Wednesday, 30 September 2020

गौमूत्र अर्क करता है कफज और पेट के रोगों को दूर

हाल ही अभिनेता अक्षय कुमार ने एक शो में कहा कि वे रोज गौमूत्र अर्क पीते हैं। उन्होंने के कई फायदे भी गिनाएं हैं। उनका कहना है कि अगर कोई रोजाना इसका अर्क वैद्य की सलाह से से लेता है तो इसके बहुत से फायदे हैं। जानते हैं उसके फायदों के बारे में- गौमूत्र अर्क उदर रोगों में काफी फायदेमंद होता है। यह पेट की अग्नि को बढ़ाकर पाचन को ठीक रखता है। कफज विकारों (सर्दी-खांसी), मोटापा और यकृत व लिवर बढऩे पर भी इसका उपयोग किया जाता है। यह शरीर के दूषित पदार्थों को बाहर निकालने का काम करता है। पुनर्नवा मंडूर आदि दवाइयों को बनाने में इसका उपयोग होता है। गौमूत्र काफी उष्ण और तीक्ष्ण होता है। इसलिए सीधे इसको नहीं पीएं। इससे गले और भोजन नली में छाले निकल सकते हैं। इसके अर्क को पीएं। यह शुद्ध किया जाता है। एक चम्मच अर्क को एक गिलास पानी में पीएं। गौमूत्र अर्क लेने के लिए विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें।



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International Day of Older Persons: उम्र बढ़ने के साथ बढ़ती हैं बीमारियां

जैसे-जैसे उम्र अधिक होने लगती हैं, शरीर भी कमजोर होने लगता है। शरीर के कमजोर होने से शारीरिक और मानसिक बीमारियां होती हैं। देश में 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों (वृद्धजन) की संख्या 13 करोड़ हैं। इनमें से अधिकतर लोगों को कुछ न कुछ सेहत की परेशानी रहती है। इनमें डायबिटीज, हाइपरटेंशन, प्रोस्टेट आदि की समस्या आम है। देशभर में करीब दो करोड़ से अधिक लोग मनोरोग से पीड़ित हैं। वृद्धजनों की मानसिक बीमारी को जेरियाट्रिक मेंटल हैल्थ कहते हैं। जेरियाट्रिक मेंटल हैल्थ एक बीमारी नहीं है, इसमें कई बीमारियां हैं।ऐसे लोगों के लिए विशेष केयर की जरूरत होती है, ज्यादा ध्यान दें। वर्ष 2050 तक भारत में 34 करोड़ लोग 60 वर्ष से अधिक के होंगे। दुनियाभर में एक अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस मनाया जाता है।

बुजुर्गों में एक साथ कई समस्याएं
उम्र बढ़ने पर बुजुर्गों में एकसाथ कई बीमारियां होती हैं। 60 वर्ष से अधिक उम्र के 4 फीसदी बुजुर्गों को डिमेंशिया है । डिमेंशिया के मरीज थोड़ी ही देर पहले की बातों को भूल जाते हैं । 80 से अधिक उम्र होने पर डिमेंशिया के मरीजों की संख्या 30% तक हो जाएगी। बुजुर्ग को डिप्रेशन, डिलिरियम आदि कई अन्य समस्याएं होने लगती हैं। नींद न आने, चिड़चिड़ा होना और छोटी बात पर गुस्सा आम बात है।

बुजुर्गों में हार्ट और स्ट्रोक का खतरा
एक सर्वे के अनुसार देश में 21 फीसदी से अधिक बुजुर्ग डिप्रेशन में हैं। इससे भी मरीजों में हार्ट और स्ट्रोक का खतरा चार गुना बढ़ जाता है । एक्सपर्ट की मानें तो हॉस्पिटल्स की जगह घर में केयर अच्छी होती है । इसलिए बुजुर्गों की सेवा के लिए होम केयर सुविधा बढ़नी चाहिए ।

वृद्धों में बीमारियों के मुख्य कारण ये हैं
रिटायर होने के बाद लोगों का सामाजिक जीवन से दूर होना है। किसी मित्र या संबंधी की मृत्यु की खबर भी परेशान कर देती हैं। साथ ही बीपी, शुगर, स्ट्रोक आदि गंभीर रोग भी कारण होते हैं। बुजुर्गों में मानसिक रोगों का मुख्य कारण उम्र अधिक होना है। 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में रासायनिक परिवर्तन होते हैं। इस कारण डिप्रेशन, एंजायटी और तनाव आदि होने लगता है।

बुजुर्गों के मानसिक रोगों का इलाज ऐसे
बुजुर्गों का इलाज जेरियाट्रिक मेंटल हैल्थ एक्सपर्ट ही करते हैं। इसमें मरीजों के इलाज के साथ परिवारीजनों को भी टे्रनिंग देते हैं। इसमें मरीज को दवाइयां देने के साथ कई प्रकार की थैरेपी देते हैं। इनमें कॉग्नेटिव और बिहैवियर थैरेपी अधिक कारगर होती है। गंभीर मरीजों का इलाज भर्ती कर किया जाता है, अलग वार्ड होता है।

इन तरीकों से हैल्दी रहेंगे बुजुर्ग
40-50 वर्ष की उम्र से ही अपने स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहें । नियमित जांचें कराएं, बीपी, शुगर आदि है तो नियंत्रित रखें
रिटायर होने के बाद भी एक्टिव रहें, सोशल एक्टिविटी करें । अपने लिए भी रोजाना करीब एक घंटे का समय निकालें
दिमाग को एक्टिव रखने के लिए चेस या पजल्स में मन लगाएं। फ्रेंड सर्किल बनाएं, परिवार के अन्य सदस्यों से बातचीत करें । अगर कोई समस्या महसूस हो तो डॉक्टर से संपर्क करें । कई सर्वे में कहा गया है कि बुजुर्ग डिजिटल रूप से एक्टिव रहें । डिजिटल नॉलेज होने से दूर बैठें लोगों से संपर्क कर सकते हैं ।

डॉ. सुनील सुथार, जेरियाट्रिक मेंटल हैल्थ एक्सपर्ट



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30 की उम्र से ध्यान रखेंगे तो हृदय रोगों से होगा बचाव

अमरीकन कॉलेज ऑफ कॉर्डियोलॉजी का कहना है कि अधिक उम्र में हृदय रोगों से बचाव के लिए कम उम्र से ही ध्यान रखने की जरूरत है। इसके लिए 30 वर्ष की उम्र से कुछ बातों का ध्यान रखा जाए। इस वर्ष वल्र्ड हार्ट डे की थीम यूज हार्ट टू बीट कॉर्डियो वेस्कुलर डिजीज है।
हृदय में तीन हिस्से होते
दिल शरीर का इंजन होता है। इसके तीन हिस्से हैं। पहला, हार्ट मसल्स जो खून पंप करता। दूसरा, इलेक्ट्रिकल सिस्टम जो धडक़नों को नियंत्रित करता और तीसरी कोरोनरी आर्टरीज (धमनियां) जिससे ब्लड-ऑक्सीजन की आपूर्ति हर अंगों में होती है।
कैलोरी कम मात्रा में लें
डाइट में कैलोरी की मात्रा फिजिकल एक्टिविटी के अनुसार तय करें। ज्यादा लेने से हृदय रोग होता है। फल, सलाद, हरी सब्जियां, साबुत अनाज ज्यादा और तेल-घी कम खाएं। लहसुन खाएं, कोलेस्ट्रॉल को ठीक रखता, नॉनवेज खाने से बचें।
खराब लाइफ स्टाइल वजह, अच्छी दिनचर्या रखें
95त्न मरीजों में हार्ट डिजीज खराब लाइफ स्टाइल से होती है। कई शोधों में पाया गया है कि 30 वर्ष की उम्र में कुछ सावधानियां बरतें तो हृदय रोगों के खतरे को कम कर सकते हैं। इसके लिए अच्छी दिनचर्या रखें। समय पर सोएं, उठने और अपने काम को करें।
डायबिटीज से नुकसान
डायबिटीज के कारण रोगी की नव्र्स डैमेज हो जाती हैं। इसलिए हार्ट अटैक होने पर उनमें सीने में दर्द या जलन नहीं होती है। हार्ट अटैक होने पर भी पता नहीं चलता है। ऐसे रोगियों को ज्यादा खतरा है। छह माह में संबंधित जांचें कराएं। बीपी और दूसरी बीमारियों को नियंत्रित रखें।
45 मिनट व्यायाम करें
रोज व्यायाम करने से दिल की बीमारियों के साथ अन्य रोगों से भी बचाव होता है। इससे खून की नलियों में कोलेस्ट्रॉल जमा नहीं होता है। रोज 45 मिनट हल्का-फुल्का व्यायाम जरूर करें। 30 मिनट या दस हजार कदम चलें। हृदय की धडक़नें भी सामान्य रहती हैं।
खाने के तेल की भी भूमिका
खाने के लिए सरसों, जैतून या मूंगफली का तेल ठीक रहता है। सोयाबिन का तेल कोलेस्ट्रॉल बढ़ाता है। फ्राई वाले तेल को दोबारा इस्तेमाल न करें, इसे छौंक में इस्तेमाल करें। दोबारा गर्म करने से ट्रांस फैट बढ़ता है। हृदय रोगों का कारण बनता है।
जांच किस उम्र से जरूरी
30 की उम्र के बाद हृदय रोगों की आशंका रहती है। जिनकी फैमिली में बीपी, किडनी और हाई कोलेस्ट्रॉल है वे हाई रिस्क श्रेणी में आते हैं। साल में एक बार जांच जरूर करवाएं।
वजन नियंत्रित रखें
वजन बढऩे से खून की नलियों पर दबाव बढ़ता है। हृदय को ज्यादा काम करना पड़ता है।
सोने से 3 घंटे पहले डिनर
सोने से 3-4 घंटे पहले डिनर कर लें। देरी से खाने से फैट जमा होता है। हृदय रोगों का खतरा बढ़ता है।
खुलकर हंसे
अमरीकन हार्ट एसोसिएशन का कहना है कि खुलकर हंसने से स्टे्रस हार्मोन कम होते हैं। इससे हृदय रोगों का खतरा भी घटता है।
नट्स ज्यादा खाएं
अखरोट और बादाम ज्यादा मात्रा में खाएं। इसमें फाइबर और अच्छा फैट होता है। काजू कम मात्रा में खाएं।



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कोविड-19: 44 % पुरुषों की तुलना में 58 % महिला डॉक्टर्स टेलीमेडिसिन ट्रेंड में आगे- एसएमएसआरसी-पड्र्यू विश्वविद्यालय

भारत में इस समय कोरोना संक्रमण (Covid-19) अपने पीक पर है। संक्रमण से बचने के लिए ज्यादातर लोग अनलॉक के बावजूद घर में ही रहना पसंद कर रहे हैं। ऐसे में डॉक्टर और मरीजों के बीच भी कुछ नए ट्रेंड्स देखने को मिले हैं। हाल ही में एसएमएसआरसी-पड्र्यू विश्वविद्यालय (SMSRC-Purdue University) के क्रानर्ट स्कूल ऑफ मैनेजमेंट (Krannert School of Management study) की ओर से किए गए एक अध्ययन में सामने आया कि देश में टेलीमेडिसिन (Telemedicine) के प्रति एक निरंतर झुकाव आ रहा है। कोरोना संक्रमण के बीच जून-जुलाई में किए गए इस अध्ययन में देश के 80 शहरों व कस्बों से 2,116 फिजिशियन ने हिस्सा लिया है। अध्ययन में कोविड-19 के चलते लॉकडाउन के शुरुआती तीन महीनों का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन में चिकित्सकों ने मुख्य रूप से टेलीमेडिसिन के इन-पर्सन (निजी रूप से मिलने) विजिट पर अपनी टिप्पणियों और वरीयताओं को साझा किया है। अध्ययन में सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि कोविड-19 के शुरुआती तीन महीनों के दौरान 44 फीसदी पुरुष चिकित्सकों की तुलना में 58 फीसदी महिला चिकित्सकों ने टेलीमेडिसिन को अपनाया।

कोविड-19: 44 % पुरुषों की तुलना में 58 % महिला डॉक्टर्स टेलीमेडिसिन ट्रेंड में आगे- एसएमएसआरसी-पड्र्यू विश्वविद्यालय

इसके अलावा, महिला चिकित्सकों ने टेलीमेडिसिन को अपनाने की उच्च प्रवृत्ति दिखाई वहीं पुरुष चिकित्सक इस मामले में भी उनसे काफी पीछे रहे। लेकिन मेट्रो शहरों और युवा पुरुष चिकित्सकों ने अपने seniors की तुलना में टेलीमेडिसिन को अपनाने की ओर अधिक रुचि दिखाई। अध्ययन में भाग ले रहे 86 फीसदी से अधिक चिकित्सकों ने कहा कि उन्होंने अपने सेलुलर ऑडियो कॉल का उपयोग कर रोगियों की परेशानी सुनीं। जबकि 62 फीसदी ने कहा कि उन्होंने सोशल मीडिया ऐप (Social Media App) जैसे व्हाट्सए (Whattsapp), फेसबुक (facebook) और ऐसी ही दूसरी ऐप का उपयोग कर रोगियों को कंसल्ट किया। इन दोनों समूहों की तुलना में केवल 11 फीसदी ने प्रैक्टिस मैनेजमेंट सॉफ्टवेयर (Practice Management Software or PMS) के जरिए रोगियों को देखने की बात स्वीकारी।

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अपनी तरह का पहला अध्ययन
भारत के प्रमुख हेल्थकेयर शोध संगठनों में से एक एसएमएसआरसी, विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित यूएस-आधारित क्रानर्ट स्कूल ऑफ मैनेजमेंट और पड्र्यू यूनिवर्सिटी ने भारत में कोरोना वायरस (Corona Virus in India) के प्रभाव को समझने के लिए भारतीय चिकित्सकों के बीच कोविड-19 के दौरान प्रैक्टिस करने के उनके तरीकों को समझने के लिए अपनी तरह का यह पहला अध्ययन किया है। अध्ययन विभिन्न पहलुओं पर गौर करते हुए क्लिनिक या अस्पताल जाकर इलाज करवाने की बजाय घर बैठे टेलीकम्यूनिकेशन के जरिए डॉक्टर से सलाह-मशविरा करने के संबंध में एक महत्वपूर्ण बदलाव का खुलासा करता है। अध्ययन में देश के 80 शहरों और कस्बों से 2100 से अधिक चिकित्सकों से प्राप्त प्रतिक्रिया और फोन साक्षात्कार से जुटाए सांख्यिकीय नमूनों के आधार पर महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए।

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महिलाएं यहां भी रहीं आगे
परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियों, बढ़ती उम्र, स्वास्थ्य संबंधी जोखिम और उनकी लोकेशन (जैसे कोरोना संक्रमण के रेड जोन) को ध्यान में रखते हुए महिला चिकित्सकों ने टेलीमेडिसिन को प्राथमिकता दी। जबकि उनके साथी पुरुष चिकित्सक इस दौरान भी फिजिकल तौर पर मरीजों को देखने के लिए अपनी क्लिनिक और अस्पताल जाते रहे। पड्र्यू विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर डॉ. रीटाब्राडा कर का कहना है कि टेलीमेडिसिन अपनाने वाली महिला डॉक्टर्स की इस प्रवृत्ति को उनके पुरुष समकक्षों के अनुपात में यूं समझा जा सकता है कि भारतीय महिलाएं परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियों, पुरुषों की रुढि़वादी सोच और परिवार के लिए जोखिम के प्रति पुरुषों से ज्यादा संवेदनशील होती हैं। लॉकडाउन, के दौरान हमने देखा कि घर पर होने के बावजूद भारतीय पुरुष घर के कामों में हाथ बंटाने से कतराते हैं। यानी उन पर इस दौरान दोहरी जिम्मेदारी थी। परिवार और प्रोफेशन दोनों में सामंजस्य बिठाने के लिए महिला चिकित्सकों ने टेलीमेडिसिन को अधिक अपनाया। ऐसे ही युवा चिकित्सकों ने टेलीमेडिसिन को अपनाया क्योंकि वरिष्ठ चिकित्सकों में अधिक से अधिक यथास्थिति और एक संज्ञानात्मक पूर्वाग्रह की प्रवृत्ति होती है जहां वे परिवर्तन के लिए प्रतिरोधी होते हैं और काम करने के अपने वर्तमान तरीके को ही जारी रखना चाहते हैं। इसलिएए युवा चिकित्सक नए दृष्टिकोण और कार्यप्रणाली के लिए अधिक अनुकूल हैं। इसी तरह, महानगर के चिकित्सक अपने गैर-महानगरीय साथियों की तुलना में टेलीमेडिसिन की ओर अधिक बढ़ रहे हैं।

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पीएमएस में पुरुष चिकित्सक आगे
जहां टेलीमेडिसिन में महिलाओं ने पुरुष चिकित्सकों से बाजी मार ली वहीं प्रैक्टिस मैनेजमेंट सॉफ्टवेयर (पीएमएस) के उपयोग में पुरुष अपनी समकक्ष महिला चिकित्सकों से काफी आगे रहे। यह प्रवृत्ति संबंधित जोखिम से बचने की ओर इशारा करती है। महिला चिकित्सकों द्वारा एक नई लेकिन सुरक्षित तकनीक को अपनाने में पुरुष डॉक्टर्स की तुलना में उतनी तेज नहीं हैं जितना कि उनके समकक्ष पुरुष साथी। वे पेशे से जुड़ी किसी भी नई तकनीक को लेकर बहुत ज्यादा कॉन्शियस रहती हैं। एसएमएसआरसी के महाप्रबंधक अनीश मित्रा का इस बारे में कहना है कि जैसे मोबाइल कॉल और सामान्य लोकप्रिय सोशल मीडिया ऐप कोविड-19 के दौरान टेलीमेडिसिन के रूप में डॉक्टरों की मदद करते हैं वैसे ही 'न्यू नॉर्मल' के रूप में टेलीमेडिसिन के प्रति यह बड़ा बदलाव को अपनाने का समय है।

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चिकित्स्कों का समय बचे ऐसे विकल्प चाहिए
मित्रा आगे कहते हैं कि जब हम पीएमएस आधारित टेलीमेडिसिन ट्रेंड को अपनाते हैं तो न्यू नॉर्मल के रूप में यह एक समान स्थिति है जो सभी प्रकार के चिकित्सकों में देखी जाती है। चिकित्सकों के लिए पीएमएस आधारित टेलीमेडिसिन प्लेटफॉर्मों के अनगिनत लाभों के बावजूद, कोविड-19 में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए हमें साथ मिलकर, ऐसे प्लेटफॉर्म और विकल्प विकसित करने की जरूरत है जो चिकित्सकों के लिए आसान हो और उनका समय भी बचाए। भारत में रोगी-चिकित्सक अनुपात में गहरी असमानताएं हैं ऐसे में इस तरह के उपायों की यहां अधिक जरुरत है। राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन (एनडीएचएम) जैसी पहल भी विशिष्ट टेलीमेडिसिन-आधारित अनुप्रयोगों के लिए एक बेहतरीन प्रेरणा साबित होगी।

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अध्ययन के महत्तवपूर्ण तथ्य
01. 50 फीसदी युवा चिकित्सकों ने 44 फीसदी वरिष्ठ चिकित्सकों की तुलना में कोरोना संक्रमण के दौरान टेलीमेडिसिन को अपनाया
02. 58 फीसदी से भी अधिक महिला चिकित्सकों ने भी अपने 44 फीसदी पुरुष समकक्षों की तुलना में सेलुलर ऑडियो कॉल, सोशल मीडिया ऐप जैसे व्हाट्सए, टेलीग्राम और फेसबुक के जरिए ही रोगियों को देखा
03. 52 फीसदी मेट्रो शहरों के फिजिशियंस की तुलना में 44 फीसदी गैर-मेट्रो फिजिशियंस टेलीमेडिसिन को अपनाने में पीछे रहे।

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Sunday, 27 September 2020

LOCKDOWN EFFECT : तनाव व अनिद्रा से क्यों बढ़ रहा हार्मोन असंतुलन

ये हैं लक्षण : अचानक से वजन घटने या बढऩे लगना, मासिक माहवारी में अनियमितता, तनाव के साथ घबराहट होना, भूख न लगना, बहुत जल्दी थक जाना और पाचन तंत्र में खराबी आने के साथ शरीर में सूजन बने रहना इसके प्रमुख लक्षण हैं।जाए तो इस बीमारी से दूर रहा जा सकता है।
जानिए क्या होता है हार्मोन
हॉर्मोन शरीर को संतुलित रखने वाला तत्त्व है जो दो तरह के होते हैं। एंडोक्राइन और एक्सोक्राइन। एंडोक्राइन हॉर्मोन निकलने के बाद शरीर के रक्त में मिल जाता है। अलग-अलग कोशिकाओं तक पहुंचकर उनको जीवित रखता है। एक्सोक्राइन पाचन क्रिया को ठीक रखता है। शरीर पर चोट लगने से पहले ये दिमाग को सिग्नल देता है।
कुशिंग सिंड्रोम क्या है?
हार्मोन के असंतुलन से शरीर में कुशिंग सिंड्रोम हो जाता है। जिससे व्यक्ति मोटापाग्रस्त हो सकता है। डायबिटीज की समस्या हो सकती है। कुछ मामलों में मरीज का चेहरा हर समय लाल रहता है। हल्की चोट पर भी हड्डियों में फ्रैक्चर हो सकता है। ऑस्टियोपोरोसिस की प्रमुख वजह हार्मोन का असंतुलन होता है। कुछ मामलों में इस वजह से शरीर के किसी भाग में गांठ, ट्यूमर और घेंघा भी हो सकता है। पुरुषों की तुलना में महिलाओं को अधिक तकलीफ होती है। इसका प्रमुख कारण घर की जिम्मेदारियों की वजह से हर समय तनाव में रहती हैं। तनाव से कॉटिसोल हॉर्मोन तेजी से बढ़ता है जो हॉर्मोन साइकिल को डिस्टर्ब कर देता है।
ये काम करने से बचें
माहवारी में पहले तीन दिन तक सिर न धाएं, माहवारी के दौरान नमक खाना कम कर दें, अधिक भारी काम न करें जिससे थकावट हो, नाभी में कैस्टर का तेल डालें हॉर्मोन अंसतुलन की तकलीफ नहीं होगी। हॉर्मोनल इंबैलेंस से पीडि़त व्यक्ति नियमित योगा करे तो उसको फायदा होगा। इसमें भोजन के बाद ब्रजआसन की मुद्रा में बैठा जाए तो लाभ होगा। भुजंग आसन और सूर्य नमस्कार नियमित से आराम मिल सकता है।
एक्सपर्ट : डॉ. एस.के. सिंह,विभागाध्यक्ष हार्मोन रोग विभाग, इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, बीएचयू (उत्तरप्रदेश)



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Thursday, 24 September 2020

विटामिन सी और जिंक की कमी से भी महिलाओं में होता ‘ल्यूकोरिया’

सवाल-कुछ दिन से सफेद पानी की समस्या हो रही है। इससे कमजोरी और मांसपेशियों में दर्द रहता है। क्या करें? अनेक महिला पाठक
जवाब- इसको ल्यूकोरिया कहते हैं। यह समस्या हर उम्र की महिलाओं में होती है। यह एक संक्रमण है। ये उन महिलाओं में बार-बार होता है, जिनमें विटीमिन सी और जिंक की कमी होती है। इससे महिलाओं में कमजोरी, चिड़चिड़ापन जैसी समस्याएं होती हैं। इसलिए हैल्दी डाइट लें खासकर आंवला, सिघाड़ा, केला, संतरा और हरी सब्जियां आदि खाएं। सफाई का पूरा ध्यान रखें। होम्योपैथी में कई दवाइयां हैं जिनको डॉक्टरी सलाह से लिया जा सकता है।
सवाल-छोटे-छोटे बच्चों में आजकल लाल-लाल बड़े दाने हो जाते हैं। इससे बचाव के लिए क्या करें? अनेक पाठक
जवाब-यह सीजनल समस्या है। बरसात में मच्छरों के काटने से दाने निकल आते हैं। यह समस्या 7-8 साल तक के बच्चों में अधिक देखने को मिलती है। इससे बचाव के लिए मच्छरों से बचाव करें। बच्चों को ऐसे कपड़े पहनाएं जिससे पूरा शरीर ढक जाए। मच्छरों से बचाव के लिए रात में सोते समय बच्चों को सरसों का तेल लगाएं। इससे मच्छर नहीं काटते हैं। इसके अलावा होम्योपैथी में रेस्टेक और लिडमपाल आदि दवा भी आती हैं। डॉक्टरी सलाह से दे सकते हैं। इससे तत्काल आराम मिलता है।
एक्सपर्ट- डॉ. राजीव नागर और डॉ. कमलेंद्र त्यागी, होम्योपैथी विशेषज्ञ



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तीन तरह के होते हैं सफेद दाग, इलाज में कारगर है फोटोथैरेपी

सवाल-कुछ माह से हाथ-पैरों और चेहरे पर सफेद दाग हो गए हैं। क्यों हो रहे हैं, इन्हें कैसे ठीक कर सकते हैं? अनेक पाठक
जवाब-इस बीमारी को विटिलिगो कहते हैं। यह ऑटो इम्युन डिजीज है। इसमें त्वचा का रंग बनना बंद हो जाता है। ये तीन प्रकार के होते हैं। पहले, एक ही दाग होता है। दूसरे में हाथ-पैरों और चेहरे पर और तीसरे में पूरे शरीर पर दाग निकलते हैं। पूरे शरीर वाली समस्या ज्यादातर मरीजों में देखने को मिलती है। वैसे तो इसकी जांच की जरूरत नहीं पड़ती है। कुछ केसों में बायोप्सी की जाती है। इलाज में कुछ दवाइओं के साथ फोटोथैरेपी भी देते हैं। इसमें समय लगता है लेकिन बीमारी ठीक हो जाती है।
सवाल-चेहरे पर चिकनपॉक्स व मुहांसों के दाग-धब्बे हैं। इन दाग-धब्बों को कैसे हटाएं? कोई उपाय बताएं- अनेक पाठक
जवाब-चेचक के दाग गहरे हैं तो चिकित्सकीय परामर्श से इलाज कराएं। तभी आराम मिलेगा। यदि दवाओं से आराम नहीं मिलता है तो इनको कैमिकल व लेजर थैरेपी से इलाज हटाना पड़ेगा। मुहांसों के कारण जो दाग होते हैं वे हल्के होते हैं। यह तेल की ग्रंथियों के ब्लॉक होने से निकलते हंै। मुहांसों को दबाएं या फोड़े नहीं। इससे भी दाग बन जाते हैं। मुहांसे न हों इसके लिए चेहरे को दिन में कई बार धोएं। तला-भुना खाने से बचना चाहिए।
डॉ. सविता अग्रवाल एवं डॉ. अंशुल माहेश्वरी, त्वचा रोग विशेषज्ञ



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बच्चों की नाक बंद होने से आते हैं खर्राटे, एलर्जी-संक्रमण भी कारण

सवाल-बच्चे की उम्र 7 वर्ष है। अक्सर नाक बंद रहती है, रात में मुंह खुला रहता है और लार निकलती है। उपाय बताएं- अनेक पाठक
जवाब-बच्चों में यह सामान्य परेशानी है। इसमें नाक के पीछे और गले के अंदर एडिनोइड नामक ग्रंथि बढ़ जाती है। यह खासकर 7-8 साल तक केबच्चों में बढ़ती है। जिससे बच्चे की नाक बंद हो जाती है और खर्राटे और मुंह से सांस लेने लगते हैं। यह ग्रंथि एलर्जी, संक्रमण अथवा स्वत: भी बढ़ जाती है। उम्र बढऩे के साथ ग्रंथि भी छोटी हो जाती है। जिनमें नहीं होते उनकी सर्जरी होती है। एलर्जी और संक्रमण के कारण ये ग्रंथि बढ़ती है तो कुछ दवाइयां देने से भी ठीक हो जाती है। इसके लिए विशेषज्ञ को दिखाएं।
सवाल-कान में भारीपन और खुजली रहती है। कान बंद हो जाता है और कई बार पस भी आता है? अनेक पाठक
जवाब-इसे ऑटोमाइसिस कहते हैं। यह एक तरह का फंगल इन्फेक्शन है। यह नमी और उमस के कारण कानों में होता है। लंबे समय तक परेशानी रहने और पस बनने से कान के पर्दे में छेद भी हो सकता है। इसके लिए तत्काल डॉक्टर को दिखाकर इलाज लें। खुद कान को साफ न करें। अंदर जख्म हो सकता है। कान में तेल न डालें और पानी न जाने दें। इससे संक्रमण बढ़ता है। डॉक्टर इसकी सफाई करने के बाद ही इलाज करते हैं।
डॉ. तरुण ओझा और डॉ. शुभकाम आर्य, ईएनटी सर्जन



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खाली पेट या दही के साथ फल खाने से भी आती खट्टी डकारें

सवाल-काफी समय से खट्टी डकार के कारण परेशान हूं। दवा लेने से भी आराम नहीं है। आयुर्वेद में कोई इलाज बताइए? अनेक पाठक
जवाब-इसे अम्ल पित्त कहते हैं। नींद की कमी, खानपान में गड़बड़ी या अधिक तनाव से यह परेशानी होती है। जो खाली पेट या नियमित दही के साथ (पहले-बाद में) फल खाते हैं उनको भी यह परेशानी हो जाती है। आयुर्वेद में इससे बचाव के लिए लंघन क्रिया करते हैं। इसमें मरीज को कुछ समय के लिए लिक्विड डाइट पर रखते हैं। पाचन वाली चीजें जैसे छाछ-जीरा, काला नमक अधिक देते हैं। विरुद्ध आहार से भी ऐसी परेशानी होती है। घी-शहद एक साथ नहीं खाएं। इससे भी समस्या हो सकती है।
सवाल-मेरी उम्र 35 वर्ष है। वैसे तो कोई परेशानी नहीं है, लेकिन कई बार हड्डियों के जोड़ों में आवाज आती है? एक पाठक
जवाब-अगर हड्डियों में दर्द, सूजन या चलने में दिक्कत नहीं है तो इस तरह की आवाज आने से नुकसान नहीं है। लेकिन कोई समस्या है तो डॉक्टर को दिखाएं। साथ ही खट्टी, मैदा-बेसन वाली और ठंडी चीजों से दूर रहे। अगर दर्द ज्यादा हो रहा है तो गर्म सेक भी कर सकते हैं। डॉक्टरी सलाह से कैल्शियम- विटामिन डी का सप्लीमेंट ले सकते हैं। हो सके तो रोज जोड़ों की किसी तेल से हल्की मालिश करें। जोड़ों के लिए कुछ व्यायाम भी करें।
डॉ. पीयूष त्रिवेदी एवं डॉ. के.वी. नरसिम्हा राजू, आयुर्वेद विशेषज्ञ



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लंबे समय तक बैठने से भी रात को रीढ़ की हड्डी में होता है दर्द

सवाल- रीढ़ की हड्डी के दोनों तरफ मांसपेशियों में रात को ज्यादा दर्द होता है। क्या कारण है, कोई इलाज बताएं? अनेक पाठक
जवाब- लंबे समय तक एक जगह पर बैठे रहने या भारी सामान उठाने से भी रीढ़ की हड्डी में दर्द हो सकता है। इस कारण भी रात में दर्द हो सकता है। बैठने की मुद्रा में बदलाव करें, बैठते हुए तनकर सीधे और सहारा लगाकर बैठें। बीच-बीच में ब्रेक लें। अगर घर से काम कर रहे हैं तो इसका विशेष ध्यान दें। ज्यादा दर्द होने पर मांसपेशियों को आराम देने वाली दवा लें और मालिश करें। कैल्शियम युक्त डाइट लें। आराम नहीं मिलने पर डॉक्टर की सलाह से जांच करवाएं। नियमित व्यायाम करें। इससे भी लाभ होगा।
सवाल-वजन ज्यादा है। इसको कम करने के लिए क्या करना चाहिए। खानपान में किन चीजों का ध्यान रखें? अनेक पाठक
सवाल-लंबाई के अनुसार वजन होना चाहिए। इसके लिए बीएमआई देखकर सही वजन मापा जाता है। रोज एक वयस्क को करीब 15 सौ कैलोरी डाइट की जरूरत होती है। इससे ज्यादा डाइट शरीर में फैट के रूप में जमा होती है। इससे ही मोटापा होता है। हरी सब्जियां और फल ज्यादा खाएं। इनमें फाइबर होता है। मोटापा नियंत्रित रहता है। मीठा और वसा युक्त डाइट कम मात्रा में लें। 45 मिनट नियमित व्यायाम करें।
एक्सपट्र्स- डॉ. संकल्प शास्त्री एवं आशुतोष चतुर्वेदी, मेडिसिन विशेषज्ञ



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हार्ट के रोगी खाने के बाद न टहलें, तला, भुना और मीठे से परहेज करें

सवाल- ब्लड प्रेशर की समस्या है। लॉकडाउन में बीपी सामान्य था तो दवा बंद कर दी, अब दोबारा बढ़ गया है? अनेक पाठक
जवाब-बीपी की दवा अपनी मर्जी से नहीं छोडऩी चाहिए और यदि अर्से से छोड़ रखी है तो अपने मन से शुरू न करें। इसकी डोज भी कम-ज्यादा खुद तय नहीं करें। इसके लिए डॉक्टर की सलाह जरूरी है। हो सकता है कि दवा बदलनी पड़े या डोज घटानी-बढ़ानी पड़े। ऐसे रोगी भी डॉक्टर की सलाह लें जो नियमित दवा ले रहे हैं और उनका बीपी लेवल 130-80 से ज्यादा है। डोज बढ़ानी पड़ेगी। अगर सामान्य है तो सावधानी बरतें। रोज व्यायाम करें। खूब पानी पीएं। केवल दाल और सब्जी में ही नमक खाएं। ऊपर से न लेंं।
सवाल-लॉकडाउन से पहले हार्ट की बायपास सर्जरी होनी थी। कोरोना के कारण टल गई। उचित सलाह दें? अनेक पाठक
जवाब-अब हर जगह सर्जरी की सुविधा शुरू हो गई है। अपने डॉक्टर से मिलकर सर्जरी प्लान करें। दोबारा से एंजियोग्राफी और दूसरी जांचें करवा लें ताकि इस दौरान शरीर में कई बदलाव भी हुए होंगे। जब तक सर्जरी नहीं होती है, क्षमता से 20 फीसदी कम चलें। खाना टुकड़ों में और कम खाएं। खाने के बाद टहले नहीं। क्योंकि इससे ऊर्जा खर्च होगी और हार्ट को अधिक ऊर्जा चाहिए। परेशानी हो सकती है। तला-भुना और मीठे से परहेज करें।
डॉ. संकेत गोयल एवं डॉ. हेमंत चतुर्वेदी, सीनियरकॉर्डियोलॉजिस्ट



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रात में नींद नहीं आए तो पतला तकिया लगाएं, बाईं करवट सोएं

सवाल-रात में नींद नहीं आने की समस्या से परेशान हूं। इससे बचाव के लिए कोई उपाय बताइए? अनेक पाठक
जवाब-रात में हैवी डाइट लेने से बचें। इससे पेट में दर्द या आफरा होने के कारण नींद नहीं आती। कई बार बीमारी भी नींद नहीं आने का कारण बनती है। ऐसा है तो इलाज कराएं। तनाव वाले कार्यों से बचें। सोने से एक घंटा पहले मोबाइल-टीवी देखना बंद कर दें। सिर में बादाम का तेल लगाएं और गुनगुने पानी में पैरों को थोड़ी देर रखें। मोटा तकिया न लगाएं। बाईं करवट सोने की आदत बनाएं। पाचन भी ठीक रहता है। सोने से पहले 10-20 मिनट मेडिटेशन करें। जल्दी सोएं और सुबह जल्दी उठें।
सवाल-शुगर लेवल थोड़ा बढ़ा हुआ है। इससे बचाव के लिए आयुर्वेदिक उपायों के बारे में बताइए? अनेक पाठक
जवाब-इसके लिए रोज रात में 2-3 चम्मच दाना मेथी पानी में भिगो दें। सुबह इसको अच्छे से मसलकर पानी सहित पी लें। मेथी दानों को फेंकें नहीं, चबा लें। करेला सुखाकर चूर्ण बना लें। खाने से आधा घंटा पहले एक चम्मच करेला चूर्ण लें। शुगर लेवल नियंत्रित रहेगा। जामुन के बीज का पाउडर भी सुबह खाली पेट लेने से आराम मिलता है। सोने से पहले 2-3 चम्मच त्रिफला चूर्ण व हल्दी-दूध लें। बेसन, मैदा, दही, सूजी व तला-भुना खाने से बचें।
एक्सपट्र्स- डॉ. पीयूष त्रिवेदी एवं डॉ. सुमन अहूजा, आयुर्वेद विशेषज्ञ



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दिनभर थकान रहती तो भरपूर नींद लें और मौसमी फल खाएं

सवाल-दिनभर थकान रहती है। कुछ काम करने की इच्छा नहीं होती है। इससे बचाव के लिए क्या करें? अनेक पाठक
जवाब-तनाव, नींद व पोषकता की कमी, अनिद्रा, बीपी या न्यूरोपैथी की दवा, हाइपोथायरॉइड या फिर स्लीप एप्निया से भी थकान की समस्या रह सकती है। तनाव से बचें। रोजाना 7-8 घंटे की नींद लें। किसी दवा से ऐसा हो रहा है तो डॉक्टरी सलाह लें। थायरॉइड टेस्ट करवाएं। हैल्दी डाइट लें। मौसमी फल ज्यादा लें। इसमें एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं। शरीर में फुर्ती आती है। नियमित व्यायाम करें। समय पर सोएं और समय से उठें।
सवाल-बार-बार आने के साथ ही पेशाब में जलन रहती है। पेट में दर्द भी रहता है। बचाव के लिए क्या करें? अनेक महिला पाठक
जवाब-अधिक उम्र की महिलाओं में ऐसी समस्या ज्यादा देखने को मिलती है। यह यूरिन में इन्फेक्शन के कारण होता है। साथ ही पथरी और शुगर लेवल बढऩे के कारण भी हो सकता है। संक्रमण से बचाव के लिए हाइजीन का ध्यान रखें। खूब पानी पीएं। इसकी जांच करवाएं। जरूरत के अनुसार डॉक्टर पेट का अल्ट्रासाउंड भी करवा सकते हैं। हरी सब्जियां और मौसमी फल ज्यादा मात्रा में खाएं। फलों में बेरीज और सिट्रस फ्रूट्स जैसे संतरा, नींबू आदि अधिक खाना चाहिए। येे संक्रमण से बचाव करते हैं।
डॉ. पुनीत रिझवानी एवं डॉ. अभिषेक तातेर, सीनियर फिजिशियन



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बच्चों को बुखार आए तो दो दिन देखें, फिर एंटीबायोटिक्स शुरू करें

सवाल-बच्चे को इन दिनों बुखार के साथ उल्टी दस्त भी हो रहे हैं। कोरोना का खतरा तो नहीं? अनेक महिला पाठक
जवाब-इस मौसम में छोटे बच्चों में बुखार और उल्टी दस्त की समस्या अधिक होती है। हर बुखार को कोरोना समझकर जांच करवाने की कोशिश न करें। बाहर ले जाने पर खतरा और बढ़ जाता है। बच्चे को बुखार आ रहा है तो दो दिन तक डॉक्टरी सलाह से केवल पैरासिटामॉल दें। अगर फिर भी बुखार नहीं उतर रहा है तो एंटीबायोटिक्स दें। अगर कोई संक्रमित मरीज से संपर्क या टे्रवल हिस्ट्री है तो ही कोरोना टेस्ट करवाएं। बासी और बाहरी खाना नहीं दें। डेयरी प्रॉडक्ट जल्दी खराब होते हैं, इसलिए ताजा ही दें।
सवाल-बच्चा एक वर्ष का हो गया, लेकिन अभी तक दांत नहीं निकले हैं। ऐसे क्यों होता है? सलाह दें- अनेक पाठक
जवाब-बच्चों के दांत छह माह की उम्र से निकलने लगते हैं। कुछ में आठवें या नौ महीने में भी निकलते हैं। इससे देरी होने पर उनमें विटामिन डी की कमी हो सकती है। इससे शिशु का विकास भी प्रभावित होता है। हड्डियां टेढ़ी हो सकती हैं। इम्युनिटी कम हो जाती है। इसलिए छह माह की उम्र से बच्चों को विटामिन डी का सप्लीमेंट देनी चाहिए। हो सके तो बच्चे को सुबह आधा घंटा धूप में जरूर बैठाएं या खेलने दें। साथ ही डेयरी प्रॉडक्ट भी ज्यादा दें।
डॉ. दीपक शिवपुरी एवं डॉ. शरद थोरा, वरिष्ठ शिशु एवं बाल रोग विशेषज्ञ



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बालों में रूसी व रूखी त्वचा से भी बार-बार होता है आंखों में संक्रमण

Q- आंखों में बार-बार संक्रमण होता है। इसके लिए आयुर्वेद में कोई उपचार है तो बताएं। अनेक पाठक
A_ प्रदूषण, एलर्जी के कारक, बार-बार सर्दी-जुकाम की समस्या रहना, बालों में रूसी और त्वचा रूखी रहने पर भी आंखों में बार-बार संक्रमण होता है। इसमें आंखें लाल हो जाती और खुजली होती है। बचाव के लिए एलर्जी करने वाले कारणों से बचें। रूसी न होने दें। त्वचा पर लोशन लगाते रहें। आंखों को पानी से कई बार धोएं। भाप लेते रहें। इम्युनिटी बढ़ाने के लिए हरितिकी, च्यवनप्राश और एलर्जी से बचाव के लिए लक्ष्मी विलास रस लें।

Q=सायटिका और लो बैक पेन की समस्या है। दवा से आराम नहीं मिल रहा है। आयुर्वेद में कोई उपाय बताएं? अनेक पाठक
A-यह समस्या ज्यादा देर काम करने, भारी वजन उठाने, चोट, कमजोर मसल्स, टीबी या कैल्शियम की कमी से होती है। ज्यादा देर बैठने से बचें। सीधा बैठें। ज्यादा दर्द है तो लंबर बेल्ट लगाएं। इसमें भुजंगासन फायदेमंद होता है। आयुर्वेद में पंचकर्म क्रिया बस्ती और कटिबस्ती कराते हैं। पत्रपोठली स्वेद (स्टीम) देते हैं। ज्यादा नरम बेड पर न सोएं। करवट सोते हैं तो पैरों के बीच में और पीठ के बल सोते हैं तो घुटनों के नीचे तकिया लगाएं। डेयरी प्रॉडक्ट ज्यादा लें। कुछ दवाइयां भी दी जाती हैं।
डॉ. पीयूष त्रिवेदी एवं डॉ. के.वी. नरसिम्हा राजू, आयुर्वेद विशेषज्ञ



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Wednesday, 23 September 2020

नई रिसर्च: 30 साल पहले की तुलना में आज के बुजुर्ग हैं ज्यादा तेज, स्मार्ट और दमदार

फिनलैंड में हुए एक नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने दावा किया है कि आज के बुजुर्ग युवाओं जितने ही फिट और एक्टिव हैं। शोधकर्ताओं ने तीन दशक पुराने बुजुर्गों के समूह के साथ 2017 में समान उम्र और शारीरिक अवस्था वाले बुजुर्गों की शारीरिक और कॉग्निटिव परफॉर्मेंस की तुलना करने पर पाया कि 30 साल पहले के बुजुर्गों की तुलना में आज के बुजुर्ग लगभग हर परीक्षण में बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। शोध के वैज्ञानिकों का कहना है कि यह इस बात का इशारा है कि एक सामान्य व्यक्ति के पूरे जीवन में स्वस्थ बने रहने की अवधि लगातार बढ़ रही है। यही वजह है कि आज हमारी जीवन प्रत्याशा पहले से ज्यादा है। बीती सदी से मानव की जीवन प्रत्याशा लगातार वृद्धि हो रही है। हालांकि, वैज्ञानिकों का एक समूह ने सुझाव दिया है कि हमें जीवन की लंबी अवधि की बजाय उसकी गुणवत्ता पर अधिक ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।

नई रिसर्च: 30 पहले की तुलना में आज के बुजुर्ग हैं ज्यादा तेज, स्मार्ट और दमदार

'हेल' है स्वास्थ्य गुणवत्ता की कसौटी
मानव जीवन को स्वस्थ्य की दृष्टि से और अधिक गुणवत्तापूर्ण बनाने के उद्देश्य से 2001 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation) ने अपने वैश्विक स्वास्थ्य विश्लेषणों में एक नई कसौटी शामिल की- हेल यानी स्वस्थ जीवन प्रत्याशा (Healthy Life Expectencyहैल्दी लाइफ एक्सपेंटेंसी)। यह एक नई स्वास्थ्य गणना है जो इस पर ध्यान लगाती है कि कोई व्यक्ति अपने पूरे जीवनकाल में कितनी लंबी अवधि तक स्वस्थ (Health Span) बना रहा। यह केवल जीवन काल नहीं बल्कि स्वास्थ्य काल यानी हैल्थ स्पैन पर भी नए सिरे से ध्यान केंद्रित करता है। यह सुझाव देता है कि मनुष्य 70 वर्ष की आयु के बाद कितनी स्वस्थ्य जिंदगी जीता है इस पर ध्यान दिए जाने की जरुरत है। इसलिए हमें उम्र के इन आखिरी सालों की गुणवत्ता पर ध्यान देना चाहिए।

नई रिसर्च: 30 पहले की तुलना में आज के बुजुर्ग हैं ज्यादा तेज, स्मार्ट और दमदार

दो पीढिय़ों की तुलना से जाना 'स्वास्थ्य'
फिनलैंड स्थित युवास्कुले विश्वविद्यालय (University of Jyväskylä) के शोधकर्ताओं ने दो अलग-अलग समय की समान आयु वर्ग के दो समूहों में शारीरिक और कॉग्निटिव परफॉर्मेंस (Cognitive Performence) की तुलना की है। दोनों पीढिय़ों के स्वास्थ्य की तुलना कर उन्होंने आज की बुजुर्ग पीढ़ी के दमखम का पता लगाया है। विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने 30 साल पहले के और आज के लगभग 500 बुजुर्गों की तुलना की। इसमें पहला अध्ययन 1989 में हुआ था जिसमें 1910 से 1914 के बीच पैदा हुए 75 से 80 साल के समूह वाले बुजुर्गों ने विभिन्न प्रकार के शारीरिक और संज्ञानात्मक परीक्षणों में भाग लिया था। ऐसे ही 1938 से 1943 के बीच पैदा हुए 75 से 80 साल के समूह वाले बुजुर्गों ने भी 2017 में ऐसे ही विभिन्न प्रकार के शारीरिक और संज्ञानात्मक परीक्षणों में भाग लिया था। शोध की मुख्य अन्वेषक तैं रांतनें का कहना है कि इस शोध ने एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक स्वास्थ्य की निरंतर प्रगति को मापने के लिए एक नया तरीका पेश किया है।

नई रिसर्च: 30 पहले की तुलना में आज के बुजुर्ग हैं ज्यादा तेज, स्मार्ट और दमदार

दूसरे समूह में दिखा गुणात्मक सुधार
मुख्य अन्वेषक तैं रांतनें का कहना है कि यह शोध बहुत-सी बातों की वजह से अद्वितीय है क्योंकि दुनिया में ऐसे गिने-चुने ही अध्ययन हैं जिसमें दो अलग-अलग युग में एक-समान उम्र के लोगों के बीच प्रदर्शन-आधारित स्वस्थ्य और गुणात्मक जीवन की तुलना की गई है। रांतनें का कहना है कि अध्ययन के प्रदर्शन-आधारित परिणाम बताते हैं कि कैसे बुजुर्ग अपने दैनिक जीवन का मैनेजमेंट करते हैं और अध्ययन साथ ही दोनों समूहों की कार्यात्मक आयु को भी दर्शाता है। अध्ययन में सामने आया कि 1938 से 1943 के बीच पैदा हुए 75 से 80 साल के समूह वाले बुजुर्गों ने लगभग सभी परीक्षणों में 1910 से 1914 के बीच पैदा हुए 75 से 80 साल के समूह वाले बुजुर्गों की तुलना में ज्यादा बेहतर प्रदर्शन किया था। 80 साल की उम्र में भी इनके चलने की गति तेज थी, पहले समूह के 5 फीसदी की तुलना में इस समूह ने 25 प्रतिशत की ताकत से अपनी मजबूत पकड़ का प्रदर्शन अपना दमखम दिखाया। ऐसे ही घुटने से जुड़ी समस्याओं में भी पहले ग्रुप की 20 फीसदी की तुलना में दूसरे समूह के बुजुर्गों ने 47 प्रतिशत के बीच सुधार दिखाया। फेफड़े भी पहले समूह से ज्यादा बेहतर काम कर रहे थे।

नई रिसर्च: 30 पहले की तुलना में आज के बुजुर्ग हैं ज्यादा तेज, स्मार्ट और दमदार

ये कारण गिनाए बेहतर प्रदर्शन के
इस शोध पर कार्य कर रहे पीएचडी स्कॉलर मैट्टी मनुक्का का कहना है कि 1938-43 के बीच के 75 से 80 साल के बुजुर्गों की तीन दशक पहले पैदा हुए उनके समकक्षों की तुलना में बेहतर परफॉर्मेंस के पीछे बहुत से कारण हैं। दोनों पीढिय़ों के बुजुर्गों के बीच कई अनुकूल बदलाव आ गए हैं। इनमें बेहतर पोषण और स्वच्छता, स्वास्थ्य देखभाल और स्कूल प्रणाली में सुधार, बेहतर शिक्षा तक पहुंच और कामकाजी जीवन में सुधार कुछ महत्त्वपूर्ण कारक हैं। यह 'कॉग्निटिव परफॉर्मेंस कम्पैरेटिव स्टडी' (The cognitive performance comparative study) एजिंग क्लिनिकल एंड एक्सपेरिमेंटल रिसर्च जर्नल (the journal Aging Clinical and Experimental Research) में प्रकाशित हुई है। जबकि 'फिजिकल परफॉर्मेंस कम्पैरेटिव स्टडी' (the physical performance comparative study) जेरोन्टोलॉजी: सीरीज ए जर्नल (The Journals of Gerontology: Series A) में प्रकाशित हुई है।



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Tuesday, 22 September 2020

हैल्थ अलर्ट: 30 की उम्र में रखेंगे इन बातों का खयाल तो 40 में नहीं होगा उच्च रक्त चाप

अमरीकन हार्ट एसोसिएशन के जर्नल में प्रकाशित एक नए अध्ययन के अनुसार जो लोग अपनी उम्र के 30 के दशक में स्वस्थ जीवन शैली का पालन करते हैं, वे उम्र के 40 के दशक में उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियों के जोखिम को कम कर सकते हैं। एसोसिएशन के 'लाइफ्स सिंपल 7' प्रोग्राम हमारी जीवनशैली में व्यायाम और संतुलित डाइट को बेहद महत्त्वपूर्ण मानती हैं। स्वस्थ जीवनशैली के अलावा ये दोनों बातें ही हमें ढलती उम्र में भी फिट और सक्रिय रख सकती है। 'लाइफ्स सिंपल 7' प्रोग्राम हृदय को स्वस्थ रखने का सुझाव देता है जिसके लिए संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, लो कोलेस्ट्रॉल और ब्लड शुगर का उचित प्रबंधन शामिल है। वहीं स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि लोगों को जीवनशैली में बदलाव लाने की एक बार में इन सभी सातों नियमों को एक साथ पूरा करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। शुरुआत 1 या 2 से कर सकते हैं।

हैल्थ अलर्ट: 30 की उम्र में रखेंगे इन बातों का खयाल तो 40 में नहीं होगा उच्च रक्त चाप

42 फीसदी हाई-ब्लड प्रेशर से पीड़ित
अध्ययन में अमरीका के विभिन्न राज्यों से 30 हजार से अधिक वयस्कों को शोध में शामिल किया गया था। ९ साल लगातार चले अनुसंधान के दौरान सामने आया कि अध्ययन में भाग ले रहे 42 प्रतिशत प्रतिभागियों में उच्च रक्तचाप की शिकायत थी। जबकि जिन प्रतिभागियों ने एसोसिएशन के 'लाइफ्स सिंपल 7' प्रोग्राम की पालना की थी उनमें अमरीकन हार्ट एसोसिएशन के स्कोर पर उच्च रक्तचाप के मामले में 6 प्रतिशत कम जोखिम नजर आया। एसोसिएशन के अनुसार, अमरीका के आधे वयस्कों को उच्च रक्तचाप की परेशानी है। इसके चलते वे स्ट्रोक, दिल का दौरा, कमजोर नजरें और कार्डियक अअरेस्ट जैसे जोखिमों का सामना करते हैं। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इन सभी समस्याओं को रोका जा सकता है।इ हम जो भी काम करते हें वह हमारे स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है इसलिए सक्रिय स्वस्थ्स जीवनशैली का कोई विकल्प नहीं हो सकता।

हैल्थ अलर्ट: 30 की उम्र में रखेंगे इन बातों का खयाल तो 40 में नहीं होगा उच्च रक्त चाप

क्या हैं 'लाइफ्स सिंपल 7' प्रोग्राम
स्वस्थ जीवन शैली के लिए अमरीकन हार्ट एसोसिएशन की ओर से बनाया गया 7 सरल नियमों या यूं कह लीजिए कि हैल्थ टिप्स हैं जो हमें सेहतमंद रखने में मदद करते हैं। यह हमारे हृदय को तंदुरुस्त रखने का एक प्रकार का 'स्वास्थ्य मीट्रिक मॉडल' है जिसे एसोसिएशन ने सालों के अध्ययन और गहन शोध-अनुसंधान के बाद बनाया है। इस 'सेहतनामे' में शामिल हैं-
01. बॉडी मास इंडेक्स यानी बीएमआई
02. संतुलित आहार (अवश्य लें)
03. धूम्रपान (आज से ही छोड़ दें)
04. शारीरिक गतिविधियां (अधिक से अधिक करें)
05. रक्तचाप (को नियंत्रित रखें और व्यायाम करें)
06. कोलेस्ट्रॉल (बढऩे न दें) और
07. ब्लड शुगर (की नियमित जांच करवाते रहें)

हैल्थ अलर्ट: 30 की उम्र में रखेंगे इन बातों का खयाल तो 40 में नहीं होगा उच्च रक्त चाप

तनाव है हृदय का दुश्मन
अमरीकन हार्ट एसोसिएशन के वर्तमान अध्यक्ष और नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी में प्रिवेंटिव मेडिसिन चिकित्सा विभाग के अध्यक्ष डॉ. डोनाल्ड एम. लॉयड-जोंस और उनके साथियों ने इस 'स्वास्थ्य मीट्रिक मॉडल' को विकसित किया है। डॉ. डोनाल्ड का कहना है कि लोगों को तनाव और नींद सहित स्वस्थ जीवन के लिए बेहद जरूरी इन सभी 7 बातों का खयाल अवश्य रखना चाहिए। डॉ. डोनाल्ड का कहना है कि इसमें कोई शक नहीं कि आज तनाव की समस्या हर किसी को है और यह सब जगह मौजूद है। यह अपरिहार्य है। परेशानी यह है कि रक्तचाप मापने के लिए जैसे हमारे पास उपकरण है वैसा कोई उपकरण तनाव को मापने के लिए नहीं है। इसलिए इसका इलाज तो सबसे पहले आप ही को करना होगा और वह तरीका है कि हम इससे बचने का पूरा प्रयास करें। तनाव भी अलग-अलग लोगों को उनकी पृष्ठभूमि और व्यवसाय के अनुसार अलग-अलग होते हैं। लेकिन यह साफ तौर पर कहा जा सकता है कि तनाव हमारे दिल की सेहत के लिए बिल्कुल भी अच्छा नहीं है।

हैल्थ अलर्ट: 30 की उम्र में रखेंगे इन बातों का खयाल तो 40 में नहीं होगा उच्च रक्त चाप

ऐसे समझें 'लाइफ्स सिंपल 7' को
डॉ. लॉयड-जोन्स कहते हैं कि जब हम तनाव में होते हैं, तो हम स्वस्थ भोजन नहीं करते हैं, हम शारीरिक गतिविधि में संलग्न नहीं होते हैं और हम ठीक से सोते भी नहीं हैं। ऐसा लंबे समय तक करने से वजन और रक्तचाप दोनों बढ़ते हैं। 'लाइफ्स सिंपल 7' के सभी नियमों को एक साथ फॉलो करने की जरुरत नहीं है। सबसे पहले उस चीज़ को चुनें जिसे आप आज से ही कम करना चाहते हैं और उसे बेहतर बनाने के लिए तैयार हैं। इसके अलावा, जो भी आप चुनें उसे पूरा करने के लिए ऐसे रास्ते को चुनें जिसमें आपको कम से कम रुकावट आए ताकि उसे बीच में छोड़ न दें। हालांकि डॉ. डोनाल्ड का सुझाव यह है कि अगर आप ध्रूम्रपान करते हें तो सबसे पहले उसे छोडऩे का प्रयास कीजिए।

हैल्थ अलर्ट: 30 की उम्र में रखेंगे इन बातों का खयाल तो 40 में नहीं होगा उच्च रक्त चाप

ऐसे बनाएं अपना सिंपल 7 मेन्यू
-ताजा हरी सब्जियां
-सभी मौसमी फल
-साबुत अनाज
-सेम की फली
-मछली
-लीन पोल्ट्री (हल्की मात्रा में चिकन)
-मेवा और स्वस्थ प्राकृतिक तेल

हैल्थ अलर्ट: 30 की उम्र में रखेंगे इन बातों का खयाल तो 40 में नहीं होगा उच्च रक्त चाप

इनसे बचें-
-प्रोसेस्ड मीट
-रेड मीट
-रिफाइंड अनाज
-मिठाइयां

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कोरोना अलर्ट: क्या शरीर का तापमान चेक करने से कोरोना को रोका जा सकता है?

कोरोना महामारी के दौरान मास्क, सैनिटाइजर, सोशल डिस्टैसिंग के बीच एक और चीज जो बहुज कॉमन है वह है प्रवेश के दौरान अपका टेम्प्रेचर जांचने का रुटीन। हवाई अड्डों, रेस्तरां, शॉपिंग स्टोर ऑफिस, स्कूल, कॉलेज, संस्थान, दुकान, मार्केट और ऐसी ही दूसरी सार्वजनिक जगहों पर यह बेहद आम है। लेकिन क्या इस तरह शरीर का तापमान मापने से कोरोना वायरस को रोकने में कोई मदद मिलती है? स्वस्थ्य विशेषज्ञों और लोगों का इस बारे में बहुत ही साधारण सा सवाल है कि क्या यह कोविड-19 के प्रसार को कम करने में प्रभावी हैं? अगर नहीं तो ऐसा करने के पीछे क्या मजबूरी है? इस महामारी की शुरुआत में बुखार आना इसके सबसे शुरुआती और सामान्य लक्षण के रूप में सामने आया था। इसलिए शरीर का तापमान मापने के लिए 'नो-कॉन्टेक्ट' थर्मामीटर्स का उपयोग किया जाता है क्योंकि ऐसा कोई भी व्यक्ति वायरस से संक्रमित हो सकता है। लेकिन महामारी के 7-8 महीने बीत जाने के बाद अब यह स्पष्ट हो चुका है कि शरीर के तापमान की जांच उतनी भी प्रभावी नहीं होती जितनी कि वह लगती है।

कोरोना अलर्ट: क्या शरीर का तापमान चेक करने से कोरोना को रोका जा सकता है?

संक्रमण बुखार तक सीमित नहीं
दर्जनों अध्ययनों से पता चला है कि कोविड-19 के संदिग्ध मरीजों के एक बड़े हिस्से में बुखार के लक्षण नहीं थे यानी वे संक्रमित तो थे लेकिन उन्हें न तो तेज बुखार था न ही सूखी खांसी। एक शोध के अनुसार अस्पताल आने वाले 30 से 43 फीसदी संदिग्ध या संक्रमित रोगियायें में औसतन 40 फीसदी पूरी तरह से स्पर्शोन्मुख (asymptomatic) होते हैं। ऐसे ही एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि महामारी की शुरुआत में दुनिया भर में यात्रा कर रहे 46 फीसदी यात्रियों के तापमान जांच में उन्हें वायरस के संक्रमण की पुष्टि नहीं हुई जबकि वे उस समय भी कोविड-19 वायरस से संक्रमित थे। दरअसल, सामान्य जीवन में बुखार मापने पर भी शरीर का तापमान एक ही दिन में अलग-अलग समय पर भिन्न-भिन्न हो सकता है। ऐसा स्वस्थ्य व्यक्ति जो अभी धूप में चलकर या कुछ माले सीढिय़ां चढ़कर आया हो उसके शरीर का तापमान भी बढ़ा हुआ हो सकता है। वहीं हल्के या वाले उस व्यक्ति का उच्च तापमान भी थर्मामीटर स्कैनर से पकड़ में नहीं आएगा जिसने कुछ समय पहले ही इब्रूफेन दवा खाई हो जबकि वे वायरस दूसरे व्यक्ति तक पहुंचा सकते हैं।

कोरोना अलर्ट: क्या शरीर का तापमान चेक करने से कोरोना को रोका जा सकता है?

थर्मामीटर जांच को लेकर भ्रम
महामारी के इस दौर में 'नो-कॉन्टेक्ट' थर्मामीटर स्कैनर्स से तापमान जांचने को लेकर बहुत से स्वास्थ्य संगठन भी सहमत नहीं हैं। उनका मानना है कि यह सिर्फ जीव विज्ञान और हमारी गतिविधियों की ही वजह से नहीं है जो तापमान जांच को कम प्रभावी बनाता है। स्वास्थ्य संगठनों के बीच थर्मामीटर रीडिंग में बुखार को लेकर भी कुछ भ्रम है। इतना ही नहीं कुछ देशों में तो शरीर का तापमान जांचने वालों पर भी आरोप लगाए जाने की रिपोर्ट है, क्योंकि उन्हें उपकरणों का उपयोग करने का पर्याप्त प्रशिक्षण तक नहीं दिया गया था। ऐसे ही बहुत से संस्थानों के पास उचित उपकरण नहीं हैं या वे तापमान जांचने का जो तरीका उपयोग कर रहे हैं वे गलत हैं।

कोरोना अलर्ट: क्या शरीर का तापमान चेक करने से कोरोना को रोका जा सकता है?

ऐसे ही चिकित्सक समुदाय कोविड-19 के संदर्भ में नो-कॉन्टैक्ट थर्मामीटर का उपयोग करने के तरीके पर भी सहमत नहीं है। हालांकि चीन में किए गए एक गैर-सहकर्मी समीक्षा अध्ययन में पाया गया कि माथे पर स्कैनर की मदद से शरीर का तापमान मापने की तुलना में कलाई से मापना 'अधिक स्थिर' परिणाम थे। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इंफेक्शस डिसीज़ के निदेशक और शीर्ष अमरीकी कोरोनावायरस के विशेषज्ञ एंथोनी फौसी ने भी तापमान की जांच को बहुत ज्यादा प्रभावी नहीं बताया है। यूएस सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन भी इस पर बहुत भरोसा नहीं जताता लेकिन बावजूद इसके मार्च के बाद पहली बार रेस्तरां में इनडोर भोजन की अनुमति के साथ ही प्रवेश करने से पहले रेस्तरां को तापमान जांच करने की हिदायत दी गई है।



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Monday, 21 September 2020

जानिए मीठी तुलसी खाने के फायदे

मीठी तुलसी को वन तुलसी (तुलसा) या नियाजबो भी कहते हैं। यह हरे रंग का पौधा होता है और इसकी पत्तियां आकार में अन्य तुलसी की पत्तियों से काफी बड़ी व हरे रंग की होती हैं। इसके फूल गुच्छों में लगते हैं जो सुगंधित व हरे बैंगनी रंग के होते हैं। यह एंटीबायोटिक और एंटीवायरल होती है। इसकी 4-5 पत्तियां खाने से ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने, गठिया, पेशाब में जलन, हेपेटाइटिस, पेट का अल्सर, थकान, तनाव, उल्टी, दस्त, भोजन में अरुचि, हिचकी, सर्दी-जुकाम, पेट संबंधी रोग और डायबिटीज में लाभ होता है। इसे प्रयोग करने से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।
यह भी जानें-
इसकी सुगंध से डेंगू के मच्छर दूर भागते हैं। ज्यादा सर्दी के मौसम में तुलसी की पत्तियां सूखकर झड़ जाती हैं और बसंत का मौसम आने पर नई आती हैं। इसलिए मीठी तुलसी की ताजी पत्तियों को सुखाकर रख लें। सर्दियों में इनके इस्तेमाल से सेहत में लाभ होता है। पत्तियों की चटनी भी बना सकते हैं।



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एसिडिटी के कारण भी गले में होती हैं समस्याएं, जानें इनके बारे में

अगर आपका गला बार-बार खराब, आवाज में खराश, पेट व सीने में जलन बनी रहती है तो है इन सबका कारण एसिडिटी भी हो सकती है। भोजन नली अपने निचले सिरे पर एक स्फिंक्टर द्वारा आमाशय में खुलती है जिससे होकर भोजन नीचे उतरता है और फिर से ऊपर नहीं आ सकता। लेकिन कभी-कभी स्फिंक्टर के ठीक से काम न करने या आमाशय में अधिक एसिड बनने पर यह अपनी दिशा के विपरीत ऊपर भोजन नली व गले में आ जाता है। लेटे रहने पर यह समस्या बढ़ जाती है। कई बार एसिड मुंह और नाक तक पहुंच जाता है।
परेशानी : सोते समय खांसी, गले में कुछ चुभना, निगलने में तकलीफ, छाती, सीने व गले में जलन व दर्द और दांतों का खराब होना जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
ध्यान रहें ये बातें-
सोने से करीब 3-4 घंटे पहले भोजन कर लें। इस दौरान गरिष्ठ खानपान से परहेज करें।
एक बार में अधिक खाने की बजाय थोड़ा-थोड़ा करके खाएं।
ज्यादा मिर्च-मसालों व खट्टी चीजों से परहेज करें। चाय, कॉफी व कोल्ड ड्रिंक का अधिक मात्रा में प्रयोग न करें। शराब से बचें।
एंटीबायोटिक व दर्द निवारक दवा अपनी मर्जी से न लें क्योंकि ये एसिडिटी बढ़ा सकती हैं।



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जानिए सेहत के लिए कितना फायदेमंद है मेडिटेशन

हमारे शरीर, मन और आत्मा को एक-दूसरे से जोडऩे के लिए मेडिटेशन यानी ध्यान बेहद जरूरी है। मेडिटेशन से मस्तिष्क में मौजूद सभी प्रमुख ग्रंथियां अपना काम सुचारू रूप से करती हैं और हार्मोंस उचित मात्रा में स्रावित होते हैं जिससे रोग हमें प्रभावित नहीं कर पाते। जब हम ध्यान की मुद्रा में होते हैं तो मस्तिष्क में अल्फा तरंगों की गतिविधियां बढ़ जाती हैं। इन तरंगों का अधिक मात्रा में होना इस बात का परिचायक है कि हमारा मस्तिष्क शांत व स्वस्थ है।
लाभ : मेडिटेशन के दौरान गहरी सांस लेने से ऑक्सीजन से भरपूर रक्त शरीर में प्रवाहित होता है।
उदासी व तनाव दूर होते हैं और व्यक्ति की उम्र लंबी होती है।
ध्यान करने से सकारात्मक सोच व ऊर्जा बढ़ती है और चिड़चिड़ापन व उत्तेजना जैसे भाव दूर होते हैं।
ईड़ा, पिंघला और सुसुमना, सांस संबंधी नाडिय़ां संतुलित होती हैं जिससे श्वास पर नियंत्रण करना आसान हो जाता है।
मेडिटेशन, सात्विक भोजन और सामान्य व्यायाम के माध्यम से थायरॉइड, रूमेटॉयड आर्थराइटिस और अस्थमा जैसे रोगों पर नियंत्रण किया जा सकता है।
ऐसे करें-
मेडिटेशन दो मिनट से दो घंटे तक किया जा सकता है लेकिन यह व्यक्तिके मस्तिष्क व शारीरिक क्षमता पर निर्भर करता है। शरीर, मन व आत्मा के तालमेल के लिए आंखें बंद करके ध्यान करना चाहिए। यह दिमाग के लिए खुराक का काम करता है।
सुबह चार बजे से सूर्योदय तक और सूर्यास्त के बाद दो घंटे तक मेडिटेशन किया जा सकता है। उस समय वातावरण शुद्ध होता है और साफ वायु होने से ध्यान का लाभ ज्यादा होता है।
ध्यान हमेशा खाली पेट ही करना चाहिए। शाम के समय मेडिटेशन तभी करें जब खाना खाए हुए दो से तीन घंटे बीत चुके हों।
इसे हमेशा शांत माहौल में समतल सतह पर करना चाहिए। घुटनों की तकलीफ वाले कुर्सी पर बैठकर भी ध्यान कर सकते हैं। इसका अभ्यास कोई भी व्यक्ति कर सकता है।
मेडिटेशन करने से हमारे दिमाग के दोनों हिस्से (हेमिस्फेयर) संतुलित रहते हैं। जिससे शरीर अपना काम बिना किसी अवरोध के कर पाता है।



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आलू खाने से बढ़ेगी इम्यूनिटी, जानें इसके अन्य फायदे

आयुर्वेद के अनुसार आलू ठंडा और पचने में भारी होता है। इसे खाने से कम समय में ज्यादा ऊर्जा मिलती है। स्पेन के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में पाया कि जो लोग रोजाना आलू खाते हैं, उनमें रोगों से लडऩे की क्षमता में वृद्धि होती है।
आलू में विटामिन सी, बी कॉम्पलेक्स, आयरन, कैल्शियम, मैंगनीज और फॉस्फोरस जैसे तत्त्व होते हैं।
100 ग्राम आलू में 1.6 प्रतिशत प्रोटीन, 22.6 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, 0.1 प्रतिशत वसा, 0.4 प्रतिशत खनिज और 97 प्रतिशत कैलोरी होती है।
जलने पर कच्चा आलू कद्दूकस करके लगाने से जलन में आराम मिलता है।
कच्चे आलू का रस रोजाना पीने से एसिडिटी में लाभ होता है।
आलू के रस में नीबू के रस की कुछ बूंदें मिलाकर लगाने से चेहरे के दाग-धब्बे दूर होते हैं।
ब्रेस्ट फीड कराने वाली मांओं को आलू रोजाना खाना चाहिए। इसके टुकड़ों को गर्दन और कोहनियों पर रगडऩे से कालापन दूर होता है व त्वचा मुलायम होती है।
आलू को हमेशा छिलके समेत पकाना चाहिए क्योंकि इसका सबसे अधिक पौष्टिक भाग छिलके के एकदम नीचे होता है, जो प्रोटीन और खनिज से भरपूर होता है।
अगर आप अपना वजन कम करना चाहते हैं तो आलू को तलने या भूनने की बजाय उबालकर खाएं। इसके स्लाइस आंखों पर रखने से आंखों को आराम मिलता है।



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कैंसर का इलाज ले रहे रोगियों में कोरोना से मृत्यु का जोखिम अधिक

न्यूयॉर्क. अमरीकी शोधकर्ताओं के अध्ययन से पता चला है कि कैंसर रोगियों में कोविड-19 संक्रमित का संक्रमण होने से मौत की आशंका बढ़ जाती है। यूरोपियन सोसाइटी फॉर मेडिकल ऑन्कोलॉजी वर्चुअल कांग्रेस 2020 में सिनसिनाटी विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की ओर से पेश किए गए अध्ययन में कैंसर के ऐसे तरीकों के बारे में बताया गया जो रोगी के कोरोनावायरस संक्रमित होने पर उस पर नकारात्मक असर डाल सकते हैं। यूसी कॉलेज ऑफ मेडिसिन में हेमटोलॉजी ऑन्कोलॉजी विभाग में मेडिसिन के एसोसिएट प्रोफेसर त्रिशा वाइज-ड्रेपर ने कहा, ऐसे मरीज के अस्पताल में भर्ती होने की आशंका 40 प्रतिशत तक होती है। साथ ही उनमें गंभीर श्वसन बीमारी होने और मृत्यु की आशंका होती है। कोविड -19 और कैंसर के संबंध पर किए गए पिछले अध्ययन में टीम ने पाया था कि उम्र, लिंग, धूम्रपान करने और सक्रिय कैंसर सहित अन्य स्वास्थ्य स्थितियों में मृत्यु की आशंका बढ़ा देती हैं।

पहले एक साल एंड्रक्राइन थैरेपी छोड़ दें
कोविड-19 डायग्नोस होने से पहले के एक साल में एंडोक्राइन थैरेपी को छोड़ दें तो कैंसर का ट्रीटमेंट नहीं ले रहे रोगियों की तुलना में सक्रिय कैंसर उपचार ले रहे रोगियों की मृत्यु संख्या अधिक रही। उन्होंने कहा, यह उन रोगियों के लिए अच्छी खबर नहीं है जो कैंसर से लड़ रहे हैं। इसके अलावा भी कैंसर के रोगियों में किसी भी स्थिति या कारण के चलते मृत्यु की आशंका सामान्य आबादी की तुलना में अधिक है। इसमें वो लोग शामिल हैं, जिनका पिछले साल इलाज नहीं चल रहा था। लेखकों ने कहा कि उन्हें इस विषय पर और अधिक शोध करने की जरूरत है क्योंकि वे रोगियों के समूह पर महामारी के प्रभाव की जांच करना जारी रखना चाहते हैं।



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Sunday, 20 September 2020

बारिश के बाद आंखों में होने लगती हैं ये समस्याएं, जानें इनके बारे में

बारिश के बाद की ड्राइनेस में आंखों के कंजक्टिवाइटिस का डर रहता है। आई फ्लू पीड़ित की आंखों में देखने से नहीं संक्रमित हाथों से आंख को छूने से फैलता है।
एलर्जी कंजक्टिवाइटिस-
धूल व धूएं, फूलों के परागकण, कार्बन के कण और कई बार कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स के इस्तेमाल से यह रोग होता है।
लक्षण : आंखों में लालिमा, खुजली, जलन, भारीपन और पलकों में सूजन होने लगती है।
इलाज : सामान्य एलर्जी है तो लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप और एंटी एलर्जिक (सॉफ्ट स्टेरॉइड) आई ड्रॉप डालने से 2-3 दिन और गंभीर है तो एक हफ्ते में आराम मिल पाता है।
बैक्टीरियल कंजक्टिवाइटिस-
बैक्टीरियल कंजक्टिवाइटिस को बैक्टीरियल आई फ्लू भी कहा जाता है जो कि पहली बरसात के समय स्टेफायलोकोकस, न्यूमोकोकस, हीमोफिलस इन्फ्लूएन्जा आदि जीवाणुओं के संक्रमण से होता है।
लक्षण : आंखों में लालिमा, दर्द, सूजन, चिपचिपापन और आंखों से पानी आने लगता है।
इलाज : विशेषज्ञ की सलाह से एंटीबायोटिक, लुब्रिकेट आई ड्रॉप डालने से सामान्य आई फ्लू 3-4 दिन व गंभीर इंफेक्शन हो तो ठीक होने में एक हफ्ता लग जाता है।
कैमिकल कंजक्टिवाइटिस-
स्वीमिंग पूल के पानी में क्लोरीन की मात्रा ज्यादा होती है। ऐसे में स्वीमिंग पूल में नहाने वालों में इस प्रकार का संक्रमण फैलने की आशंका हो सकती है।
लक्षण : संक्रमित व्यक्ति की आंखों में तेज जलन, खुजली, लालिमा या किरकिरापन लगे तो ये कैमिकल कंजक्टिवाइटिस के लक्षण हो सकते हैं।
इलाज : लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप और एंटीबायोटिक आई ड्रॉप से आराम मिलता है। यह रोग 2-3 दिन में ठीक हो जाता है।
वायरल कंजक्टिवाइटिस-
बरसात के पानी में फैलने वाले एडीनोवायरस (टाइप ८ व १९) के कारण यह समस्या होती है।
लक्षण : इस रोग में कभी-कभी कानों के पास कनपटी पर सूजन भी हो सकती है और कॉर्निया में सूक्ष्म जख्म होने के कारण दिखना भी कम हो जाता है। इस रोग से पीडि़त व्यक्ति की आंखों में लालिमा और उसे धुंधला दिखाई देने लगता है। अगर इस बीमारी का इलाज सही समय पर ना कराया जाए तो आंखों की रोशनी में हमेशा के लिए धुंधलापन आ सकता है।
इलाज : लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप डालने से सामान्य कंजक्टिवाइटिस ठीक होने में एक हफ्ता और सीवियर कंजक्टिवाइटिस होने पर 2-3 हफ्ते भी लग जाते हैं।
इनका ध्यान रखें-
आंखों में सूखापन महसूस हो तो इन्हें बार-बार मसले नहीं बल्कि तीन-चार बार ठंडे पानी से धोएं।
हमेशा साफ कपड़े से ही आंखों को पोछें और अपना तौलिया व रुमाल किसी से शेयर ना करें।
गंदे हाथों से आंखों को छूने पर संक्रमण फैलता है इसलिए हाथों की सफाई का भी विशेष ध्यान रखें।
मानसून के दिनों में आई मेकअप से परहेज करें क्योंकि धूल व अन्य प्रकार का प्रदूषण मेकअप से भी आंखों को नुकसान पहुंचता है। चश्में का प्रयोग करें।



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धूप थैरेपी से ठीक होंगे शरीर के कई रोग

कुछ देर धूप सेंक ली जाए तो सेहत खिली-खिली रहेगी। यह बात कई शोधों में भी साबित हुई है कि सुबह 20 मिनट सूरज की किरणों में बैठने से कई बीमारियों से निजात पाई जा सकती है। सूर्य की किरणों में विटामिन-डी होता है जो मानव शरीर की हड्डियों को मजबूत बनाने में सहायक होता है।
आयरन की कमी दूर-
शरीर में आयरन की कमी, चर्मरोग, कमजोरी, थकान, कैंसर, टीबी और मांसपेशियों की बीमारी का इलाज सूर्य की किरणों के प्रयोग से किया जा सकता है। यहां तक मानना था कि सूर्य की किरणों से हृदय भी तंदुरुस्त रहता है।
ध्यान रखें-
पसीना आने के बाद धूप में नहीं बैठना चाहिए।
दोपहर बाद धूप में बैठने का उतना महत्व नहीं है।
वैज्ञानिकों ने अपनी रिसर्च से यह भी सिद्ध किया है कि सूर्य की किरणें बाहरी त्वचा पर ही अपना प्रभाव नहीं डालती हैं बल्कि शरीर के अंदरूनी अंगों में जाकर उन्हें स्वस्थ बनाने में अपनी कारगर भूमिका निभाती हैं।



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सप्ताह में 30 घंटे ईमेल पढ़ने में गंवाते हम, सेहत कब बनाएंगे ?

अगर आप तनाव महसूस कर रहे हैं तो खुद को घर की साफ-सफाई, जुम्बा क्लास या पोछा लगाना जैसे सामान्य काम में व्यस्त कर लें। इस प्रकार शरीर को किसी काम में व्यस्त रखने और लंबी सांसे लेने से हमारे शरीर को तनाव दूर करने में मदद मिलती है। दरअसल हमारे शरीर में तनाव के प्रति प्रतिक्रिया करने का चक्र होता है। जब यह पूरा नहीं होता है तो हमें थकान और अनिद्रा जैसी परेशानियां होती हैं। 'बर्नआउट: द सीक्रेट टू अनलॉकिंग द स्ट्रेस ' किताब की लेिखका एमिली व एमेलिया नागोस्की का कहना है कि इससे कैलोरी घटाने में मदद मिलती है।

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टीएनटी पर लगाएं ध्यान
बर्नआउट एक्सपर्ट पाउला डेविस-लाक कहती हैं नौकरी में मांग और संसाधनों के बीच संतुलन बनाने पर गौर करें। नौकरी की मांग है कि हम अपनी ऊर्जा खर्च कर कंपनी को लाभ दें। वहीं संसाधन आपके काम के लिए प्रेरक ऊर्जा देने वाले पहलू हैं। इसमें साथियों से घनिष्ठ संबंध, नई चुनौतियों का सामना करना, मेंटोरशिप व सकारात्मक फीडबैक मिलना इत्यादि शामिल है। अगर आपकी जॉब डिमांड्स हाई हैं और उनकी तुलना में संसाधन कम हैं तो अपने बॉस से इसे बदलने के लिए कहें। डेविस-लाक इसे टीएनटी कहती हैं- 'टिनी नोटिसेबल थिंग्स' or Tiny Noticeable Things।

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दोस्तों संग बिताएं समय
अगर कुछ समझ नहीं आ रहा है तो कानों पर हैडफोन लगाकर वीडियो गेम खेलने से अच्छा है दोस्तों के साथ कोई पसंदीदा काम करें। दोस्तों के साथ हंसी-मज़ाक और साथ रहने की भावना सुरक्षित महसूस करने में मदद करती है। तनाव के स्तर को भी कम करती है। 30 घंटे औसतन एक कर्मचारी सप्ताह में ईमेल और फोन कॉल्स पर ही अपना समय बिता देता है। फ्रांस में 'राइट टू डिसकनेक्ट कानून' कर्मचारियों को संवैधानिक रूप से अपने काम के बाद ईमेल और फोन कॉल से दूर करता है। लेखक डैन शॉबैल का कहना है कि कंपनियों को उचित काम के घंटे लागू करने चाहिए। शॉबैल का कहना है कि लचीली कार्यशैली को बढ़ावा देने से बर्नआउट को रोकने में भी मदद मिलती है

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कॉर्पोरेट कल्चर जरूरी
नियोक्ता बर्नआउट को भी प्रभावित करते हैं। लेखक डैन शॉबैल का कहना है कि कंपनियों को कॉर्पोरेट कल्चर लागू करना चाहिए। शॉबैल का कहना है कि लचीली कार्यशैली कर्मचारियों को समय प्रबंधन का समय देता है। वहीं औसतन एक कर्मचारी सप्ताह में 30 घंटे ईमेल और फोन कॉल्स पर बिता देता है।

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समुदाय के साथ रहें
मनोवैज्ञानिक शेैरिल जीगलर कहती हैं कि पारंपरिक मूल्यों के प्रति हमारा रुझान घट रहा है। इसलिए अपने मन में अध्यात्मिकता का दिया जलाकर रखें क्योंकि यह शक्ति देता है। इसके अभाव में आज हम अपने परिजनों, परिवार और समुदाय से दूर होते जा रहे हैं।

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