Saturday, 31 August 2019

अगर दिनभर रहती है थकान तो जानें टैट सिंड्रोम के बारे में

भागदौड़ भरी जिंदगी में थकान आम बात हो गई है। आजकल जिसे देखो वह थका नजर आता है। ऐसे में हर पांच में से तीन व्यक्ति दिनभर थके होने की शिकायत करते हैं। इसे टैट सिंड्रोम यानी टायर्ड ऑल द टाइम कहते हैं।

ये बचाएंगे रोग से -
सुबह आधा घंटा प्राणायाम, मेडिटेशन व डीप ब्रीदिंग जैसे वर्कआउट करें। आधा घंटा हरे-भरे वातावरण में बिताएं। रात को सोने का समय तय करें। दूध, दही, पनीर, साबुत अनाज, फल-सब्जियां खाएं।

सेड्स उपयोगी -
स्वस्थ तन और मन के लिए 'सेड्स' फॉर्मूला (स्लीप, एक्सरसाइज, डाइट व स्प्रिचुअलिटी) कारगर है। पर्याप्त नींद, रोज 30 मिनट एक्सरसाइज, पौष्टिक व सुपाच्य खुराक और दिनभर में कुछ समय अध्यात्म में लगाना स्वस्थ शरीर की कुंजी है।

हर समय थकान क्यों ?
चौबीसों घंटे, सातों दिन काम करने की प्रवृत्ति के कारण व्यक्ति को कभी फुरसत के दो पल नहीं मिल पाते। घर पर रहें या ट्रैवल करते रहें तो भी लोग सोशल मीडिया के जरिए लगातार दूसरों से संवाद करते रहते हैं। ऐसे में उनका मन और शरीर कभी शांत और रिलैक्स नहीं रह पाता।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2MNQe4N

जानिए त्वचा और बालों को विटामिन- ई से होने वाले फायदों के बारे में

त्वचा की रौनक बढ़ानी हो या बालों को घना-चमकदार करना हो तो विटामिन-ई उपयोगी है। मार्केट में विटामिन-ई से युक्त कई ब्यूटी प्रोडक्ट्स के अलावा इसके कैप्सूल भी मौजूद हैं। जानें इसके फायदों के बारे में..

स्ट्रेच माक्र्स हटाए -

गर्भावस्था के दौरान महिला को त्वचा पर निशान (स्ट्रेच माक्र्स) की समस्या रहती है। बचाव के लिए दो विटामिन-ई के कैप्सूल को निचोड़कर इसका तेल निकालें व एक बड़ा चम्मच नारियल तेल व ऑलिव ऑयल में मिलाएं। इस मिश्रण को थोड़ा-थोड़ा एक सप्ताह तक रोजाना प्रभावित हिस्से पर लगाएं।

त्वचा को दे नमी -
एक चम्मच मलाई लेकर उसमें एक विटामिन-ई का कैप्सूल निचोड़ें और अच्छे से मिक्स कर लें। सोने से २० मिनट पहले इस मिश्रण को चेहरे के अलावा हाथ-पैरों और शरीर के किसी भी रूखे हिस्से पर लगा सकते हैं। इसके बाद गुनगुने पानी से इसे धो लें। यह एक तरह से बॉडी लोशन का काम करेगा।

बालों को करे घना -
विटामिन-ई बालों की अच्छी ग्रोथ के लिए बेहद जरूरी है। इसके लिए जब भी बालों को धोना हो उससे दो घंटे पहले एक कैप्सूल को निचोड़ लें। इसमें जो तेल आप नियमित इस्तेमाल में लेते हैं जैसे नारियल, सरसों, आंवला, भृंगराज आदि को जरूरत के हिसाब से मिक्स करें। अब इसे बालों की जड़ पर लगाकर मालिश करें। दो-मुंहे बालों की समस्या में भी इसका प्रयोग कर सकते हैं।

दाग-धब्बे दूर करे -
चेहरे पर यदि दाग-धब्बे, मुहांसे, कील या आंखों के नीचे काले घेरे बने हैं तो भी इसे प्रयोग में ले सकते हैं। एक कैप्सूल को निचोड़कर इसे प्रभावित भाग पर लगाएं। यह सीरम की तरह काम करेगा। रातभर इसे लगाकर छोड़ें व सुबह सामान्य पानी से चेहरा या प्रभावित हिस्सा धो लें। कैप्सूल के तेल को विभिन्न फेसपैक में भी मिला सकते हैं।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2Zsehx8

Swine Flu: अगर दिखाई दें ये लक्षण तो हो सकते हैं स्वाइन फ्लू के संकेत

देशभर में तेजी से फैलती जा रही है स्वाइन फ्लू बीमारी। इससे निपटने के लिए रोग क्या है, कैसे फैलता है, क्या सावधानी बरतें और उपचार के विकल्पों के बारे में जानना जरूरी है। आइये जानते हैं इसके बारे में।

क्या है स्वाइन फ्लू -
स्वाइन फ्लू एच1एन1 टाइप के वायरस से फैलने वाला रोग है। यह तेजी से फैलकर नाक, फेफड़ों व गले पर असर करता है। 2009 में यह वायरस पूरी दुनिया में फैला था, तब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे महामारी घोषित किया था। हालांकि इससे घबराने की जरूरत नहीं, समय पर लक्षणों की पहचान कर इलाज लेने से रोग पर काबू पाया जा सकता है। लेकिन देरी होने पर यह वायरस बुखार, खांसी और सांस में तकलीफ को बढ़ा सकता है और निमोनिया का कारण भी बनता है। श्वांस तंत्रिका के कार्य बंद कर देने से मौत भी हो सकती है।

संक्रमण व सावधानी -
यह वायरस संक्रमित व्यक्ति के खांसने, छींकने, हाथ मिलाने व गले मिलने से फैलता है। इस दौरान मुंह और नाक से निकली छोटी बूंदों से यह वायरस फैलता है। वहीं यह वायरस स्टील या प्लास्टिक में 24-48 घंटे, कपड़ों में 8-12 घंटे, टिश्यु पेपर में 15 मिनट तक और हाथों में 30 मिनट तक सक्रिय रहता है।

बचाव : साफ-सफाई रखें। शुरुआती लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर को दिखाएं व दूसरों से एक मीटर की दूरी बनाकर रखें। बीमार होने पर स्कूल, ऑफिस, मंदिर या सार्वजनिक जगह पर जाने के बजाय घर पर रहें। हाथों को साबुन-पानी से दिन में कई बार धोएं। छींकते समय रुमाल या टिश्यु पेपर प्रयोग में लें। टिश्यु पेपर को खुले स्थान में न फेकें। आंख, नाक व मुंह बार-बार न छुएं, न ही हाथ मिलाएं। लिक्विड डाइट लें। रोगी के परिजन मुंह पर मास्क लगाकर रखें।

ये सावधानी बरतें : कमजोर इम्युनिटी, 60 वर्ष से अधिक उम्र के व्यक्ति, लिवर, किडनी, डायबिटीज, दमा व एड्स के रोगी, नवजात शिशु व छोटे बच्चे और गर्भवती महिलाएं बचाव के तरीकों को अपनाएं।

इलाज के तरीके -
एंटीवायरल दवाएं टेमीफ्लू व रेलंजा के अलावा कफ सिरप व पैरासिटामॉल देकर लक्षणों में कमी लाते हैं। वहीं आयुर्वेद में इम्युनिटी बढ़ाने के लिए योग करने और गिलोय, नीम, तुलसी व आंवले का रस पीने, जिंक युक्त दालें, सूखे मेवे, तिल, कद्दू व मशरूम, विटामिन-सी से युक्त चीजें खाएं। नीम, तुलसी, हल्दी, मुलैठी के साथ ऑलिव ऑयल व पिसी कालीमिर्च मिलाकर काढ़ा पीएं। इंफ्लुएंजीनम, जेलसेमियम, जैसी होम्योपैथी दवाएं इम्युनिटी बढ़ाने के लिए दी जाती हैं।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2ZLw41L

Salt therapy: श्वसन रोग के लिए फायदेमंद है सॉल्ट थैरेपी, जानें इसके बारे में

सॉल्ट थैरेपी या हेलोथैरीपी, दवा रहित व नैचुरल थैरेपी है। इसमें व्यक्ति को नमक की दीवारों व फर्श के बीच रखते हैं। इस नमक को रोगी की बॉडी धीरे-धीरे अवशोषित करती है। साइनुसाइटिस, एलर्जी, अस्थमा व श्वास संबंधी रोगों में यह थैरेपी उपयोगी है। रोग की स्थिति के अनुसार नमक के दाने का आकार तय करते हैं।

नमक में ये गुण -
थैरेपी में प्रयोग हुए नमक में कैल्शियम, सोडियम व मैग्नीशियम जैसे मिनरल्स होते हैं। व्यक्ति की उम्र और स्थिति के अनुसार थैरेपी की समय अवधि तय करते हैं। रोग की एक्यूट अवस्था में इसे प्रयोग में नहीं लेते हैं।

कई हैं फायदे :
थैरेपी लेने के दौरान नमक के कण सांस के जरिए फेफड़ों तक पहुंचते हैं जिससे संक्रमण के साथ समस्या में राहत मिलती है।
इस थैरेपी का कोई दुष्प्रभाव नहीं होता। त्वचा संबंधी, टॉन्सिलाइटिस या फायब्रॉइड्स की समस्या में भी यह लाभदायक है।
45 मिनट की इस थैरेपी में कमरे में नमी और तापमान (18-22 डिग्री सेल्सियस) समुद्री स्थान जैसा होता है।
गर्भवती महिलाएं भी इसका फायदा उठा सकती हैं।
सॉल्ट थैरेपी के बाद व्यक्ति ताजगी महसूस करता है।
त्वचा पर होने वाले छोटे-मोटे निशान दूर होने के बाद त्वचा चमकदार बन जाती है।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2LhSL45

Eye Donation Week: जानिए नेत्रदान कब और कैसे किया जा सकता है

हर साल नेत्रदान पखवाड़ा (Eye Donation Week) 25 अगस्त से 08 सितंबर तक मनाते हैं। इसका उद्देश्य नेत्रदान से जुड़ी भ्रांतियों को दूर करना और कॉर्निया ट्रांसप्लांटेशन के बारे में लोगों को जागरूक करना है।

ये कर सकते आंखें दान -
किसी भी उम्र के व्यक्ति की स्वस्थ आंखों का कॉर्निया प्रत्यारोपित हो सकता है। जिनकी मृत्यु आकस्मिक दुर्घटना, हार्ट अटैक या लकवे से हुई है उनका कॉर्निया श्रेष्ठ, जिनकी मृत्यु ब्लड प्रेशर, मधुमेह, अस्थमा या हृदयरोग के कारण हुई है उनका कॉर्निया उत्तम माना जाता है।

सेप्टीसीमिया, वायरल संक्रमण, जलकर, डूबकर, जहर खाकर, फांसी से, टीबी, क्रॉनिक बुखार, सिफलिस, एड्स से हुई मृत्यु के व्यक्ति का कॉर्निया उपयोगी नहीं होता।

एक कॉर्निया, कई लाभ -
भारत में हर साल 1 करोड़ लोगों की मौत होती है जबकि सिर्फ 45 हजार आंखें दान होती हैं। रिसर्च कहती है कि एक कॉर्निया चार लोगों को नेत्र ज्योति दे सकता है।

पारदर्शी पुतली लगाई जाती है-
कॉर्निया प्रत्यारोपण (किरेटोप्लास्टी) में पारदर्शी पुतली प्रत्यारोपित करते हैं। यह खास प्रकार की माइक्रोस्कोपिक सर्जरी है जिसमें दान की हुई आंख से पारदर्शी कॉर्निया निकालकर मरीज के अपारदर्शी कॉनिया की जगह लगा देते हैं। भारत में कॉर्निया की खराबी से अंधता (कॉर्नियल ब्लाइंडनेस) के मामले ज्यादा सामने आ रहे हैं।

नेत्रदान कब और कैसे -
मृत्यु के बाद 6 घंटे के अंदर मृत्यु की सूचना आई हॉस्पिटल, आई बैंक या प्रमुख सरकारी नेत्र विशेषज्ञों को फोन से देनी होती है। नेत्र विभाग का कोई डॉक्टर या प्रशिक्षित आई बैंक टेक्नीशियन, व्यक्ति के घर जाकर मृतक की आंख का कॉर्निया निकालकर खाली जगह पर आर्टिफिशियल कॉन्टेक्ट लैंस लगा देता है। ताकि नेत्रदान करने वाले का चेहरा विकृत न दिखे। यह निशुल्क है।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2zOmooB

मधुमेह -हाईबीपी के मरीज ब्रेन स्ट्रोक से एेसे बचें

बे्रन स्ट्रोक दोबारा न हो, क्या सावधानी बरतें?

सबसे पहले पैरालिटिक स्ट्रोक (शरीर के एक तरफ लकवे की स्थिति) क्लॉट जमने की प्रवृत्ति को कम करने के लिए रक्तपतला करने की दवाएं लें। यदि रोगी हाई बीपी, मधुमेह या कोलेस्ट्रॉल कम करने की दवा ले रहा है तो वह उन्हें नियमित ले। धूम्रपान करते हैं तो तुरंत बंद करें। नियमित रूप से एक्सरसाइज कर वजन कम करें। तला-भुना भोजन व नमक कम ही खाएं। हृदय संबंधी रोगों से भी बे्रन स्ट्रोक हो सकता है। इसलिए चेकअप कराएं।

यदि व्यक्ति हाई बीपी के लिए नियमित दवाएं ले तो क्या उसे फिर भी ब्रेन स्ट्रोक हो सकता है?
हाई ब्लड प्रेशर की शिकायत पर नियमित दवाएं लेने से ब्रेन स्ट्रोक का खतरा कम हो जाएगा लेकिन समाप्त नहीं। रोग के कई कारणों में से हाई बीपी एक है। ऐसे में यदि ब्लड प्रेशर नियंत्रित है और दूसरे कारक अनियंत्रित हों तो भी स्ट्रोक का खतरा रहता है।

ब्रेन स्ट्रोक के लक्षण क्या हैं?
इसके लक्षणों को अंग्रेजी के शब्द फास्ट (एफएएसटी) से पहचान सकते हैं। एफ (फेस) चेहरा टेढ़ा होना। ए (आर्म) एक हाथ का काम न करना। एस (स्पीच) बोलने, समझने में दिक्कत और टी (टाइम) इमरजेंसी है। स्ट्रोक से पीड़ित को तुरंत अस्पताल ले जाएं। कुछ और लक्षण भी दिखाई देते हैं, लेकिन ये सबसे प्रमुख हैं।

क्या ब्रेन स्ट्रोक पर काबू पाया जा सकता है?
हां, स्ट्रोक के लक्षण दिखने पर रोगी को तुरंत अस्पताल पहुंचाएं। यहां क्लॉट डिजॉल्विंग ड्रग्स देकर या इंटरवेंशन तकनीक से क्लॉट निकालकर रोग को शुरूआती स्टेज में नियंत्रित कर सकते हैं। बड़े अस्पतालों में इलाज के लिए आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2LnlS6f

जांघों की मांसपेशियों को मजबूत बनाते हैं ये योगासन, एेसे करें

लंबे समय तक चलने या बैठे रहने से पैरों में खासकर जांघों में दर्द होने लगता है। कूल्हों में लगी किसी चोट या खिंचाव के कारण भी यह दर्द होता है। कुछ योगासन ऐसे हैं जिन्हें नियमित तौर पर करके जांघों के दर्द से राहत पाई जा सकती है। जानें इनके बारे में विस्तार से...

पर्श्वोत्तनासन –
ऐसे करें: ताड़ासन की मुद्रा में खड़े होकर हाथों को पीठ के पीछे लाकर हथेलियों से नमस्कार मुद्रा बनाएं। पैरों के बीच 3 फुट का गैप दें। फिर शरीर को पहले दाईं ओर घुमाएं। सांस अंदर लेते हुए कमर से ऊपर का शरीर नीचे झुकाएं। इस दौरान ठुड्डी को घुटने पर लगाएं। घुटना मोड़े नहीं। ध्यान रहे कि बाएं पैर का पंजा जमीन पर टिका रहे। कुछ देर इस अवस्था में रुककर प्रारंभिक स्थिति में आएं। बाएं पैर से भी दोहराएं।
इसे करने से खासकर शरीर का ऊपरी भाग मजबूत होता है। लेकिन इस भाग के झुकाव से निचले भाग में खिंचाव होता है जिससे जांघों की मांसपेशियों में ताकत आती है।
ध्यान रखें : पीठ या हाथों में कोई चोट लगी हो तो इसे न करें।

टिट्टिभासन -

ऐसे करें : सीधे खड़े होकर आगे की ओर झुकते हुए जमीन पर हथेलियां रखें। पंजों के बीच गैप दें। अब कोहनी व कंधों के बीच के भाग को पैरों के बीच ऐसे लाएं कि जांघें इस भाग से स्पर्श हों। हाथों को मजबूती से जमीन पर टिकाएं। फिर हाथ के इस भाग पर जांघ टिकाएं। पंजों को सामने की ओर लाएं। अब सामान्य स्थिति में आ जाएं।
ध्यान रखें: कोहनी या कंधे से जुड़ा हाल ही कोई ऑपरेशन हुआ हो तो इस अभ्यास को न करें।

स्कंधासन

ऐसे करें : दोनों पैरों के बीच 2-3 फुट का गैप देकर सीधे खड़े हो जाएं। अब घुटने मोड़ते हुए कुर्सी के आकार में बैठें। अब पहले बाएं घुटने को मोड़कर इस पैर के पंजे पर बैठें। इस दौरान दायां पैर दाईं ओर सीधा रहेगा। इसके बाद दाएं पैर से भी ऐसा ही करें। इस दौरान यदि संतुलन बिगड़े तो हथेलियों को जमीन पर टिकाएं या हथेलियों की नमस्कार मुद्रा बना सकते हैं।
इसे हाफ स्क्वैट पोज या साइड लंज भी कहते हैं। जांघों को मजबूती देने के साथ यह आसन कूल्हों-पंजों की ताकत बढ़ाता है। अधिक वजन वाले ऐसे व्यक्ति जिनकी जांघों वाले भाग में अधिक चर्बी हो, वे इसका अभ्यास कर सकते हैं। घर या जिम में भी इसे कर सकते हैं।
ध्यान रखें : हाल ही जिनके पैरों से जुड़ी कोई सर्जरी हुई है तो वे इसे न करें।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2HC9gqE

Friday, 30 August 2019

Fitness mantra: जानें डांस के फायदे, शरीर को मिलेगा ये लाभ

बढ़ता लचीलापन (Increased flexibility)
आजकल देखा जा रहा है कि सिर्फ उम्रदराज लोगों को ही जोड़ों में दर्द की समस्या नहीं होती बल्कि युवा भी इस समस्या से पीडि़त हैं। जरूरी नहीं कि डांस सिर्फ युवाओं के लिए अच्छा है। किसी भी उम्र का व्यक्ति हल्का-फुल्का डांस वर्कआउट के रूप में कर जोड़ों में लचीलापन ला सकता है। इसी के साथ पोस्ट-एक्सरसाइज सोरनेस यानी वर्कआउट के बाद जोड़ों व मांसपेशियों में खिंचाव, दर्द के साथ सूजन की समस्या में भी राहत मिलती है।
डांस एरोबिक्स (Dance aerobics)
डांस एरोबिक्स यानी संगीत की धुनों के जरिए जॉगिंग, रनिंग, साइक्लिंग आदि कर बॉडी को टोन रखना। शारीरिक रूप से सेहतमंद होने के साथ व्यक्ति मानसिक रूप से रिलैक्स महसूस करता है। इसमें हिप-हॉप, साल्सा, जैज और डांस के अन्य फॉर्म करने के दौरान वर्कआउट व मनोरंजन एकसाथ हो जाता है। डांस एरोबिक्स में हिप हॉप एरोबिक्स, बॉलीवुड एरोबिक्स आदि शामिल हैं।
घटता तनाव (Decreasing stress)
कई शोधों के अनुसार जो व्यक्ति कम उम्र से ही डांस प्रेक्टिस करते हैं उनमें तनाव के अवसाद में तब्दील होने के मामले बेहद कम सामने आते हैं। डांस का दिमाग पर सकारात्मक असर होता है जिससे मन भी प्रसन्न रहता है। उनमें सोचने-समझने के साथ रचनात्मकता दिखाने की कला भरपूर होती है।
फायदे हैं अनेक (Benefits are many)
कम से कम 5 मिनट डांस फ्लोर पर किए गए डांस से शरीर की 30 कैलोरी बर्न हो जाती है। यदि कोई एक माह में 5-10 किलो तक वजन कम करना चाहे तो 30 मिनट तक की डांस प्रेक्टिस मददगार होती है। हाथ-पैरों के साथ ही पूरे शरीर की एक्सरसाइज करने के लिए भी डांस कर सकते हैं। इससे हाई ब्लड प्रेशर की समस्या नहीं होती। कमर के आसपास की चर्बी घटाने के लिए सालसा व बैले डांस कर सकते हैं। घर पर ही डांस कर वजन कम कर सकते हैं। यह जिम जॉइन करने जैसा ही होता है।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/32iVn8N

pregnancy care: प्रेग्नेंसी में हो सकती है सुबह-सुबह ये समस्या

शिशु की सुरक्षा (Baby safety)
प्रेग्नेंसी की शुरुआत से ही विशेषज्ञ व परिजन महिला को खानपान, चलने-फिरने, उठने-बैठने से लेकर कई बातों पर सावधानी बरतने के लिए कहते हैं। इन सभी की आदत महिला को पहले से नहीं होती व पहली तिमाही में ऐसा लगातार करने से भी कई बार शिशु की सुरक्षा का खयाल दिमाग पर हावी होने से मूड स्विंग की परेशानी होती है। २-३ माह में इन सभी की आदत होने के बाद महिला सामान्य हो जाती है।
हार्मोंस में बदलाव (Change in hormones)
गर्भावस्था के दौरान खासतौर पर एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर घटता व बढ़ता रहता है। ऐसे में प्रोजेस्ट्रॉन का स्तर ज्यादातर समय अधिक होता है ताकि गर्भस्थ शिशु को पोषण मिलता रहे। इससे स्ट्रेस हार्मोन कार्टिसोल पर असर होने से चिड़चिड़ापन आता है।
मिचली आना (Nausea)
गर्भधारण के बाद कुछ दिन महिला को बार-बार उल्टी आने जैसा लगता है। जिससे वह शारीरिक रूप से परेशान रहती है। साथ ही कुछ खाने का मन न होने, कब्ज, बार-बार यूरिन आने का अचानक सामना न कर पाने से उनमें खासकर सुबह चिड़चिड़ापन रहता है।
ये अपनाएं : महिला सबसे पहले स्वीकार करे कि उसके अंदर एक और जीव पल रहा है। फिर विशेषज्ञ से मिलकर काउंसलिंग ले ताकि शरीर में हो रहे बदलावों को समझे व जरूरी एहतियात बरतें।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2zASeFd

HEALTH NEWS : आज से ही छोड़ दीजिए रात में देर से खाना

क्या कहती है Health Research

अमरीका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में हुए शोध में खुलासा हुआ कि Late Night Eating की आदत का दिमाग पर बुरा असर पड़ता है। गलत समय खाने से दिमाग और शरीर की जैव घड़ी का तालमेल गड़बड़ा जाता है। लंबे समय तक ऐसा होने से मस्तिष्क को नई चीजें सीखने और उन्हें याद रखने में दिक्कतें आने लगती है।
समय से भोजन करेंगे तो होंगे ये फायदे
भागदौड़ भरी जिंदगी में खाने के लिए अक्सर लोग समय नहीं निकाल पाते हैं। साथ ही घर के खाने की बजाय बाहर से, इंस्टेंट फूड (फास्ट व जंक) खाते हैं। आयुर्वेद के अनुसार सही मात्रा व समय के अनुसार भोजन करने से शारीरिक व मानसिक बल, पूर्ण तृप्ति, पोषण, त्वचा की कांति व बुद्धि प्रखर होती है।
Late Night eating से ज्यादा दिक्कतें बढ़ेंगी
सुबह ब्रेकफास्ट व रात में डिनर का समय व तरीका दोनों बिगडऩे की वजह से शारीरिक दिक्कतें बढ़ रही हैं। सुबह उठने के दो से तीन घंटे में नाश्ता करना चाहिए। रात आठ से नौ बजे तक डिनर जरूरी है। डिनर हल्का व सुपाच्य होना चाहिए। इसके बाद जितना देर से डिनर करते हैं शरीर पर इसका उतना ज्यादा दुष्प्रभाव पड़ता है।
पाचन संबंधी बीमारियां होंगी
देर रात भोजन का सीधा दुष्प्रभाव पाचन क्षमता पर पड़ता है। पाचन शक्ति क्षीण होती है। भोजन अच्छे से पचता नहीं है। पेट फूलना, साफ न होना, कब्ज, बवासीर, बड़ी-छोटी आंत संबंधी बीमारियां हो सकती हैं।
अनिद्रा व थकान बढ़ेगी
देर रात खाने से भारीपन, थकान, अनिद्रा की शिकायत बढ़ती है। रात में नींद टूटती है। उच्च रक्तचाप, डायबिटीज, इनफर्टिलिटी की समस्या बढ़ती है। आदतों में बदलाव न करने से त्वचा व कैंसर जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
Cholesterol व Obesity की प्रमुख वजह है
देर रात खाने के बाद जल्दी सोने से लिवर पर दबाव बढ़ता है। भोजन अच्छे से पचता नहीं है, यह कोलेस्ट्रॉल के रूप में जमना शुरू हो जाता है। यह मोटापा व हृदय रोगों के प्रमुख कारणों में से एक है।
मस्तिष्क पर भी पड़ता है बुरा असर
पर्याप्त नींद नहीं ले पाने से मस्तिष्क पर गलत असर पड़ता है। इससे मूड में बदलाव की आशंका बढ़ती है। डिप्रेशन, निर्णय लेने की क्षमता घटती है। दिमाग को पर्याप्त आराम नहीं मिल पाता है, चिड़चिड़ापन बढ़ता है।

एक्सपर्ट : डॉ. एम. वली, सीनियर फिजिशियन सर गंगाराम हॉस्पिटल, नई दिल्ली



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/32ppEmD

6 माह तक ब्रेस्टफीडिंग कराने से शिशु को कम होंगी बीमारियां

अक्सर सुनने में आता है कि तंदुरुस्त बच्चा देश का भविष्य होता है। लेकिन ऐसा तभी संभव है जब उसकी देखभाल, लालन-पोषण व परवरिश गर्भावस्था के पहले दिन से शुरू हो जाए। शिशु के शारीरिक व मानसिक विकास के लिए सबसे अहम मां का दूध है। जिसके साथ समय-समय पर कुछ और चीजें भी दी जा सकती हैं।

इसलिए जरूरी मां का दूध-
मां का दूध शिशु के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इसमें मौजूद कोशिकाओं को बच्चे के अहम अंग आसानी से अवशोषित कर लेते हैं जिससे अंगों को ताकत मिलती है। यह उसके शरीर में विटामिन, मिनरल्स, प्रोटीन, फैट और एंटीबॉडीज जैसे जरूरी तत्त्वों की पूर्ति कर दिमाग और अन्य प्रमुख अंगों को पोषण देता है। इससे बचपन से ही उसके सोचने और समझने की क्षमता मजबूत होने लगती है। ब्रेस्टमिल्क शिशु को कई तरह से सेहतमंद रखता है।

अन्य चीजें भी दे सकते -
समय से पूर्व यदि प्रसव हो जाए या किसी अन्य वजह से बच्चा कमजोर रह जाए तो उसकी डाइट में अन्य चीजों को भी दूध के साथ दे सकते हैं। दूध के अलावा जब उसे कुछ और देना शुरू करते हैं तो इस स्थिति को कॉम्प्लीमेंट्री फीडिंग कहते हैं। इसके लिए आप दूध के साथ-साथ गाय का दूध, दाल का पानी, चावल का मांड, खीर, खिचड़ी, दलिया, सूजी लप्टा, आटा लप्टा, केले का शेक आदि खिला या पिला सकते हैं।

न बरतें लापरवाही - गर्भावस्था के दौरान जो कुछ भी महिला खाती है उससे गर्भस्थ शिशु को भी पोषण मिलता है। इसलिए महिला को आयरन, प्रोटीन, कैल्शियम युक्त चीजों को भोजन में शामिल करना चाहिए।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2zCqKi9

राजमा खाकर कम करें वजन, जानें ये खास बातें

इम्युनिटी बढ़ाए : राजमा में केवल प्रोटीन ही नहीं बल्कि एंटीऑक्सीडेंट तत्त्व भी भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। ये शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता को बढ़ाते हैं ताकि आमतौर पर होने वाले मौसमी रोगों से बचा जा सके।

वजन घटाने में कारगर : यदि आप वजन घटाना चाहते हैं तो इसे डाइट में शामिल करें। इसमें मौजूद फाइबर से भोजन के बाद पेट भरा हुआ महसूस होता है और खुराक कम हो जाती है। साथ ही यह ऊर्जा भी देता है जिससे इसे खाने के बाद काफी देर तक आप एनर्जेटिक महसूस करते हैं।

सीमित मात्रा में हो प्रयोग : राजमा अधिक मात्रा में खाया जाए तो नुकसान पहुंचा सकता है। इसे सीमित मात्रा में ही लेना बेहतर है। इससे शरीर में अधिक फाइबर और आयरन की मात्रा पहुंचने से पाचनतंत्र के अलावा अन्य अंगों पर भी असर पड़ता है। जिससे अपच की समस्या और विभिन्न अंगों को क्षति पहुंच सकती है।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/30JgCAo

चिकनपॉक्स के मरीजों को रहता है हर्पीज होने का खतरा

कई बार बचपन या फिर किशोरावस्था में हुई चिकनपॉक्स की बीमारी के इलाज के बाद भी वायरस शरीर के नर्वस सिस्टम में लंबे समय तक रहता है। हालांकि इस दौरान कोई लक्षण सामने नहीं आता। लेकिन शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होते ही यह वायरस अंदर ही अंदर इम्यून सिस्टम पर अटैक कर हर्पीज (त्वचा पर दाने निकलना) का कारण बनता है।

वायरस के दो प्रकार -
हर्पीज त्वचा संबंधी संक्रामक रोग है। यह दो तरह का होता है। हर्पीज जोस्टर व हर्पीज सिम्प्लैक्स। जिन्हें पहले कभी चिकनपॉक्स हो चुका हो उन्हें इसी के कारक वायरस वैरिसेला जोस्टर से हर्पीज जोस्टर होता है। इसमें शरीर के एक ही भाग में एक तरफ कई सारे दाने उभरते हैं। ये धीरे-धीरे पानी से भरे फफोलों का रूप ले लेते हैं। कई बार ये शरीर के दूसरे भाग या दोनों तरफ भी उभरते हैं। ऐसा एचआईवी, कैंसर रोगी, 40 से अधिक उम्र वाले व जिनकी इम्युनिटी कम हो, उन्हें होते हैं। वहीं सिम्प्लैक्स में मुंह के चारों तरफ और जननांग के आसपास दाने बार-बार उभरते हैं। यह हर्पीज सिम्प्लैक्स वायरस से होता है। 40 की उम्र से अधिक के लोगों में हर्पीज की आशंका ज्यादा होती है। कारण कमजोर इम्युनिटी है। 3-4 दिन पहले से दर्द होता है। इसके बाद प्रभावित भाग पर दाने उभरते हैं।

इलाज का तरीका -
एलोपैथी में 72 घंटों में एंटीवायरल दवाएं देते हैं। इसके साथ क्रीम या कैलामाइन लोशन दानों पर लगाने के लिए देते हैं। कम से कम 15-20 दिन इलाज चलता है। इसके अलावा जिन्हें चिकनपॉक्स नहीं हुआ उन्हें वैक्सीन लगाते हैं। वहीं हर्पीज सिम्प्लैक्स में 5 दिन दवा देते हैं।

होम्योपैथी में रोग के कारण व लक्षणों के आधार पर आर्सेनिक, जीनस एपिडेमिकस, बैलेडोना, ब्रायोनिया, रसटोक्स आदि दवा इलाज व बचाव के लिए देते हैं।

आयुर्वेद में हरिद्रा, मंडूक, ब्राह्मी, आमलकी, गिलोय, दूध, घी और च्यवनप्राश खाने की सलाह देते हैं ताकि इम्युनिटी बनी रहे।

प्रमुख लक्षण -
शरीर के प्रभावित हिस्से पर दाने उभरने के 3-4 दिन पहले दर्द होना। फिर इनमें जलन, दर्द या घाव बनना। तेज बुखार, कंपकपी, सिरदर्द, पेट संबंधी समस्या, शरीर के विभिन्न हिस्सों में दाने।

बचाव- साफ-सफाई का ध्यान रखें। पानी वाली फुंसियों को हाथ के नाखूनों से न फोड़ें । वर्ना संक्रमण फैलकर गंभीर रूप ले सकता है। बच्चों को टीका लगवाया जाना चाहिए।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2ZtF6kz

कई गंभीर बीमारियों के लिए फायदेमंद है कटहल, एेसे करें सेवन

कटहल में कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने के गुण होते हैं। इसे सब्जी या अचार के रूप में खाने से कैंसर का खतरा कम हो जाता है।

अस्थमा में कटहल की जड़ का उबला पानी पीने से वायुकोष खुलते हैं और अस्थमा की समस्या में फायदा होता है। उच्च रक्तचाप के मरीजों के लिए ये बहुत ही फायदेमंद है।

कटहल के बीज खून की कमी को दूर करते हैं। इनमें मौजूद थाईमीन तत्त्व रक्त कोशिकाओं का निर्माण करता है। कटहल में पाया जाने वाला पोटैशियम हार्ट से जुड़ी बीमारियां में फायदेमंद होता है।

पेट के अल्सर की समस्या है तो कटहल की सब्जी हफ्ते में 1-2 बार खानी चाहिए। इसमें भरपूर मात्रा में फाइबर होता है जो आंतों की सफाई करता है। कटहल में आयरन होता है इससे एनीमिया से बचाव होता है। इसे खाने से ब्लड सर्कुलेशन भी नियंत्रित रहता है।

अस्थमा के इलाज में भी ये कारगर औषधि है, कच्चे कटहल को पानी में उबालकर छान लें, जब ये पानी ठंडा हो जाए तो इसे पी लें, नियमित रूप से ऐसा करने से अस्थमा की समस्या में फायदा होता है।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2ZkWZ4O

जानिए दांतों से जुड़ी कॉर्टिकल इम्प्लांट तकनीक के बारे में

नए दांत लगाने में कॉर्टिकल इम्प्लांट तकनीक क्या है ?

दांत लगाने की पारंपरिक तकनीक कन्वेंशनल इम्प्लांट में जबड़े के कम कठोर भाग में नए दांत लगाते हैं। इसके बाद इम्प्लांट व हड्डी के जुडऩे का काफी इंतजार करना पड़ता है। लेकिन इन दिनों नए दांत लगाने में नई तकनीक कॉर्टिकल इम्प्लांट्स की मदद ली जाती है। यह तकनीक ऑर्थोपेडिक कॉन्सेप्ट पर काम करती है। इसमें इम्प्लांट को हड्डी के कठोर हिस्से पर या जबड़े में लगाया जाता है और इसके ऊपर नए दांत को लगा देते हैं। इसके जरिए 72 घंटों में नए दांत अपनी जगह फिक्स हो जाते हैं।

यह तकनीक किस तरह फायदेमंद है ?
चीरा रहित तकनीक होने के कारण इससे कम खून निकलता है और सूजन भी कम होती है। साथ ही पायरिया की समस्या में प्रभावित दांत को निकालकर इस तकनीक से नए दांत लगा सकते हैं। रोग से राहत मिलती है। इसमें तीन दिन का समय लगता है।

क्या हटाने-लगाने वाली बत्तीसी की जगह इस तकनीक से स्थायी दांत लगवा सकते हैं?
हां, कॉर्टिकल इम्प्लांट के जरिए स्थायी दांत लगवाए जा सकते हैं क्योंकि ये जबड़े की कठोर हड्डी में लगाए जाते हैं।

जबड़े के कैंसर में जहां हड्डी को हटा दिया जाता है, क्या ऐसे मरीजों को भी फिक्स दांत लगाए जा सकते हैं?
कैंसर के मरीजों में कैंसर प्रभावित जबड़े की हड्डी को हटा दिया जाता है। लेकिन आसपास की कठोर हड्डी में लंबे कॉर्टिकल इम्प्लांट लगाकर फिक्स दांत लगाए जा सकते हैं। मरीज उन दांतों से आसानी से खाना खा सकता है।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/32fOvsI

इस हार्मोन का लेवल गड़बड़ाने से भी हो सकती है गर्भधारण की समस्या

एक स्वस्थ बच्चे को जन्म देने के लिए शरीर में हार्मोन्स का संतुलित होना जरूरी है। खानपान के बदलते तौर-तरीके और रहन-सहन की गलत आदतों से सबसे पहले शरीर के विभिन्न हार्मोन असंतुलित होने लगते हैं। एंटी मुलेरियन हार्मोन (एएमएच) महिलाओं के शरीर में पाया जाने वाला जरूरी हार्मोन है। गर्भधारण में आने वाली दिक्कतों से जुड़े कारणों में ज्यादातर महिलाओं में इस हार्मोन की गड़बड़ी पाई जाती है। जानें इसके बारे में...

कम स्तर, इंफर्टिलिटी का कारण -
यह हार्मोन अंडाशय में बनता है। इसका स्तर यहां पर अंडाणुओं के प्रवाह को प्रभावित करता है। ऐसे में स्तर कम होना इंफर्टिलिटी (बांझपन) का एक कारण हो सकता है। महिलाओं के रक्त में इस हार्मोन का स्तर आमतौर पर उनके अच्छे ओवेरियन रिजर्व यानी अंडाशय द्वारा पर्याप्त मात्रा में फर्टिलाइज होने लायक एग सेल्स उपलब्ध कराने का संकेत है। यह हार्मोन छोटे विकसित फॉलिकल्स के जरिए बनता है।

इसलिए टैस्ट जरूरी - तेजी से बदलती जीवनशैली के कारण शरीर में होने वाले बदलाव समय से पहले होने लगे हैं। इस कारण महिलाओं में ओवेरियन रिजर्व समय से पहले घट या कम हो जाता है। ऐसे में एएमएच टैस्ट अंडाशय की कार्यप्रणाली को गहराई से जानने व मेनोपॉज की शुरुआत (45 की उम्र के आसपास) के बारे में बताता है। खासकर 20-25 साल की उम्र के दौरान, जब इसकी गुणवत्ता अच्छी होती है।

इस कारण होती कमी -
उम्र बढ़ने के साथ महिलाओं के अंडाशय में अंडों की कमी होने लगती है। ऐसा शरीर में पोषण तत्त्वों की कमी से होता है। खराब गुणवत्ता वाला भोजन करने, रक्तसंचार बेहतर न होने, असंतुलित हार्मोन व अन्य सेहत संबंधी समस्याओं के कारण भी महिलाएं गर्भधारण नहीं कर पातीं। इसके लिए सही खानपान लेने व तनाव न लेने की सलाह देते हैं। डाइट में हरी पत्तेदार सब्जियां, मौसमी फल और अंकुरित अनाज शामिल करें। खासकर कैल्शियम व आयरन की कमी को पूरा करने के लिए पालक व दूध उत्पाद लें।

हार्मोन का बनना -शिशु के विकास से लेकर जन्म लेने तक यह हार्मोन जरूरी है। इसका सही स्तर महिला की जीवनशैली पर निर्भर करता है। मासिक चक्र के हिसाब से हार्मोन का स्तर घटता-बढ़ता रहता है। हालांकि एंटी मुलेरियन हार्मोन के विकास की दर एक गति से होती है। गर्भधारण के समय एएमएच के साथ एफएसएच व एस्ट्रोडिल प्रमुख जांचें भी होती हैं। जिनसे गर्भाशय की स्थिति व गर्भस्थ शिशु के विकास की जानकारी मिलती है। इसके आधार पर इलाज तय होता है।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/32kCDWF

Thursday, 29 August 2019

जानिए वजन कम करने के लिए ये खास टिप्स

यदि आप दिनभर में 3000 कैलोरी लेते हैं तो उसी अनुसार हल्के व्यायाम कर वजन नियंत्रित रख सकते हैं- आइये जानते हैं कि किस तरह से कैलोरी बर्न करके शरीर का वजन कंट्रोल रखा जा सकता है।

सीढ़ियां चढ़ने-उतरने से शरीर में मेटाबोलिज्म बढ़कर कैलोरी बर्न होती है। साथ ही पैर भी चुस्त-दुरुस्त रहते हैं। एस्केलेटर्स के बजाय सीढ़ियों का उपयोग करें। 20-30 मिनट पैदल चलने से भी कैलोरी बर्न होती है। कैलोरी बर्न होगी तो शरीर का वजन भी कम होगा।

वजन कम करने के लिए डांसिंग भी एक अच्छी एक्सरसाइज है। यह एक्सट्रा कैलोरी को जमने से रोकती है और शरीर को लचीला बनाती है। इससे पसीना निकलता है और शरीर की कैलोरी बर्न होती है। संभव हो तो कम से कम 30 मिनट एरोबिक्स करें।

दौड़ना एथलीट के लिए ही जरूरी नहीं, सभी को क्षमता के अनुसार दौडऩा चाहिए। 1.5 किमी प्रति घंटे की गति से 15 मिनट दौडऩा शुरू करें। इससे हृदय स्वस्थ रहता है।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2NEULWQ

जानिए यूरिन इंफेक्शन से बचने के लिए ये खास घरेलू नुस्खे

यूरिन में इंफेक्शन की समस्या आम हो गई है। जिससे यूरिन करते समय जलन, कमर-पीठ के आसपास दर्द, बार-बार पेशाब जाने की इच्छा होती है। कुछ घरेलू नुस्खे अपनाकर इन समस्याओं से बचा जा सकता है। जानिए इन नुस्खों के बारे में।

रात को एक गिलास पानी में गेहूं के 10-15 दाने भिगोकर सुबह छानें। इस पानी में थोड़ी चीनी मिलाकर पीएं , इससे पेशाब में जलन नहीं होगी।

धनिया और आंवले के चूर्ण को बराबर मात्रा में मिलाकर रात को भिगो दें। सुबह इसे मसलकर छान लें। इस पानी को पीने से यूरीन इंफेक्शन की समस्या खत्म होगी। नारियल पानी में गुड़ व धनिया का चूर्ण मिलाकर पीने से यूरीन इंफेक्शन में आराम मिलता है।

इलायची के दाने और सौंठ का चूर्ण बराबर मात्रा में लेकर अनार के रस या छाछ में सेंंधा नमक मिलाकर पी लें। लक्षणों में कमी आएगी।

यूरिन इंफेक्शन के लक्षण -

पेशाब के दौरान दर्द या जलन होना।

पेशाब करने में ज्यादा समय लगना।

बार-बार पेशाब आना।

पेशाब से बदबू आना।

पेट के निचले हिस्से में दर्द होना।

हल्का बुखार होना।

कभी-कभी पेशाब के साथ खून आना।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2NyUYLo

जानिए प्रसव के बाद बॉडी मसाज कराने के फायदे और नुकसान

डिलीवरी के बाद महिलाओं का वजन बढ़ना आम बात है लेकिन मसाज करके शरीर के इस अतिरिक्त बढ़े हुए वजन को कम किया जा सकता है। स्त्री रोग विशेषज्ञ के मुताबिक प्रसव के बाद हल्के हाथों से बॉडी मसाज से त्वचा की मांसपेशियों को टोन कर महिलाएं फिट रह सकती हैं। बॉडी मसाज से रक्तसंचार बेहतर होने के साथ तनाव घटता है, शरीर की मासपेशियों में होने वाला दर्द खत्म होता है। डिलीवरी के समय पीठ, रीढ़ की हड्डी, कूल्हें, जांघों पर बहुत ज्यादा स्ट्रेस पड़ता है। बच्चे के जन्म के बाद बॉडी की मांसपेशियां शिथिल हो जाती है, मांसपेशियों में दोबारा स्फूर्ति लाने के लिए मालिश करवाना फायदेमंद होता है। मालिश करने से बॉडी में रक्त और ऑक्सीजन का संचार बढ़ने लगता है। जिससे शरीर में मौजूद विषैले तत्व बाहर निकलकर मांसपेशियां मजबूत होती हैं।

नुकसान -

सी सेक्शन के बाद घाव और स्ट्रेस ठीक होने तक मालिश नहीं करवानी चाहिए।

डिलीवरी के कम से कम तीन हफ्तों का अंतर होना जरूरी है। जबकि लोग नॉर्मल डिलीवरी के बाद मालिश जल्दी शुरू कर देते हैं। लेकिन एेसा नहीं करना चाहिए।

पेट के बल लेटकर पीठ की मालिश न करवाएं। पीठ की मालिश बैठकर करवाएं।

डिलीवरी के बाद मालिश करवाने से पहले अपने डॉक्टर की सलाह अवश्य लें।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2PvWOzo

बच्चों के लिए पौष्टिक है इटेलियन स्टफिंग वाली पिज्जा पॉकेट्स, एेसे बनाएं

क्रीम, चॉकलेट, बादाम, आम, आलूबुखारा, चीनी, खमीर, अनार, अनानास, सूखे मेवे, प्याज, पालक, पनीर, मशरूम, चीज़, अजवाइन, ऑलिव, तुलसी के पत्ते और 150 ग्राम आटा।

स्टफिंग बनाने के लिए कढाई में दो चम्मच तेल डालकर प्याज, पिसा पालक, मिर्च के दाने, अजवाइन मिलाएं। ठंडा होने के बाद पनीर मिलाएं। इटालियन स्टफिंग के लिए कढाही में दो चम्मच तेल डालकर उसमें प्याज, मशरूम, लालमिर्च, पिज्जा मसाला व अजवाइन मिला देंगे। इसे अलग निकालकर तुलसी की पत्तियां व चीज़ डालें। बाउल में एक कटोरी मैदा, नमक, खमीर का पानी डालकर गूंथकर दो घंटे के लिए रखें। छोटी लोई बनाकर बेलें, स्टफिंग भरकर ओवन में 10-15 मिनट तकसेकें। फल, सूखे मेवे, चॉकलेट आदि से सजाएं।

घर पर बने होने के कारण ये काफी पौष्टिक होते हैं। खासतौर पर ऐसे बच्चे जो मार्केट की चीजें खाना ज्यादा पसंद करते हैं उनके लिए यह अच्छा विकल्प है। इससे बच्चे बाहर की चीजें भी कम खाएंगे, उनके लिए ये एक अच्छा स्नैक हो सकता है।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2HwLVqh

दिमाग और मांसपेशियों के लिए फायदेमंद है स्वीट डिश नवरतन कोरमा, जानें बनाने का तरीका

जानिए नवरतन कोरमा के बारे में, ये दिमाग और मासपेशियों के लिए फायदेमंद है। जानिए इसको कैसे बनाया जाता है और इसके क्या फायदे हैं।

मशरूम, 4-5 बादाम, किशमिश, 15-20 काजू, 50 ग्राम कटा पनीर, मटर, अनारदाना, प्याज और विभिन्न रंगों के फल के अलावा क्रीम।

एक पैन में एक चम्मच देसी घी डालकर गर्म करें। इसके बाद इसमें कटा हुआ मशरूम, बादाम, मध्यम आकार में कटे फल, 8-10 किशमिश, आधी कटोरी मटर, बारीक कटा पनीर, 5-6 काजू मिलाकर पकाएं। 2-3 मिनट बाद इसमें सफेद ग्रेवी (प्याज, बादाम, काजू मिक्सी में पिसा हुआ) डालकर पकाएं। फिर 3-4 चम्मच क्रीम मिलाकर पकाएं। इसके बाद इसमें एक चम्मच पिसी कालीमिर्च मिलाएं। अच्छे से पकने के बाद बाउल में निकालें। इसपर एक चम्मच क्रीम, कसा हुआ पनीर व अनारदाना डालकर सर्व करें।

इसमें इस्तेमाल हुए सूखे मेवे दिमाग के साथ मांसपेशियों को भी मजबूत करते हैं। फल और क्रीम ऊर्जा देने का काम करते हैं। पनीर से कैल्शियम मिलता है। ये सेहत के लिए कई तरह से फायदेमंद है।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/30IExzV

जानिए बासी चावल खाने और सुबह उठकर पानी पीने के फायदे

रात को पकाए चावल सुबह खाने से पेट दुरुस्त

हम में से कई लोग रात को बनाए गए एक्स्ट्रा परांठे, चपातियां व चावल सुबह नाश्ते में खा लेते हैं। अमरीकी वैज्ञानिकों ने शोध में पाया कि रात को बनाकर रखे गए चावल सुबह खाने से पेट की गर्मी शांत होती है व अल्सर जैसे कई रोगों से राहत मिलती है। इसके लिए वैज्ञानिकों ने पकाए हुए चावल को मिट्टी के बर्तन में रखा। सुबह इसमें जो खमीर आया वह सेहतमंद पाया गया।

सुबह उठकर 2 गिलास पानी पीने से फायदा -
अक्सर सुनने में आता है कि कुछ लोग सुबह उठते ही दो गिलास गुनगुना पानी पीते हैं। कारण वजन कम करना या कब्ज की दिक्कत को दूर करना होता है। लेकिन क्या आप जानते हैं यह काम कैसे करता है। रातभर सोने के दौरान शरीर के विभिन्न हिस्सों में बलगम और बैक्टीरिया इकट्ठे हो जाते हैं। ऐसे में गुनगुना पानी अंदरुनी अंगों पर जमे कफ, बैक्टीरिया व अन्य विषैले तत्त्वों को बाहर निकाल देता है। इससे पेट से जुड़े रोगों में काफी लाभ होता है।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2UcXN62

Fit india movement: इन योगासनों से सेहत रहेगी फिट, तनाव से मिलेगी राहत

Fit india movement: थोड़ी शारीरिक गतिविधि के बावजूद थकान हो व बार-बार नींद आए तो दिक्कत बढ़ सकती है। खासकर तब जब पेशा दिनभर एक्टिव रहने का हो। पर्याप्त नींद लेने के अलावा कुछ योगासनों को सुबह के समय या कार्यस्थल पर कर एक्टिव रह सकते हैं। पीएम मोदी ने फिट इंडियां मूवमेंट (Fit india movement) की शुरुआत की है। तो आइये जानते हैं कि कैसे खुद को फिट रखा जाए।

पादंगुष्ठासन -
ऐसे करें : ताड़ासन में खड़े हो जाएं। इस दौरान कमर सीधी हो और पैरों पर जोर दें। अब कमर झुकाकर माथे को घुटने पर छूने का प्रयास करें। साथ ही हाथों की अंगुलियों से पंजों की अंगुलियों को छुएं। कोहनियां सीधी कर गहरी सांस लें। शरीर का ऊपरी हिस्सा ऊपर उठाकर कमर सीधी करें। अभ्यास को एक समय में 5-6 बार कर सकते हैं। शरुआती स्थिति में यदि शरीर लचीला न हो तो झुकने में दिक्कत होगी। अभ्यास धीरे-धीरे करें।
ये न करें : जिनके गर्दन या कमर में चोट लगी हो वे इसे करने से परहेज करें।
फायदे : यह आसन दिमाग को शांत कर रिलैक्स करता है। जांघों को मजबूती देता है।

डॉल्फिन पोज -
ऐसे करें : समतल जगह पर आसन बिछाकर खड़े हो जाएं। अब चित्र में दिखाएं अनुसार झुककर और हाथों को कोहनी तक जमीन पर रखें। चाहे तो अंगुलियों को फैलाकर या फिर मुट्ठी बांधकर रखें। पैरों को घुटनों से मोड़ें नहीं। पंजों से लेकर कूल्हों तक का हिस्सा एक सीध में होना चाहिए। सांस लेते हुए एडिय़ों को ऊपर उठाएं। दबाव पैरों के पंजों पर दें। सांस छोड़ते हुए कूल्हे ऊपर उठाएं। सिर नीचे की ओर हो। सामान्य सांस लेते हुए कुछ देर इस अवस्था में रुकें फिर प्रारंभिक अवस्था में आ जाएं।
ये न करें : हाथ, कंधे और पीठ में कोई चोट लगी है तो इसे न करें।
फायदे : थकान, अनिद्रा और सिरदर्द में राहत देने के साथ इससे शरीर के ऊपरी हिस्से जैसे कंधे, गर्दन और बाजुओं को ताकत मिलती है। शरीर लचीला होता है।

जानुशीर्षासन -
ऐसे करें : पैरों को सामने की ओर सीधे फैलाते हुए बैठ जाएं। कमर सीधी रखें। अब दाएं घुटने को मोड़कर तलवा बाईं जांघ के पास लाएं। दायां घुटना जमीन पर होना चाहिए। सांस भरते हुए दोनों हाथों को सिर से ऊपर ले जाकर खींचें। कमर को बाईं तरफ घुमाएं। सांस छोड़ते हुए आगे झुकें। ठुड्डी को पंजों की ओर बढ़ाएं। हथेलियों से पंजों को पकड़ने की कोशिश करें। 10-15 सेकंड इस अवस्था में रुककर सामान्य सांस लेते हुए प्रारंभिक स्थिति में आ जाएं।
ये न करें : पैर, कमर आदि से जुड़ी कोई दिक्कत हो तो न करें।
फायदे : शारीरिक और मानसिक रूप से शांति मिलती।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2ZuMUxC

Wednesday, 28 August 2019

मानसून के बाद होने वाली उल्टी-दस्त, पीलिया की समस्या के बारे जानें

बारिश के मौसम के जाते-जाते दूषित भोजन और पानी से पेट की बीमारियों के मामले बढ़ने लगे हैं। ऐसे में इस दौरान साफ-सफाई का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। जानते हैं इस मौसम में होने वाली सामान्य परेशानी उल्टी-दस्त और पीलिया से कैसे करें बचाव-

उल्टी और दस्त -
इसका कारण दूषित खानपान और पानी है। ऐसी स्थिति में बैक्टीरिया या वायरस का आंतों में संक्रमण हो जाता है। जिससे एक्यूट-गैस्ट्रोएंट्राइटिस (आंतों में सूजन) की दिक्कत होती है। लक्षण के रूप में उल्टी, दस्त और बुखार होना सामने आता है।

पीलिया - गर्मियों या मानसून मेंं पीलिया, वायरल हेपेटाइटिस के संक्रमण के कारण होता है। इनमें वायरल हेपेटाइटिस ए और ई का संक्रमण अधिक होता है। यह संक्रमण भी दूषित खानपान और पानी के कारण फैलता है।

लक्षण -
आंखों और पेशाब का रंग पीला होना, भूख न लगना, जी-मिचलाना, उल्टी-दस्त, बदनदर्द, सिरदर्द, कमजोरी, थकान, बुखार और पेट में दाईं ओर ऊपर की तरफ हल्का दर्द, कभी-कभी जोड़ों में दर्द होने जैसे लक्षण भी पीलिया के हो सकते हैं।

कारण -
उल्टी और दस्त के लिए वायरल, बैक्टीरियल, प्रोटोजोआ और परजीवी संक्रमण अहम कारण बनकर उभरते हैं। वहीं पीलिया हेपेटाइटिस-ए, बी, सी, डी या ई, संक्रमित सूर्इं लगवाने, असुरक्षित यौन सम्बंध बनाने, टैटू गुदवाने, दूषित भोजन, पानी और संक्रमित रेजर के इस्तेमाल से भी हो सकता है।

इलाज : उल्टी-दस्त होने पर डॉक्टर से संपर्क करें। आमतौर पर वायरल संक्रमण में वायरस का असर 7-8 दिन में स्वत: खत्म हो जाता है। लेकिन बैक्टीरियल व प्रोटोजोअल संक्रमण के लिए एंटीबायोटिक दवाएं दी जाती हैं। डिहाइडे्रशन की स्थिति में गेस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट से संपर्क करें। वे रोगी की गंभीरता की स्थिति के अनुसार उसे भर्ती करते हैं या ओआरएस घोल पीने की सलाह देते हैं। वायरल हेपेटाइटिस-ए व ई के बजाय बी, सी व डी के संक्रमण में एंटीवायरल दवाएं देते हैं।

बचाव : धूम्रपान और शराब से दूर रहें ये लिवर को नुकसान पहुंचाती हैं। ताजा खाना खाएं और उबला हुआ पानी पीएं। डाइट में फैट कम और प्रोटीनयुक्त आहार ज्यादा लें। कमजोरी अधिक होना, बेहोशी या शरीर के किसी हिस्से से खून आने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2MJHJYO

फेफड़ों के संक्रमण में रखें इन बातों का ध्यान, जानें इसके बारे में

फेफड़े शरीर का अहम अंग है जिससे व्यक्ति साफ व शुद्ध हवा सांस के रूप में लेता है। इसका काम सांस व भीतर पहुंच रही दूषित हवा को साफ करना है जिसके बाद यह रक्त में ऑक्सीजन बनकर मिलती है। लेकिन दूषित हवा के बीच सांस लेने से जब दूषित कण नाक व मुंह के साथ श्वास नलिका व फेफड़े तक को संक्रमित करते हैं तो यह लंग्स इंफेक्शन की स्थिति बनती है।

मुख्यत: तीन तरह का संक्रमण फेफड़ों पर असर करता है। बैक्टीरियल, वायरल और पैरासिटिक। इस इंफेक्शन से कई बार फेफड़ों में पानी भरने की भी तकलीफ सामने आती है। श्वास नलिकाएं दो हिस्सों में बंटी होती है जिसे ट्रैकिया कहते हैं। साथ ही नाक से गले तक के सभी छोटे और बड़े अंगों का काम ऑक्सीजन की अदला-बदली से होता है। ऐसे में सीने या फेफड़ों में होने वाला किसी भी तरह का संक्रमण फेफड़ों को कमजोर करता है। जिससे सांस लेने में तकलीफ होने लगती है।

एलोपैथी में उपचार-
सीने या फेफड़ों में इंफेक्शन को जल्द ठीक करने के लिए विभिन्न तरह की एंटीबायोटिक दवाएं दी जाती हैं। संक्रमण होने पर रोगी को ठंडा व बासी खाने से परहेज करना चाहिए। संक्रमण का स्तर बहुत अधिक होने पर रोगी को अस्पताल में भर्ती कर उसकी देखरेख करते हैं। दूषित वातावरण से बचाने के लिए मरीज को स्पेशल केयर भी दी जाती है। फेफड़ों में संक्रमण होने पर ब्लड की कुछ जांचें, सीने का एक्स-रे, बलगम की जांच और गंभीर परिस्थिति में सीने का सीटी स्कैन भी कराते हैं।

ऐसे होता असर -
खांसी होना कोई रोग नहीं है लेकिन यह रोगी होने का संकेत हो सकता है। फेफड़ों में श्वास नलिका के साथ वायु कोशिकाएं होती हैं जिनसे हवा छनकर अंदर जाती है व अशुद्ध हवा बाहर निकलती है। यहां मौजूद सीलिया (बरौनी) हानिकारक तत्त्वों को बाहर निकालती हैं। इस दौरान कोई भी बाहरी तत्त्व के फेफड़ों में जाने से खांसी आती है। लंबे समय तक यह समस्या बनी रहे तो सीलिया के क्षतिग्रस्त होने से सांस संबंधी रोग जैसे सीलिया, निमोनिया, ब्रॉन्काइटिस की आशंका बढ़ती है। दिक्कत बने रहने से संक्रमण दूसरे अंगों में भी फैलता है। जो आगे चलकर रेस्पिरेटरी अटैक का कारण बनता है। डॉक्टरी सलाह पर दवाएं लें।

समय पर हो पहचान - लंबे समय तक खांसी, सांस लेने में तकलीफ, थोड़ी देर काम करने पर थकान, सीढ़ी चढ़ने पर सांस फूलने, कफ के साथ खून आने, गले में दर्द, अनिद्रा, सोते समय खांसी, सीने में जकड़न व दर्द हो तो तुरंत इलाज लें।

इलाज -
आयुर्वेद- इस तकलीफ में रोगी को ताजा भोजन खाना चाहिए। घर की रसोई में मौजूद हल्दी, सौंठ, अदरक, कालीमिर्च जैसे मसालों का प्रयोग करने से संक्रमण के असर को कम किया जा सकता है। इसके अलावा पिप्पली को दूध के साथ लेने से फेफड़ोंं की कोशिकाएं मजबूत होती हैं और संक्रमण फैलने का खतरा कम होता है।

होम्योपैथी: सीने या फेफड़ों के संक्रमण को ठीक करने के लिए रोगी को लक्षणों के अनुसार होम्यापैथी दवा देते हैं। इसमें मुख्य रूप से एकोनाइट, आर्सेेनिक अल्बम, ब्रायोनिया एल्बा, क्लीम्यूर, लोबेला आदि लेने से राहत मिलती है। योग और प्राणायाम फेफड़ों को मजबूत बनाते हैं।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2ztN9yd

Tuesday, 27 August 2019

बारिश के मौसम में सबसे ज्यादा प्रभावित होती है त्वचा

मानसून में सबसे ज्यादा त्वचा प्रभावित होती है। शरीर की ढंग से सफाई न होने से त्वचा पर मैल की परत जमकर रोमछिद्रों को बंद कर देती है। इससे दाद व खुजली की समस्या होना आम होता है।


क्या है दाद
दाद शरीर के किसी भी हिस्से (पैर, पेट के निचले भाग में, गर्दन के पीछे, जांघों में व कान के पीछे) पर हो सकता है। यह आसानी से ठीक नहीं होता व एक बार ठीक होने के बाद इसके दोबारा होने की आशंका रहती है। खुजली का असर हाथ की अंगुलियों, घुटने और शरीर के दूसरे नरम स्थानों पर अधिक होता है। पहले छोटी फुंसियां उठती हैं जिनमें सामान्य खुजली होती है। बाद में दर्द भी होता है।


ये हैं मुख्य कारण
नहाने के बाद शरीर को बेहतर ढंग से न पोछने से जोड़ वाले अंग गीले रह जाते हैं। इसके अलावा गर्मी में बार-बार पसीना आने से भी इन अंगों में नमी रहती है व दाद बनने लगता है।


रक्त विकार से होती खुजली
खुजली एक संक्रामक रोग है जो रक्तमें खराबी से होता है। खुजली की समस्या के मरीज के कपड़े पहनने या मवाद लगने से यह रोग दूसरे लोगों में भी फैल सकता है। रात के समय ज्यादा खुजली होती है और ज्यादा खुजाने से जलन व दर्द की दिक्कत भी होती है। खुजली के रोगी को अपना पेट साफ रखना चाहिए।


घरेलू उपचार
दाद वाली जगह को मोटे कपड़े से हल्के से रगड़कर उस पर नीम का तेल लगा दें। ऐसा करने से थोड़ा दर्द होगा लेकिन दाद जड़ से खत्म हो जाएगा। इसके अलावा केले के गूदे में नींबू का रस मिलाकर दाद पर लगाने से भी फायदा होगा। ५ ग्रा. गंधक को दही में मिलाकर उसका लेप नहाने से पहले शरीर पर लगाना लाभदायक है।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2KZcbvz

जानें क्या है मसल फीवर, ऐसे होता इलाज

सावधानी बरतकर मांसपेशियों के दर्द को दूर कर सकते हैं

शरीर की मांसपेशियों में होने वाले दर्द को मसल फीवर muscle fever के नाम से भी जाना जाता है। इससे दिनचर्या के काम प्रभावित होते हैं। अधिक वर्कआउट करने, पैदल चलते समय या भारी सामान उठाने पर मांसपेशियों में ऐंठन आ जाती है जिससे दर्द होता है। मांसपेशियों पर दबाव के अलावा इस समस्या के कई अन्य कारण भी हो सकते हैं। समय पर इलाज लेना जरूरी है वर्ना तकलीफ बढ़ सकती है। कुछ सावधानी बरतकर मांसपेशियों के दर्द को दूर कर सकते हैं।

इन वजहों से होता दर्द
दिनचर्या में शारीरिक गतिविधियां जारी रखने और रेगुलर एक्सरसाइज करने से मांसपेशियों में उचित खिंचाव होने के साथ इन्हें आराम भी मिलता रहता है। लेकिन जरूरत से ज्यादा कोई भी शारीरिक गतिविधि या एक्सरसाइज करने के दौरान मांसपेशियों पर पडऩे वाला दबाव अधिक हो जाता है। इस कारण इन्हें आराम नहीं मिल पाता और बार-बार खिंचाव होने से इनमें तनाव हो जाता है जो दर्द का कारण बनता है।
ये तरीके अपनाएं
पर्याप्त मात्रा में पानी पीएं। वर्कआउट से पहले वार्मअप करें ताकि शरीर लचीला बना रहे। बाहरी रूप से जैल या तेल से मसाज करें। सिकाई करें। ज्यादा तकलीफ हो तो एक्सपर्ट को दिखाएं।
मल्टीविटामिन लें
वर्कआउट के 30 मिनट बाद सेहतमंद नाश्ता लें। इस दौरान लैक्टिक एसिड और ऊर्जा के स्तर में कमी आ जाती है। इसके लिए मल्टीविटामिन वाला आहार लें। भोजन को दिनभर में 5-6 बार करके खाएं।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2NyZPw1

इन कारणों से झड़ते हैं बाल, जानें इलाज

बाल झड़ने के ये हैं कारण
आनुवांशिकता प्रमुख वजह है। गर्भावस्था के दौरान बालों के गिरने की सामान्य क्रिया रुक जाती है जो प्रसव के बाद सुचारू होती है। इनमें बच्चे को ब्रेस्टफीड कराने से भी होने वाले हार्मोनल बदलाव से बाल गिरते हैं। तनाव के अलावा थायरॉइड, खून या पोषक तत्त्वों की कमी से भी ऐसा होता है। आयुर्वेद में इसे खालित्य रोग कहते हैं जो त्रिदोषों के कारण होता है। जिस तरह वात व पित्त में असंतुलन से बालों का झड़ना शुरू होता है वैसे ही कफ के बढ़ने से जब यह रक्त में मिलकर स्कैल्प के रोमछिद्रों को बंद करता है तो नए बाल नहीं निकल पाते।
पंचकर्म उपयोगी
स्नेहं और स्वेदम् प्रक्रिया में शिरोधारा, शिरोवस्थी, शिरोअभ्यंग व शिरोपिचू करते हैं। इनमें सिर की तेल से मसाज आदि करते हैं। मुल्तानी मिट्टी में नागरमोथा, कपूर कचरी, आमलकी मिलाकर हैडपैक लगाएं।
होम्योपैथी दवाएं
इसमें शुरुआती अवस्था में इस समस्या को रोका जा सकता है। जिसके लिए लिक्विड रूप में मौजूद दवाएं, गोलियां व बायोकैमिक कंपाउड्स विभिन्न पोटेंसी में देते हैं।
एलोपैथी में इलाज
बालों का झडऩा सामान्य प्रक्रिया है। 2-3 माह एक बाल को विकसित होने में लगते हैं जिसके बाद यह टूटता है व इसकी जगह नया बाल आता है। इस अवधि के प्रभावित होते ही बाल झड़ते हैं। हर व्यक्ति के रोजाना औसतन 50 बाल गिरते हैं। इससे अधिक गिरें तो यह हेयरफॉल की ओर इशारा करती है। बाल गिरने के बाद यदि वापस न आएं तो दवाएं व स्कैल्प पर लगाने के लिए सिरम देते हैं। जिनमें बालों की जड़ें ब्लॉक होने से एक बार बाल पूरी तरह से चले जाते हैं, उनके लिए हेयर रेस्टोरेशन तकनीक का प्रयोग कर सिर के बाल वाले हिस्से से जरूरत के अनुसार बाल लेकर प्रभावित भाग पर प्रत्यारोपित करते हैं।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2Zh6TEw

मिर्गी के रोगियों के लिए फायदेमंद है इस तरह की डायट, जानें इसके बारे में

मिर्गी के मामले जिस तरह से बढ़ रहे हैं वैसे ही कुछ मामलों में दवाइयां भी बेअसर साबित हो रही हैं। ऐसे में कीटोजेनिक डाइट अनियंत्रित मिर्गी के दौरों में एक वैकल्पिक चिकित्सा है। इस खास डाइट की शुरुआत 1920 में हुई। कई शोध के नतीजों में सामने आया कि इस डाइट से मिर्गी के दौरे के अलावा पार्किंसन, अल्जाइमर, कैंसर रोग और ऑटिज्म के मरीजों को फायदा पहुंचता है। जानते हैं डाइटीशियन से इस खास डाइट और इससे जुड़े फायदों के बारे में...

बच्चों के लिए ज्यादा फायदेमंद -
मिर्गी की तीसरी स्टेज में यह डाइट ज्यादा फायदेमंद है। इसका उद्देश्य दौरों की संख्या व तीव्रता को कम करने और लाइफस्टाइल को बेहतर करना है। कई शोधों के मुताबिक इस डाइट का सबसे ज्यादा व तेजी से फायदा 10 वर्ष से छोटे बच्चों पर देखा गया है।

क्या है कीटोजेनिक डाइट -
इस खास डाइट में अधिक वसा, सामान्य प्रोटीन और कम कार्बोहाइड्रेट लेना होता है। इस कीटोजेनिक डाइट प्लान को तैयार करने के लिए आहार विशेषज्ञ रोगी की उम्र, लंबाई, वजन, शारीरिक संरचना, क्षमता और जरूरत जैसी तमाम बातों को आधार बनाते हैं।

फैट से मिलती है शरीर को एनर्जी -
सामान्य तौर पर शरीर को ऊर्जा देने का कार्य अनाज और शक्कर का होता है लेकिन मिर्गी के रोगियों में ग्लूकोज दिमाग में दौरों की गतिविधि को बढ़ा देता है। इस गतिविधि को कम करने के लिए शरीर को फैट के माध्यम से ऊर्जा दी जाती है।

ये ध्यान रखें -
कीटोजेनिक डाइट को कभी भी विशेषज्ञ की सलाह के बिना न लें।
अधिक फैट के उपयोग के बाद इस डाइट से शरीर का अनावश्यक वजन बढऩे के बजाय नियंत्रित रहता है। ऐसा इसलिए क्योंकि व्यक्ति की उम्र और लंबाई के आधार पर आदर्श वजन की स्थिति बनी रहे इसे भी ध्यान में रखकर डाइट प्लान करते हैं।

चार चरणों में देते हैं डाइट -
मरीज के कुछ अहम चेकअप कराने के बाद परिवार के सदस्यों की उसकी देखरेख को लेकर काउंसलिंग की जाती है।
रोगी के शरीर में शुगर लेवल कंट्रोल करते हैं।
इसके बाद कीटोजेनिक डाइट शुरू की जाती है।
रेगुलर फॉलोअप किया जाता है ताकि किसी भी समस्या की आशंका से मरीज को दूर रखा जा सके।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2Zsw7zk

Monday, 26 August 2019

हैल्दी रहने के लिए उम्र के हिसाब से लें डाइट

अधिक घी ghee देने से बचें
1-3 साल के बच्चे को दाल, चावल, रोटी देते हैं। कुछ लोग घी खिलाने पर जोर देते हैं ताकि उसका शरीर मजबूत हो। इस उम्र में बच्चे के भीतर सेल्स बनने का काम शुरू हो चुका होता है। घी अधिक मात्रा में देने से फैट सेल्स बनने का काम दोगुनी तेजी से होता है जो बच्चे के मोटा बना देता है।
जंक फूड Zunk food से बचें
3-10 साल की उम्र में बच्चे की हड्डियों boan का विकास होता है। इस दौरान कैल्शियम और आयरन की जरूरत होती है। इसके लिए उसके भोजन में दूध, दही, दाल, हरी सब्जी, फल और प्रोटीनयुक्त डाइट का अधिक मात्रा में होना जरूरी है। रोजाना 1200 से 1400 कैलोरी उसे हर दिन लेनी जरूरी है।
सोया प्रोडक्ट ज्यादा
40-60 की उम्र में खानपान बढ़िया होना चाहिए। पोषक तत्त्व न मिलने से शरीर कमजोर होता है। महिलाओं में इस उम्र में माहवारी संबंधी समस्या भी होती है। ऐसे में सोयाबीनयुक्त चीजें खाने से फायदा होता है। एस्ट्रोजन हॉर्मोन की कमी नहीं होगी और हॉर्मोन रिप्लेसमेंट थैरेपी से बच सकते हैं।
सुबह का नाश्ता हैवी
18-25 की उम्र में 34 घंटे के भीतर रोजाना वयस्क पुरुष को 2425, महिला को 1875 कैलोरी लेना जरूरी होता है। खाना तय समय पर खाना चाहिए। नाश्ता हैवी रहेगा तो शरीर फिट और एक्टिव रहेगा। सुबह भरपूर नाश्ता करने से शरीर में दिनभर ऊर्जा और फुर्ती बनी रहती है।
दाल, पनीर और अंडा खाएं
10-18 उम्र वर्ग के लड़के और लड़कियों के विकास के लिए यह समय महत्त्वपूर्ण होता है। इसमें शारीरिक विकास और हॉर्मोनल चेंज होते हैं। ऐसी अवस्था में शरीर में आयरन और कैल्शियम की मात्रा कम नहीं होनी चाहिए। वजन के हिसाब से प्रोटीन लेना जरूरी है। एक किलो ग्राम वजन पर एक ग्राम प्रोटीन जरूरी है।
बुजुर्ग रंग-बिरंगी सब्जियां लें
60 की उम्र के बाद अधिकतर लोग काम कम करते हैं। पुरुषों को प्रतिदिन 2,225 कैलोरी जबकि महिला के लिए 1,675 कैलोरी जरुरी होती है। एंटीऑक्सीडेंट्स की अधिक मात्रा लेना जरूरी है। इसमें हरी और रंग बिरंगी सब्जी के साथ फल, दूध, मेवा खाना चाहिए। तरल में पानी, सूप और जूस लेना ठीक रहता है।
ऊपर की चीजें छह माह बाद ही दें
1 वर्ष तक के बच्चे के लिए मां का दूध अमृत होता है। मां का गाढ़ा दूध बच्चे को मजबूती देता है। छह माह से एक साल के बच्चे को ऊपर का खाना देना चाहिए जिससे उसके शरीर को पोषक तत्त्व मिल सकें। इसमें दलिया, दूध, दाल दे सकते हैं। सभी खाद्य पदार्थ तरल रूप में होने चाहिएं जिन्हें वे आसानी से खा लें और पचा सकें।
चार कटोरी दाल जितना प्रोटीन जरूरी
25-40 की उम्र में तय मानक के अनुसार शरीर में कैलोरी कम नहीं होनी चाहिए। प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट्स के लिए फल, सब्जी, दाल, रोटी, चावल और अंडे का प्रयोग फायदेमंद रहता है। इस उम्र में पर्याप्त मात्रा में सभी पोषक तत्त्व मिलने से हड्डियां मजबूत होती हैं। खाने में करीब 60 ग्राम प्रोटीन जरूरी है। एक अंडे और एक कटोरी चना दाल में 13-13 ग्राम प्रोटीन होता है।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2ZA7QaE

गुर्दे की पथरी दोबारा होने के ये है कारण, ऐसे करें उपचार

लक्षणों के आधार पर इलाज शुरू हो तो ऑपरेशन से बचा जा सकता है
स्टोन (पत्थरी) Kidney stone की समस्या का होम्योपैथी homeopathy में लक्षणों के आधार पर इलाज शुरू हो तो ऑपरेशन से बचा जा सकता है। पत्थरी का ऑपरेशन होने के बाद डॉक्टरी सलाह पर नियमित होम्योपैथिक दवाएं ली जाएं तो तकलीफ को दोबारा होने से रोका जा सकता है। ऑपरेशन के बाद 50 फीसदी मामलों में दोबारा स्टोन बनने का खतरा रहता है। कैलकेरिया, रेनिलिस, कैलकेरिया कार्ब जैसी कई दवाएं हैं जो स्टोन बनने से रोकती है। इन दवाओं का प्रयोग डॉक्टरी सलाह पर ही करना चाहिए।
किडनी में स्टोन की वजह
गर्मियों में तापमान अधिक बढऩे से यूरिन कम बनता है और काफी पानी पसीने के रूप में निकल जाता है। चाय, कॉफी ज्यादा पीने से यूरिन गाढ़ा हो जाता है जो स्टोन का कारण बनता है। लंबे समय तक बैठकर कंप्यूटर पर काम करना भी वजह है। इसके अलावा यूरिन को देर तक रोक कर रखने से भी किडनी स्टोन बनने की आशंका 50 फीसदी तक बढ़ जाती है। इससे यूरिन इंफेक्शन का खतरा रहता है।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/30yGKgZ

मरीज से उसके सपने के बारे में भी पूछते हैं, फिर तय करते दवा

रोगी की जीवनशैली अहम है
रात
को सोते वक्त डरावने सपने आना, सोते-साते चीखने लगना, सोते हुए हंसने समेत अन्य सपने जिसे लेकर व्यक्ति बहुत उत्साहित या डरा हुआ महसूस करता है। रोगी जब चिकित्सक के पास जाएगा और बताएगा की रात के समय उसे इस तरह के सपने आ रहे हैं तो उस आधार पर बीमारी और लक्षणों की गंभीरता का पता लगाकर दवा दी जाती है। एक जैसे सपने दो लोगों को आते हैं फिर भी दोनों की दवा अलग होगी क्योंकि रोगी की जीवनशैली अहम है।
गुजरे समय से जुड़े होते सपने
बार-बार आने वाले सपने पहले हुई किसी मानसिक वेदना, आघात और संघर्ष समेत अन्य तरह की परेशानियों से उबर न पाने की स्थिति को दर्शाता है। गुजरी हुई बात रात को सोते वक्त दिमाग में चलती है। व्यक्ति अपनी दुनिया में रहता है और दूसरों से अलग हो जाता है।
ऐसी तकलीफ तो भी बेहतर इलाज संभव
नींद न आना, सोने की अलग-अलग मुद्रा, नींद में आंख मुंह-खुला रहना गंभीर बीमारी के लक्षण हैं। परिवार का दूसरा सदस्य ही रोगी की इस परेशानी को बता सकता है। रोगी को पहले उसकी परेशानी के बारे में बताते हैं। रात को सोते वक्त जरूरी सावधानी बरतने के लिए भी कहा जाता है।
इलाज:
सपनों के आधार पर जब रोगी को दवा देते हैं तो सपनों पर भी फर्क पड़ता है। सोते वक्त चिल्लाना, हंसना, गुस्सा करना समेत अन्य परेशानियों से निजात मिलती है। दवा के असर से बुरे सपने कम होते या रुक जाते हैं, अच्छे सपने आने लगते हैं। 100 से 200 तरह की दवाइयां है जिनकी मदद से अलग-अलग रोगों का इलाज होता है।
नोट: मरीज कोई भी दवा मन से न लें। योग्य चिकित्सक की सलाह से ही इन्हें लें।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2KVdPhN

गर्भावस्था के दौरान हो रही दिक्कतों में ऐसे मिलता है आराम

गर्भावस्था के समय कई तरह की दिक्कते सामने आती है। ऐसे मेंं महिलाओं को विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है। दवाओं के चुनाव के साथ पौष्टिक खानपान पर ध्यान देना जरूरी होता है।
उल्टी या जी मिचलाना:
गर्भावस्था में सुबह उठने के बाद उल्टी या जी मिचलाना प्रमुख समस्या है। गर्भधारण के पहले और दूसरे महीने में तकलीफ अधिक होती है। कुछ मामलों में पूरी गर्भावस्था के दौरान समस्या रहती है जिससे शरीर में पानी की कमी हो
जाती है।
कमर दर्द: छठे महीने से शुरू होता है। इसका कारण कमर की नस में खिंचाव, गलत तरीके से उठना, बैठना, सोना और मांसपेशियों में तनाव होता है।
कब्ज: गर्भवती की आंतों के तनाव में कमी आती है जिससे बच्चेदानी का दबाव गुदा पर पडऩे लगता है। इससे कब्ज की शिकायत रहती है।
ध्यान: खानपान संतुलित रखने के साथ डॉक्टरी सलाह पर दवा लेनी चाहिए। व्यायाम करें और पर्याप्त पानी पीएं।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2U4WDcX

Sunday, 25 August 2019

भ्रूण की जीन एडिटिंग से घटेगी आनुवांशिक रोगों की आशंका

अब परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाले आनुवांशिक रोगों से गर्भस्थ शिशु को बचाया जा सकेगा। इसके अलावा उन भू्रण को भी बचाना आसान होगा जो जेनेटिक कारणों से गर्भ में पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाते। ऐसा खास तकनीक (सीआरआईएसपीआर-सीएएस9) से संभव हो सकेगा। इसकी मदद से गर्भ में पल रहे भू्रण के जीन में प्रभावित हिस्से को हटाकर भविष्य में होने वाले आनुवांशिक रोगों की आशंका को कम कर सकेंगे। खासतौर पर हृदय संबंधी रोगों के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकेगा।

इस तरह उपयोगी है तकनीक -
विशेषज्ञ के अनुसार जीनोम स्वस्थ शिशु तैयार करता है। जीन एडिटिंग समझने के लिए पुरुष के स्पर्म से 58 भू्रण तैयार किए जिसमें हाइपरट्रॉफिक कार्डियोमायोपैथी रोग पनप रहा था। फिर स्वस्थ महिला के गर्भाशय से अंडे निकालकर भू्रण तैयार किया। तकनीक के सहारे भू्रण के जीन के प्रभावित भाग को काटकर अलग किया। ऐसा डीएनए पर टारगेट करने वाले एंजाइम सीएस-9 से संभव हुआ। डीएनए के किसी भाग के प्रभावित होने पर यह एंजाइम उसे काटकर अलग कर देता है। सबकुछ सही होने पर डीएनए खुद को दोबारा रिपेयर कर लेता है।

हृदय रोगों से बचाव -
वैज्ञानिकों ने तकनीक का प्रयोग कर गर्भस्थ शिशु को आनुवांशिक रोग हाइपरट्रॉफिक कार्डियोमायोपैथी से बचाने में सफलता हासिल की। इस रोग में हृदय की मांसपेशियां मोटी होने के कारण हार्ट अटैक की आशंका रहती है। करीब 500 में से एक को होने वाले इस रोग के एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाने की आशंका करीब 50 फीसदी होती है।

डॉक्टरी राय -
जीन एडिटिंग की शानदार कामयाबी के बाद सभी के साथ विचार-विमर्श होगा। इसके बाद इसपर क्लीनिकल ट्रायल किया जाएगा। हम खुद को और बेहतर करना चाहते हैं जिससे भविष्य में इस तकनीक को और आधुनिक तरीके से इस्तेमाल में ले सकें।

इस खोज से हजारों जिंदगियां बच सकेंगी। हाइपरट्रॉफिक कार्डियोमायोपैथी जीन में डिफेक्ट के कारण होती है। भारत में एक हजार में से दो बच्चे इस रोग से पीडि़त होते हैं। पीडि़त व्यक्ति की मौत 20-50 वर्ष की उम्र में हो जाती है। इस आनुवांशिक रोग का कोई इलाज नहीं। पूरी दुनिया में आने वाला समय जीन थैरेपी का होगा। इसे बढ़ावा मिलना चाहिए।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2Zqjbpe

शरीर के कई रोगों में लाभदायक है हरड़, जानें इसके फायदे

आयुर्वेद के खजाने में से एक दवा यानी हरड़ में कई बीमारियों को खत्म करने की क्षमता है।

इन रोगों में लाभदायक : गला बैठना, पुराना बुखार, सिर, आंखों, पेट, त्वचा, हृदय के रोग, खून की कमी, पीलिया, शरीर में सूजन, मधुमेह, उल्टी, पेट में कीड़े होना, दमा, खांसी, मुंह से लार टपकना, बवासीर, प्लीहा बढ़ना, पेट में अफारा, एसिडिटी, भोजन में अरुचि आदि के अलावा हरड़ का प्रयोग वात-कफ से जुड़े रोगों में भी लाभदायक है। इससे के सेवन से शरीर के कई रोग जड़ से खत्म हो जाते हैं।

ऐसे करें प्रयोग : हरड़ चूर्ण को गोमूत्र के साथ रोजाना पीकर व उसके पचने के बाद दूध पीने से खून की कमी दूर होती है। सौंठ, कालीमिर्च व पिप्पली, गुड़ व तिल तेल के साथ एक माह तक हरड़ का इस्तेमाल करने से कुष्ठ रोगों में आराम पहुंचता है। भोजन करने से पहले दो ग्राम हरड़ चूर्ण पुराने गुड़ के साथ लेने से बवासीर रोग में लाभ मिलता है।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/30y1kye

एक बार पूरी तरह से ठीक होने के बाद फिर हो सकता है कैंसर

कैंसर शरीर की अनियंत्रित कोशिकाओं से फैलता है। इसका कोई पुख्ता सबूत नहीं है कि एक बार यदि किसी को कैंसर हुआ और वो ठीक हो गया तो उसे दोबारा नहीं होगा। 50 फीसदी आशंका कैंसर के दोबारा उभरकर आने की होती है जिसे कैंसर रिलैप्स की स्थिति कहते हैं। इसके कई कारण हैं जिसमें से प्रमुख वजह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होना है।

शरीर का हर अंग अलग-अलग कोशिकाओं के रूप में विभाजित है। इनमें खराबी आने से शरीर के उस भाग की कोशिकाएं पूरी तरह अनियंत्रित हो जाती हैं जिनपर शरीर का कोई नियंत्रण नहीं रहता और वहां कैंसर कोशिकाएं बनने लगती हैं। ये कोशिकाएं सिर के बाल से लेकर पैरों के नाखून तक होती हैं।

दो तरह का होता कैंसर -
कैंसर दो तरह का होता है एक सॉलिड मेलिग्नेंसी और दूसरा लिक्विड फॉर्म कैंसर। दिमाग, हड्डी, आंख, स्तन समेत अन्य भागों में गांठ बने तो सॉलिड मेलिग्नेंसी है। वहीं लिक्विड कैंसर रक्त में होता है। भारत में केवल 20 फीसदी कैंसर मरीजों का जीवन बचा पाने में सफलता प्राप्त होती है। जबकि 80 फीसदी कैंसर रोगियों की मृत्यु का कारण समय पर इलाज न लेना या उपचार के लिए पर्याप्त पैसा न होना सामने आया है। वहीं अमरीका जैसे देश कैंसर से होने वाली मौतों को समय पर इलाज कर रोक रहे हैं। यहां करीब 80 फीसदी कैंसर रोगियों का जीवन बचा लिया जाता है। इसलिए जरूरी है कि समय रहते लक्षणों को पहचानकर इलाज लिया जाए।

लक्षण -
बार-बार बुखार होना।
थोड़ा-सा चलने या काम करने पर थकान होना।
शरीर के किसी भाग में तेज व असहनीय दर्द होना।
त्वचा का रंग अचानक बदलना।
भूख न लगना व वजन घटना।
अपच की समस्या और नींद न आने की दिक्कत।

धीरे-धीरे दूसरे अंगों में फैलता है
शरीर के किसी एक भाग में सेल्स अनियंत्रित हों तो दूसरे अंग पर भी असर छोड़ती हैं। जैसे प्रोस्टेट की खराब कोशिकाएं खून में फैलती हैं। जिससे मल में या खांसते समय मुंह से खून आता है। भोजननली में इन कोशिकाओं के जाने से खाने में तकलीफ व कब्ज रहती है। फेफड़ों में इनके फैलने से ट्रेकिया पर दबाव पड़ता है जिससे सांस लेने में दिक्कत होती है। धूम्रपान व शराब पीने वालों में रोग का खतरा 10 गुना रहता है।

40 की उम्र के बाद जरूरी जांचें -
40 की उम्र में पहुंचने के साथ महिलाओं को सर्विक्स, दर्द रहित गांठ की मेमोग्राम और पैपस्मीयर टैस्ट कराने चाहिए। धूम्रपान करने वालों के मुंह में सफेद धब्बा कैंसर की शुरुआत हो सकता है। वहीं कफ के साथ खून आए तो जांच करवाएं। 40 साल के बाद हर दस साल में कोलोनोस्कोपी, सीटी स्कैन या एमआरआई जांच और ब्लड की बायोकैमेस्ट्री जांच करानी चाहिए।

इलाज -
एलोपैथी -
कैंसर का बेहतर इलाज शुरूआती लक्षणों की पहचान होने पर संभव है। लेकिन एक बार रोग का इलाज होने पर यदि यह दोबारा हो तो रोगी की हिस्ट्री जानने के बाद इलाज तय करते हैं। क्योंकि ऐसे मामलों में उस भाग की दोबारा सर्जरी करना मुश्किल होता है। जरूरी जांचों की रिपोर्ट के बाद यह निर्णय लेते हैं।

आयुर्वेद -
कीमोथैरेपी से पहले आयुर्वेदिक दवाएं लेने से लक्षणों में कमी आती है। इसमें मुख्य रूप से कैंसर रोगी की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए उसे हीरक भस्म के साथ गिलोय, अश्वगंधा, हल्दी, आंवला, शतावरी और त्रिफला समेत अन्य आयुर्वेदिक औषधियां दी जाती हैं। सुपाच्य और साफ-सुथरा भोजन लें।

होम्योपैथी - कैंसर के इलाज के साथ होम्योपैथी दवाएं रोगी को दी जाएं तो उसकी इम्युनिटी बढ़ सकती है। जिससे रोग की पुनरावृत्ति को रोका जा सकता है। कैंसर से उबर चुके रोगी का आहार पौष्टिक होना चाहिए। किसी तरह का तनाव उसकी सेहत के लिए ठीक नहीं। इम्युनिटी कमजोर होने पर ही कैंसर रिलैप्स का खतरा होता है।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2P9Z4Mi

जानिए प्लेटलेट्स क्या हैं और शरीर में कितनी होनी चाहिए

प्लेटलेट्स क्या है ?

यह रक्त का एक भाग है जो खून का थक्का बनाने में सहायक हैं। कोई चोट लगने पर होने वाले रक्तस्त्राव को ये रोकती हैं। शरीर में इनकी पर्याप्त संख्या होनी चाहिए। शरीर में इनकी संख्या बहुत कम होने पर मौत भी हो सकती है।

कितनी प्लेटलेट्स होनी चाहिए ?
स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में डेढ़ से चार लाख प्लेटलेट्स होती हैं। किसी कारण से यदि ये 50 हजार से कम हो जाएं तो चिंता की बात नहीं। लेकिन इससे भी कम होने पर रक्तस्त्राव होता है। यदि 10-20 हजार की संख्या रहे तो यह स्थिति इमरजेंसी की है।

किन रोगों में इनकी संख्या कम हो जाती हैं ?
डेंगू, मलेरिया, स्क्रब टायफस, टायफॉइड जैसे रोगों में और दर्दनिवारक दवाएं नियमित लेने से भी ये घटने लगती हैं।

इस स्थिति में क्या करना चाहिए ?
अस्पताल में भर्ती कर रोगी से मिलते ब्लड ग्रुप वाले व्यक्ति के रक्त से जरूरत अनुसार प्लेटलेट्स निकालकर उसे चढ़ाते हैं।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2L5e2xN

फैलोपियन ट्यूब खराब होने के बाद भी मां बनना है संभव, जानें इसके बारे में

अक्सर ऐसे मामले सामने आते हैं कि महिला में हर माह अंडे बनने की प्रक्रिया तो हो रही है लेकिन तब भी वह मां नहीं बन पाती। इसका कारण फैलोपियन ट्यूब का न होना या इसमें खराबी होना हो सकता है। इंफर्टिलिटी से पीड़ित 20 महिलाओं में से 10-12 में इस ट्यूब से जुड़ी परेशानी सामने आती है। चिकित्सा जगत में इलाज के कई नए तरीके ऐसे हैं जिनसे इस अवस्था के बावजूद महिला मां बन सकती है।

इसलिए जरूरी ट्यूब : ओवरी से अंडा फैलोपियन ट्यूब (यहीं स्पर्म व अंडे का फर्टिलाइजेशन होता है) के बाद गर्भाशय में जाता है। यहां शिशु का विकास शुरू होता है।

ट्यूब न होने पर: ज्यादातर मामलों में फैलोपियन ट्यूब के न होने पर अंडाशय व गर्भाशय में भी विकृति पाई जाती है। यह समस्या जन्मजात या फिर प्यूबर्टी के समय से उभरती है। इस कारण माहवारी के शुरू होने से लेकर इसके सुचारू बने रहने में भी दिक्कत आती है। ऐसे में 11-12 साल की उम्र के दौरान माहवारी से जुड़ी दिक्कतें होने लगती है। डॉक्टरी सलाह से सोनोग्राफी, ट्यूब टैस्ट, एक्सरे, क्रोमोपटर््यूबेशन जांच से इस समस्या का पता चलता है। फिर दवाओं या सर्जरी से इलाज शुरू होता है।

कारण-
जन्मजात इस ट्यूब की बनावट में खराबी या विकृति, इसका उचित रूप से विकसित न होना, सामान्य होने के बावजूद टीबी या अबॉर्शन के बाद संक्रमण से होने वाला ब्लॉकेज।

उपचार - फैलोपियन ट्यूब में यदि ब्लॉकेज पाया जाता है तो सबसे पहले दवाओं से इसे ठीक करते हैं। इसके बाद भी यदि ब्लॉकेज खत्म न हो तो कैन्यूलाइजेशन तकनीक के तहत एक पतले तार को सर्विक्स के जरिए ट्यूब में पहुंचाकर ब्लॉकेज को हटाते हैं। फैलोपियन ट्यूब की सामान्य लंबाई 8-10 सेंटीमीटर होती है। ऐसे में यदि ट्यूब में ब्लॉकेज यदि बड़ा पाया जाता है तो ट्यूब के प्रभावित हिस्से को हटाकर बाकी हिस्से को टांकें लगाकर जोड़ दिया जाता है।

रुकावट दूर न हो तो -
ट्यूब न खुले तो आईवीएफईटी (इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन एम्ब्रिओ ट्रांसप्लांट) प्रयोग में लेते हैं। इसमें ओवरी से अंडा बाहर निकालकर पुरुष के स्पर्म के साथ लैब में फर्टिलाइज करते हैं। यहां विकसित होने के 15-20 दिन बाद इसे यूट्रस में ट्रांसफर करते हैं। जिनमें ट्यूब के साथ गर्भाशय भी खराब हो उनके लिए सरोगेसी विकल्प हो सकता है।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2L5dBDQ

Saturday, 24 August 2019

जानिए वजन कंट्रोल करने से जुड़ी ये खास बातें

यदि आप दिनभर में 3000 कैलोरी लेते हैं तो उसी अनुसार हल्के व्यायाम करके वजन को नियंत्रित रख सकते हैं। रोज के काम से थोड़ा सा समय निकालकर अच्छी सेहत के लिए एक्सरसाइज जरूर करनी चाहिए। छोटे-छोटे काम जैसे सीढ़ियां चढ़ना-उतरना, डांस करना, तेज चलना, दौड़ना आदि शरीर के लिए बेहतर वर्कआउट हो सकते हैं। आइये जानते हैं इनके बारे में ।

सीढिय़ां चढ़ने-उतरने से शरीर में मेटाबोलिज्म बढ़कर कैलोरी बर्न होती है। साथ ही पैर भी चुस्त-दुरुस्त रहते हैं। एस्केलेटर्स के बजाय सीढ़ियों का उपयोग करें। 20-30 मिनट पैदल चलने से भी कैलोरी बर्न होती है। कैलोरी वर्न होने से मोटापा घटता है।

डांसिंग भी अच्छी एक्सरसाइज है। यह एक्सट्रा कैलोरी को जमने से रोकती है और शरीर को लचीला बनाती है। संभव हो तो कम से कम 30 मिनट एरोबिक्स करें।

दौड़ना एथलीट के लिए ही जरूरी नहीं, सभी को क्षमता के अनुसार दौड़ना चाहिए। 1.5 किमी प्रति घंटे की गति से 15 मिनट दौड़ना शुरू करें। इससे हृदय स्वस्थ रहता है।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2HkDazC

डाइट्री फाइबर से भरपूर है ओट्स से बनी इडली, सेहत को होगा फायदा

सामग्री- ओट्स, सूजी, दही, तड़का लगाने के लिए राई, जीरा, हींग, हरी मिर्च, कालीमिर्च, तेजपत्ता, मसूर व चने की दाल, बारीक कटा अदरक।

विधि - पैन गर्मकर एक चम्मच तेल डालें। इसमें आधी चम्मच राई, जीरा, चुटकीभर पिसी कालीमिर्च व हींग डालने के बाद एक चम्मच मसूर-चने की दाल, थोड़ी कटी हुई हरी मिर्च, कसा हुआ अदरक, कटा हुआ करी पत्ता डालें। इसके बाद पहले से पिसे हुए ओट्स मिलाकर मिक्स कर लें। हल्का भूरा होने पर आधा कप सूजी डालें। सिकने के बाद एक बाउल में इस मिश्रण को निकालकर आधा कप दही, स्वाद के अनुसार नमक, बारीक कटे हरे धनिए के साथ मिक्स करें। थोड़ा मीठा सोड़ा डालकर पानी इतना डालें कि घोल न ही ज्यादा गाढ़ा हो व न ही पतला। अब इडली सांचें में 30मिनट पकने के बाद इसे गर्मागर्म सर्व करें।

फायदे - ओट्स से सबसे ज्यादा डाइट्री फाइबर और मैग्नीशियम तत्त्व की पूर्ति होती है। प्रोटीन और आयरन का बेहतरीन स्त्रोत होने के कारण यह सभी के लिए फायदेमंद है। हृदयरोगों से बचाव के लिए यह भोजन का अच्छा विकल्प है। इसलिए इसे सुपरफूड भी कहते हैं। वजन कंट्रोल करने के साथ यह रक्तसंचार को बेहतर करने और ब्लड शुगर को नियंत्रित करने में मददगार है।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2ZgHM4U

नाश्ते में अच्छी सेहत के लिए लें वेज चीज़ क्रीम बे्रड सैंडविच

सामग्री -

टमाटर, गाजर, प्याज, खीरा, थोड़ी हरी मिर्च, चीज़ और सफेद ब्रेड।

विधि - टमाटर, गाजर, प्याज और खीरा सभी को अच्छे से कद्दूकस कर लें। इसके अलावा दूसरे बाउल में मार्केट में मिलने वाली चीज़ को डालकर अच्छे से फेंट लें। अब कुछ ब्रेड लेकर उसके चारों ओर का भूरा हिस्सा चाकू से हटाकर अलग कर दें। एक बाउल में थोड़ी गाजर, दो चम्मच टमाटर, खीरा और हरी मिर्च डालकर उसमें स्वादानुसार नमक, आधी चम्मच कालीमिर्च और लालमिर्च डाल दें। इसमें चीज़ क्रीम को डालकर अच्छे से मिक्स कर लें। इस मिश्रण की लेयर ब्रेड पर लगा लें। अब यह डिश तैयार है। आप चाहें तो इसे टमाटर या हरे धनिए की चटनी के साथ भी खा सकते हैं।

फायदे - इन दिनों बच्चों और बड़ों सभी को मार्केट में मिलने वाले सैंडविच और बर्गर बेहद पसंद आते हैं। ऐसे में आप चाहें तो घर पर भी इस डिश को घर पर भी बना सकते हैं। वेज चीज़ क्रीम ब्रेड सैंडविच पौष्टिक होने के साथ तुरंत भूख मिटाने वाला विकल्प भी बन सकता है। इसमें प्रयोग की गई सब्जियां शरीर में आयरन, लाइकोपीन, पोटैशियम की कमी को दूर करने में सहायक हैं।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2zh2Qsn

जानिए खाद्य तेल के सेवन से जुड़ी ये खास बातें

क्या ऑयल (खाद्य तेल) शरीर को नुकसान पहुंचाता है? यह सवाल अक्सर लोगों के जेहन में आता है। इसका जवाब है कि तेल शरीर के लिए जरूरी है और इसे सही मात्रा में ही खाना चाहिए। तेल में ऐसे कई फैटी एसिड्स (ओमेगा-3, 6) होते हैं जो शारीरिक विकास के लिए जरूरी हैं। करीब 1 एमएल तेल से 9 कैलोरी ऊर्जा मिलती है। जानते हैं इनके अन्य फायदों के बारे में...

ये हैं खासियत -
सनफ्लावर, नारियल, ऑलिव आदि तेल शरीर में विटामिन-ए (आंखों की रोशनी के लिए), डी (हड्डियों व दांतों की मजबूती के लिए), ई (एंटीऑक्सीडेंट), के (रक्त का थक्का बनने के लिए जिम्मेदार) के अवशोषण में मददगार है। इनमें मौजूद गुड कोलेस्ट्रॉल शरीर को नुकसान पहुंचाने वाले बैड कोलेस्ट्रॉल को कम करता है।

ऐसे करें इस्तेमाल: तेल को बहुत ज्यादा गर्म न करें, ध्यान रखें कि धुआं न हो इतना ही गर्म करें। वहीं ऑलिव, मूंगफली या अखरोट ऑयल को बिना गर्म किए भी इस्तेमाल कर सकते हैं। सब्जियों में अधिक तेल का इस्तेमाल न करें। तेल का एक बार इस्तेमाल होने के बाद इसे दोबारा प्रयोग में न लें।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2PddTxF

ब्लैकहेड्स व मुहांसों से राहत दिलाएगा नीम के पत्तों का पानी, ऐसे करें इस्तेमाल

किसी भी तरह के संक्रमण या त्वचा संबंधी रोग, जानवर के काटने या बाहरी रूप से कोई चोट लगने पर विशेषज्ञ नीम का प्रयोग करने की सलाह देते हैं। यह बाहरी रूप से संक्रमण को खत्म कर तुरंत राहत देता है। जानते हैं इसके फायदे और प्रयोग के बारे में-

संक्रमण से बचाव : नीम की पत्तियों में खासकर यदि पत्तियां ताजा हों तो इनमें एंटीबैक्टीरियल, एंटीफंगल और एंटीवायरल गुण काफी मात्रा में पाए जाते हैं। ये किसी भी तरह के संक्रमण व मौसमी रोगों से बचाती हैं। संक्रमण और प्रभावित भाग पर सूजन हो तो उसमें भी आराम मिलता है।

गैस पर धीमी आंच पर एक भगोने पानी में नीम की 20-25 पत्तियों को उबालें, ठंडा होने पर छानें और इससे नहाएं। इससे शरीर पर होन वाली खुजली व दानें आदि की समस्या खत्म होगी।

ब्लैकहेड्स : ब्लैकहेड्स, वाइटहेड्स जैसी त्वचा संबंधी समस्याओं में भी नीम उपयोगी है। इसके लिए कुछ पत्तियों को चटनी की तरह पीसकर दही, शहद या दूध में मिलाकर पेस्ट की तरह चेहरे पर लगाएं।

मुहांसों से राहत: त्वचा पर उभरने वाले मुहांसों को दूर करने में भी इन पत्तियों को प्रयोग में ले सकते हैं। इसके लिए नीम की पत्तियों वाला गुनगुना पानी मुंह धोने में इस्तेमाल करें। चाहें तो खीरा, दही के साथ फेसपैक बनाकर भी चेहरे पर सूखने तक लगा सकते हैं।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2L5qD4i

Friday, 23 August 2019

HEALTH : ब्रेन पॉवर बढाना चाहते हैं तो आज से ही करें ये काम

स्पोट्र्स एक्टिविटी से व्यस्त दिनचर्या, काम के दबाव के बावजूद दिमाग की कार्यक्षमता बढ़ जाती है। शारीरिक रूप से फिट होने के साथ मानसिक रूप से व्यक्ति मजबूत होता है।
दौडऩा ( RUNNING )

पहले मॉर्निंग वॉक की आदत डालें। फिर धीरे-धीरे jogging करना शुरू करें। इसके बाद शरीर की क्षमतानुसार रनिंग करें। इससे शरीर लचीला होगा। शरीर के प्रत्येक अंग पर असर दिखेगा।
क्रिकेट- CRICKET

एकाग्रता, शरीर का लचीलापन बढ़ता है। पैरों की MUSCELS मजबूत होती हैं। शारीरिक संतुलन बढ़ता, हड्डियां व जोड़ मजबूत होते हैं। टीमवर्क की भावना भी बढ़ती है।
बास्केटबॉल- BASKET BALL

यह शरीर में ऊर्जा, गतिशीलता और प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। शरीर में फुर्ती, हाथों व आंखों के बीच समन्वय, दिमाग में त्वरित निर्णय की क्षमता बढ़ती है।
बैडमिंटन, टेनिस- BADMINTON, TENNIS

गति व दिशा के साथ खुद को संतुलित रखना सीखते हैं। ध्यान केन्द्रित करने की क्षमता बढ़ती है। तुरंत निर्णय लेना सीखते हैं। डिफेंस करना सीखते हैं। इसके अलावा मसल्स टोनअप, कंधे व बांहें मजबूत होती हैं।
फुटबॉल- FOOTBALL

मैदान में खेलने के लिए अपने पैरों का ज्यादा प्रयोग करने व शरीर का संतुलन अच्छा होता है। सांसों को नियंत्रित करने व डिफेंस करना सीखते हैं।
कबड्डी- KABADDI

कबड्डी शरीर को मजबूत और स्वस्थ बनाती है। फेफड़े व हृदय व स्वस्थ होते हैं। हाथ-पैरों की पकड़ व मांसपेशियों को भी मजबूती मिलती है।
जिम्नास्टिक - GYMNASTIC

शारीरिक फुर्ती के साथ बॉडी बैलेंसिंग में सबसे ज्यादा मददगार है। शरीर में लचीलापन बढ़ता है। सांसों पर नियंत्रण व आइ मूवमेंट भी सुधरता है।

उम्र सीमा नहीं
स्पोट्र्स के लिए कोई तय उम्र नहीं होती है। शरीरिक स्थिति के अनुसार खेल सकते हैं। कोई भी खेल गतिविधि से पहले बॉडी फिटनेस की जांच की जाती है। फिटनेस के बिना अपने मन से कोई खेल खेलना खतरनाक हो सकता है। शोधों में साबित हो चुका है कि SPORTS बच्चों की अच्छी ग्रोथ व बढ़ती उम्र को रोकने व बुजुर्गावस्था में बीमारियों से दूर रखने में मदद करती है।

EXPERT : डॉ. राजेंद्र के अहिरे, ऑथोपेडिक सर्जन , रायपुर
EXPERT : डॉ. राहुल उपाध्याय एंकल सर्जन, जयपुर



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2Zj7nFn

मानसून के मौसम में एहतियात बरतकर एेसे रखें सेहत का ध्यान, जानें खास टिप्स

मानसून के दौरान अचानक तापमान में गिरावट से बैक्टीरिया, वायरस व फंगस की संख्या में वृद्धि हो जाती है। ऐसे में खानपान के साथ साफ-सफाई पर ध्यान देना जरूरी है। वर्ना मलेरिया, डेंगू, स्वाइन फ्लू, टायफॉइड, आंखों में संक्रमण (कंजक्टिवाइटिस), हेपेटाइटिस, निमोनिया, उल्टी, दस्त, बुखार, कोलेरा और पेट संबंधी रोगों की आशंका बढ़ जाती है।

ये हैं मुख्य कारण -
इस मौसम में गंदे पानी और मार्केट में मिलने वाले जंक व फास्ट फूड में किटाणु पनपने लगते हैं। बरसात के बाद ये किटाणु, अन्य जीवाणु और विभिन्न तरह के कण हवा मेंं घुलकर आंख को और सांस के जरिए फेफड़ों पर असर डालते हैं। इसके अलावा संक्रमित वस्तु को छूने से भी किटाणु हाथों के जरिए फैलते हैं। इसका कारण कोल्ड फ्लू वायरस हैं जो मुख्य रूप से गले और फेफड़ों पर तेजी से हमला कर असर करने लगते हैं और व्यक्ति को बीमार बनाते हैं। जिन बच्चों का पूर्ण टीकाकरण नहीं हुआ होता वे मौसमी रोगों की चपेट में ज्यादा आते हैं।
खांसी, जुकाम के अलावा आंखों में लालिमा, दर्द व खुजली की तकलीफ होना सामान्य है।

इनका ध्यान रखें -
हाईजीन मेंटेन करने के साथ साफ-सुथरा भोजन करना चाहिए। आंखों को साफ व ठंडे पानी से धोना चाहिए।
आंखों की सेहत के लिए अनुलोम-विलोम, प्राणायाम, भ्रामरी करना लाभदायक हो सकता है। इससे आंखों से जुड़ी मुख्य नसों को आराम मिलता है।

एक-दूसरे से हाथ मिलाने (हैंड शेक) के बजाए नमस्कार का चलन बढ़ाएं। भोजन से पहले और बाद में हाथों को साबुन से अच्छी तरह से साफ करें। घर में यदि कोई रोगी है तो उचित एहतियात बरतें ताकि आप भी प्रभावित न हो सकें।

एलोपैथी में इलाज-
किटाणुओं से बचाव ही इलाज है। हल्के बुखार या बदनदर्द में पैरासिटामॉल दवा देते हैं। लक्षणों के आधार पर कंजक्टिवाइटिस के लिए एंटीबायोटिक दवा व आई ड्रॉप दी जाती है। बिना डॉक्टरी सलाह के कोई दवा न लें और न ही आई ड्रॉप डालें।

आयुर्वेद-
इम्यूनिटी बरकरार रख रोगों से बचा जा सकता है। इसके लिए 20-25 एमएल गिलोय का रस सुबह-शाम पीएं। तुलसी के पत्तों को निगलना लाभदायक है। आंखों की सेहत के लिए तर्पण प्रक्रिया (आंखों के चारों ओर उड़द के आटे का लेप करें। इसमें औषधियुक्त घी भर दें। कुछ समय के लिए आंखें बंद रखें। नसों को आराम और पोषण मिलेगा)।

होम्योपैथी-
इस मौसम में त्वचा संबंधी रोगों में लाल चकत्ते होना आम है। ऐसे में लक्षणों के अनुसार सिपिया दवा देते हैं। टाइफॉयड के लक्षण दिखते हैं तो आरसेनिक व बैप्टीशिया और निमोनिया होने पर रसटॉक्स दवा देते हैं। आंखों की उचित देखभाल की सलाह दी जाती है।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/31VCatJ

धूम्रपान व एसिडिटी की वजह से भी हो सकता है फूडपाइप का कैंसर

इसोफेगस कैंसर यानी भोजननली का कैंसर इन दिनों आम रोग बनता जा रहा है। इसके मामले 50-70 वर्ष के लोगों में पाए जाते थे लेकिन इन दिनों युवा भी इसकी चपेट में आ रहे हैं।

ये हैं प्रमुख कारण -
फूडपाइप को धूम्रपान, सिगरेट, शराब पीने और लंबे समय से एसिडिटी की तकलीफ से नुकसान होता है। इससे फूडपाइप के आकार-बनावट में बदलाव आने से करीब 8-10 साल बाद एसिड रिफलक्स या जलन पैदा होती है। इसे नजरअंदाज करना रोग को जन्म देना है। इनमें बतौर इलाज एसिड साफ तो कर देते हैं लेकिन भविष्य में कैंसर का खतरा रहता है। जिनमें फूडपाइप संबंधी विकार (एक्लेसिया कार्डिया) होता है उनकी भोजननली का वॉल्व खाने को रोक नहीं पाता व खाना सीधे पेट में जाता है।

लक्षण -
भोजन निगलने में दिक्कत व सीने में दर्द प्रारंभिक लक्षण हैं। कई बार इन्हें सामान्य मानकर लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं। जिस कारण 90 प्रतिशत मामलों में यह नली क्षतिग्रस्त हो जाती है।

इलाज - शुरुआती अवस्था में रोग की पहचान से इलाज होता है। इनमें दो तरह से स्क्रीनिंग की जाती है। क्रोमोएंडोस्कोपी व आई स्कैन (नैरो बैंड इमेजिंग)।

क्रोमोएंडोस्कोपी -
इसमें भोजननली पर ड्राई स्प्रे कर प्रभावित हिस्से का पता लगाते हैं। कैंसर सुनिश्चित करने के लिए बायोप्सी करते हैं। फिर एंडोसोनोग्राफी से कैंसर की गहराई का पता चलता है। यदि भोजन नली की सीमा से बाहर तक कैंसर कोशिकाएं फैली हैं तो सर्जरी करते हैं। सीमा के अंदर है तो दूरबीन से बिना सर्जरी ट्यूमर निकालते हैं।

नैरो बैंड इमेजिंग -
इसमें 3-4 तरह की रोशनी भोजननली पर डालते हैं। इससे कैंसर कोशिकाओं का रंग अलग ही दिखता है। बायोप्सी के बाद सर्जरी या दूरबीन की मदद से ट्यूमर निकालते हैं।

रेडियो/कीमोथैरेपी -
कुछ मामलों में रेडियो/कीमोथैरेपी के बाद भोजन व सांसनली स्वत: आपस में मिल जाती हैं। ट्रेकियोइसोफेगल फिस्टुला कर मेटेलिक स्टेंट डालकर नली को अलग करते हैं। कीमो, रेडियो के बाद 80 की उम्र के रोगी जो कुछ नहीं खा पाते उनमें भी इसे डालते हैं। यदि कैंसर फेफड़े, लिवर या अन्य अंग तक भी फैला हो तो कीमो या रेडियोथैरेपी देते हैं।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/323Hk73

इन एक्सरसाइज से दूर करें गले की डबल चिन

इन दिनों वजन बढ़ना हर 4 में से एक व्यक्ति की समस्या बन चुकी है। फिर चाहे महिला हो या पुरुष। शरीर में बढ़ती चर्बी जब गर्दन के आसपास दिखने लगती है तभी व्यक्ति खुद को अधिक वजनी समझने लगता है। यह स्थिति डबल चिन की होती है। जानें कुछ उपयोगी एक्सरसाइज के बारे में-

ठुड्डी को ऊपर उठाना-
ठुड्डी को ऊपर उठाने के दौरान जबड़े, गले और गर्दन की मांसपेशियों में खिंचाव पैदा होता है। इस दौरान ध्यान रखें कि चेहरे पर इन हिस्सों के अलावा होंठों की मांसपेशियों का भी मूवमेंट होना चाहिए।

ऐसे करें: इसे बैठकर या खड़े होकर भी कर सकते हैं। चेहरे को आसमान की तरफ ऊपर करते हुए होंठों की आकृति आसमान को चूमने जैसी बनाएं। इस दौरान होंठों पर होने वाले इस खिंचाव से गर्दन की मांसपेशी पर सीधे तौर पर असर होगा। इस स्थिति में 5-10 सेकंड रुकने के बाद सामान्य अवस्था में आ जाएं। गर्दन के खिंचाव के दौरान ऐसा 10-20 बार कर सकते हैं।

जबड़े की एक्सरसाइज -
चेहरे की मांसपेशियों के खिंचाव के लिए की जाने वाली एक्सरसाइज में से जबड़े का वर्कआउट अहम है। इसके अभ्यास से जबड़े के अलावा होंठ और गाल के आसपास जमी चर्बी धीरे-धीरे गायब होने लगती है।

ऐसे करें: कमर सीधी कर बैठें या खड़े हो जाएं। इसके बाद मुंह को इस तरह हिलाएं जैसे कि च्वुइंगम चबा रहे हों पूर्ण रूप से सांस अंदर लेते व छोड़ते रहें। इसके बाद मुंह खोलकर जीभ से मुंह के निचले भाग पर दबाव डालें। 5-10 सेकंड के लिए रुककर प्रारंभिक स्थिति में आ जाएं। एक समय में 10-15 बार दोहरा सकते हैं।

मुंह से हवा छोड़ना -
न केवल डबल चिन बल्कि जिनके गाल काफी फूले हुए होते हैं, उनके लिए भी यह अभ्यास मददगार है। इसमें गर्दन के साथ गाल और जबड़े से जुड़ी मांसपेशियों की भी एक्सरसाइज होती है।

ऐसे करें: कुर्सी पर कमर सीधी करके बैठ जाएं। अब चेहरा आसमान की ओर करते हुए मुंह से हवा बाहर को छोड़ें। इस दौरान गर्दन के आसपास होने वाले खिंचाव से चर्बी कम होने में मदद मिलेगी। एक बार में 5-10 सेकंड के लिए लगातार गर्दन ऊपर व नीचे करने का अभ्यास करें। ऐसा 15-20 बार दोहराएं।

ध्यान रखें -
हल्के हाथों से कभी-कभार गले व इसके आसपास किसी भी तेल से 5-10 मिनट मालिश कर सकते हैं।
डाइट में ज्यादा से ज्यादा फल व सब्जी खाएं।
लो फैट डेयरी प्रोडक्ट्स जैसे दही, चीज खाएं।
तलीभुनी चीजों व हाई प्रोटीन डाइट से दूर रहें।
जिन्हें टॉन्सिलाइटिस है या गले की सर्जरी हुई है तो विशेषज्ञ से पूछकर ये करें।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/343QeDo

ऑयली स्किन के लिए इस्तेमाल करें ये फेसपैक, खूबसूरत दिखेगा चेहरा

चंदन-मुल्तानी मिट्टी : त्वचा पर नेचुरल कोमलता लाने के लिए चंदन और मुल्तानी मिट्टी से तैयार फेसपैक लगा सकते हैं। इसके लिए बराबर मात्रा में मुल्तानी मिट्टी और चंदन पाउडर को लें। कील-मुहांसों की दिक्कत से राहत देने वाली चुटकीभर हल्दी और 3-4 चम्मच दूध डालकर इस मिश्रण को एक पेस्ट के रूप में तैयार कर लें। सूखने तक इसे चेहरे पर लगा रहने दें। इसके बाद गुनगुने पानी से चेहरा धो लें। इससे त्वचा पर चमक आती है और चेहरे की खूबसूरती बढ़ती है।

लौंग फेसपैक : लौंग में औषधीय गुण होते हैं। इस वजह से यह मुहांसों के इलाज के लिए बढ़िया साबित होता है। साथ ही चेहरे पर दाग भी नहीं रहते। त्वचा के रोमछिद्रों में भरे तेल को निकालने में भी यह सहायक होता हे। रोजाना यदि इससे चेहरा धोया जाए तो खासतौर पर ऑयली त्वचा के कारण होने वाले मुहांसें खत्म होकर चमक बढ़ती है। इसके लिए 4-5 लौंग को थोड़े से पानी के साथ पीसकर पेस्ट बना लें। इसे मुहांसों पर लगा कर रातभर के लिए छोड़ दें। सुबह उठते ही पानी से धो लें।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2zmqlQN

मच्छर का एक डंक बना सकता है रोगी, रहें अलर्ट

03 अवस्थाएं हैं डेंगू की- क्लासिकल, हेमरेजिक फीवर और शॉकिंग सिंड्रोम।
48 घंटे बाद (काटने के) महसूस होने लगते मच्छर जनित रोग के लक्षण।
4.5 लाख लोगों की मृत्यु सालाना मलेरिया बीमारी से विश्व में होती है।
50 % लोगों में पूर्ण इलाज न लेने से रोग लौट सकता है।
कई हैं प्रजाति ...
वैसे तो मच्छरों की कई प्रजातियां मौजूद हैं लेकिन भारत में कुछ प्रमुख प्रजातियां ही रोगों को फैलाती हैं। इसमें एनाफिलीज, एडीज और क्यूलेक्स प्रकार के मच्छर रोगों के वाहक हैं। मलेरिया मच्छर की दो प्रमुख प्रजाति में वाइवेक्स से ज्यादा फैल्सिपेरम खतरनाक और जानलेवा होता है। ये किडनी, लिवर आदि को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
टाइगर मॉस्किटो (डेंगू)

डेंगू यानी हड्डीतोड़ बुखार एडीज मच्छर के काटने से होता है। इसमें कमर में तेज दर्द, आंखों के ऊपरी हिस्से में दर्द और गंभीर रूप होने पर प्लेटलेट्स घटने लगती है। गंभीर अवस्था में डेंगू स्ट्रोक सिंड्रोम होता है।
चिकनगुनिया
एडीज इजिप्टी से यह फैलता है। इसका वाहक भी डेंगू मच्छर ही है। अंतर केवल इतना है कि इसमें शरीर के प्रमुख जोड़ों में दर्द होता है। मच्छर के काटने के ४-७ दिन बाद जोड़ों में दर्द व सूजन, तेज बुखार व मसल्स पेन होता है।
हर्बल पौधे भगाएंगे मच्छर
मच्छरों से बचाव के लिए नीम, नीलगिरी व लेमनग्रास का तेल, स्प्रे व रोलर त्वचा पर लगा सकते हैं। घर में इंडोर पौधे जैसे तुलसी, लेवेंडर, लेमनग्रास, पिपरमिंट, गेंदा रखें। गुलमेहंदी की सूखी पत्तियां जलाएं।
लापरवाही से बढ़ सकती परेशानी
म लेरिया मच्छर प्लाजमोडियम परजीवी का होता है। इसका वाहक मादा एनाफिलीज होता है। ये शाम के समय 5-7 बजे के बीच ज्यादा सक्रिय होते हैं। इसकी फैल्सिपेरम प्रजाति सीधे लाल रुधिर कोशिकाओं पर असर करती हैं। इसके काटने के 48 घंटों बाद से सर्दी लगकर बुखार आने, तिल्ली बढऩे, पीलिया जैसे लक्षण सामने आते हैं। वहीं वाइवेक्स प्रजाति का मच्छर साफ पानी में पनपता है। ये दीवारों पर ज्यादा बैठते हैं। इसमें सिरदर्द, बुखार और पीलिया के लक्षण ज्यादा सामने आते हैं।
अलर्ट : तेज बुखार, यूरिन का रंग बदले, तेज सिरदर्द, आंखों का रंग पीला पडऩा जैसे लक्षण हों तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं। लापरवाही से मल्टीऑर्गन फैल्योर (प्रमुख रूप से लिवर व किडनी पर असर) और ब्लैक वॉटर फीवर यानी काले रंग का यूरिन आ सकता है। साथ ही मस्तिष्क तक असर होने पर सेरेब्रल मलेरिया की स्थिति बन जाती है। जिसमें मरीज को बेहोशी आती है और वह कोमा में भी जा सकता है।
जांच व इलाज : कार्ड टेस्ट, थिक एंड थिन ब्लड टेस्ट आदि से जीवाणु का पता कर इलाज के तहत दवा देते हैं।
एक्सपर्ट : डॉ. नवीन किशोरिया, सी. प्रो. (मेडिसिन), डॉ एसएन मेडिकल कॉलेज, जोधपुर
एक्सपर्ट : डॉ. सर्वेश अग्रवाल, आयुर्वेद विशेषज्ञ, राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान, जयपुर



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2zkmPGR