Saturday, 30 September 2023

कम उम्र मेंं कमजोर हो रहीं पैरों की मांसपेशियां, जानें कब नंगे पैर या जूते पहनकर चलें-दौड़ें

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की रिसर्च में यह साबित हुआ है कि पैरों की मांसपेशियां कमजोर होने की समस्या तेजी से बढ़ रही हैं। इसका मुख्य कारण गलत प्रकार के जूते पहनकर दौडऩा या गलत जगह नंगे पैर चलना है। गलत तरह के जूते हमारे फुट आर्च को सपोर्ट नहीं करते हैं। इससे चोट की आशंका बढ़ती है। वहीं बहुत से लोगों को पता ही नहींं है कि कब नंगे पैर चलना चाहिए। आज जानते हैं कि कब नंगे पैर चलना चाहिए और कब किस तरह के जूते-चप्पल पहनकर दौड़ेंं-चलें।

First understand what is foot arch पहले समझें कि क्या होता है फुट आर्च
कुछ व्यक्तियों के पैरों के तलवों को छोडक़र अधिकतर के पैरों में अंदर की ओर एक कर्व होता है। इसे ही आर्च सपोर्ट कहते हैं। यह न केवल व्यक्ति को जमीन से जोडक़र रखता है बल्कि स्प्रिंंग की तरह आगे की ओर भी बढ़ाता है। जानकारी के अभाव में इसमें समस्या हो जाती है। मांसपेशियां कमजोर होती हैंं।

40% एड़ी और टखने में चोट की वजह गलत तरह के जूते पहनना।

20 से अधिक बीमारियों से बचाव करता है नंगे पैर चलना, लाइफ स्टाइल बीमारियों मेंं भी बचाव होता

10% स्पोट्र्स इंजरी की वजह गलत गैजेट्स पहनना व टेक्नीक न जानना।

When is it beneficial to walk barefoot? कब नंगे पैर चलना फायदेमंद होता है?

अगर कोई व्यक्ति रोज 30-40 मिनट नंगे पैर चलता है तो इससे न केवल पैरों का संपूर्ण विकास होगा बल्कि पैरोंं का आर्च भी सही रहेगा। जब किसी व्यक्ति का फुट आर्च सही रहता है तो संतुलन बनाने मेें समस्या नहीं होती है। वहीं जिनमें फ्लैट फुट की समस्या होती है तो उसमेंं चलने में असुविधा होती है। नंंगे पैर न केवल बड़े ही चलें, बल्कि बच्चों के लिए भी अच्छा होता है। इससे उनकी ग्रोथ अच्छी होती है। घास, बालू-मिट्टी या समुद्र के किनारों पर नंगे पैर वॉक करना अच्छा होता है।

Why not walk barefoot on hard surfaces कठोर सतह पर नंगे पैर क्यों नहीं चलेंं

कठोर सतह पर नंगे पैर चलने से बहुत नुकसान होता है। इससे मांसपेशियां कमजोर होती हैंं, मांसपेशियों में तनाव होता और असंंतुलन की समस्या होती है। गिरने से चोट की आशंका कई गुना बढ़ जाती है। इनमें भी लिगामेंंट इंजरी की आशंका रहती है। अगर कठोर सतह है तो पूरे शरीर का भार जोड़ों के बीच वाले मांस पर पड़ता है। फट सकता है। लिगामेंट इंजरी को ठीक होने मेंं काफी समय लगता है।

Should one wear slippers at home or not? घर में चप्पल पहननी चाहिए या नहीं?

अक्सर घर मेंं लोग जूते-चप्पल नहीं पहनते हैं। आजकल हर घर में टाइल्स और मार्बल के फर्श हैं। इनसे नुकसान होता है। घर मेंं अच्छी कुशनिंग वाली रबड़ की चप्पल पहननी चाहिए।

नंगे पैर चलने के फायदे: तेजी से वजन घटता, डायबिटीज, ब्लड प्रेशर और हार्ट से जुड़ी बीमारियोंं से बचाव। मानसिक बीमारियों में भी राहत मिलती है।

How should shoes be? कैसे होने चाहिए जूते

ऐसे जूते पहनें जिनके तलवे बहुत ज्यादा न तो मुलायम और न ही बहुत ज्यादा कुशनिंंग वाले होने चाहिए। ऐसे जूते पहनेंं जो पैरोंं के आर्च को सपोर्ट करते हों। आगे बढऩे के लिए प्रेरित करते हों।

Why not wear flat and high heel shoes and slippers? क्यों नहीं पहनें फ्लैट और हाई हील वाले जूते-चप्पल?: इन दोनों ही तरह के जूते और चप्पल पैरोंं के आर्च को सपोर्ट नहीं करते हैं। इनसे पैरों और पैरों की मांंसपेशियोंं को नुकसान होता है। धीरे-धीरे पैरोंं की मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं। प्लांटर फैसियाटिस की बीमारी हो जाती है।

Spongy and soft soles can cause harm स्पंजी और मुलायम सोल से नुकसान हो सकता है : जैसे-जैसे तकनीक विकसित हुई जूते के सोल मुलायम होते गए। लेकिन ध्यान रखेंं कि ज्यादा मुलायम और स्पंंजी जूते सेहत के हिसाब से सही नहीं होते हैंं। पैरों की कुशनिंग ठीक नहीं होती है। इनसे इंजरी होने की आशंका रहती है। कई बार बहुत महंगे जूते भी नुकसान पहुंचाते हैं।

Wear shoes according to the game गेम के हिसाब से पहनेंं जूते: अब हर स्पोट्र्स के हिसाब से जूते बन रहे हैं। पहले एक तरह के जूते हर तरह के खेलों में पहने जाते थे। इससे स्पोट्र्स इंजरी की आशंका कई गुना रहती थी। जैसे क्रिकेट वाले जूते पहनकर फुटबॉल नहीं खेले सकते हैं। स्पोट्र्स प्लेयर्स पैरों के आर्च और बायोमेकैनिज्म को सपोर्ट करने वाले जूते ही पहनेंं।



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अब AI की मदद से मोटापे और मधुमेह का इलाज संभव , चीनी वैज्ञानिकों ने बनाई नई दवा

AI-developed weight loss drug for obesity : चीनी वैज्ञानिकों की एक टीम ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Chinese AI-developed weight loss drug) की शक्ति का उपयोग करके एक नई वजन घटाने की दवा विकसित की है जो न केवल बढ़ते मोटापे का मुकाबला कर सकती है बल्कि टाइप 2 मधुमेह का भी इलाज कर सकती है।

AI-developed drug for type 2 diabetes : एआई-संचालित ड्रग डिस्कवरी कंपनी माइंडरैंक द्वारा विकसित, MDR-001 नामक दवा ग्लूकागन-जैसे पेप्टाइड-1 रिसेप्टर (GLP-1-R) से बंधकर काम करती है - जो एक अच्छी तरह से स्थापित दवा लक्ष्य है, साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट (SCMP) ने बताया।

इस रिसेप्टर से बंधकर, दवा अग्न्याशय से इंसुलिन रिलीज को उत्तेजित करती है, जो रक्त शर्करा के स्तर को कम करने और वजन कम करने में मदद करता है।

जून में, MDR-001 ने चरण 1 के क्लिनिकल परीक्षणों को सफलतापूर्वक पूरा किया, जिससे इसकी बेहतर प्रभावकारिता और सुरक्षा की पुष्टि हुई।

रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर की शुरुआत में, इसने अपने चरण 2 के क्लिनिकल परीक्षण शुरू किए, जिसमें प्रतिभागियों को कई खुराक में दवा दी गई। दवा वर्तमान में अपने चरण 2 के क्लिनिकल परीक्षणों में प्रवेश कर चुकी है।

माइंडरैंक के एक एआई ड्रग डिस्कवरी वैज्ञानिक जिन ज़ुरुई के हवाले से कहा गया, "पाइपलाइन के प्रीक्लिनिकल विकास को पूरा होने में तीन से चार साल लगते हैं। हालांकि, MDR-001 ने 19 महीनों में FDA (फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन) और NMPA (नेशनल मेडिकल प्रोडक्ट्स एडमिनिस्ट्रेशन) दोनों से इन्वेस्टिगेशनल न्यू ड्रग (IND) अनुमोदन प्राप्त किया, जो प्रभावी रूप से गति को दोगुना कर रहा है।"

यह उल्लेखनीय उपलब्धि माइंडरैंक के स्व-विकसित AI कंप्यूटिंग प्लेटफॉर्म मॉलिक्यूल प्रो और डेटा सेंटर द्वारा संभव बनाई गई थी, जो ड्रग डेवलपमेंट के हर चरण में योगदान देते हैं।

MDR-001 भी चीनी कंपनियों के उस बहु-बिलियन डॉलर के बाजार में प्रवेश को चिह्नित करता है जिस पर वर्तमान में अमेरिकी दवा उद्योग का वर्चस्व है।



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15 दिन में लंबे, चिकने और चमकदार बालों के लिए अलसी का चमत्कार

अलसी बालों के लिए क्यों फायदेमंद है?

Flaxseeds: The Secret to Silky, Shiny Hair : अलसी बालों के लिए एक प्राकृतिक सुंदरता बढ़ाने वाला है। यह बालों के रोम को अंदर से पोषण देता है, स्वस्थ विकास में सहायता करता है और बालों का टूटना कम करता है। अलसी प्रोटीन, विटामिन ई और ओमेगा-3 फैटी एसिड जैसे जरूरी पोषक तत्वों से भरपूर है। ये पोषक तत्व स्कैल्प की नमी को बैलेंस बनाए रखते हुए ड्राईनेस और रूसी से बचने में मदद करते हैं। अलसी के सूजन-रोधी गुण सिर की सूजन को भी शांत कर सकते हैं और इसका ओमेगा-3 फैटी एसिड आपके बालों को शानदार चमक देने में मदद करता है जिससे वे चिकने और चमकदार दिखते हैं।

अलसी के बीज से बालों के लिए मास्क कैसे बनाएं?

अलसी के बीज से बालों के लिए कई तरह के मास्क बनाए जा सकते हैं। यहां कुछ आसान और प्रभावी तरीके दिए गए हैं:

अलसी के बीज और दही का मास्क: इस मास्क को बनाने के लिए, 2 बड़े चम्मच दही, 1 बड़ा चम्मच पिसा हुआ अलसी पाउडर और आधा बड़ा चम्मच शहद मिलाएं। इस मिश्रण को अपने बालों पर लगाएं और इसे लगभग 1 घंटे तक हवा में सूखने दें। फिर इसे हमेशा की तरह धो लें।

अलसी जेल: अलसी जेल बनाने के लिए, 1/4 कप अलसी और 2.5 कप पानी को एक पैन में मिलाएं। मिश्रण को थोड़ी देर तक उबालें और फिर इसमें थोड़ा सा एलोवेरा जेल मिलाएं। जब मिश्रण जेल जैसा दिखने लगे, तो बर्नर बंद कर दें और इसे लगभग 1 घंटे तक ठंडा होने दें। फिर इसे स्कैल्प पर लगाएं और इसे लगभग 30 मिनट तक हवा में सूखने दें। अंत में, इसे हमेशा की तरह धो लें।

केला और अलसी का मास्क: इस मास्क को बनाने के लिए, 1 चम्मच अलसी पाउडर, 1 कटा हुआ केला, 1 बड़ा चम्मच शहद और 1 बड़ा चम्मच तेल मिलाएं। सभी चीजों को अच्छी तरह मिलाएं और इसे अपने बालों पर लगाएं। इसे लगभग 30 मिनट तक हवा में सूखने दें और फिर इसे हमेशा की तरह धो लें।

अलसी, नींबू का रस और जैतून का तेल का मास्क: इस मास्क को बनाने के लिए, 1 चम्मच अलसी पाउडर, 2 चम्मच जैतून का तेल और आधा चम्मच नींबू का रस मिलाएं। इस मिश्रण को अपने बालों पर लगाएं और इसे लगभग 30 मिनट तक हवा में सूखने दें। फिर इसे हमेशा की तरह धो लें।

अलसी के तेल का उपयोग कैसे करें?

अलसी के तेल का उपयोग भी बालों के लिए फायदेमंद होता है। आप इसे सीधे अपने बालों में लगा सकते हैं या इसे अपने शैम्पू या कंडीशनर में मिला सकते हैं। अलसी के तेल को अपने बालों में लगाने के लिए, थोड़ा सा तेल लें और इसे अपने बालों की जड़ों से लेकर सिरों तक अच्छी तरह से मालिश करें। इसे कम से कम 30 मिनट तक लगा रहने दें और फिर इसे हमेशा की तरह धो लें।


अलसी बालों के लिए एक प्राकृतिक सुंदरता बढ़ाने वाला है। आप इसे अपने बालों के लिए मास्क बनाकर या अलसी के तेल का उपयोग करके इसका लाभ उठा सकते हैं। नियमित रूप से अलसी का उपयोग करने से आपके बाल लंबे, चिकने और चमकदार हो सकते हैं।

यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है, और यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. किसी भी स्वास्थ्य संबंधी चिंता के मामले में, कृपया हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने डॉक्टर से परामर्श करें. patrika.com इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी नहीं लेता है.



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Friday, 29 September 2023

7 दिनों में झुर्रियों को दूर करने का घरेलू उपाय, नारियल तेल और हल्दी का ऐसे करें उपयोग

7-day home remedy for wrinkles using coconut oil and turmeric may be effective : हर कोई चाहता है कि वो हमेशा जवां दिखे, लेकिन बढ़ती उम्र के साथ चेहरे पर झुर्रियां, फाइन लाइन्स और पिगमेंटेशन आने लगते हैं। ये सब बढ़ती उम्र के लक्षण हैं, जिन्हें पूरी तरह से रोका नहीं जा सकता है, लेकिन इनके प्रभाव को कम करने के लिए कुछ घरेलू उपाय अपनाए जा सकते हैं।

चेहरे पर झुर्रियों को कम करने के लिए नारियल तेल और हल्दी एक बेहतरीन घरेलू उपाय है। नारियल तेल में एंटी-ऑक्सीडेंट और मॉइस्चराइजिंग गुण होते हैं, जो त्वचा को पोषण देते हैं और उसे हाइड्रेटेड रखते हैं। हल्दी में एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटी-ऑक्सीडेंट गुण होते हैं, जो झुर्रियों और फाइन लाइन्स को कम करने में मदद करते हैं।

नारियल तेल और हल्दी से झुर्रियों को दूर करने का तरीका:

- एक चम्मच नारियल तेल में एक चुटकी हल्दी मिलाएं।
- इस मिश्रण को अपने चेहरे और गर्दन पर लगाएं।
- 15-20 मिनट के लिए छोड़ दें।
- गुनगुने पानी से धो लें।
- सात दिनों तक रोजाना इस उपाय को करने से आपको झुर्रियों में फर्क नजर आने लगेगा।

- नारियल तेल और हल्दी का मिश्रण लगाने से पहले चेहरे को अच्छी तरह से साफ कर लें।
- मिश्रण को लगाने के बाद आंखों के आसपास न लगाएं।
- अगर आपके पास कोई त्वचा संबंधित समस्या है तो इस उपाय को करने से पहले डॉक्टर से सलाह लें।


नारियल तेल और हल्दी से झुर्रियों को दूर करने का यह तरीका पूरी तरह से प्राकृतिक है और इसमें कोई साइड इफेक्ट नहीं होता है। इसलिए, अगर आप झुर्रियों को कम करना चाहते हैं तो यह एक बेहतरीन विकल्प है।



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दर्द की दवा को विकसित करने के लिए एआइ की सहायता से चूहों के व्यवहार का परीक्षण

बेंगलूरु. भारतीय विज्ञान संस्थान (आइआइएससी) के वैज्ञानिक लोगों के पुराने दर्द (क्रोनिक पेन) के उपचार की दवा खोजने के लिए एआइ की मदद ले रहे हैं। आइआइएससी के वैज्ञानिक चूहों पर परीक्षण कर रहे हैं। परीक्षण के दौरान चूहों के व्यवहार के विश्लेषण के लिए एआइ की मदद ली जा रही है। शोधकर्ताओं ने एआइ की मदद से चूहों के व्यवहार का एक मॉडल तैयार किया है। इससे पता चल सकेगा कि दवाओं से चूहों पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। शोधार्थियों ने बताया कि चूहों के व्यवहार से जानकारी मिल सकेगी कि दवाओं से उनका दर्द कम हुआ है या नहीं। चूहों पर प्रयोग सफल होने के बाद दवाओं का लोगों पर प्रयोग किया जा सकेगा। यह अध्ययन हाल ही न्यूरोसाइंस जर्नल में प्रकाशित किया गया।

30 प्रतिशत लोग क्रोनिक पेन से पीडि़त

शोधकर्ताओं के मुताबिक तीन माह से अधिक समय और बार-बार होने वाले दर्द को क्रोनिक पेन की श्रेणी में रखा जाता है। एक अध्ययन के मुताबिक क्रोनिक पेन दुनिया में विकलांगता का प्रमुख कारण है। दुनिया में 30 प्रतिशत से अधिक लोग पुराने दर्द से प्रभावित हैं।

न्यूरोन में बदलाव

शोधकर्ताओं के मुताबिक शरीर में दर्द को बताने के लिए मस्तिष्क में न्यूरोन होते हैं। नई दवा दर्द को बताने वाले न्यूरोन में परिवर्तन करेगी। इससे दर्द का अहसास नहीं होगा।



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जि़न्दगी की जंग लड़ी, खुद बनी प्रेरणा दुसरो को दे रही हौसला

जि़न्दगी की जंग लड़ी, खुद बनी प्रेरणा दुसरो को दे रही हौसला
निशांत तिवारी/ बिलासपुर

बचने की उम्मीद 99 प्रतिशत तक नहीं थी, लेकिन जीने की चाह ने उन्हें इस घातक बीमा इनरी से भी उबार दिया बिलासपुर. अलका पांडेय जब 40 साल की थी, उस समय डॉक्टर ने कहा की उन्हें अल्सर है। लेकिन आगे की जांच में पता चला की उन्हें कैंसर है और उनके बचने के केवल एक परसेंट चांस है। इस दौरान कैंसर की खबर ने उन्हें डिप्रेशन में धकेल दिया। क्युकी उनका एक 14 साल का बच्चा था। उन्हें दिन रात इस बात की फि़क्र लगी रहती थी की उनके जाने के बाद उनके बच्चे की देखभाल कौन करेगा। अंतत: उन्होंने इस घातक बीमारी से लडऩे का मन बनाया।

आज वह सर्जरी कराकर खुशाल जीवन जी रही है। उन्होंने बताया कि उनके शरीर से बड़ी आंत निकाल दी गई है, सिर्फ छोटी आंत है। उनका खुराक एक 4 साल के बच्चे के बराबर का है, आधा पराठा ही खा पाती है लेकिन थोड़ी-थोड़ी देर में खाते रहती है। अभी उनकी द्वै भी चल रही है लेकिन जो जि़न्दगी में अभी वह जिस भी परिस्तुईथी में है वह खुश है। आज अलका उन सभी महिलाओ के लिए प्रेरणा स्त्रोत है जो इस घातक बीमारी से जूझ रही है।


हमेशा पॉजिटिव
अलका का कहना है कि वह हमेशा पॉजिटिव रहती है। उनका इस बीमारी से जूझ रही महिलाओ के लिए सलाह है की आप इस में ज्यादा न सोचे और जरा सी भी टेंशन ना ले तभी आप स्वस्थ रह सकते है। अधिक चिंता से कैंसर जैसी घातक बीमारी आपको निगल जाएगी। इस लिए जीवन में जरुरी है की आपको सामने जो भी चुनौती आए आप उसका डट कर सामना करे। बिना लडे घुटने टेक देने से किस्मत भी आपका साथ नहीं देगी। वहां मैने 3 एड्रोस्कोपी कराया और दवाई खा रही थी। दवाई खाते-खाते जो अल्सर था वह कैंसर का रूप से लिया। तब तक पता नहीं था कि मुझे कैंसर है। जब मेरा गला चोक हो गया था। मुंह में एक चम्मच पानी नहीं जा रहा था। अगस्त 2020 में मैने फिर से डॉक्टर के पास गई और चेकअपन के लिए कहा। चेकअप की रिपोर्ट आई तो डॉक्टर ने कहा कि आपको कैंसर है, लेकिन मुझे ये नहीं बताया कि कौन से स्टेज का कैंसर है। उस समय मैं काफी डिप्रेशन में आ गई थी। उसके बाद मैं अपनी मुंबई में रहने वाली बहन और जीजा जी को बताई। जीजा ने अपने परिचित के डॉक्टर से संपर्क कर उनसे मिलने के लिए कहा। जब मैं डॉक्टर से मिली तो उन्होंने कहा पूरा प्रोसेस बताया। पर डॉक्टर ने कहा कि हम नहीं बता सकते की आपको कौन से स्टेज का कैंसर है। फिर डॉक्टर ने कहा कि आपकी कीमो थैरेपी चालू करते हैं। मेरा 3 कीम हुआ। उसके बाद डॉक्टर ने कहा कि अब सर्जरी कर सकते हैं। मेरे स्टमक यानी बड़ी आंत और छोटी आंत में कैसर था। सर्जरी के लिए मेरे एक परिचत के डॉक्टर जोशी हैं। उनसे मैने सलाह ली। मैने बोला की काफी डर लग रहा है, क्योंकि मेरा 14 साल का बेटा है। पति नहीं हैं। मै मां के साथ मायके में रहती हूं, तो मेरे बेटे को कौन सम्भालेगा। फिर डॉक्टर ध्रुव ने समझाया कि मरना हर इंसान को है। फिर परिवार के लोगों ने भी काफी समझाया। उसके बाद मैं रायपुर गई। मेकाहारा अस्तपतान के डॉक्टर भरत भूषण ने सर्जरी किया। जब सर्जरी हो गई तब पता चला कि मुझे चौथे स्टेज का कैंसर था, जिसके बचने की उम्मींद 99 प्रतिशत तक नहीं थी। सिर्फ मेरे बचने की 1 प्रतिशत ही उम्मींद थी। डॉक्टर ने मेरी बहन को पहले बता दिया था कि मेरी स्थिति क्या है। परिवार वालों ने मुझे काफी सपोर्ट किया और कहा कि मरना जीना तो लगा रहता है। मै जब ऑपरेशन के लिए गई तो यही सोच के गई थी कि मेरा एक 14 साल का बेटा है। उसके लिए मुझे जीना है। आज जो मै हूं अपने बेटे के लिए हूं।


कोविड-19 लॉकडाउन और उसके बाद बढ़ा है लोगों में डिप्रेशन
शशांक श्रीवास्तव @ भोपाल. तनाव को किसी कठिन परिस्थिति के कारण होने वाली चिंता की के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। जो की एक स्वाभाविक मानवीय प्रतिक्रिया है जो हमें अपने जीवन में चुनौतियों और खतरों से निपटने के लिए प्रेरित करती है। प्रत्येक व्यक्ति कुछ हद तक तनाव का अनुभव करता है लेकिन इसका स्तर बढ़ जाने पर हालात मानसिक तनाव का रूप ले लेता है।

मानसिक तनाव आज हमारे देश ही नही बल्कि पूरी दुनिया में एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। कोविड-19 के लॉकडाउन और उसके बादके आंकड़े और डराने वाले है। अभी हाल ही में इस ओर ध्यान देते हुए सरकार ने टेली मानस सर्विस की शुरुआत की है जिसके जरिए वो मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों तक मदद पहुंचाने का काम कर रही है। कुछ ऐसा ही काम हमारे शहर की सिमरन पारदसानी भी कर रही है। ,

अपनी लाइफ में एक पर्पस जरुर रखे : सिमरन पारदसानी
जिनके पास जीने के लिए 'क्यों' है, वे लगभग किसी भी 'कैसे' को सहन कर सकते हैं, विक्टर ई. फ्रेंकल के इस कोट से अपनी बात शुरू करते हुए सिमरन पारदसानी कहती है की अपनी लाइफ में हर किसी को एक पर्पस रखना चाहिए क्योंकि जिनके पास परपस होता है वो हर बुरे दौर से निकल आते है। कभी खुद क्लिनिकल डिप्रेशन के फेज से गुजरने वाली सिमरन आज दूसरों में मानसिक तनाव के लक्षण को पहचान कर उन्हें नई जिंदगी देने का काम कर रही है। वो बताती है कि 17 साल के उम्र में अपने पढ़ाई को लेकर मैं बहुत ज्यादा तनाव में थी। उस वक्त मेरे दोस्त भी नहीं थे जिनसे मैं अपनी फीलिंग्स शेयर कर पाती।

मेरा आत्मविश्वास खत्म सा हो गया था। फ्यूचर का कुछ सोच नही पाती थी। हर चीज अपने अगेंस्ट जाते देख मुझे बहुत गुस्सा आता था। तब मेरी मां रंजना, जो खुद एक साइकोलॉजीस्ट है, उन्होंने मेरे अंदर हो रहे बदलाव को महसूस किया और लगातार मुझसे बात करती रही। वो मुझे स्पेशलिस्ट डॉक्टर के पास ले गई जहां क्लिनिकल डिप्रेशन डायगोनोस्ट हुआ । फिर मैंने एक साल पढ़ाई ड्राप की और उस दौरान मैंने अपना पूरा ध्यान आर्ट और राइटिंग को निखारने पर लगाया। उस साल मैंने 12वी की परीक्षा न देकर अपने पसंद का हर वो काम किया जो मुझे अच्छा लगता था। मेरी मां हर वक्त मेरा साथ देती रही। अब मुझे ठीक हुए कई साल हो चुके है और इस दौरान मैंने कई किताबें पढ़ी और लिखी भी है। मैंने हर तरीके के डिप्रेशन के बारे में पढ़ा और जाना है। अब मैं लोगों में डिप्रेशन के लक्षण देखकर उनकी मदद करती हूं जिससे मुझे बहुत खुशी मिलती है।


कोरोना में लड़खड़ाए कदम, खुद को संभाला, तो विदेश में बने शिष्य
जबलपुर की समिधा मिश्रेकर ने मुश्किल समय में योग के जरिए खुद को संभाला
सोच- सेल्फ मोटिवेशन से जीती जा सकती है हर मु श्किल
नेहा सेन @ जबलपुर. कोरोना काल का दौर सभी के लिए परेशानी भरा रहा है। इस दौर में जहां लोगाें ने रोजगार खोए हैं, वहीं घर परिवार के सदस्यों को भी खोया है। इस बीच परेशानियों का दौर मैंने भी मानसिक तनाव के बीच झेला है, लेकिन जीवन में मैंने सीखा है कि सेल्फ मोटिवेशन से हर मु श्किल को पार किया जा सकता है। यह कहना है कि जबलपुर की समिधा मिश्रेकर का। समिधा ने ना सिर्फ कोविड की परेशानियों के बीच खुद को मानसिक तनाव से उबारा है, ब ल्कि लोगों को योग और मेडिटेशन से स्वस्थ्य रहने का रहस्य भी समझाया है।

बंद हो गए रेस्टोरेंट, हॉस्टल
समिधा ने बताया कि बात कोविड के पहले की है, जब जीवन में सब अच्छा चल रहा था। परिवार का रेस्टोरेंट और हॉस्टल अर्निंग का मुख्य जरिया था। लॉकडाउन लगते ही जीवन परेशानियों से घिर गया। अर्निंग सोर्स बंद हो जाने के कारण मैं डिप्रेशन में चली गई। परिवार में सभी के मायूस चेहरे सामने होते थे और बस एक ही चिंता थी कि आ खिर क्या होगा।

खुद से लगाव खत्म हो गया था
समिधा ने बताया कि वे शादी के पहले से लोगों को योग सिखा रहीं हैं। लेकिन खुद को डिप्रेशन से उबार पाने में काफी मु श्किल आई। उस वक्त हसबैंड संजय मिश्रेकर और खास मित्र नीलिमा देशपाण्डे ने ने भावनात्मक सहारा दिया। ध्यान, योग का असर हुआ और जीवन सामान्य हुआ। कोविड के समय ऑनलाइन योग क्लास लेना शुरू की, जो अलग-अलग शहरों के साथ-साथ विदेश तक बढ़ने लगी।

लंदन और अमरीका में क्लास
समिधा अब देश के वि भिन्न शहरों के साथ-साथ लंदन, अमरीका और साउथ अफ्रीका में भी ऑनलाइन कक्षाएं लेती हैं। इसके साथ मप्र विमन एंटप्रिन्योर एसोसिएशन से जुड़कर काम कर रहीं हैं। वे शहर आने वाले विदेशी मेहमानों को भी योग सिखाती हैं। वे कहती हैं हर किसी के जीवन में मु श्किलें हैं। हम दूसरों को खुद रहने के तरीके बताते हैं, लेकिन स्वयं इस पर अमल नहीं करते। मु श्किल समय के लिए स्वयं लड़ना पड़ता है।


आज के समय में जीवन बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है, भागदौड़ की जिंदगी में युवा एक दूसरे से आगे निकलने के तनाव के तले दबे जा रहे हैं। यहां तक बच्चे और युवतियां भी इससे अलग नहीं है। मानसिक तनाव की वजह से लोग गलत रास्ते की ओर मुड़ जाते हैं इससे खुद को बचाने के साथ दूसरों का तनाव दूर करने का माध्यम हमको बनना होगा। मैं एक ऐसे परिवार से आती हूं, जिसका कोई भी सदस्य मॉडलिंग या इस इंडस्ट्री से नही है। जब मैं मुबंई आई तो पेनगेस्ट और किराए के मकान में रहना पड़ा। इस दौरान कुछ मॉडलिंग के अवसर मिले।


जीवन में कई असफलता मिले और रिजेक्शन भी मिले। इसके बाद हर बार नई शुरूआत करने के लिए खुद को तैयार किया। पूरी मेहनत, शिद्दत और आत्मविश्वास से शुरूआत की। जब भी असफलता मिली, हर बार मां से बात की उन्होंने प्रेरित किया और आगे बढ़ती गई। मैं सभी को कहना चाहती हूं चुनौतियां जीवन में आती है उतार और चढ़ाव भी आते हैं लेकिन आपको उनसे घवराना नहीं है ब ल्कि परि िस्थतियों से लड़ना है पूरी मेहनत के साथ। यदि असफल हो जाते हैं तो एक नया प्रयास करना चाहिए और पहले से ज्यादा मेहनत और अतिरिक्त प्रयास के साथ आपका विश्वास आपको सफल जरूर बनाने वाला है।

भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में अब महिलाओं को केंद्र में रखकर खूब फिल्में बनने लगी है और लोग इस तरह के नए विषय देखना भी पसंद करते हैं। इडंस्ट्री में सभी को योग्यता के अनुसार काम और फीस मिलती है यहां किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं है। भारतीय दर्शक वैसे भी कला और योग्यता प्रेमी है यदि आपमें आर्ट है तो आपके सामने कोई बाधा रास्ता नहीं रोक सकती है।

खुद से जुड़ाव जरूरी
भाग दौड़ से भरे जीवन में यह जरूरी है की हम खुद से एक जुड़ाव महसूस करें। यह आम सी बात हो गई है की युवाओं को भी स्ट्रेस और डिप्रेशन का सामना करना पढ़ रह है। इन सब से बचने का एक तरीका है की हम ऐसी परिस्थिति में अपने मन और भावनाओं को शांत रखें। इसके लिए आप मैडिटेशन को अपने डेली लाइफस्टाइल में अपनाएं। स्ट्रेस और डिप्रेशन जैसी घातक बीमारी को जड़ से खत्म करने के लिए सभी के लिए मैडिटेशन करना जरूरी हो जाता है।

चैलेंजेज जीवन का हिस्सा हैं-
चैलेंजेज हर जीवन का हिस्सा हैं, लेकिन हमें मजबूत हो कर और कड़ी मेहनत से इन सब चैलेंज से लड़ना है और खुद को बेहतर साबित करना है। कोई भी परेशानी हो हमेशा अपना बेस्ट करें। जीवन में किसी भी चैलेंज से आप गुजर रहे हों, इससे लड़ने के लिए हमेशा एक्स्ट्रा एफर्ट की कोशिश करें। इसके साथ आपको खुद की काबिलियत पर पूरा विश्वास होना महत्वपूर्ण हैं। जितना आपका खुद पर मजबूत विश्वास होगा उतना ही आप एक पॉजिटिव लाइफस्टाइल जी पाएंगे।

संघर्षों को देख कर अपना रास्ता न बदलें
मनुष्य को अपने जीवन में आने वाले संघर्षों को देख कर अपनी मंजिल का रास्ता नहीं छोड़ना चाहिए। बल्कि उनसे डटकर सामना करना चाहिए। ऐसे में जरूरी है कि आप खुद को उस काबिल बनाएं न कि रास्ते से हट जाएं। आपकी मेहनत आपको मंजिल तक पहुंचाएगी।



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बदलते मौसम में छींक और नाक बंद होना एलर्जी के लक्षण, अदरक वाला काढ़ा पीएंं

Allergies symptoms : मौसम बदल रहा है। इस समय अक्सर कम इम्युनिटी वाले लोगों में अलग-अलग तरह की एलर्जी देखी जाती है जिसमें खांसी, छींकने, नाक बहना-बंद होना और चेहरे पर खुजली जैसे लक्षण सामने आते हैं। अक्सर इस समय अस्थमा, कंजेक्टिवाइटिस (आई फ्लू), गले में संक्रमण, त्वचा संबंधी रोग, व पेट में संक्रमण जैसे रोग होते हैं।

गले का संक्रमण
इस समय गले का संक्रमण आम है। अधिकांश गले के संक्रमण लगातार बने रहने वाले या कुछ पर्यावरणीय कारकों का परिणाम होते हैं।
इस रोग के लक्षण : गले में खराश, सोते समय गले से आवाज आना, घरघराहट होना व दर्द या जलन की समस्या होना।
क्या करें : एक कप पानी में दो इंच अदरक का टुकड़ा कूटकर उसे उबालकर काढ़े की तरह पीएं।
सुबह एक या दो चम्मच शहद का सेवन करें। हल्का गुनगुना पानी पीना व नमक के गरारे भी फायदेमंद हैं।

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अस्थमा

अस्थमा के मरीजों के लिए सितंबर के बाद सर्दियों तक का समय और फरवरी-मार्च का समय बेहद कठिन होता है। अस्थमा सांस फूलने की बीमारी है। जब सांस की नलियों में खराबी या उसके फेफड़ों की नलियां पतली हो जाती हैं और उसके कारण सांस लेने में तकलीफ होती है तो इस बीमारी को अस्थमा कहा जाता है।

इस रोग के लक्षण : सांस फूलना या सांस लेने में तकलीफ महसूस करना, अत्यधिक खांसी आना, डस्ट या धुएं से एलर्जी होना।
क्या करें : इनहेलर अपने पास रखें। जीवनशैली में सुधार लाएं। धूल-मिट्टी से परहेज करें। साफ-सफाई के काम करने पड़े तो मास्क लगाएं।

कंजेक्टिवाइटिस (आई फ्लू)
इस समय वातावरण में तरह-तरह के वायरस-बेक्टीरिया और एलर्जन सक्रिय रहते हैं। इस मौसम में कंजेक्टिवाइटिस का खतरा अधिक रहता है। बिना सफाई का ध्यान रखे कॉन्टेक्ट लेंंस, चश्मे, तौलिए का उपयोग इस रोग की आशंका को बढ़ाता है।

इस रोग के लक्षण : आंखों में लालिमा, खुजली और जलन, संक्रमित आंखों से लगातार पानी आना।
क्या करें : कॉन्टेक्ट लेंस न लगाएं, गर्म कपड़े का सेक करें, हाइजीन का ध्यान रखें।

त्वचा संबंधी रोग

इस समय फंगल इंफेक्शन की आशंका ज्यादा रहती है। त्वचा में दरारें आना, खुजली, रेडनेस, कपड़े, जूते और मोजे से रेशेज, कमर के क्षेत्र में खुजली होने लगती है।

रोग के लक्षण : एग्जिमा में स्किन में खुजली, दरारें और खुरदरापन होना, दाद में त्वचा पर लाल दाने या धब्बे दिखाई देना।
क्या करें : झाडऩे के बजाय गीला पोंछा लगाएं। पैट्स से दूरी बनाए रखें, घर को खुला व हवादार रखें। - डॉ. आलोक गुप्ता, सीनियर फिजिशियन, जोधपुर



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आंत माइक्रोबायोम प्रत्यारोपण: बीमारियों के इलाज का एक नया तरीका

आंत माइक्रोबायोम प्रत्यारोपण कई बीमारियों के इलाज में मदद कर सकता है, जिसमें सूजन आंत्र रोग और मोटापा शामिल है

आंत माइक्रोबायोम (Gut microbiome) हमारे शरीर में मौजूद बैक्टीरिया, कवक और अन्य सूक्ष्मजीवों का समुदाय है। यह समुदाय हमारे स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिसमें पाचन, प्रतिरक्षा प्रणाली और मानसिक स्वास्थ्य शामिल हैं।

अंत माइक्रोबायोम प्रत्यारोपण (Gut microbiome transplant) एक नई चिकित्सा प्रक्रिया है जिसमें एक स्वस्थ व्यक्ति से आंत माइक्रोबायोम को किसी बीमार व्यक्ति को प्रत्यारोपित किया जाता है। यह प्रक्रिया उन लोगों के लिए फायदेमंद हो सकती है जिनका आंत माइक्रोबायोम (Gut microbiome)असंतुलित है, जो कई बीमारियों का कारण बन सकता है।

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अध्ययनों ने दिखाया है कि आंत माइक्रोबायोम प्रत्यारोपण (Gut microbiome transplant) सूजन आंत्र रोग, मोटापा, मधुमेह और यहां तक कि कुछ प्रकार के कैंसर के इलाज में मदद कर सकता है। यह प्रक्रिया अभी भी विकास के चरण में है, लेकिन यह एक वादा करती है कि भविष्य में कई बीमारियों के इलाज में मदद मिल सकती है।

सूजन आंत्र रोग

सूजन आंत्र रोग (आईबीडी) एक ऐसी स्थिति है जो पाचन तंत्र में सूजन और जलन का कारण बनती है। आईबीडी के दो मुख्य प्रकार हैं: क्रोहन रोग और अल्सरेटिव कोलाइटिस।

आईबीडी के कारण पूरी तरह से ज्ञात नहीं हैं, लेकिन माना जाता है कि आंत माइक्रोबायोम (Gut microbiome) में असंतुलन एक भूमिका निभाता है। आंत माइक्रोबायोम प्रत्यारोपण आईबीडी के लक्षणों को कम करने और यहां तक कि कुछ मामलों में रोग को ठीक करने में मदद कर सकता है।

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मोटापा

मोटापा एक ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर में बहुत अधिक वसा होता है। मोटापा कई अन्य स्वास्थ्य समस्याओं, जैसे हृदय रोग, स्ट्रोक, मधुमेह और कुछ प्रकार के कैंसर के खतरे को बढ़ा सकता है।

मोटापे के कारण पूरी तरह से ज्ञात नहीं हैं, लेकिन माना जाता है कि आंत माइक्रोबायोम (Gut microbiome) में असंतुलन एक भूमिका निभाता है। आंत माइक्रोबायोम प्रत्यारोपण मोटापे के रोगियों में वजन घटाने और चयापचय में सुधार में मदद कर सकता है।

अन्य बीमारियां

अध्ययनों ने दिखाया है कि आंत माइक्रोबायोम प्रत्यारोपण (Gut microbiome transplant) मधुमेह, कुछ प्रकार के कैंसर और अन्य कई बीमारियों के इलाज में मदद कर सकता है। हालांकि, इस क्षेत्र में अधिक शोध की आवश्यकता है।

आंत माइक्रोबायोम प्रत्यारोपण (Gut microbiome transplant) एक नई चिकित्सा प्रक्रिया है जिसमें एक स्वस्थ व्यक्ति से आंत माइक्रोबायोम को किसी बीमार व्यक्ति को प्रत्यारोपित किया जाता है। यह प्रक्रिया उन लोगों के लिए फायदेमंद हो सकती है जिनका आंत माइक्रोबायोम असंतुलित है, जो कई बीमारियों का कारण बन सकता है।

अध्ययनों ने दिखाया है कि आंत माइक्रोबायोम प्रत्यारोपण (Gut microbiome transplant) सूजन आंत्र रोग, मोटापा, मधुमेह और यहां तक कि कुछ प्रकार के कैंसर के इलाज में मदद कर सकता है। यह प्रक्रिया अभी भी विकास के चरण में है, लेकिन यह एक वादा करती है कि भविष्य में कई बीमारियों के इलाज में मदद मिल सकती है।



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Thursday, 28 September 2023

चॉकलेट प्रेमियों के लिए अच्छी खबर: चॉकलेट खाने से हृदय रोग का खतरा कम हो सकता है

eating chocolate regularly can lower your risk of heart disease : चॉकलेट को लंबे समय से एक स्वादिष्ट और आनंददायक उपचार माना जाता है, लेकिन हाल के शोधों से पता चला है कि यह हमारे स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद हो सकता है। एक नए अध्ययन में पाया गया है कि नियमित रूप से चॉकलेट खाने से हृदय रोग का खतरा कम हो सकता है।

अध्ययन, जो यूरोपीय हृदय जर्नल में प्रकाशित हुआ था, में 21,000 से अधिक लोगों को शामिल किया गया था। प्रतिभागियों ने हर दिन पूरे दूध के चॉकलेट, डार्क चॉकलेट, या कोको पाउडर का कितना सेवन किया, यह बताया।

अध्ययन में पाया गया कि जिन लोगों ने हर दिन डार्क चॉकलेट या कोको पाउडर खाया, उनमें हृदय रोग से मरने का जोखिम उन लोगों की तुलना में 23% कम था, जो नहीं खाते थे। पूरे दूध के चॉकलेट खाने वालों में हृदय रोग से मरने का जोखिम 14% कम था।

अध्ययन के लेखकों का कहना है कि चॉकलेट में फ्लेवोनोइड्स नामक यौगिक होते हैं, जो हृदय के लिए अच्छे होते हैं। फ्लेवोनोइड्स रक्त वाहिकाओं को चौड़ा करने में मदद करते हैं, जिससे रक्तचाप कम होता है और हृदय को रक्त पंप करना आसान होता है।

अध्ययन के लेखकों का कहना है कि हालांकि चॉकलेट में स्वास्थ्य लाभ होते हैं, लेकिन यह महत्वपूर्ण है कि इसे मॉडरेशन में खाया जाए। चॉकलेट में कैलोरी और चीनी भी होती है, इसलिए इसे बहुत अधिक खाने से वजन बढ़ सकता है और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं।

यदि आप चॉकलेट के स्वास्थ्य लाभों का आनंद लेना चाहते हैं, तो डार्क चॉकलेट या कोको पाउडर चुनना सबसे अच्छा है। डार्क चॉकलेट में दूध चॉकलेट की तुलना में अधिक फ्लेवोनोइड्स होते हैं और कोको पाउडर में बिना चीनी के फ्लेवोनोइड्स की सबसे अधिक मात्रा होती है।

चॉकलेट को अपने आहार में शामिल करने के कई तरीके हैं। आप इसे स्नैक के रूप में खा सकते हैं, इसे अपने दलिया या कॉफी में मिला सकते हैं, या इसे बेकिंग में उपयोग कर सकते हैं। बस इस बात का ध्यान रखें कि इसे मॉडरेशन में खाएं और चीनी युक्त चॉकलेट से बचें।

हृदय रोग को रोकने के लिए अन्य टिप्स

- धूम्रपान छोड़ें।
- स्वस्थ वजन बनाए रखें।
- नियमित रूप से व्यायाम करें।
- एक स्वस्थ आहार खाएं जिसमें फल, सब्जियां और साबुत अनाज शामिल हों।
- अपने कोलेस्ट्रॉल और रक्तचाप को नियंत्रित करें।



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बढ़ती उम्र में हो रही है यूरिन लीकेज की समस्या, तो शाम को अपनाएं ये उपाय

वृद्धावस्था में खांसते-छींकते समय, कोई सामान उठाते हुए या टॉयलेट तक पहुंचने से पहले कपड़ों में यूरिन लीक होना असामान्य समस्या नहीं है। महिलाओं में पुरुषों के मुकाबले यह ज्यादा देखी जाती है। बुजुर्गों में यह समस्या है तो तुरंत डॉक्टरी परामर्श लें। यूरिन लीक होने की समस्या को यूरिन इन्कॉन्टिनेंस कहा जाता है।

 

प्रिवेंटेबल, क्योरेबल और ट्रीटेबल है यह बीमारी

महिलाओं में पेल्विक फ्लोर कमजोर होने के कारण यूरिन इन्कॉन्टिनेंस होती है। पीरियड्स बंद होने, प्रसव आदि के कारण यूरिनरी ब्लेडर, यूट्रस व रेक्टम ढीले होने लगते हैं। 50-60 वर्ष की उम्र के बाद खांसते-छींकते समय यूरिन लीक हो जाता है। इस लीकेज को महिलाएं सामान्य न मानें। यह लीकेज प्रिवेंटेबल, क्योरेबल और ट्रीटेबल है। महिलाएं हर डिलीवरी के बाद पेल्विक फ्लोर को मजबूत करने वाली एक्सरसाइज करें ताकि मेनोपॉज के बाद उन्हें इस तरह की समस्या न हो। महिलाओं में स्ट्रेस और अर्ज इन्कॉन्टिनेंस होती है। स्ट्रेस इन्कॉन्टिनेंस नीचे झुकने, झाड़ू लगाने आदि से होती है। अर्ज इन्कॉन्टिनेंस में ब्लेडर ओवर एक्टिव हो जाता है।


यूरिन लीकेज के कारण
ब्लेडर मसल्स की ज्यादा सक्रियता होना।
महिलाओं में पेल्विक फ्लोर की मसल्स का कमजोर होना।
ब्लेडर में सूजन आना।
पुरुषों में प्रोसेस्ट की समस्या।
न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर जैसे मल्टीपल स्केलेरोसिस, स्ट्रोक आदि।

 

पुरुष भी ध्यान दें
पुरुषों में पेल्विक फ्लोर कमजोर नहीं होता है। प्रोस्टेट की बीमारी के कारण उन्हें यूरिन लीकेज की समस्या हो सकती है। इसे नजरअंदाज न करें। क्योंकि इससे ब्लेडर सेकंडरी ओवर एक्टिव हो जाता है। इसके अलावा जिनके प्रोस्टेट की सर्जरी हुई और यूरिन लीकेज होता है तो तुरन्त डॉक्टरी परामर्श लें।

 

क्या करें मरीज और उनके परिजन
रात को खाने व सोने में दो घंटे का गैप रखें। बेड और टॉयलेट की दूरी ज्यादा न हो। यूरिनरी पॉट बेड के पास हो। घर से बुजुर्ग अगर बाहर जाएं तो टॉयलेट कर ही जाएं। डायबिटीज और कब्ज से पीडि़त मरीज यदि घर में है और उन्हें यूरिन लीकेज की समस्या है तो परिजन को पता होना चाहिए कि ऐसे लोगों को शाम के बाद पानी कम कर दें। इस बीमारी के प्रति जागरूकता बेहद जरूरी है। कब्ज न होने दें। यदि ऐसी किसी को समस्या है तो यूरोलॉजिस्ट से परामर्श जरूर लें। हाइजीन का ध्यान रखें। इसमें सबसे अच्छी बात यह है कि डॉक्टर को दिखाते हैं तो कुछ दवाइयों से इसका इलाज संभव है।



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रोज़ाना 3 अखरोट खाने के 7 चमत्कारी फायदे, फायदे जानकर चौंक जाएंगे आप

अखरोट एक बहुत ही पौष्टिक और स्वादिष्ट मेवा है। इसमें कई पोषक तत्व मौजूद होते हैं, जैसे कि विटामिन ई, ओमेगा-3 फैटी एसिड, मैग्नीशियम, कॉपर और फाइबर। अखरोट खाने से स्वास्थ्य को कई तरह के लाभ होते हैं।

3 अखरोट के 7 चमत्कारी लाभ:

दिल की सेहत को बेहतर बनाता है: अखरोट में मौजूद ओमेगा-3 फैटी एसिड दिल की सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होते हैं। ये कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करने में मदद करते हैं और रक्तचाप को नियंत्रित रखने में मदद करते हैं।

कैंसर के खतरे को कम करता है: अखरोट में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट कैंसर सेल्स के विकास को रोकने में मदद करते हैं।

वजन घटाने में मदद करता है: अखरोट में फाइबर और प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है, जो पेट को भरा रखने में मदद करते हैं और भूख को कम करते हैं।

दिमाग की शक्ति बढ़ाता है: अखरोट में मौजूद ओमेगा-3 फैटी एसिड दिमाग की शक्ति बढ़ाने में मदद करते हैं और याददाश्त को बेहतर बनाते हैं।

डायबिटीज का खतरा कम करता है: अखरोट में मौजूद फाइबर और प्रोटीन रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित रखने में मदद करते हैं, जिससे डायबिटीज का खतरा कम होता है।

हड्डियों को मजबूत बनाता है: अखरोट में मौजूद कैल्शियम और मैग्नीशियम हड्डियों को मजबूत बनाने में मदद करते हैं।

बालों और त्वचा को स्वस्थ बनाता है: अखरोट में मौजूद विटामिन ई और ओमेगा-3 फैटी एसिड बालों और त्वचा को स्वस्थ बनाते हैं।
अखरोट को आप स्नैक्स के रूप में खा सकते हैं या फिर इसे अपने सलाद, दही या स्मूदी में मिलाकर खा सकते हैं। बस इस बात का ध्यान रखें कि अखरोट को सीमित मात्रा में ही खाएं, क्योंकि इसमें कैलोरी की मात्रा अधिक होती है।

नोट: यह लेख केवल सूचना के उद्देश्य के लिए है। किसी भी स्वास्थ्य संबंधी सलाह के लिए कृपया डॉक्टर या किसी अन्य योग्य स्वास्थ्य देखभाल पेशेवर से परामर्श करें।



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शरीर को डिटॉक्स करने के साथ जोड़ों में दर्द से भी राहत दिलाती है मिट्टी चिकित्सा

2-3 फीट नीचे जमीन से निकाली गई मिट्टी को ही चिकित्सीय प्रयोग में लिया जाता है। पहले धूप में सुखाते भी हैं। प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार शरीर पंचमहाभूतों से मिलकर बना हुआ है। जब इनसे मिलकर ही शरीर बना है तो जब कोई भी शारीरिक एवं मानसिक विकृति आती है तो उसके उपचार के लिए इन्हीं महा पंचभूतों से उपचार करना प्राकृतिक उपचार कहलाता है।

 

त्वचा रोगों में
विभिन्न प्रकार के त्वचा संबंधी रोगों के लिए मिट्टी को पतला पेस्ट बनाकर पूरे शरीर पर या फिर जहां त्वचा पर एलर्जी है, वहां लगाएं। मिट्टी के साथ नीम की चटनी व हल्दी मिलाने पर यह त्वचा की एलर्जी सोरायसिस एग्जिमा में अत्यंत लाभकारी है।

 

दीमक वाली मिट्टी भी उपयोगी
काली या मुल्तानी मिट्टी में सफेद चंदन पाउडर मिलाकर चेहरे पर लेप करने से चेहरे के मुंहासे-फोड़े-फुंसी-दाग-धब्बे दूर होते हैं। दीमक की मिट्टी अच्छे से साफ करके उसमें पानी और गुलाब जल मिलाकर चेहरे पर लगाने से झाइयां एवं झुर्रियों में राहत मिलती है।

 

ठंडी पट्टी का उपयोग
मिट्टी की पट्टियों को ठंडी एवं गर्म पट्टी दो तरह से इस्तेमाल होता है। मिट्टी को ठंडे पानी के साथ 8 घंटे तक भिगोने के बाद पट्टियां बनाकर माथे, पेट, आंखों, रीढ़ की हड्डी आदि पर लगाएं। ये शरीर को डिटॉक्स करने का काम करती हैं। शरीर की गर्मी भी दूर होती है।

 

गर्म पट्टी के लाभ
मिट्टी को पानी के साथ गर्म करके पट्टी जहां दर्द है, उस हिस्से पर लगाने से दर्द निवारक का काम करती है जैसे गर्म मिट्टी की पट्टी घुटनों, एड़ी, कोहनी, कलाई, कंधे, गर्दन एवं कमरदर्द के लिए लाभकारी होती है। इसके पतले घोल से मालिश भी कर सकते हैं।

 

सर्दी-जुकाम और अस्थमा रोगी इनसे बचें
मिट्टी साफ-सुथरी होनी चाहिए। 3 से 4 फीट नीचे से निकाली जाती है। चिकित्सकीय उपयोग के पहले मिट्टी को अच्छे से धूप में सुखाकर छान लें। एक बार भिगोई मिट्टी का दोबारा उपयोग नहीं होता है। सर्दी जुकाम, अस्थमा व श्वांस संबंधी समस्याओं में मिट्टी का लेप या ठंडी मिट्टी की पट्टी नहीं लगाई जानी चाहिए।



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Wednesday, 27 September 2023

ये छोटे-छोटे दाने हैं मधुमेह की रामबाण दवा , खाने का तरीका जान लीजिए

रागी मधुमेह के लिए एक अच्छा अनाज है क्योंकि यह ग्लाइसेमिक इंडेक्स में कम है। इसका मतलब है कि यह रक्त शर्करा के स्तर को धीरे-धीरे बढ़ाता है। रागी में फाइबर की मात्रा भी अधिक होती है, जो रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में मदद करता है।

रागी को मधुमेह वाले लोगों के लिए कैसे खाएं

रागी को मधुमेह वाले लोगों के लिए निम्नलिखित तरीकों से खाया जा सकता है:

रोटी: रागी की रोटी गेहूं की रोटी का एक अच्छा विकल्प है। यह ग्लाइसेमिक इंडेक्स में कम है और फाइबर में अधिक है।
दलिया: रागी का दलिया नाश्ते के लिए एक अच्छा विकल्प है। यह पौष्टिक और रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में मददगार है।
उपमा: रागी की उपमा एक स्वादिष्ट और स्वस्थ नाश्ता व्यंजन है। यह बनाने में आसान है और इसमें कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स होता है।
पुडिंग: रागी की खीर एक स्वादिष्ट और स्वस्थ मिठाई है। यह ग्लाइसेमिक इंडेक्स में कम है और फाइबर में अधिक है।
रागी के फायदे

रागी में कई स्वास्थ्य लाभ हैं, जिनमें शामिल हैं:

रक्त शर्करा नियंत्रण: रागी ग्लाइसेमिक इंडेक्स में कम है और फाइबर में अधिक है, जो रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में मदद करता है।
हृदय स्वास्थ्य: रागी में मैग्नीशियम और पोटेशियम जैसे खनिज होते हैं जो हृदय स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होते हैं।
पाचन स्वास्थ्य: रागी में फाइबर की मात्रा अधिक होती है, जो पाचन स्वास्थ्य में सुधार करने में मदद करता है।
वजन प्रबंधन: रागी में फाइबर की मात्रा अधिक होती है, जो वजन प्रबंधन में मदद करता है।
मधुमेह वाले लोगों के लिए रागी का सेवन कैसे करें

मधुमेह वाले लोगों को रागी को मध्यम मात्रा में खाना चाहिए। रागी को दिन में दो बार से अधिक नहीं खाना चाहिए। रागी के साथ अन्य खाद्य पदार्थों को संयोजित करना भी महत्वपूर्ण है, जैसे कि सब्जियां और प्रोटीन, ताकि रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित किया जा सके।

मधुमेह वाले लोगों के लिए रागी से बने कुछ व्यंजन

रागी की रोटी: रागी का आटा, गेहूं का आटा, पानी और नमक को मिलाकर आटा बना लें। आटे को नरम होने तक गूंथ लें। आटे को छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लें और प्रत्येक टुकड़े को गोल करें। गोल आटे को गीले कपड़े से ढककर 15 मिनट के लिए रख दें। 15 मिनट बाद, प्रत्येक गोल आटे को रोटी की तरह बेल लें। रोटी को गर्म तवे पर पकाएं और दोनों तरफ से सुनहरा होने तक पकाएं।
रागी का दलिया: रागी के आटे को पानी में मिलाकर घोल बना लें। घोल में नमक और स्वादानुसार काली मिर्च डालें। घोल को एक बर्तन में गर्म करें और लगातार चलाते हुए पकाएं। दलिया को मध्यम आंच पर तब तक पकाएं जब तक कि यह गाढ़ा न हो जाए। दलिया को गरमागर्म सर्व करें।
रागी की उपमा: रागी के आटे को पानी में मिलाकर घोल बना लें। घोल में नमक और स्वादानुसार काली मिर्च डालें। घोल को एक बर्तन में गर्म करें और लगातार चलाते हुए पकाएं। उपमा को मध्यम आंच पर तब तक पकाएं जब तक कि यह गाढ़ा न हो जाए। उपमा को गरमागर्म सर्व करें।
रागी की खीर: रागी के आटे को दूध



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46 वर्षीय करोड़पति अपनी जैविक आयु कम करने के लिए रोजाना 111 गोलियां लेता है

ब्रायन जॉनसन, 46 वर्षीय करोड़पति, जो उम्र को पीछे छोड़ने के लिए सालाना 2 मिलियन डॉलर खर्च कर रहे हैं, उन्होंने खुलासा किया कि वह अपने सख्त स्वास्थ्य व्यवस्था और अच्छी सेहत के लिए हर दिन 111 गोलियां लेते हैं।

जॉनसन "प्रोजेक्ट ब्लूप्रिंट" नामक प्रोग्राम का पालन कर रहे हैं। इसके लिए व्यवसायी को एक विशिष्ट आहार खाने, पूरे दिन भर कई प्रकार से सप्लीमेंट लेने, एक फिटनेस रूटीन का पालन करने और अपने स्वास्थ्य के हर पहलू की निगरानी और देखभाल करने की आवश्यकता होती है, जिसमें बाल, त्वचा, हृदय, मस्तिष्क, कान, आंख, फेफड़े और मस्तिष्क शामिल हैं।

जॉनसन ने एक पत्रिका के साथ एक साक्षात्कार में खुलासा किया की वे एक बेसबॉल कैप भी पहनते हैं जो उनकी खोपड़ी में लाल रोशनी डालता है।

जॉनसन ने कहा, उद्यमी ने कहा कि उनका सख्त रूटीन सिर्फ पैसा खर्च करना और युवा दिखने से कहीं बढ़कर है। "ज्यादातर लोग मानते हैं कि मृत्यु अपरिहार्य है। हम मूल रूप से मरने से पहले हमारे पास मौजूद समय को लम्बा खींचने की कोशिश कर रहे हैं,"

उन्होंने आगे कहा, मुझे नहीं लगता कि इतिहास में कोई ऐसा समय रहा है जब होमो सेपियन्स सीधे चेहरे के साथ कह सकें कि मृत्यु अपरिहार्य नहीं हो सकती है।

जॉनसन ने अपनी वेबसाइट पर उल्लेख किया, मैंने ब्लूप्रिंट को मानव होने के भविष्य का पता लगाने के लिए एक वैज्ञानिक प्रयोग के रूप में शुरू किया। मेरी यात्रा और प्रोटोकॉल खुले तौर पर साझा और सभी के लिए सुलभ है। यहां हमारा सर्वश्रेष्ठ स्वयं बनने और इस अगले युग में एक साथ कदम रखने के लिए है।

जॉनसन ने अपने कार्यक्रम का विवरण, जिसमें दैनिक लागत और उसने जो परिणाम सामने है इस बात की जाजानकारी वेबसाइट पर साझा की गई है कोई भी इसे एक्सेस कर सकता है।

साक्षात्कार के अनुसार, जॉनसन का अंतिम लक्ष्य अपने 46 वर्षीय शरीर को 18 वर्षीय शरीर में बदलना है। उनके अनुसार, उनके डॉक्टरों द्वारा एकत्रित किए गए आंकड़े बताते हैं कि ब्लूप्रिंट कार्यक्रम ने उनकी हड्डियों और हृदय की उम्र को कम कर दिया है। उन्होंने कहा कि प्रयोग ने "यह साबित कर दिया है कि एक सक्षम प्रणाली मनुष्य की तुलना में मुझे बेहतर तरीके से प्रबंधित कर सकती है।



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भारतीय महिलाओं की 63 फीसदी से अधिक कैंसर से होने वाली मौतों को रोकना संभव

नई दिल्ली. कैंसर जानलेवा बीमारी है, लेकिन समय पर बीमारी की पहचान कर 63 फीसदी से अधिक महिलाओं की जान बचाई जा सकती है। हाल ही लैंसेंट की ओर से जारी रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में समय पर उपचार नहीं मिलने के कारण हजारों महिलाओं की मौत जाती है। कैंसर से पीडि़त महिलाओं को समय पर उपचार मिलने से 37 फीसदी मौतों को टाला जा सकता है। रिपोर्ट में बताया गया कि भारतीय महिलाएं के स्वास्थ्य पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता है। इस मामले में वह स्वयं भी लापरवाह होती हैं। इसके हालत और खतरनाक हो जाती है।

50 फीसदी की उपचार तक पहुंच नहीं

लैंसेंट की कमिश्नर डॉ. ईशू कटारिया का कहना है कि 2020 में भारत में कैंसर से पीडि़त 50 फीसदी से ज्यादा महिलाओं की मौत परिवार की ओर से ध्यान नहीं देने और चिकित्सा सुविधाओं तक नहीं पहुंचने से हुईै। रिपोर्ट में मुंबई के नालासोपारा में 36 साल की एक कैंसर पीडि़त महिला रमा का भी जिक्रकिया गया।

सरकारी खर्च कम

रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में कैंसर की देखभाल पर किया जाने वाला सरकारी खर्च नेशनल हेल्थ पर के कुल खर्च का 2.53 फीसदी है। कैंसर की जांच के लिए जब किसी दूसरे डॉक्टर के पास रेफर किया जाता है तो पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को ज्यादा इंतजार करना पड़ता है।



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इन सात बीमारियों में न खाएं एंटीबायोटिक्स, समस्या हो सकती है

बिना डॉक्टरी सलाह के एंटीबायोटिक्स लेने के कारण हर साल दुनियाभर में करीब 20 लोगों की मृत्यु होती है। जब कोई व्यक्ति बिना जरूरत के एंटीबायोटिक्स ले लेता है तो उस व्यक्ति के शरीर में उस दवा का रेजिस्टेंस हो जाता है और जब उसे कोई बीमारी होती है जिसमें एंटीबायोटिक्स देना होता है तो वह काम नहीं करती है।

 

सामान्य सर्दी-खांसी, जुकाम, गला खराब होना यानी अपर रेस्प्रेटरी डिजीज और जितने भी मच्छर जनित रोग होते हैं जैसे मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया, जीका, इनमें एंटीबायोटिक्स का काम नहीं होता है। डेंगू में एंटीबायोटिक्स लेने से ब्लीडिंग की आशंका बढ़ जाती है जबकि मलेरिया में देरी से आराम मिलता है। चिकनगुनिया में एंटीबायोटिक्स देने से फेफड़ों, गुर्दे और लिवर को नुकसान होने की आशंका रहती है। इसके साथ ही वायरल हेपेटाइटिस जिसे सामान्य भाषा में पीलिया कहते हैं। यह बीमारी वायरस से होती है और मुख्य रूप से साफ-सफाई का ध्यान न रखने से यह बीमारी होती है। सामान्य बीमारियों स्क्रब टाइफस के कुछ मामलों और टाइफाइड में एंटीबायोटिक्स देना फायदेमंद होता है। अगर कोई इन बीमारियों में एंटीबायोटिक्स लेता है तो उसको नुकसान होने की आशंका रहती है।

 

सेकंड्री इंफेक्शन से बचाने के लिए भी देते
कई बार कुछ मरीज जैसे डायबिटीज या कोई दूसरी क्रॉनिक बीमारियों से ग्रसित है तो उन्हें भी सर्दी-जुकाम या गले के खराश में एंटीबायोटिक्स दिया जाता है, उन्हें सेकंड्री इंफेक्शन से बचाव के लिए ऐसा किया जाता है क्योंकि ऐसे लोगों की इम्युनिटी पहले से कमजोर होती है।

 

बैक्टीरिया की क्षमता से
तय होता है कोर्स
इसका कोर्स तय होता है जैसे 3,5,7, 10 और 14 दिन आदि। डॉक्टर बैक्टीरिया की क्षमता को जानते हुए कोर्स तय करते हैं। निर्धारित कोर्स से कम या ज्यादा मात्र में लेने से रेजिस्टेंस होता है। कई बार मरीज ठीक महसूस होने पर कोर्स बीच में छोड़ देता है। ऐसा न करें।

 

एंटीबायोटिक्स लेते हैं तो इनका रखें ध्यान
बिना डॉक्टरी सलाह के कोई भी दवा न लें। एंटीबायोटिक्स ले रहे हैं तो पानी की मात्रा बढ़ा दें ताकि इसका दुष्प्रभाव लिवर और गुर्दे पर न पड़े। इसके साथ आहार में प्रोटीन की मात्रा भी अधिक लेनी चाहिए, इससे इम्युनिटी बढ़ती है और दवा भी ज्यादा प्रभावी होती है।

 

रेजिस्टेंस के नुकसान
जब कोई एंटीबायोटिक्स रेजिस्टेंस हो जाता है तो वह दवा दोबारा जरूरत पडऩे पर काम नहीं आती है। इसके लिए मरीज को हाइ डोज वाले एंटीबायोटिक्स देने की जरूरत पड़ती है। इससे न केवल दवा की कीमत कई गुना तक बढ़ जाती है बल्कि उसके साइड इफेक्ट भी बढ़ते हैं और मरीज के रिकवरी की आशंका पहले से कम हो जाती है।

 

क्या कहती है रिसर्च
लांसेट रिसर्च के अनुसार भारत में सबसे ज्यादा एंटीबायोटिक्स का दुरुपयोग हो रहा है। एंटीबायोटिक्स रजिस्टेंस होने से नई-नई एंटीबायोटिक्स बनाने की चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। इससे न केवल ज्यादा खर्च बढ़ेगा बल्कि बीमारियों को नियंत्रण में करने में भी दिक्कत होगी।



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स्मोकर्स के साथ रहने से कैंसर का खतरा 51% तक

ब्रिटिश मेडिकल जर्नल द लांसेट के अध्ययन में दावा किया गया है कि सेकंड-हैंड स्मोकिंग कैंसर होने का 10वां सबसे बड़ा कारण है। जो लोग स्मोकर्स के पास रहते हैं उनमें कैंसर की आशंका सामान्य की तुलना में 51 फीसदी तक होती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सेकंड हैंड स्मोकिंग का दुष्प्रभाव सभी पर पड़ता है।

 

अगर कोई व्यक्ति घर में स्मोकिंग करता है तो उसके बच्चों पर भी इसका ज्यादा दुष्प्रभाव देखने को मिला है। ऑफिस, बार, रेस्तरां और कैसीनो के साथ-साथ अन्य जगहों पर भी सिगरेट न पीने वाले लोग सेकंड हैंड धुएं के संपर्क में आते हैं। सेकंड हैंड धुआं बच्चों और वयस्कों में स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर सकता है।

 

कभी कभी यह ज्यादा घातक भी हो सकता है। अमरीकी रोग नियंत्रण केंद्र के मुताबिक, तंबाकू के धुएं में 7,000 से अधिक जहरीले रसायन होते हैं। 1964 के बाद से धूम्रपान नहीं करने वाले करीब 25 लाख लोगों की सेकंड-हैंड धुएं के संपर्क में आने से मौत हो चुकी है। इससे बचाव का प्रभावी तरीका है कि तत्काल धूम्रपान को छोड़ दिया जाए। छोडऩे के दिन से फायदा होता है।

 



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इस मौसम में अदरक का उपयोग कर रहे हैं तो इन बातों पर ध्यान दें

सर्दियां शुरू हो गई हैं और इस समय चाय में अगर अदरक न हो तो आप खुद को ऊर्जावान ही महसूस नहीं करते। कई बार लोगों को चाय में अदरक के अधिक उपयोग की आदत पड़ जाती है, आपको अदरक का उपयोग करते समय कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए।

 

अधिकतर लोगों को सब्जी और चाय में अदरक का उपयोग करने बेहद पसंद होता है। चूंकि वर्षा ऋतु से लेकर शरद तक अदरक का उपयोग नुकसानदेह नहीं होता, लेकिन गर्मियों में इसका अधिक मात्रा में उपयोग नुकसान पहुंचाता है। क्योंकि अदरक की तासीर गर्म होती है, इसलिए इसका अधिक मात्रा में सेवन सीने में जलन और एसिडिटी की समस्या कर सकता है।

 

अदरक आहार कल्पना का हिस्सा है, जिसमें आप एक खाद्य पदार्थ को दूसरे के साथ बैलेंस कर सकते हैं। जिसमें एक खाद्य पदार्थ की गर्मी को दूसरे खाद्य पदार्थ अपने शीत गुणों से नियंत्रित कर देते हैं।

 

ऐसे करें सेवन

दूध में उबालकर अदरक का सेवन करें
शहद के साथ अदरक का उपयोग फायदेमंद होता है।

 

सौंठ, कालीमिर्च और पीपल का उपयोग कफ-कोल्ड की समस्या में कारगर है।
अदरक को सेंधा नमक के साथ लेना चाहिए।
रोजाना बनने वाली सब्जी में अदरक थोड़ी मात्रा में उपयोग करें।



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Blue tea benefits: नीली चाय के फायदे हैं लेकिन यह औषधीय है, डॉक्टरी सलाह से लें

नीली चाय सुनकर आपको थोड़ी हैरत तो होगी, लेकिन इसके गुण भी बहुत हैं। दिखने में भी आकर्षक लगती है। यह बटरफ्लाई पी के फूलों यानी अपराजिता के फूलों से तैयार की जाती है। आयुर्वेद में अपराजिता के फूलों का उपयोग डायबिटीज और कार्डियो वेस्कुलर डिजीज के इलाज में किया जाता है। महिलाओं को इस चाय का सेवन नियमित तौर पर नहीं करना चाहिए। उन्हें प्रसव के समय या पीरियड्स नियमित करने के लिए इस चाय का सेवन करने की सलाह दी जाती है।

 

ऐसे बनाएं : एक पैन में एक कप पानी लें और इसे उबालें। जब यह उबल जाए तो इसमें 4 से 5 बटरफ्लाइ पी के फूल डालें और इसे अच्छी तरह से उबलने दें। अब इस चाय में को प्याली में छान लें।


शुगर लेवल कंट्रोल : नीली चाय डायबिटीज में फायदेमंद है। इस चाय का सेवन ब्लड शुगर को नियंत्रित रखता है।

 

डिटॉक्सीफिकेशन

यह शरीर को डिटॉक्स करती है। शरीर से अवांछित तत्त्वों को निकालकर इंटरनल क्लीनिंग करती है।

 

ये ध्यान रखें : यह चाय हर किसी के लिए नहीं है। आयुर्वेद में दो तरह की कल्पनाएं काम करती हैं आहार कल्पना और औषध कल्पना। औषध कल्पना वाली हब्र्स को आहार की तरह उपयोग नहीं कर सकते। इसे विशेषज्ञ की सलाह से लें।



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रिसर्च में किया गया दावा, दो अलग-अलग लोगों की याददाश्त में हो सकता है अंतर

क्या आपने कभी सोचा है कि आप अपने साथियों की तुलना में चीजों को याद रखने में कम सक्षम क्यों हैं? शोधकर्ताओं ने कुछ मस्तिष्क संकेतों की खोज की है, जिससे लोगों की याददाश्त में आने वाले अंतर को समझा जा सकता है। हालांकि, यह सच है कि कुछ मस्तिष्क क्षेत्र याददाश्त प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अब तक यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि जब बेहतर या खराब याददाश्त प्रदर्शन वाले लोगों में जानकारी एकत्र करने की बात आती है तो ये क्षेत्र अलग-अलग गतिविधियों का प्रदर्शन करते हैं या नहीं। स्विट्जरलैंड में बेसल विश्वविद्यालय की टीम ने 18 से 35 वर्ष की आयु के बीच के 1,500 प्रतिभागियों की स्मृति पर इमेजिंग अध्ययन किया।

 

प्रतिभागियों को कुल 72 छवियों को देखने और याद रखने के लिए कहा गया था। प्रक्रिया के दौरान शोधकर्ताओं ने एमआरआई का उपयोग करके विषयों की मस्तिष्क गतिविधि को रिकॉर्ड किया> फिर उन्हें यथासंभव अधिक से अधिक छवियों को याद करने के लिए कहा। शोधकर्ताओं ने पाया कि प्रतिभागियों की सामान्य आबादी के बीच याददाश्त प्रदर्शन में काफी अंतर था। हिप्पोकैम्पस (ब्रेन का एक पार्ट) सहित मस्तिष्क के कुछ क्षेत्रों में, मस्तिष्क का एक क्षेत्र जो मुख्य रूप से याददाश्त से जुड़ा होता है। इसमें शोधकर्ताओं ने याद रखने की प्रक्रिया के दौरान मस्तिष्क की गतिविधि और बाद में याददाश्त प्रदर्शन के बीच सीधा संबंध पाया।

 

नेचर कम्युनिकेशंस जर्नल में प्रकाशित पेपर में टीम ने कहा, बेहतर याददाश्त वाले व्यक्तियों में मस्तिष्क के इन क्षेत्रों में अधिक सक्रियता देखी गई। जबकि, ओसीसीपिटल कॉर्टेक्स (ब्रेन का एक पार्ट) में अन्य स्मृति-प्रासंगिक मस्तिष्क क्षेत्रों के लिए ऐसा कोई संबंध नहीं पाया गया, वे याददाश्त प्रदर्शन के सभी स्तरों वाले व्यक्तियों में समान रूप से सक्रिय थे। विश्वविद्यालय की डॉ. लियोनी गीसमैन ने कहा, "निष्कर्ष हमें यह बेहतर ढंग से समझने में मदद करते हैं कि एक व्यक्ति और दूसरे व्यक्ति के बीच याददाश्त में अंतर कैसे होता है।" गीसमैन ने कहा, "हालांकि, किसी एक व्यक्ति के मस्तिष्क के संकेत उनकी याददाश्त प्रदर्शन के बारे में कोई निष्कर्ष निकालने की अनुमति नहीं देते हैं।"

 



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Tuesday, 26 September 2023

सर्दी में ठंडे पानी से नहाते हैं तो इनका रखें ध्यान

सर्दी में ठंडे पानी से नहाने से हार्ट और ब्रेन स्ट्रोक की आशंका रहती है। यह समस्या तब होती है जब अचानक से ठंडे पानी से व्यक्ति नहा लेता है। वहीं देखा जाए तो ठंडे पानी से नहाने से जोड़ों के दर्द, सूजन और तनाव आदि में राहत भी मिलती है।

 

ऐसे में जब ठंडे पानी से नहाते हैं तो कुछ बातों का ध्यान रखें जैसे ज्यादा ठंडा पानी है तो हल्का गुनगुना कर लें। पानी सिर से गिराने की जगह पैरों, फिर कमर, कंधे और सबसे बाद में सिर नहाएं। दो बार में भी नहा सकते हैं। पहले कंधे से नहा लें और बाद में सिर को धो लें इससे अचानक से सर्दी लगने का रिस्क घटेगा।

 

दाना मेथी फेस पैक से दूर करें चेहरे के मुंहासे
चे हरों पर मुंहासों और झाइयों की समस्या है तो इसके लिए दाना मेथी फेसपैक लगा सकते हैं। इस पैक को बनाने के लिए रात में एक चम्मच दाना मेथी भिगो दें और सुबह उसमें दो चम्मच गुलाब जल और एक चम्मच नींबू का रस मिलाकर पेस्ट बना लें।

 

इसको अपने चेहरे करीब 20 मिनट के लिए लगा दें। फिर इसे सामान्य पानी से धो लें। इस प्रक्रिया को सप्ताह में दो-तीन बार अपना सकते हैं। इससे कील-मुंहासों के साथ दाग-धब्बों की समस्या है तो राहत मिलेगी।



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Home Remedies: चूहों का घर में बढ़ गया है आंतक, तो इन्हें दूर भागने में काम आएंगे ये घरेलू नुस्खे

Home Remedies: घर से चूहों को भगाना बहुत ही मुश्किल काम होता है। अगर घर में एक भी चूहा घुस जाए तो आंतक मचाना शुरू कर देते है। लेकिन चूहों को घर से दूर भागने में कुछ घरेलू उपाय आपकी मदद कर सकते है।

Home Remedies: अगर घर में एक भी चूहा घुस जाए तो किसी आफत से कम नहीं है। ये घरों में चारो तरह आंतक मचाना शुरू कर देते है। घर पर मौजूद हर एक चीज कुतर डालते हैं फिर चाहे वो अनाज, कपड़े हो या फिर कोई अन्य महंगा समान है। ये चीजों को काटकर लोगों की मुश्किलें बढ़ाने का काम करते है। घरों में चूहों की मौजूदगी किसी बड़ी परेशानी से कम नहीं होती है। ये चूहें कई गंभीर बीमारियों को जन्म देते है। इसलिए जरूरी है कि इन्हें घर से भगाया जाए। बिना जान से मारे कुछ घरेलू उपायों की मदद से इन चूहों को घर से दूर भगाया जा सकता है। तो आइए जानते है इन घरेलू उपायों के बारे में जो घर से चूहों को भागने में मदद करते है


चूहों को घर से भागने के घरेलू उपाय
1. प्याज
चूहों को घर से भागने के लिए प्याज एक अच्छा उपाय है। क्योंकि चूहों को प्याज की गंध बिल्कुल भी पसंद नहीं होती है। इसलिए प्याज की गंध से चूहे घर से भाग जाते है। इसके लिए चूहों के घूमने की जगह पर प्याज का टुकड़ा रख दें। जिसकी वजह से चूहे खुद ही दूर भागते नजर आने लगेंगे।


2. पेपरमिंट
चूहों को घर से भागने के लिए पेपरमिंट एक अच्छा उपाय है। क्योंकि चूहों को पेपरमिंट की गंध बिल्कुल भी पसंद नहीं होती है। इसलिए पेपरमिंट की गंध से चूहे घर से भाग जाते है। इसके लिए चूहों के घूमने की जगह पर एक रूई में पेपरमिंट लगाकर रख दें। जिसकी वजह से चूहे खुद ही दूर भागते नजर आने लगेंगे।

3. तेजपत्ता
चूहों को घर से भगाने के लिए तेजपत्ता एक अच्छा उपाय है। तेजपत्ता की खुशबू से चूहे घर से भाग जाते है। इसके लिए चूहों के घूमने की जगह पर या घर के कोनों में तेजपत्ता रख दें। जिसकी वजह से चूहे खुद ही दूर भागते नजर आने लगेंगे।

4. लाल मिर्च
चूहों को घर से भगाने के लिए लाल मिर्च एक अच्छा उपाय है। लाल मिर्च से चूहे घर से भाग जाते है। इसके लिए चूहों के घूमने की जगह पर लाल मिर्च पाउडर या सुखा लाल मिर्च रख दें। जिसकी वजह से चूहे खुद ही दूर भागते नजर आने लगेंगे।



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एक बार फिर से कोरोना वायरस जैसी बीमारी फैलने की संभावना, मर सकते है 50 मिलियन लोग

Batwoman warns of next pandemic: चीन की वायरोलॉजिस्ट शी झेंगली ने चेतावनी दी है कि एक और कोविड महामारी जैसा प्रकोप "बहुत संभावित" है। एक नए अध्ययन में, शी और वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के उनके सहयोगियों ने 40 कोरोनावायरस प्रजातियों के मानव स्पिलओवर जोखिम का मूल्यांकन किया। उन्होंने पाया कि 20 कोरोनावायरस प्रजातियां "उच्च जोखिम" वाली हैं। उन्होंने कहा कि अगर पहले किसी कोरोनावायरस ने बीमारी का कारण बनाया है, तो इस बात की बहुत अधिक संभावना है कि वह भविष्य में भी प्रकोप का कारण बनेगा। उन्होंने यह भी कहा कि यह लगभग निश्चित है कि भविष्य में रोग का प्रकोप होगा और यह बहुत संभावित है कि यह फिर से कोरोनावायरस के कारण होगा।


शी के अनुसार अगर पहले किसी कोरोनावायरस ने बीमारी पैदा की है तो भविष्य में भी उसके संक्रमण का खतरा अधिक है. इन 40 प्रजातियों में से छह पहले ही ऐसी बीमारियों का कारण बन चुकी हैं जो मनुष्यों को संक्रमित करती हैं, जबकि इस बात के प्रमाण हैं कि आगे की तीन प्रजातियों ने बीमारी पैदा की या अन्य जानवरों की प्रजातियों को संक्रमित किया.

यह भी पढ़े-शरीर में विटामिन बी12 और मिनरल्स की कमी के 7 लक्षण, नजरअंदाज करना पड़ सकता है महंगा

स्टडी में चेतावनी दी गई है कि भविष्य में किसी बीमारी का उभरना लगभग निश्चित है और यह बहुत अधिक संभावना है कि यह फिर से एक कोरोनावायरस बीमारी होगी. यह स्टडी वायरल लक्षणों के विश्लेषण पर आधारित है, जिसमें जनसंख्या, आनुवंशिक विविधता, मेजबान प्रजातियां और जूनोसिस का कोई पिछला इतिहास शामिल है - ऐसी बीमारियां जो जानवरों से मनुष्यों में फैलती हैं.

शी और उनके सहयोगियों ने रोगज़नक़ के महत्वपूर्ण मेजबानों की भी पहचान की, जिनमें चमगादड़ और कृंतक जैसे प्राकृतिक मेजबान, या ऊंट, सिवेट, सूअर या पैंगोलिन जैसे संभावित मध्यवर्ती मेजबान शामिल हैं. यह स्टडी ऐसे समय में सामने आई है जब ब्रिटेन वैक्सीन टास्कफोर्स की पूर्व अध्यक्ष केट बिंघम ने अपनी एक नई किताब में एक ऐसी अगली महामारी के बारे में चेतावनी दी है जो एक मिलियन अज्ञात वायरस से आ सकती है और स्पेनिश फ्लू की तरह लगभग 50 मिलियन लोगों को मार सकती है।


विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी एक "अनिवार्य" अगली महामारी "रोग X" के खतरे की चेतावनी दी, जिससे दुनिया भर में चिंताएं बढ़ गईं। रोग X को पहली बार WHO ने 2018 में गढ़ा था, कोविड-19 महामारी ने दुनिया पर हमला करने से एक साल पहले। यह WHO की "ब्लू प्रिंट सूची प्राथमिकता वाले रोगों" में से एक है जो अगली घातक महामारी का कारण बन सकता है और इसमें इबोला, SARS और जीका शामिल हैं।



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नाईट शिफ्ट में काम करने वाले बस करें ये उपाय, हमेशा रहेंगे एक्टिव

एक नए अध्ययन खुलासा हुआ है कि रात की ड्यूटी के दौरान 120 मिनट की झपकी की तुलना में 90 मिनट की झपकी और उसके बाद 30 मिनट की झपकी उनींदापन और थकान को दूर करने में अधिक प्रभावी है। साइंटिफिक रिपोर्ट्स जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में 2012 से 2018 तक रात की शिफ्ट में झपकी पर किए गए पायलट स्टडी के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया।

 

 

हिरोशिमा विश्वविद्यालय के ग्रेजुएट स्कूल ऑफ बायोमेडिकल एंड हेल्थ साइंसेज में नर्सिंग विज्ञान के प्रोफेसर, अध्ययन की एकमात्र लेखक सनाई ओरियामा ने कहा, ''लंबी अवधि के प्रदर्शन को बनाए रखने के लिए 90 मिनट की झपकी और कम थकान के स्तर व तेज़ प्रतिक्रियाओं को बनाए रखने के लिए 30 मिनट की झपकी, झपकी के रणनीतिक संयोजन के रूप में सुबह की कार्यकुशलता और सुरक्षा के लिए मूल्यवान हो सकती है।"

 

 

ओरियामा ने झपकी लेने के बाद और शाम 4 बजे से सुबह 9 बजे की शिफ्ट के दौरान सतर्कता और प्रदर्शन की तुलना करने के लिए पिछले पायलट अध्ययनों की दोबारा जांच की। उन्होंने पाया कि आधी रात को समाप्त होने वाली 120 मिनट की झपकी से उनींदापन का अनुभव और भी बदतर हो गया।

 

 

हालांकि, दो झपकी- 90 मिनट की झपकी, आधी रात तक चलने वाली और 30 मिनट की झपकी, जो सुबह 3 बजे समाप्त होती है, यह उनींदापन से बचाती है। ओरियामा ने कहा, "मैं काम के प्रकार और दिन के समय के आधार पर कई झपकियों को संयोजित करने में सक्षम होना चाहती हूं, और ऐसी झपकियां चुनना चाहती हूं जो उनींदापन, थकान को कम करने और प्रदर्शन को बनाए रखने में प्रभावी हों।"

 

 

उदाहरण के लिए, रात की शिफ्ट, जो शाम 4 बजे से अगली सुबह 9 बजे तक चलती है, 90 मिनट और 30 मिनट की एक विभाजित झपकी, जो क्रमश: 12 बजे और 3 बजे समाप्त होती है, 120 मिनट की मोनोफैसिक झपकी की तुलना में अधिक प्रभावी मानी जाती है, जो 12 बजे समाप्त होती है।

 

 

दिलचस्प बात यह है कि जिन लोगों को 90 मिनट की झपकी के दौरान सोने में अधिक समय लगा, उन्हें उचिडा-क्रैपेलिन परीक्षण (यूकेटी) में खराब अंक मिले, जो एक समयबद्ध बुनियादी गणित परीक्षा है, जिसका उद्देश्य किसी कार्य को करने में गति और सटीकता को मापना है।

 

 

ओरियामा ने कहा कि निष्कर्ष नए माता-पिता के लिए भी मददगार हो सकते हैं। ओरियामा ने कहा, "इस अध्ययन के नतीजों को न केवल रात की शिफ्ट में काम करने वालों पर लागू किया जा सकता है, बल्कि शिशुओं को पालने वाली माताओं में नींद की कमी की थकान को कम करने के लिए भी लागू किया जा सकता है।"



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Monday, 25 September 2023

उम्र के किसी भी पड़ाव पर हो सकती है पीसीओडी, पहचानें लक्षण

पीसीओडी यानी पॉलीसिस्टिक ओवेरियन डिजीज एक हार्मोनल विकार है जिसमें ओवेरीज में सिस्ट बनने लगती हैं। फूड हैबिट्स, फिजिकल एक्टिविटी की कमी और स्ट्रेस के चलते होने वाला मोटापा महिलाओं को इस बीमारी से ग्रसित कर रहा है। किशोरावस्था में भी लड़कियों में पीसीओडी के मामले काफी सामने आ रहे हैं। महिलाओं में इस बीमारी की वजह से कंसीव करने में समस्या पैदा होती है। जरूरी यह है कि उन्हें इस बीमारी के शुरुआती लक्षणों के बारे में पता हो।

 

लक्षण पहचानें : लड़कियों और महिलाओं में जब मोटापा बढऩे लगता है तो सतर्कता जरूरी है। मेटाबॉलिज्म में गड़बड़ी से बढ़ा मोटापा हार्मोन्स पर भी दुष्प्रभाव डालता है। इससे ही पीरियड्स में अनियमितता, फेशियल हेयर्स बढऩा और आर्मपिट में डार्कनेस जैसे लक्षण आने लगते हैं।

 

तनाव मुक्त रहें
पीसीओडी का टीनएज गल्र्स में सबसे बड़ा कारण स्ट्रेस देखा गया है। पढ़ाई के तनाव की वजह से वे अधिक भोजन करने लगती हैं जिससे मोटापा बढ़ता है। इससे हार्मोन्स में असंतुलन पैदा होता है।

 

खानपान पर ध्यान दें
फास्टफूड न खाएं। पौष्टिक खानपान पर ध्यान दें। फाइबर, विटामिन ई और ओमेगा थ्री फैटी एसिड अधिक लें। डिब्बाबंद चीजों से परहेज करें।

 

फिजिकली एक्टिव बनी रहें
व्यायाम को रुटीन में शामिल करें। सुबह योग व प्राणायाम अवश्य करें। महिलाएं यह न सोचें कि घरेलू कार्य पूरे कर लेने से ही उनके व्यायाम की आवश्यकता पूरी हो जाती है। शारीरिक रूप से एक्टिव बनी रहें। टहलें या साइकिलिंग करें। मी टाइम निकालें।



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एचआइवी में एक गोली रोज लेने से घटता वायरल लोड, संक्रमण की आशंका भी जीरो

जब कोई व्यक्ति एचआइवी संक्रमित होता है तो धीरे-धीरे उसमें वायरल लोड बढ़ता है यानी बीमारी गंभीर होती है। ऐसे व्यक्ति को कुछ वर्षों तक सही इलाज नहीं मिले तो उन्हें एड्स हो जाता है। एड्स ऐसी बीमारी है जिसमें एक साथ कई तरह की समस्याएं होती हैं। इससे मरीज की जान चली जाती है।

 

इलाज की सुविधा अच्छी
एचआइवी-एड्स का इलाज पहले से बहुत अच्छा हुआ है। अगर बीमारी की पहचान जल्दी हो जाए तो दवा लेने के साथ व्यक्ति सामान्य जीवन व्यतीत कर सकता है। न तो उसकी जान जाती है और न ही उससे दूसरों में संक्रमण फैलता है।

 

एआरटी सेंटर से लें इलाज

देशभर में एआरटी सेंटर्स बनाए गए हैं जहां एचआइवी के मरीजों का नि:शुल्क इलाज होता है। अपने देश में भी वही इलाज मिलता है जो विश्व के विकसित देशों में मिलता है।

 

नियमित दवा लेने से वायरल लोड जीरो होता
हाल ही कई रिसर्च में पाया गया कि जो एचआइवी मरीज नियमित रूप से अपनी दवा लेते हैं उनका वायरल लोड धीरे-धीरे घटकर जीरो हो जाता है। ऐसे व्यक्ति से दूसरों में एचआइवी संक्रमण होने की आशंका भी शून्य हो जाती है। वह भी सामान्य लोगों की तरह में अपना जीवन व्यतीत कर सकते हैं लेकिन दवा बीच में छोडऩे से इसकी गंभीरता बढ़ जाती है।

 


हाइ रिस्क लोग इसकी मॉनीटरिंग करवाते रहें
असुरक्षित संबंध बनाने वाले, सुई से नशा करने वाले, जिन्हें असुरक्षित खून चढ़ा हो, संक्रमित सुई चुभी हो या इस तरह के मेडिकल सेंटर्स में काम करने वाले लोग, गर्भवती महिलाएं आदि एचआइवी के लिए हाइ रिस्क श्रेणी में आते हैं। ऐसे लोगों की मॉनीटरिंग होनी चाहिए। उनकी जांच होनी चाहिए क्योंकि एचआइवी में शुरुआती लक्षण नहीं दिखते हैं।

 

डरें नहीं, केयर करें
अक्सर देखा जाता है कि एचआइवी मरीजों की पहचान के बाद उनका परिवार साथ नहीं देता है। यह सही बात नहीं है। एक बार इलाज शुरू हो जाता है तो डरने वाली कोई बात नहीं है। ऐसे मरीजों की केयर करें। मरीज की दवा बीच में बंद न होने दें। धीरे-धीरे मरीज दवाओं के साथ सामान्य लोगों जैसा हो सकता है।

 

जब हो किसी को संदेह तो...

जब किसी को लगता है कि उसे कोई संक्रमित सुई लगी है जिससे एचआइवी की आशंका है या फिर असुरक्षित यौन संबंध बना है तो सबसे पहले उन्हें अपनी जांच करवानी चाहिए।


पहली जांच दो सप्ताह होने पर करवाएं। यह एक तरह का एंटीजन टेस्ट होता है। यह नेगेटिव या पॉजिटिव आता है तो एक माह बाद एंटीवायरल लोड टेस्ट किया जाता है।


दूसरी-तीसरी जांच में इसकी पुष्टि होती है। अगर पहले की जांचों में टेस्ट नेगेटिव आया है तो दूसरे और तीसरे महीने में भी वायरल लोड की जांच की जाती है। अगर दूसरे और तीसरे माह में भी वायरल लोड नेगेटिव आता है तो बीमारी नहीं है। अगर यह पॉजिटिव आता है तो तत्काल एआरटी सेंटर जाएं और डॉक्टरी परामर्श लें।



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इस राज्य में कहर मचा रहा डेंगू, 38 हजार के पार हुए कुल मामले

पश्चिम बंगाल स्वास्थ्य विभाग ने बताया कि राज्य में डेंगू के मामलों की संख्या रिकॉर्ड 38,000 के आंकड़े को पार कर गई है। सोमवार तक, कुल आंकड़ा 38,181 था। लगभग हर दिन अलग-अलग जिलों से डेंगू से होने वाली मौतों की खबरें सामने आ रही हैं, लेकिन विभाग ने वास्तविक संख्या नहीं बताई है। विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, "चिंताजनक बात यह है कि अब उत्तर बंगाल, खासकर मालदा के कई इलाके तेजी से डेंगू की चपेट में आ रहे हैं।"

 

उत्तर और दक्षिण बंगाल में कई "डेंगू हॉटस्पॉट क्षेत्र" नामित किए गए हैं, जहां नियमित आधार पर विशेष निगरानी की जा रही है। राज्य की राजधानी में मामलों में अचानक वृद्धि के बीच, कोलकाता नगर निगम (केएमसी) ने स्थिति नियंत्रण में आने तक अपने स्वास्थ्य केंद्रों को "सप्ताह में सात दिन" के आधार पर संचालित करने का निर्णय लिया है। केएमसी ने अगले दो महीनों के लिए अपने पूरे स्टाफ की छुट्टियां भी रद्द कर दी हैं। अक्टूबर में दुर्गा पूजा और नवंबर में दिवाली के दौरान कर्मचारी छुट्टियां नहीं ले सकेंगे।

 

इस बीच, विपक्षी भाजपा ने पश्चिम बंगाल में डेंगू की चिंताजनक स्थिति को लेकर राज्य सरकार पर तीखा हमला बोला है। पश्चिम बंगाल में भाजपा प्रवक्ता समिक भट्टाचार्य ने कहा, "जिस तरह पश्चिम बंगाल में घोटालेबाज राज्य सरकार से प्राप्त संरक्षण के कारण निडर हो गए हैं, उसी तरह मच्छर भी यह समझकर निडर हो गए हैं कि स्वास्थ्य अधिकारी उन्हें नियंत्रित करने के लिए निवारक उपाय करने में इतने लापरवाह हैं।''

 

केएमसी के डिप्टी मेयर और सदस्य-मेयर-इन-काउंसिल (स्वास्थ्य) अतीन घोष ने दावा किया है कि अकेले केएमसी इस खतरे को नियंत्रित नहीं कर सकता,जब तक कि आम लोग अपने घरों और आसपास के क्षेत्रों को साफ रखने जैसी सावधानी नहीं बरतते।

 

डेंगू में घरेलू उपचाय

डेंगू में फायदेमंद है नीम
डेंगू में नीम के पत्ते का रस प्लेटलेट्स (Platelets) और सफेद रक्त कोशिकाओं की संख्या बढ़ाने में कारगर है। इसलिए डेंगू होने पर इसका सेवन करना चाहिए।

 

गिलोय है फायदेमंद
डेंगू के इलाज में गिलोय के सेवन फायदेमंद है। यह इम्यूनिटी बूस्ट करता है। यह डेंगू बुखार के महत्वपूर्ण जड़ी बूटी है। इसके सेवन से संक्रमण कम होता है। गिलोय के तने को उबालकर इसका काढ़ा बनाकर पीने से लाभ मिलेगा।

 

तुलसी का सेवन है कारगर
डेंगू बुखार में तुलसी का सेवन कारगर है। यह शरीर के विषाक्त तत्वों को बाहर करती है। साथ इम्यूनिटी भी बूस्ट करती है। 5-7 तुलसी के पत्ते को पानी में उबालकर इसमें एक चुटकी काली मिर्च मिलाकर पीने से लाभ मिलेगा।

 

डेंगू में रामबाण है पपीते का सेवन
डेंगू के इलाज में सबसे असरदार है पतीते के पत्ते का सेवन। पपीते के पत्ते को पीसकर पानी में मिलाकर मरीज को देने से तेजी से सुधार होता है। साथ ही मरीज के खून में प्लेटलेट्स (Platelets) और सफेद रक्त कोशिकाओं की संख्या तेजी से बढ़ जाती है।

 

डेंगू बुखार में संतरे का करें सेवन
संतरे के रस में एटीओक्सीडेंट्स और विटामिल सी पाए जाते हैं। जो डेंगू के वायरस को नष्ट करने में असरदार है। यह इम्यूनिटी को भी बूस्ट करता है।

 

खूब पीए नारियल पानी
डेंगू होने पर नारियल पानी और जूस का सेवन भरपूर मात्रा में करना चाहिए। इसके सेवन में प्लेटलेट्स (Platelets) और सफेद रक्त कोशिकाओं की संख्या बढ़ाने में मदद मिलती है।



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New Report : चमगादड़ों के आनुवंशिक अनुकूलन ने कैंसर और संक्रमण को रोकने में मदद की

Bat cancer prevention : एक नए अध्ययन के अनुसार, चमगादड़ों के तेजी से होने वाले आनुवंशिक अनुकूलन ने उन्हें कैंसर और संक्रमण दोनों से बचने में मदद की है।

चमगादड़ स्तनधारियों के बीच असाधारण हैं, क्योंकि वे लंबे समय तक जीवित रहते हैं, कम कैंसर दर रखते हैं, और मजबूत प्रतिरक्षा प्रणाली रखते हैं।

यूएस में कोल्ड स्प्रिंग हार्बर लेबोरेटरी और यूनिवर्सिटी ऑफ ओक्लाहोमा के शोधकर्ताओं ने दो चमगादड़ प्रजातियों - जमैका फ्रूट चमगादड़ और मेसोअमेरिकन मूंछों वाले चमगादड़ के जीनोम को अनुक्रमित किया। उन्होंने चमगादड़ और अन्य स्तनधारियों के विविध संग्रह के साथ एक तुलनात्मक जीनोमिक विश्लेषण भी किया।

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शोधकर्ताओं का कहना है कि इन आनुवंशिक अनुकूलनों ने चमगादड़ों को उनके असाधारण स्वास्थ्य और दीर्घायु को प्राप्त करने में मदद की है।

यह अध्ययन चमगादड़ों की अनूठी जीवविज्ञान के बारे में हमारी समझ को आगे बढ़ाता है। यह मानव स्वास्थ्य और रोग के लिए भी महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।

शोधकर्ताओं ने पाया कि चमगादड़ों में डीएनए मरम्मत और प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़े कई आनुवंशिक अनुकूलन हैं। इनमें से कई अनुकूलन कैंसर और संक्रमण को रोकने में मदद कर सकते हैं।

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उदाहरण के लिए, चमगादड़ों में डीएनए मरम्मत से जुड़े छह प्रोटीनों में आनुवंशिक अनुकूलन होते हैं। ये प्रोटीन डीएनए को क्षति से बचाने में मदद करते हैं, जो कैंसर का कारण बन सकती है।

चमगादड़ों में प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़े 46 प्रोटीनों में भी आनुवंशिक अनुकूलन होते हैं। ये प्रोटीन शरीर को संक्रमण से बचाने में मदद करते हैं।



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Health Benefits of Surya Namaskar: रोजाना करें सूर्य नमस्‍कार, सेहत को मिलेंगे चमत्कारी फायदे, लंबी उम्र तक बने रहेंगे फिट

Health Benefits of Surya Namaskar: अगर आप कम समय में अपने शरीर स्वस्थ्य रखना चाहते हैं तो आप सिर्फ एक योगासन करके भी फिट रह सकते हैं। अपने फिटनेस को बेहतर बनाने और बीमारियों को दूर रखने के लिए घर पर बड़ी आसानी से सूर्य नमस्‍कार का अभ्‍यास कर सकते हैं। इसके चमत्कारी रिजल्ट्स मिलेंगे। यह ना केवल आपको शारीरिक मजबूती देता है, बल्कि मानसिक रूप से भी आपको फिट रखता है।

 

इस तरह करें शुरुआत
सबसे पहले मैट पर कमर और गर्दन को सीधी करके पद्मासन या अर्ध पद्मासन की मुद्रा में बैठकर अब आंखें बंद करके गहरी सांस लें। कुछ स्‍ट्रेचिंग करें और फिर ओम का उच्‍चारण करते हुए प्रार्थना करें।

 

सूर्य नमस्‍कार करने का तरीका

प्रणामासन
मैट पर एक तरफ सीधे खड़े हो जाएं और अपने हाथों को सामने जोड़ते हुए प्रणाम की मुद्रा बनाएं। अब इसी मुद्रा में सूर्य का ध्‍यान करें और कुछ देर होल्‍ड करें। गहरी सांस लें और फिर छोड़ दें।

 

हस्तउत्तनासन
अब गहरी सांस भरते हुए अपने दोनों हाथों को सिर के ऊपर ले जाकर अब धीरे धीरे अपने हाथों को प्रणाम करने की मुद्रा में पीछे की तरफ हल्‍का झुकने की कोशिश करें और इस स्थिति में कुछ समय तक रुकें।

 

पादहस्तासन
फिर धीरे-धीरे सांस छोड़ें और आगे की ओर झुकते हुए अपने हाथों से पैरों की उंगलियों को स्‍पर्श करें। इस मुद्रा में आपका सिर घुटनों से मिलना चाहिए। गहरी सांस लें और निकालें।

 

अश्व संचालनासन
इसके बाद गहरी सांस लेते हुए दाहिने पैर पीछे की ओर ले जाएं और पैर के घुटने को जमीन पर रखें। इस दौरान दूसरे पैर को मोड़कर दोनों हाथों के बीच रखें और आगे की तरफ देखें।

 

दंडासन
अब सांस छोड़ते हुए अपने दोनों हाथों और पैरों को एक लाइन में रखें। इसके बाद पुश-अप करने की अवस्था में आ जाएं। साथ ही गहरी सांस लेते रहें।

 

अष्टांग नमस्कार
अब सांस लेते हुए अपनी हथेलियों, चेस्ट, घुटनों और पैरों को जमीन से सटाएं। इस अवस्था में कुछ देर होल्‍ड करें और गहरी सांस लें और निकालें।

 

भुजंगासन
अब सांस छोड़ते हुए अपनी हथेलियों को जमीन पर रखे रहें और नाभी तक शरीर के आगे के हिस्‍से को उठाएं और पेट को जमीन से सटाकर रखें। साथ ही गर्दन को पीछे की ओर झुकाएं।

 

पर्वतासन अथवा अधोमुख शवासन
पैरों को जमीन पर सीधा रखें। कूल्हे को ऊपर की ओर उठा लें। अपने कंधों को सीधा रखें और चेहरे को अंदर की तरफ रखें। इसके बाद अश्व संचालनासन, पादहस्तासन, हस्तउत्तनासन और प्रणामासन करें।



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Find in research : नींद की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए मस्तिष्क का 'जादुई बटन'

Secrets of Sleep and Memory : शोधकर्ताओं ने नींद और स्मृति से जुड़े मस्तिष्क के एक 'नीले धब्बे' की पहचान की है, एक ऐसी प्रगति जो नींद को कैसे नियंत्रित किया जाता है, यह समझने में मदद कर सकती है। यह तो लंबे समय से ज्ञात है कि नींद मस्तिष्क के लिए अच्छी है।

हम यह भी जानते हैं कि प्रकाश केवल देखने के लिए नहीं है, बल्कि मूड जैसे अन्य पहलुओं में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हम यह नहीं जानते कि यह सब हमारे दिमाग में कैसे होता है।

बेल्जियम में यूनिवर्सिटी ऑफ लीज की एक टीम ने अल्ट्रा-हाई फील्ड 7 टेस्ला एमआरआई का उपयोग करके प्रदर्शित किया कि हमारे आरईएम स्लीप (नींद का वह हिस्सा जिसके दौरान हम सबसे अधिक सपने देखते हैं) की गुणवत्ता लोकोस सेरुलियस की गतिविधि से जुड़ी है।

यह छोटा मस्तिष्क नाभिक, 2 सेमी लंबी स्पेगेटी के आकार का मस्तिष्क के आधार पर (ब्रेनस्टेम में) स्थित होता है।

लोकोस सेरुलियस - लैटिन में "नीला धब्बा" के लिए - ऑटोप्सी में देखे जाने पर इसका रंग इसके नाम पर होता है। यह नॉरएड्रेनालाईन नामक एक न्यूरोमॉड्यूलेटर को स्रावित करने के लिए मस्तिष्क के लगभग हर क्षेत्र (और रीढ़ की हड्डी में) में प्रोजेक्ट करता है, जो न केवल न्यूरॉन्स को उत्तेजित करने और उन्हें जगाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि स्मृति, भावनात्मक प्रसंस्करण, तनाव और चिंता जैसी संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं की एक पूरी श्रृंखला के लिए भी महत्वपूर्ण है।

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वर्सिटी के गाइल्स वांडेवाल कहते हैं की नींद शुरू करने और आरईएम नींद की अनुमति देने के लिए इसकी उत्तेजक गतिविधि को कम होना चाहिए। "यह आरईएम नींद को नॉरएड्रेनालाईन के बिना काम करने की अनुमति देता है, उन सिनैप्स को छांटता है जिन्हें नींद के दौरान बनाए या समाप्त करने की आवश्यकता होती है और एक नए दिन को सक्षम बनाता है, जो नए अनुभवों से भरा होता है।

प्रयोगशाला में एक शोधकर्ता और जेसीआई इनसाइट में प्रकाशित लेख के पहले लेखक एकातेरिना कोशमैनोवा ने कहा, पशु अनुसंधान पहले ही दिखा चुका है कि इस छोटे नाभिक का कार्य नींद और जागने के लिए आवश्यक है। "मनुष्यों में, बहुत कम सत्यापित किया गया है क्योंकि नाभिक का छोटा आकार और इसकी गहरी स्थिति पारंपरिक एमआरआई के साथ विवो में इसे देखना मुश्किल बनाती है।

7 टेस्ला एमआरआई के उच्च रिज़ॉल्यूशन के लिए धन्यवाद, हम नाभिक को अलग करने और जागने के दौरान एक साधारण संज्ञानात्मक कार्य के दौरान इसकी गतिविधि को निकालने में सक्षम थे, और इस प्रकार दिखाया कि हमारे लोकोस सेरुलियस जितना अधिक प्रतिक्रियाशील है, उतनी ही खराब नींद की गुणवत्ता और कम तीव्र हमारी आरईएम नींद है।

यह विशेष रूप से उम्र के बढ़ने के साथ सच लगता है, क्योंकि यह प्रभाव केवल अध्ययन में शामिल 50 और 70 वर्ष की आयु के व्यक्तियों में पाया गया था, न कि 18 से 30 वर्ष की आयु के युवा वयस्कों में। यह खोज बता सकती है कि क्यों कुछ लोग उम्र के साथ धीरे-धीरे अनिद्रा से ग्रस्त हो जाते हैं।

ये प्रारंभिक परिणाम नींद के दौरान इस छोटे नाभिक की गतिविधि और अनिद्रा और नींद और अल्जाइमर रोग के बीच की कड़ी में भूमिका निभा सकती है, इस पर भविष्य के अध्ययन की नींव भी रखते हैं।

(आईएएनएस)



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Long term effects of Covid: 3 में से 1 मरीज को हो सकता है कई अंगों को नुकसान

Long term effects of Covid : एक अध्ययन में पता चला है कि कोविड-19 संक्रमण के पांच महीने बाद लगभग एक तिहाई रोगियों में कई अंगों में असामान्यताएं देखी गईं, खासकर फेफड़ों, मस्तिष्क और गुर्दे में। यह अध्ययन इस संक्रामक रोग के दीर्घकालिक प्रभाव को देखता है।

द लैंसेट रेस्पिरेटरी मेडिसिन में प्रकाशित अध्ययन में चुंबकीय अनुनाद इमेजिंग (एमआरआई) स्कैन के आधार पर पाया गया कि फेफड़ों में असामान्यताएं काफी अधिक थीं - कोविड के लिए अस्पताल से छुट्टी पाने वाले रोगियों में नियंत्रण समूह की तुलना में लगभग 14 गुना अधिक।

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मस्तिष्क और गुर्दे से संबंधित असामान्य निष्कर्ष क्रमशः तीन और दो गुना अधिक थे।

एमआरआई पर असामान्यताओं की सीमा अक्सर कोविड संक्रमण की गंभीरता और रोगियों की उम्र के साथ-साथ अन्य बीमारियों से भी प्रभावित थी।

बर्मिंघम विश्वविद्यालय के रेडक्लिफ डिपार्टमेंट ऑफ मेडिसिन के डॉ. बेट्टी रमन ने कहा, "हमने पाया कि लगभग एक तिहाई रोगियों में नियंत्रण समूह की तुलना में एमआरआई पर मल्टीऑर्गन असामान्यताओं का अधिक बोझ था।"

निष्कर्ष 500 अस्पताल में भर्ती कोविड रोगियों के बहु-केंद्र एमआरआई अनुवर्ती अध्ययन से आए हैं। पेपर में 259 अस्पताल में भर्ती कोविड-19 रोगियों और 52 नियंत्रणों के अंतरिम विश्लेषण के परिणाम प्रस्तुत किए गए हैं।

यूके में 13 साइटों पर भर्ती किए गए प्रतिभागियों ने अस्पताल से छुट्टी के औसतन पांच महीने बाद हृदय, मस्तिष्क, फेफड़े, यकृत और गुर्दे को कवर करने वाले एमआरआई स्कैन करवाए। उनका खून भी लिया गया और उन्होंने प्रश्नावली भरी।

अध्ययन में पाया गया कि जहां कुछ अंग-विशिष्ट लक्षण अंग की चोट के इमेजिंग साक्ष्य से संबंधित थे - उदाहरण के लिए, सीने में जकड़न और खांसी फेफड़ों में एमआरआई असामान्यताओं के साथ - सभी लक्षणों को सीधे एमआरआई-पाए जाने वाली विसंगतियों से नहीं जोड़ा जा सकता था।

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पूर्व अस्पताल में भर्ती कोविड रोगियों में हृदय और यकृत को नुकसान का स्तर नियंत्रण समूह में समान था।

पेपर ने यह भी पुष्टि की कि बहु-अंग एमआरआई असामान्यताएं उन अस्पताल में भर्ती रोगियों में अधिक आम थीं जिन्होंने कोविड के बाद गंभीर रूप से बिगड़ा हुआ शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बताया था।

इसके अलावा, रमन ने कहा कि एमआरआई पर मल्टीऑर्गन पैथोलॉजी वाले लोग - अर्थात उनके दो से अधिक अंग प्रभावित थे - गंभीर और बहुत गंभीर मानसिक और शारीरिक दुर्बलता की रिपोर्ट करने की संभावना चार गुना अधिक थी।

उन्होंने कहा, "हमारे निष्कर्ष बहु-विषयक अनुवर्ती सेवाओं की आवश्यकता पर भी प्रकाश डालते हैं, जो कि फुफ्फुसीय और फुफ्फुसीय स्वास्थ्य (गुर्दे, मस्तिष्क और मानसिक स्वास्थ्य) पर केंद्रित है, खासकर उन लोगों के लिए जो कोविड-19 के लिए अस्पताल में भर्ती हैं।"

(आईएएनएस)



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Sunday, 24 September 2023

गुड़ में भी हो सकती है कई तरह की मिलावट, ऐसे करें पहचान

अक्सर देखा जाता है कि लोग रिफाइंड शुगर के होने वाले नुकसानों से बचने के लिए लोग गुड़ का उपयोग शुरू करते हैं लेकिन कई बार देखने को मिलता है कि गुड़ में मिलावट होती है। हाल में कई ऐसी जांचों में पता चला है कि गुड़ में भी कई तरह की मिलावट हो रही है। आज के अंक में बताएंगे कि गुड़ में किस-किस तरह की मिलावट हो रही है और उन्हें कैसे पहचान सकते हैं।

 

सर्दी के दिनों में गुड़ का उपयोग कई चीजों में किया जाता है। इन दिनों में इसकी मांग अधिक हो जाती है जैसे गजक, रेवड़ी, गुड़ की चाय, मीठी खिचड़ी, लड्डू आदि। गुड़ सेहत के लिए फायदेमंद होता है। यह न केवल कम कैलोरी होने के कारण वजन नियंत्रित रखने में मदद करता है बल्कि इसमें कई ऐसे खनिज व दूसरे पोषक तत्त्व होते हैं जो एनीमिया आदि से बचाव करते हैं।

 

गुड़ की खूबियां
गुड़ में कई तरह की खूबियां पाई जाती हैं। ये आपके शरीर से खतरनाक तत्त्वों को बाहर करता है यानी डिटॉक्सिफिकेशन करता है। गुड़ में कैल्शियम, पोटैशियम, फॉस्फोरस, आयरन, जिंक, प्रोटीन जैसे कई पोषक तत्त्व पाए जाते हैं लेकिन जिस गुड़ को आप गुणकारी समझकर खा रहे हैं, वह मिलावटी भी हो सकता है।

 

मिलावट की पहचान

स्वाद से पहचानें
गुड़ की पहचान के लिए उसे चखकर देखना चाहिए। असली गुड़ मीठा होता है। अगर नमकीन या खट्टा स्वाद है तो उसमें मिलावट हो सकती है। मिलावटी गुड़ में जो केमिकल इस्तेमाल किया जाता है उससे स्वाद थोड़ा कड़वाहट लिए हो सकता है। खरीदने से पहले इसको चखें।

 

पानी में मिलाकर
असली और मिलावटी गुड़ में अंतर करने का एक और तरीका है उसे पानी में डालकर देखना। पानी में डालने पर असली गुड़ पूरी तरह घुल जाता है जबकि मिलावटी गुड़ के टुकड़े पानी के नीचे बर्तन पर चिपक जाएंगे। गुड़ के छोटे टुकड़े करके पानी में मिलाएं।

 

रंग के अनुसार भी देखें

मिलावटी गुड़ का रंग सफेद, हल्का पीला या लाल होता है। ये दिखने में ज्यादा चमकदार होता है। ज्यादा भूरे रंग का गुड़ असली होता है। वहीं पीले रंग का या हल्के भूरे रंग का गुड़ न चुनें क्योंकि ये मिलावटी हो सकता है। अगर गुड़ का रंग लाइट ब्राउन या सफेद रहे तो ये इस बात की निशानी होती है कि गुड़ का रंग साफ करने के लिए उसमें केमिकल का उपयोग किया गया है।

 



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Saturday, 23 September 2023

सुबह, दोपहर का व्‍यायाम करना है बहुत फायदेमंद, कम करता है टाइप-2 मधुमेह का जोखिम, रिपोर्ट में हुआ खुलासा

भारतीय मूल के शोधकर्ताओं के नेतृत्व में किए गए एक नए अध्ययन के अनुसार, सुबह और दोपहर की शारीरिक गतिविधि टाइप-2 मधुमेह होने के जोखिम को कम करती है। डायबेटोलोजिया जर्नल में प्रकाशित नए शोध में शाम की शारीरिक गतिविधि और टाइप 2 मधुमेह के जोखिम के बीच कोई सांख्यिकीय महत्वपूर्ण संबंध नहीं पाया गया।

शारीरिक गतिविधि टाइप 2 मधुमेह के लिए एक निवारक कारक है, लेकिन इसका समय और निरंतरता (शारीरिक गतिविधि के समग्र योग के विपरीत) अपेक्षाकृत अस्पष्ट रही है। अमेरिका में हार्वर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने सुबह, दोपहर या शाम की शारीरिक गतिविधि और निरंतरता (दिनचर्या) और टाइप 2 मधुमेह के जोखिम के बीच संबंधों का विश्लेषण किया।

हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के डॉ. चिराग पटेल ने कहा, "हमारे अध्ययन में सुबह और दोपहर बनाम शाम की शारीरिक गतिविधि के बीच मधुमेह के जोखिम के साथ संबंध दिखाया गया है। निष्कर्षों से यह भी पता चलता है कि मधुमेह और अन्य हृदय रोग के विकास के जोखिम को कम करने में मदद के लिए कुछ उच्च तीव्रता वाली गतिविधि को शामिल करना सहायक है।"

टीम में टाइप-2 मधुमेह के इतिहास के बिना 93,095 प्रतिभागियों (औसत आयु 62 वर्ष) को शामिल किया गया, जिन्होंने एक सप्ताह के लिए कलाई पर पहना जाने वाला एक्सेलेरोमीटर पहना था। उन्होंने कार्य के उपापचय समतुल्य (एमईटी) (शारीरिक गतिविधि का एक सामान्य उपाय) का अनुमान लगाने के लिए एक्सेलेरोमीटर जानकारी को परिवर्तित किया, जिसमें काम, चलना और तेज गतिविधि सहित कुल शारीरिक गतिविधि के एमईटी-घंटे जोड़े गए।

 

टीम ने शारीरिक गतिविधि के सुरक्षात्मक संबंध देखे। एमईटी में प्रत्येक 1-यूनिट की वृद्धि क्रमशः सुबह और दोपहर में टाइप 2 मधुमेह के जोखिम में 10 प्रतिशत और 9 प्रतिशत की कमी के साथ जुड़ी हुई है। हालाँकि, शाम की शारीरिक गतिविधि और टाइप 2 मधुमेह के जोखिम के बीच कोई सांख्यिकीय महत्वपूर्ण संबंध नहीं था।

 

शोधकर्ताओं का मानना था कि जीवनशैली के कारक, जैसे नींद की मात्रा और आहार सेवन, सुबह, दोपहर और शाम को की जाने वाली शारीरिक गतिविधि की मात्रा को प्रभावित करेंगे, और इसलिए मधुमेह के खतरे में गतिविधि की भूमिका होती है।

 

डॉ. पटेल ने कहा, "शारीरिक गतिविधि की स्थिरता या नियमितता टाइप-2 मधुमेह से दृढ़ता से जुड़ी नहीं थी। दूसरे शब्दों में, जो व्यक्ति कम समय के लिए अधिक बार व्यायाम करते हैं, उनमें मधुमेह का खतरा उन लोगों की तुलना में कम नहीं होता है जो कुल मात्रा में समान व्यायाम करते हैं, लेकिन कम व्यायाम करते हैं।"

 

उन्होंने कहा, "हमारे निष्कर्ष इस बात का समर्थन करते हैं कि कुल शारीरिक गतिविधि, लेकिन सप्ताह भर में इसकी निरंतरता नहीं, टाइप 2 मधुमेह के जोखिम को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक हो सकती है। गतिविधि का समय मधुमेह के जोखिम को कम करने में भूमिका निभा सकता है।"



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अधिक ऊंचाई पर रहने वालों में मोटापा कम होने के पीछे ये तीन धारणाएं

मोटापे से जुड़े सीधे तौर पर कई कारण हैं जैसे जेनेटिक, पर्यावरणीय, डाइट, कुछ बीमारियां, नशे की आदत व व्यायाम न करना आदि। लेकिन कुछ कारण ऐसे भी जो सीधे तौर पर नहीं, पर मोटापे को बढ़ाते हैं। इनमें अधिक तापमान, अधिक ह्यूमिडिटी या कम ऊंचाई पर रहना आदि हैं।

 

हाल ही एक रिसर्च अमरीका के न्यूयॉर्क में हुआ है जिसमें कहा गया है कि सामान्य सतह पर रहने वालों तुलना में अधिक ऊंचाई पर रहने वालों में मोटापा कम है। यह अध्ययन 500, 1000, 1500 और 2000-2500 मीटर ऊंचाई के आधार पर किया गया था। जैसे-जैसे ऊंचाई बढ़ती गई, इसी अनुपात में मोटापा भी कम होता गया। एक अन्य अध्ययन में स्पेन व तिब्बत को उदाहरण के रूप में बताया गया है कि वहां मोटापा कम है।

 

एक धारणा यह है कि जैसे-जैसे ऊपर जाते हैं तो वायु दाब कम होने से शरीर में ऑक्सीजन की कमी होने लगती है। इसे हाइपोक्सिया कहते हैं। इससे शरीर में कई हार्मोनल बदलाव होते हैं। जैसे लैक्टिन नामक हार्मोन ज्यादा बनने लगता है। यह फैट सेल्स में बनता है, जो ब्लड में मिलकर दिमाग तक पहुंचता और भूख की क्षमता में कमी लाता है।

 

दूसरी धारणा में कहा गया है कि हाइपोक्सिया से शरीर में नॉरएडर-लिन हार्मोन का स्त्राव बढ़ जाता है। यह एड्रिनल ग्रंथि से निकलता है। इसकी मात्रा बढऩे से मेटाबॉलिक दर काफी बढ़ जाती है और शरीर में ऊर्जा का संचय होता है। इससे भी मोटापा नहीं होता है।

 

एक अन्य अध्ययन में पाया गया है कि अधिक ऊंचाई पर रहने वाले लोग स्मोकिंग कम करते हैं। यह मोटापे को सीधे ही प्रभावित करता है। इससे भी मोटापा कम होता है।



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Cataract surgery : मोतियाबिंद के ऑपरेशन के बाद क्या सावधानी बरतें?

What precautions to take after cataract surgery? : मोतियाबिंद सर्जरी एक आम और सुरक्षित प्रक्रिया है, लेकिन इसके बाद कुछ सावधानियां बरतना जरूरी है ताकि आंखों में कोई संक्रमण या जटिलता न हो। ये सावधानियां निम्नलिखित हैं:

आंखों को छूने या रगड़ने से बचें: मोतियाबिंद सर्जरी के बाद आंखें बहुत संवेदनशील होती हैं, इसलिए उन्हें छूने या रगड़ने से बचें। इससे आंखों में संक्रमण का खतरा हो सकता है।

आंखों को साफ रखें: हर दिन अपनी आंखों को साफ पानी से धोएं। आप अपनी आंखों को साफ करने के लिए किसी अच्छे नेत्र चिकित्सक द्वारा बताए गए आई ड्रॉप्स का भी उपयोग कर सकते हैं।

धूप से बचें: जब आप बाहर जाएं तो चश्मा या टोपी पहनें ताकि आपकी आंखें धूप से सुरक्षित रहें। धूप से आंखों में जलन और सूखापन हो सकता है।

भारी वजन उठाने से बचें: मोतियाबिंद सर्जरी के बाद भारी वजन उठाने से बचें। इससे आंखों में दबाव बढ़ सकता है और जटिलताएं हो सकती हैं।

तैराकी से बचें: मोतियाबिंद सर्जरी के बाद कम से कम 2 से 4 सप्ताह तक तैराकी से बचें। इससे आंखों में संक्रमण का खतरा हो सकता है।

अपने डॉक्टर द्वारा बताए गए निर्देशों का पालन करें: अपने डॉक्टर द्वारा बताए गए सभी निर्देशों का पालन करें, जैसे कि आई ड्रॉप्स का उपयोग करना और सर्जरी के बाद अपनी आंखों की देखभाल करना।

यदि आपको मोतियाबिंद सर्जरी के बाद कोई भी असामान्यता दिखाई दे, जैसे कि आंखों में दर्द, लालिमा, धुंधला दिखाई देना या प्रकाश के प्रति संवेदनशीलता, तो तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क करें।



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आपका बच्चा भविष्य में शराबी बनेगा या नहीं, अब दिमाग की मैपिंग से चलेगा पता

Mapping Teenage Minds: Predicting Future Alcohol Consumption Behavior : एक अध्ययन के अनुसार, किशोरावस्था में उनके दिमाग की मैपिंग करके लोगों के वर्तमान और भविष्य के शराब पीने के व्यवहार की भविष्यवाणी की जा सकती है।

किशोरों के दिमाग में किशोरावस्था के दौरान नए कनेक्शन बनते हैं। इस समय के दौरान दो प्रणालियां जो फिर से जुड़ती हैं, वे रिवॉर्ड और निषेध से संबंधित नेटवर्क हैं।

अमेरिका में येल विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने किशोरों के दिमाग के एक विशाल एमआरआई डेटासेट के माध्यम से यह देखने के लिए कि क्या वे किशोरों में पीने के व्यवहार की भविष्यवाणी कर सकते हैं। इस दौरान इन दो प्रणालियों को कैसे फिर से जोड़ा जाता है।

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JAMA Psychiatry जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में पता चला कि निरोधात्मक और इनाम मार्ग, जो व्यापक रूप से "ब्रेक" और "गो" व्यवहार को नियंत्रित करते हैं, यह अनुमान लगाने में मदद कर सकते हैं कि उन किशोरों के भविष्य में भारी शराब पीने की कितनी संभावना है।

अध्ययन में यह भी पता चला कि दोनों कार्यों का डेटा लड़कियों में शराब के उपयोग की भविष्यवाणी कर सकता है, लेकिन लड़कों में व्यवहार की भविष्यवाणी करने में केवल निरोधात्मक कार्य डेटा उपयोगी था।

उदाहरण के लिए, लड़कियां अपनी निरोधात्मक प्रणालियों को विकसित करती हैं, जो कनेक्शन उन्हें यह बता सकते हैं कि कुछ न करें लड़कों से पहले। इस वजह से, शोधकर्ताओं को कभी-कभी किशोरावस्था के दौरान पुरुष और महिलाओं के बीच विभिन्न पीने के पैटर्न दिखाई देते हैं, लड़कों में लड़कियों की तुलना में जोखिम भरा शराब पीने का व्यवहार करने की अधिक संभावना होती है।

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इस अध्ययन का आयोजन करने के लिए शोधकर्ताओं ने लगभग 14 वर्ष की आयु के 2,000 बच्चों को शामिल किया और उन्हें एमआरआई में अपने मस्तिष्क की इमेजिंग करते हुए विभिन्न कार्य करने के लिए कहा।

इन परीक्षणों में से कुछ का उद्देश्य इनाम और निरोधात्मक प्रणालियों को सक्रिय करना था, जैसे कि प्रतिभागियों को पैसे के लिए खेल खेलने या स्टॉप सिग्नल के जवाब में बटन दबाने से बचना। इनमें से वही किशोर जब 19 साल के हुए तो वही परीक्षण करने के लिए वापस लाए गए।

येल चाइल्ड स्टडी सेंटर में मनोरोग की एसोसिएट प्रोफेसर सारा यिप ने कहा, इन किशोरों को समय के साथ देखकर, हम यह पता लगाने में सक्षम थे कि उस पांच साल की अवधि में मस्तिष्क कैसे बदल गया। इस प्रकार का डेटा बहुत दुर्लभ है। इस प्रकार, यह हमें ऐसे प्रश्न पूछने की अनुमति देने के लिए विशिष्ट रूप से तैनात है जो पहले संभव नहीं थे ।

अध्ययन में यह भी पाया गया कि लड़कों में, केवल निषेध कार्य के दौरान एकत्र किए गए मस्तिष्क इमेजिंग डेटा, एक कार्य जो परीक्षण करता है कि लोग कुछ व्यवहारों पर "ब्रेक मारते हैं" कितनी अच्छी तरह शराब पीने के व्यवहार की भविष्यवाणी कर सकते हैं।

दूसरी ओर, निरोधात्मक और इनाम दोनों कार्यों के दौरान एकत्र किए गए मस्तिष्क इमेजिंग डेटा महिला प्रतिभागियों में भविष्य के शराब के उपयोग से संबंधित थे।

यिप ने कहा, शोधकर्ता इस जानकारी का उपयोग किशोरों और वयस्कों दोनों में जोखिम भरे शराब पीने के व्यवहार के इलाज के लिए नई चिकित्सा विकसित करने के लिए कर सकते हैं। ये निष्कर्ष यह भी बताते हैं कि पुरुष और महिला रोगियों के लिए उपचार का लक्ष्य बनाना उपचार के परिणामों में सुधार के लिए एक उपयोगी दृष्टिकोण हो सकता है। इन मस्तिष्क नेटवर्क की इमेजिंग भी चिकित्सकों को यह निर्धारित करने में मदद कर सकती है कि क्या उनके उपचार उनके रोगियों के लिए काम कर रहे हैं।

(आईएएनएस)



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