Sunday, 30 June 2019

जटिल बीमारियों में मरीजों को उम्मीद दे रही नई तकनीक

कैंसर में इम्यूनोलॉजी थैरेपी
इम्यूनोलॉजी कैंसर के इलाज में कारगर है। रोग प्रतिरोधकता बढ़ाने के लिए थैरेपी दी जाती है। ये रोग प्रतिरोधक कोशिकाएं कैंसर की कोशिकाओं को खत्म करती हैं और स्वस्थ कोशिकाओं को कोई नुकसान भी नहीं पहुंचाती हैं। कैंसर के दोबारा होने की आशंका घटती है। इसके साथ ही इस थैरेपी से किसी तरह के साइड इफेक्ट भी कम होता है।

दस गुना छोटा है पेसमेकर
प हले की अपेक्षा 10 गुना छोटा है। इसको इंप्लांट करने के लिए सर्जरी की जरूरत नहीं होती है। इसे मरीज के दाएं वेंट्रिकल में आसानी से लगाया जाता है। इसके प्रयोग के लिए किसी वायर की भी जरूरत नहीं होती है। ऐसे मरीज जिनके दिल की धड़कन सामान्य से कम होती है उन्हें लगाया जाता है। जरूरत न होने पर हमेशा के लिए बंद किया जा सकता है।
टेली- रोबोटिक सर्जरी
टेली-रोबोटिक सर्जरी से दुनिया के किसी भी कोने से अस्पताल में बैठा सर्जन दूसरे सर्जन को सर्जरी के लिए निर्देशित करता है। जटिल ऑपरेशन में सुपर स्पेशलिटी ट्रीटमेंट मिलने में आसानी होगी। ग्रामीण क्षेत्रों के सर्जन जटिल केस में मदद लेकर ऑपरेशन कर सकेंगे। इलाज वाले सेंटरों का उपकरणों से लैस होना जरूरी होगा। अमरीका में ट्रायल हो चुका है।
लेजर से एंजियोप्लास्टी
हार्ट अटैक या ब्लॉकेज को लेजर एंजियोप्लास्टी से इलाज हो सकेगा। इसमें हृदय की जिस धमनी में ब्लॉकेज होगा उसे लेजर से खत्म किया जाएगा। दोबारा ब्लॉकेज भी रुकेगा। इसमें रोगी को लंबे समय तक अस्पताल में नहीं रहना पड़ेगा और किसी तरह का चीरा या टांका भी नहीं लगेगा। वॉल्व पर भी काम चल रहा है।

एक्सपर्ट : डॉ. राजीव सरीन, कैंसर रोग विशेषज्ञ, मुम्बई



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डॉक्टर्स डे : मरीजों का डॉक्टर से टूट रहा भरोसा बड़ी चुनौती

नई दिल्ली स्थित सीनियर कॉर्डियोलॉजिस्ट डॉ. के.के. अग्रवाल ने बताया कि डॉक्टर-मरीजों के बीच बढ़ती अविश्वास की खाई बढ़ रही है। डॉक्टर में सेवाभाव व मरीज में भरोसा कायम रहना दोनों के हित में है। मरीज, परिजनों को लगता है कि डॉक्टर जांचें व सर्जरी पैसा कमाने के लिए करते हैं। ऐसा नहीं है, डॉक्टर मरीज की बीमारी के बारे में सोचता है ताकि वह स्वस्थ होकर घर जाए।

बढ़ रही अविश्वास की खाई

मरीजों का डॉक्टरों पर विश्वास डगमगा रहा है। अक्सर मरीजों को शिकायत होती है कि डॉक्टर जेनरिक दवाओं की बजाय महंगी दवाएं लिखते हैं। मरीजों को सवालों के जवाब नहीं देते हैं। परामर्श के लिए भी मोटी फीस लेते हैं। वहीं, डॉक्टरों का कहना है कि मरीज बीमारी व इलाज के बारे में पूरी तरह समझे बिना ही डॉक्टरों को दोष देते हैं। वे इंटरनेट से आधी-अधूरी जानकारी के आधार पर डॉक्टर से तर्क करते हैं। डॉक्टर की यही कोशिश होती है कि ठीक होकर रोगी हंसते-मुस्कुराते हुए परिवार के साथ घर जाए। मरीज व डॉक्टरों का रिश्ता एक दूसरे के प्रति अच्छा व्यवहार से अटूट बना रह सकता है।
ऐसे सुधरेगा रिश्ता
उन्होंने कहा कि मरीज पूरे विश्वास के साथ इलाज के लिए डॉक्टर के पास जाता है। इसके लिए जरूरी है कि डॉक्टर भी मरीज व उनके परिजनों के विश्वास पर खरा उतरे। मरीजों का भरोसा ही डॉक्टर को नई ताकत देती है। कई जांचें बीमारी की स्थिति व अन्य संबंधित बीमारियों की पहचान के लिए कराई जाती हैं। यह मरीज के हित में होती हैं। निजी चिकित्सा व्यवसाय है, लेकिन मानवीय सेवा पहला लक्ष्य है।



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डॉक्टर्स डे : स्वाइन फ्लू होते ही इलाज व बचाव कर सात दिन में रिकवर हुआ

फरवरी 2019 की बात है, हॉस्पिटल में मरीजों को देख रहा था, उस समय जुकाम की शिकायत हुई। छींक आनी शुरू हुई। जब छींकें लगातार बढ़ती गई और गले में भी दिक्कत शुरू हो गई तो स्वाइन फ्लू की आशंका हुई। इसके बाद स्वाइन फ्लू से संबंधित जांचें करवाई तो रिपोर्ट पॉजिटिव निकली तो थोड़ा चिंता हुई। क्योंकि स्वाइन फ्लू के वायरस की फ्रीक्वेंसी तेज होती है। इसलिए तुरंत अन्य वरिष्ठ डॉक्टरों से बातचीत कर ओपिनियन ली।

बिना समय गंवाए इलाज शुरू

पूरी जानकारी के बाद बिना समय गंवाए संबंधित दवाएं लेना शुरू कर दिया। जब परिवार को इसकी जानकारी हुई तो सभी के माथे पर चिंता की लकीरें थी लेकिन उन्हें समझाया कि चिंता की बात नहीं है। उन्हें भरोसा दिलाया कि जल्द ही ठीक हो जाऊंगा। इसके बाद सभी ने सहयोग किया। दूसरे फ्लोर पर एक कमरे में सात दिन तक रह कर जरूरी प्रोटीन, पोषकतत्व से भरपूर आहार व नियमित दवाएं लेना शुरू किया तो करीब एक सप्ताह में बुखार, गले में खरांश आदि कम हुई। करीब एक माह रिकवर करने में लगे। इस तरह की बीमारी में बिना डरे इलाज के साथ बचाव के कदम उठाना चाहिए।



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धमनियों को स्वस्थ रखती है ग्रीन टी

ग्रीन-टी पीने से धमनियां स्वस्थ रहती हैं। टोक्यो की क्योटो यूनिवर्सिटी में हुए एक शोध के मुताबिक ग्रीन-टी में मौजूद पॉलीफेनॉल तत्त्व धमनियों को अधिक फैलने, क्षतिग्रस्त होने (एन्यूरिज्म) और उनमें सूजन आने से बचाता है। कई बार अत्यधिक फैलने के कारण ये फट जाती हैं। पॉलीफेनॉल तत्त्व धमनियों को लचीलापन प्रदान करता है। कई बार किडनी के निचले भाग की धमनी में सूजन आने से व्यक्ति की मौत भी हो सकती है।

ग्रीन-टी पीने के अन्य फायदे
- ग्रीन-टी वजन कम करने के लिए फायदेमंद होती है। इसमें मौजूद एंटी-ऑक्सीडेंट, मेटाबॉलिज्म को बढ़ाकर वजन कम करने में मदद करता है। इसमें मौजूद सक्रिय यौगिक, फैट बर्निंग हॉर्मोन को प्रभावित करते हैं।

- ग्रीन-टी, पेरियोडोंटल (एक प्रकार की मंसूड़ों की बीमारी) में वरदान है । ग्रीन-टी, बैक्टीरियल प्लाक (दांतों की मैल) को नियंत्रित कर दांतों को खराब होने से बचाती है। ग्रीन-टी में मौजूद पॉलीफेनोल्स, ग्लोक्सीलट्रांसफरेस (एक तरह का बैक्टीरिया, जो चीनी खाने से मुंह में पैदा होता है) का अंत करके प्लाक से लड़ता है।

- हरी चाय में फ्लोराइड भी होता है, जो दांतों को खराब होने से बचाता है।

- ग्रीन-टी से डायबिटीज का खतरा कम हो सकता है, क्योंकि इसमें मौजूद पॉलीफेनोल्स (polyphenols) शरीर में ग्लूकोज के स्तर को संतुलित करते हैं।

- ग्रीन-टी हानिकारक कोलेस्ट्रॉल, जिससे ह्रदय रोग होने की आशंका बढ़ती है, उसके स्तर को कम कर सकती है।

सावधानी
- खाली पेट कभी भी ग्रीन टी न पिएं।

- खाना खाने से एक या दो घंटे पहले ही ग्रीन टी पी लें।

- कुछ लोग ग्रीन टी में दूध और चीनी मिलाकर पीते हैं। ग्रीन टी में चीनी और दूध मिलाने से परहेज करें।

- ग्रीन टी को शहद के साथ मिलाकर पीना फायदेमंद रहेगा।



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Breast cancer: रोजाना 75 मिनट का व्यायाम बे्रस्ट कैंसर से बचाएगा , जानें इसके बारे में

Breast cancer: महिलाओं में बे्रस्ट कैंसर का पता अंतिम अवस्था में लगता है, ऐसे में इलाज कठिन हो जाता है। उम्रदराज महिलाओं में इसकी अधिक आशंका रहती है, इसका मतलब यह नहीं कि युवतियों मेंं यह रोग नहीं होता। 20-30 वर्ष की आयु में भी इस रोग के मामले बढ़ रहे हैं। इसे व्यायाम कर काफी हद तक रोका जा सकता है। जानें इससे जुड़े तथ्य-

मोटापा नियंत्रित होना जरूरी -
मोटापा बे्रस्ट कैंसर के लिए जोखिम भरा है। अधिक वजन वाली महिलाओं में विशेषकर रजोनिवृति (मेनोपॉज) के बाद इस रोग की आशंका अधिक रहती है। इससे बचने के लिए रोजाना 75 मिनट का व्यायाम जरूरी है जिसे टुकड़ों में बांटकर भी किया जा सकता है। 16-64 वर्ष आयु की महिलाएं घरेलू काम, नृत्य, व्यायाम, बागवानी या साइक्लिंग भी कर सकती हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास के कैंसर सेंटर के एक शोध के अनुसार अधिक शक्कर लेना मोटापा बढऩे का कारण है। ये बे्रस्ट कैंसर का जोखिम बढ़ाता जो फेफड़ों तक फैल सकता है।

कब हो जाएं अलर्ट -
बे्रस्ट में किसी प्रकार की गांठ दिखाई दे या इसमें अथवा बगल में असहनीय दर्द हो जैसे कि माहवारी के दिनों में होता है। बे्रस्ट की त्वचा का बदरंग होना या लालिमा आना। निप्पल में दानें उभरना या बगलों में गांठ होना। इससे रक्तरहित या रक्त सहित रिसाव होना अथवा बनावट में परिवर्तन हो। ब्रेस्ट टिश्यू के मोटा होने का अहसास हो या बे्रस्ट के आकार में बदलाव हो। स्तनों या निप्पल की त्वचा में चकत्ते या पपड़ी जमना।



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किडनी खराब होने की जानकारी के बाद बीमारी चिंतित हुआ पर डरा नहीं, इलाज से अब स्वस्थ हूं

2011 में मैं हॉस्पिटल में नाइट में ड्यूटी कर रहा था। उस रात कुछ असुविधा महसूस हुई तो अगले दिन रूटीन जांचें करवाई। इसमें क्रिएटिनिन लेवल 1.8 आया जो थोड़ा बढ़ा था। करीब तीन साल से मैं हाइपरटेंशिव था, नेफ्रोलॉजी में वरिष्ठ चिकित्सकों की परामर्श से अन्य जांचों से पता चला कि किडनी फंक्शन ठीक नहीं है। किडनी खराब हो रही है। इससे डर लग रहा था किडनी खराब हो गई तो क्या होगा? बच्चे तो अभी छोटे हैं। विशेषज्ञों के बताए परहेज के साथ इलाज शुरू किया। 2015 में क्रिएटिनिन का लेवल तीन से चार व 2016 में पांच से छह पहुंच गया। जून 2017 में पेट खराब हो गया। थकान तेजी से बढऩे लगी तो जांच में पता चला दोनों किडनी खराब हो चुकी हैं। डायलिसिस शुरू हो गई। इस दौरान भी ड्यूटी कर रहा था। किडनी ट्रांसप्लांट के लिए परिवार व नजदीकी रिश्तेदारों में ब्लड मैच नहीं हुआ तो कैडेवर ही विकल्प था। जुलाई 2018 में किडनी का सफल ट्रांसप्लांट हुआ। डेढ़ माह बाद मैंने दोबारा ड्यूटी ज्वाइन की। नियमित जांच, परहेज के साथ दवाएं लेता हूं। इस दौरान वरिष्ठ सहयोगियों, पत्नी व बच्चों का पूरा सहयोग मिला।

 



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प्रदूषण का असर कम करते हैं ये नेचुरल फाइटर

शहराें में बढ़ता प्रदूषण आज हमारी सेहत के लिए नुकसानदायक हाे चुका है। प्रदूषण बढ़ने का मुख्य कारण है फैक्ट्री-कारखाने, गाडि़याें का धुआं है। धुएं में मौजूद कण और रसायन सीधे शरीर में जाकर अंगों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। जानें डाइट में किन चीजों को शामिल कर इनसे बचाव किया जा सकता है-

फलों और सब्जियों में पाए जाने वाले एंटीऑक्सीडेंट्स शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ाते हैं। ये जहरीली गैसों के खतरों से बचाने के साथ कैंसर की वजह बनने वाले फ्री-रेडिकल्स से भी बचाता है। साथ ही ओमेगा-थ्री, बीटा कैरोटिन व विटमिन-ई भी फायदेमंद है।

विटामिन-सी :
यह एक अच्छा एंटी-ऑक्सीडेंट है जो शरीर में विटामिन-ई बनाने में मदद करता है। नींबू, संतरा, आंवला, अमरूद, धनिया पत्ती, चौलाई का साग, गोभी, साग आदि में यह पाया जाता है।

ओमेगा-थ्री फैटी एसिड : यह हृदय रोग व डायबिटीज से बचाने, हार्मोंस को बैलेंस कर प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के साथ विटामिन-डी बनाता है। अखरोट, बादाम, मेथीदाना, सरसों, अलसी से इसकी पूर्ति कर सकते हैं।

विटामिन-ई : यह प्रदूषण के कारण शरीर की क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को रिपेयर करता है। बादाम, मिर्च, सरसों तेल, लौंग आदि में यह भरपूर मात्रा में पाया जाता है।

बीटा कैरोटिन : यह शरीर में होने वाली सूजन से बचाता है। हरी पत्तेदार सब्जियों और लाल व पीले फलों जैसे गाजर, चौलाई, धनिया, मेथी, कद्दू, पालक, मूली, अमरूद आदि में पाया जाता है।



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ग्लूट ब्रिज से कमर और पैरों को मिलती मजबूती

कमर दर्द दूर करने और घुटनों को मजबूत बनाने के लिए 'ग्लूट ब्रिज' वर्कआउट किया जा सकता है। आइए जानें इसके फायदे-

कैसे करें
मैट पर सीधे लेट जाएं। पैरों को चित्रानुसार घुटनों से मोड़ें और तलवे व हथेलियां जमीन से लगाएं। सांस लेते हुए और पेट की मसल्स पर धीरे-धीरे जोर देते हुए कमर को ऊपर उठाएं। कूल्हे पर अधिक जोर न दें। धीरे-धीरे कमर को नीचे लाएं और सांस छोड़ें। शुरुआत में इसे 3 बार कर सकते हैं। इसके बाद इसे क्षमतानुसार बढ़ाएं। इसे हफ्ते में 3-4 बार कर सकते हैं।

फायदे व सावधानी
यह वर्कआउट पैरों को मजबूत बनाने के साथ कूल्हों को सही आकार देता है। इसके अलावा कमर और घुटनों में दर्द की समस्या से राहत देता है। वर्कआउट के दौरान कमर को क्षमतानुसार ही ऊपर ले जाएं। इस दौरान अगर लोअर बैक पेन या घुटनों में दर्द होने लगे तो इसे न करें। हाल ही कोई सर्जरी हुई तो इसे करने से बचें।



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दांत पीसने की आदत से होते कई दंत रोग

बच्चों में अक्सर बार-बार दांत पीसना या घिसने की आदत होती है। लगातार व लंबे समय तक ऐसा करने से दांतों को नुकसान पहुंचने और मुंह संबंधी दिक्कतें होने लगती हैं। मेडिकली इसे ब्रक्शिज्म कहते हैं। जानते हैं इसके बारे में-

अधिकतर छोटे बच्चों में यह आदत टूटे दांत या निश्चित जगह पर दांत के न होने से खालीपन के कारण होती है। ऐसा वे रात में भी करते हैं जिससे उनमें स्लीप डिसऑर्डर होने की आशंका रहती है। जिसमें खर्रांटे व मुंह से सांस लेने की दिक्कत आम है।

लक्षण : आदत से रहते हैं अनजान
इसके कोई लक्षण नहीं होते और न ही यह पता चलता है कि बच्चा ऐसा कर भी रहा है। लेकिन लंबे समय तक ऐसा करने से जब तक इस वजह से कोई परेशानी न हो तब तक इसका पता नहीं चलता।

धंसने के साथ टूट भी सकते हैं दांत
घिसने व पीसने से दांत व जबड़े भी प्रभावित होते हैं। इसके क्रॉनिक बीमारी का रूप लेने पर दांत धंस जाते हैं जिससे दांतों या जबड़े के फ्रेक्चर होने, दांतों की जड़ों का ढीला होने व असमय इनके टूटने की आशंका बढ़ती है।

इलाज : रूट कैनाल ट्रीटमेंट, इंप्लांट
गंभीर समस्या में दांतों का रूट कैनाल ट्रीटमेंट, इंप्लांट, डेंचर लगाने की जरूरत भी पड़ सकती है। आदत बहुत पुरानी न होने पर डॉक्टर माउथ गार्ड पहनने की सलाह देते हैं। आदत छुड़ाने के लिए च्वूइंगम दे सकते हैं। बीच-बीच में टोकें।



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60 की उम्र से पहले सुनने में आए परेशानी, ताे रखें ये सावधानी

उम्र बढ़ने के साथ सुनने की क्षमता में कमी आना स्वभाविक है। लेकिन कुछ मामलों में कान में तरह-तरह की आवाजें आना जिसे टिनीटस भी कहते हैं, के कारण भी कम सुनाई देता है। मेडिकली इसे प्रेसबायक्युसिस कहते हैं। ऐसे में घबराने की जरूरत नहीं है। कुछ बातों को ध्यान में रखकर सुनने की क्षमता में सुधार किया जा सकता है।

कान की अंदरूनी सतह कमजोर हाेना बनती है वजह
60 - 65 वर्ष की उम्र के बाद सुनने में कमी आम है। सामान्य रूप से कान की आंतरिक सतह पर पड़ने वाली आवाज विद्युत तरंग बनकर दिमाग तक जाती है और दिमाग तुरंत उसे समझने का संदेश देता है। लेकिन उम्र बढ़ने के दौरान कान की आंतरिक सतह कमजोर होने से कोशिकाओं का काम धीमा हो जाता है। इसके अलावा डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर के रोगी या जिनका कान आकार में बड़ा या कान में कोई विकृति हो उनमें सुनने की क्षमता साठ वर्ष की उम्र से पहले भी प्रभावित होने लगती है।

जांच : ऑडियोमेट्री से पता लगाते गंंभीरता : ऑडियोमेट्री जांच से पता करते हैं कि कान में किस कारण और कितनी क्षति हुई है। कान को नुकसान पहुंचने के दो कारण हो सकते हैं। पहला, कान के पर्दे में छेद होना और दूसरा, पर्दा ठीक होने के बावजूद आंतरिक कान में खराबी होना।

इलाज व सावधानी
मरीज को ऐसी दवाएं देते हैं जो आंतरिक कान की नसों को सक्रिय करती हैं। बिल्कुल सुनाई न देने की स्थिति में हियरिंग एड लगाते हैं। सावधानी के तौर पर विशेषज्ञ तेज आवाज वाले माहौल से दूर रहने और समय-समय पर ब्लड प्रेशर व ब्लड शुगर जैसी जांचें कराने की सलाह देते हैं। इसके अलावा शोरगुल वालो स्थानों पर जानें से बचें।



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Thoracoscopy: जानिए फेफड़ों में पानी भरने और इसकी जांच से जुड़ी ये बातें

थोरेकोस्कोपी क्या है ?

Thoracoscopy: फेफड़ों के विभिन्न हिस्सों में होने वाली बीमारियों के इलाज में ब्रोंकोस्कोपी तकनीक उपलब्ध होने से काफी सुविधा हो गई है। लेकिन फेफड़ों के बाहर की झिल्ली (प्लयूरा) से जुड़े रोगों का पता लगाना कठिन होता है। थोरेकोस्कोपी तकनीक में एक विशेष लचीली ट्यूब को सीने में छोटे चीरे के जरिए डालकर फेफड़ों की झिल्ली और आसपास के अंगों से जुड़े रोगों का इलाज आसान हो गया है। इसमें फेफड़ों की झिल्ली में पानी भरना आम बीमारी है। थोरेकोस्कोपी यंत्र की मदद से प्लयूरल केविटी का पूरा दृश्य कैमरे में दिखता है। थोरेकोस्कोपी से लिए गए बायोप्सी के नमूने से ऐसी बीमारी का सही पता लग जाता है। कई बार प्लयूरल केविटी में भरे पानी में जाले बन जाते हैं जिससे पानी पूर्णतया निकाला नहीं जा सकता। ऐसी स्थिति में थोरेकोस्कोपी से जाले तोड़े जाते हैं।

क्या इसमें दर्द होता है?
छाती में छोटा सुराख कर थोरेकोस्कोप प्लयूरल केविटी में जाता है। जहां से यंत्र प्रवेश करता है, वहां इंजेक्शन से सुन्न कर देते हैं। साथ ही दर्द निवारक दवा देते हैं जिससे उसे दर्द नहीं होता है।

फेफड़ों की झिल्ली में पानी भरने के क्या कारण हैं ?
कई बार पानी भरने के कारण का पता नहीं लग पाता है। आमतौर पर कैंसर, लिम्फोमा और टी.बी. जैसी बीमारियों के कारण फेफड़ों की झिल्ली में पानी भरने की समस्या देखी जाती है। लेकिन हार्ट फेल्योर व किडनी से जुड़ी समस्या के कारण भी हो ऐसा सकता है।

जांच में कितना समय लगता है ?
जांच से एक-दो घंटे पहले मरीज को बुलाते हैं। इस प्रक्रिया से 6 घंटे पहले तक खानपान बंद कर देते हैं। जांच में 1 घंटा लगता है।

थोरेकोस्कोपी के साथ क्या खतरा है?
यह सुरक्षित तरीका है। टी.बी. व कैंसर रोगियों में पानी की अधिकता से इंफेक्शन का खतरा रहता है। रक्तस्राव भी हो सकता है। छुट्टी के बाद तक ट्यूब के स्थान पर कुछ दर्द रह सकता है।

थोरेकोस्कोपी के बाद क्या छाती में नलकी रहती है?
एक चेस्ट ट्यूब को 2-3 दिन तक छेद में रख देते हैं। इस दौरान मरीज को अस्पताल में भर्ती रखते हैं। इसमें से प्लयूरा में बचा हुआ पानी निकलता रहता है। दर्द होने पर 1-2 दिन दर्द की दवा दे दी जाती है।



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सुबह बासी मुंह पिएं पानी, दूर होंगे पेट व त्वचा के राेग

लार मुंह में बनने वाला एक तरल है जो एंटीसेप्टिक की तरह काम कर हमें कई रोगों से बचाता है। लार में मौजूद एंजाइम भोजन को पचाते हैं। यह दांतों के बीच फंसे भोजन को तोड़कर बैक्टीरिया से बचाती है। यह दांतों, जीभ व मुंह के कोमल ऊत्तकों को चिकनाई देकर सुरक्षा करती है। रोजाना सुबह बासी मुंह पानी पीने से लार पेट में जाकर रोगों से बचाएगी।

98 प्रतिशत मानव लार 98 प्रतिशत पानी से बनी है, जबकि इसके शेष 2 प्रतिशत भाग में एंजाइम, बलगम, इलेक्ट्रोलाइट और जीवाणुरोधी यौगिक जैसे तत्त्व मौजूद होते हैं।

लार से कई रोगों का इलाज
एक्जिमा में सुबह उठकर करीब 1 माह तक लार लगाने से फायदा होता है। इसके अलावा सोरायसिस में सुबह बासी मुंह की लार 6 माह से 1 वर्ष तक, जलने के निशान पर 1-2 माह व घाव पर 5-10 दिन तक लार लगाएं। हाथ-पैरों की अंगुलियों के बीच होने वाले फंगल इंफेक्शन पर इसे रोजाना लगाएं। आंख आने पर दो दिन तक व एलर्जी होने पर 2-3 माह तक आंखों में लार को काजल की तरह लगाएं। पेट की समस्या या कीड़े होने पर सुबह उठकर बासी मुंह पानी पीएं।

इन वजहों से मुंह में लार की कमी
धूम्रपान से लार के दूषित होने या तंबाकू, खैनी, पान व जर्दा खाने से बार-बार थूकने की आदत से मुंह सूखने लगता है जिससे यह खत्म हो जाती है। ऐसे में जरूरत से ज्यादा लार बाहर निकल जाती है। दवाओं या ड्रग आदि के प्रयोग से भी मुंह सूख जाता है और लार न के बराबर रह जाती है।

अधिक बनना यानी पेट के रोगों की आशंका
कैंसर व स्ट्रोक का पता लगाने व डीएनए मैपिंग आदि लार के माध्यम से की जाती है। इसका अधिक बनना पेट, लिवर और पेट के कीड़े होने का सकेंत होता है।



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surgery: सर्जरी सेे पहले इन बातों का रखें ध्यान, जानें इनके बारे में

surgery: अधिकांश मरीजों को सर्जरी से पहले एनेस्थीसिया दिया जाता है जिससे की मरीज को ऑपरेशन के दौरान दर्द न हो। जिसे विशेषज्ञ अहम मानते हैं। ऐसे में सर्जरी के लिए एनेस्थीसिया लेने से पहले मरीज को कुछ बातों को ध्यान में रखना जरूरी है। जानें इनके बारे में-

सर्जरी से 3 घंटे पहले कुछ न लें -
ऐसी सर्जरी जिनमें डॉक्टर को एनेस्थीसिया देने की जरूरत महसूस हो उनमें मरीज को सर्जरी से 3 घंटे पहले कुछ भी खाने की मनाही होती है। साथ ही यदि मरीज पानी पीना चाहे तो एनेस्थीसियोलॉजिस्ट की सलाह से दो घंटे पहले पी सकता है।

सर्जरी सुनिश्चित होने के बाद एक माह पहले से धूम्रपान न करें और शराब से दूरी बना लें वर्ना एनेस्थीसिया में प्रयोग होने वाली दवा का असर कम हो सकता है।

विशेषज्ञ को रोग के अलावा अन्य रोग और इनके लिए ली जाने वाली दवाओं, रक्त पतला करने वाली मेडिसिन या गर्भनिरोधक गोलियां ले रही हैं तो इसकी जानकारी जरूर दें।

एनेस्थीसियोलॉजिस्ट को बीमारी, संक्रमण, पूर्व में हुई कोई सर्जरी या कृत्रिम व ढीले दांत के बारे में बताएं। किसी तरह की एलर्जी या दुष्प्रभाव को न छिपाएं।



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खुद को व्यस्त रखकर बढ़ाएं पॉजिटिविटी

दिमाग में हर वक्त गलत विचार आना जीवन को प्रभावित करता है।जिसकी वजह से कर्इ बार आप अनचाहे कर्इ परेशानियाें में फंस जाते हैं।आइए जानते हैं इससे निपटने के उपायाें के बारे में :-

नकारात्मकता क्या है?
नकारात्मकता निराशावादी दृष्टिकोण है जिसमें व्यक्तिको हर वक्तकुछ गलत होने का डर लगता है जैसे 'कोई मुझे प्यार नहीं करता', 'दुनिया बहुत ही बेकार है', 'कहीं घूमने जाएंगे तो दुर्घटना हो जाएगी'। इससे उसमें नकरात्मकता बढ़ती जाती है।
हम दूसरों को जल्दी सकारात्मक सोच के लिए प्रेरित कर देते हैं पर खुद को नहीं समझा पाते, ऐसा क्यों? अक्सर व्यक्ति खुद को अच्छा काउंसलर मानता है लेकिन दूसरों को निराशा से बाहर निकालने के चलते थोड़ा निराशावादी दृष्टिकोण अंजाने में इकट्ठा कर लेता है। वह चाहकर भी सकारात्मक सोच नहीं बना पता। ऐसे में साइकोलॉजिस्ट से परामर्श लें।

क्या बढ़ती उम्र के साथ यह अधिक हावी होने लगती है?
नहीं, उम्र के साथ नहीं बल्कि यह माहौल या किसी पूर्वाग्रह के कारण भी हो सकती है। जैसे बुजुर्गों में जिंदगी के कड़वे अनुभव उन्हें नकारात्मकता से भर देते हैं। उन्हें मनपसंद कार्य में व्यस्त कर या उनसे बात की जाए तो वे इससे बाहर निकल सकते हैं।

यह किन स्थितियों में बढ़ती है व इलाज क्या है?
किसी लंबी बीमारी- स्वयं की या परिजन की, परीक्षा के परिणाम के समय, किसी मृत्यु या दुर्घटना की वजह से, बार-बार विफल होना जैसी चीजें नकारात्मक सोच को बढ़ाती हैं। नकारात्मकता सिर्फ एक सोच है जिसे बदला जा सकता है। इसके लिए साइकोथैरेपी की विभिन्न तकनीकों के जरिए नकारात्मक विचारों को सकारात्मक सोच में बदला जाता है।



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बच्चों का चेहरा खराब कर सकता है शुगर एडिक्शन

छोटे बच्चों में शुगर एडिक्शन यानी चॉकलेट, टॉफी आदि अधिक खाने से कैविटी (दांतों का खोखला होना) की परेशानी होती है। जो समय से पहले बेबी टीथ (दूध के दांत) गिरने का कारण है। असमय दांत गिरने के बाद नए दांत टेढे-मेढ़े निकलते हैं जिससे चेहरा बेडौल होने लगता है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार बच्चे-बड़ों को दिनभर में छह चम्मच से ज्यादा चीनी नहीं खानी चाहिए।

क्या है शुगर एडिक्शन
कोई भी बच्चा जब शुगर से भरपूर चीजें (कैंडी, चॉकलेट, मिठाई, दूध में अधिक चीनी) खाता है तो उसके दिमाग में डोपामाइन हार्मोन स्त्रावित होने लगता है जो खुशी का अहसास कराता है। इसलिए धीरे-धीरे बच्चे का मीठी चीजों के प्रति लगाव बढ़ जाता है। इसे शुगर एडिक्शन कहते हैं।

ये हैं नुकसान
पाचनतंत्र प्रभावित : समय पूर्व बेबी टीथ गिरने के बाद बच्चा हर चीज को बिना चबाए निगलता है। इससे पाचनतंत्र गड़बड़ाता है।

टेढ़े-मेढ़े दांत : बेबी टीथ स्थायी दांत को निकलने में मदद करते हैं। लेकिन शुगर की लत से दांत टेढ़े-मेढ़े व कमजोर भी होते हैं।
संक्रमण : दांतों में कैविटी बनने पर बैक्टीरिया अधिक पनपते हैं जो मुंह में संक्रमण और मसूढ़ों में दर्द का कारण भी बनते हैं।

रोजाना ब्रशिंग :टूथपेस्ट कम लगाकर सॉफ्ट ब्रसल वाले टूथब्रश से रोजाना ब्रश कराएं। सुबह-शाम दांत साफ करें।

जूस नहीं, पानी पिलाएं : कई बार मांएं बच्चे को प्यास लगने पर जूस या सॉफ्ट ड्रिंक्स देती हैं, जो सही नहीं है। इससे मोटापा बढऩे, संक्रमण का खतरा रहता है। बच्चे को मीठे फल जैसे सेब मसलकर दिया जा सकता है ताकि उनके शरीर में नेचुरल शुगर की पूर्ति हो सके।



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एग फ्रीजिंग तकनीक से बढ़ती उम्र में मां बनना हुआ आसान

आमतौर पर 40 की उम्र के बाद महिलाओं को गर्भधारण में कई समस्याएं आती हैं। लेकिन 35 की उम्र से पहले जो महिलाएं मां नहीं बनना चाहतीं वे 25-30 की उम्र के बीच अंडाणुओं को फ्रीज करा सकती हैं। क्योंकि इस उम्र में अंडाणुओं की गुणवत्ता बेहतर होती है। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के अनुसार 'एग फ्रीजिंग' तकनीक के तहत अंडाणुओं को 10 वर्ष तक सुरक्षित रख सकते हैं। देश-विदेश और छोटे शहरों की महिलाएं इसे अपना रही हैं।

40 की उम्र में भी एग फ्रीजिंग से गर्भधारण
विशेषज्ञाें के अनुसार महिलाओं में कॅरियर बनाने को लेकर देर से गर्भधारण का चलन बढ़ा है। इससे उनके अंडाणुओं की संख्या व गुणवत्ता में कमी आ जाती है। एग फ्रीजिंग से 35 की उम्र के बाद प्रेग्नेंसी संभव है। महिला की हेपेटाइटिस-बी व सी और एचआईवी की जांच कर सर्जरी करके स्वस्थ एग (अंडाणु) को ओवरी से निकालते हैं। इन्हें 196 डिग्री सेल्सियस पर लिक्विड नाइट्रोजन में फ्रीज करते हैं। भविष्य में जो समय मां बनने के लिए सही लगता है उस समय सुरक्षित रखे अंडाणुओं को भ्रूण के रूप में गर्भाशय में स्थानांतरित करते हैं।

गर्भधारण की प्रक्रिया
फ्रोजन एग को सामान्य अवस्था में लाकर प्रत्येक एग को सुई की मदद से पार्टनर के एक स्पर्म से फर्टिलाइज कर कैथेटर यानी एक पतली ट्यूब के जरिए यूट्रस में डालते हैं। इसके बाद भू्रण बनने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।

इसलिए कराएं अंडाणुओं को फ्रीज
- महिलाओं में 35 की उम्र के बाद अंडाणु बनने की क्षमता व गुणवत्ता दोनों कम होने से गर्भस्थ शिशु में विकृतियों की आशंका बढ़ जाती है इसलिए पहले ही अंडाणु को सुरक्षित रखवा सकती हैं।
- कैंसर पीडि़त महिलाएं जिनकी कीमोथैरेपी व रेडियोथैरेपी शुरू न हुई हो, उनके अंडाणु को फ्रीज कर फर्टिलिटी को सुरक्षित कर सकते हैं।
- 30 की उम्र के बाद हाइपरटेंशन, डायबिटीज जैसे कारणों से गर्भपात की आशंका को घटाने के लिए भी ऐसा करते हैं।



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Body Fitness Tips: पूरी बॉडी की फिटनेस के लिए जानें ये खास टिप्स

Body fitness Tips: कैल्शियम की शरीर में जरूरी मात्रा के मौजूद रहने के अलावा व्यायाम भी हड्डियों की मजबूती के लिए जरूरी है। अगर 20 वर्ष की उम्र से व्यायाम करना शुरू कर दें तो दूसरों के मुकाबले हड्डियां अधिक मजबूत होती हैं।

एरोबिक्स व डांस -
हफ्ते में पांच दिन 30 मिनट की एरोबिक्स करें। इसमें सीढ़ी चढ़ना, स्वीमिंग आदि कर सकते हैं। ऐसा न कर पाने पर डांस कर सकते हैं। यह मन को सुकून देने के साथ हड्डियों व मसल्स को मजबूत बनाता है।

वॉक व जॉगिंग -
रोजाना सुबह दौड़ लगाना शरीर के लिए कई तरह से फायदेमंद है। इससे वजन नियंत्रित रहने के अलावा हड्डियों और मांसपेशियों को मजबूती मिलती है। रोज क्षमतानुसार कुछ किलोमीटर दौड़ें।

वेट लिफ्टिंग : जिम में भारी वजन उठाने से जुड़े व्यायाम से भी हड्डियां मजबूत व शरीर फिट रहता है। दर्द, थकान रहे तो कराएं जांच बीएमडी यानी बोन मिनरल डेंसिटी टैस्ट से हड्डियों की मजबूती को जांचा जाता है। इसमें डेक्सा मशीन से हड्डियों का घनत्व देखकर ऑस्टियोपोरोसिस का पता लगाते हैं। इसे 45 वर्ष से अधिक उम्र वाले, मेनोपॉज के बाद महिलाओं को, कम उम्र में गर्भाशय निकलवा चुकी महिलाएं व अक्सर हड्डियों में दर्द रहने और जल्दी थकान होने की स्थिति में विशेषज्ञ कराने की सलाह देते हैं।



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Calcium Diet: जानिए हड्डियों की मजबूती के लिए कब, कितना और कैसे लें कैल्शियम

Calcium Diet: हड्डियां कैल्शियम, प्रोटीन और खनिज तत्त्वों से मिलकर बनती हैं। इसमें कैल्शियम अहम है। ऑस्टियोपोरोसिस का कारण बढ़ती उम्र के साथ हड्डियों में कैल्शियम की कमी है। पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में इसकी जरूरत अधिक होती है क्योंकि प्रेग्नेंसी व पीरियड्स के दौरान शरीर में इसकी खपत अधिक होती है।

ऐसे पहचानें कमी : जोड़ों व हड्डियों में दर्द, इनके कमजोर होने के कारण फ्रैक्चर जैसे लक्षण सामने आना कैल्शियम की कमी होना बताते हैं।

इनसे कैल्शियम की पूर्ति: दूध, दही, हरी सब्जियां, आलू, भिंडी, बादाम, चावल, मूंगफली, ब्रॉकली, सोयाबीन, चोकरयुक्त गेहूं आटा, अमरूद, संतरा।

इतनी मात्रा जरूरी : 20-50 वर्ष के व्यक्तियों में एक से ढाई हजार मिग्रा और 50 से अधिक उम्र वालों में 1200 मिलीग्राम की मात्रा शरीर में होनी चाहिए।

धूप भी लें : बिना विटामिन-डी के कैल्शियम शरीर में अवशोषित नहीं हो पाता है। इसलिए इसके लिए रोजाना सुबह 20-25मिनट धूप में जरूर बैठें।

अधिक मात्रा से पथरी : कैल्शियम कम होने पर अधिकतर लोग खासकर महिलाएं इसके सप्लिमेंट अधिक मात्रा में लेने लगती हैं। ऐसे में शरीर में इसकी मात्रा अधिक हो जाती है जो किडनी में पथरी का कारण का बनता है। ऐसी स्थिति पर्याप्त मात्रा में पानी जरूर पिएं।



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Bone Cancer: जानिए बोन कैंसर के बारे में, कारण, लक्षण और इलाज

Bone Cancer : बोन कैंसर शरीर की किसी भी हड्डी में हो सकता है लेकिन यह ज्यादातर लंबी हड्डियों (जैसे हाथ व पैर) में होता है। अधिकतर मामले एक अंग से कैंसर के हड्डियों में फैलने के भी होते हैं। शुरुआती अवस्था में इसके लक्षणों की पहचान से प्रभावी इलाज संभव है।

प्रमुख लक्षण : हड्डियों में दर्द, जोड़ के आसपास सूजन व दर्द, रोजमर्रा के काम करने में दिक्कत, कमजोर हड्डी के कारण हल्की गतिविधि से भी हड्डी का चटकना, थकान व बिना कारण वजन घटना।
वजहें : अधिकतर मामलों में कारण अज्ञात होते हैं। कुछ मामलों में आनुवांशिकता को वजह माना जाता है।

तीन प्रमुख रूप -
विभिन्न अंगों से कैंसर की शुरुआत होने से इसे कई श्रेणियों में बांटा गया है।
ओस्टियोसारकोमा : बच्चों में पैर-हाथ की हड्डी में।
कॉन्ड्रोसारकोमा : उम्रदराज व्यक्तियों (40-50 वर्ष) में विशेषकर कूल्हे, पैर और हाथ की हड्डियों में।
ईविंग्स सारकोमा : बच्चों व युवाओं में विशेषकर कूल्हे और रीढ़ की हड्डी में।

इन्हें खतरा अधिक : आनुवांशिक रूप से परिवार में किसी को आंख का कैंसर रेटिनोब्लास्टोमा रहा हो। अन्य किसी कैंसर में दिए जाने वाले रेडिएशन के दुष्प्रभाव से भी इस रोग की आशंका रहती है।

पहली स्टेज : कैंसर ट्यूमर का असर कम होता है। शरीर में संक्रमण से बचाव करने वाली सफेद रक्त कणिकाओं से जुड़ी लिम्फ नोड्स व अन्य अंग प्रभावित नहीं होते।
दूसरी स्टेज : कैंसर ट्यूमर जहां होते हैं, असर वहीं होता है। दूसरे अंग बचे रहते हैं।
तीसरी स्टेज : कहीं और फैले बिना ये ट्यूमर अनगिनत रूप से हड्डी में एक जगह फैलते हैं।
चौथी स्टेज : ट्यूमर की संख्या व आकार बढ़ने के बाद यह अन्य अंगों को भी चपेट में ले लेता है।

इलाज : इसके इलाज में सर्जरी कर ट्यूमर निकालते हैं। ओस्टियो व ईविंग्स सारकोमा जैसे कैंसर में सर्जरी से पहले और बाद में कीमोथैरेपी को कोर्स चलता है। लिंब सेल्वेज सर्जरी के जरिए कैंसरग्रस्त ट्यूमर वाली हड्डी को हटाकर आर्टिफिशियल या धातु की हड्डी लगाते हैं। बच्चों में ऐसे प्रोस्थेटिक्स लगाते हैं जो उम्र के साथ बढ़ते हैं।



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Saturday, 29 June 2019

B Alert - मधुमेह से बढ़ती है हार्ट अटैक की आशंका

मधुमेह से हार्ट अटैक की आशंका बढ़ाती क्याेंकि सामान्य से ज्यादा शुगर का स्तर रक्तधमनियों को धीरे-धीरे बाधित करने लगता है। खासकर जो धमनियां पतली होती हैं वे डायबिटीज होने के शुरुआती कुछ सालों में मोटी हो जाती हैं जिससे हार्ट अटैक का खतरा रहता है। यह एक तरह से प्री-डायबिटिक लक्षण होते हैं। यदि डायबिटीज के दौरान ब्लड शुगर लेवल नियंत्रित नहीं हो पाता तो कई बार इससे आंख, किडनी आदि के अलावा अन्य अंगों की बेहद पतली नसों पर असर होने लगता है जिससे अप्रत्यक्ष रूप से अंगों की कोशिकाएं भी क्षतिग्रस्त होने लगती हैं।

टाइप-1 :
इसे जुवेनाइल डायबिटीज भी कहते हैं जिसमें बचपन से ही बच्चे के शरीर में इंसुलिन की बीटा कोशिकाएं बेकार हो जाती हैं जिससे इंसुलिन नहीं बन पाता। ऐसे में मरीज को इंसुलिन की पूर्ति पूर्ण रूप से नहीं हो पाती। मरीज को इंजेक्शन या दवा से इंसुलिन की खुराक दी जाती है।

टाइप-2 :
यह उम्र के बढऩे के साथ खराब जीवनशैली के कारण होती है। इसमें पेन्क्रियाज इंसुलिन तो बनाता है लेकिन शुगर को ऊर्जा में बदलकर शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुंचाने में असमर्थ हो जाता है। इसके लिए मरीज को दवाएं देकर पेन्क्रियाज की इंसुलिन बनाने की क्षमता को बढ़ाया जाता है।

प्रमुख लक्षण :
दोनों प्रकार की डायबिटीज यानी टाइप-1 और टाइप-2 में मरीज के लक्षण लगभग समान होते हैं। फर्क सिर्फ उनकी गंभीरता का होता है। शुगर ज्यादा होने पर भूख और प्यास ज्यादा लगना, बार-बार यूरिन आना, धुंधला दिखाई देना, पैरों में जलन या किसी भी तरह के घाव को भरने में समय लगने जैसी दिक्कतें सामने आती हैं।

35 पार जांच कराना
आमतौर पर एक स्वस्थ व्यक्ति को 35 साल की उम्र के बाद सेहत संबंधी जांचें जैसे ब्लड टैस्ट, ब्लड शुगर टैस्ट आदि करवानी चाहिए ताकि अगर कोई आशंका हो भी तो उसके बचाव के तरीके और समय पर इलाज को अपनाया जा सके। इसके अलावा ऐसे व्यक्ति जिनमें डायबिटीज का खतरा रहता है उन्हें 20 साल की उम्र से ही कोलेस्ट्रॉल, किडनी और हृदय से जुड़ी प्रमुख जांचें कराने की सलाह दी जाती है। साथ ही गर्भावस्था में भी रोग की आशंका होने पर संबंधित जांचें करवा लेनी चाहिए।

इलाज : दवाओं से स्थिति करते नियंत्रित
मरीजों को ऐसी दवाएं देते हैं जो पेन्क्रियाज की कार्यप्रणाली को सुधारने के साथ सामान्य मात्रा में इंसुलिन बनाने में मदद करती हैं। कुछ मामलों इंसुलिन रेसिस्टेंस की स्थिति में इंसुलिन सेंसिटाइजर देते हैं जिनका काम ब्लड शुगर के स्तर को सामान्य कर अंगों द्वारा इंसुलिन प्रयोग में लेने की क्षमता को बढ़ाना होता है।

न्यू ट्रीटमेंट
इन दिनों डायबिटीज के टाइप-2 मरीजों को सोडियम ग्लूकोज को-ट्रांसपोर्टर-2 (एसजीएलटी-2) इंहेबिटर्स भी देते हैं। इसे सही डाइट और नियमित व्यायाम के साथ लेने की सलाह दी जाती है ताकि किडनी के जरिए अतिरिक्त शुगर यूरिन के रूप में बाहर निकल सके। यही इस दवा का मुख्य काम भी है। कुछ मरीजों में अन्य रोगों के अनुसार इसके दुष्प्रभाव भी देखे जा सकते हैं इसलिए डॉक्टरी सलाह के बाद ही इसे लेने के लिए कहते हैं।



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Friday, 28 June 2019

Bengali Literary Festival Launches Theme Music for its Fifth Edition

Curated by the Oxford Bookstores in association with Patra Bharati publications, the three-day Apeejay Bangla Sahitya Utsob (ABSU) would be organised at Jorasankho Thakurbari.

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डायबिटीज, थायरॉइड, हाइपर टेंशन से बचने के लिए करें ये बदलाव

खानपान में अत्यधिक ट्रांस फैट, सैचुरेटेड फैट वाली चीजें लेने व तनाव से हाई कोलेस्ट्रॉल, हाइपरटेंशन, डायबिटीज, थायरॉइड की आशंका बढ़ती है। अल्कोहल व वायरल इंफेक्शन से भी डायबिटीज होती है। आयोडाइज्ड साल्ट की कमी से थायरॉइड की दिक्कत होती है। सामान्यत: 150 माइक्रोग्राम लेनी चाहिए।
सुबह सूर्योदय से पहले जागें
सुबह छह से पहले उठने की आदत डालें। रात में दस बजे तक बिस्तर पर जाएं। दवाओं के साथ परहेज भी करें। नियमित व्यायाम करें। शारीरिक गतिविधि से मेटाबॉलिज्म बढ़ता है। इन बीमारियों में फायदा मिलता है।

इनफर्टिलिटी : वर्किंग कपल में दिक्कत बढ़ी
हाल ही एक रिसर्च में पाया गया कि जो लोग पूरी नींद नहीं लेते हैं, उनमें स्पर्म काउंट कम होता है। वर्किंग कपल में तनाव व प्रदूषण से भी फर्टिलिटी कम होती है। पुरुषों में टाइट अंडरगारमेंट, स्मोकिंग, अल्कोहल कारण है। खुश रखें। सप्ताह में एक दिन आउटिंग पर जाएं। चाइनीज व जंक फूड में पाया जाने वाला मोनो सोडियम ग्लूटामेट स्पर्म काउंट घटाता है।
जागरूक रहें
महिलाओं में हाइपो थायरॉइड,पीसीओडी व पुरुषों में मम्स इन्फेक्शन से स्पर्म बनने में दिक्कत होती है। शीघ्रपतन भी प्रमुख कारण है। ज्यादा चिकनाई वाली चीजें न लें।

एक्सपर्ट : डॉ. एम. वली, सीनियर फि जिशियन, सर गंगाराम अस्पताल, नई दिल्ली
एक्सपर्ट : डॉ. लीला व्यास, प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ, जयपुर



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जानिए हड्डियों से जुड़ी ये 12 दिलचस्प बातें

हमारी हड्डियों की संख्या क्यों घट जाती है ?

जन्म के समय शरीर में 300 हड्डियां होती हैं लेकिन मृत्यु के समय तक शरीर में सिर्फ 206 बचती हैं। इसकी वजह कई हड्डियां जैसे खोपड़ी आदि का जुड़कर एक इकाई बन जाना है। 18 वर्ष की आयु के बाद हड्डियों का विकास बंद होना यानी इनमें फ्यूजन होना है।

इन्हें हैल्दी कैसे रखें ?
हड्डियों का घनत्व 30 की उम्र तक बढ़ता है। इसके बाद व्यायाम न करने, कैल्शियम की कमी से डेंसिटी कम होती जाती है।

कैसे जुड़ती हैं टूटी हड्डियां ?
हड्डियों की क्षतिग्रस्त हुई सतह के तंतु आपस में जुड़कर खुद को सिल लेते हैं और एक नई हड्डी का रूप ले लेते हैं।

काम का है कंकाल-
ये हमें सहारा देकर सक्षम बनाता है। दिमाग, दिल और फेफड़ों को सुरक्षा देता है। रक्त कोशिकाओं का निर्माण करता है और उन सभी जरूरी पोषक तत्त्वों को सुरक्षित व नियमित करता है जो शरीर के लिए जरूरी होते हैं।

सबसे ज्यादा हड्डियां-
हमारे हाथ, अंगुलियों और कलाई में सबसे ज्यादा 54 हड्डियां होती हैं जो हमें लिखने, कुछ पकड़ने और हर तरह का काम करने में मदद करती हैं।

सबसे बड़ी और छोटी हड्डी-
जांघ की 19 इंच लंबी फीमर हड्डी शरीर में सबसे बड़ी होती है। वहीं कान में घुंडी नुमा स्टेपीज नाम की 0.11 इंच की हड्डी सबसे छोटी होती है। हड्डियों की मजबूती के लिए कैल्शियम युक्त चीजें लें। विटामिन-डी के लिए सुबह 30 मिनट धूप में जरूर बैठें।

जीवित टिश्यू हैं -
हड्डियों में कोलेजन टिश्यूज प्रोटीन होता है जो खुद को हमेशा जीवंत और प्रगतिशील बनाए रखता है। ये शरीर में इतनी तेजी से खुद-ब-खुद बनता व बढ़ता रहता है कि आने वाले सात साल में हमें एक नया कंकाल मिल सकता है।

हमारे दांत भी हड्डियां हैं?
नहीं, उन्हें हड्डियां नहीं कहा जा सकता क्योंकि उनमें हड्डियों की तरह कैल्शियम और मिनरल्स तो होता है लेकिन कोलेजन टिश्यू नहीं। इसलिए ये लचीले नहीं होते।

महिलाओं-पुरुषों की हड्डियों में अंतर-
लगभग समान हैं लेकिन बनावट व आकार का फर्क सिर्फ पेट के नीचे वाले भाग की पेल्विस हड्डियों में है।

हड्डियां कभी नहीं घूमती-
आमतौर पर लोगों में भ्रम है कि हड्डियां घूम जाती हैं लेकिन ऐसा नहीं है। हड्डियां नहीं बल्कि उनके जोड़ों में घुमाव होता है। जैसे घुटने के जोड़।

कुछ जोड़ चटकते क्यों हैं?
मांसपेशी व तंतु (लिगामेंट) विभिन्न जोड़ को सपोर्ट देते हैं। जिसमें लचीली हड्डियां भी मदद करती हैं। इनके घिसने पर जोड़ चटक जाते हैं।

'फनी बोन' देती है झन्नाटा-
यह एक हड्डी नहीं बल्कि कोहनी में मौजूद की एक अल्नर नस है जो बाहर की ओर स्थित है। किसी चीज से टकराने पर इसमें झन्नाहट या दर्द होता है।



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सोते समय सांस में रुकावट हो सकता है हाई बीपी का सकेंत

मौजूदा समय में लोगों को नींद संबंधी बीमारियां हो रही हैं। कई शोधों में ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एप्निया (ओएसए) व हाईबीपी यानी हाइपरटेंशन के मरीजों में गहरा संबंध पाया गया है। स्लीप एप्निया एक स्लीप डिसऑर्डर है, जिसमें सोते समय सांस लेने में दिक्कत होने से खर्राटे आते हैं व नींद बाधित होती है। सांस ठीक से नहीं ले पाने से कई बार शरीर में ऑक्सीजन का स्तर कम हो जाता है जिससे हाई बीपी की समस्या हो सकती है। यह हार्ट हार्टअटैक व स्ट्रोक की वजह भी बन सकती है। हाई कैलोरी फूड, बढ़ता मोटापा रोककर व लाइफस्टाइल सुधारकर बचा जा सकता है।

दवा का असर कम
अमरीकन कॉलेज द्वारा किए गए शोध के अनुसार हाईबीपी और स्लीप एप्निया का संबंध पेट से है। खानपान की खराब आदतें और नींद पूरी न होने से भारतीय लोगों में नींद संबंधी अनियमितता और मेटाबॉलिज्म संबंधी बीमारियों की आशंका बढ़ जाती है। स्लीप एप्निया का समय रहते इलाज न होने से उच्च रक्तचापabstract sleep apnea में ली जाने वाली दवाओं का प्रभाव भी कम होता है। इसके अलावा समय पर खाना और नींद लेने की आदत को रुटीन में जरूर लाएं।

- 13 प्रतिशत भारतीय आबादी ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एप्निया से प्रभावित है।
- 43 प्रतिशत से अधिक इस
- डिस्ऑर्डर के रोगी सोते समय सीपीएपी मास्क नहीं लगाते हैं।

ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एप्निया यानी ओएसए का इलाज कराना आवश्यक है, विशेषकर जिनकी आयु 50 वर्ष से अधिक है, इनमें हाई बीपी होने का अधिक खतरा रहता है।

मोटापा भी जिम्मेदार
अधिकतर रोगी खर्राटों को नजरअंदाज करते हैं जो खतरनाक हो सकता है। अमरीकन एकेडमी ऑफ स्लीप मेडिसिन के अनुसार उच्च रक्तचाप के मरीजों को स्लीप एप्निया की जांच जरूर करवानी चाहिए। इसका इलाज करके भी हाईबीपी की समस्या को कम कर सकते हैं। सोते समय कंटिनुअस पॉजिटिव एयरवे प्रेशर (सीपीएपी) नामक एक मास्क लगाकर भी सांस लेने की प्रक्रिया को सामान्य किया जा सकता है। इसके प्रयोग से रक्तचाप को नियंत्रित करने के भी संकेत मिले हैं। यह हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों में प्रभावी है।



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आंखों की जलन दूर करता है गुलकंद, जानें इसके फायदे

स्वाद के मीठा गुलकंद गुलाब के फूल और शक्कर को मिलाकर बनाया जाता है। गुलकंद दिमाग और अमाशय को मजबूत करता है। भोजन करने के बाद एक चम्मच गुलकंद खाना दिमाग के लिए फायदेमंद है। जानिए गुलकंद से होने वाले फायदों के बारे में।

रोजाना सुबह और शाम को गुलकंद की 3 चम्मच मात्रा को 1 गिलास पानी में मिलाकर पीने से प्यास कम लगती है। गर्मियों के सीजन में गुलकंद शरीर को ठेडक देता है।

6-10 ग्राम गुलकंद को दूध या पानी के साथ सुबह-शाम लेने से हाथ-पैर, तलवों और आंखों की जलन या आंखों से पानी निकलना बंद हो जाता है। यह खून साफ करता है जिससे त्वचा निखरती है।

आंवला के बारे में...
भावप्रकाश ग्रंथ से...
आयुर्वेद के इस ग्रंथ के श्लोक 'रक्तपित्तप्रमेहघ्नं परं वृष्यं रसायनम्। हन्ति वातं तदम्लत्वात्पित्तं माधुर्यशैत्यत:। कफं रूक्षकषायत्वात्फलं धात्र्यास्त्रिदोषजित्। के अनुसार वात-पित्त-कफ दोषों में गड़बड़ी से रोगों की शुरुआत होती है। ऐसे में इन दोषों को संतुलित करने के लिए आंवला फल मददगार है।



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बढ़ती उम्र में आपको फिट रखेंगे ये टिप्स

उम्र का बढ़ना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। बढ़ती उम्र के साथ शरीर के अंगों का कमजोर होना, सफेद बाल व झुर्रियां आदि अधिक उम्र के बदलावों को दिखाते हैं। ऐसे में खानपान का ध्यान रखें, शारीरिक गतिविधियां बढ़ाएं और खुश रहें।आइए जानते हैं बढ़ती उम्र में फिट रहने के नुस्खाें के बारे में :-

समय पर लें डाइट:
कई बार अधिक बीमार रहने या ज्यादा दवाएं खाने से मुंह का स्वाद बदल जाता है व भूख कम हो जाती है। ऐसे में खाने के प्रति रुचि बनाएं रखें व समय से खाएं।

चिकनाईयुक्त चीजें सीमित मात्रा में लें :
कुछ लोगों को अधिक चिकनाईयुक्त, दूध या अन्य चीजें खाने से पेटदर्द, गैस या डायरिया आदि परेशानियां हो सकती है। ऐसे में इन चीजों को सीमित मात्रा में ही लें। खाने के साथ दही, छाछ आदि लें।

थोड़ी-थोड़ी देर में पानी पीते रहें :
इस उम्र में शरीर में ऊर्जा बरकरार रखने के लिए थोड़ी-थोड़ी देर में पानी पीते रहें। इसके अलावा जूस और सूप जैसे तरल पदार्थों को भी खानपान का अहम हिस्सा बनाएं।

अतिरिक्त नमक न लें :
बढ़ती उम्र में शरीर को सोडियम की अधिक जरूरत नहीं होती है। इसलिए खाने-पीने की चीजों में ऊपर से अतिरिक्त नमक डालने से बचें। इसकी अधिकता ब्लड प्रेशर बढ़ाती है। रोजाना एक चम्मच का दो-तिहाई हिस्सा नमक पर्याप्त है।

व्यायाम कर रहें फिट :
रोजाना योग, ध्यान, वॉक या व्यायाम जरूर करें। इससे मन खुश रहता है और आप फिट रहने के साथ रोगों से दूर रहते हैं।

इन बातों का रखें ध्यान
- लो-फैट वाली चीजें खाएं। मलाई हटाकर दूध पिएं।
- खाद्य पदार्थों को फ्राई करने की बजाय उसे बॉयल, रोस्ट, बेक या स्टीम करें।
- ओमेगा-थ्री फैटी एसिड्स, फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट्स वाले पदार्थों की मात्रा बढ़ाएं।
- खुद को किसी रचनात्मक काम में व्यस्त रखें। किताबों व संगीत को अपना मित्र बनाएं।



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Premature Birth Affects Brain Health of Infants, Claims Study

According to the study babies born at full term had marked reorganization of brain activity during different states of sleep, while it wasn't as distinct in very premature babies.

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Happy Birthday Vivian Dsena: Here's Why He Deserves the Title of Sexiest Man in Asia

The Shakti star is all set to celebrate his birthday with his family in Ujjain, we bring to you five pictures of this handsome hulk that will make your heart melt:

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Women Smoker Face Greater Risk of Major Heart Attack: Research

Female smokers have greater than 13 times higher risk of cardiovascular diseases as compared to their non-smoking female.

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Climate Warming May Increase Malaria Risk in Colder Regions: Study

Parasite development rate increases when temperatures fluctuate naturally, from cooler at night to warmer in the day.The quicker the parasites develop, the greater the chance they will survive and be transmitted to humans through mosquito.

Thursday, 27 June 2019

Artefacts From First Moon Missions to Go on Auction

NASA missions artefacts from the Apollo programme and the Apollo 11 Moon have gone on sale in global auction, bidders can take home a piece of space exploration history, whether it is an object that has been to the Moon and back or the charts used to navigate there.

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Social Media May Improve Mental Health in Adults: Study

The researchers found that someone who uses a social networking site is 1.63 more likely to avoid serious psychological distress and are 63 per cent less likely to experience major depression or serious anxiety.

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Fear of New Foods May Up Risk of Heart Disease, Diabetes: Study

The study found that food neophobia is linked to poorer dietary quality,. Food neophobia also increases the risk of developing cardiovascular diseases or type 2 diabetes.It also impacts of eating behaviour and diet.

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85 Per Cent Indian Moms Want School Fees Reduced: Survey

On a regional basis, the priorities of mothers in the north and west were more day-cares in offices, while those in the south demanded a reduction in school fees and those in the east wanted hospitals for their children and clean and hygienic toilets.


इन नियमों का पालन कर लें, बीमारी आपके पास नहीं आयेगी

हमेशा खाना खाएं तो चबा चबाकर खाये. ओतना चबाएं जितने आपके दांत है दांत अगर 32 हैं तो 32 बार चबाएं.
खाना जब भी खाएं तो जमीन पर बैठ कर खाएं. जमीन पर बैठने से पृथ्वी का गुरुत्व बल हमारी पृथ्वी पर केन्द्रित है पेट की नाभि पर गुरुत्वाकर्षण होने से नाभि चार्ज है नाभि के पास जठर है वो चार्ज है जठर के चार्ज होने से अग्नि चार्ज है अग्नि तीर्व होने से खाना जल्दी पचेगा इसलिए बैठ कर खाएं.
दोपहर को जब आप भोजन करें तो आराम जरुर करें. कम से कम 48 मिनट क्योंकि दोपहर का भोजन खाते ही हमारे शरीर का ब्लड प्रेशर बढ़ता है. एक तो सूरज की धुप होती है दोपहर को और दूसरा अंदर की गर्मी दोनों मिलकर ब्लड प्रेशर बढ़ता है, बी.पी. बढेगा तो आराम ही करना पड़ेगा. सबसे अच्छी मुद्रा होती है लेफ्ट साइड में लेटना.
ज्यादा नही लेटना फिर मोटापा आता है, 48 मिनट तक लेटना अच्छा है उसमें नींद आ जाये तो ले लेना ज्यादा लेटेंगे तो फिर मोटापा आता है इसलिए इसका ध्यान रखना.
इसके आगे का आठवां नियम है कि रात का खाना खाने के दो घंटे तक आराम न करें. 2 घंटे बाद ही करना. रात के खाने के बाद पैदल चलना जरुरी है 1000 कदम, उसके बाद कुछ और काम करके फिर आराम करना. क्युंकी रात को ब्लड प्रेशर कम होता है. और कम ब्लड प्रेशर में आराम करना खतरनाक है, ऊँचे ब्लड प्रेशर या हाई बी.पी में काम करना खतरनाक है.

इसके बाद का नियम है आप जब भी खाना खाएं दो बातों का ध्यान रखें. दो चीजें ऐसी न खाएं जो एक दुसरे के विरुद्ध है. ठंडा गर्म एक साथ न खाएं, दूध और दही एक साथ न खाएं. उड़द की डाल और दही एक साथ न खाएं. खट्टे फल और दूध एक साथ न लें. कटहल की सब्जी के साथ दूध न लें. कच्ची प्याज खा रहे है तो दूध न लें. दही में नमक डाल कर न खाएं. हमेशा दही में मीठी चीजें डाल कर खाएं.
आपको अजीब सा लगेगा कि ये क्या बोल रहे है क्योंकि रायता तो बिना नमक के बनता नही. बात ये है कि जो दही है वो जीवाणुओं का घर है. अगर आप लेंस लगाकर देखेंगे तो दही में लाखों जीवाणु हैं और शरीर को ये जीवाणु जीवित चाहिए. आप दही में एक चुटकी नमक डालेंगे तो सब जीवाणु मर जायेंगे. अब जीवाणु मर गये तो दही खाया जो वो बेकार, इसलिए जीवित जीवाणु दही के साथ जरुरी हैं. तो कहा गया है कि दही के साथ नमक न खाएं. या दही में बुरा डालो, खांड डालें, या गुड़ डालें तो बुरा , खांड या गुड़ से जीवाणुओं की संख्या बहुत बढ़ जाती है. और बड़ी हुयी संख्या के जीवाणु आपको चाहिए.

माताओं के लिए एक नियम है घर में खाना बनाते समय ऐसे बर्तन कभी भी इस्तेमाल न करें जो चारों तरफ से बंद हो. हमेशा खाना बनाने वाला बर्तन खुला हो. आधा खुला आधा बंद हो तो भी नही चलेगा. पूरा बंद न हो क्यूंकि बाहर की हवा खाना बनाते समय अंदर प्रवेश करनी जरुरी है. वागभट्ट जी ने कहा है कि भोजन बनाते समय सूर्य का प्रकाश या पवन का स्पर्श दोनों में से एक जरुरी है. अब ये तभी संभव है जब बर्तन खुला हो. वागभट्ट जी के अनुसार प्रेशर कुकर में खाना न बनाएं. अब प्रेशर कुकर वागभट्ट जी के ज़माने में नही था. लेकिन उनको शायद ये अंदाजा जरुर था कि मानव कभी न कभी ये जरुर बना लेगा. ये बहुत ही गंभीर बात है.
आप जानते हैं कि प्रेशर कुकर एल्युमीनियम का है. और एल्युमीनियम दुनिया का सबसे ख़राब मेटल है, खाना बनाने के लिए और खाना पकाने के लिए भी. एक सर्वे के अनुसार पाया गया कि गरीबों को अस्थमा, टी.बी. क्यूँ होता है उस सर्वे का रिजल्ट आया कि सारे गरीब लोग एल्युमीनियम के बर्तन में खाना खाते और पकाते है यही उनके दाम और अस्थमा का कारण है.