते हैं और 45 की उम्र के बाद शिकायत व बीमारियों का दौर शुरू हो जाता है। जानते हैं इन रोगों से बचाव के उपायों के बारे में।
खाली पेट नारियल पानी से दिन की शुरुआत करें। लौकी, ककड़ी जैसी सब्जियों का जूस आदि भी ले सकते हैं।
मेवे, फल, दूध और दूध से बनी चीजों को नाश्ते में शामिल करना चाहिए।
लंच करना न भूलें। लंच में साबुत अनाज व हरी सब्जियों को महत्व दें। डिनर हल्का लें।
3 कप से ज्यादा चाय-कॉफी का सेवन न करें। तली-भुनी चीजों से परहेज करें।



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भारत में कोरोना वायरस पॉजिटिव रोगी के फेफड़े प्रत्यारोपित किए गए

चेन्नई । कोरोनावायरस पॉजिटिव पाए गए 48 वर्षीय मरीज के गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त फेफड़ों को चेन्नई के अस्पताल में डॉक्टरों ने सफलतापूर्वक बदल दिया है। निजी अस्पताल ने अपने बयान में दावा किया है कि यह कोविड -19 पॉजिटिव मरीज के फेंफड़ों के प्रत्यारोपण का एशिया का पहला ज्ञात मामला है। वहीं लॉकडाउन होने के बाद अस्पताल में किया गया दूसरा फेफड़ा प्रत्यारोपण है।
अस्पताल ने कहा है कि दिल्ली का कोविड-19 मरीज फेफड़ों के गंभीर संक्रमण से पीड़ित था। कोविड -19 से संबंधित फाइब्रोसिस के कारण उनके फेफड़े गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गए थे।
एमजीएम हेल्थकेयर के अनुसार मरीज का कोविड परीक्षण 8 जुलाई को पॉजिटिव आया था और उसके फेफड़ों का केवल एक छोटा हिस्सा ही काम कर रहा था। हालत बिगड़ने पर उसे वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया। बाद में उसे 20 जुलाई को गाजियाबाद के एमजीएम हेल्थकेयर से एयरलिफ्ट करके चेन्नई ले जाया गया।
वहां एक महीने से अधिक समय तक उसे ईसीएमओ सपोर्ट पर रखागया। बाद में डॉक्टरों ने उसके फेंफड़ों का प्रत्यारोपण करने का फैसला किया। 27 अगस्त को किए गए ट्रांसप्लांट का नेतृत्व कार्डियक साइंसेज के अध्यक्ष और निदेशक डॉ.के.आर. बालकृष्णन ने किया।
एमजीएम हेल्थकेयर ने कहा है, "ट्रांसप्लांट के बाद मरीज अच्छा है और वह अभी आईसीयू में है। उसके प्रत्यारोपित किए गए फेंफड़े अच्छे से काम कर रहे हैं।"



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कोरोना अपडेट: नए शोध का दावा बच्चों की श्वांस नली में हफ्तों तक जिंदा रह सकता है कोरोना वायरस

कोरोना परिवार का सातवां और बिल्कुल नया वायरस नोवेल कोविड-19 वायरस बहुत से देशों में एक बार फिर वापस लौटा है और पहले से ज्यादा घातक साबित हो रहा है। दुनियाभर में इस समय सबसे ज्यादा संक्रमितों की संख्या भारत में ही आद रही हैं। शुक्रवार को भी बीते 24 घंटो में यहां 74 हजार से ज्यादा संक्रमित आए थे। वहीं दुनियाभर में करीब 2.50 करोड़ लोग इस वायरस से संक्रमित हो चुके हैं। लेकिन वैज्ञानिक इस बात से हैरान हैं कि अचानक कोरोना के इतने केसेज कैसे उभर रहे हैं। इसका जवाब शायद दक्षिण कोरिया के वैज्ञानिकों के हालिया शोध में छिपा हुआ है। दक्षिण कोरियाई वैज्ञानिकों का कहना है कि इस शोध में हमने पाया कि बच्चों के श्वांस नली और नाक में कोरोना वायरस की मौजूदगी लोगों में साइलेंड स्प्रेडर (Silent Spreader) के मामले से जुड़ा हो सकता है।

कोरोना अपडेट: नए शोध का दावा बच्चों की श्वांस नली में हफ्तों तक जिंदा रह सकता है कोरोना वायरस

40 फीसदी वयस्कों में कोई लक्षण नहीं
इस शोध की समीक्षा करने वाले चिल्ड्रंस नेशनल हॉस्पिटल, वॉशिंगटन की डॉ. रॉबर्टा डी'बायसी और डॉ. मेघन डेलानी का कहना है कि इस नए शोध की तुलना वयस्कों केडेटा से करने पर हमने पाया कि 40 फीसदी मामलों में ऐसे बच्चों और उनसे संक्रमित हुए वयस्कों में वायरस के संक्रमण के कोई लक्षण हफ्तों बाद भी नहीं नजर आते। दोनों डॉक्टर दक्षिण कोरिया के इस शोध में शामिल नहीं थीं। अध्ययन के लेखकों का अनुमान है कि 85 संक्रमित बच्चे (करीब 93 फीसदी) बच्चों पर जब रोगियों के परीक्षण पर केंद्रित परीक्षण रणनीति का उपयोग कर संक्रमण की जांच की गई तो वे टेस्ट में निगेटिव आए और उनमें किसी प्रकार के सामान्य या विशिष्ठ लक्षण नजर नहीं आ रहे थे।

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अमरीका में हो रही सीडीसी की आलोचना
यह अध्ययन ऐसे समय में सामने आया है जब अमरीका के रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्र (सीडीसी) ने लक्षण न दिखाने वाले रोगियों (Asymptomatic Testing) की जांच संबंधी गाइडलाइंस को बदलने के लिए आलोचना हो रही है। सीडीसी के इस कदम को अमरीकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स ने शुक्रवार को 'पीछे की ओर उठाया गया एक घातक कदम' बताया है और जमकर आलोचना की है। गौरतलब है कि अमरीका में कोरोना संक्रमितों की संख्या 60 लाख के पार हो गई है। गौरतलब है कि सीडीसी ने जांच केन्द्रों को यह निर्देश दिए हैं कि वे बिना लक्षणों वाले लोगों का परीक्षण करने की आवश्यकता नहीं है, फिर भले ही वे वायरस से परिचित किसी व्यक्ति के निकट संपर्क में ही क्यों न हों।

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इलाज में आती है परेशानी
शुक्रवार को जेएएमए बाल रोग पत्रिका ( Journal JAMA Pediatrics) में प्रकाशित इस अध्ययन में दक्षिण कोरिया भर में 22 केंद्रों पर 18 फरवरी से 31 मार्च के बीच कोविड-19 के निदान वाले 91 स्पर्शोन्मुख (एसिम्प्टोमैटिक) पूर्व-निर्धारित लक्षणों (presymptomatic) और रोगसूचक (symptomatic) लक्षणों वाले बच्चों के डेटा शामिल थे। अध्ययन मेंशामिल इन रोगियों में से 20 या 22 फीसदी ने कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाए और पूरे अध्ययन में स्पर्शोन्मुख बने रहे यानी जांच में उनमें कोई लक्षण नजर नहीं आए। वहीं 91 में से 18 से 20 फीसदी बच्चे प्रेसीप्टोमैटिक थे, जिसका अर्थ है कि वे उस समय बीमार नहीं दिख रहे थे लेकिन बाद मेंसंक्रमित पाए गए थे। जबकि डेटा के आधे से अधिक बच्चे यानी करीब 71 से 78 फीसदी लक्षण दिखाते थे जिसमें बुखार, खांसी, दस्त, पेट दर्द और गंध या स्वाद न लगना जैसे लक्षण शामिल थे। वहीं प्रदर्शित हुए लक्षणों की अवधि भी तीनों समूहों के बच्चों में अलग-अलग दिखाई दी करीब 01 से 36 दिनों के बीच। जबकि संक्रमितरोगी में शुरुआती 5 दिनों से 14 दिनों के बीच लक्षण दिखाई देने लगते हैं।

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हल्के लक्षण वाले बच्चे हैं 'साइलेंट स्प्रेडर'
इससे पता चलता है कि हल्के और मध्यम रूप से संक्रमित बच्चे लंबे समय तक लक्षण प्रदर्शित नहीं करते हैं। डेटा से पता चला कि केवल 8.5 फीसदी रोगियों का ही लक्षण उभरने के बाद कोविड-19 का इलाज किया जा सका था। जबकि अधिकांश 66.2 फीसदी लक्षणों वाले रोगियों में लक्षण जब तक उभरे नहीं थे उनका इलाज ही नहीं किया जा सका। इसी प्रकार 25.4 फीसदी लक्षण प्रदर्शित करने वाले बच्चों में लक्षण दिखने के बाद उनका इलाज शुरू किया गया था। शोध में यह बताने का प्रयास किया गया है कि संक्रमित बच्चों में वायरस लक्षणों के साथ या बिना लक्षण दिखाए जीवित रहने की आशंका बनी रहती है, वह भी उनकी सामान्य गतिविधियों के साथ। ऐसे बच्चे सामुदायिक रूप से वायरस के फैलने का कारण बन सकते हैं।

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17.6 दिनों तक जिंदा रहता है वायरस
अध्ययन में पाया गया कि कोरोना वायरस का जेनेटिक मटेरियल यानी आनुवांशिक जीन बच्चों में करीब 17.6 दिनों तक जिंदा रह सकता है। यहां तक कि जिन बच्चों में कोई लक्षण नहीं थे उनमें भी वायरस औसतन 14 दिनों तक मौजूद था। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह भी संभव है कि वायरस बच्चों में इससे भी अधिक समय तक उनके नाक, नाक के पीछे के हिस्से, गले और श्वांस नली में मौजूद रह सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि अध्ययन में प्रारंभिक संक्रमण की तारीख की पहचान नहीं की गई थी। हालांकि विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि यह जरूरी नहीं कि सामुदायिक ट्रांसमिशन में बच्चों का ही योगदान हो। क्योंकि ट्रांसमिशन के लिए वायरस के आरएनए जीन के गैर-व्यवहार्य या टुकड़े भी जिम्मेदार हो सकते हैंं। हालांकि यह निर्धारित करने के लिए अभी और अधिक शोध करने की आवश्यकता है कि क्या दुनिया के अन्य हिस्सों में भी बच्चों के एक बड़े समूह के बीच इस शोध के समान निष्कर्ष निकलेंगे?

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वर्कआउट: 5 मिनट की इस कसरत से काम के दौरान भी पा सकते हैं एनर्जी और फिटनेस

सोचिए, कि आपके पास वर्कआउट करने का बिल्कुल भी वक्त नहीं है। तो ऐसे में आप क्या करेंगे? अपनी सेहत और बॉडी फिटनेस को काम के भरोसे दरकिनार कर देंगे या काम के दौरान कुछ समय का ब्रेक लेकर अपनी शिथिल पड़ी बॉडी को एनर्जी देने के लिए कुछ क्विक एक्सरसाइज ट्राय करेंगे? अगर आपने दूसरा ऑप्शन चुना है तो हम आपकी मदद कर सकते हैं। आइए जानें कैसे कुछ देर (5 से 10 मिनट केवल) की 6 स्टेप्स वाली 5 मिनट के वर्क आउट से आप भी पा सकते हैं काम करते हुए भी फिट बॉडी और चुस्त दिमाग, बस पांच मिनट के लिए आपको अपने कम्प्यूटर स्क्रीन से नजरें हटानी होंगी।

वर्कआउट: 5 मिनट की इस कसरत से काम के दौरान भी पा सकते हैं एनर्जी और फिटनेस

दिनभर बैठे रहना बन रहा परेशानी
हमारी बिगड़ती जीवनशैली और देर तक बैठे-बैठे काम करना अब हमारी सेहत के लिए जोखिम बनता जा रहा है। वैज्ञानिकों ने सेहत के लिए इसे भी स्मोकिंग जितना ही बड़ा खतरा माना है। दरअसल, लंबे समय तक बैठे रहने से स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव जैसे उच्च रक्तचाप में वृद्धि, मोटापा, हाई ब्लड शुगर यहां तक कि कैंसर होने का जोखिम भी कई गुना बढ़ जाता है। यही वजह है कि घर में टीवी या लैपटाप और ऑफिस में कम्प्यूटर के आगे बहुत अधिक देर तक बैठना अब चिकित्सकों के लिए चिंता का कारण बन गया है। हाल ही हुए कुछ शोध के निष्कर्षों से पता चला है कि बैठने का समय-समय जैसे-जैसे बढ़ता जाता है वैसे-वैसे हमारी अकस्मात मृत्यु का जोखिम भी बढ़ता जाता है।

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कोरोना लॉकडाउन में और बढ़ी परेशानी
बीते सात-आठ महीनों से कोरोना वारस के चलते ज्यादातर समय घर पर ही बिताने और वर्क फ्रॉम होम करने से बैठे रहने के हमारे समय में और वृद्धि हुई है। घर से ही काम करने के कारण अब कॉपी मशीन, बाथरूम और कॉन्फ्रेंस रूम के साथ-साथ कुछ समय के लिए ब्रेक लेकर दोंस्तों संग बाहर घूमने जाने जैसी अच्छी आदतें हाशिए पर पहुंच गई हैं। यानी अब हमारी शारीरिक गतिविधियां पहले से और भी कम हो गई हैं। परिणामस्वरूप हमारे शरीर लगतार गतिहीन जीवनशैली के अनुरूप ढलते जा रहे हैं।

वर्कआउट: 5 मिनट की इस कसरत से काम के दौरान भी पा सकते हैं एनर्जी और फिटनेस

5 मिनट वर्कआउट रखेगा आपको फिट
अगर आप अपने दिन की शुरुआत कसरत या पांच मिनट योगा की सुबह की वर्कआउट दिनचर्या से करते हैंं तो घंटों बैठने के बाद भी आपका शरीर एन्ज़ाएटी और थकान महसूस नहीं करेगा। बैठे-बैठे काम करने के दौरान कुछ देर का ब्रेक लेने से न केवल शरीर में ब्लड सर्कुलेशन में सुधारकरता है बल्कि यह बॉडी की ओवर ऑल गतिशीलता को बेहतर बनाने में भी मदद करता है। दरअसल, ज्वॉइंट मोबिलिटी एक्सरसाइज हमारे जोड़ों को चिकनाई देते हैं और शरीर को ऊर्जा से भर देते हैं। ज्वॉइंट मोबिलिटी एक्सरसाइज पर काम करना गठिया या जोड़ों के दर्द वाले बड़े वयस्कों के लिए भी बहुत अच्छा व्यायाम विकल्प है। यहां बताई गई यह 5 मिनट की वर्कआउट एक्सरसाइज को खास आपको आपकी कुर्सी से उठाने और शरीर को गतिशील बनाते हुए हृदय गति को बढ़ाकर पूरे शरीर को स्ट्रेच करने में मदद करता है। आइए देखें कैसे करना है ये 5 मिनट वर्कआउट।

वर्कआउट: 5 मिनट की इस कसरत से काम के दौरान भी पा सकते हैं एनर्जी और फिटनेस

01. ग्लूट मसल को टैप करते हुए साइड लंज करें
यह व्यायाम कूल्हों और आंतरिक जांघों की गतिशीलता में सुधार करता है और हैमस्ट्रिंग, ग्लूटस एवं क्वाड्स मांसपेशिशें को भी मजबूत करते हुए मोबिलिटी में सुधार करता है। इसे करने के लिए कुर्सी पर बैठे हुए अपने हाथों को अपने कूल्हों पर रखें और बांया पांव कुर्सी से दूर ले जाएं, इसके बाद अपने दाहिने पैर को दाईं ओर ले जाएं और दाहिने घुटने को एक साइड लंज पोजिशन में मोड़ें। ऐसे ही फिर दोबारा दोहराते हुए अपने दाहिने ग्लूट मसल के साथ कुर्सी पर टैप करने के लिए ग्लूट्स तक पहुंचें। इस दौरान अपने बाएं पैर को जितना हो सके सीधा रखें। प्रारंभिक स्थिति में वापस आने के लिए अपने दाहिने पैर पर दबाव डालें और वापस पहले जैसी मुद्रा में आ जाएं। इस व्यायाम को कुर्सी पर बैठे-बैठे 10 बार दोहराएं।

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02. साइड लंज करते हुए कंधे को झुकाएं
यह व्यायाम कंधे के जोड़ और गर्दन को खींचते हुए ऊपरी वक्ष और रीढ़ की हड्डी के रोटेशन में सुधार करता है। यह ऊपर बताए गए ग्लूट मसल टैप के साथ साइड लंज का ही थोड़ा विस्तृत रूप है। ग्लूट मसल टैप के साथ साइड लंज व्यायाम को दोहराते हुए, आप अब ऊपरी पीठ, छाती और कंधों को फैलाने के लिए अपने कंधे को बारी-बार से झुकाएंगे। जैसे ही आप दाईं ओर झुकते हैं तो आपको अपना दांएं कंधे को नीचे की ओर झुकाना है और ऐसा ही बाएं कंधे को बाईं ओर मोड़ें। फिर दाएं पैर का सहारा लेते हुए कंधों को वापस सेंटर में लेकर आएं और अपनी प्रारंभिक स्थिति में वापस आ जाएं।

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03. ओपेन-टो और वाइड-लेग स्क्वाट
यह एक्सरसाइज हमारे शरीर के कोर एरिया, आंतरिक और बाहरी जांघों और ग्लटस मसल को मजबूत करने का काम करता है। कुर्सी पर बैठे हुए अपने पैरों को अपने कूल्हों से अधिक चौड़ा खोलें। पैरों की उंगलियों को बाहर की ओर मोड़ें। अब घुटनों को मोड़ें और कुर्सी पर अपने ग्लूट्स को टैप करें फिर अपनी बाहों को कंधे से ऊपर जितना ऊपर उठा सकते हैं उतना ऊपर उठाएं। इसएक्सर साइज का समय अपने कोर एरिया को केन्द्रित करें और अपनी नाभि को रीढ़ की ओर खींचें। इसे 10 बार दोहराएं और अपनी सुविधानुसार समय भी बढ़ाएं।

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04. चेयर टो-टैप्स एक्सरसाइज
यह कार्डियो व्यायाम हमारे हृदय गति और ब्लड सर्कुलेशन को बढ़ाते हुए पैरों और कूल्हों की गतिशीलता में सुधार करता है। इसे करने के लिए अपनी कुर्सी के सामने मुंह करके खड़े हो जाएं। अब अपने दाहिने पैर को ऊपर उठाएं और अपने दाहिने पैर के साथ कुर्सी के किनारे को टैप करें, फिर पैर को नीचे रखें और बाएं पैर के साथ इसी प्रक्रिया को दोहराएं। कुल 40टैप करने के प्रत्येक पांव से 20 बार इसे दोहराएं।

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05. लंबे समय तक चेयर लंज
यह खिंचाव हिप फ्लेक्सर्स और हैमस्ट्रिंग को खोलता है, जो कमर और पीठ दर्द को ठीक करने में मदद कर सकता है। इसे करने के लिए चेयर टो-टैप्स एक्सरसाइज की तरह कुर्सी के सामने मुंह करके खड़े हो जाएं। अब अपने दोनों हाथों को कमर या कूल्होंपर रखकर अपने दाहिने पैर को कुर्सी पर रखें। इसके बाद दाहिने घुटने को दाहिने टखने के ऊपर झुकाएं और अपनी छाती को ऊपर उठाएं। ऐसे ही बाईं एड़ी के माध्यम से नीचे की ओर दबाएं और बाएं कूल्हे को जितना हो सके सीधा रखते हुए सामने की ओर खींचे। फिर एक गहरी सांस अंदर की ओर लें और फिर इसी प्रक्रिया को बांए पैर के साथ दोहराएं। इस दौरान दाहिने पैर को फ्लेक्स करें और अपने शरीर के ऊपरी हिस्से को पैर के आगे की ओर झुकाएं। ऐसा करने पर आपको दाहिने पैर के पीछे मौजूद हैमस्ट्रिंग और काल्फ मसल्स में खिंचाव महसूस होगा। इसे पांच-पांच बार दोनों पैरों पर करें।

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06. सिर के पीछे हाथ लगाकर पूरे बदन को खींचे
हाथों को सिर के पीछे रखकर पूरी बॉडी को स्ट्रेच करने सेे छाती, कंधों और बगल के हिस्सों में रक्त का प्रवाह में सुधार होता है। साथ ही यह ऊर्जा और श्वसन प्रक्रिया को भी बेहतर बनाता है। ऐसा करने के लिए अपने हाथों को अपने सिर के पीछे रखें और कुर्सी के लंज व्यायाम को अधिक देर तक दोहराएं। कोहनी के साथ प्रत्येक तरफ पांच बार ऐसा करें ताकि छाती और बगल को स्ट्रेच कर उन्हें खोल सकें। इस वर्कआउट को रोजाना करें। यदि आप वास्तव में इसे करना चाहते हैं, तो अपने कैलेंडर पर एक अलार्म सेट कर सकते हैं ताकि यह पूरे कार्यदिवस में पूरा हो सके।

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Friday, 28 August 2020

जानिए नए दांत लगाने के कॉर्टिकल इम्प्लांट तकनीक के बारे में

नए दांत लगाने में कॉर्टिकल इम्प्लांट तकनीक क्या है?
दांत लगाने की पारंपरिक तकनीक कन्वेंशनल इम्प्लांट में जबड़े के कम कठोर भाग में नए दांत लगाते हैं। इसके बाद इम्प्लांट व हड्डी के जुडऩे का काफी इंतजार करना पड़ता है। लेकिन इन दिनों नए दांत लगाने में नई तकनीक कॉर्टिकल इम्प्लांट्स की मदद ली जाती है। यह तकनीक ऑर्थोपेडिक कॉन्सेप्ट पर काम करती है। इसमें इम्प्लांट को हड्डी के कठोर हिस्से पर या जबड़े में लगाया जाता है और इसके ऊपर नए दांत को लगा देते हैं। इसके जरिए 72 घंटों में नए दांत अपनी जगह फिक्स हो जाते हैं।
यह तकनीक किस तरह फायदेमंद है?
चीरा रहित तकनीक होने के कारण इससे कम खून निकलता है और सूजन भी कम होती है। साथ ही पायरिया की समस्या में प्रभावित दांत को निकालकर इस तकनीक से नए दांत लगा सकते हैं। रोग से राहत मिलती है। इसमें तीन दिन का समय लगता है।
क्या हटाने-लगाने वाली बत्तीसी की जगह इस तकनीक से स्थायी दांत लगवा सकते हैं?
हां, कॉर्टिकल इम्प्लांट के जरिए स्थायी दांत लगवाए जा सकते हैं क्योंकि ये जबड़े की कठोर हड्डी में लगाए जाते हैं।
जबड़े के कैंसर में जहां हड्डी को हटा दिया जाता है, क्या ऐसे मरीजों को भी फिक्स दांत लगाए जा सकते हैं?
कैंसर के मरीजों में कैंसर प्रभावित जबड़े की हड्डी को हटा दिया जाता है। लेकिन आसपास की कठोर हड्डी में लंबे कॉर्टिकल इम्प्लांट लगाकर फिक्स दांत लगाए जा सकते हैं। मरीज उन दांतों से आसानी से खाना खा सकता है।



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ब्रेन स्ट्रोक से बचना है तो मधुमेह, हाईबीपी के मरीज को इन बातों का रखना होगा ध्यान

बे्रन स्ट्रोक दोबारा न हो, क्या सावधानी बरतें?
सबसे पहले पैरालिटिक स्ट्रोक (शरीर के एक तरफ लकवे की स्थिति) क्लॉट जमने की प्रवृत्ति को कम करने के लिए रक्तपतला करने की दवाएं लें। यदि रोगी हाई बीपी, मधुमेह या कोलेस्ट्रॉल कम करने की दवा ले रहा है तो वह उन्हें नियमित ले। धूम्रपान करते हैं तो तुरंत बंद करें। नियमित रूप से एक्सरसाइज कर वजन कम करें। तला-भुना भोजन व नमक कम ही खाएं। हृदय संबंधी रोगों से भी बे्रन स्ट्रोक हो सकता है। इसलिए चेकअप कराएं।
यदि व्यक्ति हाई बीपी के लिए नियमित दवाएं ले तो क्या उसे फिर भी ब्रेन स्ट्रोक हो सकता है?
हाई ब्लड प्रेशर की शिकायत पर नियमित दवाएं लेने से ब्रेन स्ट्रोक का खतरा कम हो जाएगा लेकिन समाप्त नहीं। रोग के कई कारणों में से हाई बीपी एक है। ऐसे में यदि ब्लड प्रेशर नियंत्रित है और दूसरे कारक अनियंत्रित हों तो भी स्ट्रोक का खतरा रहता है।
ब्रेन स्ट्रोक के लक्षण क्या हैं?
इसके लक्षणों को अंग्रेजी के शब्द फास्ट (एफएएसटी) से पहचान सकते हैं। एफ (फेस) चेहरा टेढ़ा होना। ए (आर्म) एक हाथ का काम न करना। एस (स्पीच) बोलने, समझने में दिक्कत और टी (टाइम) इमरजेंसी है। स्ट्रोक से पीडि़त को तुरंत अस्पताल ले जाएं। कुछ और लक्षण भी दिखाई देते हैं, लेकिन ये सबसे प्रमुख हैं।
क्या ब्रेन स्ट्रोक पर काबू पाया जा सकता है?
हां, स्ट्रोक के लक्षण दिखने पर रोगी को तुरंत अस्पताल पहुंचाएं। यहां क्लॉट डिजॉल्विंग ड्रग्स देकर या इंटरवेंशन तकनीक से क्लॉट निकालकर रोग को शुरूआती स्टेज में नियंत्रित कर सकते हैं। बड़े अस्पतालों में इलाज के लिए आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं।



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भारत के पास 2021 की शुरुआत में होगा कोरोना वैक्सीन : रिपोर्ट

न्यूयॉर्क । भारत के पास निश्चित रूप से साल 2021 की पहली तिमाही के भीतर अप्रूव्ड (अनुमोदित) वैक्सीन होगा। साथ ही पैमाने के हिसाब से पुणे स्थित दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीन निर्माता सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एसआईआई) अपनी पहली वैक्सीन वितरित करने की स्थिति में होगा। यह जानकारी एक शीर्ष वॉल स्ट्रीट रिसर्च और ब्रोकरेज फर्म, बर्नस्टीन रिसर्च की गुरुवार की रिपोर्ट से मिली है।

आईएएनएस द्वारा समीक्षा की गई बर्नस्टीन की रिपोर्ट का कहना है, वैश्विक रूप से चार उम्मीदवार ऐसे हैं जो वर्तमान साल 2020 के अंत या 2021 की शुरुआत तक वैक्सीन के अप्रूवल के करीब हैं। साझेदारी के माध्यम से भारत के पास दो हैं, पहला एजेड/ऑक्सफोर्ड का वायरल वेक्टर वैक्सीन और नोवावैक्स का प्रोटीन सब-यूनिट वैक्सीन के साथ एजेड/ ऑक्सफोर्ड वैक्सीन।

उसमें आगे कहा गया है, "एसआईआई को अपनी मौजूदा क्षमता और योग्यता के आधार पर अप्रूवल के समय, क्षमता और मूल्य निर्धारण के मद्देनजर एक या दोनों पार्टनरशिप वाले वैक्सीन कैंडीडेट्स के व्यवसायीकरणके लिए सबसे अच्छी स्थिति में रखा गया है।"


इन दोनों कैंडीडेट्स के पहले चरण और बाकी चरणों के ट्रायल्स के डेटा 'सुरक्षा के संदर्भ में और इम्यूनिटि प्रतिक्रिया प्राप्त करने की वैक्सीन की क्षमता' को लेकर आशाजनक नजर आ रहे हैं।
रिपोर्ट में भारत के 'वैश्विक क्षमता समीकरण' को लेकर उत्साहित करने वाली प्रतिक्रिया व्यक्त की गई है साथ ही इसके मैन्यूफैक्च रिंग पैमाने को चुनौतियों का सामना नहीं करने की उम्मीद भी जताई गई है।
रिपोर्ट का कहना है कि सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया साल 2021 में 60 करोड़ खुराक और साल 2022 में 100 करोड़ खुराक की आपूर्ति कर सकती है, वहीं गावी द वैक्सीन अलायंस और निम्न और मध्यम आय बाजारों के लिए कंपनी की प्रतिबद्धता के मद्देनजर भारत में साल 2021 में इन खुराकों में से 40 से 50 करोड़ खुराक उपलब्ध होना चाहिए। रिपोर्ट का अनुमान है कि सरकारी और निजी बाजार के बीच वैक्सीन की मात्रा 55:45 हो जाएगी।
रिपोर्ट में आगे कहा गया है, "हमारा मानना है कि इन क्षमताओं तक सरकारी चैनलों की पहुंच पहले होगी, लेकिन साथ ही यह भी विश्वास है कि इसके लिए बड़ा निजी बाजार भी होगा। फंडिंग, मैनपावर और डिलीवरी इन्फ्रास्ट्रक्च र के मामले में सरकार अपने दम पर बोझ उठाने के लिए संघर्ष करेगी और हम उम्मीद करते हैं कि निजी बाजार भी इस ओर कदम उठाएंगे।"
एसआईआई ने घोषणा की है कि गावी हर खुराक के लिए तीन डॉलर का भुगतान करेगा। बर्नस्टीन की रिपोर्ट में कहा गया है कि अनुमान के तौर पर सरकार के लिए प्रति खुराक खरीद मूल्य तीन डॉलर और उपभोक्ताओं के लिए प्रति खुराक मूल्य छह डॉलर होने की संभावना है।
रिपोर्ट में एसआईआई के अलावा लगभग तीन अन्य भारतीय फार्मा कंपनियों की जानकारी दी गई है, जो अपने स्वयं के वैक्सीन कैंडीडेट्स पर काम कर रही हैं और वे वर्तमान में पहले और दूसरे चरण में हैं। ये कंपनियां जाइडस, भारत बायोटेक और बायोलॉजिकल ई हैं।
एसआईआई, भारत बायोटेक, बायोलॉजिकल ई और कुछ छोटी कंपनियों को मिलाकर भारत हर साल विभिन्न वैक्सीन की करीब 230 करोड़ खुराक का उत्पादन करता है।
विश्व स्तर पर एसआईआई अकेले ही 150 करोड़ खुराक की क्षमता वाले वैक्सीन का सबसे बड़ा निर्माता है। वैश्विक स्तर पर हर तीन में से दो बच्चों को एसआईआई द्वारा निर्मित एक वैक्सीन मिलती है।
एसआईआई ने इस अगस्त की शुरुआत में भारत और निम्न और मध्यम आय वाले देशों (एलएमआईसी) के लिए कोविड-19 वैक्सीन की 10 करोड़ खुराक तक के निर्माण और वितरण में तेजी लाने के लिए गावी द वैक्सीन अलायंस और बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के साथ साझेदारी की।
एसआईआई को इस साझेदारी से मैन्यूफैक्च रिंग क्षमता बढ़ाने में मदद मिली है, ताकि एक बार जब एक या दोनों वैक्सीन को रेगुलेटरी अप्रूवल मिल जाता है और डब्ल्यूएचओ से प्रीक्वालिफिकेशन प्राप्त हो जाता है तो, भारत और निम्न और मध्यम आय वाले राष्ट्रों को 2021 की पहली छमाही में बड़े पैमाने पर खुराक का वितरण और प्रोडक्शन किया जा सकता है।
निखिला नटराजन



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भारत के पास 2021 की शुरुआत में होगा कोरोना वैक्सीन : रिपोर्ट

न्यूयॉर्क । भारत के पास निश्चित रूप से साल 2021 की पहली तिमाही के भीतर अप्रूव्ड (अनुमोदित) वैक्सीन होगा। साथ ही पैमाने के हिसाब से पुणे स्थित दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीन निर्माता सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एसआईआई) अपनी पहली वैक्सीन वितरित करने की स्थिति में होगा। यह जानकारी एक शीर्ष वॉल स्ट्रीट रिसर्च और ब्रोकरेज फर्म, बर्नस्टीन रिसर्च की गुरुवार की रिपोर्ट से मिली है।

आईएएनएस द्वारा समीक्षा की गई बर्नस्टीन की रिपोर्ट का कहना है, वैश्विक रूप से चार उम्मीदवार ऐसे हैं जो वर्तमान साल 2020 के अंत या 2021 की शुरुआत तक वैक्सीन के अप्रूवल के करीब हैं। साझेदारी के माध्यम से भारत के पास दो हैं, पहला एजेड/ऑक्सफोर्ड का वायरल वेक्टर वैक्सीन और नोवावैक्स का प्रोटीन सब-यूनिट वैक्सीन के साथ एजेड/ ऑक्सफोर्ड वैक्सीन।

उसमें आगे कहा गया है, "एसआईआई को अपनी मौजूदा क्षमता और योग्यता के आधार पर अप्रूवल के समय, क्षमता और मूल्य निर्धारण के मद्देनजर एक या दोनों पार्टनरशिप वाले वैक्सीन कैंडीडेट्स के व्यवसायीकरणके लिए सबसे अच्छी स्थिति में रखा गया है।"


इन दोनों कैंडीडेट्स के पहले चरण और बाकी चरणों के ट्रायल्स के डेटा 'सुरक्षा के संदर्भ में और इम्यूनिटि प्रतिक्रिया प्राप्त करने की वैक्सीन की क्षमता' को लेकर आशाजनक नजर आ रहे हैं।
रिपोर्ट में भारत के 'वैश्विक क्षमता समीकरण' को लेकर उत्साहित करने वाली प्रतिक्रिया व्यक्त की गई है साथ ही इसके मैन्यूफैक्च रिंग पैमाने को चुनौतियों का सामना नहीं करने की उम्मीद भी जताई गई है।
रिपोर्ट का कहना है कि सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया साल 2021 में 60 करोड़ खुराक और साल 2022 में 100 करोड़ खुराक की आपूर्ति कर सकती है, वहीं गावी द वैक्सीन अलायंस और निम्न और मध्यम आय बाजारों के लिए कंपनी की प्रतिबद्धता के मद्देनजर भारत में साल 2021 में इन खुराकों में से 40 से 50 करोड़ खुराक उपलब्ध होना चाहिए। रिपोर्ट का अनुमान है कि सरकारी और निजी बाजार के बीच वैक्सीन की मात्रा 55:45 हो जाएगी।
रिपोर्ट में आगे कहा गया है, "हमारा मानना है कि इन क्षमताओं तक सरकारी चैनलों की पहुंच पहले होगी, लेकिन साथ ही यह भी विश्वास है कि इसके लिए बड़ा निजी बाजार भी होगा। फंडिंग, मैनपावर और डिलीवरी इन्फ्रास्ट्रक्च र के मामले में सरकार अपने दम पर बोझ उठाने के लिए संघर्ष करेगी और हम उम्मीद करते हैं कि निजी बाजार भी इस ओर कदम उठाएंगे।"
एसआईआई ने घोषणा की है कि गावी हर खुराक के लिए तीन डॉलर का भुगतान करेगा। बर्नस्टीन की रिपोर्ट में कहा गया है कि अनुमान के तौर पर सरकार के लिए प्रति खुराक खरीद मूल्य तीन डॉलर और उपभोक्ताओं के लिए प्रति खुराक मूल्य छह डॉलर होने की संभावना है।
रिपोर्ट में एसआईआई के अलावा लगभग तीन अन्य भारतीय फार्मा कंपनियों की जानकारी दी गई है, जो अपने स्वयं के वैक्सीन कैंडीडेट्स पर काम कर रही हैं और वे वर्तमान में पहले और दूसरे चरण में हैं। ये कंपनियां जाइडस, भारत बायोटेक और बायोलॉजिकल ई हैं।
एसआईआई, भारत बायोटेक, बायोलॉजिकल ई और कुछ छोटी कंपनियों को मिलाकर भारत हर साल विभिन्न वैक्सीन की करीब 230 करोड़ खुराक का उत्पादन करता है।
विश्व स्तर पर एसआईआई अकेले ही 150 करोड़ खुराक की क्षमता वाले वैक्सीन का सबसे बड़ा निर्माता है। वैश्विक स्तर पर हर तीन में से दो बच्चों को एसआईआई द्वारा निर्मित एक वैक्सीन मिलती है।
एसआईआई ने इस अगस्त की शुरुआत में भारत और निम्न और मध्यम आय वाले देशों (एलएमआईसी) के लिए कोविड-19 वैक्सीन की 10 करोड़ खुराक तक के निर्माण और वितरण में तेजी लाने के लिए गावी द वैक्सीन अलायंस और बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के साथ साझेदारी की।
एसआईआई को इस साझेदारी से मैन्यूफैक्च रिंग क्षमता बढ़ाने में मदद मिली है, ताकि एक बार जब एक या दोनों वैक्सीन को रेगुलेटरी अप्रूवल मिल जाता है और डब्ल्यूएचओ से प्रीक्वालिफिकेशन प्राप्त हो जाता है तो, भारत और निम्न और मध्यम आय वाले राष्ट्रों को 2021 की पहली छमाही में बड़े पैमाने पर खुराक का वितरण और प्रोडक्शन किया जा सकता है।
निखिला नटराजन



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इनोवेशन: इस नए टेस्ट्स से 10 मिनट में पता लग जाएगा दर्द हार्ट अटैक का है या नहीं, बच सकेगी रोगी की जान

हाल ही यूरोपियन सोसायटी ऑफ कार्डियोलॉजी (European Society for Cardiology) ने एक शोध प्रकाशित किया है। इस नए प्रारंभिक शोध का कहना है कि एक सामान्य लार परीक्षण के जरिए प्रोटीन बायोमार्कर की उपस्थिति का पता लगा अब केवल 10 मिनट में दिल के दौरे ( cardiovascular problems) का पता लगाया जा सकता है। यदि इस प्रोटोटाइप परीक्षण को मान्यता मिलती है तो यह नाटकीय रूप से कॉर्डियो वस्कुलर केसेज में मरीज की जान बचाना आसान बना सकता है। दरअसल, एक म्योकार्डिअल इनफैरक्शन (myocardial infarction) जिसे सामान्य भाषा में दिल का दौरा पडऩा कहते हैं, मरीज के रक्त प्रवाह में ट्रोपोनिन (troponin) नामक प्रोटीन का स्तर तेजी से बढ़ता है। लेकिन अधिकतर मामलोंमें अक्सर दिल के दौरे की पहचान कर पाना आसान नहीं होता। छाती में दर्द, मितली होना और थकान जैसे लक्षण जैसे सामान्य संकेत हो सकते हैं। इसलिए जब कोई मरीज इन लक्षणों के साथ किसी आपातकालीन यूनिट में पहुंचता है तो डॉक्टर जल्दी से ट्रोपोनिन के स्तर को मापने के लिए रक्त परीक्षण करते हैं। आमतौर पर इस रक्त परीक्षण में लगभग एक घंटे का समय लगता है। यह 60 मिनट दिल का दौरा या कॉर्डियोवस्कुलर प्राब्लम से जूझ रहे किसी भी व्यक्ति के लिए गोल्डन हॉवर (Golden Hour) होते हैं।

इनोवेशन: इस नए टेस्ट्स से 10 मिनट में पता लग जाएगा दर्द हार्ट अटैक का है या नहीं, बच सकेगी रोगी की जान

ट्रोपोनिन का स्तर मापने की गति में तेजी
किसी भी अस्पताल में सीने में दर्द के साथ आने वाले आपातकालीन रोगियों के लिए एक सरल और तेजी से ट्रोपोनिन परीक्षण की बहुत आवश्यकता है। इजऱाइल में सोरोका यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर के लेखक रूई वेस्टरीच का कहना है कि वर्तमान में ट्रोपोनिन परीक्षण रक्त के नमूनों का उपयोग करता है। लेकिन हमने जो नया हार्ट अटैक डिटेक्शन टैस्ट विकसित किया है वह प्रारंभिक जांच में ही हमें लार का उपयोग कर यह बताने में सक्षम है कि यह दर्द हार्ट अटैक के कारण है या कोई और समस्या है। इससे रोगी की जान बचाना आसान हो जाएगा। यह शोध व्यावसायिक रूप से उपलब्ध ट्रोपोनिन रक्त परीक्षणों को लेने और लार के नमूनों में प्रोटीन का पता लगाने के लिए उन्हें अनुकूलित करने के तरीके खोजने के दौरान विकसित हुआ। लार के नमूनों में से कई सुपरफ्लस प्रोटीन को हटाने के लिए एक नोवेल प्रोसेसिंग प्रोसीजर विकसित की गई थी। लेखक रूई वेस्टरीच का कहना है कि हमने सीने में तेज दर्द की शिकायत लेकर आए रोगियों के लार के नमूनों की में रक्त के ट्रोपोनिन प्रोटीन की पुष्टि कर 32 रोगियों में हार्ट अटैक की पुष्टि की है। इसके अलावा 13 स्वस्थ लोगोंसे भी लार के नमूने लिए ताकि तुलना कर सकें।

इनोवेशन: इस नए टेस्ट्स से 10 मिनट में पता लग जाएगा दर्द हार्ट अटैक का है या नहीं, बच सकेगी रोगी की जान

जांच में प्रारंभिक परिणाम सफल रहे
प्रारंभिक परिणाम शानदार थे और हार्ट अटैक के बारे में बिल्कुल सही जानकारी दी थी। हार्ट अटैक के रोगियों से मिले लार के नमूनों में ट्रोपोनिन प्राटीन 84 प्रतिशत पाया गया था। केवल छह प्रतिशत लार के नमूनों में ही ट्रोपोनिन का स्तर नहीं मिला। यह परीक्षण साबित करता है कि प्रभावी परिणामों के लिए लार के नमूनों को केंद्रित करने में यह नोवेल प्रोसेसिंग प्रोसीजर महत्वपूर्ण है। हालांकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो सकता है कि यह प्रक्रिया कैसे कारम करती है और यह कितनी आसान और सस्तीसाबित होगी।

इनोवेशन: इस नए टेस्ट्स से 10 मिनट में पता लग जाएगा दर्द हार्ट अटैक का है या नहीं, बच सकेगी रोगी की जान

10 मिनट में लगेगा दिल के दौरे का पता
शोधकर्ताओं का कहना है कि उनकी इस नई तकनीक से केवल 10 मिनट में यह बताया जा सकेगा कि उक्त व्यक्ति को दिल का दौरा पड़ा है या नहीं। लगेंगे। यह तकनीक उन लोगों के लिए बहुत उपयोगी और जीवन रक्षक साबित हो सकती है जो पहले से ही हृदय संबंधी रोगोंसे घिरे हुए हैं या जिनकी उम्र ज्यादा है और वे दिल के दौरे पडऩे के दायरे में आते हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह परीक्षण अंतत: किसी गर्भावस्था परीक्षण के समान काम करेगा जो मिनटों में निगेटिव या पॉजिटिव रिजल्ट देगा।

इनोवेशन: इस नए टेस्ट्स से 10 मिनट में पता लग जाएगा दर्द हार्ट अटैक का है या नहीं, बच सकेगी रोगी की जान

वेस्ट्रिच कहते हैं कि रोगियों की लार में कार्डियक ट्रोपोनिन की उपस्थिति दिल का दौरा पडऩे के बाद कितनी देर तक रहता है, यह निर्धारित करने के लिए अभी और शोध करने की आवश्यकता है। इसके अलावा, हमें यह भी जानने की जरूरत है कि दिल के दौरे से कितने मरीजों का गलत निदान होगा और कितने मामलों में चूक होने की आशंका होती है। यह नए शोध हाल ही यूरोपीय सोसायटी फॉर कार्डियोलॉजी एनुअल 2020 कांग्रेस में प्रस्तुत किया गया था।



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लाइफ स्टाइल: जानिये स्ट्रैस हमारे चेहरे पर क्या और कैसे असर डालता है?

जीवन के किसी न किसी मोड़ पर हम में से हर कोई तनाव (Stress) महसूस करता है। लेकिन असल पुरानी तब शुरू होती है जब स्ट्रैस या तनाव का यह स्तर पुराना और गहरा (Chronic Stress) हो जाता है। ऐसा होने पर हमारे शरीर और मानसिक स्वास्थ्य पर इसका गहरा असर पड़ता है। जिसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। 'स्ट्रैस ट्रस्टेड सोर्स' अवसाद के प्रभाव को बढ़ाकर मानसिक स्वास्थ्य के विकास से जुड़े जोखिम को बढ़ा सकते हैं। इतना ही नहीं इससे आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली भी नकारात्मक रूप से प्रभावित हो सकती है और हृदय रोग के विकास के आपके जोखिम को बढ़ा सकते हैं। लेकिन तनाव का सबसे ज्यादा असर होता है हमारे चेहरे पर। वहीं चेहरा जो हमारी वास्तविक पहचान है जो हमारे व्यक्तित्व का सबसे चमकदार हिस्सा है। तनाव केचलते हमारे चेहरे पर बिन बुलाए निशान, रूखी-सूखी त्वचा, झुर्रियां और मुंहासे पूरे चेहरे की रौनक को खराब कर देते हैं। आइए जानते हैं कि चेहरे पर तनाव के और क्या प्रभाव हो सकते हैं।

लाइफ स्टाइल: जानिये स्ट्रैस हमारे चेहरे पर क्या असर डालता है?

तनाव ऐसे डालता है चेहरे पर असर
क्रॉनिक स्ट्रैस यानी किसी पुराने तनाव के कारण होने वाला असर आपके चेहरे पर दो तरह से दिखाई दे सकता है। सबसे पहला, हमारा शरीर जो हार्मोन रिलीज करता है तो तनाव महसूस करने के दौरान उनमें शारीररिक रूपसे परिवर्तन हो सकता है जिनका हमारे स्वास्थ्य और शरीर पर बुरा असर पड़ सकता है। दूसरा, तनाव महसूस करने पर हम दांत पीसना,होठों को काटना या चीजों को फेंकना शुरू कर देते हैं जो हमारे लिए अच्दे संकेत नहीं हें क्योंकि ये आगे चलकर अवसाद में बदल सकता है। आइए जानते हैं कि तनाव और किस-किस तरह से हमारे चेहरे पर असर डालता है।

लाइफ स्टाइल: जानिये स्ट्रैस हमारे चेहरे पर क्या असर डालता है?

01. मुंहासे (Acne)
जब आप तनाव महसूस करते हैं तो आपका शरीर हार्मोन कोर्टिसोल बहुत ज्यादा मात्रा में छोड़ता है। कोर्टिसोल हमारे मस्तिष्क का एक हिस्सा है जिसे हाइपोथैलेमस के रूप में जाना जाता है। यह भी कॉर्टिकोट्रॉफिन-रिलीजिंग हार्मोन (CRH) नामक एक हार्मोन का उत्पादन करता है। सीआरएच हमारे बालों के रोम छिद्रों के चारों ओर बनी वसामय तैलीय ग्रंथियों से तेल छोडऩे के लिए उत्तेजित करता है। इन ग्रंथियों द्वारा अत्यधिक मात्रा में तेल छोडऩे से रोम छिद्रों का मुंह बंद हो जाता है जिससे कील-मुंहासे बनते हैं। हालांकि अभी तक यह माना जाता है कि तनाव मुंहासे का कारण बनते हें लेकिन इसे साबित करने वाले शोध बहुत ही कम हैं। 2017 में हुए एक अध्ययन में 22 से 24 वर्ष की आयु के बीच की मेडिकल छात्राओं के चेहरे पर मुंहासों और उनका चेहरे पर पडऩे वाले प्रभाव का अधययन किया गया था। शोधकर्ताओं ने पाया कि बहुत ज्यादा तनाव होने पर चेहरे पर मुंहासे भी उतनी ही उच्च सतर पर नजर आते हैं और दोनों का आपस में गहरा संबंध है। ऐसे ही 2011 के एक दक्षिण कोरियाई महामारी विज्ञान के अध्ययन के अनुसार भी तनावख् नींद की कमी, शराब का सेवन और मासिक धर्म का नियमित न होने पर भी चेहरे पर मुंहासे हो सकते हैं।

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02. आंखों के नीचे उभार या सूजन (Bags under your eyes)
आंखों के नीचे बैग जैसी आकृति दरअसल आपकी पलकों के नीचे सूजन या सूजन जैसीउभार का संकेत है। यह उम्र के साथ और अधिक बड़ा होता जाता है क्योंकि आपकी आंखों के आसपास की सहायक मांसपेशियां कमजोर पड़ जाती हैं। उन मांसपेशियों में लोच की कमी के कारण शुष्क त्वचा भी आई बैग बनाने में योगदान कर सकती है। 'रिसर्च ट्रस्टेड सोर्स' ने अपने शोध में पाया है कि नींद की कमी के कारण होने वाला तनाव उम्र बढऩे के कारणों को भी बढ़ाता है। जैसे चेहरे और त्वचा पर बारीक रेखाओं का उभरना, त्वचा का लचीलापन नष्ट होना और असमान पिगमेंटेशन। इतना ही नहीं त्वचा की लोच का नुकसान आपकी आंखों के नीचे बैग का भी कारण बन सकता है।

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03. रूखी त्वचा (Dry skin)
स्ट्रेटम कॉर्नियम आपकी त्वचा की बाहरी परत है। इसमें प्रोटीन और लिपिड होते हैं जो आपकी त्वचा की कोशिकाओं को हाइड्रेट रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह एक सुरक्षा घेरे के रूप में भी कार्य करता है जो त्वचा के नीचे की परत की रक्षा करता है। जब आपका स्ट्रेटम कॉर्नियम पूरी क्षमता से अपना काम नहीं कर पाता तब त्वचा शुष्क और खुजलीदार होने लगती है। 2014 के एक समीक्षात्मक शोध के अनुसार इन्फ्लेमेशन एंड एलर्जी ड्रग टार्गेट्स में प्रकाशित निष्कर्ष में चूहों पर किए गए अध्ययन के हवाले से कहा गया था कि तनाव आपके स्ट्रेटम कॉर्नियम के कार्य को बाधित करता है और त्वचा में नमी बनाए रखने की क्षमता को भी प्रभावित करता है। शोध की समीक्षा में यह भी उल्लेख किया गया है कि कई मानव अध्ययनों ने पाया गया कि वैवाहिक व्यवधान से उत्पन्न तनाव को दूर करने से त्वचा की बाधा को स्वयं ही ठीक करने की क्षमता मिल जाती है और यह त्वचा के बूढ़े होने की प्रक्रिया को धीमा भी कर सकता है।

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04. चकत्ते या झाइयां(Rashes)
तनाव में हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर करने की क्षमता होती है। एक कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली हमारी आंत में मौजूद 33 हजार से ज्यादा बैक्टीरिया के असंतुलन और डिस्बिओसिस के रूप में जानी जाने वाली त्वचा को जन्म दे सकती है। जब इस असंतुलन का असर हमारी त्वचा पर होता है तो स्किन पर यह चकत्ते, झाइयां, लालिमा या दाने का कारण बन सकता है। तनाव को कई हार्माेनिकल स्थितियों को ट्रिगर या उत्तेजित करने के लिए जाना जाता है। यह सोरायसिस, एक्जिमा और दाद की सूजन जैसे चकत्ते या सूजन वाली त्वचा का कारण भी बन सकता है।

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05. झुर्रियां (Wrinkles)
तनाव हमारी त्वचा में बनने वाले विभिन्न प्रोटीन के परिवर्तन का कारण भी बनता है और इसकी इलास्टिसिटी यानी लचक को कम करता है। लोच का यह नुकसान त्वचा की चुस्ती और खिंचाव के लिए जिम्मेदार कोशिकाओं में झुर्रियां पैदा कर सकता है। इतना ही नहीं तनाव से आपकी भौंह में बार-बार फुंसी हो सकती है जो झुर्रियों के निर्माण में सहयोग करती है।

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06. सफेद/ग्रे बाल, बाल झडऩा(Graying hair-hair loss)
आमतौर पर कहा जाता है कि तनाव हमारे बालों को सफेद या ग्रे कर देता है। हालांकि, यह केवल हाल ही में वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि ऐसा क्यों होता है? दरअसल, मेलानोसाइट्स नामक कोशिकाएं मेलेनिन नामक एक वर्णक (pigment) का उत्पादन करती हैं जो आपके बालों को भूरा, काला, लाल, ब्लोंड रंग देता है। साल 2020 में ही 'नेचर मैगजीन' में प्रकाशित एक शोध के अनुसार तनाव से सहानुभूति तंत्रिका गतिविधि (sympathetic nervous activity) स्टेम कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकती है जिससे मेलानोसाइट्स गायब होने लगते हैं। एक बार जब ये कोशिकाएं गायब हो जाती हैं तो नई कोशिकाएं अपना रंग खो देती हैं और ग्रे या सफेद हो जाती हैं। क्रॉनिक स्ट्रैस यानी पुराने तनाव के कारण हमारे बालों के बढऩे की गति भी बाधित होने लगती है जो टेलोजेन इफ्लुवियम नामक स्थिति को जन्म दे सकता है। टेलोजन एफ्लुवियम की वजह से सामान्य की तुलना में बहुत ज्यादा मात्रा में बालों का झडऩा शुरू हो जाता है।

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07. तनाव से चेहरे पर होने वाले अन्य कुप्रभाव (Other ways stress affects your face)
तनाव इन संभावित तरीकों से भी हमारे चेहरे पर असर डाल सकता है-
अ. दांतों को नुकसान(Tooth Damage)-
कई लोग तनाव या चिंता महसूस होने पर दांत पीसने की आदत अपना लेते हैं। समय के साथ, यह आपके दांतों को स्थायी रूप से नुकसान पहुंचा सकता है।
ब. टेम्पोरोमैंडिबुलर ज्वाइंट डिसफंक्शन (TMD)-
टीएमडी स्वास्थ्य समस्याओं का एक समूह है जो संयुक्त रूप से चहरे और शरीर को प्रभावित करता है। टेम्पोरोमेंडिब्यूलर वह हिस्सा है जहां आपका जबड़ा आपकी खोपड़ी से जुड़ता है। यह आपके दांतों और मुंह में पायरिया या दुर्गंध आने का कारण हो सकता है।

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स. चेहरा निस्तेज होना (Face flushing)-
तनाव होने पर हम अनियमित रूप से बहुत तेज या बहुत धीरे-धीरे सांस लेते हैं और इससे सामान्य रिद्म बिगड़ जाती है। सांस लेने की ये अनियमित आदतें आपके चेहरे को अस्थायी रूप से निस्तेज कर सकती हैं।
द. होंठ चबाना (Sore lips)-
तनाव महसूस होने पर कई लोगों में अपने होठों को चबाना या अजीब तरह से मुंह चलाने की आदत होती है जो हमारे चेहरे पर बुरा असर डालता है।

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तनाव का सामना कैसे करें (How to cope with stress)-
तनाव के कुछ प्रमुख कारणों में किसी प्रियजन की अचानक मृत्यु, करीबी रिश्तों में धोखा या अप्रत्याशित रूप से नौकरी छूट जाना होता है। हालांकि, तनाव से निपटने और कम करने के तरीके भी मौजूद हैं जो आपको इससे बेहतर ढंग से प्रबंधित करने में मदद कर सकते हैं।
-सबसे पहले तो आराम की गतिविधियों के लिए समय निर्धारित करें। उन गतिविधियोंमें मन लगाएं जो तनाव होने पर आपको सुकून देती हैं।
-जीवनशैली की अच्छी आदतें बनाए रखें। लगातार स्वस्थ आहार खाने के साथ-साथ भरपूर नींद लेने से आपके शरीर को तनाव का बेहतर प्रबंधन करने में मदद मिलेगी।

लाइफ स्टाइल: जानिये स्ट्रैस हमारे चेहरे पर क्या असर डालता है?

-हमेशा शारीरिक रूप से खुद को सक्रिय रखें। व्यायाम आपको अपने तनाव हार्मोन को संतुलित करने में मदद करता है और आपको तनाव के कारण को दूर करने के लिए कुछ समय दे सकता है।
-तनाव होने पर बात करना बंद न करें बल्कि अपने करीबी लोगों से संवाद करें। कोई एक दोस्त, परिवार के सदस्य या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से बात करने से कई लोगों को तनाव से निपटने में मदद मिलती है।
-बेवजह कि एंटी-डिप्रेशन या स्ट्रैस की दवाओं और शराब पीने से बचें। दवाओं और अल्कोहल का लगातार उपयोग तनाव की अतिरिक्त समस्या पैदा कर सकता है।



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