Tuesday, 30 July 2019

Malaria - सफाई से इस तरह दें मलेरिया को मात

मलेरिया, प्लाजमोडियम परजीवी की पांच प्रकार की प्रजाति से फैलने वाला रोग है। जिसका वाहक मादा एनाफिलीज मच्छर होता है। मलेरिया मादा मच्छर एनाफिलिज के काटने से यह संक्रमण होता है। यह रोग होने पर तेज बुखार, कंपकंपी, सिरदर्द, थकावट, उल्टी, खून की कमी व आंखों में पीलापन हो जाता है।

इलाज : अगर मरीज की स्थिति नियंत्रण में हो तो डॉक्टरी सलाह से दी जा रही दवाइयों, उचित खानपान और साफ-सफाई का ध्यान रखकर घर पर ही इलाज संभव है। लेकिन यदि लो ब्लड प्रेशर, जी घबराना, सांस लेने में तकलीफ, प्लेटलेट्स कम होना, तेज बुखार, बेहोशी, दिमागी बुखार, पेशाब न आना या काले रंग का आने पर अस्पताल में भर्ती करना जरूरी होता है।

बचावः
- अगर मरीज को डिहाइड्रेशन की समस्या हो रही है तो पर्याप्त पानी और खानपान में लिक्विड चीजों से पूर्ति करानी चाहिए।
- दवाओं से मलेरिया का पूरी तरह से इलाज हो जाता है। मलेरिया होने पर कई प्रकार की दवाइयां प्रभावी होती हैं। डॉक्टर मरीज की स्थिति के अनुसार क्लोरोक्विन, आर्टीसुनेट्स आदि दवाएं देते हैं और कई बार जरूरत के अनुसार इंजेक्शन भी लगाए जाते हैं।

महत्वपूर्ण जांचें
दो प्रकार से खून की जांच की जा सकती है। रेपिड एंटीजन टेस्ट से मलेरिया का तुरंत पता लगाया जाता है। दूसरा, पेरीफेरल ब्लड फिल्म (पीबीएफ ) टेस्ट से परजीवी को माइक्रोस्कोप से देखकर पता लगाते हैं। सामान्य स्थिति में दवाओं व इंजेक्शन से घर पर ही इलाज किया जा सकता। लेकिन मरीज की गंभीर अवस्था में उसे अस्पताल में भर्ती करके भी उपचार करते हैं।

इससे जुड़े खतरे
कई बार यह रोग थोड़े समय में दवाओं से ठीक हो जाता है लेकिन समय रहते इसका इलाज न कराया जाए तो यह शरीर के अन्य अंगों को भी प्रभावित करता है। खून की कमी, किडनी का खराब होना, हार्ट फेल्योर और दिमागी बुखार के कारण दौरे आना, चक्कर आदि मलेरिया की गंभीर अवस्था में होने वाली समस्याएं हैं।

सफाई व सावधानी
- विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार मलेरिया रोग से बचाव के तीन मुख्य तरीके हैं।पहला, सोते समय मच्छरदानी का प्रयोग करें। दूसरा, शरीर को पूरी तरह से कवर करके रखें। तीसरा, त्वचा पर मच्छर भगाने की (रिपेलेंट) क्रीम का प्रयोग करें।
- घर के आसपास गंदा पानी जमा न होने दें।
- कूलर या छत पर रखी पानी की टंकी की नियमित सफाई करें।
- ध्यान रहे कि बारिश का पानी किसी डिब्बे, गमले या टायर आदि में जमा न होता रहे।
- घर में डीटीटी जैसे कीटनाशकों का छिड़काव कराएं।



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Dengue Fever - प्राकृतिक तरीके से करें डेंगू का मुकाबला

डेंगू बुखार एक संक्रमण है जो डेंगू वायरस के कारण होता है। डेंगू का इलाज समय पर करना बहुत जरुरी होता हैं। मच्छर डेंगू वायरस को संचरित करते (या फैलाते) हैं। डेंगू बुख़ार को "हड्डीतोड़ बुख़ार" के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि इससे पीड़ित लोगों को इतना अधिक दर्द हो सकता है कि जैसे उनकी हड्डियां टूट गयी हों।

लक्षण:
डेंगू बुखार के कुछ लक्षणों में बुखार; सिरदर्द; त्वचा पर चेचक जैसे लाल चकत्ते तथा मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द शामिल हैं।

बचावः

आयुर्वेद में मांसपेशियों और जोड़ों का दर्द वात और इंटरनल ब्लीडिंग पित्त के बढ़ने का संकेत माना जाता है। आयुर्वेदिक सिद्धांत के अनुसार वात और पित्त का बढ़ा हुआ रूप ही डेंगू होता है। डेंगू मच्छर के काटने पर इस बीमारी की शुरुआत जठराग्नि (भूख) कम होने और टॉक्सिन यानी शरीर में मौजूद विषैले पदार्थ इकट्ठा होने के कारण होती है। इसके बाद वात और पित्त दोष बढ़ने लगते हैं। शरीर, सिर और मांसपेशियों में दर्द, उल्टी होना व इंटरनल ब्लीडिंग डेंगू बुखार के लक्षण हैं।

वात व पित्त का संतुलन
टॉक्सिन्स यानी विषैले पदार्थों को पचाने, जठराग्नि बढ़ाने, वात और पित्त को संतुलित करने व बुखार को कम करने के लिए गुडुचि, मुस्ता, परपटक, खस, संदल (चंदन), धनवयास और पाठा जैसी जड़ी-बूटियां लाभकारी होती हैं। पित्त को संतुलित करने और खून बहने से रोकने के लिए ठंडक प्रदान करने वाली दवाएं जैसे खस, संदल, कामादुधा रस, चन्द्रकला रस आदि दिया जाता है।

दलिया भी उपयोगी
जठराग्नि (भूख) कम होने और पाचन तंत्र में विषैले तत्वों के बढ़ जाने की स्थिति में रोगी को बहुत हल्का भोजन दिया जाना चाहिए। विभिन्न दालों का पानी व चावल का मांड और दलिया संतुलित भोजन हो सकता है। भोजन के मामले में लापरवाही नहीं बरती जानी चाहिए।

पपीता
पपीते का पत्ता काफी असरदार साबित होता है। इसमें मौजूद आयुर्वेदिक गुण बुखार को कम करने के साथ ही प्लेटलेट्स की संख्या को बढ़ाने में भी मदद करते हैं।

एक्सपर्ट की राय
डेंगू का वायरस अस्थिमज्जा (बोनमैरो) पर अटैक करता है जिसके कारण प्लेटलेट्स का बनना रुक जाता है। इनकी संख्या में ज्यादा कमी आने से इंटरनल ब्लीडिंग शुरू हो जाती है। तला-भुना, मसालेदार और मांसाहारी भोजन नहीं करना चाहिए। रसदार फल जैसे अंजीर व पपीता खाएं जबकि केला और आम जैसे भारी फलों से परहेज करना चाहिए।

ये भी करें
- रोगी को पीने के लिए गुनगुना पानी देना चाहिए और नहाने की जगह शरीर को गीले कपड़े से पोंछना चाहिए।

- अपने आसपास पानी जमा न होने दें ताकि मच्छर उनमें अंडे न दे सकें। दुकान, दफ्तर और घर के अंधेरे कोनों में कचरा जमा न होने दें। कूलर व पानी की टंकियों की नियमित सफाई करें। खिड़कियों व दरवाजों मे जालियां लगवा लें और मच्छरदानी का प्रयोग करें।



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दर्द और सूजन में इन घरेलू नुस्खों से पाएं राहत, जानें इनके बारे में

शरीर के किसी हिस्से में सूजन है तो अर्जुन के पेड़ की छाल का चूर्ण बना लें। एक चम्मच चूर्ण को लेकर उसमें थोड़ा पानी मिलाकर पेस्ट बनाकर प्रभावित हिस्से पर लगाएं।

बवासीर के कारण सूजन है तो धतूरे के पत्ते को थोड़ा गर्म करके बांधे। इसके अलावा धतूरे के पत्तों को पीस कर लेप बनाएं, इसे भी प्रभावित जगह पर लगा सकते हैं।
देसी बबूल के बीज को पीस कर चूर्ण बना लें। इसमें बराबर मात्रा में हल्दी और दोगुना शहद डाल कर मिला लें। अब लेप को दर्द वाली जगह पर लगाएं, राहत मिलेगी।

सूजन की स्थिति में इलायची और धनिया भी कारगर है। इसके लिए 2-3 ग्राम इलायची और धनिया पत्ते को पीस कर दूध में मिलाकर लेप तैयार करें। इससे सूजन में राहत मिलती है।
जंगली इमली के बीज को थोड़ा पानी मिलाकर सिलबट्टे पर पीस लें। इस लेप को दर्द वाली जगह पर लगाएं।
चोट से होने वाली सूजन पर हल्दी, चूना और सरसों का तेल मिलाकर बना लेप लगाएं।
आंखों में सूजन होने पर 10-20 ग्राम बेलरस और शक्कर मिलाकर गाढ़ा लेप तैयार कर लें। इसे आंख के आसपास लगाएं, काफी आराम मिलेगा।



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कई रोगों में फायदेमंद है चमेली के फूल, पत्ते व तेल

चमेली का फूल बगीचे और घर में खुशबू फैलाने के लिए जाना जाता है। इसमें औषधीय गुण भी हैं जो कई रोगों से बचाते हैं। औषधि के रूप में चमेली की केवल 10 ग्राम मात्रा का ही प्रयोग करना चाहिए। इसकी खुशबू दिमाग को शक्तिशाली बनाती है। लेकिन यह वात, लकवा, गठिया रोगी के लिए हानिकारक है। इसकी सुगंध कुछ लोगों में एलर्जी का कारण बन सकती है। ऐसे में जिन्हें खुशबू से एलर्जी है वे इसका प्रयोग न करें। जानिए इसके फायदे-

ठीक होती चोट व घाव -
चमेली के तेल का इस्तेमाल एंटीसेप्टिक के तौर पर भी किया जाता है। किसी तरह की चोट या घाव हो जाए तो रूई के फाहे को चमेली के तेल में डुबोकर प्रभावित हिस्से पर लगाएं। इससे दर्द कम होने के साथ घाव भी तेजी से भरता है।

तनाव की छुट्टी - अगर काम का अधिक बोझ और अधूरी नींद तनाव पैदा करती है तो ऐसी स्थिति में बगीचे में जाएं और चमेली के फूलों की सुगंध लें। इसकी खुशबू मूड बूस्टर का काम करती है और तनाव का स्तर घटाती है। साथ ही अनिद्रा की समस्या से भी राहत देती है।

दूर होता दर्द -
चमेली का तेल खुशबूदार होने के कारण इसका प्रयोग अरोमाथैरेपी में भी किया जाता है। इसके तेल से की गई मसाज शरीर की मांसपेशियों आराम पहुंचाती है। इसके अलावा चमेली के तेल में नारियल का तेल मिलाएं और इससे शरीर की मालिश करें। बॉडी को आराम मिलने के साथ दर्द भी दूर होगा।

पेट में कीड़े : अगर पेट में कीड़े हो गए हैं तो चमेली के पत्तों का रस पी सकते हैं, ऐसा कुछ दिनों तक करने से कीड़े बाहर निकल जाते हैं।

मुंह में छालों की समस्या : मुंह में छाले होने पर इसकी पत्तियों को धोकर धीरे-धीरे चबाएं। पत्तियों से निकलने वाला रस छालों को खत्म करता है।

बिवाई फटना : सर्दी के अलावा भी कुछ लोगों में बिवाई फटने की समस्या होती है। ऐसे में चमेली के पत्तों का रस इस पर लगा सकते हैं।

चमेली के फूल का प्रयोग - चमेली के फूलों को पीसकर इसका लेप बना लें। इसे दाद, खाज और खुजली होने पर प्रभावित हिस्से पर लगाएं, आराम मिलेगा।

अक्सर सिरदर्द रहने की समस्या है तो कुछ चमेली के फूल लें इसे पीसकर लेप तैयार करें। इस लेप को माथे पर लगाएं, सिरदर्द से राहत मिलेगी।



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जानिए शरीर के लिए पानी की जरूरत से जुड़ी भ्रांतियां और वास्तविकता

पानी की कमी शरीर में ऊर्जा के स्तर को कम कर देती है, नतीजन आप सुस्त और बीमार भी हो सकते हैं। ऐसे में पानी और लिक्विड डाइट से शरीर को स्वस्थ रखें। शरीर में तरल पदार्थों का उपयोग पाचन, लार का निर्माण, पोषक तत्त्वों का वहन और शरीर का तापमान ठीक बनाए रखने में होता है। तरल पदार्थों की कमी होने पर मस्तिष्क थस्र्ट मैकेनिज्म यानी प्यास लगने का अनुभव कराता है। इस कमी को पानी, जूस, दूध, कॉफी आदि से पूरा किया जा सकता है। पर्याप्त मात्रा में पानी होने से गेस्ट्रोइंटेस-टाइनल टैक्ट से आसानी से चीजें फ्लो करती हैं और कब्ज नहीं होता है।

कम करता है कैलोरी -

वेट लॉस स्टै्रटजी में पानी खूब पीने की सलाह दी जाती है लेकिन प्रत्यक्ष तौर पर इससे वजन कम नहीं होता है। दरअसल उच्च कैलोरी के पेय पदार्थ की जगह जब पानी पिया जाता है तब इसका असर दिखता है। इससे कुल कैलोरी कम होती है और वजन घटने लगता है।

कुछ भ्रांतियां और वास्तविकता -

भ्रांति : रोजाना 8 गिलास पानी पीना चाहिए। इसमें केवल पानी ही पीना चाहिए या अन्य तरल पी सकते हैं?
वास्तविकता : कई शोधों से पता चला है कि पानी की जगह दूसरा तरल पदार्थ जैसे जूस, सूप , कॉफी आदि भी पी सकते हैं।

भ्रांति : प्यास लगने का मतलब डिहाइडे्रशन है?
वास्तविकता : प्यास तब लगती है जब रक्त की सांद्रता दो प्रतिशत से कम हो जाती है जबकि सांद्रता 5 प्रतिशत तक बढ़ जाती है तब डिहाइडे्रशन होने लगता है।

भ्रांति : प्लास्टिक की बोतल का बार-बार इस्तेमाल नहीं करना चाहिए?
वास्तविकता : इन बोतलों में कैमिकल्स होते हैं जो बार-बार पानी भरने से उसमें मिलते रहते हैं। अगर बोतल में मुंह लगाकर पानी पिया जाता है और उसे अच्छी तरह से साफ नहीं किया जाता तो मुंह के बैक्टीरिया उसमें जगह बना लेते हैैं।

भ्रांति : एथलीट्स को पानी की बजाय स्पो्र्टस ड्रिंक्स की जरूरत क्यों पड़ती है?
वास्तविकता : स्पोर्टस ड्रिंक्स का स्वाद अच्छा होता है और महंगे भी होते हैं लेकिन हाइड्रेट होने के लिए जरूरी नहीं हैं। इन ड्रिंक्स का इस्तेमाल शरीर में नमक की कमी पूरा करने के लिए किया जाता है।



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Monday, 29 July 2019

जानिए अस्थमा के कारण, लक्षण और घरेलू उपचार के बारे में

अस्थमा को दमा भी कहते हैं। यह श्वसन तंत्र से जुड़ी बीमारी है। इसके होने के कई कारण हैं, लेकिन इसमें मुख्य कारण एलर्जी है। पहले यह बीमारी उम्रदराज लोगों में अधिक देखने को मिलती थी लेकिन अब छोटे बच्चों को भी यह बीमारी हो रही है। अस्थमा का शुरू में इलाज दवाओं से होता है, लेकिन समस्या गंभीर होने पर डॉक्टर कई बार मरीज को इन्हेलर की सलाह देते हैं, लेकिन बिना डॉक्टरी सलाह पर इसका इस्तेमाल नुकसानदायक होता है। डॉक्टरी सलाह पर ही लें।

अस्थमा में इन्हेलर कारगर होता है लेकिन इसके कई वर्षों तक इस्तेमाल से स्किन पर बुरे असर के साथ मोतियाबिंद का भी खतरा रहता है।

लक्षण और जांचें-
अचानक खांसी, छींकें या सर्दी लगना, सांस लेने में परेशानी और सीने में जकडऩ महसूस होना, सांस लेते समय घरघराहट जैसी आवाज, तेज सांस लेने पर पसीना के साथ बेचैनी महसूस होना, सिर भारी-भारी रहना, जल्दी-जल्दी सांस लेने पर थकावट महसूस होना आदि इसके लक्षण हैं। सांस की नली में कितनी सिकुडऩ है इसके लिए स्पाइरोमेट्री टैस्ट कराते हैं। साथ ही सांस लेने की क्षमता के लिए पीक फ्लो टैस्ट होता है।

घरेलू उपाय -
आंवला पाउडर और शहद का मिश्रण रोज सुबह लें। इससे आराम मिलेगा। सांस लेने में परेशानी होने पर शहद सूंघना चाहिए। इससे राहत मिलती है। सांस नली खुल जाती है। सरसों तेल और कर्पूर को गुनगुना गर्म कर सीने और पीठ पर मालिश करें। इससे कफ कम होता है। 10-15 लहसुन की कली को दूध में उबालकर गुनगुना ही पीएं। गर्म कॉफी या फिर अदरक और अनार के रस को शहद के साथ मिलाकर पीने से भी राहत मिलती है।

दमा के लिए योग -
अनुलोम विलोम, कपालभाति, मत्स्यासन, भुजंगासन और शवासन आदि आसन करने से अस्थमा रोगियों को फायदा होता है। इन्हें नियमित करना चाहिए।

मुख्य कारण -
धूल और धुएं से यह बीमारी फैलती है। खाने की छौंक, फूलों के परागण, घर के पालतू जानवरों के फर और कॉकरोच से भी इसकी एलर्जी होती है। भय या तनाव और महिलाओं में हार्मोनल बदलाव से भी अस्थमा हो सकता है।

ये बातें रखें ध्यान -
घर को हमेशा साफ रखें ताकि धूल से एलर्जी की आशंका न रहे।
योग-व्यायाम और ध्यान कर खुद को शांत रखने की कोशिश करना चाहिए।
मुंह से सांस न लें इससे समस्या और बढ़ सकती है।
रोगी गर्म बिस्तर में ही सोए। इससे अस्थमा का अटैक घटता है।
धूम्रपान, शराब और ज्यादा मिर्च-मसालेदार चीजों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
तनाव, क्रोध तथा लड़ाई-झगड़े वाले माहौल से दूर रहना चाहिए।
इन्हेलर का प्रयोग करने वाले मरीज इसको हमेशा अपने पास रखें।

काई, धूल मिट्टी वाली जगहों से दूर रहने का प्रयास करना चाहिए।
घर के अंदर हैं तो हर प्रकार के धुंए से बचें।
शरीर की प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाने के लिए ताजे फल और सब्जियां खूब खाएं।
अगर आपका बच्चा अस्थमैटिक है तो उसके दोस्तों व अध्यापक को बता दें ताकि अटैक की स्थिति में उसकी मदद कर सकें।
ज्यादा गर्म और ज्यादा नम वातावरण से बचें क्योंकि इससे भी एलर्जी होने की आशंका रहती है। आंधी और तूफान में घर से बाहर न जाएं।

इलाज का तरीका -
एलोपैथी-
अस्थमा से पीड़ित मरीजों के इलाज से पहले कारण जाने की कोशिश की जाती है। एलर्जी का पता चलने के बाद सांस नली की सिकुडऩ दूर करने के लिए इन्हेलर और कुछ दवाइयां दी जाती है। अगर सीने में अधिक जकडऩ है तो नेबूलाइजर से कफ को कम किया जाता है ताकि मरीज को आराम मिले।

आयुर्वेद-
अस्थमा को आयुर्वेद में तमकश्वांस कहते हैं। यह कफ जनित रोग होता है। इसलिए पहले इसमें कुछ दवाइयां देकर वमन कर्म (उल्टी) कराया जाता है ताकि कफ बाहर निकल जाए। इसके बाद मरीज को खाने के लिए दवा दी जाती है। इनमें श्वांसकाथुर रस, श्वांस चिंतामणि, वासदी क्वाथ आदि दिया जाता है।

होम्योपैथी - लक्षणों के आधार पर होम्योपैथी में इलाज होता है। अस्थमा के मरीजों पर भी यही नियम लागू होता है। अगर कफ ज्यादा बन रहा है तो एंटोमोनियम टार्ट दिया जाता है जबकि सांस लेने में परेशानी होने पर एस्पीडोस्पेरमा क्यू और रात में सांस लेने पर समस्या आ रही है तो आर्सेनिक एल्बम 30 दी जाती है। लेकिन मरीज ये दवाइयां डॉक्टर की सलाह पर ही लें।



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बच्चों में दिखाई दें ये लक्षण तो हो सकती है ऑटिज्म की समस्या

लक्षण : ऑटिज्म को डवलपमेंटल डिसऑर्डर भी माना गया है। इसमें बच्चा अकेले खेलना, रहना और समय व्यतीत करना पसंद करता है। वह निर्जीव वस्तुओं के साथ ज्यादा समय बिताता है।

प्रमुख कारण -
मां की उम्र 35 और पिता की उम्र 40 से ज्यादा है। बच्चे के किसी भाई-बहन को यह बीमारी है। दूसरे जेनेटिक डिसऑर्डर या फिर बच्चे में पोषक तत्त्वों की कमी।

उपचार -
ऑटिज्म का इलाज एक टीम करती है जिसमें चाइल्ड स्पेशलिस्ट, चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट, ऑक्यूपेशनल थैरेपिस्ट, स्पेशल एजुकेटर और स्पीच थैरेपिस्ट होते हैं। इसमें सबसे कारगर बिहैवियर थैरेपी होता है।

डायग्नोसिस -
ऑब्जरवेशन और साइकोलॉजिकल टैस्टिंग से आटिज्म को डायग्नोज किया जाता है। चाइल्डहुड आटिज्म रेटिंग स्केल (कार्स) एक महत्त्वपूर्ण और सबसे ज्यादा उपयोग में लिया जाने वाला साइकोलॉजिकल टैस्ट है।

पेरेंट्स के लिए टिप्स -
यदि किसी को लगता है कि उनके बच्चे को ऑटिज्म जैसे लक्षण हैं तो चाइल्ड स्पेशलिस्ट या चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट से संपर्क करें। बच्चे को अधिक समय दें। उसे बाहर जाने और ज्यादा लोगों से मिलने को प्रेरित करें।



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NEW RESEARCH : कितने समय तक उपवास करना चाहिए?

उपवास 10-12 घंटे तक रखने से शरीर में एंटीऑक्सीडेंट्स रिलीज होते हैं। शरीर के आंतरिक अंगों को भी आराम की जरूरत होती है। ऐसे लोग जिन्हें किसी तरह की शारीरिक समस्या है वे बिना चिकित्सक की परामर्श के उपवास न करें, उन्हें दिक्कत हो सकती है।
क्या खाएं उपवास के दौरान
1- सप्ताह में एक दिन उपवास (10-12 घंटे) जरूरी है। इससे शरीर तेजी से कोशिकाओं का पुनर्निर्माण करता है।
2- व्रत के दौरान सुबह हल्का फलाहार लें। देर शाम हल्का सुपाच्य आहार लें। पूरे दिन पानी पी सकते हैं। शरीर से विषैले तत्व निकलेंगे।
3- शरीर दोष, धातु व मल से बना है। इसका समान अनुपात जरूरी है।
4- तीन शारीरिक दोष वात, पित्त, कफ, मानसिक दोष रज व तम हैं। व्रत से सम भाव में आते हैं।
सात धातुएं रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा व शुक्र समभाव में रहते हैं। मल, मूत्र व स्वेद (पसीना) संबंधी अंग सुचारु काम करते हैं।
5- बिना पचे दोबारा खाने से शरीर में जूसेज ग्लूकोज, एमीनोएसिड, ट्राइग्लिसराइड सही तरीके से नहीं बनने से आहार विषैले तत्व के रूप में काम करता है।
एक्सपर्ट : डॉ. दिनेश शर्मा, आयुर्वेद विशेषज्ञ, एसआर राजस्थान आयुर्वेद विवि, जोधपुर



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प्रेसबायोपिया: जानिए उम्र बढ़ने के साथ क्यों कमजोर होने लगती है पास की नजर

प्रेसबायोपिया यानी पास की नजर का कमजोर होना है। यह बीमारी उम्र के साथ होने वाले सामान्य बदलाव के कारण होती है जोकि 40 की उम्र के बाद देखने को मिलती है। हालांकि मोबाइल फोन और इसी तरह के अन्य गैजेट्स के इस्तेमाल करने से कई बार यह बीमारी उम्र से पहले ही नजर आने लगती है। इसमें नजर को पास में केंद्रित कर पाने में परेशानी होती है। खासकर छोटे अक्षरों और कम रोशनी में। शुरू में तो व्यक्ति मोबाइल या किताब को दूर कर पढ़ लेता है लेकिन बाद में दिखाई नहीं देता है।

कारण - इसका मुख्य कारण उम्र का अधिक होना है। यह बीमारी 40वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में आम है, लेकिन मोबाइल, कम्प्यूटर और टेबलेट्स के अत्यधिक इस्तेमाल से लोगों को जल्द ही चश्मा लग जाता है। एस्टीमैटिज्म (दृष्टिवैषम्य), नियरसाइटेडनेस (निकटदृष्टि दोष) और फारसाइटेडनेस (दूरदृष्टि दोष) के रूप में प्रेसबायोपिया में अंतर पाया जा सकता है, जो कि आंखों की पुतलियों के आकार से संबंधित है और आनुवांशिक व पर्यावरणीय कारणों से होते हैं।

लक्षण-इलाज - प्रेसबायोपिया के मरीजों को नजदीक का काम करने जैसे कढ़ाई या हाथों से लिखने पर सिरदर्द, आंखों पर दबाव या थकान महसूस होने लगता है। अगर बीमारी की पहचान शुरुआती चरण में हो जाती है तो दिनचर्या में कुछ बदलाव कर इसको नियंत्रित किया जाता है, लेकिन बीमारी बढऩे पर सर्जरी की जाती है। इसके लिए कंडक्टिव कैरेटोप्लास्टी या कॉर्नियल इन-लेज आदि सर्जरी की जाती है। इसमें नई तकनीक इंट्राऑक्यूलर लैंस और रिफे्रक्टिव लैंस एक्सचेंज भी है।

चश्मा - बायफोकल या प्रोग्रेसिव लैंस लगे चश्मे प्रेसबायोपिया में सुधार के लिए सबसे अच्छे होते हैं। बायफोकल का मतलब है, जिसमें दो फोकस होते हैं। चश्मे के लैंस का प्रमुख भाग दूरदृष्टि दोष के सुधार के लिए होता है जबकि लैंस का निचला हिस्सा निकट दृष्टि दोष के लिए होता है। प्रोग्रेसिव प्रकार के लैंस बायफोकल लैंस के समान होते हैं लेकिन उनके बीच कोई लकीर नजर नहीं आती। इसको पहन सकते हैं।

जांचें - इसकी जांच भी आंखों की दूसरी बीमारियों की तरह ही होती है। डॉक्टर, पहले आंखों में दवा डालकर पुतलियों को फैलाते हैं। इसके बाद तेज रोशनी में आंखों की जांच करते हैं। इस प्रक्रिया में करीब एक घंटे का समय लगता है। इसके अलावा भी डॉक्टर कुछ अन्य टैस्ट भी करवाते हैं।



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कंधे में तेज दर्द मतलब फ्रोजेन शोल्डर, जानें इसके बारे में

फ्रोजन शोल्डर किसे कहते हैं?

फ्रोजन शोल्डर को एडहिसिव कैप्सूलाइटिस भी कहते हैं। यह समस्या तब होती है जब लिगामेंट सूजकर मोटे हो जाते हैं। ये इतने कड़े हो जाते हैं कि इन्हें हिलाने-डुलाने में दिक्कत होती है। कंधे में तेज दर्द होता है। उस हिस्से में फ्ल्यूड भी जमा हो सकता है।

किन वजहों से ये स्थिति बनती है?
फ्रोजन शोल्डर के कई कारण हैं, जिनमें प्रमुख हैं-
कंधे की सर्जरी या चोट लगना, बढ़ती उम्र (फ्रोजन शोल्डर सिंड्रोम 40-70 साल के लोगों में अधिक होता है)। पुरुषों की तुलना में यह समस्या महिलाओं (मीनोपॉज के बाद ) में अधिक होती है। डायबिटीज, पर्किंसन, कार्डियोवॉस्क्युलर डिजीज, टीबी और स्ट्रोक आदि के मरीजों में इसका अधिक खतरा रहता है।

फ्रोजन शोल्डर के लक्षण क्या हैं?
कंधे को हिलाने-डुलाने में दर्द होना, सूजन और कड़ा होना। कई लोगों को रात में तेज दर्द होना, जिससे उन्हें नींद नहीं आती है।

इससे बचाव कैसे करें?
रोजाना कम से कम 30 मिनट एक्सरसाइज करें, इससे कंधों के साथ शरीर के जोड़ों में लचीलापन बना रहता है। कंधे में हल्का दर्द है तो एक्सरसाइज के साथ स्ट्रेचिंग करें। अगर हाथ का अधिक इस्तेमाल होता है तो विशेषज्ञ को दिखाकर विशेष एक्सरसाइज करें। साथ ही डॉक्टर के निर्देशों का पालन करें।

इसका उपचार कैसे होता है?
फ्रोजन शोल्डर का उपचार लक्षणों की गंभीरता के आधार पर किया जाता है। समस्या अधिक गंभीर नहीं है तो दर्द की दवा, स्टेरॉयड के इंजेक्शन और फिजियोथैरेपी से इलाज हो जाता है। गंभीर स्थिति में सर्जरी की जरूरत पड़ती है।



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New Research : उपवास से कई जटिल बीमारियां भी होती हैं दूर

खराब कोशिकाओं को शरीर खत्म करता है
शोध में यह बात सामने आई कि जो लोग कम खाते हैं उनका शरीर ज्यादा समय तक फिट रहता है, वहीं ज्यादा खाने वालों का शरीर पहले ढल जाता है। 12 घंटे तक कुछ न खाने वाले लोगों के शरीर में ऑटोफागी सफाई प्रक्रिया शुरू हो जाती है। जिससे शरीर खराब कोशिकाओं को खत्म करने लगता है। उसके स्थान पर शरीर नई कोशिकाओं का निर्माण करता है। शुरू में शरीर उपवास से परेशान होता है, लेकिन बाद में उसे भूखे पेट रहने की आदत पड़ जाती है।
जीवनशैली में बदलाव कर रह सकते सेहतमंद
गलत खानपान और खराब जीवनशैली की वजह से मोटापा तेजी से बढ़ रहा है। मोटापा से मेटाबॉलिक सिंड्रोम होता है जिससे फैटी लिवर, हाई ब्लड पे्रशर, हाई कॉलेस्ट्रॉल, हाइपर टेंशन, माइक्रो वैस्कुलर संबंधित बीमारियां होती हैं। जीवनशैली में बदलाव (लाइफ स्टाइल मॉडिफिकेशन) और मोटापा कम कर इन बीमारियों से बच सकते हैं। नियमित दिनचर्या व संतुलित खानपान जरूरी है। रात में समय पर सोना, सुबह उठने के दो घंटे के अंदर नाश्ता जरूरी है।

जानें...ऑटोफागी व शरीर कैसे करता है काम
प्रक्रिया : ऑटोफैगी दो शब्दों ऑटो व फैगी से मिलकर बना है। इसका अर्थ है स्वयं को खाना। 10-12 घंटे उपवास के दौरान कोशिकाएं शरीर की क्षतिग्रस्त व खराब कोशिकाओं को खुद ही खत्म करने लगती हैं। पोषक तत्वों के अभाव से शरीर उर्जावान रखने में मदद करती है। उम्र बढऩे की गति भी धीमी होती है।
ऐसे करती है काम : जब शरीर की कोशिकाएं इस प्रक्रिया को शुरू करती है तो मस्तिष्क अलर्ट मोड में रहता है। तनाव की स्थिति को कम करती है। हानिकारक जीवाणुओं से सुरक्षा करती है। इस प्रक्रिया के बाधित होने से पार्किंसन, डायबिटीज, पाचन संबंधी दिक्कते शुरू होने की आशंका बढ़ती है।

एक्सपर्ट : डॉ. एम वली, वरिष्ठ फिजिशियन, सर गंगाराम अस्पताल, नई दिल्ली



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जानिए सरसों के तेल के फायदे, एेसे करें इस्तेमाल

स्वस्थ दांत : दांत में दर्द होने पर सरसों के तेल में थोड़ा नमक डालकर दांतों और मसूढ़ों पर लगाएं। इससे दर्द के साथ मसूढ़ों से खून निकलना भी बंद हो जाता है।

कमरदर्द से राहत : सरसों के तेल में थोड़ी हींग, अजवाइन और लहसुन की कलियां मिलाकर गर्म करें। गुनगुना रह जाने पर इससे कमर पर मालिश करें।

दर्दनाशक गुण : कान में दर्द होने पर थोड़ा गुनगुना सरसों का तेल कान में डालें, दर्द से राहत मिलेगी। सरसों तेल में लहसुन की कलियां डालकर गर्म करें। गुनगुने तेल की 2 बूंद कान में डालें।
मजबूत बाल: सरसों के तेल से बालों में मालिश करने से बाल लंबे होने के साथ बालों का झड़ना बंद हो जाता है।

सरसों का तेल त्वचा पर लगाने से फायदा होता है। इसमें विटामिन ई पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। इसके सेवन से त्वचा को अंदरुनी पोषण तो मिलता है ही साथ ही इसे चेहरे पर लगाने से त्वचा की नमी भी बनी रहती है। जोड़ों के दर्द में सरसों के तेल की मालिश करना बहुत फायदेमंद होता है। सरसों के तेल के सेवन से अंदरुनी दर्द में भी आराम मिलता है।



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कच्चे केले के कटलेट से मिलेगी अतिरिक्त कैलोरी, एेसे करें सेवन

सामग्री: 4 कच्चे केले व एक उबला आलू मैश किया हुआ, एक छोटी चम्मच घिसी अदरक, एक कटी प्याज, एक चौथाई कप भुने व पिसे मूंगफली के दानें, एक चम्मच भुने तिल, 4 चम्मच ब्रेड को सुखाकर बना गया चूरा, 2 चम्मच ताजा हरा धनिया, एक चम्मच लाल मिर्च, स्वाद अनुसार नमक, तेल और चाट मसाला आदि सामग्री लें।

विधि : एक बाउल में केले, अदरक, प्याज, मूंगफली के दानें, ब्रेड का चूरा, तिल, स्वादानुसार नमक व लाल मिर्च डालकर तब तक मिलाएंं जब तक मिश्रण गुंथे आटे जैसा न हो जाए। मिश्रण की छोटी-छोटी लोई बनाकर कटलेट का आकार दें। दूसरी तरफ एक अलग पैन में तेल गर्म करें। इसमें कटलेट्स को हल्का भूरा होने तक धीमी आंच पर तब तक तलें जब तक ये कुरकुरे न हो जाएं। मिक्सी के जार में हरा धनिया, नमक, थोड़ी लाल मिर्च डालकर मिक्स कर लें। हरी चटनी तैयार होने के बाद कटलेट के साथ सर्व करें। कटलेट पर चाट मसाला डालकर खाएं।

पोषक तत्त्व: 100 ग्राम कच्चे केले से 89 कैलोरी ऊर्जा मिलती है।



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आंवला ठीक करेगा मुंह के छाले व पेट के रोग

मुंह में छाले की समस्या के कई कारण हैं। जैसे खाने में पोषक तत्त्वों की कमी और खराब जीवनशैली। ऐसे में आंवले से जुड़े घरेलू नुस्खे अपनाकर इसे दूर किया जा सकता है।

आंवला विटमिन-सी का प्रमुख स्त्रोत है। इसमें मौजूद विटामिन कभी खत्म नहीं होता। आंवले के रस में संतरे की तुलना में 20 गुना अधिक विटामिन-सी पाया जाता है।

मुंह के छाले होने पर यदि आंवले की पत्तियों को चबाया जाए, तो छालों में आराम मिलता है। आंवले के पत्तों का काढ़ा बनाकर मुंह में कुछ देर रखने या दिन में 2-3 बार कुल्ला करने से ये ठीक हो जाते हैं।

पेट में जलन, एसिडिटी या डायरिया की समस्या है तो बस एक आंवला ले लीजिए। या फिर एक ग्राम आंवला पाउडर में थोड़ी चीनी मिलाकर पानी या दूध के साथ ले लें तो काफी आराम मिलता है।

आंवला और छोटी पीपली का चूर्ण शहद के साथ चाटने से हिचकियां रोकी जा सकती हैं। पेशाब में जलन होने पर आंवले का रस शहद में मिलाकर ले सकते हैं।



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जानिए मोटापाग्रस्त बच्चों का तेजी वजन घटाने का फॉमूला

बच्चों में मोटापा बढऩे के पीछे प्रमुख वजह खेलकूद में रुचि की कमी और फास्टफूड व जंकफूड खाने की आदत है। ऐसे बच्चों में सामान्यत: 10 से 15 साल की उम्र में उनका बॉडी फैट बढऩे लगता है। अधिकतर बच्चे मोबाइल, टीवी, विडियो गेम के साथ गुजारते हैं। इसके चलते शारीरिक गतिविधि नहीं हो पाती है। इससे बच्चे की लम्बाई बढऩा समय से पहले रुक जाती है।
थोड़ा काम करने में थकते
फैटी बच्चों का शारीरिक व मानसिक विकास ठीक से नहीं होता है। ऐसे बच्चे सीढिय़ां चढऩे में हांफने लगते हैं। जल्द थक जाते हैं। लड़कियों में समय से पहले पीरियड्स शुरू हो जाता है। ओवरी में झिल्लियां बन जाती हैं, जिससे पीसीओडी की समस्या शुरू हो जाती है। ऐसे बच्चे ज्यादा भावुक और अवसाद ग्रस्त होते हैं।
जानें क्या है फॉर्मूला
मोटापे से ग्रस्त बच्चों को फिट रखने के लिए माता-पिता को फाइव टू जीरो फॉर्मूले का प्रयोग करना चाहिए। इससे बच्चा धीरे-धीरे फिट हो जाएगा।
5 मौसमी सब्जियां व फल बच्चों को नियमित खाने के लिए देना चाहिए।
2 घंटे से ज्यादा टीवी व मोबाइल चलाने के लिए न दें।
1 घंटे से ज्यादा नियमित एक्सरसाइज करें और खेलें।
0 किसी तरह का सॉफ्ट ड्रिंक बच्चों को पीने के लिए न दें।
एक्सपर्ट : डॉ. कनक रमनानी, पीडियाट्रिशन, भीमराव अंबेडकर मेमोरियल हॉस्पिटल, रायपुर



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Sunday, 28 July 2019

मिट्टी के लेप से दूर होंगे शरीर के कई रोग

आयुर्वेद के अनुसार मिट्टी को रोगों के इलाज में कारगर माना गया है। मिट्टी में कई ऐसे तत्त्व पाए जाते हैं जो विभिन्न रोगों के कारक को पहचानकर उस पर असर करते हैं। यह शरीर के विषैले तत्त्वों को अवशोषित कर बाहर निकालती है और शरीर को राहत पहुंचाती है।

त्वचा और बाल -
बढ़ती उम्र का प्रभाव और देखभाल के अभाव में चेहरे पर आई झुर्रियों को दूर करने के लिए मिट्टी को प्रयोग में ले सकते हैं। इसे थोड़े पानी में भिगोकर चेहरे या शरीर के अन्य बाहरी हिस्से पर लेप की तरह लगा सकते हैं। इससे त्वचा को नमी मिलती है और रक्तसंचार में सुधार होता है।
इन रोगों में फायदा : रूखी त्वचा के अलावा चेहरे पर आए दानें, फुंसियों, कमजोर बाल व रूसी में कारगर है।

तेज दिमाग-
मिट्टी का ठंडा प्रभाव दिमाग को ठंडक पहुंचाकर तंत्रिका तंत्र को सक्रिय करता है। इससे दिमागी बुखार में भी लाभ होता है। इसके लिए माथे पर कुछ समय के लिए इसका लेप लगा सकते हैं। दिमाग में यदि गर्मी महसूस होती है तो सिर पर इसे पूरी तरह से लगा सकते हैं।
इन रोगों में फायदा : दिमाग की कमजोरी, तनाव, अवसाद और मूड डिसऑर्डर में यह फायदेमंद है।

अपच -
लेप की तरह थोड़े पानी सहित मिट्टी को शरीर के विभिन्न हिस्सों पर बाहरी रूप से 20-30 मिनट लगाने से शरीर का तापमान सामान्य होता है। इस कारण अपच की समस्या में राहत मिलती है। पेट के निचले भाग में इसे कुछ समय लगाने से पेट की लाइनिंग को ठंडक का अहसास होता है जिससे पाचनतंत्र से जुड़ी समस्या दूर होती है।
इन रोगों में फायदा : पेट के आसपास आराम पहुंचने से कब्ज और दस्त की समस्या में राहत मिलती है। इसके अलावा आंतों में हो रही रुकावट और मरोड़ दूर होती है। विभिन्न तरह के बैक्टीरियल और वायरल इंफेक्शन से भी बचाव होता है।

सेहतमंद आंखें -
बंद आंखों पर गाढ़ा मिट्टी का लेप ठंडक देने के साथ आराम देता है। कुछ समय निकालकर इस मड थैरेपी को खासतौर पर आंखों के लिए इस्तेमाल करना किसी मेडिटेशन से कम नहीं है। इसके लिए आंखों को अच्छे से बंद कर 10-15 मिनट के लिए इस लेप को लगाएं और इस दौरान बॉडी को रिलैक्स रखें।
इन रोगों में फायदा : कंजक्टिवाइटिस, एलर्जी, खुजली, आंखों में जलन की स्थिति में बेहद फायदेमंद है। साथ ही यह थैरेपी आंखों में तनाव को कम कर ग्लूकोमा रोग से बचाव करती है।



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रोज 5 मिनट करें ये योगासन, नहीं होगी कोई बीमारी

बिगड़ी जीवनशैली और गलत आदतें रोगों को बढ़ा रही हैं। पीठदर्द, माइगे्रन, थायराइड, डायबिटीज जैसी लाइफस्टाइल डिजीज के मामले बढ़ रहे हैं। ज्यादातर बीमारियों को दूर करने में कुछ योगासनों काफी फायदेमंद हैं। रोजाना इन आसनों को 5 मिनट किया जाय तो राहत मिल सकती है।

पीठदर्द -
ये है कारण-
मांसपेशियों में खिंचाव, उठने-बैठने का तरीका गलत होना, प्रेग्नेंसी के बाद या जरूरत से अधिक श्रम करना।

हलासन -
जमीन पर पीठ के बल लेट जाएं व दोनों हथेलियों को जमीन पर रखें। दोनों पैरों की एडिय़ों व पंजों को मिलाकर रखें। दोनों पैरों को धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठाते हुए 90 डिग्री का कोण बनाते हुए सिर के पीछे ले जाएं और पैरों को बिल्कुल सीधा रखें। हाथों को जमीन पर सटाकर रखें और घुटनों को माथे पर सीधा रखें, मोड़ें नहीं। 1-2 मिनट तक इसी स्थिति में रहते हुए सांस लें और छोड़ें। धीरे-धीरे पूर्व स्थिति में आ जाएं, पूर्व स्थिति में आते समय घुटनों को सीधा रखें।

 

ये भी आसन फायदेमंद-
त्रिकोणासन, पश्चिमोत्तासन, सुप्त वक्रासन, सेतु बंधासन, भुजंगासन।
ये भी आजमाएं-
सरसों के तेल को गर्म करके 8-10 लहसुन की कलियों डालकर पका लें। इस तेल को छानकर ठंडा कर पीठ की 10-15 मिनट तक मालिश करें।

माइगे्रन के लिए -
ये है कारण -
नींद की कमी, तनाव, शरीर में पोषक तत्त्वों की कमी, अल्कोहल अधिक लेना, व एलर्जी।
अनुलोम-विलोम प्राणायाम करें -
सुखासन में बैठ जाएं, कमर बिल्कुल सीधी रखें। अनामिका और कनिष्का से बाईं नाक को बंद करें दाईं नाक से सांस लें। अब अंगूठे से दाईं नाक बंद करें। बाईं नाक से सांस निकाल लें। कुछ क्षण रुकें। दाईं नाक से सांस निकाल दें। कुछ क्षण रुकें। दोबारा दाईं नाक से सांस लें। सांस को धीरे-धीरे अंदर लें और बाहर छोड़ें। यह प्रक्रिया 10 मिनट तक दोहराएं।
ये भी आसन फायदेमंद - भुजंगासन और ब्रह्ममुद्रा।
ये भी आजमाएं -
आधा गिलास पालक और आधा गिलास गाजर का रस मिलाकर पीएं। ।

 

डायबिटीज के लिए -
ये हैं कारण -
गलत जीवनशैली, खान-पान में गड़बड़ी, तनाव, वंशानुगत, मोटापा और बढ़ती उम्र।
नौकासन करें -
जमीन पर सीधे लेट जाएं। सिर व कंधों को ऊपर उठाएं। फिर पैरों को भी सीधा उठाएं। हाथ-पैर और सिर समांतर रखें। कुछ क्षण इसी स्थिति में रहें फिर धीरे-धीरे पूर्वावस्था में आ जाएं। इस प्रक्रिया को 3-4 बार दोहराएं।
ये भी आसन फायदेमंद -
हलासन, बालासन, शवासन।
ये भी आजमाएं -
सुबह खाली पेट आधा कप करेले का जूस पीएं। नियमित तौर पर गुनगुना दूध लें।

सर्दी-जुकाम -
ये है कारण -
गलत खानपान और लाइफस्टाइल, विपरीत तापमान में अधिक समय तक रहना, वायरस, अचानक मौसम में बदलाव।
सर्वांगासन करें-
पीठ के बल लेट जाएं। दोनों हाथों को जमीन पर रखें। सांस लेते हुए पैरों को धीरे-धीरे ऊपर उठाएं। पैरों को ऊपर उठाते हुए हाथों से कमर को सपोर्ट दें। पैरों को 90 डिग्री या 120 डिग्री पर ले जाकर हाथों को उठाकर कमर के पीछे लगाएं। पैरों को मिलाकर सीधा करें। थोड़ी देर रुकें फिर पूर्व अवस्था में आ जाएं।
ये भी आसन फायदेमंद
शवासन, मकरासन, धनुरासन।
ये भी आजमाएं -
कप पानी में एक टेबलस्पून हल्दी पाउडर, 3-4 तुलसी के पत्ते डालकर 10 मिनट तक उबालें। इसमें एक टी स्पून शहद व नींबू का रस मिलाकर पीएं।



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शरीर के हिसाब से बनाए डाइट प्लान, जानें ये खास बातें

सेहतमंद रहने के लिए सबसे पहली जरूरत है अच्छा खानपान क्योंकि यह शरीर में ईंधन की तरह काम कर हमें ऊर्जा देता है। ऐसे में जरूरी है कि आहार शरीर के मुताबिक ही लिया जाए। शरीर की तासीर के अनुसार भोजन लेने से सेहत दुरुस्त रहने के साथ रोगों की आशंका भी कम हो जाती है। ऐसा ही एक पैमाना है बीएचई यानी बॉडी हीट इंडेक्स। यह जानना जरूरी है कि आपकी बॉडी का टाइप क्या है यानी ये गर्म है या ठंडी तासीर वाला। बीएचआई यानी शरीर में गर्मी के सूचकांक में बदलाव से बेचैनी और चिड़चिड़ापन की दिक्कत होती है।

क्या है बीएचआई-
बीएचआई वातावरण की आर्द्रता से शरीर की तुलना कर शरीर के तापमान की जानकारी देता है। यदि आपके शरीर का तापमान औसत (98.3 डिग्री फॉरेनहाइट) से कम है तो आपका हीट इंडेक्स लो यानी निम्न है और औसत अधिक है तो उच्च है।

ऐसा हो डाइट प्लान -
सबसे जरूरी है कि शरीर की तासीर व मौसम के अनुसार डायट प्लान बनाना चाहिए। इसके लिए ठंडी और गर्म चीजों के बारे में पहले जान लें-

बीएचआई इससे होती प्रभावित -
वैक्सीनेशन, स्टीरॉयड, गर्भावस्था, पीरियड्स, लंबी दूरी की यात्रा करने और तनाव।

पपीता : विटामिन ए, बी और सी युक्त पपीते का रस प्रोटीन को आसानी से पचाता है। गर्म प्रकृति का होने के कारण गर्भवस्था में महिलाओं को इससे परहेज करने की सलाह दी जाती है।
लाल मिर्च : यह शरीर की संचार प्रणाली को दुरुस्त रखने के साथ बॉडी के हर हिस्से में रक्त और पोषक तत्त्व पहुंचाने में मदद करता है। इसे अधिक न लें वरना गैस्ट्रिक प्रॉब्लम हो सकती है।
अंडा : यह गर्म माना जाता है। एक अंडा रोजाना खाना सेहत के लिए फायदेमंद है लेकिन इससे अधिक लेने पर दिक्कत हो सकती है।
नट्स : ये ऊर्जा के अच्छे स्त्रोत हैं। कोलेस्ट्रॉल-फ्री होने के कारण ये सेहतमंद रखते हैं। लेकिन इन्हें खाली पेट न लें वरना गैस्ट्रिक प्रॉब्लम हो सकती है। जो हायपर इंडेक्स को बढ़ाता है।

ठंडे खाद्य पदार्थ-
ककड़ी : यह शरीर को ठंडा रखती है। इसमें फाइबर प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। जो पेट साफ रखने के साथ दिमाग को शांत रखता है।
तरबूज : पोटैशियम से भरपूर तरबूज पित्तकारक, क्षारयुक्त, गर्म, वात व कफ शामक होता है जो बीपी कंट्रोल करता है। गर्मी में यह शरीर में पानी की कमी पूरी कर कई बीमारियों से दूर रखता है। इसका रस लू से बचाता है। चेहरे पर फुंसी हो तो तरबूज लगाने से लाभ मिलता है।
दही : दही एक पूर्ण भोजन है। इसमें सभी तरह के पौष्टिक तत्त्व होते हैं। इसे नियमिततौर पर खाने से पेट से जुड़ी परेशानियों से भी राहत मिलती है।
पालक : इसे रक्तशोधक भी कहते है। आयरन से भरपूर पालक शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के साथ गर्मी में नजला और सीने की जलन दूर करती है।



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जानिए आर्थराइटिस से जुड़े भ्रम और उनकी सच्चाई

आर्थराइटिस वैसे तो करीब 100 तरह का होता है लेकिन मूल रूप से ये दो तरह का का होता है। ओस्टियो-आर्थराइटिस में शरीर का वजन संभालने वाले जोड़ों जैसे कूल्हे, कमर (मेरुदण्ड) और घुटनों में जकडऩ, दर्द और सूजन की समस्या होती है जबकि रुमेटाइड आर्थराइटिस में हाथों, कलाइयों और कोहनियों जैसे नाजुक जोड़ों में सूजन और दर्द होता है। आर्थराइटिस को लेकर लोगों में कई तरह की भ्रांतियां फैली हुई हैं, जिनका निदान जरूरी है। जानते हैं इससे जुड़े भ्रम और सच-

भ्रम : बढ़ती उम्र का रोग है आर्थराइटिस
सच : उम्र बढऩे पर इस रोग के बढऩे की आशंका बढ़ जाती है लेकिन यह सिर्फ वृद्धावस्था में ही होता है, यह जरूरी नहीं। युवाओं में भी इसके मामले देखने को मिलते हैं।

मिथ : एक्स-रे से आर्थराइटिस का पता चल जाता है।
सच : एक्स-रे आर्थराइटिस के मामले में भरोसेमंद टेस्ट नहीं माना जा सकता। कई बार मरीज दर्द की शिकायत करता है फिर भी एक्सरे में कुछ नहीं सामने आता इसलिए इसके लक्षणों व दूसरी जांचों पर ही भरोसा करना चाहिए।

मिथ : सिरका पीने से दर्द कम होता है ।
सच : यह बात गलत है। इससे न तो दर्द कम होता है और न ही रक्त का पीएच लेवल बदल सकता है।

मिथ : गर्म और शुष्क मौसम में आर्थराइटिस की समस्या नहीं होती।
सच : हो सकता है कि गर्म और शुष्क मौसम में आपको लक्षणों में कुछ राहत मिल जाए लेकिन शोध बताते हैं कि जल्दी ही ये लक्षण फिर से सामने आते हैं।

मिथ : अंगुलिया चटकाने से आर्थराइटिस होता है।
सच : शोध में भी ऐसा नहीं पाया गया है। इससे सिर्फ जोड़ों के बीच मौजूद लिक्विड की गैस रीलीज होने पर आवाज आती है बशर्ते जबरदस्ती न दबाया जाए।



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बाइपोलर डिसऑर्डर : अचानक अधिक खुश होना या अवसाद में चले जाना

अक्सर बहुत ज्यादा खुश हो जाना या कभी-कभी अचानक अवसाद में चले जाना बाइपोलर डिसऑर्डर के लक्षण हैं। इसका इलाज संभव है। कुछ बातों का ध्यान रखकर इससे बचा जा सकता है।

लक्षण दिखें तो हों सावधान-
बहुत ज्यादा खुश रहने पर पैसे बांटना।
हर पल गाना सुनते रहना।
बहुत ज्यादा दोस्त बनाना, जल्दी-जल्दी बात करना, रात-रातभर जागना, अपने से छोटों पर रौब झाडऩा और उन्हें मारना-पीटना।
किसी भी बात पर ध्यान न लगाना।

कारण-
इस बीमारी का कारण कोई निश्चित नहीं होता है। जेनेटिक, न्यूरोट्रांसमीटर इम्बैलेंस, एब्नॉर्मल थायरॉयड फंक्शन, स्टे्रस का हाई लेवल भी इसका कारण बन सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस बीमारी से पीडि़त व्यक्ति नॉर्मल लाइफ जी सकता। ऐसे लोग नॉर्मल और फैमिली लाइफ एंजॉय करते हैं।

क्या है बाइपोलर डिसऑर्डर -
बाइपोलर डिसऑर्डर में दो तरह की स्थिति होती है। एक उदासी और दूसरा खुश होने पर व्यक्ति इतना डिप्रेशन में चला जाता है कि आत्महत्या जैसी खतरनाक कोशिश भी कर बैठता है। खुश और दुखी होने पर रोगी कुछ भी कर सकता है। इसका असर हफ्तों, महीनों या सालों तक रह सकता है।

इलाज - बाइपोलर डिसऑर्डर का इलाज संभव है। इसके लिए मनोचिकित्सक को दिखाएं। ज्यादातर मामलों में दवाओं से पीडि़त को राहत मिल जाती है।
कई बार पर्याप्त नींद लेने के लिए कहा जाता है।
दवाइयों के साथ मनोचिकित्सक कुछ थैरेपी लेने की सलाह देते हैं।



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जलवायु परिवर्तन से उपजा घातक फंगल

कैंडिडा ऑरिस नाम का फंगल एक बार फिर वैश्विक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन गया है। साल 2009 में पहली बार वैज्ञानिकों ने इसे खोजा था। यह फंगल कमज़ोर प्रतिरक्षा प्रणालियों वाले 30 से 60 फीसदी रोगियों के लिए जानलेवा है। 30 से ज्यादा देशों में इसके लिए चेतावनी जारी की गई है। इस फंगल को विशेष प्रयोगशाला में परीक्षण के पहचानना कठिन है। इस पर किसी एंटी फंगल दवा का भी असर नहीं होता।

वैज्ञानिकों ने पाया कि यह घातक कवक उच्च तापमान में भी विकसित हो सकता है। भारत, दक्षिण अफ्रीका और दक्षिण अमरीका में इसके संक्रमित ज्यादा हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि एंटी फंगल दवाओं का अधिक उपयेाग और कीटनाशक दवाओं का इस्तेमाल इसके लिए जिम्मेदार हैं। 12 जुलाई तक इसके 716 मामले सामने आ चुके हैं। वैज्ञानिक ग्लोबल वॉर्मिंग को भी इस कवक के लिए उत्तरदायी मान रहे हैं।

वैज्ञानिकों ने पाया कि यह घातक कवक अब उच्च तापमान वाले वातावरण में भी विकसित हो सकता था। वैज्ञानिक इस बात से भी हैरान हैं कि यह कवक तीन अलग-अलग महाद्वीपों में अलग-अलग स्वरूपों में पहचाना गया। ऐसा शायद इसलिए संभव हो सका कि जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के इतर दुनिया भर के देशों में तापमान में लगातार वृद्धि हो रही है। भारत में तो तामान और भी ज्यादा असर दिखा रहा है। कैसेडवॉल का मानना है कि यह शोध आगे के अनुसंधान के लिए एक नई दिशा प्रदान करेगा।



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New Research : मसूड़े खराब होने का जीन्स से है संबंध

मसूड़ों के खराब होने के पीछे जीन्स भी जिम्मेदार होते हैं। ब्रिटेन में यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल में यह शोध किया गया। नेचर कम्युनिकेशन में प्रकाशित शोध में बताया गया है कि दो लोग जो एक जैसा खाना खाते हैं। मुंह, दांत व मसूड़ों की साफ-सफाई भी एक समान रखते हैं लेकिन दोनों के दांतों, मसूड़ों में अलग-अलग बीमारी हो सकती है। इसके लिए एक शोध किया गया। इस शोध में नौ अंतरराष्ट्रीय क्लिनिकल अध्ययन के आंकड़े हैं। इस शोध में 62,000 लोगों को शामिल किया गया। शोध में ऐसे 47 जीन्स की पहचान की गई जो दांतों व मसूड़ों को खराब करते हैं।
एक्सपर्ट कमेंट
पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं में दांतों व मसूड़ों संबंधी दिक्कतें ज्यादा होती हैं। एक उम्र के बाद मसूड़ों के टिश्यू व हड्डियां कमजोर होने लगती है। दांतों के इनेमल खराब करने वाली चीजें न लें। इसका संबंध दांतों, मसूड़ों की देखभाल से नहीं बल्कि जीन्स में एक समय बाद आने वाली म्यूटेशन से पडता है।
डॉ. विशाल गुप्ता, एसोसिएट प्रोफेसर, एसएमएस मेडिकल कॉलेज, जयपुर



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रिसर्च : सावधान, आपका बच्चा भी ज्यादा जंकफूड तो नहीं खाता

जंक फूड के ज्यादा प्रयोग से बच्चों में फूड एलर्जी का खतरा ज्यादा होता है। उनकी याद्दाश्त में भी कमी आती है। यूनिवर्सिटी ऑफ नेपल्स फेडरिक (इटली) में 6 से 12 साल की उम्र के 61 बच्चों पर यह अध्ययन किया गया। ज्यादा प्रयोग से एडवांस्ड ग्लाइकेशन एंड प्रोडक्ट्स की मात्रा बढ़ जाती है। इससे तीन तरह की एलर्जी होती है। पहला फूड एलर्जी, दूसरी सांस संबंधी व तीसरा हैल्थ रिकवरी में देरी होती है। माइक्रोवेव में बने फूड, बारबेक्यू, ज्यादा नमक, चीनी युक्त फूड एलर्जी के लिए जिम्मेदार पाए गए।
एक्सपर्ट कमेंट
जंकफूड में पिजर्वेटिव और कई तरह के साल्ट होते हैं। शरीर में अधिकता होने पर यह एलर्जी को बढ़ाते हैं। ज्यादा खाने वालों में अस्थमा, एग्जिमा, खुजली व आंखों से पानी आने की समस्याएं होती हैं। इससे बचने के लिए एंटीऑक्सीडेंट युक्त फल व सब्जियां खानी चाहिए। इसके अलावा इसका दुष्प्रभाव पाचन और फिटनेस पर पडता है। ज्यादा खाने वाले बच्चों में मोटापा तेजी से बढता है।
एक्सपर्ट : डॉ. विशाल गुप्ता, एसोसिएट प्रोफेसर, एसएमएस मेडिकल कॉलेज, जयपुर



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शरीर को ताजगी और ऊर्जा देता है तरबूज

तरबूज शरीर को ताजगी और ऊर्जा से भर देता है। इसमें 97प्रतिशत पानी होता है जो शरीर में पानी की पूर्ति करता है। तरबूज में पाया जाने वाला पोटेशियम रक्त में कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम कर हृदय स्वस्थ रखता है।

इसमें विटामिन ए, सी, बी-6 और मिनरल होते हैं जो शरीर मेें विभिन्न रोगों से लडऩे की क्षमता को बढ़ा देते हैं।
इसमें मौजूद नेचुरल डिटॉक्सिफाइंग एजेंट, पानी और मिनरल शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालकर किडनी को स्वस्थ रखने में मददगार हैं

रात में न खाएं-
रात के समय पाचनतंत्र धीमा हो जाता है। तरबूज खाने पर इसमें मौजूद एसिड इसे पचने नहीं देता जिससे पेट संबंधी दिक्कतें होती हैं।

कई शोधों के मुताबिक तरबूज में लाइकोपीन अधिक होता है। जो वजन कम करना चाहते हैं वे पोषक तत्त्वों से भरपूर तरबूज खा सकते हैं। यह फल दिल के रोगों से दूर रखने के साथ किडनी को स्वस्थ बनाता है और बीपी कंट्रोल रखता है। अगर आपको कुछ मीठा खाने का मन करे तो तरबूज खा सकते हैं।



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अनानास का हलवा भी बनाएगा सेहतमंद, जानें इसे बनाने का तरीका

अनानास को कच्चा खाने के अलावा जूस बनाकर पीना फायदेमंद होता है। आप चाहें तो इसका हलवा भी बना सकते हैं।

सामग्री: एक मध्यम आकार का अनानास (छिल्का उतरा हुआ), केसर की 5-6 कतरनें, चार चम्मच देसी घी, बारीक कटे बादाम, काजू, पिस्ता, आधा कप खोया।

पोषक तत्त्व: मध्यम आकार के अनानास से लगभग 100 कैलोरी ऊर्जा मिलती है। इस हलवे से विटामिन-सी, डाइट्री फाइबर, विटामिन-बी6 और आयरन की पूर्ति होती है।

विधि : अनानास को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर एक पैन में दो चम्मच घी डालकर उसमें पकाएं। इसके बाद इसमें चीनी डाल दें। पूरे मिश्रण को अच्छे से चमचे से चलाते रहें। इस दौरान ध्यान रखें कि अनानास नरम होने तक अच्छे से पके और कच्चा न रह जाए। फिर एक अलग पैन में बचा हुआ घी गर्म कर इसमें सभी सूखे मेवे डालकर धीमी आंच पर पकने दें। हल्का भूरा होने के बाद इसे अनानास के मिश्रण वाले पैन में डालकर मिक्स करें। थोड़ा पकने के बाद इसमें खोया मिलाएं। जब तक खोया अच्छे से मिक्स न हो जाए तब तक पकाते रहें। यदि मिश्रण ज्यादा गाढ़ा हो गया है तो थोड़ा दूध मिला सकते हैं। एक बाउल में डालकर बारीक कटे सूखे मेवे से गार्निश करें।



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रीसर्च एंड एक्सपर्ट कमेंट : मीठे ज्यूस से बढता है कैंसर का खतरा

क्या है शोध :

शोधकर्ताओं ने 97 विभिन्न प्रकार के पेय पदार्थों और कृत्रिम रूप से मिठास वाली 12 ड्रिंक का अध्ययन में पाया कि इसमें प्रयुक्त शुगर आंतों में फैट, ब्लड शुगर के स्तर और सूजन को तेजी से बढ़ा सकती है। इसके पीछे सोडा और फलों में कीटनाशकों का प्रयोग को भी वजह बताया है। सॉफ्ट ड्रिंक और कैंसर के बीच संबंध का पता लगाने वाली यह पहली रिसर्च है। पेय कंपनियां कम या बिना शुगर, पैकेज के आकार और स्पष्ट कैलोरी वाली जानकारी के साथ अधिक विकल्प प्रदान करने के लिए काम कर रही हैं। इसके अलावा उसमें प्रयुक्त तत्वों के बारे में जानकारी देने से बचती हैं।
एक्सपर्ट कमेंट
इस तरह के ड्रिंक हाई कैलोरी व शुगर वाले होते हैं। इसमें कार्सिनोजेनिक और प्रिजर्वेटिव भी होता है। यह सेहत के लिए नुकसानदेय होते हैं। यह दांतों, आंतों को नुकसान पहुंचाते हैं। माइग्रेन, याददाश्त में कमी, इमोशनल डिसऑर्डर, सांस लेने में दिक्कत हो सकती है। यह शरीर में टॉक्सिंस को भी बढ़ाते हैं। इसे पीने से बचना चाहिए।

एक्सपर्ट : डॉ. विशाल गुप्ता, एसोसिएट प्रोफेसर, एसएमएस मेडिकल कॉलेज, जयपुर



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हाजमा बढ़ाता, मोटापा घटाता है मैंथी दाना

जोड़ों में दर्द होने व सूजन आने के कारण परेशानी बढती है, जिससे बहुत ज्यादा दर्द होता है। इसका दर्द या फिर आर्थराइटिस कहा जाता है। इसके लिए मैंथी दाना बहुत असरकारी है। इसका नियमित प्रयोग जरूरी है। शोधों में भी साबित हो गया है कि यह हार्ट की धमनियों में रुकावट से बचाने में सक्षम है। दिल का दौरा पड़ने या ऑक्सीडेटिव तनाव को बढने से रोकते हैं। इसके बीच शरीर में रक्त प्रवाह को संतुलित रखते हैं, जिस कारण धमनियों में किसी भी प्रकार की रुकावट पैदा नहीं होती है।

डायबिटीज : दाना मैंथी रात में भिगोकर सुबह खाली पेट चबाकर खाएं। बचे पानी को खाली पेट पीने से डायबिटीज नियंत्रित रहती है। गेलेक्टोमैनन फाइबर खून में ग्लूकोज के अवशोषण को कम करता है। शरीर का ब्लड शुगर लेवल नियंत्रित होता है।
एसिडिटी : एसिडिटी हो तो एक गिलास मैंथी का पानी नियमित सुबह खाली पेट पीएं। अपच, जलन में भी आराम मिलता है।
सर्दी-जुकाम : मेथी में एंटी बैक्टीरियल तत्व सर्दी-जुकाम, वायरल बुखार से बचाते हैं। शरीर में मौजूद बैक्टीरिया को खत्म करता है।
मोटापा : मैंथी में फाइबर की प्रचुर मात्रा होने से देर तक भूख नहीं लगती है। पेट भरा रहता है। इससे भूख नहीं लगती है और वजन कम होता है।



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इन आदतों से भी कमजोर होती हैं हड्डियां, जानें इनके बारे में

अक्सर सुनने में आता है कि हड्डियों में कमजोरी सिर्फ विटामिन-डी और कैल्शियम की कमी से आती है। लेकिन इनके अलावा हड्डियां कमजोर होने के अन्य कारण भी हैं जिससे हड्डियां कमजोर हो जाती हैं। आइये जानते हैं इनके बारे में-

धूम्रपान : सिगरेट, बीड़ी, हुक्का, चिलम आदि ज्यादा पीने से हड्डियों के ऊत्तकों को नुकसान होता है और नए ऊत्तक जल्दी नहीं बन पाते। इससे हड्डियां जल्दी कमजोर होने लगती हैं।

शराब की लत : शराब आदि नशें की चीजों का अधिक सेवन से शरीर में कैल्शियम ग्रहण करने की क्षमता घटती है। ऐसे में हड्डियों में कैल्शियम घट जाता है और हड्डियां कमजोर होने लगती हैं।

अधिक कॉफी या चाय: इनमें कैफीन होता है जो हड्डियों में मौजूद कैल्शियम का स्तर घटाता है। साथ ही हड्डियों को धीरे-धीरे खोखला कर इन्हें कमजोर करता है।

अनियंत्रित दवाओं का प्रयोग : ऑर्थराइटिस, अस्थमा जैसे रोगों की कई दवाएं लंबे समय तक लेते रहने से हड्डियों को नुकसान पहुंचता है।



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बच्चों के लिए क्यों जरूरी है हैल्दी टिफिन

फास्ट फूड-जंक फूड खाना ज्यादा पसंद है। पौष्टिक चीजों से शरीर की रोग प्रतिरोधकता मजबूत होती है। बीमारियों, मोटापा, कमजोर हड्डियां से बचेंगे। तीन आहार (ब्रेकफास्ट, लंच व डिनर) के बीच में दो हैल्दी स्नैक्स देना चाहिए।
शारीरिक, मानसिक विकास होता है बाधित
बच्चों की आयु के अनुसार उनका शारीरिक विकास जरूरी है। एक से पांच साल के बच्चे का प्रतिवर्ष दो किलोग्राम तक बढऩा चाहिए। इसके बाद बच्चों की मांसपेशियां, हड्डियां तेजी से विकसित होती हैं। 6 से 15 वर्ष तक सामान्यत: एक से डेढ़ किलो तक वजन बढऩा चाहिए। कम वजन वाले बच्चों का शारीरिक व मानसिक विकास बाधित होता है। उसमें एकाग्रता, गतिविधि व रोग प्रतिरोधकता कमजोर होती है।
ये पोषकतत्व भूरपूर दें
कार्बोहाइड्रेट : कार्बोहाइड्रेट शरीर में ईंधन का काम करता है। यह शरीर को ताकत देने वाला सबसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व है। फैट से भी ऊर्जा मिलती है। ये तीन प्रकार का होता है। अन सैचुरेटेड फैट बैड कॉलेस्ट्रॉल को कम करता है। ज्यादा सैचुरेटेड फैट से हृदय संबंधी समस्याएं व कॉलेस्ट्रॉल बढ़ता है।
प्रोटीन - प्रोटीन शरीर के बिल्डिंग ब्लॉक कहलाता है। यह मांसपेशियों के उत्तकों को बनाने, रखरखाव व मरम्मत करने में मदद करता है। बच्चों को प्रोटीन की जरूरत सामान्य लोगों से दोगुनी जरूरत होती है। दूध, डेयरी प्रोडक्ट, टोफू, दालें, अंडे, मछली व मांस का प्रयोग कर सकते हैं। इसमें प्रोटीन प्रचुर मात्रा में मिलता है।
विटामिन और खनिज - विटामिन और खनिज शारीरिक व मानसिक विकास में मदद करते हैं। आयरन और कैल्शियम बच्चों के लिए बहुत आवश्यक पोषक तत्व हैं। हड्डियां व दांत मजबूत करने के लिए कैल्शियम की जरूरत होती है। दूध और दूध से बने पदार्थ, हरी पत्तियों वाली सब्जियों में कैल्शियम का प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।
एक्सपर्ट- डॉ. अजय दानी, मेडिकल सुपरिन्टेंडेंट एंड चाइल्ड स्पेशलिस्ट एम्स रायपुर



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LUNCH BOX : बच्चों को टिफिन के लिए सप्ताह के लिए ये सात दिन हैल्दी मैन्यू दें

7 दिन के 7 मैन्यू

अब टेंशन नहीं...झटपट बना सकते हैं बच्चों को सुबह टिफिन में क्या दें जो बच्चे के लिए सेहतमंद व पसंद की भी हो, यह दिक्कत हर मां को होती है। इसके लिए सप्ताहभर का मैन्यू है जो स्वाद के तड़के के साथ सेहत भी देगा। इसे बनाना मुश्किल भी नहीं है।
सोमवार : बच्चों को टिफिन में फल व सलाद (ककड़ी, गाजर, मौसमी फल) को चॉप कर दे सकते हैं। इसमें एक ही फल, ककड़ी, गाजर चॉप कर न दें, कलरफुल सलाद दें। बच्चों को कलरफुल चीजें आकर्षित करती हैं।
मंगलवार : मूंग, चना व अरहर दाल रात में भिगो दें। सुबह इसको मिक्स कर पीसकर चीला बनाएं। सब्जियां भी चॉप कर डाल सकते हैं। सॉस की बजाय हरी या नारियल की चटनी दे सकते हैं।
बुधवार : ओट्स की इडली बनाकर दें। उसमें स्प्राउट्स का भरवा दे सकते हैं। बच्चों के लिए सुपाच्य होगी। यह स्वादिष्ट होने के साथ सुपाच्य भी होगा। इसे बच्चे बड़े चाव से खाएंगे।

गुरुवार : सैंडविच पसंद है तो बच्चे को कॉटेज चीज सैंडविच बनाकर दे सकते हैं। व्हाइट की बजाय ब्राउन ब्रेड लें। पनीर के साथ शिमला मिर्च, खीरा, प्याज आदि काटकर डालें। इसमें प्रोटीन व हैल्दी फैट भी मिलेगा।
शुक्रवार: राजमा, छोला व लोबिया रात में भिगो दें। सुबह कुकर में इसे हल्की सीटी दिलाकर उतार लें। इसमें स्वीट कॉर्न, खीरा, टमाटर, तीनों शिमला मिर्च चॉप करें। इसमें चाट मशाला भी डाल सकती हैं।
शनिवार: फ्री डे की तरह बच्चों का पसंदीदा बर्गर दे सकते हैं। इसका कटलेट वेजिटेबल से बनाएं। इसमें मेयोनीज की बजाय गाढ़े दही में नमक, काली मिर्च डालकर बनाएं। बेसन की बाइंङ्क्षडग देकर बनाएं।
रविवार : बच्चों को इस दिन घर पर जो पसंद है वह खाने के लिए दें। यदि व बाहर से खाने के लिए कहें तो दे सकते हैं या उन्हें उनकी पसंदीदा चीजें पिज्जा आदि भी बनाकर खिला सकते हैं।
ये भी हैं विकल्प
इसके अलावा बच्चों को मीठी चीजों में पुडिंग का केक बनाकर दे सकते हैं। इसमें केक मल्टीग्रेन आटे से बनाएं या रागी का केक भी बना सकते हैं। कुकर में भी बना सकते हैं। केक के बीच में फ्रूट कस्टर्ड की लेयर डालकर बनाएं। इसके अलावा रैप्स में सोया पनीर डालकर दे सकते हैं। पनीर टिक्का की तरह बनाकर भी दे सकते हैं। मोमोज बनाने के लिए बाहर की कवरिंग आटे से बनाएं। मशरूम, पनीर, सोया व स्प्राउट्स का भरावन दें। इसे लहसुन की चटनी के साथ सर्व करें।
एक्सपर्ट - मेधावी गौतम, डायटीशियन, जयपुर



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तेज आवाज से प्रभावित नींद पहुंचाती है कानों को नुकसान, जानें इसके बारे में

सुबह पार्क में टहलने के दौरान सुहावने मौसम में लोगों और चिडिय़ों की चहचहाती आवाज बचपन के दिनों की याद दिला रही थी। अचानक एक चीखती हुई सीटी की आवाज आई व शांत माहौल को खराब करने लगी। यह आवाज जाती ट्रेन के बारे में लोगों का सतर्क रखने के लिए बजाई जाने वाली सीटी की थी जो लगभग डेढ़ मील की दूरी से आ रही थी। 10-15 मिनट बाद यह आवाज गायब तो हो गई। लेकिन कुछ समय बाद तक उसका अहसास कान में था। अक्सर हम दिनभर में ऐसी कई आवाजें सुनते हैं जिससे कानों को नुकसान पहुंचता है। इस नॉइज पॉल्यूशन के दुष्प्रभाव को समझने के लिए पहले कान की संरचना को जानना जरूरी है।

हमारा बाहरी कान साउंड कलेक्टर के रूप में काम करता है। यहां से आवाज जाने पर कान में डेढ़ से दो सेंमी. पर मौजूद मैम्ब्रेन वाइब्रेट होता है। इस कंपन को कान के मध्य स्थित तीन छोटी हड्डियां महसूस कर कान के अंदरुनी हिस्से यानी कोक्लिया तक पहुंचाती हैं। यहां मौजूद ऑडिटरी नस इस हलचल को महसूस कर दिमाग के ऑडिटरी भाग तक दिन-रात, सोते-जागते और उठते-बैठते पहुंचाती रहती है। सोते समय यदि इस आवाज से कोई नुकसान होने की आशंका होती है तो हमारी नींद खुल जाती है। सिर्फ कान ही ऐसे हैं जो सोते समय भी हमें सतर्क रखते हैं।

कई शोधों के अनुसार हमारी नींद का आवाज से गहरा संबंध है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें तों सेहतमंद रहने के लिए आवाज की तीव्रता दिन के समय 55 डेसिबल और रात को 45 डेसीबल से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। कई अन्य तथ्य भी हैं जो आवाज के दुष्प्रभाव से सामने आते हैं।

आवाज और नींद-
सोते समय भी हमारे कान सक्रिय रहकर हर आवाज को गंभीरता से सुनते हैं। ऐसे में ज्यादा तेज आवाज से हमारी नींद टूट जाती है और हम जाग जाते हैं। अक्सर हमें स्वयं इसका पता नहीं लगता कि हम उठ गए हैं। लेकिन इलेक्ट्रोएंसेफेलोग्राफी जांच से इस बात की पुष्टि हो चुकी है कि सोते समय कान में आवाजों के जाने से हमारे दिमाग को भी रेस्ट नहीं मिलता जिस कारण व्यक्ति गहरी नींद में सो नहीं पाता और सुबह थकान व आलस से भरा उठता है।

आवाज और स्ट्रेस हार्मोन-
तेज आवाज के बीच जब हार्मोन्स को लैब में टैस्ट किया तो पाया कि तेज आवाज से दिमाग को संकेत मिलता है और बॉडी अलर्ट होकर जग जाती है। आवाज की तेज व कम गति व्यक्ति के स्ट्रेस हार्मोन्स में असंतुलन पैदा करती है। ऐसे में ब्लड प्रेशर व हार्ट रेट दोनों बढ़ जाती है। यह स्थिति आर्टिरियल वैसोकंस्ट्रिक्शन की है। जिसमें दिमाग हृदय तक ऑक्सीजनयुक्त रक्त नहीं पहुंचा पाता।

सुनाई देने में कमी-
तेज रोशनी में आंखें अचानक बंद हो जाती है, कुछ गर्म छुएं तो हाथ झटक लेते हैं या कुछ चुभने पर उछल जाते हैं। लेकिन कान कभी बंद नहीं होते। तेज या मध्यम हर आवाज सुन लेते हैं। लगातार या लंबे समय तक तेज आवाज में रहने से कान के मध्य भाग की हड्डियों में होने वाला सामान्य कंपन कई बार जरूरत से ज्यादा हो जाता है। यह बेहरेपन की पहली स्टेज होती है।



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Saturday, 27 July 2019

डर, घबराहट और बेचैनी से शुरू होता पैनिक अटैक, जानें इसके बारे में

शरीर के किसी अंग या हिस्से में उठने वाला अचानक दर्द पैनिक अटैक कहलाता है। यह रोग कई बार मानसिक बीमारियों के साथ होता है। इसमें मरीज के अंदर एक प्रकार का डर बैठ जाता है जिसके कारण रोगी की धड़कनें अनियमित हो जाती हैं और वह परेशान हो जाता है।

इन लक्षणों से पहचानें -
घबराहट के साथ दिल का तेजी से धड़कना, जल्दी-जल्दी सांसें चलना, घुटन महसूस होना, कंपकपी और पसीना आना, सीने में दर्द, बेचैनी, जी मिचलाना और पेट में दर्द, चक्कर आना, नियंत्रण खोने और मृत्यु का डर होना आदि लक्षण हो सकते हैं। एक अध्ययन में पाया गया है कि 'पैनिक अटैक' के मरीजों को दिल का दौरा या ब्रेन स्ट्रोक की आशंका अधिक रहती है।

कारण -
तनाव, हृदय रोग, अस्थमा, सांस संबंधी बीमारी, हार्मोन में गड़बड़ी और कुछ दवाइयों का साइड इफेक्ट भी है कारण।

किसे अधिक खतरा -
तनावग्रस्त लोगों में इस बीमारी के होने की आशंका अधिक रहती है। तलाक, नौकरी छूटने या किसी नजदीकी की मृत्यु होने पर भी यह हो सकता है। लंबे समय से गंभीर बीमारियों से पीडि़त मरीज और युवाओं में ब्रेकअप के बाद इस तरह की समस्या देखने को मिलती है। किसी मानसिक आघात से गुजरे लोगों में इसकी आशंका रहती है।

कैसे करें बचाव -
अटैक होने पर मरीज को शांत रखें। पीड़ित की समस्या सुनकर समझने का प्रयास करें। मरीज को टहलने या स्टे्रचिंग के लिए कहें। मरीज को नाक से लंबी सांस लेने और मुंह से छोड़ने के लए कहें। भीड़-भाड़ वाली जगह जाने से बचें। खुद पर तनाव को हावी न होने दें। जब भी कोई समस्या हो तो एक गिलास ठंडा पानी पीएं और फिर सोचें। ऐसा क्यों हुआ, उसका कारण खोजें।



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ये सेहत मंत्रा कामकाजी महिलाओं को घर-ऑफिस में रखेंगे चुस्त-दुरूस्त

अक्सर कामकाजी महिलाएं घर और दफ्तर के बीच सामंजस्य बनाने के दौरान खुद की सेहत का ध्यान नहीं रख पाती हैं। इसका परिणाम उनकी सेहत पर भी दिखने लगता है। कमजोरी और थकान के कारण परेशान रहने लगती हैं। जानें ऐसी आदतों के बारे में जो आपको रखेंगी चुस्त-दुरुस्त-

समय पर लें नाश्ता और लंच-
कभी भी ब्रेकफास्ट या लंच स्किप न करें। अगर बाहर का खाना नहीं खाना चाहती हैं तो थोड़ा समय निकालकर घर पर तैयार किया हुआ भोजन ऑफिस ले जाएं। ये काफी हैल्दी और सेहत के लिहाज से भी फायदेमंद है।

न होने दें पानी की कमी -
गर्मी के दिनों में शरीर में पानी की कमी होना सामान्य बात है। लेकिन इसकी भरपाई होनी भी जरूरी है वरना डिहाइड्रेशन की समस्या हो सकती है। इससे बचना है तो दिन में कम से कम 10-12 गिलास पानी पीएं। भूख शांत करने के लिए फास्ट फूड और स्नैक्स की जगह टिफिन बॉक्स में कटे हुए गाजर, खीरा, तरबूज-खरबूज, ककड़ी और टमाटर ले जाएं। ये शरीर में पानी की कमी पूरी करने के साथ पोषक तत्त्वों की भी पूर्ति करेंगे। इससे आप खुद को तरोताजा महसूस करेंगी और मौसमी बीमारियों से दूर रहेंगी।

हैल्दी डाइट लें -
प्रोटीन, विटामिंस, मिनरल्स से भरपूर डाइट शरीर के रोग प्रतिरोधी तंत्र के साथ मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी अच्छी होती है। खाने में फैट और कार्बोहाइड्रेट की मात्रा कम ही रखें। कोशिश करें कि ऑफिस में चाय, कॉफी और सॉफ्ट्र ड्रिंक्स की बजाय फू्रट जूस, लस्सी या छाछ पीएं। अगर आपको चाय या कॉफी पीने का ज्यादा ही मन कर रहा है तो इसमें चीनी की मात्रा कम रखें।

व्यायाम है जरूरी -
शारीरिक और मानसिक रूप से फिट रहने के लिए एक्सरसाइज जरूरी है। रोजाना 15-30 मिनट का व्यायाम फिट रखने के साथ नई ऊर्जा देगा। अगर समय है तो आप मेडिटेशन भी कर सकती हैं। इससे तनाव भी कम होता है और आप हर काम शांति से कर पाती हैं। रात में ही अगले दिन की प्लानिंग कर लें इससे आप सुबह खुद के लिए भी वक्त निकाल पाएंगी। रोजाना मॉर्निंग वॉक पर जाएं। ऑफिस में लिफ्ट की बजाय सीढ़ियों का इस्तेमाल करें। इसके अलावा वॉक, रस्सीकूद आदि कर सकती हैं।



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अब नहीं सताएगा चिकिनगुनिया, डेंगू का डर, एजीपी ट्रैप देगा राहत

आने वाले दिनाें में हाे सकता है कि आपकाे मादा मच्छर जनित चिकिनगुनिया जैसी बीमारियाें से राहत मिल जाए।हाल में शोधकर्ताओं ने एक एेसा उपकरण विकसित किया है जो अंडे देने के लिए जगह तलाशने वाली मादा मच्छरों को आकर्षित और कैप्चर करता है, उम्मीद की जा रही है कि यह उपकरण भविष्य में चिकनगुनिया वायरस पर अंकुश लगाने में मददगार हाेगा।

पीएलओएस नामक पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन से पता चलता है कि ऑटोकाइडल ग्रेविड ओविट्रैप (एजीपी ट्रैप) ( Autocidal Gravid Ovitrap ) AGP trap ने प्यूर्टो रिको में लोगों को चिकनगुनिया के वायरस से संक्रमित होने से सफलतापूर्वक बचाया है।

यूएस सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) के शोधकर्ताओं ने कहा है कि एजीओ ट्रैप्स एक रासायनिक-मुक्त, एडीज एजिप्टी (येलो फीवर मच्छर) की आबादी को नियंत्रित करने और इनके द्वारा संचारित किए जाने वाले रोगजनकों के संक्रमण से सुरक्षा प्रदान करने के लिए एक प्रभावी तरीका है।एजीओ ट्रैप्स तकनीक बड़े पैमाने पर कितना सफल रहेगी इसके लिए परीक्षण किए जा रहे हैं। एडीज एजिप्टी मच्छर ( Aedes Aegypti mosquito ) आबादी को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी साधनों की कमी से डेंगू वायरस ( dengue virus ) , जीका वायरस ( zika virus ) और चिकनगुनिया वायरस ( Chikungunya virus ) का निरंतर विस्तार हुआ है।

अध्ययन के लिए, शोधकर्ताओं ने प्यूर्टो रिकान समुदायों में 290 घरों को चुना, जिनमें एजीओ ट्रैप तकनीक का उपयाेग किया गया। वहीं 349 एेसे घराें का चयन किया, जिनमें एजीओ ट्रैप का उपयाेग नहीं किया गया।बाद में 175 ( एजीआे ट्रैप तकनीक सहित ) व 152 ( बिना एजीओ ट्रैप) लाेगाें काे चुना गया।

चिकनगुनिया वायरस के संक्रमण का पता लगाने के लिए प्रत्येक प्रतिभागी से रक्त के नमूने एकत्र किए गए थे और सर्वेक्षण में जनसांख्यिकीय जानकारी के साथ-साथ मच्छर भगाने और बिस्तर के शुद्ध उपयोग और मच्छर के काटने की आवृत्ति पर डेटा दर्ज किया गया।

114 (34.9 प्रतिशत) प्रतिभागियाें में चिकनगुनिया वायरस पाॅॅॅजिटिव पाया गया।

अध्ययन में सामने आया कि एजीओ ट्रैप वाले घराें में केवल 10.3 प्रतिशत लाेग ही चिकनगुनिया से संक्रमित थे, जबकि बिना एजीओ ट्रैप वाले घराें में चिकनगुनिया वायरस के 48.7 प्रतिशत मामले पाॅॅजिटिव थे।



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साइक्लिंग, लैग और आर्म क्ंरच वर्कआउट से सेहत को बनाएं तंदरुस्त

धूप में तेजी और तपन किसी अंग विशेष के लिए परेशानी न बनकर पूरे शरीर को नुकसान पहुंचाती है। फिर चाहे यह सुस्ती के रूप में हो या थकान, जी मिचलाना, शारीरिक और मानसिक तनाव आदि। ऐसे में अच्छी डाइट लेने के साथ कुछ वर्कआउट को भी दिनचर्या में शामिल किया जा सकता है-

वर्टिकल लैग क्ंरच -
इससे शरीर लचीला बनता है। पैरों का तनाव दूर होकर रक्तसंचार बेहतर होता है।
ऐसे करें: पीठ के बल समतल जमीन पर लेटकर पैरों को एक के बाद एक ऊपर उठाएं। इस दौरान शरीर का कोण 90 डिग्री का बनेगा। साथ ही सीने से पैरों को छूने की कोशिश करें। हथेलियों को आपस में मिलाकर सिर के नीचे सपोर्ट देते हुए लगाएं। क्षमतानुसार पैरों को ऊपर की ओर रखने के बाद पैरों को नीचे लाकर सीधे लेट जाएं। इसे 3-4 बार दोहराएं।
ध्यान रखें: गर्दन-कमरदर्द है तो इसे न करें। पैरों या घुटने में हाल ही कोई सर्जरी हुई है तो भी न करें।

लॉन्ग आर्म क्रंच-
कमर को रिलैक्स रखने के साथ ही इससे हाथ-पैर की मांसपेशियों को मजबूती मिलती है।
ऐसे करें: जमीन पर सीधे लेट जाएं। इसके बाद हथेलियों को आपस में मिलाकर सिर के पीछे मुट्ठि बनाकर ले जाएं। इस दौरान पैरों को सीधे या हल्के से घुटने मोड़कर पैरों को स्थिर करें। फिर मुट्ठि बनाकर हाथों से शरीर को पीछे की ओर खींचने और साथ ही शरीर के ऊपरी हिस्से को जमीन से थोड़ा ऊपर उठाने का प्रयास करें।
ध्यान रखें: कंधे और कूल्हों में कोई समस्या है तो न करें।

एब्स वर्कआउट-
शरीर को ऊर्जावान बनाने और स्फूर्ति लाने में लेटकर की जाने वाली साइक्लिंग काफी मददगार है।
ऐसे करें: जमीन पर लेटकर बॉडी को रिलैक्स करें। इसके बाद हथेलियों को आपस में मिलाकर सिर के नीचे लगाकर सपोर्ट दें और सिर को थोड़ा ऊपर उठाएं। घुटने से मोड़ते हुए पैरों को सीने पर लगाएं और साइकिल चलाने की कोशिश करें। ऐसा दोनों पैरों से करें। थकान महसूस होने पर न करें।
ध्यान रखें : कमर, गर्दन, घुटने या कंधे में परेशानी है तो इस अभ्यास को न दोहराएं।
इस अभ्यास को करने के तुरंत बाद पानी न पीएं।



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चेहरे के मुंहासे, सफेद दाने व झुर्रियों को इन घरेलू तरीकों से करें दूर

चेहरे पर सफेद रंग के दाने या बेहद बारीक फुंसियां व्हाइटहेड्स कहलाती हैं। ऐसा तब होता है जब चेहरे के रोमछिद्र बंद हो जाते हैं। जिस कारण स्किन से अतिरिक्त तेल बाहर नहीं आ पाता और चेहरे की रौनक लगभग खत्म हो जाती है। ऐसे में कुछ घरेलू उपाय अपनाए जा सकते हैं-

शहद कारगर-
थोड़ा-सा शहद लेकर उसे सफेद दानों पर हल्के हाथों से मालिश करते हुए लगाएं। एक घंटे बाद ठंडे पानी से चेहरा धो लें। नियमित तौर पर शहद का प्रयोग बंद हुए रोमछिद्रों को खोलता है। साथ ही त्वचा पर अचानक से होने वाली तैलीय गांठें या दाने खत्म हो सकते हैं। शहद में नेचुरल नमक होता है जो त्वचा में नमी बरकरार रखते हुए कसावट लाकर उसे मुलायम बनाता है।

हरी मेथी की पत्तियां-
हरी मेथी की पत्तियों को धोकर अच्छी तरह से मैश करें व इसके रस को निचोड़ लें। अब इस रस को रुई के फाहे से चेहरे पर लगाएं। आधे घंटे बाद चेहरे को ठंडे पानी से धो लें। पत्तियों को दूसरी तरह से भी प्रयोग कर सकते हैं। दही और मेथी की पत्तियों को मिक्सी में पीसकर पेस्ट बना लें। इसे चेहरे के प्रभावित हिस्से पर सूखने तक लगाएं। इसके बाद चेहरे को ठंडे पानी से धो लें। हफ्ते में एक या दो बार ऐसा कर सकते हें।

ग्वारपाठा (एलोवेरा)-
इसके गूदे में पाए जाने वाले एंटीऑक्सीडेंट और एंटीबैक्टीरियल गुण त्वचा संबंधी रोग को ठीक करने में असरदार हैं। इसे सफेद फुंसियों पर लगाकर हल्के हाथों से मालिश करें। इसे रातभर के लिए छोड़कर सुबह ठंडे पानी से चेहरा धो लें। एक माह तक ऐसा करने से समस्या में फायदा होता है।

चंदन और गुलाबजल -
चंदन पाउडर और गुलाबजल त्वचा को ठंडक देने के साथ साफ भी करते हैं। चंदन पाउडर में गुलाबजल मिलाकर उसे चेहरे पर लगाएं। सूखने के बाद ठंडे पानी से धोएं। यह अतिरिक्त तेल सोख लेता है।



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फोन पर रोजाना 5 घंटे, बढ़ाते हैं मोटापे का खतरा

जो लाेग दिन में पांच या अधिक घंटे अपने स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं, उनमें मोटापे का खतरा अधिक होता है और अालसी जीवनशैली व अनुचित खानपान की आदत से उनमें हृदय रोग का खतरा भी बढ़ जाता है। कोलंबिया में औसतन 19 से 20 साल उम्र के 1,060 छात्रों (700 लड़कियों और 360 लड़कों) पर किए गए शाेध में इस बात का खुलासा हुआ है।

कोलम्बिया के साइमन बोलिवर विश्वविद्यालय में कार्यरत शाेध के लेखक मिररी मेंटिला-मॉरन के अनुसार शाेध में पाया कि जाे लाेग स्मार्टफोन का इस्तेमाल दिन में पांच या अधिक घंटे करते हैं उनमें माेटापे का खतरा 43 प्रतिशत बढ़ जाता है। जिन लाेगाें ने इस तरह से स्मार्टफोन का उपयाेग किया उन्हाेनें अधिक मीठा पेय, फास्ट फूड, मिठाई आैर स्नैक्स जैसी चीजाें काे का जमकर सेवन किया।

शोधकर्ताओं के अनुसार, 26 प्रतिशत छात्र जो अधिक वजन वाले और 4.6 प्रतिशत थे, जो मोटे थे, वे अपने डिवाइस का उपयोग करते हुए पांच घंटे से अधिक समय बिताते थे।

अध्ययन में कहा गया है कि स्मार्टफोन का उपयोग करने में बहुत समय व्यतीत करने से शारीरिक गतिविधियों के समय में कमी आती है, जिससे समय से पहले मौत, मधुमेह, हृदय रोग और विभिन्न प्रकार के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।



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फलों और सब्जियों में मौजूद रेशे आंतों को रखते हैं स्वस्थ

इन दिनों खानपान में जंकफूड की मात्रा बढ़ने से प्राकृतिक और पौष्टिक मौसमी सब्जी और फलों की मात्रा कम हो गई है। इस कारण कई लाइफस्टाइल रोग जन्म ले रहे हैं जैसे मोटापा, उच्च रक्तचाप आदि। इसलिए सब्जी व फल के रूप में शाकाहार लेकर स्वस्थ रहा जा सकता है।

आहार तामसिक और शकाहारी दो प्रकार के होते हैं। आयुर्वेद में शाकाहार प्रकृति से सीधे तौर पर मिलने वाला होता है जैसे फल, सब्जियां, बीज आदि। वहीं तामसिक अप्रत्यक्ष रूप से ग्रहण किया जाता है जो कई रोगों को जन्म देता है। शाकाहार तन और मन दोनों को स्वस्थ रखता है।

सब्जी व फलों में मौजूद फाइबर (रेशे) आंतों की गति सही रखकर कब्ज व अपच से बचाते हैं।
ध्यान रखें कि भोजन के तुरंत बाद फल नहीं खाने चाहिए। वर्ना आंतों की कार्यप्रणाली बिगड़ सकती है। भोजन को पेट से छोटी आंत फिर बड़ी आंत तक जाने में कम से कम 2-3 घंटे का समय लगता है। जबकि फल 20 मिनट में पच जाते हैं। इस कारण अन्न के बाधा बनने से फल का पाचन आंतों तक नहीं हो पाता और पेट में ही ये पचने लगते हैं। जिससे पेट और गले में जलन होने लगती है।
कब्ज से पाइल्स, फिशर जैसे रोगों की आशंका बढ़ती है। ऐसे में शाकाहार पेट साफ करता है।
पुराने पाइल्स की समस्या कैंसर का कारण बन सकती है। इसके लिए ताजे फल व सब्जियां खाते रहें ताकि पाइल्स के कारक कब्ज से बचा जा सके।



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बच्चे के लिवर काे नुकसान पहुंचाती है गर्भावस्था के दौरान ज्यादा कॉफी

गर्भावस्था के दौरान अधिक कैफीन का सेवन बच्चे के लिवर के विकास को प्रभावित कर सकता है और वयस्कता में लिवर की बीमारी का खतरा बढ़ा सकता है।हाल ही में हुए एक शाेध में ये बात सामने आर्इ है।

जर्नल ऑफ एंडोक्रिनोलॉजी में प्रकाशित, अध्ययन में पता चला है कि दिन में दाे-तीन कप काॅॅॅफी का सेवन तनाव और वृद्धि हार्मोन के स्तर को बदल सकता है जो बच्चे के लिवर के विकास को बिगाड़ सकता है।

चूहों पर किए गए इस अध्ययन में, यह पाया गया कि गर्भवती चूहों, जिन्हें कैफीन दिया गया था, उनके बच्चाें में कम वजन, असयंमित विकास, तनाव हार्माेन परिवर्तन आैर बिगड़ा हुआ लिवर जैसी समस्याएं सामने आर्इ।

चीन के वुहान विश्वविद्यालय में कार्यरत शाेध के सह-लेखक यिनक्सीयन वेन ने कहा कि "हमारे परिणामों से संकेत मिला है कि प्रसवपूर्व कैफीन मां में तनाव हार्मोन गतिविधि काे बढ़ता है जाेकि जन्म से पहले लिवर के विकास के लिए जरूरी IGF-1 गतिविधि को रोकता है।इंसुलिन जैसा विकास कारक 1 (IGF-1) एक हार्मोन है जो बचपन के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

वेन ने कहा, "हमारे शाेध में पता चलता है कि जन्मपूर्व कैफीन शिशुओं के लिए अच्छा नहीं है।प्रीनेटल कैफीन के संपर्क में आने से फैटी लीवर की बीमारी का खतरा बढ़ जाता है। कैफीन का ज्यादा इस्तेमाल IGF-1 हार्मोन काे प्रभावित कर लिवर संबंधी समस्याआें काे बढ़ावा देता है।

हालांकि, पुणे में कोलंबिया एशिया अस्पताल के सलाहकार गैस्ट्रो सर्जन, हर्षल राजेकर के अनुसार, शायद ही कोई एेसा सबूत जिससे यह पता चले कि कैफीन गर्भवती महिला या उसके बच्चे के लिवर के लिए हानिकारक है, हालांकि यह सच है कि कैफीन की अधिकता नींद को प्रभावित कर सकती है ।



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इस आयु के बाद कमजोर होने लगती हैं हड्डियां, मजबूती के लिए जानें ये खास बातें

अगर आपको लगता है कि हड्डियों के खोखले या कमजोर होकर टूटने की बीमारी ऑस्टियोपोरोसिस सिर्फ महिलाओं को ही होती है तो आप गलत हैं। चार में से एक पुरुष भी इससे पीड़ित है। आमतौर पर 30 की उम्र से इस रोग की शुरुआत होती है और हड्डी के टूटने पर इसका पता लगता है। बोन डेंसिटी टैस्ट से भी उम्र के विभिन्न पड़ावों पर इस रोग का पता लगा सकते हैं। इसका कोई विशेष लक्षण नहीं। लेकिन ओस्टियोपोरोसिस से जुड़ी कई भ्रांतियां जैसे यह रोग सिर्फ महिलाओं को होता है, 50 की उम्र के बाद ही हड्डियां कमजोर होती हैं, लोगों के जहन में है। जानते हैं इनकी सच्चाई-

इसमें व्यक्ति को हड्डियां कमजोर महसूस होने लगती हैं ?
जवाब : गलत।
ओस्टियोपोरोसिस होने पर हड्डियों के कमजोर होने का अहसास बिल्कुल नहीं होता। हल्की सी चोट, झटका या बिना किसी वजह फै्रक्चर होने की स्थिति में इसका पता लगता है। इसके लिए बोन डेंसिटी टैस्ट कराना पड़ता है।

हड्डियों की सेहत के लिए ज्यादा चलना नुकसानदायक है।
जवाब : नहीं, वॉक फायदेमंद है।
वॉक, जॉगिंग, एरोबिक्स या कोई भी वर्कआउट जिसमें पैर जमीन पर दबाव डालें बेहतर है। वजन उठाना हड्डियों के लिए अच्छा है, लेकिन ज्यादा वजन नुकसान पहुंचाता है। एक्सपर्ट की सलाह जरूरी है।

ओस्टियोपोरोसिस की समस्या सिर्फ महिलाओं को होती है?
जवाब : गलत।
यह समस्या पुरुषों से लेकर टीनएजर्स तक में हो सकती है। हालांकि 80 प्रतिशत आशंका महिलाओं में होती है। क्योंकि पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की हड्डियां छोटी और पतली होती हैं।

केवल डेयरी प्रोडक्ट्स में ही सर्वाधिक कैल्शियम होता है?
जवाब : नहीं, डेयरी प्रोडक्ट्स व अन्य में।
सभी डेयरी प्रोडक्ट्स में कैल्शियम की भरपूर मात्रा होती है, लेकिन दही में सबसे ज्यादा होती है। संतरे का जूस, बादाम, चावल और सोया मिल्क में भी कैल्शियम भरपूर होता है।

शरीर में आवश्यक कैल्शियम की मात्रा न होने पर हड्डियों से कैल्शियम लिया जाने लगता है?
जवाब : सही।
शरीर को कैल्शियम की जरूरत होती है व कमी होने पर यह हड्डियों से लेना शुरू कर देता है। इसकी कमी से हड्डियां कमजोर होने और फै्रक्चर की आशंका बढ़ जाती है।

50 पार उम्र होने पर एक्सरसाइज से हड्डियों के स्वास्थ्य पर कोई असर नहीं पड़ता है?
जवाब : गलत।
इस उम्र में हड्डियों के नए ऊत्तकों का निर्माण भले ही बहुत कम हो लेकिन वर्कआउट से ऊत्तकों के टूटने की गति धीरे हो जाती है। इसलिए सावधानी बरतें। ओस्टियोपोरोसिस होने पर डॉक्टरी सलाह से 30 मिनट तक एक्सरसाइज जरूर करें। साथ ही शारीरिक तौर पर खुद को घरेलू कार्य में शामिल रखें।

अधिक उम्र में हड्डियां कमजोर होने लगती हैं?
जवाब : नहीं, 30 की उम्र से।
हमारी हड्डियां बढ़ते हुए ऊत्तक हैं जिनका काम कैल्शियम और दूसरे मिनरल्स एकत्रित करना है। 30 की उम्र तक हमारे शरीर में जिस गति से हड्डियों के पुराने ऊत्तक टूटकर उनकी जगह नए ऊत्तक लेते हैं, 35 की उम्र तक यह प्रक्रिया उल्टी होने लगती है। हड्डियों के ऊत्तक तेजी से टूटते तो हैं लेकिन नए धीमी गति से बनते हैं। इससे ओस्टियोपोरोसिस की आशंका बढ़ती है।

कैल्शियम के लिए रोजाना दूध पीना चाहिए।
जवाब : हां, साथ में दही भी जरूरी है।
स्वस्थ व्यस्क को एक दिन में एक हजार मिग्रा कैल्शियम की जरूरत होती है। दूध व दही के अलावा हरी सब्जियों में भी कैल्शियम अधिक होता है। बच्चे व युवाओं को करीब 1300 मिग्रा कैल्शियम की जरूरत होती है।

यदि मां को ओस्टियोपोरोसिस है तो यह बच्चे को भी हो सकता है?
जवाब : सही।
परिवार की मेडिकल हिस्ट्री मायने रखती है लेकिन कई उपाय हैं जिनसे बचाव संभव है। दूध, कैल्शियम और विटामिन-डी स्त्रोत वाली चीजों के अलावा फल, हरी सब्जियां खानी चाहिए। शराब से दूरी बनाए रखें।

विटामिन-डी लेने के लिए ज्यादा से ज्यादा धूप में बैठें।
जवाब : नहीं।

सूर्य की रोशनी और दूध, संतरे का जूस आदि से विटामिन-डी मिलता है। इनके बिना हमारा शरीर कैल्शियम अवशोषित नहीं कर पाता और हड्डियां कमजोर होने लगती हैं। सुबह 8-11 बजे की धूप में बैठना काफी है।

क्यों होता है ओस्टियोपोरोसिस-
हड्डियां जीवित ऊत्तक हैं जिनमें तंत्रिकाएं, रक्त वाहिनियां व बोन मैरो होते हैं। हड्डियों के स्वत: ही टूटने व उसकी जगह नई हड्डी बनने की प्रक्रिया लगातार चलती है। 20 तक की उम्र के युवाओं में टूटने वाली हड्डियों से कहीं ज्यादा तेजी से नए ऊत्तकों का निर्माण होता है। उम्र के साथ यह प्रक्रिया धीमी हो जाती है। महिलाओं में मेनोपॉज होने पर नए ऊत्तकों का बनना कम हो जाता जिससे हड्डियों का घनत्व कम हो जाता है।



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प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ने पर इन योगासनों से मिलेगा लाभ

प्रोस्टेट ग्रंथि का बढ़ना 40 वर्ष की उम्र के बाद ज्यादातर पुरुषों में आम समस्या बन जाती है। इस वजह से यूरिन करने में परेशानी होने लगती है। ऐसे में याेगासन द्वारा बचाव किया जा सकता है।आइए जानते हैं उनके बारे में :-

योग भी है सहायक
आनुवांशिक कारण होने की स्थिति के अलावा यदि इस रोग की शुरुआती स्टेज है तो कपालभाति, गोमुखासन, सिद्धासन व मूलबंधासन कर सकते हैं। इन्हें कहीं भी और कभी भी किया जा सकता है।

सिद्धासन
दंडासन की मुद्रा यानी पैरों को सीधा कर बैठें। पहले बाएं पैर की एड़ी को दोनों पैरों के बीच रखें। इसके बाद इस पैर पर बायां पैर रखें। इस दौरान दोनों पैरों के टखने एक-दूसरे पर हों। घुटनों को जमीन से टिकाकर रखें। दोनों हाथों को ज्ञान मुद्रा (तर्जनी अंगुली व अंगूठे के अग्रभाग को मिलाकर बाकी अंगुलियों को सीधा रखें) की स्थिति में घुटने पर रखें। रीढ़ की हड्डी सीधी रखें व कुछ देर आंखें बंद रखें।

गोमुखासन
सुखासन में बैठकर बाएं पैर की एड़ी को दाईं ओर कूल्हे के पास रखें। दाएं पैर को बाएं पैर के ऊपर से लाते हुए ऐसे बैठें कि दोनों पैरों के घुटने एक-दूसरे के ऊपर आ जाएं। दाएं हाथ को सिर की तरफ से पीठ की ओर ले जाएं। बाएं हाथ को कोहनी से मोड़ते हुए पेट की तरफ से घुमाते हुए पीठ की तरफ ले जाएं। पीछे से दोनों हाथों को मिलाते समय एक सीधी रेखा बनाएं। कुछ देर रुकने के बाद प्रारंभिक स्थिति में आ जाएं।

कपालभाति
समतल जगह पर बैठ जाएं। साथ ही स्वच्छ हवादार जगह का चुनाव करें। बैठने के लिए कोई भी आसन जैसे कि पद्मासन या वज्रासन चुन सकते हैं। इसके बाद पेट को ढीला छोड़ें। अब नाक से तेजी से सांस को बाहर निकलने की क्रिया करें। इस दौरान ध्यान रखें कि सांस को बाहर निकालते समय पेट को भीतर की ओर खींचें। इसके बाद सांस अंदर लेते समय संतुलन बनाए रखें। एक समय में इसे 20 - 30 बार या इससे अधिक समय के लिए भी कर सकते हैं। शुरुआत करने के बाद अभ्यास की गति और संख्या धीरे-धीरे बढ़ाएं। चाहें तो बीच-बीच में शरीर को थोड़ा आराम दे सकते हैं।

ग्रंथि के बढ़ने पर योगासान और प्राकृतिक नुस्खों को अपनाकर लक्षणों को दूर करने और सूजन कम करने में मदद मिल सकती है।



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वेट लॉस के लिए ना अपनाएं क्रैश डाइटिंग, हाेता है ये नुकसान

न्यूट्रीशनिस्ट के अनुसार क्रैश डाइट स्ट्रेस हार्मोन कार्टिसोल का लेवल बढ़ाकर तनाव व अवसाद की स्थिति पैदा करती है। वहीं, इस डाइट से दिनभर में काफी कम ऊर्जा मिलने से खुशी का हार्मोन (सिरेटोनिन) कम बनता है। इसलिए हैल्दी डाइट लें।आइए जानते हैं क्रैश डाइटिंग से हाेने वाले नुकसान के बारे में :-

- लंबे समय तक भूखे रहने से धीरे-धीरे गैस और एसिडिटी की प्रॉब्लम शुरू हो जाती है जो लॉग टर्म पर माइग्रेन का कारण भी बन जाती है।

- भूखे पेट रहने के कारण नींद में भी खलल पड़ती है। भूखा रहने से नींद नहीं आते और इससे अन्य और दिक्कतें शुरू हो जाती है। लंबे समय तक यह हालात रहे तो स्लीपिंग डिसऑर्डर भी हो जाता है।

- क्रैश डाइटिंग आपकी हेल्थ के साथ ही आपके स्किन का भी हाल बुरा कर देती है। बैलेंस डाइट न होने और न्यूट्रीएंट्स की कमी से स्किन में रफनेस, डलनेस और ड्राइनेस हो जाता है।

- लम्बे समय तक भूखे रहने वाले लोग थके और चिड़चिड़े हो जाते हैं। उनका मूड स्विंग बार-बार होता रहता है।



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Friday, 26 July 2019

नहीं रोकनी चाहिए छींक, होंगे ये नुकसान, जानें इसके बारे में

कई लोगों में छींक को जबरन रोकने या फिर उस वक्त अपना नाक दबा लेने की आदत होती है। चिकित्सकों की मानें तो ऐसा करना सेहत के लिए नुकसानदायक होता है। छींक के दौरान नाक और मुंह से जो हवा निकलती है उसकी गति 100 मील प्रति घंटे की होती है। ऐसे में उसे जबरन रोकने से नाक की कार्टिलेज में फैक्चर होने, नाक से खून आने, कान का पर्दे फटने, सुनाई न देने, चक्कर आने, आंखों पर दबाव पड़ने से रेटिना क्षतिग्रस्त होने और चेहरे पर सूजन आने जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए छींक आने पर नाक और मुंह के सामने रुमाल या टिशू पेपर रख सकते हैं लेकिन छींक को आने से रोकने की गलती कभी न करें।

कई बार ऐसा होता है कि छींक रोकने की वजह से आंखों की रक्त वाहिकाएं प्रभावित होती हैं। इसके अलावा छींक रोकने से गर्दन में भी मोच आ सकती है। कुछ मामलों में छींक रोकने से दिल का दौरा पड़ने की आशंका भी रहती ही है।



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अनिद्रा से बचाता है चुकंदर और लहसुन का प्रयोग

अमरीका की कोलोराडो बोल्डर यूनिवर्सिटी के शोध में सामने आया कि चुकंदर, कच्चा लहसुन ऐसे प्रीबायोटिक्स हैं जो नींद में सुधार कर तनाव से होने वाले प्रभाव को कम करते हैं। शोध के अनुसार इन चीजों में फायदेमंद डाइट्री फाइबर होता है।आइए जाने इनके फासदाें के बारे में :-

लहसुन के फायदे:-

- लहसुन खाने से हाई बीपी में आराम मिलता है। दरअसल लहसुन ब्‍लड सर्कुलेशन को कंट्रोल करने में काफी मददगार है। हाई बीपी की समस्‍या से जूझ रहे लोगों को रोजाना लहसुन खाने की सलाह दी जाती है।

- पेट से जुड़ी बीमारियों जैसे डायरिया और कब्‍ज की रोकथाम में लहसुन बेहद उपयोगी है। पानी उबालकर उसमें लहसुन की कलियां डाल लें। खाली पेट इस पानी को पीने से डायरिया और कब्‍ज से आराम मिलेगा।

- लहसुन दिल से संबंधित समस्याओं को भी दूर करता है। लहसुन खाने से खून का जमाव नहीं होता है और हार्ट अटैक होने का खतरा कम हो जाता है।

- खाली पेट लहसुन की कलियां चबाने से आपका डाइजेशन अच्‍छा रहता है और भूख भी खुलती है।

- लहसुन खाने से सर्दी-जुकाम, खांसी, अस्‍थमा, निमोनिया, ब्रोंकाइटिस के इलाज में फायदा है।

चुकंदर के फायदे:-
एनीमिया की बीमारी को दूर करने के लिए चुकंदर का इस्तेमाल सबसे ज्यादा लाभदायक है। चुकंदर में पर्याप्त मात्रा में आयरन, विटामिन और मिनरल्स होते हैं, जो खून को बढ़ाने और उसे साफ करने का काम करते हैं। महिलाओं को खून की कमी ज्यादा होती है। इसलिए महिलाओं को डाइट में चुकंदर जरुर लेना चाहिए।

- चुकंदर में फाइबर,फ्लेवोनॉयड्स और बेटासायनिन काफी मात्रा में मौजूद होता है। इसलिए इसका रंग लाल और बैंगनी होता है। यह एलडीएल कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद करता है। इसको खाने से दिल के दौरे आने की समस्या में भी फायदा होता है।

- शारीरिक मेहनत करने वालाें के लिए चुकंदर खाना बहुत फायदेमंद होता है। चुकंदर खाने से एनर्जी लेवल बढ़ता है। इसके साथ ही इसमें मौजूद नाइट्रेट तत्व धमनियों का विस्तार करने में मदद करता है।



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गर्भाशय विकृत होने के कारण होती है बार-बार गर्भपात की समस्या

गर्भपात या समय पूर्व डिलीवरी का एक कारण गर्भाशय के आकार का असामान्य होना या इसमें किसी तरह की परेशानी का होना हो सकता है। मेडिकली इसे मुलेरियन एनोमलीज कहते हैं। ज्यादातर मामलों में गर्भाशय की विकृति का पता गर्भधारण के बाद, शिशु के ठीक से विकसित न होने या फिर बार-बार गर्भपात होने के बाद चलता है। कुछ मामलों में गर्भाशय का विकृत होना जन्मजात हो सकता है और कई बार उम्र बढऩे के साथ भी इससे जुड़ी परेशानियां सामने आती हैं।

कारण -
गर्भाशय के आकार में बदलाव यानी आमतौर पर त्रिकोणाकार के बजाय अन्य आकार, इसमें कोई गांठ का होना, बच्चेदानी का मुंह खुला रहना, बच्चेदानी की टीबी, अंडाशय का अलग-अलग विकसित होना आदि प्रमुख वजह हैं। कभी कभार गर्भ के बढऩे के दौरान भी गर्भाशय से जुड़ी समस्याएं सामने आती हैं। कुछ परिस्थितियों में मुलरियन एनोमलीज की स्थिति गर्भाशय के एक के बजाय दो होने पर भी दिखती है।

लक्षण-
जन्मजात गर्भाशय की विकृति हो तो बिना गर्भधारण के भी पेटदर्द, यूरिन करते समय तकलीफ, अत्यधिक माहवारी या असहनीय दर्द होता है। प्रेग्नेंसी के दौरान गर्भपात, समय पूर्व प्रसव, गर्भस्थ शिशु की पोजीशन सही न होने, अंदरुनी गर्भाशय के विकास में रुकावट व इंफर्टिलिटी की आशंका होती है। वहीं जिनमें युवावस्था के दौरान विकृति होती है उनमें पीरियड्स के दौरान तेज दर्द व अधिक रक्तस्त्राव होता है।

जांचें -
गर्भाशय की स्थिति जानने के लिए सबसे पहले रोगी से उसकी हिस्ट्री पूछते हैं। एक्सरे और सोनोग्राफी कर गांठ का पता लगाते हैं। वहीं गर्भाशय के अंदर यदि कोई झिल्ली होती है तो हिस्टेरोस्कोपी करते हैं।

इलाज - गांठ या झिल्ली की स्थिति में सर्जरी की जरूरत पड़ती है। बच्चेदानी का मुंह खुला होने की स्थिति में गर्भ ठहरने के 14 हफ्ते बाद मुंह को टांके लगाकर सील देते हैं। जिन्हें 9वें माह में खोल दिया जाता है।

यदि दो बच्चेदानी हो तो किसी एक में रुकावट होने पर माहवारी के दौरान ब्लड इकट्ठा होने से गांठ बन सकती है।



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Prostate Gland - हार्मोनल बदलाव से बढ़ता ग्रंथि का आकार

प्रोस्टेट ग्रंथि का बढ़ना 40 वर्ष की उम्र के बाद ज्यादातर पुरुषों में आम समस्या बन जाती है। इस वजह से यूरिन करने में परेशानी होने लगती है। ऐसे में आयुर्वेद में बिना सर्जरी किए इस दिक्कत का इलाज संभव हो सकता है। जानते हैं रोग के कारण, लक्षण व अन्य प्रमुख जानकारी के बारे में -

उम्र बढ़ने के साथ आकार बढ़ना सामान्य प्रक्रिया
प्रोस्टेट पुरुषों में पाई जाने वाली ग्रंथि है जो मूत्राशय के नीचे, मलाशय के आगे और मूत्र मार्ग के चारों ओर स्थित होती है। आयु बढ़ने के साथ-साथ इस ग्रंथि का आकार बढ़ना एक सामान्य प्रक्रिया है। इसका सामान्य वजन 7-18 ग्राम होता है।

मुख्य कारण
40 वर्ष की उम्र के बाद प्रोस्टेट का आकार बढ़ना सामान्य विकार है। लेकिन 60 वर्ष की उम्र के बाद इस ग्रंथि के बढ़ने और इसमें सूजन के मामले ज्यादा सामने आते हैं। आमतौर पर इसके प्रमुख व ठोस कारण अज्ञात हैं। लेकिन शरीर में होने वाला हार्मोनल बदलाव रोग का खतरा बढ़ाता है।

ये हैं लक्षण
यूरिन करने में तकलीफ, बार-बार यूरिन की इच्छा या रोक न पाना, यूरिनरी ब्लैडर पूरी तरह से खाली न होना, ग्रंथि में सूजन, बूंद-बूंद यूरिन आना, रात्रि के समय यूरिन के लिए बार-बार जाना परेशानियां होती हैं। कई बार ग्रंथि बढ़ने से यूरिन बंद हो जाता है।

लापरवाही से कैंसर व किडनी में संक्रमण की आशंका
लक्षणों को बार-बार नजरअंदाज करना व समय पर इलाज न लेना भविष्य में प्रोस्टेट कैंसर और किडनी में संक्रमण की आशंका बढ़ा देता है। ऐसे में 40-50 की उम्र के बाद नियमित जांचें कराते रहना चाहिए।

अपनाएं ये उपाय
- पांच ग्राम गोखरू और दस ग्राम कांचनार की छाल को दो गिलास पानी में उबालें। इसकी मात्रा एक चौथाई रहने के बाद छानकर ठंडा करें। सुबह-शाम पीने से फायदा होता है।

- चंद्रप्रभावटी एवं वृद्धिवाधिका वटी की दो-दो गोली को सुबह और शाम के समय लेने से भी आकार में बदलाव होता है।
कांचनार और गुग्गुलू की दो-दो गोली सुबह-शाम लेने से भी लाभ होता है। वरुण, पुनर्नवा, मकोय और कांचनार के अर्क को गोमूत्र के साथ लिया जा सकता है।

योग भी है सहायक
आनुवांशिक कारण होने की स्थिति के अलावा यदि इस रोग की शुरुआती स्टेज है तो कपालभाति, गोमुखासन, सिद्धासन व मूलबंधासन कर सकते हैं। इन्हें कहीं भी और कभी भी किया जा सकता है।



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जानिए आयुर्वेद और होम्योपैथी चिकित्सा से कैसे करें हाइपरथर्मिया और हाइपोथर्मिया इलाज

शरीर का तापमान अचानक बढऩे की स्थिति को हाइपरथर्मिया और घटने को हाइपोथर्मिया कहते हैं। बच्चों से लेकर बड़ों और महिलाओं सभी को यह दिक्कत हो सकती है। दिमाग के हाइपोथैलेमस (शरीर का तापमान कंट्रोल करने वाला भाग) के प्रभावित होने से यह दिक्कत होती है। जानते हैं इस बीमारी का उपचार आयुर्वेद, होम्यापैथी और एलोपैथी चिकित्सा में कैसे करते हैं?

आयुर्वेद -
हाइपो के मुकाबले हाइपरथर्मिया के मामले ज्यादा दिखते हैं। आयुर्वेद के अनुसार महिलाओं के शरीर की प्रकृति गर्म मानी गई है। ऐसा खट्टी, तलीभुनी व मसालेदार चीजें अधिक खाने के अलावा अनियमित माहवारी होना है। जन्म के बाद बच्चा जब नए वातावरण में आता है तो उसके शरीर का तापमान बाहरी टेम्प्रेचर को सहन नहीं कर पाता जिससे उसका तापमान बढ़ जाता है।

इलाज- महिलाओं को शतावरी लेने के लिए कहते हैं ताकि इम्यूनिटी बढऩे के साथ कमजोर हड्डियों को ताकत मिले और माहवारी सामान्य हो। इसके अलावा तापमान बढ़ने पर उषीरासव, धतररिष्ठ, आंवले का पाउडर, मुलैठी चूर्ण, खश, पित्तपापड़ा व नागर जैसी औषधियां प्रयोग में लेने की सलाह देते हैं। तापमान घटने पर प्रध्वाचिंतामणि, केसर, कस्तूरी याकुतिरस व वातव्याधिरस आदि देते हैं।

ध्यान रखें -
पीरियड्स यदि सामान्य न हो तो डॉक्टरी सलाह लें। आयुर्वेद में बुखार को अच्छा माना जाता है। जिसके 2-3 दिन तक बने रहने से विषैले तत्त्व त्वचा के जरिए पसीने के रूप में बाहर निकलते हैं। ऐसे में यदि बार-बार बुखार आए तो तुरंत इलाज लें। ज्यादा मसालेदार व तलाभुना भोजन न लें।

होम्योपैथी -
हाइपो बच्चों और बुजुर्गों में ज्यादा होता है। जिसका कारण कमजोर प्रतिरोधी तंत्र है। वहीं हाइपरथर्मिया, बुखार से अलग है जिसमें तापमान बढ़कर स्थिर हो जाता है। कंफ्यूजन, बोलने में दिक्कत, भूख न लगना, अनिद्रा प्रारंभिक लक्षण है। ऐसे में तुरंत उपचार लें। लो ब्लड प्रेशर, थायरॉइड के रोगी, ठंड लगना या शरीर में पर्याप्त प्रोटीन की मात्रा न हो तो यह इसकी आशंका अधिक रहती है।

इलाज-
इस पद्धति में हाइपो व हाइपर दोनों का इलाज शुरुआती अवस्था में अलग-अलग दवाओं से होता है। रोगी की स्थिति, लक्षण और गंभीरता के आधार पर उचित दवा का चयन करते हैं। आमतौर पर तापमान नियंत्रित करने के लिए बेलेडोना और ट्यूक्लीनिंग दवा देते हैं। ज्यादातर मामले इमरजेंसी के आते हैं जिसके लिए फिजिशियन के पास रेफर कर देते हैं।

ध्यान रखें-
जो लोग शराब पीने के आदी हैं उनमें हाइपरथर्मिया घातक हो सकता है। इसका कारण उनके शरीर की गर्मी का त्वचा के जरिए पसीने के रूप में न निकलना है। हीट स्ट्रोक की स्थिति बने तो तुरंत डॉक्टरी सलाह जरूर लें। अचानक ठंडे से गर्म या गर्म से ठंडे वातावरण में न जाएं।

ये बातें रखें ध्यान -
सूरज की तेज किरणें और इससे होने वाले पानी की कमी से शरीर का तापमान बिगड़ जाता है। यह अवस्था बुखार से अलग होती है क्योंकि इसमें तापमान बढ़कर या घटकर स्थिर हो जाता है। वहीं बुखार होने पर शरीर का तापमान घटता और बढ़ता रहता है। ऐसे में जरूरी है कि कुछ बातों का ध्यान रखा जाए। जैसे इस मौसम में डाइट में कुछ बदलाव जरूरी हैं ताकि शरीर को पर्याप्त नमी मिले और तापमान नियंत्रित रहे।

बुखार तेज होने पर रोगी को ठंडी हवा में आराम कराएं।
यदि रोगी के शरीर का तापमान 103डिग्री फेरनहाइट हो जाए तो सिर पर ठंडे पानी की पट्टी बार-बार रखें।
मरीज के शरीर को दिन में 3-4 बार गीले तौलिए से पौछें।
चाय या कॉफी आदि पीने को न दें।
लंबे समय तक एसी या कूलर में बैठने के बाद अचानक तेज सूरज की किरणों के संपर्क में न आएं।
ऐसे नवजात जो जन्म के समय कमजोर और कम वजन के साथ पैदा होते हैं उन्हें तुरंत स्पेशल केयर यूनिट में रखा जाना चाहिए।
लिक्विड डाइट जैसे दही, मट्ठा, जीरा वाली छाछ, जलजीरा, लस्सी, आमपना आदि पीते रहें।
भोजन में ठंडी तासीर वाली चीजें खाएं।
रोजाना एक मौसमी फल कच्चा खाएं या फिर इनका जूस भी पी सकते हैं।
शराब और धूम्रपान से तौबा करें।
बिना डॉक्टरी सलाह के किसी भी तरह की दवाएं न लें। ये शरीर में गर्मी बढ़ाती हैं।
घर से बाहर निकलते समय स्कार्फ से चेहरा ढकें और आंखों को सूरज की तेज किरणों से बचाने के लिए सनग्लास पहनें।
किसी भी लक्षण को लंबे समय तक नजरअंदाज न करें।



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उत्तकों के क्षतिग्रस्त होने पर हाेता है लिवर सिरोसिस

यह एक गंभीर स्थिति है जिसमें लिवर के ऊत्तक अत्यधिक क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। आमतौर पर लिवर में खुद के क्षतिग्रस्त ऊत्तकों की मरम्मत करने की क्षमता होती है। लेकिन इस रोग में लिवर के ऊत्तक इतने ज्यादा क्षतिग्रस्त हो जाते हैं कि उनकी मरम्मत होना संभव नहीं हो पाती।

लक्षण
जब तक लिवर को ज्यादा नुकसान न पहुंच जाए तब तक लक्षणों की पहचान करना मुश्किल है। थकान, शरीर पर खुजली, आंखों व त्वचा का पीला होना, पेट में पानी भरना, भूख न लगना, उल्टी, पैरों में सूजन, भ्रम, बोलने में परेशानी व त्वचा पर रक्त नलिकाओं का उभरना जैसी समस्याएं होने लगती हैं।

कारण
हेपेटाइटिस, संक्रमण जैसी समस्याओं से लिवर प्रभावित होता है। जो लिवर सिरोसिस का कारण बनता है। प्रमुख कारणों में शराब पीने की लत, हेपेटाइटिस-बी और सी हैं। लिवर में वसा और कॉपर का जमाव, सिस्टिक फाइब्रोसिस, शरीर में आयरन का स्तर बढ़ना, आनुवांशिकता व कुछ दवाओं के दुष्प्रभाव अन्य वजहें हैं।

जटिलताएं
सिरोसिस के कारण लिवर से रक्तका सामान्य प्रवाह धीमा हो जाता है जिससे नसों में दबाव बढ़ता है। उच्च रक्तदाब से पैरों व पेट में पानी जमा होने लगता है जिससे सूजन आ जाती है। मरीज की इम्यूनिटी कम होने से लिवर कैंसर व फेल्योर की आशंका रहती है।

उपचार
रोग के कारण और उसकी गंभीरता पर इलाज निर्भर करता है।



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