Friday, 29 January 2021

गले में जब हो खिच-खिच

बारिश और ठंड की शुरुआत होते ही ज्यादातर लोग जुकाम (cold), फ्लू (Flu) और गले के इन्फेक्शन (throat infection) की चपेट में आ जाते हैं। ऐसे में गले का इंफेक्शन (infection) बेहद कॉमन बीमारी है। जरा सा ठंडा-गरम खाया नहीं कि सीधे गला इंफेक्शन की चपेट में आ जाता है। कई बार तो गले का इंफेक्शन इतना जबर्दस्त होता है कि आप चाहकर भी कुछ नहीं बोल पाते और खाने की बात तो दूर पानी पीने में गला दर्द करता है। ऐसे में कैसे करें इन बीमारी को दूर जाने जरा-

करें गर्म पानी के गरारे
थ्रोट इन्फेक्शन या कहें कि गला आने पर सबसे पहले गार्गल यानी गरारे सबसे ज्यादा फायदेमंद रहते हैं। दरअसल, नमक मिला गर्म पानी आपके गले में इंफेक्शन की वजह से आ गई सूजन को कम करता है और आराम पहुंचाता है। बेहतर होगा कि जल्दी राहत के लिए आप हर तीन घंटे में गरारे करें।

लेते रहें गोलियां
इंफेक्शन के दौरान आपके लिए कुछ भी खाना-पीना काफी मुश्किल होता है। ऐसे में, बेहतर होगा कि आप अगर कुछ खा-पी नहीं पा रहे हैं, तो कम से कम कुछ गोलियां ही चूसते रहें। इससे आपके मुंह में लार का निर्माण जारी रहेगा, जिससे आपको आराम मिलेगा। आप चाहें, तो इस तरह की गोलियां चूस सकते हैं, जिनमें अदरक फ्लेवर हो। इससे आपके गले को और ज्यादा आराम मिलेगा।

गर्म पेय पदार्थ लें
गले के इंफेक्शन में कुछ भी लिक्विड लेने से भी आपके गले में दर्द होगा। लेकिन बेहतर होगा कि अगर आप थोड़े गैप में कुछ गर्म लिक्विड लेते रहें। और कुछ भी नहीं तो आप थोड़ी-थोड़ी देर में गर्म पानी पीते रहें। इससे आपके गले की सिकाई होगी और आपको आराम मिलेगा। साथ ही, आपके गले में जमा होने वाला बैक्टीरिया भी इक_ा नहीं हो पाएगा।



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जुकाम से परेशान हैं, तो फायदेमंद हो सकती है नई तकनीक 'बैलून साइनुप्लास्टी'

चिकित्सा जगत की नवीनतम उपलब्धि है 'बैलून साइनु-प्लास्टी' (Balloon Sinuplasty)। ये सर्जरी उन रोगियों के लिए सुरक्षित और प्रभावी उपचार है जो साधारण दवाओं से ठीक नहीं हो पाते और साइनुसाइटिस (sinusitus) की तकलीफदेह बीमारी से निजात पाना चाहते हैं। नाक केवल सूंघने के लिए ही नहीं बना् बल्कि ये मनुष्य के शरीर में एसी (वातानुकूलित मशीन) की विंडो के समान है। बाहर से साधारण दिखने वाली नाक वास्तव में अंदर से बहुत पेचीदा बनावट लिए होती है। नाक के दोनों ओर चेहरे की हड्डियां खोखली होती हैं और उनके अंदर ठीक उसी तरह एक मेम्ब्रेन (झिल्ली) होती है जैसे अटैची के अंदर कपड़े या मखमल की लाइनिंग होती है। इसे ही चिकित्सकों ने 'साइनस' (Sinus) का नाम दिया है और मेडिकल की भाषा में इसे 'पेरा-नेजल साइनेसेज' कहते हैं।

इस साइनेसेज में शुद्ध हवा भरी होती है। साइनेसेज में में छिद्र होते हैं जिसे 'ओस्टियम' कहते है। इन्हीं ओस्टियम के माध्यम से साइनेसेज की हवा अंदर आती है और बाहर निकलती है। यानी हम सांस लेते हैं। सामान्यरूप से म्यूकस (बलगम) या अन्य गंदगी इन्हीं छिद्रों से प्रतिदिन हर स्वस्थ इंसान में नाक से बाहर निकलती है। अगर इस मेम्ब्रेन के छिद्रों (ओस्टियम) में बाहरी वातावरण जैसे सर्दी, गर्मी, बरसात, उमस और अन्य इन्फेक्शन, और अंदरूनी एलर्जी से सूजन आ जाए और जुकाम बिगड़ जाए तो 'साइनस/साइनोसाइटिस' जैसे गंभीर रोग हो जाते हैं। इसे सामान्य भाषा में बिगड़ा हुआ जुकाम कहते हैं।

'बैलून साइनुप्लास्टी' सर्जरी उन रोगियों के लिए प्रभावी उपचार है जो साधारण दवाओं से ठीक नहीं हो पाते और साइनुसाइटिस की तकलीफदेह बीमारी से निजात पाना चाहते हैं। इसकी क्रोनिक स्टेज (दीर्घकालिक या जुकाम के बार-बार होना या पुनरावृति की स्थिति) के इलाज के लिए वर्तमान समय में साइनुसाइटिस के 75 प्रतिशत रोगियों का उपचार नई और अधिक प्रभावशाली एंटीबायोटिक, एलर्जी-रोधक औषधियों एवं नाक के स्प्रे के कारण संभव हो गया है। बाकी बचे 25 प्रतिशत रोगियों के उपचार के लिए नई सर्जरी 'बैलून साइनोप्लास्टी' कारगर साबित हुई है। जयपुर में भी ये सर्जरी शुरू हो गई है। बैलून साइनुप्लास्टी के दौरान नाक का ना तो कोई टिशू या हड्डी निकाली जाती है, ना ही रक्त ज्यादा बहता है।

प्रमुख लक्षण
चेहरे पर दर्द, दबाव और जकडऩ, नाक से सांस लेने में कठिनई, गंध या स्वाद का बोध न होना, सिर दर्द, नाक से पीला या हरा बलगम निकलना, तथा थकान, दांत में दर्द, सांस में बदबू आदि हैं।



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बीमारियों को मात देना चाहते हैं, तो करें यह काम

विशेषज्ञों का कहना है कि दर्जनों तरह के घातक वायरस (virus) अपनी ताकत बढ़ा लेते हैं और पहचान और प्रभाव बदल लेते हैं। एक अध्ययन के अनुसार इन्फ्लूएंजा (Influenza) के घातक वायरस तो हर छह महीने से भी कम समय में म्यूटेशन के जरिए अपने ज्यादा ताकतवर रूप में सामने आ रहे हैं और उन पर पुरानी एंटी-वायरस दवाइयों का भी असर नहीं हो रहा है। कई देशों में 'सुपर-बग' के ऐसे ही मामले सामने आए हैं।

लापरवाही और नजरअंदाजी में कभी वायरल का प्रभाव घातक होता है तो कभी यह साधारण तकलीफ देकर जल्द ही विदा हो जाता है। लोगों में वायरल फीवर को लेकर कई तरह की गलतफमियां भी हैं। जैसे जिस बुखार या फीवर में सर्दी-जुकाम के लक्षणों के साथ तेज बुखार हो, उस स्थिति को ही वायरल फीवर मानते हैं। यह सच है कि इस तरह का बुखार भी वायरल फीवर में शामिल है, लेकिन वायरल फीवर (viral fever) के अंतर्गत वायरस से होने वाले कुछ और रोगों जैसे खसरा, वायरल हेपेटाइटिस (Viral hepatitis), चिकन-पॉक्स (chicken pox), गलसुआ आदि को भी शामिल किया जाता है। इन सभी रोगों में बुखार आना संभव है। इसके अलावा बहुत सी परेशानियां बैक्टीरियल इन्फेक्शन (bacterial infection) के कारण होती है।

सबके अंदर है 'जैविक शक्ति'
बै क्टीरियल इन्फेक्शन सदियों से दुनिया में है और आगे भी बने रहेंगे। मनुष्य ही नहीं सभी जीवधारियों को इन संक्रमणों की मार झेलनी पड़ती है लेकिन हममें एक ऐसी जैविक शक्ति है, जो रोगों का प्रतिरोध करती है और इसीलिए इसे रोग प्रतिरोधक या इम्यून पावर कहा जाता है। सभी जीवधारियों के शरीर में एक प्रभावी इम्यून सिस्टम (immune system) होता है जो बीमारियों या रोगाणुओं की घुसपैठ को रोकता है, उन्हें नष्ट कर शरीर को स्वस्थ बनाए रखता है। जब इम्यून सिस्टम में गड़बड़ हो जाती है तो बाहरी रोगवाहक जैसे-बैक्टीरिया, वायरस या फंगस शरीर पर हमला कर उसे रोगी बना देते हैं।

इम्यूनिटी बढ़ाने का 5 स्टेप्स फॉर्मूला
इम्यूनिटी (immunity) को ईश्वर और कुदरत की देन कहा जा सकता है, पर उसे संभालना और विकसित करना हमारी जिम्मेदारी है। एक नवजात को मां के दूध से सबसे पहला पोषण और इम्यूनिटी ही तो मिलती है। इसके आगे इम्यूनिटी को मजबूत बनाने के लिए जीवन भर कुछ न कुछ उपाय करने होते हैं। इम्यूनिटी शरीर की बिना शब्दों की भाषा है जो अपनी ताकत को स्वस्थ शरीर और कमजोरी को बीमारियों के जरिए व्यक्त करती है।

खाने-पीने पर दें ध्यान
अपनी फूड हेबिट्स, फूड टाइप और चॉइस का रिव्यू कीजिए। कोई भी बीमारी के लक्षण दिखें तो सबसे पहले देखिए कि कहीं आपका खानपान तो आपको बीमार नहीं कर रहा। हैल्दी और नैचुरल चीजों को अपनाइए आप अपनी इम्यूनिटी में फर्क खुद ही महसूस होगा।

एक्स्ट्रा करने को 'हां'
इम्यूनिटी कमजोर है तो रूटिन से हटकर कुछ एक्स्ट्रा भी करना होगा। इसके लिए अपने शरीर के अनुसार अनुभवी डॉक्टर्स या किसी विशेषज्ञ सलाह लीजिए। अपना नियमित चैकअप कराइए और जैविक लक्षणों को समझिए। इम्यूनिटी को लेकर अपना ज्ञान बढ़ाइए और सबके साथ बांटिए।

रखें साफ-सफाई
तन और मन की स्वच्छता हर बीमारी को रोकन के लिए पहली सुरक्षा ढाल है। कामों को टालिए मत, आदतों को बदलने का साहस कीजिए। कल कभी नहीं आएगा, सफाई का मोल आज ही जानने में तन-मन और धन का फायदा हैा इससे आप प्रतिरोधात्मक क्षमता बढ़ा सकते हैं।

टेंशन को कहें 'ना'
मन को ठिकाने पर रखें। मानसिक तनाव (mental stress) लगभग हर बीमारी का दोस्त है और इम्यूनिटी का दुश्मन। टेंशन दूर करने के लिए अपने नेगेटिव सोच से बचें और संयमित व्यमवहार करें। ध्यान, योग, प्राणायम और प्रार्थना आपके लिए मददगार होंगे।

जरूर करें व्यायाम
शरीर को सक्रिय रखना सबसे बेहतर उपाय है लेकिन इसे अपने काम की सक्रियता से मत जोडि़ए। पैदल चलिए, साइकिल चलाइए, योग या एरोबिक्स कीजिए या फिर जिम में पसीना बहाइए।

बरतें ये सावधानियां
घर, बाहर और सफर के दौरान सफाई का विशेष ध्यान रखें।

किसी भी तरह के संक्रमण से ग्रस्त हों तो ज्यादा लोगों के संपर्क में न आएं ।

अपने या किसी और के आंख, मुंह और चेहरे को ज्यादा न छुएं।

पानी और आहार की गुणवत्ता को लेकर कोई लापरवाही न बरतें।

काम और यात्रा के दौरान बीमार लोगों के करीब जाने से बचें।

बीमार या संक्रमित लोगों से बात करते समय मुंह ढक लें।

रोग को दबाएं या छुपाएं नहीं, तुरंत डॉक्टर से सलाह और उपचार लें।

सुरक्षा कवच है इम्यूनिटी
सरलतम शब्दों में शरीर की कुदरती ताकत को इम्यूनिटी कहते हैं। हमारे वातावरण और खुद शरीर के अंदर सैकड़ों तरह के असंख्य सूक्ष्म जीव विद्यमान हैं। जब रोगाणु शरीर में प्रवेश करते हैं तो अपनी क्रि याशीलता से वे कई तरह के रोगकारक रसायन बनाते हैं और उन्हें नष्ट करने की कुदरती ताकत शरीर में होती है। यह शक्ति कुछ सीमा तक प्राकृतिक होती है, मगर इसे शारीरिक क्रियाओं द्वारा विकसित किया जा सकता है। यही ताकत सुरक्षा कवच बनकर हानिकारक बैक्टीरिया और वायरस को शरीर में दाखिल होने से रोकने का काम करती है। इम्यूनिटी को प्रभावों के आधार पर विशेषज्ञों ने स्पेसिफिक, एक्टिव, इनएक्टिव और ऑटो इम्यूनिटी जैसे वर्गों में बांटा हैं। स्पेसिफिक इम्यूनिटी में किसी खास बीमारी से लडऩे के लिए एक खास इम्यूनिटी विकसित की जाती है। एक्टिव इम्यूनिटी पैदा करने के लिए बीमारी के बैक्टीरिया (bacteria) या वायरस को एंटीजेन के रूप में प्रवेश कराया जाता है ताकि वह अपने ही विरूद्ध शरीर को एक्टिव करके एंटीबॉडी बना सके।



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Diabetes in Winters: सर्दी में डायबिटीज के मरीज ना करें इन चीजों का सेवन, बढ़ सकता है खतरा

नई दिल्ली। सर्दी के मौसम में ब्लड प्रेशर से लेकर ब्लड शुगर को कंट्रोल करना एक बड़ी चुनौती वाला काम है.। क्योकि इन दोनों के अधिक बढ़ जाने के बाद रोगी को बचा पाना मुकिल हो जाता है। इसलिए इन दिनों में रोगी के इस खतरे से बचाने के लिए कुछ चीजों पर कंट्रोल करना काफी जरूरी है। डायबिटीज मरीजों के लिए ये मौसम सबसे ज्यादा घातक होता है. एक्सपर्ट कहते हैं कि सर्दी में कुछ चीजों का परहेज कर आप काफी हद तक शुगर को कंट्रोल कर सकते हैं. आइए जानते हैं ठंड के मौसम में किन चीजों का परहेज करने से ब्लड शुगर कंट्रोल रहती है।

तला हुआ या मसालेदार फूड- इस मौसम में तली हुई चीजों से दूर रहना चाहिए। आपको ऐसे मौसम में पराठा, मक्के की रोटी, समोसा, पूरी या कचौड़ी जैसी चीजे खाने से परहेज करना चाहिए। सर्दियों में हमारा शरीर की पचाने की क्षमता काफी कमजोर पड़ जाती है, और सर्दी के समय में इन चीजो को पचाना मुश्किल हो जाता है। इसलिए डायबिटीज के रागियों को इन चीजों से ज्यादा सावधान रहना चाहिए।

संतरा- विटामिन-सी से भरपूर संतरा हमारी इम्यूनिटी को बढ़ाने का सबसे अच्छा उपचार माना गया है। लेकिन डायबीज के मरीजों के लिए यह उतना ही खतरनाक है। सर्दी के मौसम में इसका सेवन करने से बचें। खासतौर से बाजार में बिकने वाले पैकेटबंद ऑरेंज जूस का सेवन तो बिल्कुल न करें।

सोडा या हाई शुगर फूड- किसी भी ऐसे फूड या पेय पदार्थ का सेवन न करें जिसमें सोडा या मीठे की मात्रा अत्यधिक पाई जाती हो। बाजार में मिलने वाले कैन सूप, जूस या पैकेटबंद चीजों में इसकी संभावना ज्यादा होती है। इसलिए इन चीजों से दूरी बनाएं।

शहद- शहद कार्बोहाइड्रेट का अच्छा स्रोत माना गया है। ये हमारे शरीर को एनर्जी तो भरपूर देता है, लेकिन डायबिटीज के रोगियों को ठंड में इसे खाने से परहेज करना चाहिए। बाजार में मिलने वाले मिलावटी शहद से भी सावधान रहें और डॉक्टर की सलाह के बाद ही इसका सेवन करें।



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दूध का अधिक मात्रा में सेवन करने से हो सकती है ये खतरनाक बीमारी, स्टडी से हुआ खुलासा

नई दिल्ली। दूध का सेवन करने के सलाह हम घर के बड़े-बूढ़ो से लेकर डॉक्टर्स से भी सुनते आ रहे है कि अच्छी सेहत बनाये रखने के लिये दूध पीना काफी अच्छा होता है। क्योकि दूध में मौजूद कैल्शियम, प्रोटीन, विटामिन D, पोटैशियम समेत अन्य कई पोषक तत्वों के गुण हमारे शरीर की हड्डियों को मजबूत बनाये रखने के साथ कई तरह से सेहत के लिए अच्छे होते है।

अधिक मात्रा में पीना आपकी सेहत के लिये हानिकारक

लेकिन रिसर्चर्स की माने तो दूध को शरीर को स्व स्थ रखने वाला सबसे च्छा उपचार नही माना जा सकता। शोध के अनुसार दूध शरीर के लिये अच्छा है लेकिन जरूरत से ज्यादा पीना उतना ही ज्यादा हानिकारक भी साबित हो सकता है। एक रिसर्चर के मुताबिक, दूध से कैल्शियम मिलता है लेकिन और भी कई चीजें उपलब्ध है जिससे कैल्शियम की कमी दूर की जा सकती है।

केवल दूध पीने से आपकी हड्डियां नहीं होती मजबूत
एक स्टडी के मुताबिक, हड्डियों को मजबूत करने के लिए दूध सही हो, ये जरूरी नही है। जिस देश में दूध का सेवन सबसे अधिक होता है वहां भी फ्रैक्चर के मामले बराबर देखने को मिलते है। इसका मतलब साफ है कि केवल दूध पीने से आपकी हड्डियों में कुछ खास असर नहीं पड़ रहा है। दूध के अलावा और भी कई चीजें ऐसी होती है जो हड्डियों को मजबूत रखने मे मदद करती है।

अधिक मात्रा में दूध पीने से हो सकता है कैंसर

एक स्टडी के मुताबिक, डेयरी प्रोडक्ट का ज्यादा इस्तेमाल कैंसर जैसी समस्याओं को पैदा करता है। पुरुषों में प्रोस्टेट कैंसर और महिलाओं में एंडोमेट्रियल कैंसर होने की ज्यादा संभावना बनती है. हालांकि अभी इस पर और रिसर्च करना बाकी है। बैसे फुल क्रीम मिल्क में सैचुरेटेड फैट अधिक मात्रा में पाया जाता है। साथ ही सोडियम की भी मात्रा पायी जाती है। जो दोनों दिल और ब्लड प्रैशर के लिये हानिकारक है। इसलिए रिसर्चर दूध का सेवन अधिक मात्रा में करने से मना करते है।



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Tuesday, 26 January 2021

INDIAN VACCINE : पड़ोसी देशों को मुफ्त वैक्सीन देकर भारत ने ऐसे बनाई कूटनीतिक बढ़त

कोरोना वैक्सीन महामारी से सुरक्षा के साथ ही वैश्विक वर्चस्व का हथियार भी बन गया है। भारत इस मोर्चे पर अन्य देशों से आगे निकल गया। दूसरी ओर, चीन अपने टीके बेचने के लिए जी तोड़ जतन कर रहा है, लेकिन वैक्सीन पर अविश्वास बड़ी चुनौती है। पिछले दिनों टीकाकरण शुरू करने वाला भारत पड़ोसियों के लिए भी उत्पादन कर रहा है। इसे भारत की कूटनीतिक जीत के रूप में देखा जा रहा है। पिछले बुधवार से भारत सरकार ने बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और मालदीव को मुफ्त टीके भेजे हैं, जबकि मॉरिशस, म्यांमार और सेशेल्स को 32 लाख टीके भेजने की तैयारी है। इसके बाद श्रीलंका और अफगानिस्तान को टीके भेजे जाएंगे।

इस वर्ष की शुरुआत में कंपनी ने 8 करोड़ खुराक का भंडारण कर लिया था। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आग्रह पर गरीब देशों को टीके भेजे जाएंगे। इन देशों को टीके की खेप भेजना भारत की ताकत को दर्शाता है। भारत की सीरम इंस्टीट्यूट विश्व की सबसे बड़ी वैक्सीन निर्माता कंपनी है। महामारी की शुरुआत में ही सीरम ने ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका से साझेदारी कर ली थी। हाल ही सीरम के मुख्यालय में आग से काफी नुकसान हुआ, लेकिन कंपनी का कहना है कि एस्ट्राजेनेका वैक्सीन के उत्पादन पर असर नहीं पड़ेगा।

पाकिस्तान में मंजूरी, पर अनुमति का इंतजार!
नि:शुल्क टीके प्राप्त करने वाले देशों की सूची में पाकिस्तान नहीं है। हालांकि उसने हाल ही एस्ट्राजेनेका वैक्सीन को मंजूरी दी है, लेकिन भारत से संपर्क नहीं किया है। नाम नहीं छापने की शर्त पर पाक अधिकारी ने कहा कि औपचारिक अनुमति का इंतजार कर रहे हैं। फिलहाल पाकिस्तान चीन से पांच लाख टीके लेगा।


आभार जताया : मुफ्त टीके प्राप्त करने वाले देशों ने भारत का आभार व्यक्त किया है। बुधवार को डेढ़ लाख खुराक मिलने पर भूटान के प्रधानमंत्री ने कहा, यह बेशकीमती तोहफा है।
आपूर्ति पर नजर : स्थानीय आपूर्ति पर असर के सवाल पर एक भारतीय अधिकारी का कहना है कि स्थानीय और अन्य देशों की आवश्यकता पर बराबर नजर रखी जा रही है।



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Sunday, 24 January 2021

लंबे समय तक बैठने से पैर सुन्न पड़ जाएं तो हल्दी पेस्ट लगाएं

एक जगह या एक ही स्थिति में लंबे समय तक बैठने से पैर सो जाते (सुन्न) हैं। पैर पर दबाव, थकान या शरीर में विटामिन बी-12, पोटैशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम और आयरन की कमी से भी ऐसी समस्या हो सकती है।
हल्दी का पेस्ट लगाने से इसमें मौजूद पोषक तत्त्व से सुन्नापन व दर्द कम होता है। हल्दी-दूध में शहद मिलाकर पीने से इस समस्या में राहत मिलती है।
तलवे को दबाएं
पैर सुन्न होने पर तलवे को थोड़ी देर के लिए दबाएं। सून्नापन खत्म हो जाएगा। शाम को गुनगुने पानी में पैरों की 10-15 मिनट तक सिकाई करने या रात में पैरों पर सरसों या नरियल के तेल से मालिश करने से भी राहत मिलती है।
चाय के साथ बेसन वाली चीजें खाने से पाचन संबंधी दिक्कत
चाय के साथ नमकीन या पकौड़े खाना हर किसी को पसंद होता है लेकिन इन्हें खाने से दिक्कत हो सकती है। पाचन संबंधी परेशानी होती है। आयुर्वेद में मीठा और नमकीन को एक साथ लेना विरुद्ध आहार की श्रेणी में आता है। इससे सेहत को नुकसान पहुंचता है। चाय के साथ बेसन की चीजें लेने से शरीर में पोषक तत्त्वों की कमी होने लगती है। चाय के साथ ठंडी चीजें जैसे आइसक्रीम, फ्रूट्स या कच्चा सलाद, दही और आयरन फूड्स लेने से अपच भी हो सकती है।



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दो सप्ताह व्यायाम छोड़ने से भी ये 5 नुकसान हो सकते

तेज सर्दी और आलस के कारण कई बार नियमित व्यायाम से लोग दूरी बना लेते हैं। लेकिन ऐसा करने से नुकसान हो सकता है। अप्लाइड फिजियोलॉजी जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार 14 दिन भी व्यायाम छोडऩे मात्र से हृदय व मांसपेशियों को रोज व्यायाम से मिलने वाला लाभ नहीं मिलता है।
1. शुगर लेवल
तीन-चार माह तक वर्कआउट करने के बाद अगर दो सप्ताह तक व्यायाम छोड़ते हैं तो शुगर लेवल अनियंत्रित हो सकता है क्योंकि खाने के बाद शुगर लेवल बढ़ता है जिसे उतक और मांसपेशियां ऊर्जा में बदलते हैं। नियमित व्यायाम से ब्लड शुगर लेवल नियंत्रित रहता है। व्यायाम न करने से भी शुगर लेवल अनियंत्रित हो जाता है।
2. ब्लड प्रेशर अचानक बढ़ता
व्यायाम से ब्लड प्रेशर नियंत्रित रहता है। एक अध्ययन के अनुसार अगर छह माह तक व्यायाम करते हैं और फिर दो सप्ताह छोड़ देते हैं तो बीपी अचानक से बढ़ सकता है। ब्रेन स्ट्रोक की आशंका भी बढ़ती है।
3. एरोबिक्स क्षमता घटती
तीन-चार माह तक वर्कआउट के बाद दो सप्ताह भी व्यायाम छोडऩे से एरोबिक्स क्षमता घट जाती है। दिल, अतिरिक्त दबाव भी सहन नहीं कर पाता है। शरीर में ऑक्सीजन की क्षमता पहले से घट जाती है। इसे वीओटू मैक्स कहते हैं।
4. मांसपेशियां कमजोर होंगी, इंजरी की आशंका
नियमित वर्कआउट से मांसपेशियां मजबूत होती हैं। लचीलापन आता है। हल्की इंजरी से चोट का खतरा नहीं रहता है। लेकिन दो सप्ताह तक भी व्यायाम छोड़ते हैं तो मांसपेशियों पर भी असर पडऩे लगता है और कमजोर होने लगती हैं। इसके बाद अगर वर्कआउट शुरू करते हैं तो इंजरी होने की आशंका कई गुना बढ़ जाती है।
5. शरीर बेडौल होता
लगातार व्यायाम करने से शरीर को सही आकार मिल जाता है। लेकिन कुछ सप्ताह ही व्यायाम छोडऩे और डाइट सही नहीं लेने से शरीर का वजन बढ़ जाता है। शरीर बेडौल भी हो जाता है।



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माइग्रेन है तो रोज पिएं एक कप अंगूर का जूस

इस मौसम में अंगूर आने लगते हैं। अंगूर सेहत के लिए बहुत ही फायदेमंद होते हैं। अगर किसी को माइग्रेन की समस्या है तो उसे रोज एक कप अंगूर का जूस पीना चाहिए। माइग्रेन है तो रोज पिएं एक कप अंगूर का जूस. माइग्रेन के दर्द में आराम मिलता है। अंगूर में प्राकृतिक रूप से एंटी इंफ्लेमेटरी गुण पाए जाते हैं। इसमें स्टैनिन नामक तत्व मिलता है जो माइग्रेन के दर्द में आराम देता है। इसमें भरपूर मात्रा में विटामिन सी मिलता है जो इम्युनिटी बढ़ाने में कारगर होता है। इसमें विटामिन ए भी अधिक मिलता है। अंगूर नियमित खाने से आंखों और त्वचा से जुड़े रोगों से बचाव भी होता है। इसके एंटीऑक्सीडेंट गुण और एंटीइंफ्लेमेटरी गुण किडनी से जुडे रोगों से भी बचाव करते हैं। अंगूर मीठा होता है इसलिए डायबिटीज के रोगी अपने डॉक्टर की सलाह के बाद ही इसे खाएं। इसे खाली पेट खाने से गैस और अपच की समस्या हो सकती है।



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माइग्रेन है तो रोज पिएं एक कप अंगूर का जूस

इस मौसम में अंगूर आने लगते हैं। अंगूर सेहत के लिए बहुत ही फायदेमंद होते हैं। अगर किसी को माइग्रेन की समस्या है तो उसे रोज एक कप अंगूर का जूस पीना चाहिए। माइग्रेन है तो रोज पिएं एक कप अंगूर का जूस. माइग्रेन के दर्द में आराम मिलता है। अंगूर में प्राकृतिक रूप से एंटी इंफ्लेमेटरी गुण पाए जाते हैं। इसमें स्टैनिन नामक तत्व मिलता है जो माइग्रेन के दर्द में आराम देता है। इसमें भरपूर मात्रा में विटामिन सी मिलता है जो इम्युनिटी बढ़ाने में कारगर होता है। इसमें विटामिन ए भी अधिक मिलता है। अंगूर नियमित खाने से आंखों और त्वचा से जुड़े रोगों से बचाव भी होता है। इसके एंटीऑक्सीडेंट गुण और एंटीइंफ्लेमेटरी गुण किडनी से जुडे रोगों से भी बचाव करते हैं। अंगूर मीठा होता है इसलिए डायबिटीज के रोगी अपने डॉक्टर की सलाह के बाद ही इसे खाएं। इसे खाली पेट खाने से गैस और अपच की समस्या हो सकती है।



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माइग्रेन है तो रोज पिएं एक कप अंगूर का जूस

इस मौसम में अंगूर आने लगते हैं। अंगूर सेहत के लिए बहुत ही फायदेमंद होते हैं। अगर किसी को माइग्रेन की समस्या है तो उसे रोज एक कप अंगूर का जूस पीना चाहिए। माइग्रेन है तो रोज पिएं एक कप अंगूर का जूस. माइग्रेन के दर्द में आराम मिलता है। अंगूर में प्राकृतिक रूप से एंटी इंफ्लेमेटरी गुण पाए जाते हैं। इसमें स्टैनिन नामक तत्व मिलता है जो माइग्रेन के दर्द में आराम देता है। इसमें भरपूर मात्रा में विटामिन सी मिलता है जो इम्युनिटी बढ़ाने में कारगर होता है। इसमें विटामिन ए भी अधिक मिलता है। अंगूर नियमित खाने से आंखों और त्वचा से जुड़े रोगों से बचाव भी होता है। इसके एंटीऑक्सीडेंट गुण और एंटीइंफ्लेमेटरी गुण किडनी से जुडे रोगों से भी बचाव करते हैं। अंगूर मीठा होता है इसलिए डायबिटीज के रोगी अपने डॉक्टर की सलाह के बाद ही इसे खाएं। इसे खाली पेट खाने से गैस और अपच की समस्या हो सकती है।



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मूंगफली की एलर्जी बच्चों में अधिक, गंभीर होने पर लो-बीपी व बेहोशी भी

मूंगफली सेहत के लिए फायदेमंद होती है। सर्दियों में इसका उपयोग भी अधिक होता है। लेकिन कुछ लोगों को मूंगफली से एलर्जी होती है। इसे पीनट एलर्जी कहते हैं। छोटे बच्चों में एंटीबॉडीज की कमी होती है। इसलिए उनमें यह समस्या अधिक होती है।
क्या है पीनट एलर्जी
मूंगफली, इससे बने उत्पाद बिस्किट-नमकीन, चक्की या तेल खाने से भी एलर्जी हो जाती है। कुछ लोगों में यह परेशानी जेनेटिक कारणों से भी हो सकती है।
सांस लेने में दिक्कत, चक्कर आना, बेहोशी, लो बीपी होना, धडक़न बढऩा, गले में कसावट, त्वचा पर लालिमा, गले में खुजली आदि।
ऐसे करें बचाव
मूंगफली व इसके तेल के इस्तेमाल से बने हर तरह के उत्पाद न खाएं। इलाज के बाद थोड़ी-थोड़ी मात्रा में लें। इसकी पहचान के लिए तीन जांचें होती हैं। डॉक्टर की सलाह से करवा सकते हैं।
एलर्जी होने पर क्या?
मूंगफली खाने के तुरंत बाद इसके लक्षण दिखते हैं। इसमें तत्काल एंटीएलर्जिक दवा लें। लक्षण गंभीर होने पर कुछ लाइफ सेविंग दवाइयां आती हैं, उन्हें डॉक्टर की सलाह से लें।



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मूंगफली की एलर्जी बच्चों में अधिक, गंभीर होने पर लो-बीपी व बेहोशी भी

मूंगफली सेहत के लिए फायदेमंद होती है। सर्दियों में इसका उपयोग भी अधिक होता है। लेकिन कुछ लोगों को मूंगफली से एलर्जी होती है। इसे पीनट एलर्जी कहते हैं। छोटे बच्चों में एंटीबॉडीज की कमी होती है। इसलिए उनमें यह समस्या अधिक होती है।
क्या है पीनट एलर्जी
मूंगफली, इससे बने उत्पाद बिस्किट-नमकीन, चक्की या तेल खाने से भी एलर्जी हो जाती है। कुछ लोगों में यह परेशानी जेनेटिक कारणों से भी हो सकती है।
सांस लेने में दिक्कत, चक्कर आना, बेहोशी, लो बीपी होना, धडक़न बढऩा, गले में कसावट, त्वचा पर लालिमा, गले में खुजली आदि।
ऐसे करें बचाव
मूंगफली व इसके तेल के इस्तेमाल से बने हर तरह के उत्पाद न खाएं। इलाज के बाद थोड़ी-थोड़ी मात्रा में लें। इसकी पहचान के लिए तीन जांचें होती हैं। डॉक्टर की सलाह से करवा सकते हैं।
एलर्जी होने पर क्या?
मूंगफली खाने के तुरंत बाद इसके लक्षण दिखते हैं। इसमें तत्काल एंटीएलर्जिक दवा लें। लक्षण गंभीर होने पर कुछ लाइफ सेविंग दवाइयां आती हैं, उन्हें डॉक्टर की सलाह से लें।



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मूंगफली की एलर्जी बच्चों में अधिक, गंभीर होने पर लो-बीपी व बेहोशी भी

मूंगफली सेहत के लिए फायदेमंद होती है। सर्दियों में इसका उपयोग भी अधिक होता है। लेकिन कुछ लोगों को मूंगफली से एलर्जी होती है। इसे पीनट एलर्जी कहते हैं। छोटे बच्चों में एंटीबॉडीज की कमी होती है। इसलिए उनमें यह समस्या अधिक होती है।
क्या है पीनट एलर्जी
मूंगफली, इससे बने उत्पाद बिस्किट-नमकीन, चक्की या तेल खाने से भी एलर्जी हो जाती है। कुछ लोगों में यह परेशानी जेनेटिक कारणों से भी हो सकती है।
सांस लेने में दिक्कत, चक्कर आना, बेहोशी, लो बीपी होना, धडक़न बढऩा, गले में कसावट, त्वचा पर लालिमा, गले में खुजली आदि।
ऐसे करें बचाव
मूंगफली व इसके तेल के इस्तेमाल से बने हर तरह के उत्पाद न खाएं। इलाज के बाद थोड़ी-थोड़ी मात्रा में लें। इसकी पहचान के लिए तीन जांचें होती हैं। डॉक्टर की सलाह से करवा सकते हैं।
एलर्जी होने पर क्या?
मूंगफली खाने के तुरंत बाद इसके लक्षण दिखते हैं। इसमें तत्काल एंटीएलर्जिक दवा लें। लक्षण गंभीर होने पर कुछ लाइफ सेविंग दवाइयां आती हैं, उन्हें डॉक्टर की सलाह से लें।



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मूंगफली की एलर्जी बच्चों में अधिक, गंभीर होने पर लो-बीपी व बेहोशी भी

मूंगफली सेहत के लिए फायदेमंद होती है। सर्दियों में इसका उपयोग भी अधिक होता है। लेकिन कुछ लोगों को मूंगफली से एलर्जी होती है। इसे पीनट एलर्जी कहते हैं। छोटे बच्चों में एंटीबॉडीज की कमी होती है। इसलिए उनमें यह समस्या अधिक होती है।
क्या है पीनट एलर्जी
मूंगफली, इससे बने उत्पाद बिस्किट-नमकीन, चक्की या तेल खाने से भी एलर्जी हो जाती है। कुछ लोगों में यह परेशानी जेनेटिक कारणों से भी हो सकती है।
सांस लेने में दिक्कत, चक्कर आना, बेहोशी, लो बीपी होना, धडक़न बढऩा, गले में कसावट, त्वचा पर लालिमा, गले में खुजली आदि।
ऐसे करें बचाव
मूंगफली व इसके तेल के इस्तेमाल से बने हर तरह के उत्पाद न खाएं। इलाज के बाद थोड़ी-थोड़ी मात्रा में लें। इसकी पहचान के लिए तीन जांचें होती हैं। डॉक्टर की सलाह से करवा सकते हैं।
एलर्जी होने पर क्या?
मूंगफली खाने के तुरंत बाद इसके लक्षण दिखते हैं। इसमें तत्काल एंटीएलर्जिक दवा लें। लक्षण गंभीर होने पर कुछ लाइफ सेविंग दवाइयां आती हैं, उन्हें डॉक्टर की सलाह से लें।



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वैक्सीन की दूसरी डोज से पहले इन बातों का रखें ध्यान

कोरोना वायरस से बचाव के लिए देश में दो तरह की वैक्सीन लगाई जा रही हैं, कोवैक्सीन और कोविशील्ड। दोनों ही वैक्सीन की दूसरी खुराक 28 दिन बाद लगनी है। ऐसे में कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है ताकि वैक्सीन सही काम करें। एंटीबॉडीज शरीर में बनें और कोरोना से बचाव हो सके।
हल्के लक्षण
सामान्य बात है
हर वैक्सीन के बाद हल्के लक्षण 24-48 घंटे के लिए आ सकते हैं। इसमें थकान, घबराहट, वैक्सीन लगने वाली जगह लालिमा, हल्का बुखार और जोड़ों में दर्द हो सकता है। इसके बाद भी दूसरा डोज लगवाएं।
कब न लगवाएं
कुछ लोगों में वैक्सीन से सांस में दिक्कत, बीपी लो होने से बेहोशी आदि हो सकती है। यह एनाफलेटिक रिएक्शन होता हैं। ऐसे में दूसरी डोज न लगवाने की सलाह डॉक्टर देते हैं।
अन्य वैक्सीन लगवाएं
हर वैक्सीन अलग तकनीक से बनती है। इसलिए जिन्हें एनाफलेटिक रिएक्शन हुआ वह दूसरी डोज की जगह दूसरी कंपनी की वैक्सीन डॉक्टरी सलाह से लगवा सकते हैं।
24 घंटे बाद लक्षण बढ़ते
हैं तो डॉक्टर को दिखाएं
वैक्सीन के हल्के लक्षणों के लिए डॉक्टर की सलाह से कुछ दवा ले सकते हैं। लेकिन इसके लक्षण 24-48 घंटे बाद भी कम नहीं हो रहे या बढ़ रहे हैं तो तत्काल अपने डॉक्टर को इसकी सूचना दें।
कंपनी न बदलें
हर वैक्सीन की बनावट, बनाने की तकनीक, उसमें उपयोग रसायन और काम करने का तरीका अलग-अलग होते हैं। इसलिए दूसरा डोज उसी कंपनी का ही लगवाएं। नहीं तो वैक्सीन का असर नहीं होगा। शरीर में एंटीबॉडीज नहीं बनेंगे।



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वैक्सीन की दूसरी डोज से पहले इन बातों का रखें ध्यान

कोरोना वायरस से बचाव के लिए देश में दो तरह की वैक्सीन लगाई जा रही हैं, कोवैक्सीन और कोविशील्ड। दोनों ही वैक्सीन की दूसरी खुराक 28 दिन बाद लगनी है। ऐसे में कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है ताकि वैक्सीन सही काम करें। एंटीबॉडीज शरीर में बनें और कोरोना से बचाव हो सके।
हल्के लक्षण
सामान्य बात है
हर वैक्सीन के बाद हल्के लक्षण 24-48 घंटे के लिए आ सकते हैं। इसमें थकान, घबराहट, वैक्सीन लगने वाली जगह लालिमा, हल्का बुखार और जोड़ों में दर्द हो सकता है। इसके बाद भी दूसरा डोज लगवाएं।
कब न लगवाएं
कुछ लोगों में वैक्सीन से सांस में दिक्कत, बीपी लो होने से बेहोशी आदि हो सकती है। यह एनाफलेटिक रिएक्शन होता हैं। ऐसे में दूसरी डोज न लगवाने की सलाह डॉक्टर देते हैं।
अन्य वैक्सीन लगवाएं
हर वैक्सीन अलग तकनीक से बनती है। इसलिए जिन्हें एनाफलेटिक रिएक्शन हुआ वह दूसरी डोज की जगह दूसरी कंपनी की वैक्सीन डॉक्टरी सलाह से लगवा सकते हैं।
24 घंटे बाद लक्षण बढ़ते
हैं तो डॉक्टर को दिखाएं
वैक्सीन के हल्के लक्षणों के लिए डॉक्टर की सलाह से कुछ दवा ले सकते हैं। लेकिन इसके लक्षण 24-48 घंटे बाद भी कम नहीं हो रहे या बढ़ रहे हैं तो तत्काल अपने डॉक्टर को इसकी सूचना दें।
कंपनी न बदलें
हर वैक्सीन की बनावट, बनाने की तकनीक, उसमें उपयोग रसायन और काम करने का तरीका अलग-अलग होते हैं। इसलिए दूसरा डोज उसी कंपनी का ही लगवाएं। नहीं तो वैक्सीन का असर नहीं होगा। शरीर में एंटीबॉडीज नहीं बनेंगे।



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कम उम्र में बाल झड़ने की कई वजहें, रोज शैंपू-लोशन लगाने से बचें व हैल्दी डाइट लें

सवाल- मेरे आगे के बाल कुछ दिनों से तेजी से झड़ रहे हैं जबकि मैं नियमित सिर की मालिश करवाता हूं। यह परेशानी मेरे घर में किसी को नहीं है। उचित सलाह दें?
सूर्य प्रकाश सिंह, 27 वर्ष, भोपाल
बालों के झडऩे के कई कारण हो सकते हैं। शैंपू का अधिक इस्तेमाल, कोई दवा या बीमारी भी हो सकती है।
डाई से खुजली हो तो...
बालों में कैमिकल वाली मेंहदी या डाई लगाने से खुजली होने लगती है। अगर इसको तत्काल बंद नहीं किया तो भी बाल झडऩे शुरू हो सकते हैं।
टायफाइड के बाद समस्या
कुछ बीमारियां जैसे टायफाइड, सोरायसिस, हार्मोनल डिजीज, कीमोथैरेपी और कुछ अन्य दवाइयों से भी बाल गिर सकते हैं। अगर ऐसी समस्या है तो चिकित्सक को इसके बारे में जरूर बताइएं।
हैल्दी डाइट व लाइफ
तनाव से बचें। स्टे्रस से भी बाल गिरते हैं। नियमित व्यायाम करें। हरी सब्जियां, सूखे मेवे ज्यादा खाएं। बार-बार शैंपू व लोशन न बदलें।
ज्यादा तेल न लगाएं
रोज शैंपू व मालिश करने से बचें। सप्ताह में दो दिन शैंपू व मालिश पर्याप्त है। जरूरत पडऩे पर पीआरपी थैरेपी भी इसमें करवा सकते हैं।



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खाने से पहले एक-एक चम्मच चीनी-घी मिलाकर लेने से वजन बढ़ता

वजन बढ़ाने के लिए आहार में जौ, अश्वगंधा को शामिल कर सकते हैं। रात में दो मुठ्ठी जौ को पानी में भिगों दें। अगली सुबह इसके छिलके निकालकर दूध में उबाल लें, जैसे खीर बनाते हैं। जब जौ अच्छे से पक जाए तो इसमें स्वादानुसार चीनी डालें। सूखे मेवे भी मिला सकते हैं। इसके प्रयोग से तेजी से वजन बढ़ता है। इसी तरह रोज खाने से आधा घंटा पहले एक-एक चम्मच घी और चीनी खाएं। इससे भी वजन बढ़ता है। खाने से पहले एक-एक चम्मच चीनी-घी मिलाकर लेने से वजन बढ़ता है
रात में दूध-अश्वगंधा लें
सोने से पहले दो चम्मच अश्वगंधा पाउडर को एक गिलास गुनगुने दूध में रोज लेते हैं तो वजन बढ़ता है। इसमें खजूर या किशमिश मिलाना और भी फायदेमंद है। दूध में शहद मिलाकर लेने से भी वजन बढ़ता है। इसके अलावा भी दूध और केला भी खाना फायदेमंद होता वजन बढ़ाने में। इस के साथ ही तनाव लेने से बचें। दिनचर्या अच्छी रखें।



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बुजुर्गों को रात में क्यों नहीं लेनी चाहिए नींद की गोलियां?

बुढ़ापे में अनिद्रा (कम नींद ) आम परेशानी है। नींद के लिए कई बार बुजुर्ग खुद से या उनके परिजन नींद की दवा दे देते हैं। ऐसा करना हानिकारक हो सकता है। बुजुर्ग रात में एक-दो बार टॉयलेट के लिए जाते हैं। दवा के असर से कई बार गिर जाते हैं। इस उम्र में हड्डियां कमजोर होती हैं, हल्की चोट से टूटजाती हैं। कई शोधों में पाया गया है कि नींद की गोलियां लेने से बुजुर्गों में याद्दाश्त क्षमता भी कम होती है। डिमेंशिया का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए डॉक्टर सलाह देते हैं कि बुजुर्गों को बिना डॉक्टरी सलाह के नींद की दवा नहीं देनी चाहिए।
खाना गले में फंस सकता
नींद की गोली लेने के बाद अगर कोई व्यक्ति खाना खाता है तो खाना गले में फंसने की आशंका अधिक रहती है। इससे सांस लेने में तकलीफ हो सकती है। उसे भर्ती करना पड़ सकता है। कई बार यह जानलेवा भी हो सकता है।
डॉ.सुनील सुथार, जेरियाट्रिक एक्सपर्ट



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HEALTH : युवाओं में तेजी से क्यों बढ़ रहा है कैंसर

कैंसर के प्रका
कैंसर के 100 से ज्यादा प्रकार, लंग्स, ब्रेस्ट, मुंह व प्रोस्टेट का कैंसर सबसे ज्यादा होता है। कोलोरेक्टल, ब्लैडर, लिम्फोमा, ल्यूकेमिया कैंसर भी होता है। पहली और दूसरी स्टेज में कैंसर का फैलाव कम होता है। तीसरी स्टेज में कैंसर शरीर में फैलना शुरू हो जाता है। चौथी स्टेज में कैंसर फैल चुका होता है। इलाज भी मुश्किल हो जाता है। घर में किसी को कैंसर है तो अन्य परिजनों में इसके 20 फीसदी होने की आशंका होती है।

जानिए कैसे फैलता है कैंसर
कैंसर रक्त के जरिए शरीर के अन्य हिस्सों में फैलता है। इसे मेटास्टैसिस कहते हैं, इससे कैंसरस ट्यूमर बनते हैं। पहले इंफेक्शन से बचाने वाले लिम्फ नोड में फैलता है। लिम्फ नोड गले, प्राइवेट पाट्र्स, अंडर आम्र्स में होते हैं। कैंसर हड्डियों, लीवर, फेफड़ों व दिमाग में भी फैलता है।

कैंसर के लक्षण ऐसे पहचानें
धूम्रपान, आरामतलब जीवनशैली, गलत खानपान और मोटापा प्रमुख कारण हैं। अल्ट्रावायलेट किरणें, इंफेक्शन, आनुवांशिक कारणों से भी होता है। कैंसर के लक्षण उसके प्रकार के अनुसार शरीर में दिखते हैं। मरीज में यूरिन में बदलाव, गले में खरांश, निगलने में कठिनाई होती है। शरीर के मस्सों, तिल के रंग व आकार में बदलाव होता है। मरीज का अचानक वजन बढऩा व घटना शुरू हो जाता है। ज्यादा थकान, उल्टी, बार-बार बुखार व बीमार पड़ते हैं तो कैंसर विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए।

कैंसर का इलाज कैसे करते हैं
कीमोथेरेपी, रेडिएशन व सर्जरी से कैंसर का इलाज करते हैं। कीमोथेरेपी से दवाओं से कैंसर सेल्स को खत्म किया जाता है। कुछ कीमो में नसों में सुइयों के जरिए इलाज किया जाता है। इससे शरीर में फैली कैंसर की कोशिकाएं खत्म हो जाती हैं। रेडिएशन के जरिए कैंसर की बढ़ती कोशिकाओं को मारते हैं।
कैंसर से बचाएंगे ये बदलाव
नियमित पत्तेदार सब्जियां, मौसमी फल, मेवे खाएं। शक्कर, प्रोसेस्ड, पैक्ड और जंकफूड से परहेज करें। महिलाएं गर्भनिरोधक गोलियों का प्रयोग लंबे समय तक न करें। वातावरण में फैल रहे प्रदूषण से बचने के उपाय करें। बाहर मास्क लगाकर ही निकलें। नियमित 7-8 घंटे की नींद लें और धूम्रपान न करें। नियमित 45 मिनट की एक्सरसाइज और योग जरूर करें।



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CORONA VACCINE : यह दिक्कतें हैं तो वैक्सीन आपके लिए नहीं

सवाल : क्या 18 साल से कम उम्र के व्यक्ति को टीका लगाया जा सकता है?
कोविड-19 टीकाकरण नियम के अनुसार केवल 18 साल से ऊपर उम्र के ही लोगों को कोरोना वायरस की वैक्सीन लगाई जी सकती है।

सवाल : कोविड 19 वैक्सीन क्या बच्चों के लिए सुरक्षित है?
भारत बायोटेक की कोरोना वैक्सीन कोवैक्सीन को 12 साल से बड़ी उम्र के बच्चों के आपातकालीन इस्तेमाल की अनुमति मिल गई है। भारत के ड्रग कंट्रोलर जनरल ने इस वैक्सीन को 18 साल से कम उम्र के पर क्लीनिकल ट्रायल की अनुमति दी है। इसके तहत जिन भी बच्चों को ये कोरोना वैक्सीन दी जाएगी उनके स्वास्थ्य लक्षणों की निरंतर मॉनिटरिंग की जाएगी।

सवाल : गर्भवती व स्तनपान कराने वाली महिलाएं वैक्सीन लगवा सकती हैं?
नहीं, ऐसी महिलाएं जो 18 साल से ऊपर उम्र की हों और गर्भवती हों या बच्चे को दूध पिला रही हों तो ऐसे में उन्हें अभी कोरोना वायरस की वैक्सीन नहीं लगाई जा सकती है।



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कोरोना वैक्सीन लगवाने जा रहे हैं तो जान लें ये तीन बातें

घबराने की जरूरत नहीं

वैक्सीन लगने के बाद हल्का बुखार, शरीर दर्द, सिरदर्द का मतलब शरीर पर टीके का असर हो रहा है। इसको लेकर घबराने की जरूरत नहीं है। यह अन्य वैक्सीन के साथ भी होता है। यदि समस्या ज्यादा हो तो तुरंत स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र पर संपर्क करना होगा।

वैक्सीन की दूसरी खुराक

वैक्सीन की दूसरी खुराक लेने के दो सप्ताह बाद एंटीबॉडी का सुरक्षात्मक स्तर विकसित होता है। प्रारंभिक चरण में वैक्सीन प्राथमिकता की श्रेणी वाले लोगों को लगेगी। बाद में वैक्सीन सभी को उपलब्ध कराई जाएगी।
हैल्पलाइन नंबर पर बात कर सकते
कोविड-19 व दूसरी वैक्सीन 14-21 दिनों के अंतराल पर ही लगवा सकते हैं। वैक्सीन की एक डोज लगने के बाद एंटीबॉडी विकसित होने में 14 दिन से अधिक का समय लगता है। इसलिए संक्रमित होना गंभीर नहीं है। वैक्सीन के लिए रजिस्ट्रेशन के दौरान मिले हैल्पलाइन नंबर पर बात कर सकते हैं। संक्रमित मरीज रिकवर होने के 14 दिन के बाद ही वैक्सीन लगवा सकता है।

दूसरी कंपनी की वैक्सीन नहीं

वैक्सीन की दूसरी डोज में अन्य कंपनी की लगवा सकते हैं? नहीं, दूसरी खुराक के लिए आप दूसरी कंपनी की वैक्सीन नहीं लगवा सकते हैं। आपको यदि कोवैक्सीन लगी है तो 14 दिन बाद दूसरी डोज में भी वही वैक्सीन लगवानी होगी।



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कोरोना वैक्सीन लगने के बाद ये पांच दिक्कतें हों तो न घबराएं

सामान्य वैक्सीन लगवाने पर हल्का बुखार, सिरदर्द, शरीर दर्द, जी मिचलाना आदि शामिल है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह लक्षण आते हैं। यह शरीर में टीके के प्रभाव को बताता है। यदि यह समस्याएं २-3 दिन से ज्यादा हैं तो तुरंत चिकित्सक की परामर्श लें।

सर्दी-बुखार : वैक्सीन लगने के बाद सर्दी-बुखार आ सकता है। शरीर में कई बार एंटीबॉडी विकसित होने की स्थिति में बुखार आता है।

सिरदर्द : कोरोना वैक्सीन लगने के बाद कई लोगों में सिरदर्द की शिकायत देखने को मिली। हाइपरटेंशन, चिड़चिड़ापन भी देखा गया है।

माइग्रेन : कोरोना वैक्सीन लगने के बाद आधे सिर में दर्द यानी माइग्रेन की समस्या होती है जो तीन-चार दिन में ठीक हो जाता है।

उल्टी, जी मिचलाना : वैक्सीन लगने के बाद गैस्ट्रोइंटसटाइनल सिस्टम पर प्रभाव पड़ता है। इस वजह से उल्टी, जी मिचलाना, पेट दर्द जैसी शिकायतें हो सकती हैं।

मांसपेशियों में दर्द : वैक्सीन लगने के बाद मांसपेशियों में दर्द हो सकता है। यह समस्या ऑक्सफोर्ड-एस्ट्रेजेनेका के परीक्षण के दौरान वॉलंटियर में पायी गई थी।

वैक्सीन से पुरुष नपुंशकता
कोरोना वैक्सीन को लेकर सोशल मीडिया पर कई तरह की अफवाहें चल रही हैं। कोरोना वैक्सीन से पुरुष नपुंशकता या महिलाओं में बांझपन हो जाएगा। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने ट्वीट कर कहा कि ऐसा कोई भी वैज्ञानिक सबूत ऐसा नहीं मिला है, जिससे पता चलता हो कि कोरोना वैक्सीन से महिला या पुरुष में बांझपन हो सकता है। डीएनए में बदलाव की बात भी अफवाह है क्योंकि जन्म के बाद किसी का डीएनए नहीं बदल सकता है।



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ONLINE CLASS SIDE EFFECT : छह माह से बच्चों में सबसे ज्यादा बढ़ रही यह बीमारी

नई दिल्ली. कोरोना महामारी के कारण चल रही ऑनलाइन क्लास बच्चों को बीमार बना रही है। बच्चों का स्क्रीन टाइम दो से तीन गुना तक बढ़ गया है। इससे बच्चों की सेहत से जुड़ी समस्याएं हो रही हैं। दूसरी ओर माता-पिता भी तनाव में हैं। अभिभावकों का कहना है कि उनके बच्चों में तनाव पहले से ज्यादा बढ़ा है। कोरोना संक्रमण दर में कमी के बावजूद वह बच्चों को स्कूल भेजने के पक्ष में नहीं हैं।

बच्चों में ये 8 बीमारियां
44.8 फीसदी बच्चों को ड्राई आई सिंड्रोम
42.7 फीसदी में चिड़चिड़ापन, व्यवहार बदला
41.8 फीसदी बच्चों को नींद से जुड़ी समस्याएं
34.8 फीसदी बच्चों में सिरदर्द की समस्या
32.5 फीसदी बच्चों का वजन बढ़ा
16.7 फीसदी बच्चों की भूख में कमी
12.7 फीसदी बच्चों में फ्रेश होने की समस्या
3.7 फीसदी बच्चों को थकान व शरीर दर्द

यह भी हैं कारण
गलत मुद्रा में बैठना, रोशनी की कमी, मोबाइल स्क्रीन पर ज्यादातर क्लास, स्क्रीन की कम दूरी, लगातार देखना, बिना एंटी ग्लेयर चश्मे के स्क्रीन पर देखना, बच्चों की शारीरिक गतिविधि की कमी।

समस्या होने पर यह करें
तनाव न लें क्योंकि ऑनलाइन क्लास बच्चे के स्कूल से जुड़ाव के लिए है, इसे स्कूल भी स्वीकारते हैं। हाइब्रिड लर्निंग यानी बच्चों को ऑनलाइन क्लास के साथ किताबों के जरिए भी पढ़ाई कराएं। व्यक्तित्व विकास पर ध्यान देने की जरूरत, ताकि बच्चे भविष्य की चुनौतियों से लडऩे में सक्षम बनें। बच्चों के लिए ऑनलाइन पढ़ाई के लिए इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक की गाइडलाइन को फॉलो करें

स्क्रीन टाइम घटाएं, शरीरिक गतिविधि बढ़ाएं
स्क्रीन टाइम बढऩे व अभिभावकों का कोरोना के कारण बाहर खेलने से रोकने की वजह से बच्चों में सेहत से जुड़ी समस्याएं बढ़ी हैं। इससे बच्चों का वजन बढऩे के साथ दिमाग, आंख, व पोश्चर से जुड़ी दिक्कतें बढ़ी हैं। बच्चों की शारीरिक गतिविधि बढ़ाने के साथ पौष्टिक खानपान पर भी ध्यान देने की जरूरत है।



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डरें नहीं...कोरोना वैक्सीन से इस लाइलाज रोग का भी खात्मा!

नई दिल्ली. कोरोना वायरस के खिलाफ बनाई गई एमआरएनए वैक्सीन कैंसर के इलाज में भी बेहद कारगर साबित हो सकती है। रिसर्च के नतीजों के आधार पर वैज्ञानिकों का दावा है कि आरएनए थैरेपी ट्यूमर सेल्स को मारने में कारगर है। यह बहुत प्रभावी तरीके से कैंसर की कोशिकाओं को मारने व उनको विकसित होने से रोकने में सक्षम हो सकती है। यदि आरएनए थैरेपी सफल होती है तो यह कैंसर के अन्य इलाज के तरीकों में सबसे अधिक सुरक्षित होगी। यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाएगी। इससे शरीर में कोई संक्रमण नहीं होगा। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के अनुसार हर साल कैंसर से 7.84 लाख मौतें होती हैं। इससे उम्मीद है कि उनकी जिंदगी को बचाया जा सकेगा।

3 वैक्सीन हैं आरएनए तकनीक पर
एमआरएनए (मोड ऑफ राइबो न्यूक्लिक एसिड) टेक्नोलॉजी पर आधारित स्वदेशी वैक्सीन, फाइजर और मॉडर्ना की वैक्सीन है। अन्य वैक्सीन डीएनए टेक्नोलॉजी पर विकसित की गई हैं।

कैसे काम करेगी आरएनए थैरेपी
इस तकनीक पर बनी कोरोना वैक्सीन 90 फीसदी तक कारगर है। कैंसर के इलाज में थैरेपी के जरिए कोशिकाओं में प्रोटीन को नियंत्रित किया जाएगा। इससे शरीर का मेटाबॉलिज्म संतुलित होगा। कैंसर की कोशिकाएं मेटाबोलिज्म को अनियंत्रित करती हैं। इससे शरीर की रोग प्रतिरोधकत क्षमता कमजोर होती है। इस थैरेपी से कोशिकाओं में आरएनए मजबूत होता है जो मेटाबोलिज्म को बढ़ाता है।
इसलिए दुनिया की नजर
1- आरएनए थैरेपी कैंसर कोशिकाओं को विकसित करने वाले जीन को रोकने में सक्षम।
2- यदि थैरेपी पूरी तरह सफल रही तो आनुवांशिक बीमारियों का भी इलाज संभव।
3- कीमोथैरेपी, सर्जरी, दवाएं कैंसर के शुरुआती स्टेज में ही ज्यादा कारगर, एडवांस स्टेज में नहीं।
4- इलाज के बाद मरीज शरीर में कई तरह की अन्य दिक्कतें भी बढ़तीं। दोबारा होने की आशंका भी रहती।
कैंसर से डरते हैं लोग
- 13.9 लाख मामले दर्ज हुए हैं कैंसर के देश में, नेशनल कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम रिपोर्ट 2020 के अनुसार
- 6.8 लाख पुरुषों को कैंसर के मामले व 7.1 लाख महिलाओं की कैंसर की समस्या
- 96 लाख मौतें डबल्यूएचओ के अनुसार दुनिया भर में कैंसर से हुई
- 70 फीसदी मौतें गरीब देश व भारत जैसे मध्यम आय वाले देशों में
- 7.84 लाख मौतें यानी दुनिया की 8 फीसदी मौतें सिर्फ भारत में हुई।
- 200 फीसदी मौतों की दर ज्यादा है भारत में विकसित देशों के मुकाबले
- 10 कैंसर मरीजों में से 7 की मौत भारत में, विकसित देशों में 3 मौतें
- 4 कैंसर के प्रकार महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर व पुरुषों में फेफड़ों, सिर, गर्दन से जुड़े कैंसर के मामले बढ़े
- 2016 से 2020 तक 10 फीसदी ज्यादा केस दर्ज किए गए हैं।



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आंवले के बीज का पेस्ट लगाने से नकसीर में आराम

आंवले का फल ही नहीं बीज भी गुणकारी होता है। नाक से खून बहने यानी नकसीर में इसका पेस्ट लगाने से आराम मिलता है। आंवले के बीजों को घी में फ्राई कर लें। फिर इसे पानी के साथ पीसकर माथे पर लेप की तरह लगाएं। आंखों में खुजली, जलन, लालिमा होने पर भी आंवले के बीज को पीसकर आंखों के ऊपर और नीचे लगाने से फायदा मिलता है। इसका रस भी रोज सुबह खाली पेट पीना फायदेमंद होता है।
दांत निकलने से जुड़ी दिक्कतों में भी राहत देती मालिश
शि शुओं की मालिश उसके संपूर्ण विकास के लिए जरूरी है। इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ इंफेंट के अनुसार मालिश से शिशु का परिसंचरण और पाचन तंत्र उत्तेजित होता है, जिससे गैस, ऐंठन और कब्ज जैसी समस्याओं से छुटकारा तो मिलता ही है, साथ ही मांसपेशियों का तनाव भी कम होता है। नींद अच्छी आती है और बच्चों में दांत निकलने के समय होने वाली परेशानियां जैसे दर्द, उल्टी, दस्त और बुखार में भी राहत मिलती है।



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Friday, 22 January 2021

Heart Attack Symptoms: दिल का दौरा पड़ने से पहले शरीर में दिखते हैं ये लक्षण, मिलते ही हो जाइए सावधान

नई दिल्ली। सर्दी के समय में हार्टअटैक होने की संभावनाए ज्यादा होती है। क्योकि इन दिनों शरीर का ब्लड गाढ़ा होने लगता है जो अटैक के आने का कारण बनता है। इसके साथ ही आज के समय में लोगों का खान पान भी इसका सबसे बड़ा कारण बन रहा है।. इसकी वजह से शरीर को कई तरह की समस्याएं (Health Problems) झेलनी पड़ती हैं.

हार्ट अटैक आने से पहले शरीर में दिखते हैं ये लक्षण
हार्ट अटैक (Heart Attack) आज के समय में सबसे बड़ी घातक बीमारी हो चुकी है जिसके चपेट में बच्चे से लेकर बूढ़ा इंसान तक आ सकता है। यह बीमारी चानकर आती है लेकिन इसके संकेत हमें काफी पहले से मिलने लगते है जिसके बारे. में पता ना होने के चलते हम उसे नजरअंदाज कर जाते है। और जब दिल का दौरा पड़ता है तो संभलने का भी समय नहीं मिल पाता है और इंसान की मौत (Death) हो जाती है. आज हम आपको बता रहे है हार्ट-अटैक आने से पहले मिलने वाले लक्षण...

सीने में दाईं तरफ उठता है दर्द
यदि सीने में आपको दाईं तरफ दर्द (Chest Pain) या जलन की शिकायत हो रही है तो बिल्कुल भी लापरवाही न बरतें. आपको तुरंत डॉक्टर (Doctor) से संपर्क करना चाहिए।यह हार्ट अटैक (Heart Attack) या हार्ट से जुड़ी किसी और बीमारी (Heart Problem) का संकेत हो सकता है।

कमजोरी (Weakness) और थकान (Fatigue)

यदि आपको काम करने के दौरान या चलने के बाद कमजोरी (Weakness) और थकान (Fatigue) महसूस होने लगती है तो यह हार्ट अटैक आने का लक्षण (Heart Attack Symptoms) हो सकता है. इसलिए बिना देर किए डॉक्टर से जांच करवा लें।

पैर के पंजे और टखने में सूजन
अगर आपके शरीर की नसें फूल रही हों या पैर के पंजे और टखने में सूजन दिखाई दे तो फौरन डॉक्टर के पास जाएं. दरअसल, जब दिल सही तरीके से शरीर में खून की सप्लाई (Blood Supply) नहीं करता है तो ब्लड सप्लाई करने वाली आर्टरी (Artery) फूल जाती है।इसकी वजह से हार्ट अटैक (Heart Attack) भी आ सकता है।

बार-बार चक्कर आना
अगर आपको बार-बार चक्कर आ रहे हैं तो सचेत हो जाएं और डॉक्टर (Doctor) से चेकअप करवाएं। क्योकि यह तभी होता है जब दिल (Heart Attack) के ठीक तरीके से काम नहीं करने पर खून दिमाग तक नहीं पहुंच पाता है. इसके कारण चक्कर आने लगते हैं। यह भी हार्ट अटैक का संकेत (Heart Attack Symptoms) हो सकता है.

सांस लेने में दिक्कत होना
दिल (Heart) के ठीक से काम नहीं करने की वजह से फेफड़ों में खून और ऑक्सीजन की सप्लाई सही तरीके से नहीं हो पाती है, जिसकी वजह से सांस लेने में परेशानी होने लगती है. अगर आपको भी सांस लेने में परेशानी होती है तो डॉक्टर से चेकअप जरूर करवा लें।यह भी हार्ट अटैक (Heart Attack) आने का एक संकेत होता है।



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Thursday, 21 January 2021

LIGHT POLLUTION : जानिए, इंसान और जानवरों के लिए क्यों खतरनाक है रात में रोशनी की जगमग

दुनिया में प्रकाश का अपना महत्व है। दिन में सूर्य इसका प्राकृतिक स्रोत है, लेकिन रात में ऊर्जा के अन्य स्रोतों पर निर्भरता बढ़ जाती है। क्या आप जानते हैं कृत्रिम प्रकाश का अत्यधिक और अवांछित प्रयोग प्रकाश प्रदूषण को जन्म देता है। इंटरनेशनल डार्क स्काई एसोसिएशन का कहना है कि अनावश्यक रोशनी से ऊर्जा, धन और सेहत को नुकसान है। अमरीका में हर वर्ष प्रकाश से 2.1 करोड़ टन कार्बन डाइ ऑक्साइड का उत्सर्जन होता है, जो पारिस्थितिकी तंत्र के साथ ही मानव और जीव-जंतुओं पर बुरा असर डालती है।

इंसानों पर असर
कृत्रिम प्रकाश से इंसान की सर्केडियन क्लॉक यानी आंतरिक घड़ी प्रभावित होती है। जिससे हमारे शरीर में हार्मोन के उत्पादन, कोशिकाओं के विनियमन और अन्य जैविक गतिविधियों को नुकसान पहुंचता है। इसकी वजह से अनिद्रा, अवसाद, हृदय रोग, मधुमेह, मोटापा, स्तन और प्रोस्टेट कैंसर जैसी खतरनाक बीमारियां हो सकती हैं।

जीवों पर असर
परिंदे अक्सर बिजली के प्रकाश से विचलित हो जाते हैं। कई बार इमारतों से टकराकर जख्मी भी हो जाते हैं। चांद की रोशनी के अभ्यस्त प्रवासी समुद्री कछुए और झिंगुर की लय भी बिगड़ जाती है।

क्या है सर्केडियन क्लॉक : यह शरीर की जैव रासायनिक प्रक्रिया या आंतरिक घड़ी है, जो सौर समय के अनुकूल चलती है।



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सर्दियों में उच्च रक्तचाप की परेशानी 23.2 फीसदी तक बढ़ जाती है

अगर आप सोचते हैं कि सर्दियों में केवल जोड़ों के दर्द, सूखी और पपड़ीदार त्वचा या फ्लू की समस्या ही अधिक होती है तो एक बार फिर से सोचेंं। डॉक्टरों का कहना है कि सर्दियों में तापमान में हुई एक डिग्री की बढ़त भी रक्तचाप की उच्च आवृत्ति से जुड़ी हुई है। सर्दियों में उच्च रक्तचाप की परेशानी 23.2 फीसदी तक बढ़ जाती है जो गर्मियों में 10.12 फीसदी तक ही रहती है। सर्दियों में शारीरिक गतिविधियों में कमी और व्यायाम न करने से हमारा दिल भी कम काम करता है जिसका असर उसकी सेहत पर भी पड़ता है। लगातार इसकी अनदेखी करने से हृदय संबंधी परेशानियां खासकर उच्च रक्तचाप की समस्या बढ़ जाती है। हृदय संबंधी परेशानियों के आनुवांशिक कारणों के अलावा भी आलस सर्दियों में दिल के लिए एक बड़ी परेशानी है। जिसके चलते हम शारीरिक गतिविधियों जैसे व्यायाम, वॉकिंग, मेडिटेशन, योग और जिमिंग को टालते रहते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि शरीर में ट्राइग्लिसराइड का स्तर, कोलेस्ट्रॉल का स्तर, बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) और मोटापा बढ जाता है और अंतत: दिल से जुड़ी बीमारियां पनपने लगती हैं।

सर्दियों में उच्च रक्तचाप की परेशानी 23.2 फीसदी तक बढ़ जाती है

विटामिन डी की कमी भी है कारण

सर्दियों के दौरान धूप में ज्यादा देर न बैठने से पराबैंगनी किरणों का हम पर दोहरा प्रभाव पड़ता है। अल्ट्रा वॉयलेट किरणे शरीर के विटामिन ग्रहण करने की प्रक्रिया में बाधक बनती हैं। स्रोटा वैलनेस के फिजिकल हैल्थ एक्सपर्ट प्रवेश गौड़ का कहना है कि यूवी किरणें शरीर में नाइट्रिक ऑक्साइड बनने की प्रक्रिया में बाधक बनती हैं जो त्वचा में रक्त वाहिकाओं को पतला करने में मदद करती हैं। सर्दियों के मौसम में उच्च रक्तचाप का एक बड़ा कारण तापमान में गिरावट, शारीरिक गतिविधियों में कमी, कम पसीना आना और इसके कारण शरीर में सोडियम की मात्रा बढ़ने से शरीर में नमक का स्तर बढ़ जाता है जो रक्त चाप के बढ़ने की वजह बनते हैं।

सर्दियों में उच्च रक्तचाप की परेशानी 23.2 फीसदी तक बढ़ जाती है

शराब कैफीन से भी बचें

इसके अतिरिक्त, नॉरएड्रेनालाईन जैसे हार्मोन जो रक्तचाप को नियंत्रित करने में मदद करते हैं, वे मौसमी बदलाव से प्रभावित होते हें और सर्दियों में रक्तचाप बढऩे में उनकी भी भूमिका होती है। सर्दियों के दौरान डाइट पर नियंत्रण करने से उच्च रक्तचाप संबंधी परेशानियों को कम करने में मदद मिल सकती है। शराब और कैफीन पीने से बचें क्योंकि वे शरीर की आंतरिक ऊर्जा यानी तापमान की तेज गिरावट का कारण बन सकते हैं। शरीर के तापमान में कमी के कारण हाइपोथर्मिया भी हो सकता है।

ऐसे करें अपना बचाव
तेजी से गिरते तापमान और सर्दियों के मौसम में शरीर को गर्म बनाए रखने के लिए अपने शरीर को ज्यादा भारी या मोटे कपड़ों की बजाय पतले कपड़ों परतों की तरह शरीर पर पहनें इससे गर्मी अधिक देर तक बनी रहेगी। वहीं, स्रोटा वैलनेस के चिकित्सा विभाग प्रमुख डॉ. गजराज कौशिक की सलाह है कि सर्दियों में उच्च रक्तचाप की समस्या से बचाव के लिए आवश्यक पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थों से युक्त संतुलित आहार लें। यह भी रक्तचाप को कम कर सकता है। उच्च रक्तचाप से पीडि़त लोगों के लिए अनुशंसित उच्च रक्तचाप (Dietary Approaches to Stop Hypertension or DASH) का पालन करें। आहार में सब्जियों, फलों, कम वसा वाले डेयरी उत्पादों और मध्यम मात्रा में लीन-मीट, मछली, और साबुत अनाज खाना चाहिए।

महत्वपूर्ण तथ्यों पर एक नज़र
-सर्दियों में उच्च रक्तचाप की परेशानी 23.2 फीसदी तक बढ़ जाती है जो गर्मियों में 10.12 फीसदी तक ही रहती है
-डॉक्टर्स का मानना है कि ऐसा सर्दियों में शारीरिक गतिविधियों की कमी के कारण होता है जिसके कारण स्वास्थ्य संबंधी दूसरे मापदंड जैसे ट्राइग्लिसराइड का स्तर, कोलेस्ट्रॉल का स्तर, बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) और मोटापा बढऩे की समस्या हो जाती है
-एक बड़ा कारण सर्दियों के कारण तापमान में गिरावट, शारीरिक गतिविधियों में कमी, कम पसीना आना और इसके कारण शरीर में सोडियम की मात्रा बढऩे जिससे शरीर में नमक का स्तर बढ़ जाता है जैसे कुछ कारक हैं जो रक्त चाप के बढऩे की वजह हैं।
-नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे की मानें तो इससे सबसे ज्यादा प्रभावित बड़े शहरों के 15 से 49 साल की उम्र के पुरुषों का 1/5वां हिस्सा और 6.1 फीसदी महिलाएं व्यापक स्तर पर प्रभावित हैं।



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Wednesday, 20 January 2021

CORONA MYSTERY : कोरोना से ठीक होने के बाद भी छह माह तक रह सकते हैं ये लक्षण

भारत सहित कई देशों में शुरू हुए टीकाकरण के बाद कोरोना के प्रकोप पर नियंत्रण की उम्मीद तो बढ़ गई, लेकिन आशंकाएं अब भी बरकरार हैं। अब लैंसेट मैगजीन में प्रकाशित नया अध्ययन डराने वाला है। शोध में दावा किया गया है कि कोरोना से ठीक होने के बाद भी कई रोगियों में छह माह तक इसके लक्षण नजर आ रहे हैं। दावा यहां तक किया गया है कि ठीक होने के बाद 76 फीसदी लोगों में कोरोना का कोई न कोई लक्षण रह जाता है। यह तब था, जब सभी की रिपोर्ट निगेटिव आ चुकी थी।

63 फीसदी में थकान, अनिद्रा और अवसाद
शोध मे पाया गया कि बीमारी से ठीक होने के बाद भी पीडि़तों में थकान, सुस्ती और मांसपेशियों की कमजोरी जैसी शिकायतें आम हैं। लैंसेट की रिपोर्ट में बताया गया है कि शोध में शामिल 63 फीसदी लोगों में मांसपेशियों में दर्द-जकडऩ, थकान, अनिद्रा और अवसाद जैसे लक्षण दिखे।

किस उम्र के लोगों को ज्यादा खतरा
इस तरह के लक्षण सभी आयु वर्ग के लोगों में दिखे हैं। लेकिन बुजुर्गों को सबसे ज्यादा सावधानी की आवश्यकता है। कोरोना का तनाव या कम आराम से इसका असर भी लंबे समय तक रह सकता है।

लापरवाही पड़ सकती है भारी
देखा जा रहा है कि वैक्सीन बनने के बाद लोग लापरवाही बरतने लगे हैं, जो खतरनाक हो सकता है। अभी मास्क, सैनिटाइजर का प्रयोग, फिजिकल डिस्टेंसिंग को बनाए रखना जरूरी है।



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Tuesday, 19 January 2021

ज्यादातर Heart Attack या Cardiac Arrest सुबह के समय आते हैं बाथरूम में, जानें इसके पीछे का कारण

नई दिल्ली। हार्ट अटैक (Heart Attack) या कार्डियक अरेस्ट (Cardiac Arrest) आज के समय में एक बड़ी समस्या बन चुकी है। इस गंभीर बीमारी के अचानक आने से लोग मौत का शिकार हो जाते है। लेकिन क्या आप जानते है कि ज्यादातर अटैक लोगों को सुबह के समय बाथरूम के अंदर ही आते है। आखिर ऐसा क्यों ? आज हम आपको बता रहे है इसके पीछे का कारण..

बाथरूम में हार्ट अटैक आने के कारण

अक्सर देखा जाता है कि लोगों के हार्ट अटैक के केस सबसे ज्यादा बाथरूम में ही सुनने को मिलते है। दरअसल बाथरूम में हार्ट अटैक (Heart Attack Symptom) आने का सबसे बड़ा कारण होता हैं। प्रेशर का तेजी से बढ़ना जिसके बारे में लोग नही जान पाते। आपको इन वजहों के बारे में जानकारी जरूर होनी चाहिए, ताकि आप खुद को और अपने परिवार को इससे सुरक्षित रख सकें।

प्रेशर से बढ़ती है आशंका

जब हम सुबह के समय टॉयलेट जाते हैं सुबह के समय हमारा ब्लड प्रेशर (High Blood Pressure) थोड़ा हाई होता है और जब हम पेट को साफ करते समय प्रेशर लगाते हैं। और जो लोग इंडियन टॉयलेट का इस्तेमाल करते है उन्हें इसकी समस्या ज्यादा होती है। क्योकि इसमें प्रेशर लगाने की ज्यादा जरूरत पड़ती है। जिससे इसका असर हमारे दिल की धमनियों पर तेजी से पड़ता है। इस वजह से बाथरूम में हार्ट अटैक (Heart Attack In Washroom) आने का खतरा बढ़ जाता है।

हार्ट अटैक से बचाव के तरीके

1. हार्ट अटैक (Heart Attack) के जोखिम के बाद अब हमारा यह जान लेना जरूरी है कि इससे कैसे बचा जा सकता है. अगर आप इंडियन टॉयलेट का इस्तेमाल करते हैं तो ज्यादा देर तक एक ही पोजिशन में न बैठें। इससे आप हार्ट अटैक या कार्डियक अरेस्ट के जोखिम से बच सकते हैं।

2. सुबह के समय जब भी आप स्नान के लिए जाए तो पानी के तापमान शरीर के हिसाब से रखें और सबसे पहले पैरों के तलवों को गीला करें। इसके बाद ही अपने सिर पर पानी डालें। इससे आपके शरीर और बाथरूम के तापमान में संतुलन बन जाएगा।

3. टॉयलेट में पेट साफ करने के लिए ज्यादा जोर ना लगाएं और टॉयलेट में थोड़ा समय लें।

4. नहाते समय अगर आप बाथ टब का इस्तेमाल करते हैं तो इसका असर भी आपकी धमनियों पर पड़ता है. इसलिए अधिक समय तक बाथ टब में न बैठें।

हार्ट अटैक के लक्षण

हार्ट अटैक (Heart Attack Symptom) अचानक आने वाली घातक बीमारी है. इसलिए ये जरूरी है कि आप इसके लक्षण (Heart Attack Symptoms) को पहचान लें ताकि किसी में कभी ऐसे लक्षण दिखें तो आप पहले से सतर्क हो जाए।

1. सीने में तेज दर्द होना

2. सांस लेने में परेशानी आना

3. कमजोरी महसूस करना

4. डायबिटीज (Diabetes) के पेशेंट को कई बार बिना कोई लक्षण दिखे भी हार्ट अटैक आ जाता है. इसे साइलेंट हार्ट अटैक (Silent Heart Attack) कहा जाता है।

5. तनाव और घबराहट होना भी हार्ट अटैक का लक्षण है।

6. चक्कर या उल्टी आना भी हार्ट अटैक का लक्षण हो सकता है।

हार्ट अटैक आने पर तुरंत क्या करें?

अगर किसी में हार्ट अटैक (Heart Attack Ke Upchar) के लक्षण नजर आते हैं तो तुरंत सावधान हो जाएं और ये उपाय करें।

1. किसी व्यक्ति को हार्ट अटैक आए तो उसे सबसे पहले जमीन पर लिटा दें।

2. अगर व्यक्ति ने अधिक टाइट कपड़े पहने हैं तो उन्हें खोल दें।

3. इस बात का ध्यान रखें कि लेटते समय व्यक्ति का सिर थोड़ा ऊपर की ओर हो।

4. एंबुलेंस के लिए तुरंत फोन करें।

5. हाथ-पैर को रगड़ते रहें।



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Sunday, 17 January 2021

CORONA VACCINATION : कोरोना संक्रमित मरीज वैक्सीन की दूसरी डोज लगवा सकता है?

वैक्सीन : जरूरत, सुरक्षा व प्रभाव

सवाल : क्या कोरोना वैक्सीन सभी को लगवाने की जरूरत है?
कोरोना वायरस वैक्सीन स्वैच्छिक है। कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव के लिए वैक्सीन की दोनों खुराक लेनी जरूरी है।

सवाल : यह वैक्सीन बहुत कम समय में बनी है, कितनी सुरक्षित है?
मंजूरी से पहले वैक्सीन के नैदानिक परीक्षणों (क्लिनिकल ट्रायल) से सुरक्षा और प्रभावकारिता डाटा की जांच की जाती है। वैक्सीन के सुरक्षित व प्रभाव की समीक्षा के बाद प्रयोग की मंजूरी दी जाती है।

सवाल : रिकवर हुए लोगों को भी वैक्सीन जरूरी है?
वैक्सीन शरीर में एक मजबूत प्रतिरोधी तंत्र को विकसित करने में मदद करेगी। इसलिए लगवानी जरूरी है।
वैक्सीन : रजिस्ट्रेशन
सवाल : वैक्सीन के लिए रजिस्ट्रेशन जरूरी है?
कोरोना वैक्सीन लगवाने के लिए रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है। आवेदन के परीक्षण के बाद ही चरण, तारीख, समय व बूथ की जानकारी दी जाएगी।

सवाल : रजिस्ट्रेशन के लिए कौन से दस्तावेज लगेंगे?
रजिस्ट्रेशन के लिए आधार कार्ड, मतदाता कार्ड, पैन कार्ड, पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस, पेंशन दस्तावेज में से कोई एक जरूरी है। इसके अलावा स्वास्थ्य बीमा स्मार्ट कार्ड, मनरेगा कार्ड, बैंक या पोस्ट ऑफिस की पासबुक व आइडी कार्ड का प्रयोग भी कर सकते हैं।

सवाल : क्या फोटो आइडी अनिवार्य है?
रजिस्ट्रेशन के बाद सत्यापन के लिए फोटो पहचान पत्र जरूरी है। ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि सही व्यक्ति को ही वैक्सीन लगी है।
सवाल : वैक्सीन लगने के बाद क्या करना होगा?
वैक्सीन लगने के बाद व्यक्ति के मोबाइल पर एसएमएस आएगा। दूसरी डोज लगने के बाद क्यूआर कोड आधारित प्रमाण पत्र मोबाइल पर आएगा। जिसे स्केन कर वैक्सीनेशन की जानकारी आ जाएगी।
वैक्सीन लगने के बाद...

सवाल : वैक्सीन लगने के बाद किन बातों का ध्यान रखना होगा?
वैक्सीन लगने के बाद 30 मिनट तक वहीं आराम करना होगा। यदि बाद में बेचैनी या दिक्कत होती है तो स्वास्थ्य अधिकारी, एएनएम या आशा को सूचना दें। मास्क पहनना, हाथ की सफाई और शारीरिक दूरी जैसे नियमों का पालन अनिवार्य रहेगा।

सवाल : वैक्सीन लगने के बाद कोई साइड इफेक्ट दिखता है?
वैक्सीन लगने के बाद हल्का बुखार, शरीर दर्द, सिरदर्द का मतलब शरीर पर टीके का असर हो रहा है। इसको लेकर घबराने की जरूरत नहीं है। यह अन्य वैक्सीन के साथ भी होता है। यदि समस्या ज्यादा हो तो तुरंत स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र पर संपर्क करना होगा।

सवाल : वैक्सीन के कितने बाद एंटीबॉडी विकसित होंगी?
वैक्सीन की दूसरी खुराक लेने के दो सप्ताह बाद एंटीबॉडी का सुरक्षात्मक स्तर विकसित होता है।
सवाल : क्या हैल्थकेयर व फ्रंटलाइन वर्कर के परिवार को भी वैक्सीन लगेगी?
प्रारंभिक चरण में वैक्सीन प्राथमिकता की श्रेणी वाले लोगों को लगेगी। बाद में वैक्सीन सभी को उपलब्ध कराई जाएगी।
वैक्सीन की दूसरी डोज....

सवाल : दूसरा टीका कब लगाया जा सकता है?
कोविड-19 व दूसरी वैक्सीन 14-21 दिनों के अंतराल पर ही लगवा सकते हैं।

सवाल : वैक्सीन की पहली खुराक के बाद कोई संक्रमित होता है तो क्या करे?
वैक्सीन की एक डोज लगने के बाद एंटीबॉडी विकसित होने में 14 दिन से अधिक का समय लगता है। इसलिए संक्रमित होना गंभीर नहीं है। वैक्सीन के लिए रजिस्ट्रेशन के दौरान मिले हैल्पलाइन नंबर पर बात कर सकते हैं।

सवाल : क्या वैक्सीन की दूसरी डोज में अन्य कंपनी की लगवा सकते हैं?
नहीं, दूसरी खुराक के लिए आप दूसरी कंपनी की वैक्सीन नहीं लगवा सकते हैं। आपको यदि कोवैक्सीन लगी है तो 14 दिन बाद दूसरी डोज में भी वही वैक्सीन लगवानी होगी।

सवाल : संक्रमित मरीज वैक्सीन लगवा सकता है?
नहीं, संक्रमित मरीज रिकवर होने के 14 दिन के बाद ही वैक्सीन लगवा सकता है।



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WHY COVAXIN : महंगी, बिना क्लिनिकल ट्रायल डाटा के ही कोवैक्सीन का क्यों टीकाकरण शुरू!

नई दिल्ली. कोरोना का टीकाकरण अभियान शुरू हो रहा है। इसको लेकर औषध महानियंत्रक यानी डीसीजीआई ने सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की कोविशील्ड व भारत बायोटेक के स्वदेशी वैक्सीन कोवैक्सीन को मंजूरी के बाद टीकाकरण शुरू हो रहा है। शुरू से ही विवादों में रही कोवैक्सीन को लेकर अब सवाल उठ रहे हैं कि महंगी होने के अलावा वैक्सीन को 'बैकअप' (BACKUP VACCINE) के रूप में प्रयोग की मंजूरी थी तो इसका सीधे टीकाकरण में शामिल क्यों किया जा रहा है? ऐसे में फ्रंटलाइन वॉरियर्स के पास विकल्प नहीं कि कौन सी वैक्सीन लगवाएंगे?

डीसीजीआई डॉ. वीजी सोमानी (DCGI DR. V G SOMANI) ने कोवैक्सीन को मंजूरी देने के बाद कॉन्फ्रेंस में कहा था कि जिन लोगों को टीके लगाए जाएंगे, उन्हें क्लीनिकल ट्रायल का हिस्सा माना जाएगा। ऐसे में सवाल है कि क्या कंसेंट फॉर्म में इसका विस्तृत विवरण होगा? क्या कोई नियंत्रण समूह होगा? इस ट्रायल के डेटा का उपयोग कहां किया जाएगा? वे अधिकार जो सामान्य तौर पर किसी क्लीनिकल ट्रायल के वॉलंटियर को मिलते हैं, क्या वही अधिकार कोवैक्सीन लगवाने वाले लोगों को मिलेंगे?

कितनी सुरक्षित व प्रभावशाली (HOW MUCH SECURE COVAXIN VACCINE)
भारत बायोटेक के दूसरे चरण के क्लीनिकल ट्रायल के डाटा रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं हुई है। ऐसे में कैसे यह तय कर लिया गया कि कोवैक्सीन सुरक्षित व प्रभावशाली (SECURITY AND EFFICASY RATE )है? दूसरी ओर भारत बायोटेक ने भी कहा था कि उम्मी है कि कोवैक्सीन 60 फीसदी प्रभावशाली होगी। इसका क्या आधार है।
महंगी...प्रभावशीलता का पता नहीं (COVAXIN IS COSTLY)
कोवैक्सीन की कीमत करीब 900 रुपए होगी। दूसरी ओर इसके क्लिनिकल ट्रायल का डाटा नहीं आया है। इस वजह से इसकी प्रभावशीलता यानी एफिकेसी रेट भी पता नहीं है कि यह कितनी प्रभावी होगी। ऐसे में सवाल उठता है कि जब सरकार के पास 200 रुपए प्रति डोज की कोविशील्ड वैक्सीन उपलब्ध थी तो इस वैक्सीन को पहले चरण में शामिल क्यों किया।

सीरम पर भी सवाल (COVISHIELD SUSPECTED)
सीरम इंस्टिट्यूट की वैक्सीन (SERUM VACCINE COVISHIELD) के तीसरे चरण के परीक्षण के दौरान एक वॉलिंटयर ने न्यूरोलॉजिकल समस्या की शिकायत की थी। साथ ही, कंपनी पर पांच करोड़ रुपये के जुर्माने के लिए याचिका दायर की थी। इसके बाद सीरम ने उस वॉलंटियर पर ही मानहानि का मामला दायर करने की धमकी दी थी। क्या डीसीजीआइ ने उस पर साइड इफेक्ट को लेकर कैसे संतुष्ट हो गया कि उसक समस्या वैक्सीन से जुड़ी हुई नहीं थी?



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CORONA VACCINE : साइड इफेक्ट...यानी कोरोना वैक्सीन का प्रभाव हो रहा है

नई दिल्ली . सामान्य वैक्सीन लगवाने पर यह लक्षण आते हैं। यह शरीर में टीके के प्रभाव को बताता है। यदि यह समस्याएं 2-3 दिन से ज्यादा हैं तो तुरंत चिकित्सक की परामर्श लें।

ये हैं साइड इफेक्ट
सर्दी-बुखार
वैक्सीन लगने के बाद सर्दी-बुखार आ सकता है। शरीर में कई बार एंटीबॉडी विकसित होने की स्थिति में बुखार आता है।

सिरदर्द
कोरोना वैक्सीन लगने के बाद कई लोगों में सिरदर्द की शिकायत देखने को मिली। हाइपरटेंशन, चिड़चिड़ापन भी देखा गया है।

माइग्रेन
कोरोना वैक्सीन लगने के बाद आधे सिर में दर्द यानी माइग्रेन की समस्या होती है जो तीन-चार दिन में ठीक हो जाता है।

उल्टी, जी मिचलाना
वैक्सीन लगने के बाद गैस्ट्रोइंटसटाइनल सिस्टम पर प्रभाव पड़ता है। इस वजह से उल्टी, जी मिचलाना, पेट दर्द जैसी शिकायतें हो सकती हैं।

मांसपेशियों में दर्द : वैक्सीन लगने के बाद मांसपेशियों में दर्द हो सकता है। यह समस्या ऑक्सफोर्ड-एस्ट्रेजेनेका के परीक्षण के दौरान वॉलंटियर में पायी गई थी।

ये अफवाहें भी हैं
कोरोना वैक्सीन को लेकर सोशल मीडिया पर कई तरह की अफवाहें चल रही हैं। कोरोना वैक्सीन से पुरुष नपुंशकता या महिलाओं में बांझपन हो जाएगा। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने ट्वीट कर कहा कि ऐसा कोई भी वैज्ञानिक सबूत ऐसा नहीं मिला है, जिससे पता चलता हो कि कोरोना वैक्सीन से महिला या पुरुष में बांझपन हो सकता है। डीएनए में बदलाव की बात भी अफवाह है क्योंकि जन्म के बाद किसी का डीएनए नहीं बदल सकता है।



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Friday, 15 January 2021

रोज 5 मिनट एक्यूप्रेशर रोलर घुमाने से पेट व पैंक्रियाज रोगों में आराम मिलता है

एक्यूप्रेशर से खून का प्रवाह शरीर में बढ़ता है और उससे कई बीमारियों में राहत मिलती है। एक्यूप्रेशर रोलर एक आम उपकरण है। इसको हथेलियों, पैरों या शरीर पर घुमाने से काफी फायदा होता है। शाम को शरीर पर घुमाने से तनाव कम होता और नींद भी अच्छी आती है। एक्यूप्रेशर रोलर की मदद से दर्द वाली मांसपेशियों पर मालिश करने से वहां रक्त संचार बढ़ता, दर्द कम होता, ऐंठन में राहत मिलती है।
ब्लड शुगर नियंत्रित रहता
पैरों पर कई तंत्रिकाएं और प्रेशर पॉइंट्स सीधे अग्नाशय (पैनक्रियाज) से जुड़े होते हैं। जब रोलर पर तलवों को हल्के से घुमाते हैं तो पैंक्रियाज में हार्मोन्स का स्त्राव सही होता है। इसे पांच-पांच मिनट सुबह-शाम घुमाएं।
लंबे समय से पाचन की दिक्कत रहती है तो रोज तलवों में रोलर घुमाने से गैस, अपच, पेट में संक्रमण से राहत मिलती है। साथ ही पेट से जुड़ी अन्य बीमारियों से बचाव होता है। जिन्हें मानसिक रोग, ब्लड प्रेशर की समस्या है, उन्हें भी राहत मिलती है।
अनिद्रा से बचाव जिन्हें अनिद्रा की समस्या रहती है उन्हें सोने से पहले तलवों पर रोलर घुमाना चाहिए। इससे राहत मिलेगी। जल्दी नींद आती है। इससे पैरों की नसों को भी आराम मिलता है।
- डॉ.पीयूष त्रिवेदी, एक्यूप्रेशर एक्सपर्ट



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मैटर्नल मार्कर टेस्ट: अधिक उम्र में मां बनने वाली महिलाओं के लिए जरूरी

मैटर्नल मार्कर टेस्ट अधिक उम्र में मां बनने वाली महिलाओं के लिए जरूरी है। अधिक उम्र (32 वर्ष के बाद) में मां बनने वाली महिलाओं के शिशुओं में डाउन सिंड्रोम जैसी मानसिक व शारीरिक बीमारियों की आशंका अधिक होती है। ऐसे में डॉक्टर की सलाह से मैटर्नल मार्कर टेस्ट करवाना चाहिए। इससे पता चल जाता है कि भ्रूण को कोई जेनेटिक बीमारी तो नहीं है। यह जांच उन्हें भी करवानी चाहिए जिन्हें खुद या पति को डाउन सिंड्रोम जैसी कोई दूसरी बीमारी है। जिस महिला का 5-6 बार से अधिक गर्भपात हो चुका है, उसे भी यह जांच करानी चाहिए। जिनके परिवार में किसी को मेंटल डिजीज या लो आइक्यू की समस्या है। उन्हें भी गर्भधारण के दौरान डॉक्टर की सलाह से यह जांच करवानी चाहिए। इसमें डुअल, ट्रिपल और क्वाड्रपल मार्कर, तीन जांचें होती हैं। इसमें से एक जांच कराने की जरूरत रहती है। -डॉ. मेघा. एस. शास्त्री, स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ



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विंटर एग्जिमा: ऐसे बच्चों को नहलाने से पहले तेल न लगाएं

छोटे बच्चों में अक्सर हल्की सर्दी से भी त्वचा फटने या लालिमा की समस्या हो जाती है। इसे विंटर या एटोपिक एग्जिमा कहते हैं। ऐसे बच्चों की त्वचा में वसा कम होती है जो नमी को बनाए रखती है। त्वचा में नमी की कमी होने से ऐसा हो जाता है। जिन बच्चों के अभिभावकों में एलर्जिक रायनाइटिस, सांस और दमा की जेनेटिक हिस्ट्री व एलर्जी है उनमें भी यह परेशानी होती है। इससे बचाव के लिए नहाने से पहले बच्चों को कोई तेल न लगाएं। इससे त्वचा नमी नहीं सोखती है। लेकिन नहाने के तत्काल बाद नारियल तेल या गिल्सरीन लगाएं। ज्यादा गर्म पानी से बच्चों को न नहलाएं। ऊनी कपड़़े पहनाने से पहले सूती कपड़े पहनाएं। साथ ही बच्चों को मच्छरों से भी बचाएं। जिन बच्चों को इस तरह की एलर्जी होती है। मच्छरों के काटने से भी इस तरह की दिक्कत हो सकती है। डॉ. अमित तिवारी, त्वचा रोग विशेषज्ञ, जयपुर



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Thursday, 14 January 2021

वर्क फ्रॉम होम से भी युवाओं में बढ़ी बीमारियां, पारंपरिक खानपान व सही दिनचर्या से बचाव

सही दिनचर्या और पारंपरिक खानपान से दूरी, तनाव भरे काम व नशे की लत से कई युवाओं में पहले से ही गंभीर बीमारियों का खतरा था। लेकिन लॉकडाउन व वर्क फ्रॉम होम से बीमारियों का खतरा और बढ़ गया है। इसकी मुख्य वजह घर-ऑफिस के बीच तालमेल का अभाव, लंबे समय तक बैठे रहना, हैवी डाइट, कम पानी पीना और शारीरिक गतिविधियों में कमी है।
तनाव व याद्दाश्त की समस्या
घर से काम करने पर तनाव अधिक होता है। घर और ऑफिस के बीच तालमेल बैठाने में दिक्कत होती है। इससे अनिद्रा और एंजाइटी बढ़ रही है। साथ ही शरीर में हार्मोनल बैलेंस बिगडऩे से भी कई दिक्कतें हो रही हैं।
शारीरिक गतिविधियां न होना भी प्रमुख कारण
युवाओं में खराब दिनचर्या से शारीरिक गतिविधियां कम हुई हैं। ऑफिस जाने से सही दिनचर्या बनी रहती, माहौल बदलता है। वहीं वर्कफ्रॉम होम से इसमें भी कमी आई है। व्यायाम न करने से मेटाबॉलिज्म बढ़ता और इससे मोटापा, हाइपरटेंशन, टाइप-2 डायबिटीज, हृदय व हड्डी से जुड़े रोगों में बढ़ोत्तरी होती है।
बैठने का तरीका बदलें
वर्कफ्रॉम होम है तो जंक-फास्ट फूड्स न खाएं। इसमें कैलोरी ज्यादा होती है। मोटापा बढ़ता है। कोई नशा करते हैं तो इसे छोडऩे के लिए अच्छा समय है, कोशिश करें। वर्क फ्रॉम होम में भी ऑफिस की तरह टेबल-चेयर पर बैठकर काम करें। हर आधे घंटे पर उठकर टहलें। पानी पीएं।
स्थानीय और मौसमी चीजें डाइट में ज्यादा शामिल करें
युवाओं को पारंपरिक, स्थानीय और मौसमी चीजें अधिक खानी चाहिए। अभी आंवला, पालक, बथुआ, पत्तेदार चीजें ज्यादा खाएं। खाने में स्थानीय चीजें जैसे चावल, दाल, रोटी, दही, छाछ, राबड़ी आदि खाएं। कोशिश करें कि जहां रहते हैं वहां की पारंपरिक ही चीजें ही खाएं। ये बीमारियों से बचाते हैं।
नींद की कमी से बीमारियों की आशंका अधिक
यु वा किसी दिनचर्या या नियम में बंधने को तैयार नहीं होते हैं। इससे उनकी नींद का चक्र बिगड़ जाता है। डे-नाइट शिफ्ट से बायोलॉजिकल क्लॉक बिगड़ती है। वहीं वर्कफ्रॉम होम से सोने-उठने का कोई समय निर्धारित नहीं रहता है। कई शोधों में देखा गया है कि लॉकडाउन के बाद युवाओं की नींद में कमी हो गई है। पर्याप्त नींद नहीं ले पा रहे हैं। शारीरिक-मानसिक परेशानियां हो रही हंै।



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वर्क फ्रॉम होम से भी युवाओं में बढ़ी बीमारियां, पारंपरिक खानपान व सही दिनचर्या से बचाव

सही दिनचर्या और पारंपरिक खानपान से दूरी, तनाव भरे काम व नशे की लत से कई युवाओं में पहले से ही गंभीर बीमारियों का खतरा था। लेकिन लॉकडाउन व वर्क फ्रॉम होम से बीमारियों का खतरा और बढ़ गया है। इसकी मुख्य वजह घर-ऑफिस के बीच तालमेल का अभाव, लंबे समय तक बैठे रहना, हैवी डाइट, कम पानी पीना और शारीरिक गतिविधियों में कमी है।
तनाव व याद्दाश्त की समस्या
घर से काम करने पर तनाव अधिक होता है। घर और ऑफिस के बीच तालमेल बैठाने में दिक्कत होती है। इससे अनिद्रा और एंजाइटी बढ़ रही है। साथ ही शरीर में हार्मोनल बैलेंस बिगडऩे से भी कई दिक्कतें हो रही हैं।
शारीरिक गतिविधियां न होना भी प्रमुख कारण
युवाओं में खराब दिनचर्या से शारीरिक गतिविधियां कम हुई हैं। ऑफिस जाने से सही दिनचर्या बनी रहती, माहौल बदलता है। वहीं वर्कफ्रॉम होम से इसमें भी कमी आई है। व्यायाम न करने से मेटाबॉलिज्म बढ़ता और इससे मोटापा, हाइपरटेंशन, टाइप-2 डायबिटीज, हृदय व हड्डी से जुड़े रोगों में बढ़ोत्तरी होती है।
बैठने का तरीका बदलें
वर्कफ्रॉम होम है तो जंक-फास्ट फूड्स न खाएं। इसमें कैलोरी ज्यादा होती है। मोटापा बढ़ता है। कोई नशा करते हैं तो इसे छोडऩे के लिए अच्छा समय है, कोशिश करें। वर्क फ्रॉम होम में भी ऑफिस की तरह टेबल-चेयर पर बैठकर काम करें। हर आधे घंटे पर उठकर टहलें। पानी पीएं।
स्थानीय और मौसमी चीजें डाइट में ज्यादा शामिल करें
युवाओं को पारंपरिक, स्थानीय और मौसमी चीजें अधिक खानी चाहिए। अभी आंवला, पालक, बथुआ, पत्तेदार चीजें ज्यादा खाएं। खाने में स्थानीय चीजें जैसे चावल, दाल, रोटी, दही, छाछ, राबड़ी आदि खाएं। कोशिश करें कि जहां रहते हैं वहां की पारंपरिक ही चीजें ही खाएं। ये बीमारियों से बचाते हैं।
नींद की कमी से बीमारियों की आशंका अधिक
यु वा किसी दिनचर्या या नियम में बंधने को तैयार नहीं होते हैं। इससे उनकी नींद का चक्र बिगड़ जाता है। डे-नाइट शिफ्ट से बायोलॉजिकल क्लॉक बिगड़ती है। वहीं वर्कफ्रॉम होम से सोने-उठने का कोई समय निर्धारित नहीं रहता है। कई शोधों में देखा गया है कि लॉकडाउन के बाद युवाओं की नींद में कमी हो गई है। पर्याप्त नींद नहीं ले पा रहे हैं। शारीरिक-मानसिक परेशानियां हो रही हंै।



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वर्क फ्रॉम होम से भी युवाओं में बढ़ी बीमारियां, पारंपरिक खानपान व सही दिनचर्या से बचाव

सही दिनचर्या और पारंपरिक खानपान से दूरी, तनाव भरे काम व नशे की लत से कई युवाओं में पहले से ही गंभीर बीमारियों का खतरा था। लेकिन लॉकडाउन व वर्क फ्रॉम होम से बीमारियों का खतरा और बढ़ गया है। इसकी मुख्य वजह घर-ऑफिस के बीच तालमेल का अभाव, लंबे समय तक बैठे रहना, हैवी डाइट, कम पानी पीना और शारीरिक गतिविधियों में कमी है।
तनाव व याद्दाश्त की समस्या
घर से काम करने पर तनाव अधिक होता है। घर और ऑफिस के बीच तालमेल बैठाने में दिक्कत होती है। इससे अनिद्रा और एंजाइटी बढ़ रही है। साथ ही शरीर में हार्मोनल बैलेंस बिगडऩे से भी कई दिक्कतें हो रही हैं।
शारीरिक गतिविधियां न होना भी प्रमुख कारण
युवाओं में खराब दिनचर्या से शारीरिक गतिविधियां कम हुई हैं। ऑफिस जाने से सही दिनचर्या बनी रहती, माहौल बदलता है। वहीं वर्कफ्रॉम होम से इसमें भी कमी आई है। व्यायाम न करने से मेटाबॉलिज्म बढ़ता और इससे मोटापा, हाइपरटेंशन, टाइप-2 डायबिटीज, हृदय व हड्डी से जुड़े रोगों में बढ़ोत्तरी होती है।
बैठने का तरीका बदलें
वर्कफ्रॉम होम है तो जंक-फास्ट फूड्स न खाएं। इसमें कैलोरी ज्यादा होती है। मोटापा बढ़ता है। कोई नशा करते हैं तो इसे छोडऩे के लिए अच्छा समय है, कोशिश करें। वर्क फ्रॉम होम में भी ऑफिस की तरह टेबल-चेयर पर बैठकर काम करें। हर आधे घंटे पर उठकर टहलें। पानी पीएं।
स्थानीय और मौसमी चीजें डाइट में ज्यादा शामिल करें
युवाओं को पारंपरिक, स्थानीय और मौसमी चीजें अधिक खानी चाहिए। अभी आंवला, पालक, बथुआ, पत्तेदार चीजें ज्यादा खाएं। खाने में स्थानीय चीजें जैसे चावल, दाल, रोटी, दही, छाछ, राबड़ी आदि खाएं। कोशिश करें कि जहां रहते हैं वहां की पारंपरिक ही चीजें ही खाएं। ये बीमारियों से बचाते हैं।
नींद की कमी से बीमारियों की आशंका अधिक
यु वा किसी दिनचर्या या नियम में बंधने को तैयार नहीं होते हैं। इससे उनकी नींद का चक्र बिगड़ जाता है। डे-नाइट शिफ्ट से बायोलॉजिकल क्लॉक बिगड़ती है। वहीं वर्कफ्रॉम होम से सोने-उठने का कोई समय निर्धारित नहीं रहता है। कई शोधों में देखा गया है कि लॉकडाउन के बाद युवाओं की नींद में कमी हो गई है। पर्याप्त नींद नहीं ले पा रहे हैं। शारीरिक-मानसिक परेशानियां हो रही हंै।



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सही दिनचर्या और पारंपरिक खानपान से दूरी, तनाव भरे काम व नशे की लत से कई युवाओं में पहले से ही गंभीर बीमारियों का खतरा था। लेकिन लॉकडाउन व वर्क फ्रॉम होम से बीमारियों का खतरा और बढ़ गया है। इसकी मुख्य वजह घर-ऑफिस के बीच तालमेल का अभाव, लंबे समय तक बैठे रहना, हैवी डाइट, कम पानी पीना और शारीरिक गतिविधियों में कमी है।
तनाव व याद्दाश्त की समस्या
घर से काम करने पर तनाव अधिक होता है। घर और ऑफिस के बीच तालमेल बैठाने में दिक्कत होती है। इससे अनिद्रा और एंजाइटी बढ़ रही है। साथ ही शरीर में हार्मोनल बैलेंस बिगडऩे से भी कई दिक्कतें हो रही हैं।
शारीरिक गतिविधियां न होना भी प्रमुख कारण
युवाओं में खराब दिनचर्या से शारीरिक गतिविधियां कम हुई हैं। ऑफिस जाने से सही दिनचर्या बनी रहती, माहौल बदलता है। वहीं वर्कफ्रॉम होम से इसमें भी कमी आई है। व्यायाम न करने से मेटाबॉलिज्म बढ़ता और इससे मोटापा, हाइपरटेंशन, टाइप-2 डायबिटीज, हृदय व हड्डी से जुड़े रोगों में बढ़ोत्तरी होती है।
बैठने का तरीका बदलें
वर्कफ्रॉम होम है तो जंक-फास्ट फूड्स न खाएं। इसमें कैलोरी ज्यादा होती है। मोटापा बढ़ता है। कोई नशा करते हैं तो इसे छोडऩे के लिए अच्छा समय है, कोशिश करें। वर्क फ्रॉम होम में भी ऑफिस की तरह टेबल-चेयर पर बैठकर काम करें। हर आधे घंटे पर उठकर टहलें। पानी पीएं।
स्थानीय और मौसमी चीजें डाइट में ज्यादा शामिल करें
युवाओं को पारंपरिक, स्थानीय और मौसमी चीजें अधिक खानी चाहिए। अभी आंवला, पालक, बथुआ, पत्तेदार चीजें ज्यादा खाएं। खाने में स्थानीय चीजें जैसे चावल, दाल, रोटी, दही, छाछ, राबड़ी आदि खाएं। कोशिश करें कि जहां रहते हैं वहां की पारंपरिक ही चीजें ही खाएं। ये बीमारियों से बचाते हैं।
नींद की कमी से बीमारियों की आशंका अधिक
यु वा किसी दिनचर्या या नियम में बंधने को तैयार नहीं होते हैं। इससे उनकी नींद का चक्र बिगड़ जाता है। डे-नाइट शिफ्ट से बायोलॉजिकल क्लॉक बिगड़ती है। वहीं वर्कफ्रॉम होम से सोने-उठने का कोई समय निर्धारित नहीं रहता है। कई शोधों में देखा गया है कि लॉकडाउन के बाद युवाओं की नींद में कमी हो गई है। पर्याप्त नींद नहीं ले पा रहे हैं। शारीरिक-मानसिक परेशानियां हो रही हंै।



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वर्क फ्रॉम होम से भी युवाओं में बढ़ी बीमारियां, पारंपरिक खानपान व सही दिनचर्या से बचाव

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तनाव व याद्दाश्त की समस्या
घर से काम करने पर तनाव अधिक होता है। घर और ऑफिस के बीच तालमेल बैठाने में दिक्कत होती है। इससे अनिद्रा और एंजाइटी बढ़ रही है। साथ ही शरीर में हार्मोनल बैलेंस बिगडऩे से भी कई दिक्कतें हो रही हैं।
शारीरिक गतिविधियां न होना भी प्रमुख कारण
युवाओं में खराब दिनचर्या से शारीरिक गतिविधियां कम हुई हैं। ऑफिस जाने से सही दिनचर्या बनी रहती, माहौल बदलता है। वहीं वर्कफ्रॉम होम से इसमें भी कमी आई है। व्यायाम न करने से मेटाबॉलिज्म बढ़ता और इससे मोटापा, हाइपरटेंशन, टाइप-2 डायबिटीज, हृदय व हड्डी से जुड़े रोगों में बढ़ोत्तरी होती है।
बैठने का तरीका बदलें
वर्कफ्रॉम होम है तो जंक-फास्ट फूड्स न खाएं। इसमें कैलोरी ज्यादा होती है। मोटापा बढ़ता है। कोई नशा करते हैं तो इसे छोडऩे के लिए अच्छा समय है, कोशिश करें। वर्क फ्रॉम होम में भी ऑफिस की तरह टेबल-चेयर पर बैठकर काम करें। हर आधे घंटे पर उठकर टहलें। पानी पीएं।
स्थानीय और मौसमी चीजें डाइट में ज्यादा शामिल करें
युवाओं को पारंपरिक, स्थानीय और मौसमी चीजें अधिक खानी चाहिए। अभी आंवला, पालक, बथुआ, पत्तेदार चीजें ज्यादा खाएं। खाने में स्थानीय चीजें जैसे चावल, दाल, रोटी, दही, छाछ, राबड़ी आदि खाएं। कोशिश करें कि जहां रहते हैं वहां की पारंपरिक ही चीजें ही खाएं। ये बीमारियों से बचाते हैं।
नींद की कमी से बीमारियों की आशंका अधिक
यु वा किसी दिनचर्या या नियम में बंधने को तैयार नहीं होते हैं। इससे उनकी नींद का चक्र बिगड़ जाता है। डे-नाइट शिफ्ट से बायोलॉजिकल क्लॉक बिगड़ती है। वहीं वर्कफ्रॉम होम से सोने-उठने का कोई समय निर्धारित नहीं रहता है। कई शोधों में देखा गया है कि लॉकडाउन के बाद युवाओं की नींद में कमी हो गई है। पर्याप्त नींद नहीं ले पा रहे हैं। शारीरिक-मानसिक परेशानियां हो रही हंै।



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सही दिनचर्या और पारंपरिक खानपान से दूरी, तनाव भरे काम व नशे की लत से कई युवाओं में पहले से ही गंभीर बीमारियों का खतरा था। लेकिन लॉकडाउन व वर्क फ्रॉम होम से बीमारियों का खतरा और बढ़ गया है। इसकी मुख्य वजह घर-ऑफिस के बीच तालमेल का अभाव, लंबे समय तक बैठे रहना, हैवी डाइट, कम पानी पीना और शारीरिक गतिविधियों में कमी है।
तनाव व याद्दाश्त की समस्या
घर से काम करने पर तनाव अधिक होता है। घर और ऑफिस के बीच तालमेल बैठाने में दिक्कत होती है। इससे अनिद्रा और एंजाइटी बढ़ रही है। साथ ही शरीर में हार्मोनल बैलेंस बिगडऩे से भी कई दिक्कतें हो रही हैं।
शारीरिक गतिविधियां न होना भी प्रमुख कारण
युवाओं में खराब दिनचर्या से शारीरिक गतिविधियां कम हुई हैं। ऑफिस जाने से सही दिनचर्या बनी रहती, माहौल बदलता है। वहीं वर्कफ्रॉम होम से इसमें भी कमी आई है। व्यायाम न करने से मेटाबॉलिज्म बढ़ता और इससे मोटापा, हाइपरटेंशन, टाइप-2 डायबिटीज, हृदय व हड्डी से जुड़े रोगों में बढ़ोत्तरी होती है।
बैठने का तरीका बदलें
वर्कफ्रॉम होम है तो जंक-फास्ट फूड्स न खाएं। इसमें कैलोरी ज्यादा होती है। मोटापा बढ़ता है। कोई नशा करते हैं तो इसे छोडऩे के लिए अच्छा समय है, कोशिश करें। वर्क फ्रॉम होम में भी ऑफिस की तरह टेबल-चेयर पर बैठकर काम करें। हर आधे घंटे पर उठकर टहलें। पानी पीएं।
स्थानीय और मौसमी चीजें डाइट में ज्यादा शामिल करें
युवाओं को पारंपरिक, स्थानीय और मौसमी चीजें अधिक खानी चाहिए। अभी आंवला, पालक, बथुआ, पत्तेदार चीजें ज्यादा खाएं। खाने में स्थानीय चीजें जैसे चावल, दाल, रोटी, दही, छाछ, राबड़ी आदि खाएं। कोशिश करें कि जहां रहते हैं वहां की पारंपरिक ही चीजें ही खाएं। ये बीमारियों से बचाते हैं।
नींद की कमी से बीमारियों की आशंका अधिक
यु वा किसी दिनचर्या या नियम में बंधने को तैयार नहीं होते हैं। इससे उनकी नींद का चक्र बिगड़ जाता है। डे-नाइट शिफ्ट से बायोलॉजिकल क्लॉक बिगड़ती है। वहीं वर्कफ्रॉम होम से सोने-उठने का कोई समय निर्धारित नहीं रहता है। कई शोधों में देखा गया है कि लॉकडाउन के बाद युवाओं की नींद में कमी हो गई है। पर्याप्त नींद नहीं ले पा रहे हैं। शारीरिक-मानसिक परेशानियां हो रही हंै।



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वर्क फ्रॉम होम से भी युवाओं में बढ़ी बीमारियां, पारंपरिक खानपान व सही दिनचर्या से बचाव

सही दिनचर्या और पारंपरिक खानपान से दूरी, तनाव भरे काम व नशे की लत से कई युवाओं में पहले से ही गंभीर बीमारियों का खतरा था। लेकिन लॉकडाउन व वर्क फ्रॉम होम से बीमारियों का खतरा और बढ़ गया है। इसकी मुख्य वजह घर-ऑफिस के बीच तालमेल का अभाव, लंबे समय तक बैठे रहना, हैवी डाइट, कम पानी पीना और शारीरिक गतिविधियों में कमी है।
तनाव व याद्दाश्त की समस्या
घर से काम करने पर तनाव अधिक होता है। घर और ऑफिस के बीच तालमेल बैठाने में दिक्कत होती है। इससे अनिद्रा और एंजाइटी बढ़ रही है। साथ ही शरीर में हार्मोनल बैलेंस बिगडऩे से भी कई दिक्कतें हो रही हैं।
शारीरिक गतिविधियां न होना भी प्रमुख कारण
युवाओं में खराब दिनचर्या से शारीरिक गतिविधियां कम हुई हैं। ऑफिस जाने से सही दिनचर्या बनी रहती, माहौल बदलता है। वहीं वर्कफ्रॉम होम से इसमें भी कमी आई है। व्यायाम न करने से मेटाबॉलिज्म बढ़ता और इससे मोटापा, हाइपरटेंशन, टाइप-2 डायबिटीज, हृदय व हड्डी से जुड़े रोगों में बढ़ोत्तरी होती है।
बैठने का तरीका बदलें
वर्कफ्रॉम होम है तो जंक-फास्ट फूड्स न खाएं। इसमें कैलोरी ज्यादा होती है। मोटापा बढ़ता है। कोई नशा करते हैं तो इसे छोडऩे के लिए अच्छा समय है, कोशिश करें। वर्क फ्रॉम होम में भी ऑफिस की तरह टेबल-चेयर पर बैठकर काम करें। हर आधे घंटे पर उठकर टहलें। पानी पीएं।
स्थानीय और मौसमी चीजें डाइट में ज्यादा शामिल करें
युवाओं को पारंपरिक, स्थानीय और मौसमी चीजें अधिक खानी चाहिए। अभी आंवला, पालक, बथुआ, पत्तेदार चीजें ज्यादा खाएं। खाने में स्थानीय चीजें जैसे चावल, दाल, रोटी, दही, छाछ, राबड़ी आदि खाएं। कोशिश करें कि जहां रहते हैं वहां की पारंपरिक ही चीजें ही खाएं। ये बीमारियों से बचाते हैं।
नींद की कमी से बीमारियों की आशंका अधिक
यु वा किसी दिनचर्या या नियम में बंधने को तैयार नहीं होते हैं। इससे उनकी नींद का चक्र बिगड़ जाता है। डे-नाइट शिफ्ट से बायोलॉजिकल क्लॉक बिगड़ती है। वहीं वर्कफ्रॉम होम से सोने-उठने का कोई समय निर्धारित नहीं रहता है। कई शोधों में देखा गया है कि लॉकडाउन के बाद युवाओं की नींद में कमी हो गई है। पर्याप्त नींद नहीं ले पा रहे हैं। शारीरिक-मानसिक परेशानियां हो रही हंै।



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वर्क फ्रॉम होम से भी युवाओं में बढ़ी बीमारियां, पारंपरिक खानपान व सही दिनचर्या से बचाव

सही दिनचर्या और पारंपरिक खानपान से दूरी, तनाव भरे काम व नशे की लत से कई युवाओं में पहले से ही गंभीर बीमारियों का खतरा था। लेकिन लॉकडाउन व वर्क फ्रॉम होम से बीमारियों का खतरा और बढ़ गया है। इसकी मुख्य वजह घर-ऑफिस के बीच तालमेल का अभाव, लंबे समय तक बैठे रहना, हैवी डाइट, कम पानी पीना और शारीरिक गतिविधियों में कमी है।
तनाव व याद्दाश्त की समस्या
घर से काम करने पर तनाव अधिक होता है। घर और ऑफिस के बीच तालमेल बैठाने में दिक्कत होती है। इससे अनिद्रा और एंजाइटी बढ़ रही है। साथ ही शरीर में हार्मोनल बैलेंस बिगडऩे से भी कई दिक्कतें हो रही हैं।
शारीरिक गतिविधियां न होना भी प्रमुख कारण
युवाओं में खराब दिनचर्या से शारीरिक गतिविधियां कम हुई हैं। ऑफिस जाने से सही दिनचर्या बनी रहती, माहौल बदलता है। वहीं वर्कफ्रॉम होम से इसमें भी कमी आई है। व्यायाम न करने से मेटाबॉलिज्म बढ़ता और इससे मोटापा, हाइपरटेंशन, टाइप-2 डायबिटीज, हृदय व हड्डी से जुड़े रोगों में बढ़ोत्तरी होती है।
बैठने का तरीका बदलें
वर्कफ्रॉम होम है तो जंक-फास्ट फूड्स न खाएं। इसमें कैलोरी ज्यादा होती है। मोटापा बढ़ता है। कोई नशा करते हैं तो इसे छोडऩे के लिए अच्छा समय है, कोशिश करें। वर्क फ्रॉम होम में भी ऑफिस की तरह टेबल-चेयर पर बैठकर काम करें। हर आधे घंटे पर उठकर टहलें। पानी पीएं।
स्थानीय और मौसमी चीजें डाइट में ज्यादा शामिल करें
युवाओं को पारंपरिक, स्थानीय और मौसमी चीजें अधिक खानी चाहिए। अभी आंवला, पालक, बथुआ, पत्तेदार चीजें ज्यादा खाएं। खाने में स्थानीय चीजें जैसे चावल, दाल, रोटी, दही, छाछ, राबड़ी आदि खाएं। कोशिश करें कि जहां रहते हैं वहां की पारंपरिक ही चीजें ही खाएं। ये बीमारियों से बचाते हैं।
नींद की कमी से बीमारियों की आशंका अधिक
यु वा किसी दिनचर्या या नियम में बंधने को तैयार नहीं होते हैं। इससे उनकी नींद का चक्र बिगड़ जाता है। डे-नाइट शिफ्ट से बायोलॉजिकल क्लॉक बिगड़ती है। वहीं वर्कफ्रॉम होम से सोने-उठने का कोई समय निर्धारित नहीं रहता है। कई शोधों में देखा गया है कि लॉकडाउन के बाद युवाओं की नींद में कमी हो गई है। पर्याप्त नींद नहीं ले पा रहे हैं। शारीरिक-मानसिक परेशानियां हो रही हंै।



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वर्क फ्रॉम होम से भी युवाओं में बढ़ी बीमारियां, पारंपरिक खानपान व सही दिनचर्या से बचाव

सही दिनचर्या और पारंपरिक खानपान से दूरी, तनाव भरे काम व नशे की लत से कई युवाओं में पहले से ही गंभीर बीमारियों का खतरा था। लेकिन लॉकडाउन व वर्क फ्रॉम होम से बीमारियों का खतरा और बढ़ गया है। इसकी मुख्य वजह घर-ऑफिस के बीच तालमेल का अभाव, लंबे समय तक बैठे रहना, हैवी डाइट, कम पानी पीना और शारीरिक गतिविधियों में कमी है।
तनाव व याद्दाश्त की समस्या
घर से काम करने पर तनाव अधिक होता है। घर और ऑफिस के बीच तालमेल बैठाने में दिक्कत होती है। इससे अनिद्रा और एंजाइटी बढ़ रही है। साथ ही शरीर में हार्मोनल बैलेंस बिगडऩे से भी कई दिक्कतें हो रही हैं।
शारीरिक गतिविधियां न होना भी प्रमुख कारण
युवाओं में खराब दिनचर्या से शारीरिक गतिविधियां कम हुई हैं। ऑफिस जाने से सही दिनचर्या बनी रहती, माहौल बदलता है। वहीं वर्कफ्रॉम होम से इसमें भी कमी आई है। व्यायाम न करने से मेटाबॉलिज्म बढ़ता और इससे मोटापा, हाइपरटेंशन, टाइप-2 डायबिटीज, हृदय व हड्डी से जुड़े रोगों में बढ़ोत्तरी होती है।
बैठने का तरीका बदलें
वर्कफ्रॉम होम है तो जंक-फास्ट फूड्स न खाएं। इसमें कैलोरी ज्यादा होती है। मोटापा बढ़ता है। कोई नशा करते हैं तो इसे छोडऩे के लिए अच्छा समय है, कोशिश करें। वर्क फ्रॉम होम में भी ऑफिस की तरह टेबल-चेयर पर बैठकर काम करें। हर आधे घंटे पर उठकर टहलें। पानी पीएं।
स्थानीय और मौसमी चीजें डाइट में ज्यादा शामिल करें
युवाओं को पारंपरिक, स्थानीय और मौसमी चीजें अधिक खानी चाहिए। अभी आंवला, पालक, बथुआ, पत्तेदार चीजें ज्यादा खाएं। खाने में स्थानीय चीजें जैसे चावल, दाल, रोटी, दही, छाछ, राबड़ी आदि खाएं। कोशिश करें कि जहां रहते हैं वहां की पारंपरिक ही चीजें ही खाएं। ये बीमारियों से बचाते हैं।
नींद की कमी से बीमारियों की आशंका अधिक
यु वा किसी दिनचर्या या नियम में बंधने को तैयार नहीं होते हैं। इससे उनकी नींद का चक्र बिगड़ जाता है। डे-नाइट शिफ्ट से बायोलॉजिकल क्लॉक बिगड़ती है। वहीं वर्कफ्रॉम होम से सोने-उठने का कोई समय निर्धारित नहीं रहता है। कई शोधों में देखा गया है कि लॉकडाउन के बाद युवाओं की नींद में कमी हो गई है। पर्याप्त नींद नहीं ले पा रहे हैं। शारीरिक-मानसिक परेशानियां हो रही हंै।



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Tuesday, 12 January 2021

तो, इस चिंता से जुड़ा है नोमोफोबिया

इन दिनों हर आयुवर्ग का व्यक्ति मोबाइल फोन (Mobile Phone) रखता है। यह ऐसा गैजेट (Gadget) है जिसके बिना व्यक्ति को अपना जीवन अधूरा या खालीपन सा लगता है। लोग इस चिंता में भी डूबे रहते हैं कि यदि मोबाइल फोन गुम हो जाए तो उनका क्या होगा। मेडिकली इस डर को नोमोफोबिया कहते हैं। पिछले कुछ सालों में यह फोबिया आम हो गया है जिसमें मोबाइल खोने या पास न होने का डर रहता है।

हमेशा रखते अपने साथ
मेल ऑनलाइन की रिपोर्ट के मुताबिक 66 फीसदी मोबाइल यूजर्स इससे पीडि़त हैं। इसमें व्यक्ति को अपने मोबाइल फोन के गुम हो जाने का भय रहता है, इसीलिए यह लोग अपने मोबाइल को छोड़ते नहीं हैं। यहां तक कि टॉयलेट (toilet) में भी इसे अपने साथ लेकर जाते हैं। वहीं सोते समय भी उन्हें अपना मोबाइल फोन साथ लेकर सोने की आदत होती है। आंकड़ों के अनुसार दिनभर में औसतन तीस से अधिक बार वे अपना फोन चेक करते हैं।

प्रमुख लक्षण
मोबाइल खोने के सपने आना। इसके बिना नींद (Sleep) न आना। ऐसे में मोबाइल या तो अपने बगल में या फिर अपने तकिए के नीचे रखना। थोड़ी-थोड़ी देर में चेक करते रहना। मोबाइल घर पर छूट जाने पर ऑफिस के काम में मन न लगना। न मिलने पर पसीने छूटना, बीपी बढऩा या धड़कनें बढऩा। लो बैटरी होने पर मूड खराब होना। सुबह उठते ही फोन लेकर बैठ जाना। प्लेन से नीचे उतरते या मीटिंग खत्म होते ही तुरंत फोन को फ्लाइट मोड से हटाकर नॉर्मल मोड पर लाना। 66 प्रतिशत मोबाइल यूजर्स जिसमें खासतौर पर युवा शामिल हैं, इससे पीडि़त हैं। मेल ऑनलाइन की एक रिपोर्ट में यह सामने आया।

रोग तो नहीं : कुछ बातों पर गौर करके अंदाजा लगा सकते हैं कि कहीं आप भी तो इससे ग्रसित नहीं। इसके लिए अपने पति या पत्नी, पिता या मां को फोन को लॉक खोलकर एक दिन के लिए देने के बारे में सोचें।

यदि आपकी चिंता बढ़ जाए, हृदय गति में परिवर्तन आए, बीपी बढ़ जाए तो शायद आप ग्रसित हो चुके हैं।

इन उपायों से करें बचाव
-मोबाइल पर निर्भरता कम करें।

-सोशल मीडिया (Social Media) जैसे फेसबुक या ट्वीटर का प्रयोग मोबाइल के बजाय डेस्कटॉप या लैपटॉप पर करें। मैसेंजरए ईमेलए व्हाट्सएप आदि के नोटिफिकेशन ऑफ रखें।

-निजी जानकारी जैसे पासवर्डए फोटोए वीडियो को मोबाइल में न रखें। इन्हें एक डायरी में लिखें।

-समय-समय पर मोबाइल से दूरी बनाएं, जैसे कुछ घंटों या कुछ दिनों के लिए या कम से कम दिन में तीन घंटे और हफ्ते में एक दिन।

-रात में मोबाइल जल्दी ऑफ या साइलेंट कर दें।



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