Tuesday, 30 June 2020

सेहत का टॉनिक है शहद और दूध, जानें इसके बारे में

दूध को संपूर्ण आहार कहा जाता है। हर व्यक्ति को रोजाना 1 गिलास दूध जरूर पीना चाहिए। इसमें विटामिन- ए, बी, सी, डी, कैल्शियम, प्रोटीन व लैक्टिक एसिड भरपूर मात्रा में पाया जाता है। आयुर्वेद में शहद को कई रोगों के इलाज में कारगर औषधि बताया गया है। शहद का इस्तेमाल कई जटिल रोगों के इलाज में किया जाता है। शहद में प्रोटीन, वसा, एंजाइम अमीनो एसिड, कार्बोहाइड्रेट, आयोडीन, आयरन, पोटैशियम, सोडियम, फॉस्फोरस, कैल्शियम जैसे कई तत्त्व पाए जाते हैं। यह एंटीबैक्टीरियल, एंटीऑक्सीडेंट और एंटीफंगल गुणों से युक्त होता है। ऐसे में अगर दूध और शहद साथ लिए जाएं तो यह शरीर को कई तरह से फायदा पहुंचाता है।

सर्दी-जुुकाम से बचाव-
अगर आप सर्दी, खांसी व जुकाम से अक्सर परेशान रहते हैं तो दूध में शहद मिलाकर नियमित पीएं। शहद और दूध का मेल एंटीबैक्टीरियल की तरह काम करता है। साथ ही हानिकारक बैक्टीरिया शरीर पर हमला नहीं कर पाते हैं।

चमकदार त्वचा-
दूध नेचुरल क्लींजर का काम करता है और शहद स्किन को चमक प्रदान करता है। इन दोनों चीजों को बराबर मात्रा में मिलाकर चेहरे पर लगाएं। पेस्ट के सूख जाने पर मुंह धो लें, त्वचा निखर जाएगी।

मजबूत हड्डियां-
हड्डियों की मजबूती के लिए कैल्शियम जरूरी है। एक गिलास दूध में एक चम्मच शहद मिलाकर पीएंगे तो दूध में शहद का यह कॉम्बिनेशन न केवल हमारी हड्डियों को मजबूती देगा बल्कि जोड़ों के दर्द से भी बचाएगा।

पेट के रोग होते दूर
ऐसे लोग जिन्हें कब्ज, बदहजमी की समस्या हैं वे एक गिलास दूध में दो चम्मच शहद मिलाएं और तुरंत पी जाएं। इसे नियमित लेने से इसका असर दिखने लगेगा।



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दर्द और सूजन से छुटकारे के लिए अपनाएं ये घरेलू नुस्खे

शरीर के किसी हिस्से में दर्द और सूजन है तो कुछ घरेलू नुस्खे अपना सकते हैं। ये नुस्खे दर्द और सूजन से राहत देंगे।

शरीर के किसी हिस्से में सूजन है तो अर्जुन के पेड़ की छाल का चूर्ण बना लें। एक चम्मच चूर्ण को लेकर उसमें थोड़ा पानी मिलाकर पेस्ट बनाकर प्रभावित हिस्से पर लगाएं।
बवासीर के कारण सूजन है तो धतूरे के पत्ते को थोड़ा गर्म करके बांधे। इसके अलावा धतूरे के पत्तों को पीस कर लेप बनाएं, इसे भी प्रभावित जगह पर लगा सकते हैं।
देसी बबूल के बीज को पीस कर चूर्ण बना लें। इसमें बराबर मात्रा में हल्दी और दोगुना शहद डाल कर मिला लें। अब लेप को दर्द वाली जगह पर लगाएं, राहत मिलेगी।
सूजन की स्थिति में इलायची और धनिया भी कारगर है। इसके लिए 2-3 ग्राम इलायची और धनिया पत्ते को पीस कर दूध में मिलाकर लेप तैयार करें। इससे सूजन में राहत मिलती है।
जंगली इमली के बीज को थोड़ा पानी मिलाकर सिलबट्टे पर पीस लें। इस लेप को दर्द वाली जगह पर लगाएं।
चोट से होने वाली सूजन पर हल्दी, चूना और सरसों का तेल मिलाकर बना लेप लगाएं।
आंखों में सूजन होने पर 10-20 ग्राम बेलरस और शक्कर मिलाकर गाढ़ा लेप तैयार कर लें। इसे आंख के आसपास लगाएं, काफी आराम मिलेगा।



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तनाव, चोट, दर्द, पेट के कीड़े, मुंह के छाले व अन्य बीमारियों में फायदेमंद है चमेली की फूल

चमेली का फूल बगीचे और घर में खुशबू फैलाने के लिए जाना जाता है। इसमें औषधीय गुण भी हैं जो कई रोगों से बचाते हैं। औषधि के रूप में चमेली की केवल 10 ग्राम मात्रा का ही प्रयोग करना चाहिए। इसकी खुशबू दिमाग को शक्तिशाली बनाती है। लेकिन यह वात, लकवा, गठिया रोगी के लिए हानिकारक है। इसकी सुगंध कुछ लोगों में एलर्जी का कारण बन सकती है। ऐसे में जिन्हें खुशबू से एलर्जी है वे इसका प्रयोग न करें। जानिए इसके फायदे-

ठीक होती चोट व घाव -
चमेली के तेल का इस्तेमाल एंटीसेप्टिक के तौर पर भी किया जाता है। किसी तरह की चोट या घाव हो जाए तो रूई के फाहे को चमेली के तेल में डुबोकर प्रभावित हिस्से पर लगाएं। इससे दर्द कम होने के साथ घाव भी तेजी से भरता है।

तनाव की छुट्टी - अगर काम का अधिक बोझ और अधूरी नींद तनाव पैदा करती है तो ऐसी स्थिति में बगीचे में जाएं और चमेली के फूलों की सुगंध लें। इसकी खुशबू मूड बूस्टर का काम करती है और तनाव का स्तर घटाती है। साथ ही अनिद्रा की समस्या से भी राहत देती है।

दूर होता दर्द -
चमेली का तेल खुशबूदार होने के कारण इसका प्रयोग अरोमाथैरेपी में भी किया जाता है। इसके तेल से की गई मसाज शरीर की मांसपेशियों आराम पहुंचाती है। इसके अलावा चमेली के तेल में नारियल का तेल मिलाएं और इससे शरीर की मालिश करें। बॉडी को आराम मिलने के साथ दर्द भी दूर होगा।

चमेली के पत्ते के फायदे - चमेली के पत्ते का प्रयोग कई रोगों को दूर करने में किया जाता है। जानते हैं इसके बारे में-
पेट में कीड़े : अगर पेट में कीड़े हो गए हैं तो चमेली के पत्तों का रस पी सकते हैं, ऐसा कुछ दिनों तक करने से कीड़े बाहर निकल जाते हैं।
मुंह में छालों की समस्या : मुंह में छाले होने पर इसकी पत्तियों को धोकर धीरे-धीरे चबाएं। पत्तियों से निकलने वाला रस छालों को खत्म करता है।
बिवाई फटना : सर्दी के अलावा भी कुछ लोगों में बिवाई फटने की समस्या होती है। ऐसे में चमेली के पत्तों का रस इस पर लगा सकते हैं।

चमेली के फूल का प्रयोग - चमेली के फूलों को पीसकर इसका लेप बना लें। इसे दाद, खाज और खुजली होने पर प्रभावित हिस्से पर लगाएं, आराम मिलेगा।
अक्सर सिरदर्द रहने की समस्या है तो कुछ चमेली के फूल लें इसे पीसकर लेप तैयार करें। इस लेप को माथे पर लगाएं, सिरदर्द से राहत मिलेगी।



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अस्थमा के मरीज करें ये उपाय मिलेगी राहत

अस्थमा को दमा भी कहते हैं। यह श्वसन तंत्र से जुड़ी बीमारी है। इसके होने के कई कारण हैं, लेकिन इसमें मुख्य कारण एलर्जी है। पहले यह बीमारी उम्रदराज लोगों में अधिक देखने को मिलती थी लेकिन अब छोटे बच्चों को भी यह बीमारी हो रही है। अस्थमा का शुरू में इलाज दवाओं से होता है, लेकिन समस्या गंभीर होने पर डॉक्टर कई बार मरीज को इन्हेलर की सलाह देते हैं, लेकिन बिना डॉक्टरी सलाह पर इसका इस्तेमाल नुकसानदायक होता है। डॉक्टरी सलाह पर ही लें।

अस्थमा में इन्हेलर कारगर होता है लेकिन इसके कई वर्षों तक इस्तेमाल से स्किन पर बुरे असर के साथ मोतियाबिंद का भी खतरा रहता है।

लक्षण और जांचें-
अचानक खांसी, छींकें या सर्दी लगना, सांस लेने में परेशानी और सीने में जकडऩ महसूस होना, सांस लेते समय घरघराहट जैसी आवाज, तेज सांस लेने पर पसीना के साथ बेचैनी महसूस होना, सिर भारी-भारी रहना, जल्दी-जल्दी सांस लेने पर थकावट महसूस होना आदि इसके लक्षण हैं। सांस की नली में कितनी सिकुडऩ है इसके लिए स्पाइरोमेट्री टैस्ट कराते हैं। साथ ही सांस लेने की क्षमता के लिए पीक फ्लो टैस्ट होता है।

घरेलू उपाय -
आंवला पाउडर और शहद का मिश्रण रोज सुबह लें। इससे आराम मिलेगा। सांस लेने में परेशानी होने पर शहद सूंघना चाहिए। इससे राहत मिलती है। सांस नली खुल जाती है। सरसों तेल और कर्पूर को गुनगुना गर्म कर सीने और पीठ पर मालिश करें। इससे कफ कम होता है। 10-15 लहसुन की कली को दूध में उबालकर गुनगुना ही पीएं। गर्म कॉफी या फिर अदरक और अनार के रस को शहद के साथ मिलाकर पीने से भी राहत मिलती है।

दमा के लिए योग -
अनुलोम विलोम, कपालभाति, मत्स्यासन, भुजंगासन और शवासन आदि आसन करने से अस्थमा रोगियों को फायदा होता है। इन्हें नियमित करना चाहिए।

मुख्य कारण -
धूल और धुएं से यह बीमारी फैलती है। खाने की छौंक, फूलों के परागण, घर के पालतू जानवरों के फर और कॉकरोच से भी इसकी एलर्जी होती है। भय या तनाव और महिलाओं में हार्मोनल बदलाव से भी अस्थमा हो सकता है।

ये बातें रखें ध्यान -
घर को हमेशा साफ रखें ताकि धूल से एलर्जी की आशंका न रहे।
योग-व्यायाम और ध्यान कर खुद को शांत रखने की कोशिश करना चाहिए।
मुंह से सांस न लें इससे समस्या और बढ़ सकती है।
रोगी गर्म बिस्तर में ही सोए। इससे अस्थमा का अटैक घटता है।
धूम्रपान, शराब और ज्यादा मिर्च-मसालेदार चीजों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
तनाव, क्रोध तथा लड़ाई-झगड़े वाले माहौल से दूर रहना चाहिए।
इन्हेलर का प्रयोग करने वाले मरीज इसको हमेशा अपने पास रखें।
काई, धूल मिट्टी वाली जगहों से दूर रहने का प्रयास करना चाहिए।
घर के अंदर हैं तो हर प्रकार के धुंए से बचें।
शरीर की प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाने के लिए ताजे फल और सब्जियां खूब खाएं।
अगर आपका बच्चा अस्थमैटिक है तो उसके दोस्तों व अध्यापक को बता दें ताकि अटैक की स्थिति में उसकी मदद कर सकें।
ज्यादा गर्म और ज्यादा नम वातावरण से बचें क्योंकि इससे भी एलर्जी होने की आशंका रहती है। आंधी और तूफान में घर से बाहर न जाएं।

इलाज का तरीका -
एलोपैथी
अस्थमा से पीड़ित मरीजों के इलाज से पहले कारण जाने की कोशिश की जाती है। एलर्जी का पता चलने के बाद सांस नली की सिकुड़न दूर करने के लिए इन्हेलर और कुछ दवाइयां दी जाती है। अगर सीने में अधिक जकड़न है तो नेबूलाइजर से कफ को कम किया जाता है ताकि मरीज को आराम मिले।

आयुर्वेद-
अस्थमा को आयुर्वेद में तमकश्वांस कहते हैं। यह कफ जनित रोग होता है। इसलिए पहले इसमें कुछ दवाइयां देकर वमन कर्म (उल्टी) कराया जाता है ताकि कफ बाहर निकल जाए। इसके बाद मरीज को खाने के लिए दवा दी जाती है। इनमें श्वांसकाथुर रस, श्वांस चिंतामणि, वासदी क्वाथ आदि दिया जाता है।

होम्योपैथी - लक्षणों के आधार पर होम्योपैथी में इलाज होता है। अस्थमा के मरीजों पर भी यही नियम लागू होता है। अगर कफ ज्यादा बन रहा है तो एंटोमोनियम टार्ट दिया जाता है जबकि सांस लेने में परेशानी होने पर एस्पीडोस्पेरमा क्यू और रात में सांस लेने पर समस्या आ रही है तो आर्सेनिक एल्बम 30 दी जाती है। लेकिन मरीज ये दवाइयां डॉक्टर की सलाह पर ही लें।



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अवसाद से दूर रहते हैं प्रकृति के बीच अधिक समय बिताने वाले लोग

शोध में भी सामने आया है की जो लोग अधिक समय पार्क और अन्य प्राकृतिक जगहों पर बिताते हैं वे ज्यादा खुश और स्वस्थ रहते हैं। शोध में यह भी सामने आया कि इसमें एक खास शारीरिक गतिविधी भी अहम भूमिका निभाती है। प्रकृति हमारे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है जिसके बारे में हमें अपने बच्चों को बताना चाहिये। प्रकृति और मनुष्य के बीच बहुत गहरा संबंध है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। मनुष्य के लिए धरती उसके घर का आंगन, आसमान छत, सूर्य-चांद-तारे दीपक, सागर-नदी पानी के मटके और पेड़-पौधे आहार के साधन हैं। इतना ही नहीं, मनुष्य के लिए प्रकृति से अच्छा गुरु नहीं है। आज तक मनुष्य ने जो कुछ हासिल किया वह सब प्रकृति से सीखकर ही किया है। छुट्टीयों में हमारे बच्चे अपना सारा दिन टीवी, मोबईल फोन, कम्प्यूटर खेलों में खराब कर देते है लेकिन वह भूल जाते है कि दरवाजे के बाहर प्रकृति के गोद में भी बहुत कुछ रोचक है उनके लिये।

अवसाद से दूर रहते हैं प्रकृति के बीच अधिक समय बिताने वाले लोग

निस्वार्थ जीना सिखाती है प्रकृति
प्रकृति की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह किसी के साथ भेदभाव या पक्षपात नहीं करती है। सुबह जल्दी प्रकृति के गोद में ठहलने से बच्चे स्वस्थ और मजबूत बनते है साथ ही ये उनहे कई सारी घातक बीमारीयों जैसे डायबिटिज, स्थायी हृदय घात, उच्च रक्त चाप, लीवर संबंधी परेशानी, पाचन संबंधी समस्या, संक्रमण, दिमागी समस्याओं आदि से भी दूर रखता है। ये हमारे स्वास्थ्य के लिये अच्छा है कि हम चिड़ियों की मधुर आवाज, मंद हवा की खनखनाहट, ताजी हवा की सनसाहट, बहती नदी की आवाज आदि सुबह - सुबह सुनें। शहर के जीवन से दूर होने और प्रकृति के साथ होने में कुछ बात है। यह बेचैन लोगों को तक शांत करता है और लोगों को उस बटन को रीसेट करने में मदद करता है जिसे जीवन कहा जाता है।

अवसाद से दूर रहते हैं प्रकृति के बीच अधिक समय बिताने वाले लोग

ज़्यादा खुश रहते हैं प्रकृति के नज़दीक रहने वाले
हाल ही 'नेचर साइंटिफिक रिपोर्ट्स' नामक पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, पेड़-पौधों के बीच बनी सड़क पर टहलने या किसी रमणीक प्राकृतिक जगह पर सप्ताह में 120 मिनट बिताने वाला व्यक्ति ज्यादा स्वस्थ और खुश महसूस करता है। शोध में यह भी सामने आया कि इससे कम समय बिताने वाले व्यक्ति को कोई महत्वपूर्ण लाभ नहीं हुआ। लेकिन जो लोग रोज 2 से 3 घंटे हरियाली और पेड़ों के झुरमुठ के बीच चहलकदमी करते थे वे उन लोगों की तुलना में 20 फीसदी ज्यादा खुश और सेहतमंद थे जो ऐसा बिल्कुल भी नहीं करते थे। शारीरिक स्वास्थ्य पर इसके फायदे और भी ज्यादा थे। बाहर घूमने वालों की सेहत अनियमित दिनचर्या वाले उनके साथियों की तुलना में 60 फीसदी अधिक थी। शोधकर्ताओं ने कहा कि पार्क और हरियाली वाले क्षेत्र में प्रतिदिन दो घंटे से ज्यादा समय बिताने वालों में हृदय रोग, मधुमेह, मोटापा, अस्थमा, मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं और मृत्यु के जोखिम कम थे।

अवसाद से दूर रहते हैं प्रकृति के बीच अधिक समय बिताने वाले लोग

बच्चों को लाएं प्रकृति के क़रीब
जापान में हुए एक शोध में पाया गया कि केवल प्राकृतिक वातावरण में निष्क्रिय बैठे रहने से भी शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को लाभ मिल सकता है। वहीं इस विषय पर हुए अन्य शोधों से पता चला है कि बाहर व्यायाम करने से मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा मिलता है जो आपको जिम या घर में उसी व्यायाम को करने से मिलता है। एक औसत अमरीकी किशोर डिजिटल स्क्रीन के सामने दिन में पांच से आठ घंटे बिताता है। यानि कि हमारे बच्चों से प्रकृति का साथ छूटता जा रहा है। इसलिए जरूरी है कि हम अपने बच्चों को खुली हवा में प्रकृति के साथ समय बिताने के लिए प्रेात्साहित करें। पहले जहां बच्चे स्थानीय पार्कों में खेलने, घर बनाने और पेड़ों पर चढऩे के बाहर घंटों बिताते थे वहीं आज इन क्रियाकलापों की जगह वीडियो गेम, टेलीविजन देखने और इन्डोर खेलों ने ले ली है। अब हमारे बच्चों का ग्रीन टाइम स्क्रीन टाइम से बदल गया है और इसका बच्चों के कल्याण और विकास पर प्रभाव पड़ा है।

अवसाद से दूर रहते हैं प्रकृति के बीच अधिक समय बिताने वाले लोग

प्रकृति के बीच रहने के ये होते फायदे
-प्रकृति में समय बिताने वाले बच्चों की स्कूल परफॉर्मेंस अच्छी होती है।
-ऐसे बच्चे ज्यादा क्रिएटिव और कल्पनाशील होते हैं।
-खेल-कूद में भी ऐसे बच्चों का प्रदर्शन बहुत शानदार होता है।
-टीम भावना, मिलकर काम करने की प्रवृत्ति, ज्यादा सामाजिकता और अपनत्व की भावना बढ़ती है। ऐसे बच्चे मानसिक परेशानियों से उबरने में भी सक्षम होते हैं।
-तनाव, चिंता, थकान, एकांकीपन और तेजी से मूड बदलने की आदत भी नहीं होती
-बच्चों में ध्यान लगाने और चीजों के बारे में बेसिक समझ में भी वृद्धि होती है।
-मजबूत हड्डियां, विटामिन डी की प्रचुरता, हृदय संबंधी बीमारियों सेे भी बच्चे सुरक्षित रहते हैं। आंखों की रोशनी बढ़ती है। नींद अच्छी आती है और ऐसे बच्चों का भविष्य में सफल होने की उम्मीद भी ज्यादा होती है।
-अच्छी और सेहतमंद जिंदगी के अलावा अपने बच्चों के साथ बाहर समय बिताने वाले माता-पिता के भी लंबे समय तक सेहतमंद बने रहने की आशा होती है।

अवसाद से दूर रहते हैं प्रकृति के बीच अधिक समय बिताने वाले लोग

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स्किन चमकदार बनाने से मोटापा घटाने तक अनेक गुणों की खान है करेला

आमतौर पर करेला ज़्यादातर लोगों की पसंदीदा लिस्ट में शामिल नहीं होता है। लेकिन चिकित्सा के लिहाज से करेला बहुत फायदेमंद और गुणों की खान है। करेला कई बीमारियों के इलाज के लिए कारगर साबित हुआ है। करेला भी सेहत के लिए एक दवाई का काम करती है। खासकर इसका जूस तो कई बीमारियों को दूर करने में मदद करता है। हरी सब्जियों की बात की जाए तो कम ही लोगों को करेले पसंद होते है। लेकिन यह वजन घटाने में भी कारगर है। यह न सिर्फ स्किन को चमकदार बनाता है बल्कि ब्लड शुगर भी कंट्रोल में रखता है। करेले में फास्फोरस पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। यह कफ, कब्ज और पाचन संबंधी समस्याओं को दूर करता है। इसके सेवन से भोजन का पाचन ठीक तरह से होता है, और भूख भी खुलकर लगती है। अस्थमा की शि‍कायत होने पर करेला बेहद फायदेमंद होता है। दमा रोग में करेले की बगैर मसाले सब्जी खाने से लाभ मिलता है। करेले का जूस पीने से लीवर मजबूत होता है और लीवर की सभी समस्याएं खत्म हो जाती है। प्रतिदिन इसके सेवन से एक सप्ताह में परिणाम प्राप्त होने लगते हैं। इससे पीलिया में भी लाभ मिलता है। अगर आप भी अब तक करेले खाना पसंद नहीं करते, तो इसके सेहत लाभ जानकर जरूर खाना शुरू कर देंगे -

स्किन चमकदार बनाने से मोटापा घटाने तक अनेक गुणों की खान है करेला

कई करेला कई रोगों पर भारी
-एक स्टडी के अनुसार, करेले का जूस मोटापा कम करने में मदद करता है। यह इंसुलिन को ऐक्टिव करता है जिससे शरीर में बनने वाली शुगर फैट का रूप नहीं ले पाती। इससे चर्बी कम करने और फैट कंट्रोल करने में मदद मिलती है। इसके अलावा करेले में काफी कम कैलरी होती हैं जिससे कैलरी कंट्रोल में रहती है और वजन नहीं बढ़ता।
-करेले का जूस ब्लड शुगर को कंट्रोल करने में भी मदद करता है। इसमें मोमर्सिडीन और चैराटिन नामक के दो कम्पाउंड होते हैं जो ब्लड शुगर को कंट्रोल करते हैं। खाली पेट करेले का जूस पीने से डायबीटीज में काफी फायदा होता है।
-करेले का जूस कैंसर पथरी किडनी की पथरी निकालने में भी सहायक है। इसके अलावा यह स्किन संबंधी बीमारियों, उल्‍टी, दस्‍त , गैस की समस्‍या, पीलिया, गठिया और मुंह के छालों में भी आराम करता है।
-करेले का जूस आंखों के लिए भी फायदेमंद माना गया है। इसमें बीटा-कैरोटिन होता है जो आंखों से संबंधित बीमारियों को दूर रखता है और रोशनी बढ़ाने में भी मदद करता है।
-अगर पाचन संबंधी कोई समस्या है तो करेले का जूस उसमें भी फायदा करता है। साथ ही यह दिमागी विकास में भी मदद करता है और उसे सेहतमंद रखता है।

-करेले में मौजूद मोमोरेडीसिन तत्व एंटीऑक्सीडेंट, एंटीडायबिटीज और एंटीस्टे्रस की तरह काम करता है। इसका सेवन करने से बीपी कंट्रोल हो जाता है।

-पथरी रोगियों को दो करेले का रस पीने और करेले की सब्जी खाने से आराम मिलता है। इससे पथरी गलकर बाहर निकल जाती है। करेले के सेवन से चेहरे के दाग-धब्बों, मुहांसों और स्किन इंफेक्शन से भी छुटकारा मिलता है।
-करेले में फास्फोरस पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। यह कफ, कब्ज और पाचन संबंधी समस्याओं को दूर करता है। इसके सेवन से भोजन का पाचन ठीक तरह से होता है, और भूख भी खुलकर लगती है।

-बच्चों को करेला भी खाना चाहिए क्योंकि इससे उनकी याददाश्त और उनकी आंखें दोनों मजबूत होंगी। वहीं करेले का जूस जवां दिखने में भी मदद करता है।

-करेले के सेवन से चेहरे के दाग-धब्बों, मुहांसों और स्किन इंफेक्शन से भी छुटकारा मिलता है।

स्किन चमकदार बनाने से मोटापा घटाने तक अनेक गुणों की खान है करेला

-करेले में मौजूद ल्युटेन जैसे केरोटोनोइडस विभिन्न नेत्र रोग, हृदय रोग और यहां तक कि कैंसर की रोकथाम में सहायक है।

-करेले का जूस पीने से लीवर मजबूत होता है और लीवर की सभी समस्याएं खत्म हो जाती है। प्रतिदिन इसके सेवन से एक सप्ताह में परिणाम प्राप्त होने लगते हैं। इससे पीलिया में भी लाभ मिलता है।

-करेले में एंटी-एलर्जन और एनाल्जेसिक सर्दी खांसी से राहत प्रदान करने और इस रोकन में काफी सहायक है।
-करेले की पत्त‍ियों या फल को पानी में उबालकर इसका सेवन करने से, इम्यून सिस्टम स्टरांग होता है, और किसी भी प्रकार का इंफेक्शन ठीक हो जाता है।

-करेले में प्रोटीन और आयरन भरपूर होता है जबकि कैलोरी कम मात्रा में होती है। यदि 100 ग्राम करेले की सब्जी का सेवन करते हैं तो 17 कैलोरी प्राप्त होती है। जिससे वजन घटाने वाले लोगों के लिए यह बेहतर विकल्प है।

-करेले में मौजूद बीटा कैरोटीन आंखों के लिए फायदेमंद माना जाता है। टीवी स्क्रीन पर काम करने वाले व्यक्ति को करेले का सेवन करना चाहिए।
करेले के जूस में छिपा है अच्छी सेहत का खजाना, जानें फायदे और बनाने का तरीका
पेट में गैस बनने और अपच होने पर करेले के रस का सेवन करना अच्छा होता है, जिससे लंबे समय के लिए यह बीमारी दूर हो जाती है।

स्किन चमकदार बनाने से मोटापा घटाने तक अनेक गुणों की खान है करेला

-करेले का जूस पीने से लीवर मजबूत होता है और लीवर की सभी समस्याएं खत्म हो जाती है। प्रतिदिन इसके सेवन से एक सप्ताह में परिणाम प्राप्त होने लगते हैं। इससे पीलिया में भी लाभ मिलता है।
-करेले की पत्त‍ियों या फल को पानी में उबालकर इसका सेवन करने से, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, और किसी भी प्रकार का संक्रमण ठीक हो जाता है।

-उल्टी-दस्त या हैजा हो जाने पर करेले के रस में काला नमक मिलाकर पीने से तुरंत आराम मिलता है। जलोदर की समस्या होने पर भी दो चम्मच करेले का रस पनी में मिलाकर पीने से लाभ होता है।
-लकवा या पैरालिसिस में भी करेला बहुत कारगर उपाय है। इसमें कच्चा करेला खाने से रोगी के लिए लाभदायक होता है।

-खून साफ करने के लिए भी करेला अमृत के समान है। मधुमेह में यह बेहद असरकारक माना जाता है। मधुमेह में एक चौथाई कप करेले का रस, उतने ही गाजर के रस के साथ पीने पर लाभ मिलता है।

-खूनी बवासीर में करेला अत्यंत लाभदायक है। एक चम्मच करेले के रस में आधा चम्मच शक्कर लिाकर पीने से इसमें आराम होता है।
-गठिया व हाथ पैरों में जलन होने पर करेले के रस की मालिश करना लाभप्रद होता है।

-किडनी की समस्याओं में करेले का उबला पानी व करेले का रस दोनों ही बेहद लाभकारी होते हैं।यह किडनी को सक्रिय कर, हानिकारक तत्वों को शरीर से बाहर करने में मदद करता है।

-ह्दय संबंधी समस्याओं के लिए करेला एक बेहतर इलाज है। यह हानिकारक वसा को ह्दय की धमनियों में जमने नहीं देता जिससे रक्तसंचार व्यवस्थित बना रहता है, और हार्ट अटैक की संभावना नहीं होती।
-नींबू के रस के साथ करेले के रस को चेहरे पर लगाने से मुंहासे ठीक हो जाते हैं और त्वचा रोग नहीं होते।

-कैंसर से लड़ने के लिए करेले के रस का सेवन बहुत ही लाभकारी सिद्ध होता है।

स्किन चमकदार बनाने से मोटापा घटाने तक अनेक गुणों की खान है करेला

ज्यादा फ्रूट जूस पीने से समय से पहले मौत का खतरा: स्टडी
हाल ही में हुई एक नई स्टडी में इस बात का खुलासा हुआ है कि जो लोग बहुत ज्यादा शुगरी ड्रिंक्स और फ्रूट जूस का सेवन करते हैं उनमें किसी भी वजह से समय से पहले मौत का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। अमेरिका के अनुसंधानकर्ताओं ने पहली बार 100 पर्सेंट फ्रूट जूस की तुलना कोला और लेमेनेड जैसे मीठे पेय पदार्थों से की। स्टडी में अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि शुगरी ड्रिंक्स और फ्रूट जूस दोनों में काफी समानताएं हैं और इन दोनों के सेवन से समय से पहले मौत का खतरा बढ़ जाता है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि इस संबंध में और रिसर्च करने की जरूरत है। जर्नल ऑफ अमेरिकन मेडिकल असोसिएशन (JAMA) में प्रकाशित इस नई रिसर्च में 13 हजार 440 लोगों के डेटा की जांच की गई ।

स्किन चमकदार बनाने से मोटापा घटाने तक अनेक गुणों की खान है करेला

स्किन के लिए करेले के जूस के फायदे:
-करेले में ऐंटी-माइक्रोबियल और ऐंटी-बैक्टीरियल प्रॉपर्टीज होती हैं जो खून को साफ करने में मदद करती हैं। इस वजह से एक्ने और पिंपल जैसी स्किन संबंधी समस्याएं भी दूर हो जाती हैं।

-अगर आप उम्र को मात देना चाहती हैं तो करेले का जूस एकदम बढ़िया है। इसमें अत्यधिक मात्रा में विटमिन सी पाया जाता है जोकि आपके बढ़ती उम्र की रफ्तार को धीमा कर सकता है। आप चाहे तो इसके लिए करेले के जूस की जगह करेला भी खा सकती हैं। इसके लिए करेले को उबालें, उसमें नींबू का रस और नमक डालकर खाएं और फायदा आपको काफी जल्दी ही देखने को मिलेगा।

-करेले का जूस पीने से स्किन पर ग्लो आता है क्योंकि इसमें विटमिन ए, सी और ऐंटी-ऑक्सिडेंट्स होते हैं। साथ ही यह रिंकल्स भी दूर करता है।

-रोजाना करेले का जूस पीने से स्किन संबंधी समस्याएं भी दूर रहती हैं। एक्जिमा और सोरायसिस की बीमारियों में करेले का जूस बेहद फायदेमंद है।

स्किन चमकदार बनाने से मोटापा घटाने तक अनेक गुणों की खान है करेला

करेले का जूस बनाने का तरीका
करेले का जूस बनाने के लिए एक करेला लें और उस छील लें। अब इस पर नमक और नींबू लगाकर आधे घंटे के लिए धूप में रख दें। साफ पानी से धोकर करेले को 1 संतरे और 1 नींबू के जूस के साथ पीस मिक्सी में पीस लें। अब इसे छान लें और ऊपर से जीरा, काला नमक और हींग का तड़का लगाएं। बर्फ डालकर सर्व करें।



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कोविड-19: डायबिटीज और उच्च रक्तचाप से पीडि़त ऐसे रहें कोरोना महामारी में सुरक्षित

नोवेल कोरोना वायरस कोविड-19 सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए वैश्विक दृष्टि से हमारे समय का सबसे बड़ा संकट बनकर उभरा है। दुनिया भर के देश इस वायरसके संक्रमण को कम करने के लिए तमाम उपाय कर रहे हैं जिनमें टेस्टिंग और इलाज के अलावा मरीजों के संपर्कमें आने वाले साइलेंट स्प्रेडर्स की खोज, यात्राओं पर रोक, नागरिकों को क्वारंटीन करना और बड़े आयोजनों को रद्द करने जैसे उपाय शामिल हैं। इस महामारी से कुछ समूह के लोगों को ज्यादा खतरा है। इनमें हाइपरटेंशन, डायबिटीज और हृदय रोग से पीडित लोग खासतौर पर शामिल हैं। इस कारण यह स्वास्थ्य क्षेत्र में ध्यान देने के लिहाज से महत्वपूर्ण बन गया है। यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज एवं गुरु तेग बहादुर हॉस्पिटल में क्लीनिकल एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. आशीष गोयल भारत में कोविड-19 से निपटने वाले लोगों की अग्रिम पंक्ति में हैं। डॉ. गोयल ने पब्लिक हेल्थ में मास्टर्स डिग्री के लिए मैरीलैंड के जॉन हॉपकिंस, ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ में बतौर फुलब्राइट नेहरू फेलो साल 2017 में काम किया है।

कोविड-19: डायबिटीज और उच्च रक्तचाप से पीडि़त ऐसे रहें कोरोना महामारी में सुरक्षित

इन परिस्थितियों में रहें सावधान
ऐसा पाया गया है कि विभिन्न बीमारियों जैसे डायबिटीज, हाइपरटेंशन, हृदय संबंधी रोग, पुरानी सांस की बीमारी और पुराने किडनी रोग के वृद्ध अगर कोविड-19 से संक्रमित हो जाते हैं और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ जाए तो उन्हें अधिक खतरा होता है। नोवेल कोरोना वायरस शरीर की रेनिन-एंजियोटेंसिन-एल्डोस्टेरॉन धुरी पर असर डालता है और उसे मानव शरीर की कोशिका में प्रवेश करने के लिए एंजियोटेंसिन से बनने वाले एंजाइम पर निर्भर रहना पड़ता है। इसकी सटीक प्रक्रिया पर अभी भी खोज जारी है और उसका विश्लेषण चल रहा है। इस रोग में हाइपरटेंशन की दवाओं के इस्तेमाल के बारे अभी भी विचार चल रहा है और इस बात के कोई साक्ष्य नहीं मिले हैं जिनकी बदौलत एसीई-इनहिबिटर या एंजियोटेंसिन रिसेप्टर ब्लॉकर दवाओं के इस्तेमाल के बारे में कोई समझ बन पाए। कोविड-19 के संक्रमण का असर शरीर के ग्लूकोज मेटाबॉलिज्म पर भी पड़ता है। पहले से डायबिटीज रोग से पीडि़त मरीजों के लिए जरूरी है कि उनके शुगर लेवल पर सख्त नियंत्रण रखा जाए।

कोविड-19: डायबिटीज और उच्च रक्तचाप से पीडि़त ऐसे रहें कोरोना महामारी में सुरक्षित

इन सावधानियों का रखें खयाल
किसी व्यक्ति में संक्रमण के खतरे को कम करने के लिए बहुत जरूरी है सोशल डिस्टेंसिंग या शारीरिक दूरी और साफ-सफाई के अलावा हाथों को धोना बहुत महत्वपूर्ण है। इसके अलावाए दूसरों से बात करते समय हमेशा मास्क पहनना भी आवश्यक है। एन-95 मास्क ही नहीं बल्कि संक्रमण को रोकने के लिए किसी भी तरह के मास्क को पहनना बेहतर हैं बजाय इसके कि मास्क पहना ही न जाए। यह भी जरूरी है कि जितना अधिक संभव हो सके, घर के अंदर ही रहा जाए और बाहर जितना कम से कम हो सके जाया जाए। संक्रमण के फैलाव को रोकने और स्वास्थ्य सेवाओं को ढहने से बचाने के लिए भी ऐसा जरूरी है। ऐसी भी खबरें हैं जिनमें दावा किया गया है कि आमतौर पर डायबिटीज और हाइपरटेंशन के मरीजों के कुछ तरह के इलाज जैसे कि एसीई इनहिबिटर्स से वे कोरोना वायरस को लेकर और संवेदनशील हो जाते हैं। लेकिन एसीई इनहिबिटर्स और एंजियोटेंसिन रिसेप्टर ब्लॉकर्स को लेकर किए जा रहे इन दावों के बारे में निर्णायक तौर पर अभी कुछ भी नहीं कहा जा सकता।

कोविड-19: डायबिटीज और उच्च रक्तचाप से पीडि़त ऐसे रहें कोरोना महामारी में सुरक्षित

कोरोना वैक्सीन बनने में अभी समय
वैक्सीन को विकसित करना एक धीमी प्रक्रिया है और उस पर अमल बहुत ही सावधानी के साथ योजनाबद्ध तरीके से किया जाता है। इसमें कोई दोराय नहीं कि हाल के समय में संभावित वैक्सीन को विकसित करने के उद्देश्य से काफी कुछ किया जा रहा है। लेकिन, महामारी के इस पहले दौर में इसकी रोकथाम के लिए किसी वैक्सीन की उम्मीद पालना अव्यावहारिक होगा। पिछले दशकों में वैक्सीन के विकास की प्रगति के बावजूद मानव शरीर के लिए कोविड-19 जैसे एकदम नए वायरस के लिए जो वैक्सीन बनेगीए उसमें सुरक्षाए उसके प्रभाव और लगातार एंटीबॉडीज की उपलब्धता का ध्यान रखना होगा और मानव पर इस्तेमाल से पहले उसका जानवरों पर परीक्षण करना होगा।

कोविड-19: डायबिटीज और उच्च रक्तचाप से पीडि़त ऐसे रहें कोरोना महामारी में सुरक्षित

इन तरीकों से बढ़ाएं अपनी इम्यूनिटीे
हाल के आंकड़ों से पता चलता है कि नोवेल कोरोनावायरस शरीर में लिंफोसाइट पर असर डालता है। वायरस से निपटने के लिए जिन विभिन्न प्रकार के दृष्टिकोणों पर काम चल रहा हैए उनमें शरीर की प्रतिरोधी क्षमता को बढ़ाने वाली थैरेपी में रोग से उबर रहे मरीजों के शरीर से निकाली गई एंटीबॉडीज के इस्तेमाल और पहले से स्थापित कीमोथेरोपी के इस्तेमाल पर निगाह रखी जा रही है। ऐसी भी खबरें हैं जिसमें विटामिन डी की भूमिका को भी काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है और वैकल्पिक और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में कई तरह के नजरिए पेश किए गए हैं। लेकिन इस बात का कोई प्रमाण नही हैं कि इसमें से कोई भी तरीका मानव शरीर में इस वायरस को रोकने में पक्के तौर पर कारगर कहा जा सके। कोविड-19 रोगियों को सूंघने की शक्ति के अभाव या स्वाद की क्षमता को खो देने के लक्षणों से भी जोड़ कर देखा जा रहा है। सहज तौर पर देखें तो इसकी वजह से भूख कम हो सकती है और मामूली संक्रमण के मामलों में भी मरीज खाना कम कर सकता है। ऐसे में स्वस्थ, पौष्टिक और संतुलित आहार लेना, पर्याप्त नींद लेना, तनाव कम करना, प्रतिदिन व्यायाम और दिनचर्या का पालन करना लाभदायक होता है।



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कोविड-19 से मुक्ति: अगस्त में इंसानों पर परीक्षण होगा लैब में विकसित की गई एंटीबॉडी का

नोवेल कोरोना वायरस (Novel Corona Virus) के फैलने के बाद पूरी दुनिया में इस वायरस को लेकर खौफ का माहौल है। सरकारें डरी हुई हैं और लोग घरों से निकलने में भी कतरा रहे हैं। लोगों का ये डर बेबुनियाद नहीं है। करीब 200 दिनों में ही इस वायरस ने पूरी दुनिया में 10,421,615 लोगों को संक्रमित कर दिया है जबकि 508,421 लोगों की जान ले चुका है। भारत में भी कोरोना संक्रमितों का ग्राफ लगातार ऊपर की ओर बढ़ता जा रहा है। रविवार को भी बीते 24 घंटे में देश में करीब 20 हजार से संक्रमितों के नए मामले सामने आए हैं। वहीं मरने वालों का आंकड़ा भी अब 17 हजार के करीब पहुंच गया है। यही वजह है कि इस वायरस से छुटकारा पाने के लिए पूरी दुनिया में 120 वैक्सीन पर शोधकार्य जारी है। अभी तक कोई भी देश सौ फीसदी कोरोना वैक्सीन नहीं खोज सका है। हालांकि अब अमरीका में वैज्ञानिकों (American Scientists) की एक टीम ने लैब में ही कृत्रिम एंटीबॉडी बनाई जो कोरोना रोगियों को बचाने में कारगर साबित हो सकता है।

कोविड-19 से मुक्ति: अगस्त में इंसानों पर परीक्षण होगा लैब में विकसित की गई एंटीबॉडी का

कैसे बनाया कृत्रिम एंटीबॉडी
दरअसल वैज्ञानिकों को कोरोना संक्रमण से ठीक हो चुके रोगियों के प्लाज्मा (Plazma) का उपयोग कर संक्रमितों का इलाज कर रहे हैं। लेकिन कोरोनो के खिलाफ इम्यूनिटी विकसित कर चुके इन स्वस्थ कोरोना संक्रमितों से पर्याप्त मात्रा में प्लाज्मा नहीं मिल पा रहा था जिसके चलते अस्पतालों में इलाज करने में दिक्कत आ रही थी। ऐसे में वैज्ञानिकों ने लैब में ही कृत्रिम प्लाज्मा एंटीबॉडी बनाने की ठानी। इसी शोध में वैज्ञानिक शुरुआती परीक्षणों में सफल रहे और उन्होंने कोरोना से लडऩे वाला एक कृत्रिम रूप से तैयार मोनोक्लोनल एंटीबॉडी (Monoclonal Antibody) बनाया है जो संभवत: कोरोना संक्रमितों के लिए रामबाण बन सकता है। वैज्ञानिकों का दावा है कि वे अगस्त से इस एंटीबॉडी का इंसानो पर परीक्षण शुरू कर देंगे। अगर परीक्षण सफल रहा तो सितंबर से इसका व्यापक प्रयोग किए जाने की संभावना है।

कोविड-19 से मुक्ति: अगस्त में इंसानों पर परीक्षण होगा लैब में विकसित की गई एंटीबॉडी का

दावा-रामबाण साबित होगी थैरेपी
लैब में इस कृत्रिम प्लाज्मा एंटीबॉडी को विकसित करने वाले अमरीकी वैज्ञानिकों का कहना है कि कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित अमरीका में यह थैरेपी रामबाण साबित हो सकती है। वैज्ञानिकों का दावा है कि थैरेपी कोरोना वायरस का खत्मा करने में सक्षम है, साथ ही लंबे समय तक वायरस के शरीर और प्रतिरक्षा तंत्र पर पडऩे वाले दुष्प्रभावों से भी बचाती है। अमरीकी दवा संगठनों का भी मानना है कि शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने में इसकी गजब की क्षमता ने अगस्त में इंसानी परीक्षणों के लिए काफी उम्मीद जगाई है।

कोविड-19 से मुक्ति: अगस्त में इंसानों पर परीक्षण होगा लैब में विकसित की गई एंटीबॉडी का

क्या होता है एंटीबॉडी
दरअसल एंटीबॉडी किसी भी वायरस के संक्रमण से लडऩे के लिए शरीर में स्वयं उत्पन्न होने वाला प्रोटीन होता है। एक 'संभावित न्यूट्रलाइजिंग' एंटीबॉडी एक रोगजऩक़ वायरस के प्रसार को रोकने में सक्षम है। नोवेल कोरोना वायरस कोविड-19 एंटीबॉडी वायरस का टीका नहीं हैं। ये ब्लड पैकेट्स (Blood Packets) कोरोनोवायरस रोगियों से एकत्र किए जाते हैं। शोध के अनुसार एक बार जब कोई व्यक्ति वायरस से ठीक हो जाता है तो संभावनाएं होती हैं कि उनके रक्त में एंटीबॉडी होते हैं जो वायरस के खिलाफ लड़ सकते हैं जिससे रोगी वायरस के संक्रमण से काफी हद तक सुरक्षित हो जाता है।

कोविड-19 से मुक्ति: अगस्त में इंसानों पर परीक्षण होगा लैब में विकसित की गई एंटीबॉडी का

जबकि मोनोक्लोनल एंटीबॉडी वायरस से लडऩे वाली एक जैसी प्रतिरक्षा कोशिकाओं से लैब में तैयार हुआ कृत्रिम एंटीबॉडी है। ये संक्रमित कोशिकाओं से सीधे लड़ता है और वायरस के संक्रमण को आगे बढऩे से रोक देता हैं। यह एंटीबॉडी थैरेपी दो से तीन माह तक संक्रमण से बचा सकती है। इससे वायरस से सीधे संपर्क में आने वाले फ्रंटलाइन डॉक्टर्स और अन्य चिकित्साकर्मियों को संक्रमण के जोखिम से बचाया जा सकता है।



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Monday, 29 June 2020

शरीर की इम्यूनिटी बढ़ाने में कारगर हैं ये जड़ी-बूटियां

उम्र बढऩा सामान्य प्रक्रिया है इस दौरान व्यक्ति को कई मानसिक व शारीरिक बदलावों का अहसास होता है। इस उम्र में सबसे पहले रोग प्रतिरोधक क्षमता घटने लगती है जिससे विभिन्न प्रकार के रोगों और संक्रमण की आशंका रहती है। आयुर्वेद में कई जड़ी-बूटियां ऐसी हैं जो समस्याओं से बचाव करती हैं। विशेषज्ञ के बताए अनुसार ही इन्हें लेना फायदेमंद होता है।

शिलाजीत: बढ़ती उम्र के प्रभावों को कम करने के साथ यह शरीर के सभी हार्मोन्स को सुचारू रखता है जिससे त्वचा चमकदार होने के साथ झुर्रियां कम होती हैं। इसके प्रयोग से मांसपेशियों को ताकत मिलती है और शारीरिक व मानसिक तनाव दूर होता है।

अर्जुन छाल: एंटीऑक्सीडेंट्स व औषधीय गुणों से भरपूर अर्जुन की छाल हृदय से जुड़ी समस्याओं के लिए रामबाण है। वृद्धावस्था में धड़कनों के अनियमित होने और सांस की समस्या में इसे लेने की सलाह देते हैं।

पुनर्नवा: किडनी और लिवर जैसे प्रमुख अंगों में से यह विषैले पदार्थों को बाहर निकालकर रोगों से बचाती है। यह हृदय को सेहतमंद रखने में कारगर है। सब्जी या चाय में इसके प्रयोग से दमा की शिकायत दूर होती है और शरीर पर होने वाली सूजन में कमी आती है। इसका १-४ ग्राम रस किडनी के संक्रमण से बचाता है।

दालचीनी: नेचुरल एंटीऑक्सीडेंट होने के कारण यह मौसम में बदलाव से होने वाले संक्रमण से बचाती है। अधिक उम्र वालों को सर्दी-जुकाम, जोड़ों में दर्द, पेट की समस्या, अधिक वजन आदि दिक्कतें होती हैं जिसके लिए दालचीनी का प्रयोग फायदेमंद हो सकता है। भोजन में इसे खासतौर पर इस्तेमाल किया जाता है।

ब्राह्मी : कब्ज को दूर करने और रक्त के शुद्धिकरण में यह कारगर जड़ी-बूटी है। शरीर की ऊर्जा बढ़ाकर नर्व टॉनिक के रूप में काम करती है जिससे दिमाग को मजबूती मिलती है। त्वचा संबंधी रोगों में भी इसे प्रयोग में लेते हैं। ब्राह्मी का रस व पाउडर दोनों फायदेमंद हैं।



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किडनी की पथरी से हो सकती है गंभीर समस्या

पथरी की शुरुआत से ही रोकथाम किडनी को सेहतमंद रखती है। मेयो क्लीनिक के शोधकर्ताओं ने शोध में पाया कि किडनी में केवल एक पथरी बनने से भी इसकी कार्यक्षमता प्रभावित होती है। आमतौर पर रक्त की कोशिकाओं द्वारा बनने वाले विशेष प्रोटीन सिस्टेटिन-सी की सामान्य मात्रा किडनी के स्वस्थ होने की ओर इशारा करती है। लेकिन पथरी से इस प्रोटीन का स्तर बढ़ता है साथ ही यूरिन के जरिए भी अधिक प्रोटीन बाहर निकलता है। इनसे किडनी से जुड़े गंभीर रोगों की आशंका बढ़ती है।

कमेंट: किडनी में थोड़ा सा दबाव भी यदि लंबे समय तक रहे तो इसमें सूजन व इंफेक्शन की आशंका बढ़ जाती है। किडनी बीमार होने से फेल्योर की आशंका भी दोगुनी हो जाती है।

आर्थराइटिस की दवा से गुर्दे के रोगों का इलाज-
रुमेटॉएड आर्थराइटिस के इलाज में प्रयोग होने वाली ड्रग को इंग्लैंड के शोधकर्ताओं ने किडनी संबंधी रोगों के इलाज में भी उपयोगी माना। विशेषकर उन स्थितियों में जिससे किडनी फेल हो सकती है। 'न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन' में प्रकाशित शोध के अनुसार आर्थराइटिस में जोड़ों पर असर करने वाली कमजोर एंटीबॉडी को इम्यूनोमॉड्यूलेटरी ऑरेन्सिया दवा मजबूत रखती है। यह किडनी के मरीजों में ग्लोमेरुलस की क्षति को रोककर जिसके शरीर में प्रत्यारोपित किडनी लगी हो उसमें इसे स्वीकारने की क्षमता बढ़ाती है।

कमेंट: रुमेटॉइड आर्थराइटिस के इलाज में प्रयोग होने वाली इम्यूनोमॉड्यूलेटरी दवाओं के असर को देखने के बाद यह सामने आया है कि ये दवाएं किडनी की कार्यक्षमता बढ़ाती हैं।



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शराब पीने वालों को हो सकता ये खतरा

सेप्सिस या सेप्टिसीमिया एक प्रकार का ब्लड इंफेक्शन है। जो मुख्यत: बैक्टीरिया के संक्रमण से होता है। निमोनिया, मेनिनजाइटिस, यूरिनरी टै्रक्ट इंफेक्शन भी इसका कारण हो सकते हैं। इसके अलावा सर्जरी के बाद घाव, यूरिनरी कैथेटर का इस्तेमाल या पीठ में घाव होने पर भी सेप्सिस की स्थिति बन सकती है।

इन्हें अधिक खतरा : एचआईवी, कैंसर, कमजोर इम्यूनिटी, डायबिटीज व किसी रोग से पीडि़त उम्रदराज व्यक्ति, शराब पीने वाले और किडनी व फेफड़ों की गंभीर बीमारी के रोगी अधिक पीडि़त होते हैं।

कई दिक्कतों से बढ़ता रोग-
ब्लड इंफेक्शन होने पर ब्लड का थक्का बनने की समस्या होती है। इससे रक्तसंचार बाधित होने के अलावा ऑक्सीजन की कमी और कई अंग जैसे फेफड़े, किडनी और लिवर काम करना बंद कर सकते हैं। समय रहते इलाज न होने पर मरीज की जान को खतरा रहता है। कई बार संक्रमण हड्डियों तक पहुंच जाता है।

लक्षण: तेज धड़कन व बुखार-
सर्दी लगकर तेज बुखार, शरीर में दर्द, डिहाइड्रेशन, सांस तेज चलना, धड़कन तेज होना, उल्टी महसूस होना व यूरिन कम होने जैसे लक्षण सामने आते हैं।

एंटीबायोटिक से इलाज-
रोगी की स्थितिनुसार ब्लड टैस्ट, अल्टासाउंड, एक्स-रे, सीटी स्कैन व बीपी, प्लेटलेट्स और लिवर व किडनी फंक्शन टैस्ट भी कराते हैं। बतौर इलाज एंटीबायोटिक व एंटीवायरल दवाएं दी जाती हैं। ऑक्सीजन की पूर्ति करने के साथ रोगी को फ्लूड देकर बीपी नियंत्रित करते हैं।



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बालों को मजबूती देता है प्रोटीन

अच्छी पर्सनैल्टी के लिए सिर पर खूबसूरत बाल होना बहुत जरूरी है। बालों को मजबूत और सुंदर बनाने के लिए लोग कई तरह के जतन करते हैं। बालों की मजबूती के लिए प्रोटीन लाभदायक होता है। प्रोटीन बालों के विकास में अहम भूमिका निभाता है। इंसान के बालों में करीब 65 से 95 फीसदी प्रोटीन होता है। बालों के रोम छिद्रों को बनाने, रिपेयर और इसके ऊत्तकों को बनाए रखने के लिए प्रोटीन और अन्य पोषक तत्त्वों जैसे विटामिन और आयरन आदि जरूरी हैं। क्लिनिकल न्यूट्रीशनिस्ट के मुताबिक 'उचित मात्रा में प्रोटीन और अन्य पोषक तत्त्वों से मिश्रित आहार बालों को अंदर से पोषण देता है। जानें कैसे रखें इनका खयाल-

बालों का टूटना व बेजान होना शरीर में प्रोटीन की कमी होने पर बालों का विकास रुक जाता है। ऐसी स्थिति में बाल पतले और नाजुक हो जाते हैं जिससे ये आसानी से टूटने लगते हैं।

बालों में अंडा लगाएं ।

भोजन में प्रोटीन वाली चीजें शामिल करें।



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अब टीबी की दवा खानी नहीं माला की तरह पहनने से ही हो जाएंगे स्वस्थ

अमरीका और भारत के शोधकर्मियों ने मिलकर दवा युक्त ऐसी माला तैयार की है जो टीबी के इलाज में मदद करेगी। तार की कुंडली में एंटीबायोटिक दवा मोतियों की तरह से पिरोई गई होती है। खतरनाक और संक्रामक रोग ट्यूबरक्यूलोसिस (टीबी) हजारों साल से मानवता के लिए खतरा बना हुआ है। हालांकि टीबी की जांच और इसका इलाज मुमकिन है, लेकिन फिर भी यह बीमारी हर साल भारत में हजारों लोगों की मौत का कारण बनी हुई है और दुनियाभर में दस लाख से अधिक लोगों की जान ले रही है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ट्यूबरक्यूलोसिस एंड रेसपिरेटरी डिजीजेज़, नई दिल्ली के इंटरनल मेडिसिन विभाग की अध्यक्ष डॉ. उपासना अग्रवाल के अनुसार, ‘‘दुनिया भर में टीबी का सबसे बड़ा बोझ भारत पर है। यह देश की प्रमुख स्वास्थ्य समस्याओं में से है। इस मर्ज का बड़ा आर्थिक असर भी है जिसमें इसके इलाज और देखरेख में खर्च से लेकर आजीविका पर संकट का मसला है।’’

अब टीबी की दवा खानी नहीं माला की तरह पहनने से ही हो जाएंगे स्वस्थ

कैसे होती है टीबी की बीमारी
टीबी एक बैक्टीरिया की वजह से होता है जो अधिकतर मरीज के फेफड़ों पर संक्रमण करता है लेकिन यह शरीर के किसी भी अंग पर असर डाल सकता है जैसे कि गुर्दे, रीढ़ या फिर दिमाग को भी अपने शिकंजे में ले सकता है। इसमें मरीज के बलगम में खून आना, उसे बुखार रहना, रातों को पसीना आना और शरीर को दुर्बल करने वाले दूसरे लक्षण दिखते हैं।

इलाज में ये हैं प्रमुख बाधाएं
भारत में टीबी की बीमारी की जड़ें काफी विस्तारित और जटिल हैं। मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज नई दिल्ली की निदेशक प्रोफेसर डॉ. नंदिनी शर्मा के अनुसार, ‘‘सर विलियम ऑस्लर ने कहा था कि, ट्यूबरक्यूलोसिस एक सामाजिक बीमारी है जिसका एक चिकित्सकीय पहलू है और इसका उन्मूलन एक चुनौती है। इसके कई सामाजिक कारक हैं जैसे कि गरीबी, जरूरत से ज्यादा भीड़भाड़ और इस रोग के साथ जुड़ा सामाजिक लांछन। इन चीजों का निराकरण जरूरी है।’’ डॉ. अग्रवाल का कहना है कि, अब टीबी में उन दवाओं के प्रति ज़्यादा प्रतिरोध उभर रहा है जो इसके इलाज में इस्तेमाल की जाती रही है। भारत की करीब 40 फीसदी जनसंख्या इसके बैक्टीरिया से संक्रमित है लेकिन उन पर इसके लक्षण नहीं दिखाई देते। टीबी कभी भी फिर से सक्रिय और संक्रामक हो सकती है जब कभी भी संक्रमित व्यक्ति की प्रतिरोधी क्षमता कमजोर पड़ती है।

इंजीनियरिंग की नई सोच
टीबी के इस तरह से इलाज की तकलीफों के चलते एक नए तरह के उपकरण को ईजाद किया गया जो मरीजों के लिए तो आसान था ही, साथ ही स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के काम को भी आसान बनाता है। यह अविष्कार, एक छोटा पतला धातु का तार है जिसमें टीबी की दवाएं पिराई गई होती हैं। नाक के रास्ते यह तार पेट तक जाता है। शरीर की भीतरी गर्मी के कारण तार मुड़कर एक कुंडली का आकार ले लेता है जो इसे आंतों में जाने और फिर शरीर के बाहर जाने से रोकता है। एक बार पेट में इसके सफलतापूर्वक चले जाने पर यह कुंडली रोजाना की खुराक के अनुरूप दवा को चार ह़फ्तों तक पेट में नियमित तौर पर छोड़ती है। डॉ. वर्मा के अनुसार, यह उपकरण छोटा है लेकिन इसके नतीजे काफी बड़े हैं। अगर मरीज इस तरह से इलाज का रास्ता चुनता है तो उसे रोजाना की जगह महीने में सिर्फ एक बार ही क्लीनिक पर जाना पड़ेगा। इस तरह से इस बात की संभावना बढ़ जाएगी कि मरीज दवाओं की अपनी मियाद पूरी कर लेगा और रोग से मुक्त हो जाएगा।

कई साल पहले से चल रहा काम
इस उपकरण को तैयार करने का काम एमआईटी में कई साल पहले शुरू हुआ था जब डॉ. वर्मा, जो तब एक ग्रेजुएट विद्यार्थी थीं, ने यूनिवर्सिटी प्रोफेसरों रॉबर्ट लैंगर और जियोवनी ट्रैवर्सो के साथ मिल कर उन रास्तों की तलाश शुरू की जिसमें टीबी के इलाज के लिए रोजाना क्लीनिक पर जाकर गोली न खानी पड़े। जैसे-जैसे यह शोध बढ़ता गया और इस उपकरण ने आकार लेना शुरू किया, उनकी टीम में अमरीका और भारत के दूसरे टीबी विशेषज्ञ शामिल होते गए जिसमें डॉ. शर्मा और डॉ. अग्रवाल भी शामिल हैं। टीम इस उपकरण की सुरक्षा और प्रभाव को आंकने के लिए सक्रियता से इसका परीक्षण कर रही है और उन रास्तों का अध्ययन कर रही है कि इसे किस तरह से भारत में मरीजों के लिए इस्तेमाल में लाया जाए। डॉ. वर्मा के अनुसार, ‘‘हमें उम्मीद है कि इसके शुरुआती परीक्षण अगले पांच सालों में शुरू हो जाएंगे।’’

हालांकि मरीजों को इसका सीधे फायदा मिलने से पहले काफी काम बचा हुआ है लेकिन फिर भी रिसर्च टीम को इस अविष्कार में काफी क्षमताएं नजर आती हैं। डॉ. अग्रवाल का कहना है कि इसमें मरीज के पास अपने इलाज की प्रक्रिया पर न सिर्फ बने रहने का विकल्प होगा बल्कि इसमें बेहतर नतीजों की भी उम्मीद है। इसके इस्तेमाल से एंटीबायोटिक दवाओं को लेकर रोग की प्रतिरोध की क्षमता भी कम होगी, साथ ही और भी कई फायदे होंगे।



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क्या आप भी परेशान हैं ऑफिस के वर्क कल्चर से? जानिये क्या है इसका कारण

नोवेल कोरोना वायरस (Novel Corona Virus) के बाद कार्यस्थल पर स्वास्थ्य संबंधी नियमों और प्रोटोकॉल्स में वृहद स्तर पर बदलाव किए जा रहे हैं। काम और निजी जीवन के बीच संतुलन बनाए रखना हमारी स्वयं की जिम्मेदारी होती है। कोरोना महामारी से पहले हमारी प्राथमिकता पेशेवर मांगों और व्यक्तिगत इच्छाओं को पूरा करने के लिए समय से रेस लगाने तक ही सीमित थी। लेकिन इस महामारी ने 4 महीने में ही हमारी जिंदगी के हर उसूल बदल दिए, सभी नियमों को ध्वस्त कर दिया और अब हमें जिंदगी को एक नए नजरिए से देखने के लिए विवश कर दिया है। जामा (JAMA) इंटरनल मेडिसिन जर्नल में प्रकाशित एक शोध कार्यस्थल पर स्वास्थ्य कार्यक्रमों (Wellness Programme) के महत्त्व पर प्रकाश डालता है।

क्या आप भी परेशान हैं ऑफिस के वर्क कल्चर से? जानिये क्या है इसका कारण

इस अध्ययन के सह-लेखक और कैम्ब्रिज स्थित नेशनल ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक रिसर्च के प्रोफेसर डेविड मोलिटर के अनुसार, कुछ नियोक्ता अपने कर्मचारियों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने और स्वास्थ्य संबंधी खर्चों को कम करने के लिए 'वर्कप्लेस वैलनेस प्रोग्राम' (Workplace Wellness Programme) को लागू करते हैं, लेकिन उसके प्रभाव का मूल्यांकन कर पाना मुश्किल है। मोलिटर का कहना है कि शोध में हमने पाया कि कर्मचारियों की स्वास्थ्स संबंधी परेशानियों को दूर करने के लिए शुरू किए गए इन उपायों या चिकित्सा कार्यक्रमों का कर्मचारियों पर कोई महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं होता।

क्या आप भी परेशान हैं ऑफिस के वर्क कल्चर से? जानिये क्या है इसका कारण

कर्मचारियों के अनुरूप नहीं होते प्रोग्राम (Not According to Empolyee)
प्रोफेसर डेविड मोलिटर ने शोध के हवाले से बताया कि 'वर्कप्लेस वैलनेस प्रोग्राम' का कार्यस्थल संबंधी परेशानियों, मेंटल हैल्थ (Mentle Health) और स्वास्थ्य पर प्रभाव की पड़ताल करने के लिए 4834 कर्मचारियों को शोध में शामिल किया था जिनकी औसत आयु 43.9 वर्ष थी। इनमें 2770 महिला कर्मचारी भी शामिल थीं। शोधकर्ताओं ने पाया कि इन कार्यक्रमों का कर्मचारियों की मानसिक परेशानियों और स्वास्थ्य संबंधी शारीरिक समस्याओं में भी उनकी परेशानियों के लिए किसी ठोस उपाय या समस्या के कम होने जैसे कुछ सुधार नहीं हुए थे। दरअसल, इसका प्रमुख कारण कर्मचारियों की इन प्रोग्राम्स को लेकर अपेक्षा और स्वास्थ्य के स्तर में वास्तविक सुधार के बीच कोई जुड़ाव न होना भी है। कार्यस्थल का माहौल कर्मचारी की अपेक्षा और इन स्वास्थ्य कार्यक्रमों के बीच कोई तारतम्य नहीं होता। शोध के ये निष्कर्ष इन स्वस्थ्य कल्याण कार्यक्रमों के प्रति कर्मचारियों की धारणाओं पर भी रोशनी डालते हैं।

24 महीनों तक किया अध्ययन
अध्ययन में इन कर्मचारियों के 12 से 24 महीनों तक स्वास्थ्य और कल्याण गतिविधियों का अध्ययन किया गया था। शोध के एक अन्य सह-लेखक प्रोफेसर जूलियन रीफ का भी यही कहना है कि इससे पूर्व के भी कई अध्ययनों में पाया गया है कि 'वर्कप्लेस वैलनेस प्रोग्राम' में कर्मचारियों के स्वास्थ्य में सुधार हुआ और चिकित्सा संबंधी खर्चों में भी कमी आई। लेकिन शोध के वे परिणाम इस बात पर निर्भर करते हैं कि इन कार्यक्रमों में कौन भाग ले रहा है। ऐसे कार्यक्रमों में हिस्सा लेने वाले लोगों के अनुसार भी परिणाम में अंतर आने की संभावना है।

मसलन महिलाओं की समस्याएं उनके निजी जीवन, जिम्मेदारियों और परिवार से जुड़ी होती हैं। एक अन्य अध्ययन में भी यह बात सामने आई है कि लगातार लंबे समय तक काम करने वाली महिलाएं पुरुषों की तुलना में जल्दी अवसादग्रस्त हो जाती हैं। ऐसे ही महिलाओं की तुलना में पुरुषों का सामाजिक नेटवर्क कमजोर होता है। अपनी तकलीफों को खुलकर शेयर न कर पाना भी उनके मेंटल स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का कारण बन सकता है।



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शरीर की हड्डियों को एेसे बनाएं मजबूत, जानें ये खास टिप्स

कैल्शियम की शरीर में जरूरी मात्रा के मौजूद रहने के अलावा व्यायाम भी हड्डियों की मजबूती के लिए जरूरी है। अगर 20 वर्ष की उम्र से व्यायाम करना शुरू कर दें तो दूसरों के मुकाबले हड्डियां अधिक मजबूत होती हैं।

एरोबिक्स व डांस -
हफ्ते में पांच दिन 30 मिनट की एरोबिक्स करें। इसमें सीढ़ियां चढ़ना, स्वीमिंग आदि कर सकते हैं। ऐसा न कर पाने पर डांस कर सकते हैं। यह मन को सुकून देने के साथ हड्डियों व मसल्स को मजबूत बनाता है।

वॉक व जॉगिंग -
रोजाना सुबह दौड़ लगाना शरीर के लिए कई तरह से फायदेमंद है। इससे वजन नियंत्रित रहने के अलावा हड्डियों और मांसपेशियों को मजबूती मिलती है। रोज क्षमतानुसार कुछ किलोमीटर दौड़ें।

वेट लिफ्टिंग : जिम में भारी वजन उठाने से जुड़े व्यायाम से भी हड्डियां मजबूत रहती हैं।

दर्द, थकान रहे तो कराएं जांच
बीएमडी यानी बोन मिनरल डेंसिटी टैस्ट से हड्डियों की मजबूती को जांचा जाता है। इसमें डेक्सा मशीन से हड्डियों का घनत्व देखकर ऑस्टियोपोरोसिस का पता लगाते हैं। इसे 45 वर्ष से अधिक उम्र वाले, मेनोपॉज के बाद महिलाओं को, कम उम्र में गर्भाशय निकलवा चुकी महिलाएं व अक्सर हड्डियों में दर्द रहने और जल्दी थकान होने की स्थिति में विशेषज्ञ कराने की सलाह देते हैं।



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Sunday, 28 June 2020

अगर उम्र बढ़ानी है तो शहर भी बदलकर देखिये

अच्छे स्वास्थ्य के लिए देखभाल और गुणवत्ता कारक है। मौसम, जलवायु, वायु प्रदूषण व अन्य पर्यावरणीय कारक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अत्याधिक ऊंचाई और चढ़ाव वाले स्थान आमतौर पर जीवन को कम करते हैं। अत्याधिक गर्मी और सर्दी का भी मृत्यु दर से संबंध है। स्वास्थ्य व्यवहार, चिकित्सा देखभाल और आनुवांशिक विरासत दीर्घायु के लिए जरूरी है। जीवन को बढ़ाने के लिए नीतियों का ध्यान रखना चाहिए। स्थान-आधारित कारक का जीवनकाल पर असर पड़ता है जो कि स्थान के आधार पर भिन्न-भिन्न होता है। खाड़ी देशों में पिछले तीन दशकों के अनुसंधान में यह पता लगाया गया कि अलग-अलग शहरों में सबसे कम जीवनकाल 50 वर्ष एवं ज्यादा 80 वर्ष रहा। मृत्यु के अंतर को कुछ ब्लॉकों की अवधि में विभाजित किया जा सकता है। कुछ मायनों में जगह हमें प्रभावित करती है।

कई कारण होते हैं
स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी और मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के अर्थशास्त्रियों के दल ने एक शोध किया है। 1999 से 2014 तक मेडिकेयर लाभार्थियों का एक व्यापक डेटा बनाया गया। उन्होंने 65 वर्ष की आयु के बाद के लोगों बीच जीवन अंतर का पता लगाया। इससे उन्हें पता चला कि अलग-अलग स्थान के प्रभाव का असर स्वास्थ्य, जीवनशैली और आनुवांशिकता पर पड़ता है। ये कारक दीर्घायु को प्रभावित करते हैं। शोधकर्ताओं ने पाया कि बरसों तक एक ही शहर में रहने के बाद यदि आप दूसरे शहर में बसते हैं तो जीवनकाल थोड़ा बढ़ जाएगा।



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दूध के दांतों का सही इलाज जरूरी, ब्रश के 20 मिनट बाद ही कुछ खाएं

सवाल-मेरे बेटे की उम्र चार वर्ष है और उसके दांतों में कीड़े लग गए हैं। क्या इसका इलाज कराना जरूरी है? एक महिला पाठक
जवाब-इसको दूध के दांत कहते हैं। यह पक्के दांतों के लिए आधार बनाते हैं ताकि वह सही स्थान पर निकलें और टेढ़े मेढे न हों। अगर दूध के दांत में कीड़े लग जाते हैं और उसका समय पर इलाज नहीं लिया जाए तो पक्के दांत निकलते समय कई तरह की परेशानी हो सकती है। दांत कमजोर तो होंगे ही, टेढ़े मेढ़े भी निकलेंगे। इसका तत्काल इलाज कराएं। बच्चों को सुबह-शाम ब्रश कराएं। ब्रश कराने के 20 मिनट बाद ही कुछ खाने को दें ताकि टूथपेस्ट में होने वाला फ्लोराइड असर कर सके।
सवाल-मसूड़ों में खून आता है और दुर्गंध भी। इसका कैसे बचाव किया जा सकता है? अनेक पाठक
जवाब-दांतों में प्लाक जमा होने के कारण पायरिया हो जाता है। इससे मसूड़ों में सूजन और खून आता है। इसके लिए दांतों और मसूड़ों की क्लीनिंग कराएं। हल्के गुनगुने नमक के पानी से दिन में कई बार कुल्ला करें। दोनों समय ब्रश अनिवार्य रूप से करें। डेंटल फ्लॉसिंग को आदत बनाएं। इसमें वैक्स लगा होता है जो मसूड़ों को बीमारियों से बचाता है। दिन में कुछ भी चिपचिपा खाते हैं तो उसके बाद कुल्ला जरूर करें। जरूरत लगे तो डॉक्टर को भी दिखाएं।
एक्सपट्र्स- डॉ. रोहन गुप्ता और डॉ. अपर्णा सिंह, दंत रोग विशेषज्ञ



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HEADACHE : सिरदर्द सताए तो ये घरेलू नुस्खे आजमाएं, तत्काल मिलेगी राहत

जयपुर. सिरदर्द की तकलीफ हर किसी को थोड़ी या अधिक होती ही है। काम की अधिक, वित्तीय प्रबंधन या संबंधों में कड़वाहट के चलते जब मन बेचैन होता है तो दिमाग में रक्त का संचार धीमा पड़ जाता है, जिससे यह परेशानी होती है। ज्यादातर लोग नियमित रूप से सिरदर्द की दवा लेने लगते हैं, जो कई तरह की समस्याएं पैदा कर सकती हैं। कुछ घरेलू और ऐसे उपाय हैं, जिन्हें घर पर ही आजमाया जाए तो सिरदर्द से आराम मिलता है। सबसे बड़ी औषधि तो खुश रहना ही है। मुश्किल हालातों में धैय नहीं खोएं और शांत रहें। ध्यान डाइवर्ट करें। अच्छा संगीत या पौधों की देखभाल करने से भी सिरदर्द में राहत मिलती है। अलबत्ता इन उपायों से राहत मिल जाती है, लेकिन लगातार रहे तो डॉक्टर से परामर्श करना चाहिए। कुछ घरेलू उपाय सिरदर्द से तत्काल राहत दे सकते हैं।


1. तुलसी की पत्तियां
सिर दर्द होने पर कुछ लोग चाय या कॉफी पीते हैं। आप तुलसी की पत्तियों को पानी में उबालकर उसका सेवन करें। ये किसी भी चाय और कॉफी से कहीं अधिक कारगर और फायदेमंद है।

2. लौंग सूंघें
तवे पर लौंग की कुछ कलियों को गर्म कीजिए। अब गर्म लौंग की कलियों को एक रूमाल में बांध लीजिए। कुछ-कुछ देर पर इस पोटली को सूंघते रहिए। सिर दर्द कम हो जाएगा।

3. सेब पर नमक लगाकर खाएं
अगर आपको सिर दर्द है तो आप एक सेब काट लें और उस पर नमक लगाकर खाएं। सिर दर्द में राहत पाने के लिए ये एक बहुत ही कारगर उपाय है। हालांकि एसिडिटी के कारण होने वाले सिरदर्द में इसका प्रयोग पूछकर ही करें।

4. काली मिर्च और पुदीने की चाय
सिरदर्द में काली मिर्च और पुदीने की चाय का सेवन करना भी बहुत फायदेमंद होता है। आप चाहें तो ब्लैक टी में पुदीने की कुछ पत्तियां मिलाकर भी ले सकते हैं।

5. एक्यूप्रेशर
सिरदर्द होने पर अपनी दोनों हथेलियों को सामने ले आइए। इसके बाद एक हाथ से दूसरे हाथ के अंगूठे और इंडेक्स फिंगर के बीच की जगह पर हल्के हाथ से मसाज करें। ये प्रक्रिया दोनों हाथों में दो से चार मिनट तक दोहराइए। ऐसा करने से आपको सिरदर्द में आराम मिलेगा।



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रात में सीधे सोते समय खांसी आना हृदय रोग के लक्षण भी हो सकते हैं

सवाल- मेरी उम्र 60 वर्ष है। कई बार दिन के समय अचानक आंखों के आगे अंधेरा, चक्कर या बेहोशी छा जाती है? एक पाठक
जवाब-कम उम्र में इसके कई कारण हो सकते हैं, लेकिन आपकी उम्र अधिक है और दिन में ऐसा हो रहा है तो हो सकता है कि हार्ट रेट (दिल की धडक़न) कम हो रही हों। क्योंकि आमतौर पर रात में आराम के वक्त यह समस्या नहीं होती है। डॉक्टरी सलाह से ईसीजी करवाएं। हो सकता है कि हृदय में रुकावट हो रही है। इसको साइनस पॉजेज कहते हैं। इसके लिए डॉक्टर शुरू में कुछ दवाइयां देते हैं और फिर पेशमेकर लगाते हैं। इसके बाद दिल की धडक़न सामान्य हो जाती है।
सवाल-थोड़ा काम करने के बाद थकान, रात में सीधे सोने पर खांसी आती है और सांस फूलता है। बैठकर सांस लेना पड़ता है? एक पाठक
जवाब-यह हृदय रोग हो सकता है। इसमें हार्ट की पंपिंग क्षमता बहुत कम हो जाती है। हार्ट में मौजूद फ्लूड को वह बाहर नहीं निकाल पाता है जो फेफड़ों, पेट और गुर्दे में चला जाता है। फेफड़ों में जाने से खांसी और गुर्दे में जाने से यूरिन कम आता है, पैरों में सूजन आ जाती है। पेट में जाने से अफारा आता है। नमक और लिक्विड कम मात्रा में लेना चाहिए। डॉक्टर कुछ दवाइयां देते हैं जिससे यूरिन ज्यादा निकले इसके बाद आराम मिलता है।
डॉ. राहुल सिंघल और डॉ. हेमंत चतुर्वेदी, हृदय रोग विशेषज्ञ



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हीट स्ट्रोक के मरीजों को ठंडे पानी से नहलाने पर मिलती है राहत

सवाल -मेरी उम्र 55 वर्ष है और दस वर्ष से डायबिटीज है। अभी शरीर पर पस वाली फुंसियां निकाल आई हैं। क्या करें? एक पाठक
जवाब-गर्मी में पसीने से फुंसियां ज्यादा निकलती हंै, लेकिन डायबिटीज के मरीजों में यह परेशानी अधिक होती है। पस वाली फुंसियों से दिक्कत हो सकती है। डायबिटीज कंट्रोल रखें। खानपान में परहेज और नियमित व्यायाम करें। इसके साथ ही हाइजीन का ध्यान रखें। नहाते समय शरीर को अच्छे से रगड़ें ताकि पसीने के कारण बंद नलियां खुल जाएं और फुंसियां निकलना बंद हो जाएं। अगर पस ज्यादा है तो अपने डॉक्टर को दिखाकर इलाज लें। लापरवाही से बुखार भी आ सकता है। फुंसियां बड़ी हो सकती हैं।
सवाल-तेज बुखार के साथ थकान, बेहोशी छाने जैसा और चिड़चिड़ापन महसूस हो रहा है। इसके लिए क्या करें? अनेक पाठक
जवाब-तेज बुखार, चिड़चिड़ापन और बेहोशी छाने जैसे लक्षण हीट स्ट्रोक (लू) के होते हैं। बच्चों, बुजुर्गों और बीपी के रोगियों को इसका खतरा अधिक रहता है। धूप से बचाव करें। खूब पानी पीएं। हल्के कपड़े पहनें। अगर हीट स्ट्रोक का रोगी है तो उसको ठंडे पानी से नहलाएं। तुरंत राहत मिलती है। ऐसे मरीजों को लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए। हीट स्ट्रोक का असर हृदय, फेफड़ों और दिमाग पर भी हो सकता है। ज्यादा समस्या है तो डॉक्टर को दिखाएं।
डॉ. विनय सोनी और डॉ. पुनीत रिझवानी, सीनियर फिजिशियन



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Saturday, 27 June 2020

उदास और निराश रहना भी है बीमारी के लक्षण

अक्सर गुमसुम रहना, दूसरे लोगों से घुलने-मिलने से बचना, अपने मन की बात दूसरों को को आसानी से न समझा पाना जैसे लक्षण तीन साल की उम्र से लेकर जीवनभर दिख सकते हैं। ये लक्षण एस्पर्जर सिंड्रोम के हो सकते हैं। जो ऑटिज्म स्पैक्ट्रम डिस्ऑर्डर का एक प्रकार है।

लक्षण - इनके मरीज किसी भी कार्य को करने का अपना तरीका बनाते हैं, इसमें कोई बदलाव इन्हें पसंद नहीं आता।
रोग से पीड़ित व्यक्ति अलग व अकेला रहना पसंद करते हैं। इससे ग्रसित बच्चों की सीखने की क्षमता धीमी होती है। ये बोलने और नई भाषा सीखने में देरी करते हैं।

इससे पीडि़त कई मरीज बहुत प्रतिभावान भी होते हैं, वे किसी एक फील्ड जैसे म्यूजिक, एक्टिंग जैसा कोई एक काम बहुत अच्छी तरह से कर दिखाते हैं। ये बहुत कम चीजों को एंजॉय करते है जैसे उन्हें डांस करना पसंद है तो जरूरी नहीं कि म्यूजिक भी उन्हें अच्छा लगे। ये दूसरों की आंखों में देखकर बात करने से कतराते हैं।

कारण : रोग की मुख्य वजह फिलहाल अज्ञात है। एक्सपट्र्स का मानना है कि ये एक जेनेटिक बीमारी है। यानी परिवार में किसी को यह समस्या होगी तो उसके आगे की पीढ़ी में भी ये हो सकती है।

उपचार - इस बीमारी का पूरी तरह से निदान संभव नहीं है लेकिन कुछ थैरेपी और काउंसलिंग से इसे नियंत्रित किया जा सकता है। जैसे स्पेशल एजुकेशन, स्पीच थैरेपी, अभिभावकों की काउंसलिंग, सामाजिक मेल-मिलाप व व्यवहार में बदलाव और दवाएं। साइकोलॉजिस्ट, स्पीच थैरेपिस्ट और चिकित्सक एक टीम वर्क के रूप में इसका इलाज करते हैं। उपचार से बच्चे सामाजिक व्यवहार व संवाद में आने वाली समस्याओं को नियंत्रित करना सीखते हैं।



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सेहत के लिए नुकसानदायक है ज्यादा शक्कर का सेवन, एेसे करें कंट्रोल

शुगर एडिक्शन यानी ज्यादा चीनी खाने की लत। आजकल लाइफस्टाइल बीमारियों में से आधी से ज्यादा चीनी के कारण हो रही हैं। रिसर्च भी बताती हैं कि अधिक मीठा खाना एक बॉयोलॉजिकल एडिक्शन है यानी ऐसी लत जो आपसे आपके परिवार में फैल सकती है। चीनी में सिर्फ कैलोरी होती है उसमे प्रोटीन , विटामिन या खनिज आदि पोषक तत्व नहीं होते। ज्यादा चीनी के उपयोग से पोषक तत्वों की कमी हो जाती है। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी कोशिका की अनियंत्रित वृद्धि का परिणाम होता है। इस वृद्धि के नियंत्रण में इन्सुलिन की अहम् भूमिका होती है। अधिक चीनी के उपयोग से इन्सुलिन पर बुरा असर पड़ता है जो कैंसर का कारण बन सकता है।

हम हर रोज खा जाते हैं इतनी चीनी-
औसतन वयस्क 10 से 20 छोटे चम्मच चीनी किसी न किसी रूप लेते हैं।
बच्चे 15 से 34 छोटे चम्मच चीनी किसी न किसी रूप में खा जाते हैं।

रोजाना इतनी लेनी चाहिए शुगर-
सभी रूपों में 5 चम्मच महिलाओं के लिए और 9 चम्मच पुरुषों के लिए।
4 चम्मच चीनी की मात्रा छोटी उम्र के बच्चों के लिए पर्याप्त है।



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सेहत के लिए फायदेमंद है गेहूं, बाजरा, मक्का और जौ का दलिया

आमतौर पर छोटे बच्चे या स्कूलगोइंग को अलग-अलग वैरायटी का खाना पसंद होता है। ऐसे में स्वाद व पौष्टिकता से भरपूर दलिया एक अच्छा विकल्प हो सकता है। यह आसानी से पचने वाला भोजन है जो गेहूं, बाजरा, मक्का और जौ को दरदरा पीसकर बनाया जाता है। सेहत के अनुसार यह संपूर्ण डाइट है। इसे विभिन्न तरीके से पकाया व खाया जा सकता है।

न्यूट्रिशन फैक्ट -
सेहत का खजाना कहा जाने वाला दलिया शारीरिक विकास व एनर्जी के लिए अहम है। खासतौर पर बच्चों में हड्डियों की मजबूती और पेट की कार्यप्रणाली दुरुस्त करने के लिए इसे खाने की सलाह दी जाती है। दलिया प्रोटीन का अच्छा स्त्रोत है। साथ ही इसमें फाइबर, कैल्शियम, मिनरल, विटामिन, एंटीऑक्सीडेंट्स आदि पाए जाते हैं।

खाने के विकल्प-
दिन के किसी भी मील (नाश्ता, लंच या डिनर) का हिस्सा बनाकर खाए जाने वाले दलिए को मीठा, नमकीन, स्प्राउट, दूध के साथ, वेजिटेबल दलिया या फ्रूट दलिया बनाकर भी खाया जा सकता है। जानते हैं इनके बारे में-

नमकीन दलिया : यह पाचनतंत्र को दुरुस्त कर सोडियम तत्त्व की पूर्ति और हड्डियों को मजबूती देता है। इसे वेजिटेबल दलिया भी कहते हैं।
विधि: दो कप दलिए को थोड़े कुकिंग ऑयल में भूनकर अलग रखें। पैन में थोड़ा ऑयल गर्म कर इसमें जीरा, हींग, प्याज, अदरक, लहसुन का तड़का लगा लें। इसमें भुना दलिया, टमाटर, पत्तागोभी, मटर व अन्य मौसमी सब्जियां मिलाकर स्वादानुसार नमक, मसाले व ३ कप पानी डालें।

मीठा : गुड़ या चीनी मिलाकर तैयार दलिया पचने में काफी हल्का होता है। यह शरीर में एनर्जी को बरकरार रखने में मदद करता है।
विधि: कुकर में एक चम्मच घी गर्म कर एक कप दलिया भूनें। दो कप पानी डालकर कुकर में दो सीटी आने तक पकाएं। इसके बाद इसमें आधा कप चीनी या थोड़ा गुड़ मिलाकर पकाएं। चीनी का पानी सोखने के बाद दलिए में सूखे मेवे मिला सकते हैं।

फ्रूट : नेचुरल मीठा होने की वजह से फल दलिए के स्वाद को बढ़ा देते हैं। खासकर बच्चे इसे खाना ज्यादा पसंद करते हैं।
विधि: कम चीनी या गुड़ वाले तैयार मीठे दलिए में कुदरती मीठे फल डाल सकते हैं। दलिए को खिला-खिला पकाएं। एक बाउल में सेब, केला, नाशपाती के टुकड़े, अंगूर, अनार के दाने मिलाएं। दलिए को फलों और सूखे मेवों के साथ मिक्स कर खाएं।

खीर के रूप में : दूध-दलिए का कॉम्बिनेशन हैल्दी डाइट है। बच्चे को यदि नाश्ते में एक कटोरी दलिए की खीर दी जाए तो शरीर में एनर्जी बनी रहेगी।
विधि: एक कटोरी मीठे दलिए में या बिना चीनी व नमक के पके फीके दलिए में समान मात्रा में गर्म दूध मिक्स कर लें। ऊपर से स्वादानुसार चीनी या गुड़ भी मिला सकते हैं। चाहें तो इसमें इलायची, केसर और चीनी के बजाय भीगी हुई किशमिश को भी मिला सकते हैं।

प्रोटीन - जौ को दरदरा पीसकर बनाया गया दलिया प्रोटीन से भरपूर है। जिसमें किसी प्रकार की सब्जी या फल मिक्स करने की जरूरत नहीं होती। लेकिन गेहूं, बाजरा व मक्का से तैयार दलिए में प्रोटीन की मात्रा थोड़ी कम होती है। इसके लिए इसमें छिलके वाली मूंग की दाल या मिक्स दाल को मिलाना पड़ता है। साथ में मूंगफली के दानों को भी मिला सकते हैं।

दलिया खाने के फायदे-
इसमें फैट और कोलेस्ट्रॉल की मात्रा काफी कम होती है जिससे यह वजन नियंत्रित करने और पेट साफ रखने में मदद करता है। ऐसे व्यक्ति जिनकी इम्युनिटी किसी प्रकार की बीमारी के कारण कमजोर हैं, उनके लिए यह सुपरफूड होता है। अक्सर मरीजों में कुछ भी ठोस या मसालेदार चीजों को खाने से परेशानी बढ़ जाती है, उस स्थिति में अक्सर दलिया खाने की सलाह दी जाती है। इसका फायदा यह है कि यह आंतों पर दबाव नहीं बनाता और आसानी से पच जाता है। इसलिए आंतों में घाव, रुकावट या इस अंग की कमजोरी से पीडि़त मरीजों के लिए यह सेहतमंद डाइट है। यह विटामिन-बी1 और बी2 का बेहतरीन स्त्रोत है। जो बच्चों में भूख, एनर्जी और इम्युनिटी बढ़ाते हैं।



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पुरुषों की तुलना में महिलाएं लगातार काम करने से अवसाद में आ जाती हैं

कामकाज का हमारे मानसिक स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ता है इसा बारे में अभी तक बहुत ज्यादा शोध नहीं किए गए हैं। वहीं स्त्री और पुरुष में कामकाज की अधिकता, ऑफिस वर्क का दबाव और लगातार कई-कई घंटे तक काम करने की वतह से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य किस तरह प्रतिक्रिया करता है यह भी बहुत स्पष्ट नहीं है। इस रहस्यसे पर्दा उठाने के लिए ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन के वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन किया। उनके इस अध्ययन में सामने आया कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं के तनाव और अवसाद से ग्रसित होने की अधिक आशंका होती है। लंबे समय तक काम करने के कारण महिलाओं में अवसाद के लक्षण बढ़ सकते हैं लेकिन पुरुषों में ऐसा नहीं है। अध्ययन में पाया गया है कि पुरुषों की तुलना में महिलाएं अगर हफ्ते में 55 घंटे से ज्यादा काम कर लें तो उनके अवसा से पीडि़त होने की आशंका अधिक होती है। इस लिहाज से देखें तो भारत में काम केघंटे अन्य देशों की तुलना में सबसे ज्यादा हैं और शहरों में लोग औसतन एक हफ्ते में 53 से 54 घंटे काम करते हैं। वहीं ग्रामीण क्षेत्र में यह आंकड़ा एक सप्ताह में लगभग 46 से 47 घंटे का है।

पुरुषों की तुलना में महिलाएं लगातार काम करने से अवसाद में आ जाती हैं

55 घंटे काम तो अवसाद ज्यादा
शोध में सामने आया कि औसतन एक सप्ताह में 55 घंटे या उससे ज्यादा काम करने वाली महिलाएं 35 से 40 घंटे प्रति सप्ताह काम करने वाली अपनी समकक्ष महिलाओं की तुलना में ज्यदा काम करती हें तो उनमें चिड़चिड़ापन, तनाव, चिंता, गुस्सा और भावनात्मक तारतम्य बिगडऩे का जोखिम ज्यादा होता है। शोधकर्ताओं ने अपने शोध में यह भी पाया कि महिलाओं की तुलना में पुरुषों में ५५ घंटे प्रति सप्ताह या उससे ज्यादरा समय तक काम करने पर इस तरह के कोई लक्षण नहीं आते यानी उन पर काम की अधिकता का कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता। अध्ययन के प्रमुख लेखक, यूसीएल इंस्टीट्यूट ऑफ एपिडेमियोलॉजी एंड हेल्थ केयर के गिल वेस्टन का कहना है कि दोनों परिणामों में यह अंतर महिलाओं और पुरुषों की लैंगिक भूमिकाओं और जिम्मेदारियों के प्रति पूर्वाग्रह के कारण हो सकता है।

पुरुषों की तुलना में महिलाएं लगातार काम करने से अवसाद में आ जाती हैं

अवसाद यानी कार्यकुशलता में गिरावट
वेस्टन का कहना है कि अगर आपको अपने काम से प्यार नहीं है तो यह स्थिति और भी भयावह हो जाती है। क्योंकि काम के अधिक घंटे सीधेतौर से कार्यकुशलता में गिरावट और तनाव से स्वाभाविक रूप से जुड़े हुए हैं। अधिक अवसाद का कारण कार्यकुशलता में तेजी से गिरावट का कारण भी बनता है। सामान्य घंटों से अधिक काम करने वाली महिलाओं का कहना है कि तनाव का अनुभव न भी हो तो भी लंबे समय तक काम करने से कार्य दक्षता हर महिला के मामले में प्रभावित होती है।



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अगर सेहतमंद रहना है तो ये फिटनेस एप हैं बड़े काम की

इन दिनों स्मार्टवॉच और स्मार्टफोन के जरिए अपनी सेहत की नब्ज टटोलना आम बात है। ये स्मार्ट गैजेट हमें बताते हें कि हमने आज अपनी सेहत का खयाल रखने के लिए कितने कदम चहलकदमी की या कितने कैलोरी का सेवन किया। लेकिन हर व्यक्ति की जरुरत और सेहत से जुड़े मुद्दे अलग होते हैं। ऐसे में कोई तय मापदंड नहीं हो सकता। जैसे ट्रैकिंग डिवाइस का उपयोग करने से अक्सर खाने के विकारों के लक्षण बढ़ जाते हैं। यह भी देखना जरूरी है कि क्या ये उपाय आपके दीर्घकालिक लक्ष्यों में योगदान कर सकते हैं। आइए जानते हैं कि कौन-सी ऐप आपकी सेहत और जरुरत के हिसाब से बेहतर परिणाम दे सकती है।

आपकी सेहत का पल-पल का बेहतर हाल बताएंगी ये हैल्थ एप्स

ऐट फूड डायरी, सेहत का डॉक्टर
ऐट फूड डायरी एक ऐसा ऐप है जो हमें यह बताता है कि कैलोरी की बजाय हम इस बात पर ध्यान केंद्रित करें कि हमारा भोजन हमें कैसा महसूस करवाता है। स्वास्थ्य और सेहत को लेकर आपका जो भी लक्ष्य है उसे ऐप में टाइप करें, जैसे 'ईट बैटर' या 'लूज वेट'। इसके तुरंत बाद ऐप आपको विशिष्ट चरणों का चयन करने के लिए संकेत देता है जो व्यवहार-आधारित दर्जनों विकल्पों के माध्यम से हमें तय लक्ष्यों की ओर ले जाता हैं। जैसे यह अक्सर खुद खाना बनाने की सलाह देता है, रात के खाने के बाद स्नैक्स लेने से रोकता है और पौधों से अपना अधिकांश भोजन लें। यह आपको भोजन की फोटो और उससे संबंधित आंकड़ों का एक विजुअल मिलता है। ऐप का बेसिक वर्शन मुफ्त हैए लेकिन आप प्रश्नों को निजीकृत कर अन्य लाभ भी प्राप्त कर सकते हैं।


किन के लिए है: यह ऐप उन लोगों के लिए बेहतर है जो अपने खाने-पीने को ट्रैक करना चाहते हैं साथ ही किसी खाने संबंधी से डिस्ऑर्डर से ग्रसित न हों।

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रिकवरी रेकॉर्ड से मिले संतुलित डेटा
इस ऐप को एक ईटिंग डिसऑर्डर रिकवरी ऐप के रूप में डिज़ाइन किया गया था। लेकिन यह किसी के लिए भी भोजन और शरीर के साथ बेहतर संबंध बनाने का एक प्रभावी उपकरण हो सकता है। ऐप आपको यह निगरानी करने में सक्षम बनाता है कि आप क्या खाते हैं और इसके साथ जुड़ी हुई भावनाएं, किस प्रकार के अवांछित व्यवहारों को उजागर करते हैं या नहीं। जैसे कि भोजन छोडऩा या भूख मारना। साथ ही यह इन परेशानियों से निपटने के लिए आप में कौशल भी विकसित करता है, साथ ही नियमित भोजन पैटर्न और रणनीति स्थापित करने में भी मदद करता है। यह ऐप उस समय आपको टोकता है जब आपके खाने की आदत अनियंत्रित होने लगे या भूख लगने के किसी अवांछित कारण से आपको सचेत करता है। यह ऐप भी निजी उपयोग के लिए निशुल्क उपलब्ध है।


किन के लिए है: यह उन लोगों के लिए अच्छा ऐप है जो भोजन से जुड़े डिस्ऑर्डर से उबरने या खुद को शेप में लाने के लिए जूझ रहे हैं।

आपकी सेहत का पल-पल का बेहतर हाल बताएंगी ये हैल्थ एप्स

एम आई हंगरी यानि निजी डायटीशियन
यह ऐप मन से अधिक और भाावनात्मक रूप से कम खाने में मदद करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह आपको अपनी आंतरिक भूख के संबंध में संकेतों का जवाब देने, तनाव या ऊब जैसी अन्य भावनाओं के समय खुद को परखने वाले प्रश्नों के एक सेट के जरिए मदद करता है। यह आपको स्मार्टली खाने के लिए प्रेरित करता है। यह बहुत ही प्रभावशाली ऐप है। जब आप ऐप पर 'मैं खाना चाहता हूं' टाइप करते हैं तो यह ऐप आपको स्क्रीन पर बने 'डिसीजन ट्री' से मार्गदर्शन करता है। ताकि आपको यह निर्धारित करने में मदद मिल सके कि आप क्यों, कब, क्या और कितना खाना चाहते हैं। यह ऐप अपने 10 स्केल वाले भूख-परिपूर्णता रेटिंग स्केल और रणनीतियों के जरिए भी सचेत करता है जब आप बिना भूख लगे ही कुछ खाने पहुंच जाते हैं।


किन के लिए है: यह उन लोगों के लिए अच्छा ऐप है जो अधिक भावुक, आत्म-पोषण वाले भोजन की ओर भावनात्मक और आवेगपूर्ण भोजन से दूर जाने की कोशिश कर रहे हों।

आपकी सेहत का पल-पल का बेहतर हाल बताएंगी ये हैल्थ एप्स

इनसाइट टाइमर यानि नींद का खयाल
इनसाइट टाइमर एक और ऐप है जो सेहत के सफर पर आपको अधिक मन लगाकर खाने और बेहतर जीवन जीने में मदद कर सकता है। यह चिंता से निपटने और अच्छी नींद के लिए हमारा मार्गदर्शन करता है। ऐप के सर्च फंक्शन में 'माइंडफुल ईटिंग' में प्रवेश करने पर तीन से लेकर 30 मिनट तक चलने वाले फ्री गाइडेड मेडिटेशन की पूरी श्रृंखला मौजूद है। इस ऐप पर कई विकल्प मौजूद हैं जो अच्छी नींद और तनाव का सामना करने के लिए हमें बेहतर मार्गदर्शन देते हैं। इसके ऑडियो लैसन को ऑफलाइन भी सुना जा सकता है। इस फ्री ऐप में ऐसे चार्ट हैं जहां आप अपने पूरे किए गए मेडिटेशन को ट्रैक भी कर सकते हैं।


किन के लिए है: यह उन लोगों के लिए बेहतर है जो सेहत के साथ दिमागी सुकून और विचारशील दृष्टिकोण पाना चाहते हैं।

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शापा यानि सेहत का तकनीकी आइना
यह सिर्फ एक ऐप नहीं है, बल्कि एक पैमाना है जो आपकी सेहत से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। ऐप आपके सामान्य वजन में उतार-चढ़ाव को ध्यान में रखते हुए आपके रंग, वजन और शरीर की संरचना में बदलाव के आधार पर एक शेड प्रदर्शित करता है। 10 दिनों के कैलीब्रेशन पीरियड के बाद ऐप शुरू में इसे निर्धारित करता है। हरे रंग के डिस्प्ले का मतलब है कि सेहत संबंधी आपकी आदतों में स्थिरता है और उतार-चढ़ाव की सामान्य सीमा के भीतर हैं। ऐसे ही ग्रे रंग आपको भोजन और शरीर में वजन एवं वसा के ज्यादा होने का संकेत देता है। वहीं नीले रंग का मतलब है कि आप अपना वजन कम कर रहे हैं। यह हमारे खान-पान संबंधी सार्थक पैटर्न को ट्रैक करता है। हर बार जब आप इस पर खुद को परखते हैं तो ऐप आपके रंग को प्रदर्शित करता है और शुरुआत में आपके बताए सेहत संबंधी लक्ष्यों और निजी जानकारी के आधार पर वेलनेस मिशन के बारे में सुझाव देता है।

किन के लिए है: यह उन लोगों के लिए बेहतर है जो अपना वजन और बॉडी फैट घटाना या स्थिर बनाए रखना चाहते हैं।



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