Sunday, 29 November 2020

सिर्फ फेफड़ों के एक्स-रे से कोरोना वायरस का पता लग जाएगा

न्यूयॉर्क । शोधकर्ताओं ने एक नए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) प्लेटफॉर्म का इजात किया है, जो फेफड़े के एक्स-रे की तस्वीरों से कोविड-19 का पता लगाने में सक्षम है। डीपकोविड-एक्सरे का निर्माण थोरैसिक रेडियोलॉजिस्ट की एक टीम ने किया है, जो एक्स-रे के माध्यम से कोविड-19 का पता दस गुना तेज और सटीक लगाने में सक्षम है।

जर्नल रेडियोलॉजी में प्रकाशित शोध के मुताबिक, शोधकतार्ओं की टीम का मानना है कि चिकित्सक उन मरीजों का जल्द से जल्द परीक्षण करने के लिए इस एआई सिस्टम का उपयोग कर सकते हैं, जो कोविड-19 के अलावा किन्हीं अन्य वजहों से अस्पतालों में भर्ती हैं। अत्यधिक संक्रामक वायरस का पता पहले लगने से स्वास्थ्यकर्मियों और अन्य मरीजों की संभावित सुरक्षा हो सकती है, क्योंकि इस सिस्टम की मदद से कोविड रोगियों का तुरंत पता लगाकर ही उन्हें आइसोलेट किया जा सकता है।

अमेरिका के नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी से शोध के लेखक एग्गेलोस कात्सगेलोस ने कहा, "हम वास्तविक परीक्षण को बदलने का लक्ष्य नहीं बना रहे हैं। एक्स-रे नियमित तौर पर किए जाते हैं, ये सुरक्षित और किफायती भी हैं। हमारे सिस्टम की मदद से मरीज को स्क्रीन करने और उनमें कोविड का पता लगाने में चंद सेकेंड्स लगेंगे। इससे हम जान सकेंगे कि उस मरीज को आइसोलेट करने की आवश्यकता है भी या नहीं।"

इस नई परीक्षण पद्धति का विकास करने के लिए रिसर्चरों ने नॉर्थवेस्टर्न मेमोरियल हेल्थकेयर सिस्टम के साइटों से 17,002 चेस्ट एक्स-रे की तस्वीरों का उपयोग किया। इनमें से 5,445 मरीज कोविड पॉजिटिव आए। इसके बाद टीम ने लेक फॉरेस्ट हॉस्पिटल से पांच अनुभवी कार्डियोथोरेसिक फेलोशिप-प्रशिक्षित रेडियोलॉजिस्ट के अंडर में 300 रेंडम तस्वीरों का परीक्षण किया। हर रेडियोलॉजिस्ट को इन तस्वीरों की जांच में ढाई से साढ़े तीन घंटे लगे, जबकि एआई सिस्टम को करीब-करीब 18 मिनट लगे। जहां रेडियोलॉजिस्ट की एक्यूरिसी की सीमा 76-81 फीसदी रही। डीपकोविड-एक्सआर में यही सीमा 82 फीसदी रही।

- IANS



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इनफ्लुएंजा के संक्रमण से बैक्टीरियल निमोनिया का खतरा बढ़ सकता है

लंदन । एक शोध में इस बात की जानकारी मिली है कि इनफ्लुएंजा के संक्रमण से बैक्टीरियल निमोनिया के खतरे की आशंका रहती है, जिससे हर साल दुनियाभर में कई लोगों की जान चली जाती है।

पीएनएएस जर्नल में प्रकाशित इस शोध का परीक्षण एक पशु मॉडल पर किया गया, जिसके नतीजे में मिला कि विटामिन सी जैसे एंटीऑक्सिडेंट्स और अन्य पोषक तत्वों सहित कोशिकाओं की आमतौर पर सुरक्षा करने वाले पदार्थों का रक्त से रिसाव होता है, जिनसे फेफड़ों में एक ऐसे वातावरण का निर्माण होता है, जहां बैक्टीरिया के पनपने के आसार रहते हैं। ये बैक्टीरिया बैक्टीरियल एंजाइम एचटीआरए के उत्पादन को बढ़कार अपने रहने योग्य एक वातावरण का निर्माण कर लेते हैं। शरीर में एचटीआरए की उपस्थिति से प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर पड़ने लगती है और यह इनफ्लुएंजा संक्रमित वायुमार्गों में बैक्टीरिया के विकास को भी बढ़ावा देता है। इस एंजाइम की कमी से बैटीरियल ग्रोथ रूक जाती है।

स्वीडन में स्थित कारोलिंस्का इंस्टीट्यूट से शोध के लेखक बिरगिट्टा हेनरिक्स नोर्मार्क ने कहा कि इनफ्लुएंजा के संक्रमण के दौरान निचले वायुमार्गों में न्यूमोकॉकस के पनपने की क्षमता अधिक एंटीऑक्सीडेंट्स के साथ पोषक तत्वों की अधिकता वाले वातावरण पर निर्भर करती है, जैसा कि वायरल संक्रमण के दौरान होता है। साथ ही इस वातावरण में बैक्टीरिया के ढलने और इम्युन सिस्टम से खुद को मिटाए जाने से सुरक्षा करने की उसकी क्षमता भी बढ़ जाती है।"

शोध के परिणामों से पता चला है कि किस तरह से बैक्टीरिया फेफड़े में अपने अनुकूलित वातावरण के साथ एकीकृत होते जाते हैं और साथ ही इस शोध के नतीजे का इस्तेमाल इनफ्लुएंजा वायरस और न्यूमोकॉकल बैक्टीरिया के बीच दोहरे संक्रमण के लिए नए थेरेपी को ढूढ़ने में भी किया जा सकता है।
शोध के एक अन्य लेखक विकी सेंडर ने कहा, "एचटीआरए एंजाइम एक प्रोटीज है, जो इम्युन सिस्टम को कमजोर बनाता है और न्यूमोकॉकल बैक्टीरिया को वायुमार्गों के अंदर कोशिकाओं की सुरक्षात्मक परतों में पहुंचने में मदद देता है। इससे इस बात की संभावना बन सकती है कि फेफड़े में न्यूमोकॉकल के प्रसार को रोकने के लिए प्रोटीज अवरोधकों का इस्तेमाल किया जा सकता है।"

हालांकि यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि क्या कोविड-19 के मरीज इस तरह के किसी और बैक्टीरियल संक्रमण के प्रति संवेदनशील है भी या नहीं, लेकिन शोधकर्ताओं का मानना है? कि इस तरह की प्रक्रिया कोविड-19 से गंभीर रूप से बीमार मरीजों में संभावित रूप से पाई जा सकती है। हेनरिक्स नोमार्क ने कहा, "कारण चाहे कोई भी हो, लेकिन फेफड़े में सूजन के चलते पोषक तत्वों और एंटीऑक्सिडेंट के रिसाव में वृद्धि होती है, जिससे बैक्टीरिया के रहने लायक वातावरण का विकास होता है।"



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वुहान में फ्रोजन फूड के पैकेट पर मिला कोरोना वायरस

वुहान । चीनी शहर वुहान में प्रशासन के अधिकारियों ने कहा है कि इम्पोर्ट किए गए फ्रोजन फूड के तीन पैकेटों में कोविड-19 के वायरस पाए गए। ज्ञात हो कि वुहान ही वह शहर है, जहां से नोवेल कोरोनावायरस के फैलने की बात कही गई है।

वुहान के म्युनिसिपल हेल्थ कमीशन के शनिवार को दिए बयान के हवाले से सिन्हुआ समाचार एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि यहां के रेफ्रिजेरेटेड वेयरहाउस में ब्राजील से आयातित फ्रोजन बीफ के दो नमूने और एक अन्य वेयरहाउस में वियतनाम से आयातित रखे फ्रोजन बासा फिश से एक नमूने लिए गए।

स्थानीय अधिकारियों ने इन सभी उत्पादों को सील कर क्वॉरंटाइन कर दिया और इन खाद्य पदार्थों के संपर्क में आने वाले कर्मियों पर न्यूक्लिक एसिड टेस्ट किया। फिलहाल अब तक सभी नतीजे नेगेटिव आए हैं।

जिन फ्रोजन फूड्स के नमूनों में वायरस पाए गए हैं, उन्हें बाजार में आने से फिलहाल के लिए रोक दिया गया है। चीन द्वारा आयातित भोजनों के माध्यम से कोविड-19 के संचरण को रोकने के प्रयासों तेजी लाया गया है।



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CORONA VACCINE : सबसे बड़ा सवाल, कोरोना के टीके की प्रतिरक्षा कितने दिन रहेगी?

कोरोना महामारी से निजात दिलाने के लिए पूरी दुनिया में टीकों की खोज युद्धस्तर पर जारी है। कई वैक्सीन अंतिम चरण में हैं और कुछ के ट्रायल जारी हैं। लेकिन इस जल्दबाजी में संभावित मुश्किलों से निपटना सबसे बड़ी चुनौती है। फिर परीक्षण सफल रहने के बाद दवा कंपनियों और स्वास्थ्य अधिकारियों के सामने करोड़ों लोगों तक इनकी आपूर्ति आसान नहीं है। परीक्षण से लेकर टीकाकरण तक दवा कंपनी और सरकारों को कुछ सवालों के हल ढूंढने होंगे।

टीके कितने प्रभावी
टीकों को लेकर नवंबर में लगातार उत्साहजनक परिणाम आए। हजारों वॉलंटियर्स पर किए गए परीक्षणों के बाद फाइजर इंक, बायोटेक और मॉडर्ना के प्रारंभिक नतीजे 95 फीसदी प्रभावी पाए गए। जबकि एस्ट्राजेनेका शुरुआती विश्लेषण में 70 फीसदी प्रभावी मिली है। नियामकों ने टीके के अनुमोदन के बाद, उत्पादन और वितरण के लिए फास्ट टै्रक विकल्प तैयार कर लिए हैं। उधर चीन और रूस ने अपने स्तर पर परीक्षण के बाद टीके लगाना भी शुरू कर दिए।

उत्पादन का लक्ष्य
वैश्विक मांग के अनुरूप बड़ी संख्या में वैक्सीन को सुरक्षित और प्रभावी बनाए रखना भी चुनौतीपूर्ण है। इन जरूरतों को ध्यान में रखते हुए इसी वर्ष कांच की शीशियों, सुई और अन्य उपकरणों की फैक्ट्रियां स्थापित की गईं। कुछ टीकों का उत्पादन भी शुरू हो गया, जिनका अभी परीक्षण किया जा रहा है। फाइजर का कहना है कि वर्ष के अंत तक पांच करोड़ डोज तैयार होने की उम्मीद है। जबकि अगले वर्ष 1.3 अरब खुराक के उत्पादन का लक्ष्य है।

हासिल करने की होड़
वैक्सीन बनाने से बड़ी प्रतिस्पर्धा हासिल करने की है। वैक्सीन सबसे पहले किसे मिलेगी, यह उन समझौतों पर निर्भर करेगा जो सरकारों ने दवा कंपनियों के साथ किए हैं। अमरीका, यूरोपीय संघ और ब्रिटेन ने अलग-अलग वैक्सीन कंपनियों से लाखों-करोड़ों खुराक के लिए अग्रिम समझौता कर लिया है।

टीकाकरण के बाद रखनी होगी निगरानी
टीके की प्रतिरक्षा को लेकर भी आशंकाएं हैं कि एक बार का टीका कितना कारगर होगा। मसलन खसरे का टीका एक बार लगने के बाद आजीवन प्रतिरक्षा बनी रहती है। शुरुआती अध्ययनों में पता चला है कि गंभीर रूप से ठीक हुए कोरोना के मरीजों में कई महीनों तक एंटीबॉडी का स्तर बना रहता है। जबकि जिनमें हल्के लक्षण थे, उनमें एंटीबॉडी समय के साथ कम हो जाती है। टीका लेने वालों पर महीनों निगरानी रखनी होगी, जो यह सुनिश्चित करेगा कि मास्क जैसे उपाय कितने दिन जरूरी हैं।

परिवहन और भंडारण
एक अनुमान के मुताबिक दुनिया की पूरी आबादी तक टीके पहुंचाने के लिए लगभग 8 हजार कार्गो विमानों की आवश्यकता होगी। इससे भी बड़ी मुश्किल कुछ टीकों को शून्य से माइनस 70 डिग्री सेल्सियस तक कम तापमान पर रखना होगा। गरीब देशों में टीकाकरण से जुड़ी गैर लाभकारी संस्था गावी (जीएवीआइ) का इस वर्ष के अंत तक विकासशील देशों में 65 हजार वैक्सीन रेफ्रिजरेटर उपलब्ध करवाने का लक्ष्य है।

अविश्वास सबसे बड़ी बाधा
कई देशों में टीकाकरण को लेकर अविश्वास बड़ी बाधा है। सितंबर में हुए एक सर्वे में आधे अमरीकियों ने ही टीके की इच्छा जाहिर की। ये आंकड़ा सात यूरोपीय देशों में 68 फीसदी था। फिर हर्ड इम्यूनिटी भी संभव नहीं है। क्योंकि इसके लिए या तो बड़ी आबादी का संक्रमित होना या टीका लगाए जाने से ही संभव है। लोगों का मानना है कि टीकाकरण का असर बचपन में ही होता है। फिर वैक्सीन बनने की प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में है।



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Saturday, 28 November 2020

मुंह से बदबू आती है तो नजरअंदाज न करें, जानें ये खात बातें

मुंह से बदबू आने की समस्या अक्सर लोगों में हो जाती है, मुंह से बदबू (हैलीटॉसिस) एक सामान्य समस्या है। मुंह की बदबू को ये शरीर में किसी बीमारी का उत्पन्न होने का भी संकेत हो सकता है। मुंह से बदबू किसी बीमारी का संकेत हो सकता है।

मुंह से दुर्गंध आने के कई कारण हो सकते हैं । ओरल इन्फेक्शन, फास्ट फूड के अधिक सेवन, मसूड़ों में सूजन या संक्रमण, दांतों में संक्रमण, मुंह का बार-बार पकना, कब्ज की समस्या, पाचन क्रिया खराब रहना इसका प्रमुख कारण है। इसके अलावा जो मधुमेह, किडनी और लिवर संबंधी रोगी होते हैं उनमें ये समस्या हमेशा बनी रहती है। मुंह से बदबू की तकलीफ दूसरों के साथ खुद के लिए भी बड़ी परेशानी खड़ी करती है। ऐसे में सबसे अहम होता है कि बीमारी का पता कर उसका इलाज कराया जाए जिससे दोनों का निदान हो सके।

आप अपने मुंह से आने वाली दुर्गंध की समस्या से परेशान हैं तो ऐसे में पुदीना चबाना काफी मददगार साबित हो सकता है। इसे अपनाने से आपके मुंह से बदबू आनी बंद हो जाएगी। मुंह से बदबू आने कारण कई बार हमारे द्वारा सेवन किया गया भोजन भी हो सकता है। इलायची, लौंग, त्रिफला, मुलेठी चबाने से मुंह की बदबू ठीक होती है। त्रिफला चूर्ण को रात के समय गर्म पानी में रख दें। सुबह उठते ही कुल्ला करें आराम मिलेगा। दिन में जब भी मौका मिले कर सकते हैं। त्रिफला चूर्ण के पानी से कुल्ला मसूड़ों की समस्या दूर करता है।



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कोरोना की इस वैक्सीन पर हो रहा तेजी से काम, 96 प्रतिशत असरदार

बीजिंग । दवा निर्माता कंपनी फाइजर ने हाल ही में ये ऐलान किया है कि वो लैब में कोरोना की ऐसी वैक्सीन बनाने में सफल हुई है जो कि वायरस के को खत्म करने में 96 फीसदी असरदार है। वैक्सीन को मंजूरी मिलने से पहले उसकी सुरक्षा जांच आदि की प्रक्रिया की जाती है। आमतौर पर वैक्सीन की केवल 10 प्रतिशत जांच ही सफल रहती है। इससे पहले कि एक वैक्सीन का टेस्ट हो सके इसे शुरूआती जांचों से गुजरना होता है और ये देखा जाता है कि कौन-से ऐंटिजन यानी प्रतिजन इसमें इस्तेमाल होने चाहिए। ऐंटिजन वैक्सीन के छुपे हुए हथियारों की तरह होते हैं। इसमें बीमारी का या बीमारी फैलाने वाले वायरस का एक छोटा-सा हिस्सा होता है, ताकि रोगों से लड़ने वाली प्रतिक्रिया यानी इम्यून रिस्पॉन्स शुरू करवाया जा सके। इस पूर्व-नैदानिक पड़ाव पर, ऐंटीजन का टेस्ट ऐसे जानवरों पर किया जाता है जिनका जेनेटिक ढ़ांचा हमसे मिलता-जुलता है।

अगर सब कुछ ठीक रहता है, तो वैज्ञानिक पहले पड़ाव की शुरूआत करते हैं। इसमें कुछ स्वयंसेवकों को वैक्सीन दी जाती है। शोधकर्ता और डॉक्टर देखते हैं कि सही इम्यून रिस्पॉन्स मिल रहा है या नहीं, जिससे इंसानों के लिए इसकी सही खुराक पता लगाई जा सके।

दूसरे पड़ाव में, वैक्सीन अलग-अलग उम्र के सैकड़ों स्वयंसेवकों की दी जाती है। और आखिरकार, तीसरे पड़ाव में, हजारों स्वयंसेवकों पर इसे टेस्ट किया जाता है। ये टेस्ट अलग-अलग देशों के लोगों पर होते हैं, ताकि ये देखा जा सके कि ये वैक्सीन एक दूसरे से बहुत अलग आबादियों पर असर कर सकती है या नहीं।

इस समय, फाइजर की वैक्सीन टेस्टिंग के तीसरे पड़ाव में है यानी इसे दुनिया भर में टेस्ट किया जा रहा है। कंपनियां इसे बनाने का काम शुरू करने के पहले और अधिक जानकारी जुटाने का इंतजार कर रही हैं। पारंपरिक टीकों से अलग, फाइजर वैक्सीन एक नई जेनेटिक तकनीक का इस्तेमाल कर रही है जो कि विज्ञान में सबसे आगे है। दरअसल, एमआरएनए वैक्सीन खास होती है। सिंथेटिक एमआरएनए के इस्तेमाल से इम्यून सिस्टम सक्रिय हो जाता है और वायरस से लड़ता है। पारंपरिक रूप से, वैक्सीन बीमारी फैलाने वाले जीवाणु का एक छोटा हिस्सा इंसान के शरीर में डालती हैं। लेकिन एमआरएनए वैक्सीन हमारे शरीर से ट्रिक या यूं कहें कि चालाकी से अपने आप कुछ वायरल प्रोटीन बनवाती है।
अब तक में वैक्सीन को साढ़े 43 हजार लोगों पर टेस्ट किया जा चुका है। इसमें तीन हफ्तों के अंतर में, दो खुराक देनी होती हैं। फाइजर का कहना है कि ये साल खत्म होने के पहले 5 करोड़ खुराकें तैयार की जा सकती हैं, और उनका मानना है कि साल 2021 में और 1.3 अरब खुराकें तैयार हो जाएंगी।

खैर, जानने और सुनने में ये सब कुछ बहुत अच्छा लगता है, लेकिन वैक्सीन उपलब्ध होने के बाद इसे बांटना एक चुनौतिपूर्ण होगा। बड़े-बड़े अस्पतालों से लेकर गांव के छोटे-छोटे समुदायों तक वितरण करना चुनौती होगी। वैक्सीन 6 महीनों तक चल सके, जाहिर है इसके लिए इसे -70 डिग्री सेल्सियस या इससे कम तापमान पर रखना होगा, जिसमें ढ़ेर सारी ऊर्जा और पैसा लगेगा। उसके लिए एक मजबूत कोल्ड चेन इन्फ्रास्ट्रक्च र तैयार किये जाने की आवश्यकता। उम्मीद है कि वैक्सीन उपलब्ध होने के बाद वितरण के लिए हर देश में खास योजना बनायी जा रही होगी।



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वयस्क उम्र के लोगों को तमाम बीमारियों से बचाएंगे ये वैक्सीन, जानें इसके बारे में

बच्चों को कई तरह की बीमारियों से बचाने और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए जन्म से पांच साल तक कई टीके लगाए जाते हैं । लेकिन कुछ टीके ऐसे भी हैं जिनको आप व्यस्क होने पर भी लगवा सकते हैं । इन टीकों से तमाम तरह की बीमारियों का बचाव होता है। जानते हैं इन टीकों के बारे में ।-

इन्फ्लुएंजा वैक्सीन -
रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाकर सर्दी-जुकाम व मौसमी बीमारियों से बचाव करता है। श्वसन तंत्र मजबूत करता है। यह स्वाइन फ्लू जैसी बीमारियों से बचाव में कारगर है। यह टीका साल में एक बार लगवाना चाहिए।

एमएमआर -
एमएमआर (मीजल्स, मम्स एंड रुबेला) यानी खसरा-गलगण्ड व जर्मन खसरा है। बचपन में यह टीका नहीं लगा है तो एक खुराक ले सकते हैं। इम्युनिटी कम है तो डॉक्टरी सलाह पर दो खुराक ४-८ सप्ताह के भीतर लगवाएं।

एचपीवी वैक्सीन -
एचपीवी (ह्यूमन पैपिलोमा वायरस) के टीके महिलाओं में सरवाइकल व पुरुषों में गले के कैंसर से बचाव के लिए लगता है। बच्चों को 9 साल की उम्र तक नहीं लगा तो 26 साल तक की उम्र में लगवा सकते हैं।
हेपेटाइटिस ए, बी हेपेटाइटिस ए व बी लिवर की गंभीर बीमारी है। इसकी दो या तीन डोज जरूरी है। इसका असर दस साल तक रहता है। जरूरत पडऩे पर बूस्टर डोज ले सकते हैं। मधुमेह रोगी को डॉक्टरी सलाह पर टीकाकरण करवाना चाहिए।

टायफॉइड वैक्सीन (टीसीवी) -

यह टायफॉइड बुखार से बचाता है। इसमें ओरल व इंजेक्टेबल टीका दोनों है। ओरल के चार खुराक एक दिन के अंतराल पर व टीके तीन बार चार सप्ताह के अंतराल पर लगाए जाते हैं। इससे सात साल तक बचाव होता है।

न्यूमोकॉकल वैक्सीन -
यह निमोनिया व फेफड़े संबंधी बीमारियों से बचाव करती है। यह टीका ६५ साल से कम उम्र के लोगों को एक से दो खुराक तक और इससे अधिक उम्र के लोगों को एक खुराक देने की जरूरत होती है।

हिव वैक्सीन -
हिव (हिमोफिलियस इन्फ्लुएंजा टाइप बी वैक्सीन) की एक खुराक किसी भी उम्र में ले सकते हैं। यह एचआइवी से बचाव करती है। जिन्हें एचआइवी संक्रमण है उन्हें यह टीका नहीं लगवाना चाहिए।

टीडेप -
टिटनेस, डिप्थीरिया व पर्टुसिस (काली खांसी) यानी (टीडेप) बैक्टीरिया जनित रोग से बचाव करता है। जिन्हें नहीं लगा है वे दस साल में एक बार टीडेप व टीडी (टेटनस-डिप्थीरिया) का बूस्टर डोज लगवा सकते हैं।

रिकॉम्बिनेंट जोस्टर वैक्सीन-

ये वैक्सीन हरपीज जोस्टर (स्किन पर दाने निकलते हैं, उनमें पानी भरता है) से बचाव के लिए देते हैं। यह बीमारी चिकनपॉक्स को फैलाने वाले वायरस वेरीसेला जोस्टर से ही फैलती है। दो खुराक देने की जरूरत होती है।

चिकनपॉक्स (वेरीसेला) -

चिकनपॉक्स (माता) से बचाव के लिए इसकी दो डोज लगवा सकते हैं। एक बार खुराक लेने से 95फीसदी तक बचाव होता है। पहली खुराक के ४-८ सप्ताह के बाद दूसरी खुराक लेनी चाहिए। दोबारा लेने की जरूरत नहीं पड़ती है।



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बाइपोलर डिसऑर्डर - : ज्यादा खुशी या ज्यादा गम होना, जानें इस समस्या के बारे में

बहुत ज्यादा खुशी या बहुत ज्यादा गम होना एक तरह की मानसिक बीमारी है। खुश हो जाना अचानक अवसाद में चले जाना बाइपोलर डिसऑर्डर की समस्या होती है। यह एक प्रकार की मानसिक बीमारी है, जिसमे मन लगातार कई हफ़्तो तक या महिनों तक या तो बहुत उदास या फ़िर अत्यधिक खुश रहता है । इस समस्या का इलाज संभव है लेकिन कुछ बातों का ध्यान रखकर आप इससे बच सकते हैं । इस बीमारी की शुरुआत अक्सर 14 साल से 19 साल के बीच होती है।

बाइपोलर डिसऑर्डर में दो तरह के होते हैं। एक उदासी और दूसरा खुश होने पर व्यक्ति इतना डिप्रेशन में चला जाता है कि आत्महत्या जैसी खतरनाक कोशिश भी कर बैठता है। खुश और दुखी होने पर रोगी कुछ भी कर सकता है। इसका असर हफ्तों, महीनों या सालों तक रह सकता है।
उदासी (डिप्रेशन) में मरीज के मन में अत्यधिक उदासी, कार्य में अरुचि, चिड़चिड़ापन, घबराहट, आत्मग्लानि, भविष्य के बारे में निराशा, शरीर में ऊर्जा की कमी, अपने आप से नफ़रत, नींद की कमी, सेक्स इच्छा की कमी, मन में रोने की इच्छा, आत्मविश्वास की कमी लगातार बनी रहती है।

कारण -
इस बीमारी का मुख्य कारण सही रूप से बता पाना कठिन है| वैज्ञानिक समझते है कि कई बार शारीरिक रोग भी मन में उदासी तथा तेजी कर सकते हैं । कई बार अत्यधिक मानसिक तनाव इस बीमारी की शुरुआत कर सकता है । इस बीमारी का कारण कोई निश्चित नहीं होता है। जेनेटिक, न्यूरोट्रांसमीटर इम्बैलेंस, एब्नॉर्मल थायरॉयड फंक्शन, स्टे्रस का हाई लेवल भी इसका कारण बन सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस बीमारी से पीड़ित व्यक्तिनॉर्मल लाइफ जी सकता। ऐसे लोग नॉर्मल और फैमिली लाइफ एंजॉय करते हैं।

बाइपोलर डिसऑर्डर के लक्षण -
किसी बात को लेकर बहुत ज्यादा खुश हो जाना ।
हर समय गाना सुनते रहना, गाना गुनगुनाते रहना ।
बहुत ज्यादा दोस्त बनाना, तेज आवाज में जल्दी-जल्दी बातें करना, रात-रातभर जागना, अपने से छोटों पर रौब झाड़ना और उन्हें मारना-पीटना।
किसी भी चीज में मन न लगना, किसी बात पर ध्यान न देना।

इलाज -
बाइपोलर डिसऑर्डर का इलाज संभव है। इसके लिए मनोचिकित्सक को दिखाएं। ज्यादातर मामलों में दवाओं से पीडि़त को राहत मिल जाती है।
कई बार पर्याप्त नींद लेने के लिए कहा जाता है।
दवाइयों के साथ मनोचिकित्सक कुछ थैरेपी लेने की सलाह देते हैं।
रोजाना एक्सरसाइज और मेडिटेशन करें।
इस बात को याद रखें कि यह कोई बीमारी नहीं है।



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जिन देशों में कोरोना संक्रमण के मामले कम हो रहे उन्हें सतर्क रहने की जरूरत - डब्ल्यूएचओ

जिनेवा । डब्ल्यूएचओ ने कहा है कि ऐसे देश जहां कोविड -19 मामलों की संख्या में कमी आ रही है, उन्हें अभी भी 'सतर्क' रहने की जरूरत है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के एक शीर्ष अधिकारी ने यह बात कही है।

समाचार एजेंसी सिन्हुआ ने डब्ल्यूएचओ के हेल्थ इमरजेंसी प्रोग्राम की टेक्निकल हेड मारिया वान केरखोव के हवाले से बताया कि यहां तक कि जैसे-जैसे कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या कम हो रही है, सभी देशों को सतर्क रहने की जरूरत है। आपने ऐसा पहले भी सुना है लेकिन हमें वास्तव में इस पर फिर से जोर देने की जरूरत है। यह अच्छा है कि लागू किए गए उपाय प्रभावी साबित हो रहे हैं। लेकिन हम वो नहीं देखना चाहते कि आप फिर से लॉकडाउन करने जैसी स्थिति में जाएं। लिहाजा सतर्क रहना बहुत जरूरी है।"

जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के अनुसार, दुनिया में कोरोनावायरस मामलों की कुल संख्या 6.15 करोड़ और मृत्यु संख्या 14 लाख से अधिक हो गई है। यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर सिस्टम साइंस एंड इंजीनियरिंग (सीएसएसई) के शनिवार के अपडेट के मुताबिक दुनिया में 6,15,85,651 मामले और 14,41,875 मौतें हो चुकीं थी। दुनिया में सबसे ज्यादा 1,30,86,367 मामले और 2,64,842 मौतें अमेरिका में दर्ज हुई हैं। इसके बाद 93,09,787 मामलों के साथ भारत दूसरे स्थान पर है जबकि देश में अब तक 1,35,715 जानें जा चुकीं हैं।



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Friday, 27 November 2020

बेटी Aradhya के जन्म के बाद एक्ट्रेस Aishwarya ने रखा डाइट का पूरा ध्यान,वजन बढ़ने की नहीं की चिंता

नई दिल्ली। बॉलीवुड में एक्ट्रेस का मां बनना एक बड़ी खबर बन जाती है और जब उनके खानपान के बारे में बात हो,तो हर किसी की नजर इस ओर आ जाती है कि आखिर ये लोग किस तरह से करती है अपनी और बच्चों की देखभाल। तो हम आपको बता दें कि एश्वर्या रॉय ने भी डिलेवरी के बाद अपने शरीर की देखभाल एक समान्य औरतों के समान ही की थी। अपने बेटी के लिए वो सभी जरूरतें पूरी की थी जो एक मां को बच्चे के लिए करनी होती है। वो जानती है कि डिलेवरी के बाद किस तरह से अपना और बच्चे का ख्याल रखा जाता है। ऐश ने भी बेटी आराध्‍या के जन्‍म के बाद स्तनपान करवाया था। आज हम आपके ऐश्‍वर्या राय के ब्रेस्‍टफीडिंग एक्सपीरियंस के बारे में बताने जा रहे हैं।

ऐश्‍वर्या ने करवाई ब्रेस्‍टफीडिंग

बताया जाता है कि ऐश ने बेटी आराध्‍या को काफी लंबे समय तक स्‍तनपान करवाया था। उन्‍होंने इस बात पर भी पूरा ध्‍यान दिया था कि इसी आहार से उनकी बेटी पूरी तरह से स्वस्थ रह सकती है।

क्‍या खाती थीं ऐश

कहते हैं कि डिलेवरी के बाद मां का शरीर काफी कमजोर हो जाता है और सबसे अधिक तब होता है जब डिलेवरी समान्य तरीके से हो। ऐश्वर्या ने भी बेटी को जन्म बिना ऑपरेशन कराए दिया था। उस दौरान ऐश्‍वर्या ने इस बात का पूरा ध्‍यान रखा कि उन्हें अपनी और बेटी को स्वस्थ रखने के लिए किस तरह का आहार लेना जरूरी है। उन्होंने अपने आहार में उन सभी पोषक तत्‍वों को शामिल किया जो डिलेवरी के बाद शरीर के लिए जरूरी होता है। जैसे ऐश ने गोंद के लड्डू भी खाए। माना जाता है कि गोंद के लड्डू खाने से स्‍तनों में दूध अधिक बनता है।

वजन की नहीं की चिंता

प्रेगनेंसी के दौरान और डिलीवरी के बाद ऐश्‍वर्या ने कभी भी अपने बढ़ते वजन की चिंता नहीं की। इसकी जगह उन्‍होंने हमेशा अपनी बेटी को अपनी प्रायोरिटी माना है। उन्होने उस दौरान भरपूर मात्रा में घी का सेवन किया। खाने की चीजों से भी किसी भी तरह को कोई परहेज नही किया।

स्‍तनपान करवाने के फायदे

यह बात हर कोई भलिभांति जानता है कि मां का दूध बच्चे के लिए कितना जरूरा होता है। मां के दूध में ऐसे एंटीबॉडीज होते हैं जो नवजात बच्चे को वायरस और बैक्‍टीरिया से दूर रखने में मदद करते हैं। ब्रेस्‍ट मिल्‍क से बच्चे का वजन संतु‍लित रहता है। कुछ अध्‍ययनों का कहना है कि स्‍तनपान से बच्‍चों का दिमाग विकसित होता है। मां के दूध से और भी कई तरह के फायदे होते हैं



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Pregnancy के दौरान इस महीने में चक्कर आने से हो सकती है परेशानी, हो जाएं सावधान

नई दिल्ली। गर्भावस्थाू(Pregnancy) के दौरान हर महिलाओं के शरीर में अंतर आता है। इस समय बच्चे के साथ साथ मां को भी अपने शरीर की देखभाल करने की विशेष आवश्कता पड़ती है। ये नौ महीने हर महिलाओं के लिए मुश्किल भरे क्षण होते हैं। इस समय शरीर में हार्मोन्स परिवर्तन से कई तरह के बदलाव देखने को मिलते है मानसिक और शारीरिक रूप से होने वाले बदलाव के चलते आपको कमजोरी चिड़चिड़ापन मतली के आने जैसी समस्याएं होनी लगती है। लंबे समय तक एक ही जगह पर बैठे रहने से सिर चकराने लगता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि प्रेगनेंसी में ऐसा क्यों होता है।
Pregnancy में कब आते हैं चक्कर
गर्भावस्थाे मिलाओं के चक्कर आने की समस्या अक्सर पहले तीसरे या फिर छठे सप्तााह के बाद से शुरू होने लगते हैं। प्रेगनेंसी (dizziness in pregnancy)के शुरुआती महीनों में चक्कर आना कोई बड़ी बीमारी नही है लेकिन जब यह चौथे या पांचवे महिने में आने लगे तो आपके लिए परेशानी बढ़ सकती है।

प्रेगनेंसी की पहले चौथे महिनें में सिर चकराना
गर्भावस्था के चौथे महिनें में सिर चकराने का सबसे बड़ा कारण यह होता है कि इस दौरान आपके शरीर में तेजी से हार्मोनल का बदलाव होता है जो रक्त वाहिकाओं की दीवारों को चौड़ा करता है। जिससे ब्लड प्रेशर में गिरावट आती है और जैसे ही ब्लड प्रेशर लो होता है आपको चक्कर महसूस होने लगते हैं। मॉर्निंग सिकनेस में शरीर फूड और लिक्विड को नहीं रख पाता है इसलिए इसकी वजह से कमजोरी और चक्कर आने लगते हैं।

  • पाचवें और छठवें माह में चक्कर आना
    इस समय शरीर में ब्लड वॉल्यूम 30 फीसदी तक बढ़ जाता है। इसकी वजह से ब्‍लड प्रेशर बढ़ जाता है और चक्कर आने लगते हैं। इसके अलावा जेस्टेशनल डायबिटीज, एनीमिया और शरीर में पानी की कमी की वजह से भी प्रेगनेंसी में चक्कर आ सकते हैं।

    चक्‍कर आने पर क्‍या करें
    जब भी आपको अचानक से चक्‍कर आने लगें तो आप नीचे बताए गए टिप्‍स आजमा सकती हैं :
    बंद जगह पर बिल्कुल भी ना रहे। ताजी हवा के बीच जाएं।
  • जब भी चक्कर आए धीरे से एक जगह पर बैठ जाएं हो सके तो सिर को घुटनों के बीच में रख दें।
  • इस समय कोई भी चीज अचानक से ना करें। हो सके तो बाईं करवट लेकर लेट जाएं। जब आपका रक्‍त प्रवाह समान्य हो जाएगा तो बेहतर महसूस होगा
  • एनर्जी को बढ़ाने के लिए आप ऐसे कोई फ्रूट जूस पी सकती हैं। अगर ब्‍लड शुगर लेवल घटने की वजह से चक्‍कर आ रहे हैं, तो इस तरीके से वो ठीक हो जाएगा।
  • शरीर में पानी की कमी बिल्कुल भी न होने दें। ज्यादा हो तो आप उस समय ठंडे पानी से नहा लें


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डब्ल्यूएचओ ने फिर कहा चीन के वुहान से नहीं आया कोरोना वायरस

बीजिंग । विश्व स्वास्थ्य संगठन के स्वास्थ्य आपातकालीन कार्यक्रम के कार्यकारी निदेशक डॉ. माइकल रयान ने 23 नवंबर को न्यूज ब्रीफिंग में कहा कि कोरोना वायरस संभवत: बहुत पहले ही दुनिया के विभिन्न स्थलों में फैल चुका था और बहुत से लोग शायद विभिन्न समय पर संक्रमित भी हो चुके थे। डॉ. रयान ने कहा कि और अधिक सूचना से जाहिर है कि कोरोना वायरस पूरी दुनिया में मौजूद है। शोधकतार्ओं ने हाल में चमगादड़ के शरीर में यह वायरस पाया है। अन्य जगहों पर वायरस के संभावित स्रोत भी पाये गये हैं। अब तय नहीं कर सकते हैं कि मनुष्य या फिर जानवर, किसने कोरोनावायरस का प्रसार किया है, बस वायरस वुहान के समुद्री भोजन बाजार में पाया गया है ।

वुहान और हूपेई प्रांत की हुई आलोचना -
महामारी फैलने की शुरूआत में वुहान और हूपेई प्रांत की आलोचना काफी तीव्र थी। यहां तक कि कुछ देशों ने कोरोना वायरस को वुहान वायरस भी करार दिया और बारंबार चीन पर हमला बोला। लेकिन चाहे वह इटली, स्पेन या फ्रांस हो, वायरस सितंबर 2019 से पहले के रक्त, अपशिष्ट जल या रोग के मामलों में पाया गया है। इन निर्णायक सबूतों को देखने के बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अंतत: पुष्टि की कि कोरोनावायरस वुहान से नहीं आया है।

वुहान ने सबसे पहले वायरस का पता लगाया -
अब डब्ल्यूएचओ का फैसला आ चुका है। वुहान ने बस सबसे पहले वायरस का पता लगाया और सबसे पहले रिपोर्ट की। इससे न सिर्फ साबित हुआ है कि वुहान निर्दोष है, बल्कि यह भी साबित हुआ है कि कुछ देशों ने बुरी मंशा के साथ चीन पर कालिख पोती और महामारी का राजनीतिकरण किया।

कोरोना वायरस लैब में नहीं बना -
वास्तव में हुपेई प्रांत और वुहान शहर के लोगों ने सरकार के निर्देशन में और सभी चीनी लोगों की सहायता में महामारी की रोकथाम के लिए भरसक प्रयास किया और भारी कीमत चुकाई । यह मानव जाति के लिए चीनी लोगों का महान योगदान है, नहीं तो अब पूरी दुनिया में महामारी की स्थिति और खराब होगी। बहुत सारे अध्ययनों से साबित हुआ है कि कोरोना वायरस प्रयोगशाला में नहीं बनाया गया है और कृत्रिम वायरस कतई नहीं है। अमेरिकी वैज्ञानिकों के अध्ययन से जाहिर है कि कोरोना वायरस प्रकृति में पैदा हुआ है। अमेरिका के तूलेन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रॉबर्ट गैरी ने विज्ञान जर्नल प्राकृतिक चिकित्सा पर थीसिस जारी कर कहा कि वुहान में कोविड-19 मामले हैं, लेकिन यह पक्का है कि वहां महामारी का स्रोत नहीं है।



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रूस की कोरोना वैक्सीन स्पुतनिक का उत्पादन भारत में होगा

मॉस्को । भारत की जेनेरिक दवा कंपनियों में से एक हेटेरो और रूसी डायरेक्ट इंवेस्टमेंट फंड (आरडीआईएफ) ने भारत में प्रति साल के हिसाब से स्पुतनिक-5 कोविड वैक्सीन की दस करोड़ से अधिक खुराक के उत्पादन को अपनी सहमति दे दी है। इनका इरादा अगले साल की शुरूआत से स्पुतनिक-5 का उत्पादन करने का है।

हेटेरो लैब में इंटरनेशनल मार्केटिंग के निदेशक मुरली कृष्णा रेड्डी के अपने एक बयान में कहा कि हम कोविड-19 के उपचार के लिए सबसे अधिक प्रत्याशित स्पुतनिक-5 के उत्पादन के लिए आरडीआईएफ के साथ भागीदारी कर खुश हैं। यह सहयोग कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई में हमारी प्रतिबद्धताओं की ओर एक और कदम है और साथ ही 'मेक इन इंडिया' के उद्देश्य को भी साकार करना है, जिसकी कल्पना हमारे प्रधानमंत्री द्वारा की गई है।"

आरडीआईएफ के मुताबिक, वैक्सीन के अंतरिम नैदानिक परीक्षण के परिणाम में देखा गया कि इसकी पहली खुराक के बाद 42वें दिन पर ये 95 फीसदी तक असरदार है। वर्तमान में वैक्सीन के तीसरे चरण के नैदानिक परीक्षण को मंजूरी दे दी गई है, जिस पर बेलारूस, संयुक्त अरब अमीरात, वेनेजुएला और बाकी देशों में काम जारी है, जबकि भारत में दूसरे-तीसरे चरणों पर काम चल रहा है। स्पुतनिक-5 के 120 करोड़ से अधिक खुराकों के लिए अब तक 50 से अधिक देशों से अनुरोध आ चुके हैं।



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नहीं होगी कोरोना वैक्सीन की जरूरत ! वैज्ञानिक ने जताई आशंका

नई दिल्ली । फार्मास्युटिकल कंपनी फाइजर ने कोविड -19 वैक्सीन बना ली है और इसका ट्रायल चल रहा है, लेकिन कंपनी के पूर्व उपाध्यक्ष और मुख्य वैज्ञानिक डॉ. माइकल येडोन का कहना है कि महामारी को समाप्त करने के लिए किसी भी वैक्सीन की जरूरत नहीं है। एक न्यूज पोर्टल की रिपोर्ट के अनुसार डॉ. येडोन का कहना है कि महामारी को खत्म करने के लिए वैक्सीन की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है ।

सभी को कोरोना वैक्सीन लगाने पर उठाए सवाल -
येडोन ने कहा कि आप ऐसे लोगों का वैक्सीनेशन नहीं कर सकते हैं, जिन्हें बीमारी का खतरा नहीं है। जिस वैक्सीन का मानव पर बड़े पैमाने पर परीक्षण नहीं किया गया है, ऐसे वैक्सीन को फिट और स्वस्थ लोगों को लगाने के लिए निश्चित नहीं हो सकते हैं। उनकी टिप्पणियां एडवाइजर ग्रुप फॉर एमरजेंसीज (एसएजीई) की व्यापक आलोचना के साथ खत्म हुई। एसएजीई यूके की एक सरकारी एजेंसी है, जो सरकार को आपातकाल परिस्थितियों में सलाह देती है।

येडोन ने कहा कि एसएजीई का कहना है कि सभी लोग अतिसंवेदनशील थे और सिर्फ सात संक्रमित हुए हैं। मुझे लगता है कि यह सचमुच अविश्वसनीय है। उन्होंने श्वसन वायरस के खिलाफ इम्यूनोलोजिकल मेमोरी के क्षेत्र में सभी मिसाल को नजरअंदाज कर दिया है।" येडोन ने आगे कहा, "उन्होंने या तो कई विश्व-अग्रणी क्लिनिकल इम्यूनोलॉजिस्टों से उत्कृष्ट गुणवत्ता वाले काम को देखा नहीं या फिर उसकी अवहेलना की है, जो दिखाती है कि लगभग 30 प्रतिशत आबादी में पूर्व प्रतिरक्षा थी।" पिछले शुक्रवार को फाइजर ने घोषणा की थी कि वह अपने कोविड -19 वैक्सीन के लिए अमेरिकी नियामकों से आपातकालीन स्वीकृति की मांग कर रहा है।



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Basil Tea Health Benefits: सर्दियों में तुलसी की चाय के बेमिसाल फायदे, अर्थराइटिस और डायबिटीज जैसी बीमारियों को करती है कंट्रोल, जानें 6 शानदार फायदे!

नई दिल्ली। हिंदू धर्म में घर घर पूजी जाने वाली तुलसी का उपयोग औषिधि के रूप में किया जाता है। सदियों से इसका इस्तेमाल बीमारियों को दूर करने के लिए किया जाता रहा है। इस कारण तुलसी को 'जड़ी बूटियों की रानी' भी कहा जाता है। तुलसी का सेवन करने से शरीर में कई तरह के फायदे होते है। जो अर्थराइटिस और डायबिटीज जैसी बीमारियों से निजात दिलाता है। चलिए आज हम आपको तुलसी की चाय से होने वाले फायदों के बारे में बताते हैं।

तुलसी की चाय पीने के फायदे
सांस संबंधी बीमारियां
इसका सेवन करने से सर्दी-खांसी अस्थमा और सांस संबंधी बीमारियों से निजात दिलाता है। यह बलगम को बाहर निकालने में भी मदद करती हैं, जिससे सांस लेने में आसानी होती है।

शुगर लेवल कंट्रोल
तुलसी चाय का सेवन करने से शुगर लेवल कंट्रोल होता है। तुलसी चाय डायबिटीज मरीजों के लिए फायदेमंद है।

मजबूत इम्यून सिस्टम
तुलसी चाय का सेवन करने से इम्यून सिस्टम मजबूत होता है, इसलिए कोरोनाकाल में तुलसी का चाय पीने की सलाह हर किसी को दी जा रही है। तुलसी में कुछ ऐसे तत्व होते हैं, जो कंजक्‍शन को दूर करने में मदद करते हैं।

तनाव से राहत
रिसर्च के अनुसार, तुलसी की चाय तनाव पैदा करने वाले कोर्टिसोल हार्मोन के स्तर को सामान्य रखने में मदद करती है।इसलिए शरीर में थकान महसूस नही होती और तनाव से मुक्ति मिलती है। तुलसी चाय का सेवन करने से दिमाग तुरंत रिलैक्स हो जाता है।

बेहतर पाचन क्रिया
रोजाना इसका सेवन करने से पाचन क्रिया ठीक रहती है, जिससे आप कब्ज, एसिडिटी जैसी पेट की परेशानियों से बचे रहते हैं।

गठिया दर्द को करे कम
तुलसी में एंटी इंफ्लामेट्री व यूगेनॉल के गुण मौजूद होते है, जो गठिया और अर्थराइटिस से होने वाले दर्द से राहत दिलाने में मददगार होते है।



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Beetroot Mask for Hair Skin: बाल और त्वचा दोनों के लिए वरदान है चुकंदर का रस,जानें कैसे करें इसका उपयोग

नई दिल्ली। चुकंदर का रस शरीर में हो रही आयरन की कमी को पूरा करता है। इसमें मौजूद गुण शरीर में हो रही खून की कमी को पूरा करते है साथ ही यह त्वचा और बालों के लिए भी बहुत फायदेमंद होता है। यदि आप अपनी त्वचा के साथ साथ बालों को सुंदर चमकदार बनाना चाहते है तो हम आपको ऐसे मास्क के बारे में बताएंगे जो आपकी हर समस्याओं को दूर करने में मदद कर सकता है। तो आज से उपयोग में लाए चुकंदर का रस से बना मास्क जो आपकी हर परेशानियों से आपको दिलाएगा निजात, जानें घर पर कैसे बनाए चुकंदर का मास्क....

कैसे बनाएं चुकंदर का मास्क ?

चुकंदर मास्क बनाने के लिए आप और चुकंदर के रस में दही, बेसन और नींबू का रस मिलाकर चेहरे व बालों पर लगा सकते है।नींबू का रस त्वचा और बालों के अंदर जमी परत को गहराई से साफ करता है और दही उन्हें मॉइस्चराइज करता है।

चेहरे के लिए मास्क का उपयोग कैसे करें ?

-चेहरे पर इस मास्क का उपयोग करने के लिए, पहले आप अपने चेहरे को साफ पानी से अच्छी तरह से धो लें फिर इस मास्क को हाथों या ब्रश की सहायता से पूरे चेहरे पर लगाएं.

-चेहरे पर मास्क की मालिश करते हुए अपनी त्वचा को एक्सफोलिएट करने का प्रयास करें.

-फिर इसे 20-25 मिनट तक लगे रहने दे। फिर गुनगुने पानी से धो लें.

बालों के लिए मास्क का उपयोग कैसे करें?

-अपने बालों को पहले गीला कर लें।

-फिर बालों की जड़ों पर इस पेस्ट को लगाए।

-इसके बाद पूरे बालों पर लगाते हुए इसे किसी साफ कपड़े से ढक लें।

-फिर करीब 1 घंटे के बाद बालों को अच्छे शैम्पू का उपयोग करके धो लें।

त्वचा और बालों के लिए चुकंदर मास्क के फायदे

चुकंदर का मास्क आपके चेहरे व बालों पर रक्त संचार को बेहतर बनाता है, क्योंकि इसमें आयरन और कैरोटिनॉयड्स होते हैं और सभी काले धब्बों और सुस्ती को दूर करते हुए चेहरे पर एक सुंदर चमक प्रदान करता है। बालों को बेजान और कमजोर होने से बचाता है।



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प्रेग्नेंसी में Folic Acid का सेवन करना क्यों है जरूरी? जानें बच्चे के मानसिक विकास में किस तरह से है सहायक

नई दिल्ली। गर्भवती होने के दौरान महिलाओं को अपने लिए व शिशु की सही ग्रोथ के लिए काफी देखभाल करने की जरूरत होती है। इस दौरान सही तरीके से लिया गया आहार जन्म के समय बच्चे को स्वस्थ और तंदुरुस्त बनाता है इसलिए प्रेगनेंसी के समय में ऐसी चीजों को लेने की सलाह दी जाती है जो गर्भवती महिलाओं के लिए फायदेमंद साबित हो। आज हम आपको इन आहारों में सबसे खास चीज फोलिक एसिड (Folic Acid) के बारे में बता रहे है जो हेल्दी प्रेगनेंसी(Pregnancy Diet & Nutrition) के लिए काफी ज्यादा जरूरी माना जाता है।

ये हैं फोलिक एसिड के 5 फूड सोर्स

1. अंकुरित दाल:

अंकुरित अनाज शरीर के लिए काफी फायदेमेंद होता है इसमें फॉलिक एसिड की भरपूर मात्रा पाई जाती है। प्रेगनेंसी के दौरान इनका सेवन करना काफी जरूरी होता है।

2. साबुत अनाज:

साबुत अनाज फाइबर और कई खनिजों से भरपूर होता है इसमें फोलिक एसिड भी पाया जाता है.

3. हरी सब्जियां:

हरी सब्जियां आयरन से भरपूर होची है। के साथ ही इसमें एंटीऑक्सीडेंट और फोलिक एसिड के गुण पाए जाते है जो गर्भवती महिला के लिए काफी फायंदेमंद साबित होते है।

4. फल:

फल का सेवन करने से इसमें कई तरह के पौष्टिक तत्व हमें असानी से प्राप्त हो जाते है। साथ ही इनमें फोलिक एसिड भी पाया जाता है, इसलिए प्रेगनेंसी डाइट में इसे शामिल करना काफी जरूरी होता है। इनमें संतरे, अंगूर और कीवी शामिल हैं।

फोलिक एसिड का सेवन करने से होने वाले फायदे

न्‍यूरल ट्यूब डिफेक्‍ट : फोलिक एसिड का सेवन करने से भ्रूण में नसों के विकास में मदद करता है। साथ ही बच्चे का मानसिक विकास विकसित करने में मदद करता है।

लालरक्त कोशिकाओ का निर्माण : यदि प्रेग्‍नेंसी के दौरान महिलाओं के शरीर में खून की कमी सबसे ज्यादा होती है ऐसे समय में एनीमिया से जुड़ी शिकायत को पूरा करने के लिए फोलिक एसिड बहुत जरूरी होता है। यह लाल रक्‍त कोशिकाएं बनाता है।

जटिलताओं से सुरक्षा : फोलिक एसिड शिशु में पैलेट के खतरे को कम करता है। ये नवजात बच्चे के विकास में सहायक होता है जिससे प्रीमैच्‍योर बर्थ, मिसकैरेज, भ्रूण में शिशु के खराब होने जैसी समस्याओं से सुरक्षा मिलती है।

प्रेगनेंट महिला को मिलता है लाभ : यदि प्रेगनेंट महिलाओ नियमित रूप से फोलिक एसिड का सेवन करें तो इससे उनमें प्रीक्‍लैंपसिया, हार्ट स्‍ट्रोक, हार्ट डिजीज, कैंसर और अल्‍जाइमर रोग से बचाव होता है।



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Thursday, 26 November 2020

शरीर में कहीं भी हो दर्द और सूजन तो करें ये उपाय, जानें इनके बारे में

अक्सर शरीर के किसी अंग में दर्द और सूजन की समस्या होने लगती है, जिसके लिए आप तमाम उपचार करते हैं लेकिन कोई फायदा नहीं होता तो कुछ घरेलू नुस्खे अपना सकते हैं। ये नुस्खे दर्द और सूजन से राहत देंगे। जानिए इनके बारे में ।

शरीर में होने वाली सूजन के लिए अर्जुन के पेड़ की छाल का चूर्ण फायदेमंद होता है। एक चम्मच चूर्ण को लेकर उसमें थोड़ा पानी मिलाकर पेस्ट बनाकर प्रभावित हिस्से पर लगाएं। इससे फायदा होगा।
अगर आप बवासीर के कारण सूजन आई है तो धतूरे के पत्ते को थोड़ा गर्म करके प्रभावित जगह पर बांध लें । इसके अलावा धतूरे के पत्तों को पीस कर लेप बनाएं और इसे भी प्रभावित जगह पर लगा सकते हैं। इससे आराम मिलेगा ।

सूजन की समस्या से छुटकारे के लिए इलायची और धनिया भी फायदेमंद है। इसके लिए 2-3 ग्राम इलायची और धनिया पत्ते को पीस कर दूध में मिलाकर लेप बना कर लगा लें इससे सूजन में राहत मिलती है। चोट से होने वाली सूजन पर हल्दी, चूना और सरसों का तेल मिलाकर बना लेप लगाएं ।

दर्द से राहत के लिए उपाय -
अगर दर्द है तो देसी बबूल के बीज को पीस कर चूर्ण बना लें । इसमें हल्दी और दोगुना शहद मिला कर दर्द वाली जगह पर लेप कर लें। इससे दर्द में राहत मिलेगी ।
जंगली इमली के बीज को पीस लें। इस लेप को दर्द वाली जगह पर लगाएं ।



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हकलाने और तुतलाने में होता है अंतर, जानें इस समस्या के बारे में

कुछ लोगों में तुतलाने और हकलाने की समस्या होती है। यह कोई बीमारी नहीं है बल्कि एक प्रकार की समस्या है ये समस्या किसी भी व्यक्ति को हो सकती है। इससे पीडि़त व्यक्ति का आत्मविश्वास कम होने लगता है। यह परेशानी बच्चों में ज्यादा होती है । कुछ मामले में यह समस्या ज्यादा उम्र को लोगों में भी होती है।

तुतलाने और हकलाने में अंतर होता है। तुतलाने में शब्दों या अक्षर का सही उच्चारण करने में परेशानी होती है। इसमें व्यक्ति के मुंह से कुछ शब्द स्पष्ट नहीं उच्चारण के साथ नहीं निकलते । तुतलाकर बोलने वाले लोग कुछ शब्द जैसे 'र' को 'ड़' या 'ल', 'क' को 'त' बोलते है । वहीं हकलाने वाला व्यक्ति रुक-रुक कर अटक कर या एक ही शब्द को बार-बार बोलता है। इसका मरीज मानसिक रूप से दबाव महसूस करता हुआ जल्दी-जल्दी बोलता है। बोलते समय आंखें भींचता है व उसके होंठ बोलते समय कांपते और जबड़े हिलते हैं।

कारण -
तुतलाने की समस्या का कारण जीभ का निचला भाग ज्यादा चिपका होना व जीभ मोटी होना होता है, इसके अन्य कारम तालू का कटा होना, न्यूरोलॉजिकल प्रॉब्लम जैसे सेरेब्रल पाल्सी भी वजह है। यह समस्या आनुवांशिक भी हो सकती है।
हकलाना का समस्या में ज्यादातर मामलों में जिनपर किसी बात का दबाव या किसी विषय को लेकर तनाव की स्थिति से डर पैदा हो गया हो या मनोस्थिति बिगड़ गई हो उनमें यह समस्या देखी जाती है।

उपचार -
कुछ माह तक नियमित शब्दों के सही उच्चारण से तुतलाने की दिक्कत में सुधार होने लगता है। जल्दी-जल्दी बोलने के बजाय आराम से और धीरे-धीरे शब्दों को बोलने की आदत डालें। किताब या अखबार बोलकर पढ़ें। अपने ही शब्दों पर ध्यान दें। शीशे के सामने खड़े होकर बोलें, इससे आत्मविश्वास बढ़ता है। अभिभावक बच्चे पर किसी प्रकार का मानसिक दबाव न डालें। साथ ही उसे बार-बार टोके नहीं जैसे ऐसे बोलो, यह बोलो, इस तरह उच्चारण करो आदि।



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हकलाने और तुतलाने में होता है अंतर, जानें इस समस्या के बारे में

कुछ लोगों में तुतलाने और हकलाने की समस्या होती है। यह कोई बीमारी नहीं है बल्कि एक प्रकार की समस्या है ये समस्या किसी भी व्यक्ति को हो सकती है। इससे पीडि़त व्यक्ति का आत्मविश्वास कम होने लगता है। यह परेशानी बच्चों में ज्यादा होती है । कुछ मामले में यह समस्या ज्यादा उम्र को लोगों में भी होती है।

तुतलाने और हकलाने में अंतर होता है। तुतलाने में शब्दों या अक्षर का सही उच्चारण करने में परेशानी होती है। इसमें व्यक्ति के मुंह से कुछ शब्द स्पष्ट नहीं उच्चारण के साथ नहीं निकलते । तुतलाकर बोलने वाले लोग कुछ शब्द जैसे 'र' को 'ड़' या 'ल', 'क' को 'त' बोलते है । वहीं हकलाने वाला व्यक्ति रुक-रुक कर अटक कर या एक ही शब्द को बार-बार बोलता है। इसका मरीज मानसिक रूप से दबाव महसूस करता हुआ जल्दी-जल्दी बोलता है। बोलते समय आंखें भींचता है व उसके होंठ बोलते समय कांपते और जबड़े हिलते हैं।

कारण -
तुतलाने की समस्या का कारण जीभ का निचला भाग ज्यादा चिपका होना व जीभ मोटी होना होता है, इसके अन्य कारम तालू का कटा होना, न्यूरोलॉजिकल प्रॉब्लम जैसे सेरेब्रल पाल्सी भी वजह है। यह समस्या आनुवांशिक भी हो सकती है।
हकलाना का समस्या में ज्यादातर मामलों में जिनपर किसी बात का दबाव या किसी विषय को लेकर तनाव की स्थिति से डर पैदा हो गया हो या मनोस्थिति बिगड़ गई हो उनमें यह समस्या देखी जाती है।

उपचार -
कुछ माह तक नियमित शब्दों के सही उच्चारण से तुतलाने की दिक्कत में सुधार होने लगता है। जल्दी-जल्दी बोलने के बजाय आराम से और धीरे-धीरे शब्दों को बोलने की आदत डालें। किताब या अखबार बोलकर पढ़ें। अपने ही शब्दों पर ध्यान दें। शीशे के सामने खड़े होकर बोलें, इससे आत्मविश्वास बढ़ता है। अभिभावक बच्चे पर किसी प्रकार का मानसिक दबाव न डालें। साथ ही उसे बार-बार टोके नहीं जैसे ऐसे बोलो, यह बोलो, इस तरह उच्चारण करो आदि।



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कोरोना वायरस के प्रकोप से बचने के लिए सही मास्क का चयन जरूरी

नई दिल्ली । पूरी दुनिया कोरोनावायरस की तीसरी लहर की चपेट में है । भारत में कोरोना वायरस का प्रकोप जारी है। इससे अछूता नहीं है। इस महामारी से बचने के लिए कई तरह के दिशा-निर्देश सरकार ने जारी किए हैं। इनमें सबसे अहम है मास्क लगाए रखना और सोशल डिस्टेंसिंग बनाए रखना। अब समस्या यह है कि इस बीमारी से बचने के लिए क्या हर मास्क उपयोगी है। डिजाइनर मास्क भी बाजार में मिल रहे हैं लेकिन इन्हें लगाकर सार्वजनिक स्थलों पर या दफ्तरों में सुरक्षित रहा जा सकता है। यह सोच का विषय है।

जी99 मास्क कोरोना से बचाव के लिए कारगर -
विशेषज्ञों के मुताबिक, क्लीनिकली एप्रूव्ड मास्क से ही कोरना से बचाव हो सकता है और इस क्रम में एन95 मास्क उपयोगी बताए जा रहे हैं। एक और मास्क है, जिसे कोरोना के खिलाफ लड़ाई मे कारगर माना जा रहा है। इस मास्क का नाम जी99 है और इसे नई दिल्ली की कंपनी ने तैयार किया है। जी99 मास्क कोरोना से 99.99 प्रतिशत तक सुरक्षा करता है। यह अमेरिका की आईएसओ सर्टिफाईड लैबोरेटरी द्वारा अनुमोदित है। यह स्विस टेक्नॉलॉजी द्वारा पॉवर्ड है, जो प्रतिष्ठित ऑस्ट्रेलियन इंस्टीट्यूट से सर्टिफाइड है। जीनस जी99 मास्क को खासततौर पर कोरोना से बचाव के लिए बनाया गया है। इसमें अतिरिक्त सुरक्षा के लिए पांच परतें हैं। सबसे अंदर की परत ऑर्गेनिक कॉटन की है, जो लंबे समय तक पहने जाने के बाद अतिरिक्त कम्फर्ट प्रदान करती है। यह अत्यधिक मुलायम स्किन-फ्रेंडली कॉटन परत नमी को अवशोषित कर लेती है, जिससे कम गर्मी उत्पन्न होती है। ट्रिपल पार्टिकुलेट (3 इन टू 1) कंपोजिट नैनोटेक फिल्ट्रेशन सिस्टम प्रदूषण, बैक्टीरिया, पीएम 2.5 पार्टिकल्स को फिल्टर कर सपोर्ट का काम करता है। बाहरी परत ड्रॉपलेट्स से सुरक्षा देती है और बड़े कणों को फिल्टर कर देती है।



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रक्त की मात्रा जरूरत से ज्यादा बढऩा भी बीमारी

रक्ताल्पता की बीमारी यानी एनीमिया (Anemia) का नाम तो आपने खूब सुना होगा लेकिन शरीर में रक्त की मात्रा जरूरत से ज्यादा बढऩा भी एक बीमारी है, जिसका नाम है पोलीसाइथिमिया। आमतौर पर पुरुषों में हीमोग्लोबिन की मात्रा 15-16 (अधिकतम 18.5) और महिलाओं में 14-15 (अधिकतम सीमा 16.5) होती है। लेकिन यह अधिकतम सीमा से भी ज्यादा हो, तो समझ लें कि व्यक्ति पोलीसाइथिमिया का मरीज है। इस बीमारी में रक्त बेहद गाढ़ा हो जाता है। समय पर चिकित्सा न हो तो रक्त के छोटे-छोटे ढेले बनकर हार्ट, ब्रेन में अटक कर हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक का सबब बन सकते हैं।

कारण
बोनमैरो यानी अस्थिमज्जा में रक्त बनने की विधि में गड़बड़ी होने के कारण हीमोग्लोबिन बढऩे पर इसे प्राइमरी पोलीसाइथिमिया कहा जाता है, जबकि किसी रोग से संबंध होने पर इसे सेकेण्डरी पोलीसाइथिमिया कहते हैं। इसके कई कारण हैं-

बहुत ऊंचाई पर स्थित पहाड़ी इलाकों में रहने पर हवा में ऑक्सीजन (oxygen) कम रहती है, इसलिए शरीर को ज्यादा हीमोग्लोबिन तैयार करके उससे ऑक्सीजन की कमी को पूरा करना पड़ता है।

कई बीमारियों में शरीर को आवश्यकतानुसार ऑक्सीजन नहीं मिलती जैसे सायनोटिक हार्ट डिजीज (ब्लू बेबी), क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एप्नीया आदि। ऐसे में शरीर अधिक हीमोग्लोबिन तैयार करके ऑक्सीजन की आपूर्ति करने की कोशिश करता है। जीन संबंधी गड़बड़ी। किडनी या लिवर का कैंसर या कुशिंस सिंड्रोम नामक बीमारी। लंबे समय तक धूम्रपान करने, जबरदस्त प्रदूषण में रहने, जमीन के नीचे सुरंग में दीर्घ अवधि तक रहने के कारण।

लक्षण
जैसे गाल लाल होना या चेहरा लाल होना, हथेली या पांवों के तले में लालिमा रहती है, स्नान करने के बाद हाथ-पैरों में खुजली होती है, सिर घूमता है, थकान रहती है, पेट दर्द रह सकता है आदि। इस बीमारी में नाक से, आंत से भी रक्तपात हो सकता है। देखा गया है कि कुछ लोगों में यूरिक एसिड बढ़कर गठिया की शिकायत हो जाती है। इसमें कुछ लोगों का ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है। यही नहीं लिवर बढऩे की समस्या हो सकती है। लेकिन रक्त की जांच करने पर ही बढ़े हुए हीमोग्लोबिन का पता चल पाता है।



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बढ़ती उम्र के साथ समय पर हो लक्षणों की पहचान तो रहेंगी स्वस्थ और निरोगी

ज्यातादर महिलाएं अपने घर-परिवार में व्यस्त होने के कारण अपनी सेहत (health) पर ध्यान नहीं दे पातीं। ऐसे में उम्र के साथ होने वाले शारीरिक, मानसिक व हार्मोनल बदलाव (hormonal changes) से कई रोगों की आशंका बढ़ जाती है। व्यायाम, सही दिनचर्या व पौष्टिक खानपान से सेहतमंद रहा जा सकता है। यह तभी संभव है जब महिलाएं अपने लिए समय निकालें।

ये होती दिक्कतें
हार्मोनल बदलाव से अनियमित पीरियड्स की शिकायत, कमजोरी से स्वभाव में चिड़चिड़ापन व थकान, ब्लड प्रेशर (blood pressure), डायबिटीज (diabetes) व तनाव की तकलीफ, कैल्शियम की कमी से हड्डियां कमजोर होना, कमर-जोड़ोंं में दर्द, एस्ट्रोजन कम बनने से मनोरोग, गर्भाशय व ब्रेस्ट संबंधी रोगों की आशंका, मेनोपॉज शुरू होने से हृदय रोगों, एनीमिया आदि की दिक्कत हो सकती है।

2 घंटे दोपहर में बायीं करवट से लेटें, हृदय रोगों से बचाव होगा।

35-40 साल की उम्र के दौरान रोजाना दूध जरूर पीना चाहिए।

अहम कारण
हार्मोन्स में बदलाव होना मुख्य कारण है। इसके अलावा प्रमुख रूप से छोटी-छोटी समस्याओं को नजरअंदाज करना भी बड़ी बीमारी की वजह बनता है। खानपान पर ध्यान न दे पाना, कमजोर इम्युनिटी, पर्यावरण में बदलाव और प्रदूषण भी कई रोगों की आशंका बढ़ाता है। धूम्रपान, जंक फूड और तनाव भी वजह हैं।

ऐसे रह सकती हैं फिट
नियमित संतुलित व पौष्टिक डाइट लें। हरी पत्तेदार सब्जियां व मौसमी फल खाएं। एंटीऑक्सीडेंट्स, कैल्शियम व फाइबर युक्त चीजें लें। 35 से 40 साल की उम्र में रोज दूध पीएं। 45 मिनट वर्कआउट रोज करें। इससे रोगों की आशंका 50 फीसदी घट जाती है। स्विमिंग, एरोबिक्स, साइक्लिंग, रस्सीकूद, वॉक-जॉगिंग करें। तनाव से बचने के लिए योग, प्राणायाम व ध्यान करें। खाली पेट बिल्कुल न रहें। रोजाना 8 घंटे और दोपहर में बायीं करवट से 2 घंटे की नींद लें।

-ब्लड प्रेशर की जांच अन्य रोगों से बचाएगी।
-मेमोग्राफी टैस्ट से ब्रेस्ट कैंसर का समय पर पता लग सकेगा।
-गर्भाशय संबंधी समस्या की पहचान के लिए पैप स्मियर टैस्ट हर तीन साल में कराना चाहिए।
-पांच साल में एक बार थायरॉइड टैस्ट।
-वजन न बढऩे दें।
-हड्डियों की मजबूती का पता बीएमडी टैस्ट से चलता है।

ध्यान रखें : घी के साथ बिना पोलिश के चावल, जौ का दलिया, घी लगी जौ की रोटी, चावल मिश्री घी यदि खाती हैं तो हैल्दी रह सकती हैं।

खुद के लिए कुछ खास संकल्प लेकर रहें फिट

घर परिवार की जिम्मेदारियों के बीच आपको खुद के लिए भी कुछ संकल्प लेने की जरूरत है। इससे आप, अपने साथ परिजनों की सेहत का भी बखूबी खयाल रख पाएंगी। यदि आपने सेहत का संकल्प नहीं लिया है तो जानिए अब भी क्या खास कर सकती हैं आप:

रोजाना सलाद खाएं
-डायटिंग के चक्कर में शरीर के लिए जरूरी पोषक तत्त्वों से भरपूर चीजों को न भूलें। चिकित्सकीय रूप से भी सभी पोषक तत्त्व एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करते हैं।
-सेहतमंद रहने के साथ खूबसूरती बरकरार रखने के लिए डेयरी प्रोडक्ट्स, सूखे मेवे और किसी भी रूप में तरल पदार्थ ज्यादा पीएं।
-रोजाना एक मौसमी फल खाने की आदत डालें। यदि नहीं खा पा रही हैं तो एक कटोरी टमाटर, खीरा, ककड़ी आदि का सलाद जरूर खाएं।

काम से हटकर कुछ नया करें
-सकारात्मक सोच बरकरार रखने के लिए कोई किताब पढ़ें।
-छह माह या सालभर में कुछ दिनों के लिए फैमिली संग घूमने जाएं।
-बढ़ती उम्र के बारे में ज्यादा न सोचें, खेलकूद में शामिल रखें।
-योग, डांस या मेडिटेशन क्लास में खुद का रजिस्ट्रेशन कराएं।
-तनाव दूर करने के लिए हंसें। इसके लिए सुबह के समय पार्क में अन्य लोगों के साथ लाफ्टर प्रेक्टिस करें या कुछ देर कॉमेडी वीडियो देखें।



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Wednesday, 25 November 2020

सर्दियों में रूखी त्वचा में नमी लाता है घी, चेहरे पर आती है चमक

नई दिल्ली। घी का उपयोग लगभग हर घरों पर किया जाता है। क्योकि यह खाने का स्वाद बढ़ाने के साथ शरीर के लिए काफी फायदेमंद होता है। घर पर बनाए हुए शुद्ध घी में कई तरह के पोषक तत्व पाए जाते हैं जो शरीर को मजबूती प्रदान करने में मदद करते है। लेकिन ये बात बहुत कम लोग ही जानते है कि घी के गुण चेहेर की त्वचा के लिए किसी वरदान से कम नही है । इसका उपयोग त्वचा में करने से की तरह के अनमोल फायदे देखने को मिलते है। आयुर्वेद में घी को औषधि की तरह इस्तेमाल किया जाता था। आज हम आपको बता रहे हैं स्किन पर ग्लो लाने के लिए घी किस तरह से काम करता है।

घी से बनाएं मॉइस्चराइजिंग क्रीम-

सर्दियों के समय त्वचा काफी रूखी हो जाती है। जिससे चेहरे की चमक भी खो सी जाती है ऐसे समय में शुद्ध देसी घी से अच्छा दूसरी कोई मॉइस्चराइजर क्रीम हो ही नही सकती। त्वचा को रूखे पन से बचाने के लिए कच्चे दूध और बेसन के पेस्ट में घी मिलाकर त्वचा पर लगाएं और धीरे- धीरे मालिश करें। 15 मिनट के बाद इसे धो लें। घी त्वचा को हाइड्रेट और बेदाग भी बनाता है जिससे स्किन ग्लो करने लगती है।

फटे होठों से छुटकारा-

सर्दियों में त्वचा के साथ साथ होंठो के फटने की समस्या भी ज्याजा बनी रहती है। सर्दियों में घी को होठों पर लगाने से यह मृत कोशिकाओं को बाहर निकालता है। और नमी प्रदान करने में मदद करता है। सोने से पहले अपने होठों पर थोड़ी मात्रा में घी अवश्य लगाएं। इसका उपयोग आप नाभि में भी कर सकते है।

बालों में नमी बनाए रखता है-

बालों की नमी चले जाने से ये रूखे और बेजान हो जाते है। सर्दियों में बालों की ऐसी समस्या ज्यादातर देखने को मिलती है। ऐसे में घी का उपयोग बालों के लिए काफी अच्छा उपचार है। इसमें फैटी एसिड पाया जाता है जो बालों की नमी को बनाए रखता है। घी बालों के लिए नेचुरल कंडीशनर का काम करता है. 1 चम्मच घी गर्म कर इससे बालों में मसाज करें और 2 घंटे के बाद शैंपू से धो लें।

स्किन को जवां बनाता है-

सर्दियों के समय में त्वचा पर घी का इस्तेमाल करने से आप जवां दिख सकती हैं। घी का रोजाना इस्तेमाल करने से उम्र का असर त्वचा पर देरी से दिखाई देता है। घी की कुछ बूंदे लेकर स्किन पर थोड़ी देर मसाज करें और कुछ मिनट के बाद इसे धो लें।



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Tuesday, 24 November 2020

शोध : छोटे बच्चों को एंटीबायोटिक देना हो सकता है खतरनाक

जयपुर. छोटी-मोटी तकलीफ में बच्चों को अपने मन से एंटीबायोटिक देना खतरनाक हो सकता है। अमेरिका स्थित मेयो क्लीनिक के हालिया अध्ययन में सामने आया कि ऐसे बच्चों में आगे चलकर अस्थमा, एक्जीमा सहित अन्य एलर्जी का सामना करने की आशंका बढ़ जाती है, जिन्हें दो साल से कम उम्र में ही एंटीबायोटिक दवाएं दी जाती हैं। शोधकर्ता 14500 बच्चों की सेहत से जुड़े रिकॉर्ड का जायजा लेने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं। इनमें से 70 फीसदी को दो साल से कम उम्र से ही एंटीबायोटिक खिलाना शुरू कर दिया गया था। उन्हें कम उम्र में एंटीबायोटिक के इस्तेमाल और लंबे समय तक परेशान करने वाली बीमारियों (अस्थमा, एक्जीमा, फ्लू, मोटापा, एकाग्रता में कमी, आक्रामता) के खतरे में सीधा संबंध देखने को मिला।

मुख्य शोधकर्ता नाथन ली ब्रेजर के मुताबिक एंटीबायोटिक का निर्माण बैड बैक्टीरिया से मुकाबले से किया गया है। हालांकि, अक्सर ये पेट और आंत में मौजूद गुड बैक्टीरिया को भी नष्ट कर देते हैं, जिससे हानिकारक संक्रमण से लडऩे की शरीर की क्षमता घटती है। एंटीबायोटिक का काम बैक्टीरिया को मारना है। वायरस या फंगस से लड़ाई में इनकी कोई भूमिका नहीं होती। हालांकि, डॉक्टर वायरल संक्रमण के इलाज के लिए भी बड़े पैमाने पर एंटीबायोटिक दवाओं के सेवन का सुझाव देते हैं। इससे हानिकारक बैक्टीरिया सुपरबग का रूप अख्तियार कर लेते हैं। यानी उनमें एंटीबायोटिक के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है।

ये हो सकते हैं खतरे
-बैड बैक्टीरिया के खात्मे के लिए बनी एंटीबॉडी गुड बैक्टीरिया को भी मार गिराती है
-संक्रमण से लडऩे की शरीर की क्षमता घटती है, सुपरबग पनपने का भी होता है खतरा



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सीरम के सीईओ अडार पूनावाला का दावा: 2021 तक भारत के पास 'अप्रूव्ड' कोरोना वैक्सीन होगी

दुनियाभर में जहां 120 से ज्यादा कोरोना वैक्सीन परीक्षण पर काम चल रहा है वहीं भारत में भी वैक्सीन देने के लिए कंपनियां दिन-रात प्रयास कर रही हैं। स्वदेशी कंपनियों में कोरोना वैक्सीन बनाने में सबसे आगे चल रही पुणे स्थित सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया का कहना है कि भारत में अप्रेल 2021 के शुरुआत में एक 'अप्रूव्ड' कोरोना वैक्सीन होगी जो पूरी तरह से सार्वजनिक उपयोग के लिए सुरक्षित होगी। गौरतलब है कि सीरम इंस्टीट्यूट वॉल्यूम के हिसाब से दुनिया की सबसे बड़ी वैक्सीन निर्माता कंपनी है। वहीं वॉ स्ट्रीट जर्नल की शीर्ष रिसर्च और ब्रोकरेज फर्म बर्नस्टीन रिसर्च ने इस साल अगस्त में प्रकाशित अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया कोरोना की सबसे सुरक्षित वैक्सीन बनाने के बेहद करीब है।

सीरम के सीईओ अडार पूनावाला दावा: 2021 तक भारत के पास 'अप्रूव्ड' कोरोना वैक्सीन होगी

4 कंपनियां वैक्सीन दौड़ में सबसे आगे
विश्व स्तर पर चार उम्मीदवार कंपनियां ऐसी हें जो 2020 के अंत तक या 2021 के शुरुआती कुछ महीनों में एक सुरक्षित अनुमोदित (अप्रूव्ड) और सार्वजनिक उपयोग के लिए पूरी तरह से तैयार वैक्सीन देने की दौड़ में सबसे आगे हैं। वहीं भागीदारी के माध्यम से भारत में भी दो कंपनियां ऑक्सफोर्ड का वायरल वेक्टर वैक्सीन और नोवावैक्स की प्रोटीन सब-यूनिट वैक्सीन पर तेजी से काम कर रही हैं। बर्नस्टीन रिपोर्ट में स्पष्ट तौर से कहा गया है कि इन दोनों वैक्सीन की मौजूदा क्षमताओं और उन्हें अप्रूव्ड करने कासमय, वायरस से लडऩे की क्षमता और टीके की कीमत के आधार पर कोई एक या संभवत: दोनों वैक्सीन कंपनियों को आने वाले कुछ महीनों में जबरदस्त मुनाफा दे सकती हैं।

सीरम के सीईओ अडार पूनावाला दावा: 2021 तक भारत के पास 'अप्रूव्ड' कोरोना वैक्सीन होगी

शुरुआती चरणों में सफल परीक्षण
वहीं बर्नस्टीन रिपोर्ट में दोनों कंपनियों के वैक्सीन के पहले और दूसरे चरण के परीक्षणों के डेटा के आधार पर दोनों कंपनियों को vaccine की सुरक्षा और वायरस के खिलाफ इम्यूनिटी विकसित करने में भी सफलता मिली है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जिस तरह से चीजें अब दिख रही हैं, दोनों टीकों की दो खुराक 21 से 28 दिनों में वायरस के खिलाफ इम्यूनिटी (90 to 95% effective) विकसित करने लगेगी। वॉलस्ट्रीट जैसे प्रतिष्ठित संस्थान की यह रिपोर्ट भारत के वैश्विक रूप से वैक्सीन देने की क्षमता के विषय में उम्मीदें जगाती है। रिपोर्ट के अनुसार, सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया 2021 में 60 करोड़ (600 मिलियन) खुराक और 2022 में करीब 100 करोड़ (1 बिलियन) खुराक की आपूर्ति कर सकती है जिसमें से 40 से 50 करोड़ (400 से 500 मिलियन) खुराक 2021 तक अकेले भारत में उपयोग हो सकती है। रिपोर्ट का अनुमान है कि सरकारी और निजी बाजार के बीच वैक्सीन का क्रमश: 55:45 के अनुपात में भागीदारी होगी।

सीरम के सीईओ अडार पूनावाला दावा: 2021 तक भारत के पास 'अप्रूव्ड' कोरोना वैक्सीन होगी

ये देसी कंपनियां भी बना रही वैक्सीन
सीरम इंस्टीट्यूट ने कहा है कि वह अपनी वैक्सीन की कीमत 3 डॉलर प्रति खुराक रखेगी। लेकिन सीरम इंस्टीट्यूट के अलावा कम से कम 3 कंपनियां और हैं जो भारत में वैक्सीन बनाने में जुटी हुई हैं। इन भारतीय फार्मा कंपनियों में ज़ायडस, भारत बायोटेक और बायोलॉजिकल ई को सूचीबद्ध किया गया है। ये तीनों कंपनियां अपनी स्वयं की वैक्सीन पर काम कर रही हैं और वर्तमान में परीक्षण के चरण 1 और 2 में हैं। भारत बायोटेक, बायोलॉजिकल ई और कुछ छोटे खिलाडियों के बीच, भारत हर साल लगभग 2.3 बिलियन विभिन्न वैक्सीन की खुराक का उत्पादन करता है। सीरम इंस्टीट्यूट, ज़ायडस, भारत बायोटेक और बायोलॉजिकल ई समेत कुछ अन्य छोटी कंपनियों के दम पर भारत सालाना करीब 200 से 300 करोड़ (2-3 बिलियन) अलग-अलग वैक्सीन और खुराक का उत्पादन करता है। वहीं सीरम अकेले 150 करोड़ (1.5 बिलियन) खुराक क्षमता वाले टीकों का विश्व स्तर पर सबसे बड़ा निर्माता है। वैश्विक स्तर पर हर तीन में से दो बच्चों को सीरम इंस्टीट्यूट द्वारा निर्मित वैक्सीन या खुराक मिलती है। बर्नस्टीन के अनुसार, भारत में कुल वैक्सीन बाजार का अनुमान वित्त वर्ष 2021-2022 में 600 करोड़ (6 बिलियन डॉलर) का होने की उम्मीद है।

सीरम के सीईओ अडार पूनावाला दावा: 2021 तक भारत के पास 'अप्रूव्ड' कोरोना वैक्सीन होगी

आसान नहीं कीमत तय करना
न्यूयॉर्क में एनवाईयू लैंगोन हेल्थ में बायोएथिक्स के प्रोफेसर आर्थर एल. कैपलान का कहना है कि किसी भी संभावित सफल कोरोना वैक्सीन की कीमत तयकर पाना आसान नहीं होगा। खासकर तब जब यह अरबों डॉलर का परिणाम हो और लोगों की जान बचा सकती हो। लेकिन उन्हें उम्मीद है कि कीमत इतनी महंगी नहीं होंगी कि इसे आम आदमी खरीद ही न पाए क्योंकि सीमित पहुंच के चलते वैक्सीन का खर्च तक निकालना मुश्किल हो जाएगा। उनका कहना है कि अगर इसे मानव कल्याण के लिए उपलब्ध कराया जाएगा तब तो यह सस्ती होगी लेकिन अगर कंपनियों ने डिमांड को देखते हुए मुनाफा कमाने की सोची तो आम आदमी के लिए वैक्सीन का सपना बहुत महंगा हो सकता है।

सीरम के सीईओ अडार पूनावाला दावा: 2021 तक भारत के पास 'अप्रूव्ड' कोरोना वैक्सीन होगी

मॉडर्ना के अलावा अन्य फार्मास्युटिकल कंपनियां, जो ट्रम्प प्रशासन के वैक्सीन मिशन 'ऑपरेशन वार्प सीड ' का हिस्सा हैं, वे प्रति डोज 4 डॉलर से 20 डॉलर तक वैक्सीन का शुल्क वसूल सकती हैं। वर्तमान में कुल 5 वैक्सीन ट्रायल अपने अंतिम चरण में पहुंचे हैं जो इससाल के अंत तक या अगले साल के शुरुआती महीनों में वैक्सीन बना लेंगे। इस खबर के बाद से ही वैक्सीन की संभावित कीमत का अंदाजा लगाना शुरू हो गया। एनपीआर की रिपोर्ट के मुताबिक अग्रणी वैक्सीन निर्माता कंपनी मॉडर्ना ने एक सुरक्षित और प्रभावी कोविड-19 वैक्सीन को 32 से 37 डॉलर प्रति डोज बेचने का करार किया है। चूंकि ये कीमतें फिलहाल छोटे ऑर्डर के लिए हैं अमरीकार में इनकी लागत कम हो सकती है।डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन पर नजर रखने वाली वेबसाइट 'गुड आरएक्स की मानें तो इस वैक्सीन की तुलना मौसमी फ्लू वैक्सीन से कर सकते हैं जिसकी सामान्य कीमत 67 डॉलर प्रति डोज़ (अमरीका में) तक होती है। हालांकि, फार्मास्युटिकल कंपनियां वैक्सीन बनाने के दौरान आई कुल लागत वसूलने की योजना बना रही हैं।



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CORONA VACCINE : जानिए, आखिर कब मिलेगी कोरोना वैक्सीन? कितनी होगी कीमत?

जयपुर. कोरोना की अगली लहर का डर और वैक्सीन की उम्मीद दोनों साथ चल रही हैं। वैक्सीन के सफल प्रयोग की बहुत सारी खबरें आ रही हैं, लेकिन सब के मन में यही प्रश्न है कि वैक्सीन उन्हें कब मिलेगी? इन प्रश्नों का उत्तर जानने से पहले कुछ प्रक्रिया को समझ लेना जरूरी है। फाइजर और मॉडर्ना की वैक्सीन 95 फीसदी तक सफल बताई जा रही है। जबकि भारत बायोटेक का तीसरा चरण सफल बताया गया है। कंपनी का कहना है कि अब सिर्फ ऑथराइजेशन की अनुमति मिलने का इंतजार है। इसके लिए हर देश में अलग नियम हैं। इसके लिए अमरीका को गोल्ड स्टैंडर्ड माना जाता है। वे थर्ड फेज का ट्रायल सफल होने के दो महीने तक इसकी परख के बाद अप्रवूल देते हैं। इसकी कीमत को लेकर भी अभी कयास लगाए जा रहे हैं। लेकिन मोटे तौर पर 500 से तीन हजार के बीच एक खुराक की कीमत होगी। हालांकि अलग-अलग देशों में सरकार की सब्सिडी के बाद ये आम लोगों तक वाजिब दाम पर या मुफ्त दी जा सकती है।

एस्ट्राजेनिका : भारत के लिए राहत की बात
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, एस्ट्राजेनिका और भारत में सीरम इंस्टीट्यूट मिलकर वैक्सीन बना रहे हैं। बताया जा रहा है कि इसके तीसरे फेज का ट्रायल 90 फीसदी तक सफल रहा है। ब्रिटेन और ब्राजील में हुए इसके तीसरे ट्रायल के बाद यह दावा किया गया है। पहले वैक्सीन का आधा डोज दिय

किसे मिलेगा सबसे पहले कोरोना का टीका?
टीका किसे सबसे पहले मिलेगा, ये जटिल प्रश्न है। अमरीका में फ्रंटलाइन वर्कर्स यानी डॉक्टर्स नर्सेज सैनिटेशन वर्कर्स आदि को प्राथमिकता देने की बात कही गई है। इसके बाद 65 साल से अधिक उम्र के लोग और फिर आम आदमी तक यह पहुंच पाएगी। भारत में भी वैक्सीन वितरण का यही मॉडल चर्चा में है।

कैसे और कब तक मिलेगी वैक्सीन?
135 करोड़ की आबादी वाले देश में लगभग 270 करोड़ टीकों की जरूरत और एक वर्ष से अधिक का कार्यक्रम हो सकता है। भारत में नीति निर्धारकों का मानना है कि जुलाई-अगस्त तक 25 से 30 करोड़ लोगों को वैक्सीनेट किया जा सकेगा। वैक्सीन को लोगों तक पहुंचाने के लिए लॉजिस्टिक्स एक बड़ा मुद्दा होगा। वैक्सीन वितरण में कोल्ड चेन का सहारा लेना पड़ सकता है। सामान्य रेफ्रिजरेशन में भारत बायोटेक या ऑक्सफोर्ड वाली वैक्सीन को तो मैनेज कर लेगा, लेकिन फाइजर या मॉडर्ना के टीके वहां नहीं रखे जा सकते क्योंकि उनको -20 से -70 डिग्री रखना पड़ता है, उसके लिए व्यवस्था हमारे यहां अभी नहीं है।



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Monday, 23 November 2020

याद रह जाने वाले सपने क्यों होते हैं सेहत के लिए खतरनाक, क्या है इसके पीछे की असली वजह

नई दिल्ली। दिन भर के कामकाज करने के बाद जब हम सोते है तो उस दौरान दिन रात की कई गई प्रक्रिया को हम सपने के रूप में देखते है। कभी कभी सपने हमें आने वाली मुसीबतों से भी अगाह कराते है। और कुछ सपने में ऐसे होते है जो इतने अलग होते है जिसे देख दिल की धड़कने तेजी से बढ़ने लगती हैं और हम काफी डर जाते है। उठने के बाद कुछ सपने तो हम भूल जाते हैं लेकिन कुछ याद ही रह जाते हैं। लेकिन जो सपने याद रह जाने की स्थिति में होने से मन भारी करने लगता है वो हमारी सेहत का लिए खतरनाक होते है। आइए जानते हैं कि ऐसा क्यों होता हैं और इसे कैसे ठीक किया जा सकता है।

वैज्ञानिक भी इस बारें में पता नही लगा पाए है कि आखिर सपने क्यों आते हैं, रात को आने वाले सपने में कुछ को तो हम भूल जाते है। और सुबह उठकर ताजे मूड़ के साथ अपने काम में लग जाते है लेकिन इन्हीं के बीच कुछ सपने ऐसे होते है जिसका असर हमारे दिलोंदिमाग पर पड़ जाता है। जिसकी वजह से हम परेशान रहते हैं। ये बहुत हद तक स्लीप साइकल पर भी निर्भर करता है।
वैज्ञानिकों के द्वारा किए गए शोध से पता चला है कि ज्यादातर सपने रैपिड आई मूवमेंट (REM) के दौरान आते हैं। रैपिड आई मूवमेंट के समय सोते समय दिमाग सक्रिय अवस्था में रहता है जिसकी वजह से सपने आते हैं. सामान्य तौर पर ये मूवमेंट रात में सोते समय हर 90 मिनट पर होता है और लगभग 20 से 25 मिनट तक रहता है।वैज्ञानिकों ने इसकी कुछ खास वजहें बताई हैं।

तनाव या चिंता- रोजमर्रा की जिदंगी में हम कई तरह की घटनाओँ से होकर गुजरते है। जिसमें दोस्ती, दुश्मनी प्.र मुहब्बत, परिवार,घर ऑफिस में घटने वाली कुछ घटनाएं या फिर किसी करीबी की मौत, एक्सीडेंट या फिर यौन शोषण जैसी बड़ी घटनाओं का दिमाग पर गहरा असर पड़ता है। यह सब हमारे दिमाग में ऐसे घर कर जाती है कि रात को सोते समय भी हमें वही चीजें दिखाई देती है।

ठीक से नींद ना आना- जिन लोगों को सपने याद रहते है उनके पीछे का कारण होता है ठीक से नींद ना आने या इनसोम्निया जैसी बीमारियों का होना। इसके अलावा डिप्रेशन या अन्य मानसिक बीमारी की वजह से सपने स्पष्ट रूप से सपने याद रह जाते हैं।

मादक पदार्थों का सेवन- बहुत ज्यादा शराब पीने या ड्रग लेने का असर भी दिमाग पर पड़ता है जिसकी वजह से दिमाग शांत नहीं रहता है और तरह-तरह के ऐसे सपने आते हैं जो याद रह जाते हैं. इसके अलावा धूम्रपान या इन आदतों को छोड़ने के लिए की जाने वाली कुछ दवाओं की वजह से भी ऐसे सपने आते हैं.
हार्मोन में परिवर्तन- प्रेग्नेंसी के शुरूआती समय में महिलाओं के शरीर में हार्मोन में कई तरह के बदलाव होते है। और यह बदलाव सोते समय और तेजी से होते है। जिसकी वजह से कुछ समय के लिए ऐसे सपने दिखाई देने लगते है जो हमें याद रह जाते है।

ये सपने सेहत के लिए खतरनाक हैं- आमतौर पर सपनों का याद रहना कोई बड़ी समस्या नही है लेकिन यदि आप इन सपनों को लेकर ज्यादा सोचने लगेंगे तो यह एक बड़ी समस्या बन सकती है। ये हमें मानसिक तौर पर परेशान कर देते हैं। इसकी वजह से आपको नींद की समस्या, मूड खराब होना और नकारात्मक ख्याल आने लगते हैं और इसके चलते आप गलत डिसीजन ले सकते है।

क्या है इलाज- ज्यादातर मामलों में सपने याद रहने की समस्या अपने आप ही ठीक हो जाती है लेकिन फिर भी अगर आप लंबे समय से इस समस्या से परेशान हैं तो डॉक्टर से संपर्क कर अपना इलाज कराएं। इसके अलावा अपनी दिनचर्या को बदलें।
स्वस्थ भोजन करें- स्वस्थ भोजन करें, वजन कंट्रोल में रखें, पर्याप्त नींद लें, सही समय पर सोएं, खूब पानी पिएं, तनाव से दूर रहें और अपने दिमाग को स्वस्थ रखें।

एक्सरसाइज करें- मेडिटेशन करने से भी आपको इस समस्या से छुटकारा मिल सकता है। इसके लिए सांस लेने व छोड़ने की एक्सरसाइज करें, दिमाग को रिलैक्स रखने वाली तकनीक पर काम करें, आर्ट थेरेपी लें और एक्सरसाइज करें।



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सर्दियों में त्वचा पर निखार लाने के लिए करें मटर का सेवन, जानें 6 फायदे

नई दिल्ली। सर्दियों के मौसम में हर तरह की सब्जियां खाना फायदेमंद होता है। लेकिन इन्ही सब्जियों में से एक मटर का सेवन शरीर के साथ साथ त्वचा के लिए भी काफी असरदार सबित होता है। मटर का स्वाद कई तरह के पोषक तत्वों से भरपूर होता हैं। इसमें विटामिन A, B-1, B-6, C और K पाया जाता है, इसलिए इसे विटामिन का पावरहाउस भी कहा जाता है। मटर में कैलोरी की मात्रा काफी कम होती है। यदि आप अपने शरीर को खतरनाक वीमारियों से दूर रखना चाहते तो तो अपनी डाइट में मटर का सेवन करने से ना चूकें। जानें मटर खाने के 6 फायदे।

वजन घटाने में कारगर- मटर का सेवन करने से आप अपने वजन को असानी के साथ कम कर सकते है। इसमें फाइबर और प्रोटीन की भरपूर होती है और इसका सेवन करने से भूख भू कम लगती है। जिससे शरीर का वजन आप असानी से कम कर सकते है।

दिल की बीमारियों को दूर रखता है- मटर में मैग्नीशियम, पोटेशियम और कैल्शियम का मात्रा पाई जाती है। जो हाई ब्लड प्रेशर को बढ़ने से बचाता है। मटर शरीर से बैड कोलेस्ट्रॉल को कम करता है। यह एंटीऑक्सीडेंट का च्छा स्त्रोत माना जाता है।

पाचन के लिए अच्छा- फाइबर से भरपूर मटर पाचन तंत्र के लिए बहुत अच्छा माना जाता हैं. ये शरीर में अच्छे बैक्टीरिया को बढ़ाते हैं जिससे पेट अच्छा तरह से साफ हो जाता है औ रपाचन तत्रं मजबूत होता है।

डायबिटीज में फायदेमंद- मटर का सेवन करने से ब्लड शुगर को कंट्रोल करता है।मटर में विटामिन B A, K और C होता है जो लोगों को डायबिटीज के खतरे से बचाता है।

हड्डियों के लिए जरूरी- मटर के दानों में विटामिन K की मात्रा भी पाई जाती है। जो शरीर को ऑस्टियोपोरोसिस की समस्या से बचाता है। उबली हुई एक कप हरी मटर में विटामिन K-1 का 46 फीसदी RDA होता है, जो हड्डियों को मजबूत बनाए रखने के लिए जाना जाता है।

उम्र बढ़ने के संकेतों को रोकता है - मटर का सेवन करने से त्वचा बेदाग और चमकदार बनती.है। यह कोलेजन के उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जो उम्र बढ़ने के संकेतों को रोकता है।



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त्वचा पर दिखाई दें ये लक्षण तो हो सकती है स्किन कैंसर की समस्या

अक्सर हमारी त्वचा पर लाल दाने, तिल, मस्से आदि निकल आते हैं वैसे तो ये नॉर्मल भी हो सकते हैं, लेकिन ये ज्यादा दिन तक रहें तो लापरवाही न करें। क्यों कि त्वचा की कोशिकाओं में असामान्य वृद्धि होना स्किन कैंसर का संकेत हो सकता है। ये ज्यादातर उन हिस्सों में होता है जहां सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं जैसे चेहरा, गला, हाथ और पैर आदि पर । स्किन कैंसर की समस्या डीएनए डैमेज होने के कारण कोशिकाओं में होने वाली असामान्य वृद्धि से होती है। इसके अलावा स्किन कैंसर के और भी कई कारण हो सकते हैं। रोग प्रतिरोधक क्षमता का कमजोर होना, रेडिएशन जैसे एक्स-रे के संपर्क में बार-बार आना, खानपान में प्रिजर्वेटिव्स यानी रसायनों का अधिक इस्तेमाल होना भी कैंसर का कारण हो सकता है। जानते हैं स्किन कैंसर के बारे में।

स्किन कैंसर के प्रकार -
सैक्वमस सेल कार्सिनोमा स्किन कैंसर त्वचा की ऊपरी परत को प्रभावित करता है। ये उन लोगों में ज्यादा होता है जो धूप के संपर्क में ज्यादा आते हैं। इसमें चेहरा, गला, हाथ-पैर की त्वचा ज्यादा प्रभावित होती है ।

मेलानोमा स्किन कैंसर सबसे ज्यादा खतननाक होता है। ये कैंसर हथेली और तलवों पर ज्यादा होता है। शरीर के ऐसे हिस्से को ज्यादा प्रभावित करता है जहां सूर्य की अल्ट्रा वॉयलेट किरणें आसानी से नहीं पहुंच पाती हैं।

बेसल सेल कॉर्सिनोमा कैंसर त्वचा की सबसे निचली परत पर होता है। स्किन कैंसर के सबसे ज्यादा मामले इसके ही सामने आते हैं। ये कैंसर पूरे शरीर में नहीं फैलता है।

ऐसे करें कैंसर की पहचान - अगर आपकी त्वचा पर कोई तिल है और वो तेजी से आकार बदल रहा और उसमें खून आ रहा है, खुजली हो रही है, त्वचा पर लाल या काले धब्बे या अल्सर हो तो ये स्किन कैंसर के लक्षण हो सकते हैं। अगर 6 हफ्तों तक दवा लेने के बाद भी इनमें सुधार न हो तो कैंसर रोग विशेषज्ञ से संपर्क करें। इससे बचने के लिए शरीर को ढककर निकलें, सनस्क्रीन लगाए, डाइट में फल-ज्यूस आदि का सेवन करें।



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ज्यादा टेस्टिंग से कोरोना वायरस पर काबू पाया जा सकता है - शोध

न्यूयॉर्क । शोधकतार्ओं को शोध में इस तथ्य का पता चला है कि कोविड-19 के रेपिड परीक्षणों के माध्यम से कुछ ही हफ्तों में वायरस पर काबू पाया सकता है। रिसर्चरों ने दावा किया है कि भले ही ये परीक्षण गोल्ड स्टैनडर्ड नैदानिक परीक्षणों की तुलना में कम संवेदशनशील हो, लेकिन इनका कराया जाना जरूरी है।

रेपिड जांच होना फायदेमंद -
अमेरिका में कोलारडो विश्वविद्यालय के शोध के मुख्य लेखक डेनियल लार्मर ने कहा कि शोध में सामने आए निष्कर्षों के मुताबिक, बात जब लोगों के स्वास्थ्य की आती है, तो ऐसे कम संवेदनशील परीक्षणों का कराया जाना बेहतर है, जिनके परिणाम हाथोंहाथ मिल जाए, न कि ऐसे परीक्षण जिसके नतीजे के लिए हमें एक दिन का इंतजार करना पड़े। उन्होंने आगे कहा कि लोगों को घर में इस वजह से रहने की सलाह देना ताकि किसी एक संक्रमित व्यक्ति की वजह से दूसरों में रोग का प्रसार न हो, हम सिर्फ संक्रमितों को ही घर पर रहने की सलाह दे सकते हैं ताकि बाकियों की जिंदगी पर कोई असर न पड़े।

कोरोना का प्रसार रोकने को लेकर हुआ शोध -
इस शोध को जर्नल साइंस एडवांसेस में प्रकाशित किया गया। इसके लिए रिसर्च टीम ने हावर्ड विश्वविद्यालय के साथ मिलकर इस बात को जानने की कोशिश की कि परीक्षण की संवेदनशीलता,उसकी आवृत्ति या उसका टर्नअराउंड टाइम कोविड-19 के प्रसार को रोकने के लिए कितना महत्वपूर्ण है। शोधकर्ताओं ने देखा कि जब किसी व्यक्ति में कोरोनावायरस के लक्षण दिखते हैं या जब कोई संक्रमित हो जाता है, तो संक्रमण के दौरान शरीर के अंदर वायरल लोड का उतार-चढ़ाव कैसे होता है। फिर उन्होंने तीन काल्पनिक परिदृश्यों 10,000 व्यक्तियों, 20,000 व्यक्तियों और शहर में उपस्थित 84 लाख व्यक्तियों पर विभिन्न प्रकार के परीक्षणों के साथ स्क्रीनिंग के प्रभाव का पूवार्नुमान लगाने के लिए गणितीय मॉडलिंग का उपयोग किया। बात जब वायरस के फैलने पर अंकुश लगाने की आई तो परीक्षण की संवेदनशीलता के मुकाबले उसका बार-बार कराया जाना या उसके टर्नअराउंड टाइम यानि कि प्रक्रिया को पूरा करने की समयावधि का अधिक महत्व है।



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Sunday, 22 November 2020

अन्य कंपनियों से सस्ती होगी रूस की स्पुतनिक-5 कोरोना वैक्सीन

मॉस्को । दुनियाभर में फैली कोविड-19 महामारी से लड़ने के लिए बनाई गई रूस की स्पुतनिक-5 वैक्सीन की कीमत सरकार को फाइजर और मॉडर्ना से कम पड़ेगी। दुनिया की पहली पंजीकृत वैक्सीन के आधिकारिक ट्विटर हैंडल ने रविवार को यह जानकारी दी।

इस ट्वीट में कहा गया, "फाइजर की घोषित कीमत प्रति खुराक की दर से 19.50 डॉलर (1446.17 रुपये) और मॉडर्ना की कीमत 25 से 37 डॉलर (1854.07-2744.02 रुपये) रखी गई है यानी एक इंसान के हिसाब से इनकी कीमत 39 डॉलर (2892.34 रुपये) और 50 से 74 डॉलर (3708.13-5488.04 रुपये) बैठेगी। हर इंसान को स्पुतनिक-5, फाइजर और मॉडर्ना के दो खुराक की जरूरत होगी। स्पुतनिक-5 की कीमत इनसे कहीं अधिक कम होगी।"

रूसी प्रत्यक्ष निवेश कोष (आरडीआईएफ) के एक प्रवक्ता के हवाले से तास समाचार एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में बताया, रूसी वैक्सीन की कीमत अगले हफ्ते सार्वजनिक की जाएगी। बड़े पैमाने पर नैदानिक परीक्षण से पहले जब स्पुतनिक-5 को आधिकारिक तौर पर पंजीकृत किया गया, तो रूस अगस्त में कोविड-19 की वैक्सीन को नियामक स्वीकृति देने वाला यह पहला देश बन गया। इस वैक्सीन को गैमेलिया नेशनल रिसर्च सेंटर फॉर एपिडेमियोलॉजी एंड माइक्रोबॉयोलॉजी और रशियन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट फंड (आरडीआईएफ) ने मिलकर विकसित किया है।



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Friday, 20 November 2020

कोरोना वैक्सीन निर्माता कंपनी फाइजर ने आपातकालीन उपयोग की अनुमति मांगी

न्यूयॉर्क । अमेरिकी फार्मा कंपनी फाइजर ने अमेरिकी नियामकों से अपनी कोविड-19 वैक्सीन के आपातकालीन उपयोग की अनुमति देने के लिए अनुरोध किया है। कंपनी ने इस बात की जानकारी शुक्रवार को दी। फाइजर ने जर्मन कंपनी बायोएनटेक के साथ मिलकर कोरोना वैक्सीन विकसित की है जो फाइनल क्लीनिकल ट्रायल में 95 फीसदी असरदार पाई गई है। फाइजर ने यह दावा भी किया कि उसकी कोरोना वैक्सीन सुरक्षा मानकों पर भी पूरी तरह खरी उतरी है।

क्लीनिकल ट्रायल के फेज 3 में COVID-19 Vaccine 90 फीसदी प्रभावी

फाइजर ने कोरोना वैक्सीन पर किया सबसे तेजी से काम -
फाइजर और एक अन्य अमेरिकी कंपनी, मॉडर्ना, ने पिछले नौ महीनों से कोरोना के स्थायी इलाज के लिए वैक्सीन बनाने की चल रही दौड़ में गति के मामले में सभी वैक्सीन निमार्ताओं के रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। अमेरिका में सभी 50 राज्यों में कोरोना के मामले रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच रहे हैं।

साल के अंत तक पांच करोड़ वैक्सीन बनाएगी फाइजर -
फाइजर के सीईओ अल्बर्ट बोउर्ला ने एक बयान में सुरक्षित और प्रभावी वैक्सीन देने के लिए प्रतिबद्धता जताई है। फाइजर और बायोएनटेक ने 2020 में कुल पांच करोड़ वैक्सीन खुराक और 2021 तक 1.3 अरब खुराक का उत्पादन करने की उम्मीद जताई है। अमेरिकी नियामकों को उम्मीद है कि दिसंबर के अंत में वितरण के लिए मॉडर्ना और फाइजर प्रत्येक से दो करोड़ वैक्सीन की खुराक उपलब्ध हो जाएगी।



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Thursday, 19 November 2020

स्तनपान कराने वाली महिलाओं के शरीर में होती है पानी की कमी, जाने कैसे करें इसकी पूर्ति

नई दिल्ली। मां बनना हर महिला के लिए एक हसीन सपना होता है। जिसका अनुभव शादी के बाद हर महिलाएं लेना चाहती है। गर्भावस्था के दौरान महिला के शरीर में कई तरह परिवर्तन देखने को मिलते है। लेकिन जब वो मां बनती है तो उनकी जिम्मेदारी बच्चे के साथ साथ अपने प्रति भी ज्यादा हो जाती है। बच्चे के जन्म के बाद हर महिलाओं को अपने खानपान और सेहत का ध्यान रखना काफी जरूरी हो जाता है। क्योंकि जब बच्चा स्तनपान करता है तो मां के शरीर में पानी की कमी ज्यादा होने लगती है। ऐसे समय में स्तनपान कराने वाली महिलाओं को पर्याप्त मात्रा में पानी भी जरूर पीना चाहिए।

महिलाओं को हर बार स्तनपान कराने के पहले और बाद में एक गिलास पानी जरूर पीना चाहिए। क्योकि जब शरीर में पानी की कमी होने लगती है तो इसके लक्षण अपने आप सामने आने लगते है लेकिन इसका अभास हमे नही हो पाता जिसे हम टाल जाते है जोकि गलत है। यि आप इस बारे में जानना चाहते कि यदि आपके भी शरीर में पानी की कमी हो रही है तो उसे जानने के लिए सबसे पहले यूरिन के कलर की जांच कर लें। क्योंकि शरीर अगर डिहाइड्रेटेड होने से सबसे पहले यूरिन का रंग बदलकर गहरा पीला हो जाता है। इस तरह की परेशानी से बचने के लिए दिनभर में कम से कम ग्यारह से बारह कप पानी पीना चाहिए।

शरीर में पानी की कमी के लक्षण

अगर स्तनपान कराने वाली महिला के शरीर में पानी की कमी होती है तो उसमें ये सारे लक्षण नजर आने लगते हैं।

  • यूरिन का रंग का बदल जाना
  • शरीर में थकान का होना
  • चिड़चिड़ापन
  • त्वचा में रूखापन और फटना
  • कब्ज
  • तनाव और सिरदर्द भी एक लक्षण हो सकते हैं।

बच्चों के लिए मां के दूध का सेवन सबसे पोष्टिक आहारों में से एक है मां के दूध में 90 प्रतिशत पानी होता है। इसलिए स्तनपान कराने वाली मांओं के लिए जरूरी है कि वो शरीर में पानी कमी को पूरा करने के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी जरूर पीए। साथ ही चाय, कॉफी, सोडा और शराब जैसी चीजों का सेवन करने से दूर रहें। क्योंकि ये सारे पेय पदार्थ शरीर में पानी की कमी पैदा कर देते हैं।



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Wednesday, 18 November 2020

जानिए माउथवॉश से कैसे मरेगा वायरस, शोध में मिली जानकारी

लंदन । कोरोना वायरस के खात्मे को लेकर एक नया शोध सामने आया है। शोधकर्ताओं ने एक बार फिर दावा किया है कि माउथवॉश के इस्तेमाल से कोरोनावायरस को खत्म किया जा सकता है। प्रयोगशाला में शोध के दौरान पाया गया कि 30 सेकंड में माउथवॉश से कोरोना वायरस नष्ट हो जाता है। ब्रिटेन में कार्डिफ विश्वविद्यालय के अध्ययन से पता चला है कि कुछ माउथवॉश लार (सलाइवा) में कोरोनावायरस को मारने में मदद कर सकते हैं। ये अध्ययन अभी प्रकाशित नहीं किया गया है।

माउथवॉस से वायरस खत्म होगा-
शोध से पता चलता है कि माउथवॉश के उपयोग से लार में वायरस को मारने में मदद तो मिल सकती है, लेकिन ऐसा कोई सबूत नहीं है कि इसे कोरोनोवायरस के उपचार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। ये भी नहीं कह सकते कि वायरस श्वसन तंत्र या फेफड़ों तक नहीं पहुंचेगा। शोध कर रहे लेखकों ने कहा, "इन व्रिटो सार्स-कोव-2 को निष्क्रिय करने के लिए माउथवॉश की क्षमता का परीक्षण किया गया, जो संक्रामकता में कमी का पता लगाने के लिए सभी प्रोटोकॉल का उपयोग करके किया गया।" माउथवॉश का परीक्षण प्रयोगशाला में उन परिस्थितियों में किया गया जो मुंह या नाक जैसी परखनली के डिजाइन की थी।

शोधकर्ताओं ने बताया कि माउथवॉश में कम से कम 0.07 प्रतिशत सेटाइपैराडिनियम क्लोराइड है, जिसमें वायरस मारने की क्षमता के संकेत दिखते हैं। इस शोध के प्रमुख लेखक रिचर्ड स्टैनटन ने बीबीसी के हवाले से बताया, "इस अध्ययन से पता चलता है कि गम रोग से लड़ने के लिए कई सामान्य रूप से उपलब्ध माउथवॉश भी सार्स-कोव-2 कोरोनावायरस (और अन्य संबंधित वायरस) को निष्क्रिय कर सकते हैं।"

लार में वायरस को खत्म किया -
रिसर्च टीम के अनुसार, क्लिनिकल ट्रायल में यह देखा जाएगा कि क्या यह कार्डिफ के अस्पताल में कोविड-19 रोगियों की लार में वायरस के स्तर को कम करने में मदद करता है या नहीं, जिसके परिणाम अगले साल की शुरुआत में आने की उम्मीद है।

शोधकर्ता डेविड थॉमस ने कहा कि शुरुआती परिणाम उत्साहजनक थे, लेकिन नैदानिक परीक्षण इस बात का सबूत नहीं देगा कि मरीजों के बीच संचरण को कैसे रोका जाए। ये माउथवॉश प्रयोगशाला में वायरस को बहुत प्रभावी ढंग से मिटाते हैं, ये तो साफ है, लेकिन ये देखना बाकी है कि ये माउथवॉश रोगियों पर भी काम करेंगे या नहीं। अक्टूबर में जर्नल ऑफ मेडिकल वायरोलॉजी में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में यह भी पता चला है कि कुछ ओरल एंटीसेप्टिक्स और माउथवॉश में कोरोनावायरस को निष्क्रिय करने की क्षमता हो सकती है।



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चीन से पहले इस देश में फैल चुका था कोरोना वायरस !

बीजिंग । इटली में कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर आ चुकी है, पूरे देश में तीन स्तरीय प्रतिबंध व्यवस्था लागू की गयी। इटली के राष्ट्रीय कैंसर संस्थान ने हाल में एक ताजा अध्ययन का परिणाम जारी किया। इसके अनुसार कोरोनावायरस पिछले साल सितंबर में इटली में फैलने लगा था, जो चीन के वुहान में हुई महामारी से काफी पहले है। रिपोर्ट के अनुसार सितंबर 2019 से मार्च 2020 तक 959 स्वस्थ स्वयंसेवकों ने फेफड़ों के कैंसर की जांच में भाग लिया और अपने रक्त के नमूने छोड़ दिये। महामारी फैलने के बाद शोधकतार्ओं ने इन नमूनों का परीक्षण किया। पता चला कि 959 में 111 लोग, यानी 11.6 प्रतिशत लोगों में इस साल फरवरी में कोरोना वायरस की एंटीबॉडी बन चुकी है। उनमें चार व्यक्ति पिछले साल सितंबर में संक्रमित हो चुके थे।

लंबे समय तक फैल सकता है कोरोना -
इस अध्ययन से जाहिर है कि कोरोनावायरस कम मृत्यु दर होने की वजह से लंबे समय से लोगों के बीच फैल सकता है। इसका मतलब नहीं कि वायरस खत्म हो रहा है, इसके विपरीत वह फिर से फैलने की संभावना है। शोधकतार्ओं ने कहा कि कोविड-19 महामारी फैलने के इतिहास को नया आकार दिया जाएगा।

बुहान से पहले आया कोरोना -
ध्यान देने की बात ये है कि यह पहला अध्ययन नहीं है, जिसमें साबित हुआ है कि कोरोनावायरस आने का समय वुहान में हुई महामारी से पहले है। इससे फिर एक बार पुष्ट किया गया है कि वायरस के स्रोत की खोज एक जटिल वैज्ञानिक मुद्दा है। वैज्ञानिकों को दुनिया भर में अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन और सहयोग करने की आवश्यकता है। तथ्यों से साबित है कि पश्चिमी देशों के राजनीतिज्ञों का तथाकथित वायरस चीन से पैदा होने का कथन बिलकुल गलत है।

वायरस के स्रोत की खोज में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की जरूरत -
चीन का हमेशा यह विचार रहा है कि वायरस के स्रोत की खोज एक लगातार विकास की प्रक्रिया है, जो कई देशों और कई क्षेत्रों से संबंधित है। आशा है कि विभिन्न देश सक्रिय रवैये से अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठन के साथ सहयोग करेंगे और पूरी दुनिया में वायरस के स्रोत की खोज करेंगे। उद्देश्य है कि संभावित जोखिम को रोका जाए और सभी लोगों की सुरक्षा व स्वास्थ्य की रक्षा की जाए। चीन लगातार कोरोना वायरस से जुड़े अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन में भाग लेगा और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के साथ महामारी के खिलाफ सहयोग में योगदान देगा।



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दिवाली के बाद कोरोना के मरीजों में हुई 30 प्रतिशत की वृद्धि, एक दिन में हुईं 474 मौतें

नई दिल्ली । दिवाली के बाद भारत में कोविड-19 के नए मामलों में 30 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हो गई । बीते 24 घंटों में कोविड के 38,617 नए मामले सामने आए हैं, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, बुधवार को देश में कुल संक्रमित मरीजों की संख्या 89,12,907 हो गई । इसी अवधि में 474 नए कोरोना मरीजों की मौत हो गई। देश में कुल मौतों की संख्या बढ़कर 1,30,993 हो गई। फिलहाल देश में सक्रिय मामलों की संख्या 4,46,805 है । कोरोना से संक्रमित होने के बाद अब तक 83,35,109 लोग ठीक हो चुके हैं।

नए मामलों में 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई -
भारत में कल मंगलवार को एक दिन में 29,164 नए कोविड-19 मामले और 449 मौतें दर्ज की गई थी। बुधवार को नए आंकड़ों में लगभग 32 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है। ये वृद्धि कोरोना टेस्टिंग में हुई वृद्धि के कारण हुई है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के आंकड़ों से पता चला है कि लंबे सप्ताहांत के बाद मंगलवार को कुल 9,37,279 नमूनों का परीक्षण किया गया।

दिल्ली एनसीआर में बढ़ रहे हैं मरीज -
दिल्ली-एनसीआर में कोविड-19 के मरीज बढ़ते जा रहे हैं। सरकारी और निजी अस्पतालों में वेंटिलेटर के साथ 10 प्रतिशत आईसीयू बेड हैं, जिसे गंभीर मरीजों के लिए रखा गया है। गंभीर रोगियों के अलावा मध्यम लक्षणों वाले रोगियों को अस्पतालों में प्रवेश से पहले घंटों इंतजार करना पड़ता है। इसके अलावा, गैर-कोविड मरीजों को राजधानी के अस्पताल में बिस्तर के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है। इस स्थिति ने दिल्ली सरकार को उन प्रतिबंधों पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है, जो उन्होंने बीते महीनों में हटा दिए थे। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने उपराज्यपाल अनिल बैजल और केंद्र को एक प्रस्ताव भेजा है, जिसमें शादियों में सिर्फ 50 लोगों के शामिल होने की अनुमति देने और बाजार क्षेत्रों में लॉकडाउन लगाने पर विचार करने के लिए कहा गया है। यह स्थल हॉटस्पॉट के रूप में उभर सकते हैं। इसके अलावा गौतमबुद्धनगर के जिला प्रशासन ने बुधवार से दिल्ली से नोएडा जाने वाले यात्रियों का रैंडम कोविड टेस्ट कराने का फैसला किया है। यह निर्णय राजधानी में कोरोनावायरस के मामलों में वृद्धि को देखते हुए लिया गया है।

दुनिया में कोरोना के मामले -
जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के अनुसार, वैश्विक स्तर पर कोरोनावायरस मामलों की कुल संख्या 5.55 करोड़ से अधिक हो गई है और वायरस से 13,36,892 लोगों की मौत हुई है।



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Monday, 16 November 2020

'भारत में 130 करोड़ लोगों को कोरोना वैक्सीन लगाना बहुत बड़ी चुनौती'

हैदराबाद । भारत की पहली स्वदेशी कोरोनावायरस वैक्सीन के को-वैक्सीन का मानव अंगों पर परीक्षण तीसरे चरण में पहुंच चुका है । कोरोना वैक्सीन के निर्माण में लगी भारत बायोटेक ने सोमवार को देश के सभी लोगों तक इसकी पहुंच स्थापित करने को लेकर सवाल उठाए हैं। भारत बायोटेक ने कोरोना से निजात दिलाने के लिए 130 करोड़ लोगों का टीकाकरण किए जाने को एक चुनौती करार दिया है। भारत बायोटेक इंटरनेशनल लिमिटेड (बीबीआईएल) के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक कृष्णा एला ने कहा कि कंपनी की बायो-सेफ्टी लेवल-3 (बीएसएल-3) सुविधा वर्तमान में सीमित क्षमता की है, लेकिन अगले साल तक इसकी 100 करोड़ की खुराक तक पहुंचने की उम्मीद है

260 करोड़ सिरिंज की होगी जरूरत-
एला ने विदेश मंत्रालय के सहयोग से इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस (आईएसबी) द्वारा आयोजित डेक्सोन संवाद को संबोधित करते हुए कहा कि "हमने कोवैक्सीन के लिए आईसीएमआर के साथ भागीदारी की है और हम कोरोना वैक्सीन निर्माण के तीसरे चरण के परीक्षणों में प्रवेश कर रहे हैं, लेकिन मैं खुश नहीं हूं, क्योंकि यह इंजेक्शन से दी जाने वाली दो-खुराक वाली वैक्सीन है। अगर हमें दो डोज की वैक्सीन का 130 करोड़ आबादी को टीक लगाना है तो हमें 260 करोड़ सिरिंज और सुई की जरूरत होगी।"

नाक से दी जाने वाली वैक्सीन पर हो रहा काम -
एला ने कहा कि हम एक और वैक्सीन पर काम कर रहे हैं। यह ड्रॉप के रूप में नाक के अंदर दी जाने वाली वैक्सीन है । मुझे लगता है कि अगले साल तक हम यह वैक्सीन एक अरब आबादी को उपलब्ध कराएंगे। उन्होंने कहा कि यह चुनौती है कि 130 करोड़ आबादी का टीकाकरण किया जाए ।

क्या ठंड में बढ़ेगा कोरोना -
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटीटी), हैदराबाद के प्रोफेसर एम.विद्यासागर, जो 'कोविड-19 भारतीय राष्ट्रीय सुपरमॉडल कमेटी' के अध्यक्ष भी हैं, उन्होंने कहा कि चुनौती यह है कि क्या उत्तर भारत में ठंड का मौसम विशेष रूप से इस महामारी को बढ़ाता है और क्या हम इसका अनुमान लगा सकते हैं। उन्होंने कहा कि भारत को अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे अन्य देशों की तुलना में महामारी को नियंत्रित करने में अधिक सफलता मिली है, जिनकी मृत्युदर भारत की तुलना में सात से आठ गुना अधिक है।



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दिवाली के बाद घट गए कोरोना के मरीज, ये रहा नया आंकड़ा

नई दिल्ली । दिवाली के बाद सोमवार को देश में कोविड-19 के महज 30,548 नए मामले दर्ज किए गए हैं और यह जुलाई के बाद से दर्ज किया गया सबसे कम आंकड़ा है। बीते 24 घंटे में 435 मौतें हुई हैं, जबकि 43,851 मरीज वायरस को मात देकर ठीक हुए हैं।

रिकवरी रेट में सुधार -
नए आंकड़ों को मिलाते हुए देश में संक्रमितों और मृतकों की संख्या क्रमश: 88,45,127 और 1,30,070 है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में इस वक्त सक्रिय मामलों की संख्या 4,65,478 है। अब तक कुल 82,49,579 मरीज ठीक हो चुके हैं। रिकवरी रेट 93.09 और मृत्यु दर 1.47 फीसदी पर बनी हुई है।

इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने रविवार को 8,61,706 अधिक नमूनों का परीक्षण किया, जिसे मिलाते हुए अब तक किए गए कुल परीक्षणों की संख्या 12,56,98,525 बैठती है। महाराष्ट्र अब भी वायरस से प्रभावित राज्यों की सूची में अव्वल स्थान पर है। यहां कुल मामलों की संख्या 17,47,242 है। यहां सक्रिय मामले 85,889 है और हुई मौतों की संख्या 45,974 है।



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Sunday, 15 November 2020

बीपी कंट्रोल करते हैं ये फल-सब्जियां

खानपान में कई ऐसी चीजें हैं जिनको खाने से ब्लड प्रेशर नियंत्रित रहता है। बीपी कंट्रोल करते हैं ये फल-सब्जियां ।
चुकंदर : इसमें नाइट्रेट की मात्रा अधिक होती है। यह रक्त नलिकाओं में होने वाले दबाव कम करता है। ब्लड फ्लो सही रहने से बीपी सामान्य रहता है।
सेब: जिनका ब्लड प्रेशर लो रहता है। उन्हें एक सेब रोजाना खाना चाहिए। यह ब्लड पे्रशर को नियंत्रित करता है। इससे तुरंत ऊर्जा भी मिलती है।
लहसुन: इसमें एलिसिन नामक तत्व होता है जो कॉलेस्ट्रॉल को नियंत्रण में रखता और इम्युनिटी को बढ़ाता है।
आंवला: सुबह खाली पेट आंवला या इसका जूस लेने से पाचन ठीक रहता है। साथ ही ब्लड प्रेशर भी नियंत्रित रहता है।
पालक: इसमें पोटैशियम, फोलेट व मैग्नीशियम पाया जाता है। जूस, सब्जी के रूप में ले सकते हैं, हाई बीपी में फायदेमंद है
किशमिश: एक मु_ी किशमिश रोजाना खाने से सोडियम का बैलेंस शरीर में बना रहता है।



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दांतों की सेंसिटिविटी के कई कारण, आदतें बदलकर करें बचाव

जंक और फास्ट फूड में कई तरह के कैमिकल्स होते हैं। इसका असर शरीर के सभी अंगों के साथ दांतों पर पड़ता है। दांतों की ऊपरी परत इनेमल के नुकसान होने से सेंसिटिविटी की समस्या होती है।
रात में सोते समय दांतों के कटकटाना, पेंसिल, आलपिन या फिर बर्फ चबाना, तेजी से ब्रश करना, दिनभर खाते रहना और दांतों से नाखून चबाने से कई तरह की परेशानी होती है। दांतों के इनेमल और इससे जुड़ी हड्डियों को नुकसान होता है। स्वीमिंग पूल के पानी में मिले क्लोरीन से भी न केवल दांत पीले होते हैं बल्कि दांतों की ऊपरी हिस्सों को नुकसान होता है। इससे दांतों के अंदर मौजूद सॉफ्ट टिशूज में दर्द-चुभन होती है। दांतों में सेंसिटिविटी की समस्या हो सकती है।
कुछ लोग दिन में कई बार ब्रश करते या हार्ड ब्रश से दबाकर दांतों को साफ करते हैं जिससे वे कमजोर होते हैं। इनेमल को भी नुकसान पहुंचता।
अधिक मीठा और चिपकने वाली चीजें जैसे कैंडीज, चिप्स, क्रीम बिस्किट, जंक फूड आदि खाने से दांतों में सडऩ होती है। बच्चों को ये चीजें अधिक पसंद आती हैं। इसलिए उन्हें सप्ताह में एक बार ही खाने के लिए दें। खाने के बाद ब्रश करवा दें। सोडा या सॉफ्ट ड्रिंक्स पीते हैं तो तुरंत कुल्ला जरूर करें।
विटामिन सी और डी जरूरी
दांतों की हड्डियों के लिए विटामिन डी तो मसूड़ों को स्वस्थ रखने के लिए विटामिन सी जरूरी है। विटामिन सी के लिए खट्टे रसदार फल, हरी सब्जियां और डी के लिए डेयरी प्रोडक्ट अधिक मात्रा में लें। सुबह-शाम ब्रश जरूर करें। अपने मन से कोई दवा न लें। खाने के बाद कुल्ला करना न भूलें।



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