Friday, 31 July 2020

बारिश के मौसम में खाएं भुट्टा, होंगे कई फायदे, जानें इनके बारे में

बारिश के मौसम में कच्ची मक्का या भुट्टा बेहद फायदेमंद माना जाता है। भुट्टा ऐसा अनाज है जिसे पकाने के बाद भी उसके पौष्टिक और एंटीऑक्सीडेंट गुण नष्ट नहीं होते बल्कि बढ़ जाते हैं।

पेट के अल्सर से छुटकारा दिलाने में भुट्टे मददगार होते हैं।
कॉर्नफ्लेक्स के रूप में लेने पर यह हृदयरोग की रोकथाम में सहायक होता है।
इसमें विटामिन बी और फॉलिक एसिड होता है जिससे खून की कमी दूर होती है।
इससे आयरन की कमी पूरी होती है। भुट्टा लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण में खास भूमिका निभाता है।
भुट्टा आंतों में बैक्टीरिया या बीमारी फैलाने वाले जीवाणुओं को खत्म करता है जिससे कब्ज-बवासीर जैसी पाचन संबंधी समस्याएं नहीं होती।
इससे दांत और मसूड़े भी मजबूत होते हैं।

भुट्टे को पकाने के बाद उसके 50 प्रतिशत एंटी-ऑक्सीअडेंट्स बढ़ जाते हैं। यह बढती उम्र को रोकता है और कैंसर से लड़ने में मदद करता है। पके हुए भुट्टे में फोलिक एसिड होता है जो कि कैंसर जैसी बीमारी में लड़ने में बहुत मददगार होता है।



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अचानक से भूख में असामान्य परिवर्तन महसूस हो तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें

आप भूख में किसी प्रकार का असामान्य परिवर्तन महसूस करते हैं तो इसका मतलब है कि आपकी सेहत में भी जरूर कोई परिवर्तन आया है।

कमी आने पर-
भूख में कमी के साथ थकान, बाल झडऩा, ठंड महसूस न होना आदि लक्षण हाइपोथायरॉइडिज्म के हो सकते हैं।
भूख में कमी आने के साथ जी मिचलाना, पेट साफ न होना, बार-बार टॉयलेट जाना, मल त्याग या उल्टी के दौरान खून आना और थकान आदि हो तो ये कैंसर के लक्षण हो सकते हैं।
किसी दवा को लेने के बाद भूख में कमी हो तो भी डॉक्टर से तुरंत संपर्क करें।

बढ़ जाने पर-
अचानक ज्यादा भूख लगने लगे, अधिक पसीना आए, बार-बार मल-त्याग के लिए जाना पड़े, बाल झडऩे लगे तो यह हार्मोन के असंतुलन या हाइपरथायरॉइडिज्म का कारण हो सकता है।
भूख बढ़ जाए और बार-बार पेशाब आए, प्यास ज्यादा लगे, जख्म जल्दी ना भरे तो यह डायबिटीज का लक्षण हो सकता है। एंटी-एलर्जिक दवाएं लेने से भी ऐसा हो सकता है।



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मानसून के मौसम में एेसी रखें अपनी डाइट, सेहत को होगा फायदा

बारिश में के दिनों में सर्दी-जुकाम, बुखार, पेट की गड़बड़ी, खुजली, दाद, फंगल और वायरल इंफेक्शन आदि समस्याएं होने लगती हैं। लेकिन हम खानपान पर ध्यान देकर इन समस्याओं को काफी हद तक कंट्रोल कर सकते हैं।

फलियां-
इनमें प्रोटीन खूब होता है जो मांसपेशियों को ताकत देता है। हमारे इम्यून सिस्टम को भी मजबूत करता है। दालें, दूध, दही, पनीर प्रोटीन के प्रमुख स्रोत हैं।

दही व छाछ-
प्रोबायोटिक का बेहतरीन स्रोत छाछ या दही हमारे पाचनतंत्र को सुचारू रूप से काम करने में मदद करता है। यह शरीर की कुदरती रोग प्रतिरोधक प्रणाली के लिए मददगार है।

करौंदा व लहसुन भी फायदेमंद-
विटामिन सी से भरपूर करौंदा श्वेत रक्तकणिकाओं की कार्यप्रणाली दुरुस्त करता है। शरीर से विषैले पदार्थों की सफाई के लिए विटामिन सी काफी जरूरी होता है। लहसुन में मौजूद सेलेनियम एक महत्वपूर्ण मिनरल और एंटीऑक्सीडेंट है जो इंफेक्शन दूर करता है।

अखरोट व अनाज-
अखरोट विटामिन ई का अच्छा स्रोत है। साबुत अनाज से कार्बोहाइड्रेट, जिंक, कॉपर, आयरन, मैंगनीज आदि मिनरल्स मिलते हैं जिससे इम्यून सिस्टम मजबूत होता है।

सलाद-
कच्चे की जगह उबला हुआ (मक्का, मटर आदि से बना) सलाद प्रयोग करें क्योंकि कच्चे सलाद में बैक्टीरिया जल्दी पनपते हैं जिनसे संक्रमण होने की आशंका ज्यादा रहती है।

ध्यान रहे-
मानसून के मौसम में साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए। सब्जियों व फलों को अच्छी तरह से धोकर प्रयोग करें वर्ना संक्रमण हो सकता है। बारिश में गर्म चीजें खाने का मन करे तो चाट-पकौड़ी, कचौरी, समोसे की बजाय सांभर, इडली, उत्पम, रसम आदि खाएं क्योंकि ये चीजें आसानी से पच जाती हैं और इनमें ज्यादा कैलोरी भी नहीं होती। तरबूज और खरबूज आदि खरीदते समय इनकी क्वालिटी जरूर जांच लें। पत्ते वाली सब्जियों को ज्यादा देर गीला ना रखें।

विशेषज्ञ की राय-
डाइटीशियन के अनुसार इस मौसम में अंकुरित अनाज, दूध, दही, सोयाबीन हमारी इम्युनिटी को बढ़ाते हैं जिससे संक्रमण का खतरा कम होता है। हमेशा अच्छी तरह पका और ताजा खाना खाएं। तले-भुने की जगह हल्का आहार लें जैसे कि दाल की पकौड़ी की जगह दाल के चीले।



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वैज्ञानिकों ने बनाया ऐसा मास्क जो बिल्कुल एन-95 मास्क की तरह काम करता है

कोरोना वायरस (COVID-19) संक्रमितों का इलाज कर रहे फ्रंटलाइन चिकित्साकर्मी, डॉक्टर और नर्स फेस मास्क, ग्लव्ज और पीपीई किट (PPE Kit) की कमी से जूझने के कारण रचनात्मक तरीकों से इन्हें पुन- उपयोग लायक बना रहे हैं। लेकिन कुछ वैज्ञानिकों ने चिकित्सकों की इस परेशानी को समझा और और ऐसे उत्पाद विकसित किए जिन्हें पर्सनल हाइजीन और पीपीई किट के रूप में बार-बार उपयोग किया जा सकता है वो भी बिना किसी संक्रमण के डर के। हाल ही अमरीका की मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी ने एक रियूजेबल मास्क बनाया है जो सिलिकॉन से बना है। इसे बार-बार उपयोग में लिया जा सकता है क्योंकि ऐसा करने में संक्रमण का खतरा नहीं है। वैज्ञानिकों ने इसे आइ-मास्क (iMASC) नाम दिया है। इस काम में एमआइटी की मदद ब्रिघम और महिला अस्पतालए बोस्टन के चिकित्सकों ने भी की है। हालांकि शोधकर्ताओं अब भी इस बात की पुष्टि करने का प्रयास कर रहे हैं कि यह मास्क वायरस और अन्य हानिकारक कणों को कितनी प्रभावी रूप से रोक पाता है। लेकिन यह स्वास्थ्य देखभाल में आपूर्ति की कमी को दूर करने की दिशा में एक आशाजनक कदम है।

वैज्ञानिकों ने बनाया ऐसा मास्क जो बिल्कुल एन-95 मास्क की तरह काम करता है

एन-95 मास्क की तरह कारगर
मास्क बनाने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि के रचनाकारों का कहना है कि आइ-मास्क एन-95 श्वासयंत्र मास्क (rESPIRATOR MASK) जितनी ही सुरक्षा प्रदान करता है। यह बारीक हानिकारक कणों को शरीर में प्रवेश करने से रोकने के लिए एन 95 मास्क के फिल्टर का ही उपयोग करता है। आइमास्क एक विशेष सिलिकॉन रबर से बना है जिन्हें प्रत्येक उपयोग के बाद दोबारा उपयोग किया जा सकता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि मुंह को कवर करने वाले डबल फिल्टर को प्रत्येक उपयोग के बाद बदला भी जा सकता है। शोधकर्ताओं ने पीपीई किट और अन्य महत्त्वपूर्एा चिकित्सा उपकरणों की कमी को देखते हुए इस तरह के दोबारा उपयोग लायक मास्क बनाने का सोचा। इसके लिए उन्होंने 3डी (3D Technique)प्रिंटर की मदद से बनाया है और नर्सों और चिकित्सकों के साथ इसकी उपयोगिता को परखा।

वैज्ञानिकों ने बनाया ऐसा मास्क जो बिल्कुल एन-95 मास्क की तरह काम करता है

एन-95 की कमी को किया दूर
पीपीई उपकरणों की कमी ने डॉक्टरों को दूषित चिकित्सा उपकरणों का दोबारा उपयोग करने के लिए मजबूर किया। इसलिए चिकित्सकों ने एन-95 मास्क ही पहनना पसंद किया। लेकिन इसकी सबसे बड़ी कमी सह थी कि एक बार इस्तेमाल के बाद इसे दोबारा उपयोग में नहीं लिया जा सकता था। लेकिन कोरोना संक्रमितों की स्वास्थ्य देखभाल में लगे कर्मचारियों को मास्क और अन्य पीपीई किट की कमी के कारण उपयोग में लिए जा चुके उपकरणों को फिर से उपयोग करना पड़ा। एन-95 मास्क में उपयोग होने वाले फिल्टिरिंग कपड़ा बनाने वाले पीटर त्साई और ड्यूक विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने हाइड्रोजन पेरोक्साइड का उपयोग कर मार्च में अपने स्वयं के फिल्टर टेक्नीक का तरीका विकसित किया। अब इसी नई फिल्टर तकनीक को आइमास्क में उपयोग किया गया है।

वैज्ञानिकों ने बनाया ऐसा मास्क जो बिल्कुल एन-95 मास्क की तरह काम करता है

कई तरह से स्टरलाइज कर सकते हैं
शोधकर्ताओं ने देखा कि मास्क को स्टरलाइज (Sterlize) कर दोबारा इस्तेमाल करनें के एक या दो ही तरीके हैं। ऐसे में उन्होंने आइमास्क पर हर संभव तरीका अपनाया। उन्होंने ऑटोक्लेव, स्टीम स्टेरलाइजऱ, ओवन में रखना, ब्लीच और आइसोप्रोपिल अल्कोहल में भिगोना जैसे तरीकों को शामिल किया। प्रत्येक परीक्षण के बाद सिलिकॉन सामग्री फिर से इस्तेमाल करने लायक थी और संक्रमण का खतरा भी नहीं था। ड्यूक शोधकर्ताओं की टीम के बायोकेन्टोमीनेशन विधि को पूरा होने में घंटों लगते हैं जबकि इन तरीकों से इन्हें कुछ मिनटोंमें ही दोबारा उपयोग के लिए तैयार किया जा सकता है। इस तरह से आइमास्क को बार-बार स्टरलाइज कर कम से कम 20 बार तक उपयोग किया जा सकता है।



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COVID-19: कोरोना मामलों का तेजी से पता लगाने के लिए बनाया एप

नई दिल्ली। स्मार्टफोन निर्माता वीवो ने गुरुवार को कहा कि उन्होंने बेंगलुरु स्थित आईटी स्टार्ट-अप अकुली लैब्स के साथ साझेदारी में कोविड-19 संक्रमण का तेजी से पता लगाने और इसके जोखिमों के बारे में जानकारी के लिए एक मोबाइल एप विकसित किया है। वीवो के कैमरा का उपयोग करके अकुली लैब्स ने 'लयफस' नामक एक एप्लिकेशन बनाने में प्रभावी रूप से काम किया है, जो एक कोरोना के लक्षणों वाले व्यक्ति के जोखिम मूल्यांकन में मदद कर सकती है।

अकुली लैब्स के संस्थापक सीईओ रूपम दास ने एक बयान में कहा, "हम वीवो इंडिया के आभारी हैं कि उन्होंने हमारे पायलट चरण के दौरान अपने स्मार्टफोन वीवो वाई 11 और वाई 91 मुहैया कराए, जिसने इस एप को बनाने में हमारी मदद की।"

यह तकनीक शारीरिक संकेतों को पकड़ने के लिए वीवो स्मार्टफोन प्रोसेसर और सेंसर की शक्ति का उपयोग करती है, जो कोविड-19 की तीव्रता का पता लगाता है।

कोविड-19 ने दुनियाभर में तकनीकी नवाचार (इनोवेशन) की सीमाओं को विस्तारित किया है, क्योंकि हर कोई इस महामारी से निजात पाना चाहता है और अपनी ओर से हर संभव प्रयास कर रहा है।

वीवो इंडिया में ब्रांड रणनीति के निदेशक निपुण मेरी ने आने वाले समय में कोरोना महामारी के बीच इस एप के सहायक होने का भरोसा जताया है।



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कोरोना वायरस चमगादड़ों में दशकों से फैल रहा था- शोध

बीजिंग। प्रकृति सूक्ष्मजीवविज्ञान पत्रिका ने ऑनलाइन कोविड-19 के स्रोत के बारे में एक अंतरराष्ट्रीय दल के अनुसंधान का परिणाम जारी किया। इस अध्ययन से पता चला है कि नोवेल कोरोना वायरस 40 से 70 साल पहले के वायरस से परिवर्तित हुआ है। वास्तव में इस तरह का वायरस चमगादड़ में कई दशकों से फैल चुके थे। अध्ययनकर्ताओं के विचार में वायरस के स्रोत का पता लगाना महामारी के नियंत्रण के लिए नाजुक है। अध्ययनकर्ताओं ने अनुसंधान में पाया गया है कि चमगादड़ इन वायरसों का मुख्य माध्यम है। इस अध्ययन दल के सदस्य अमेरिका के पेंसिल्वेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी, ब्रिटिश एडिनबर्ग युनिवर्सिटी, हांगकांग विश्वविद्यालय से आये हैं।

वहीं, बीबीसी ने एक रिपोर्ट में कहा है कि इस अध्ययन के परिणाम से ऐसे कथन निराधार बन गये हैं, जैसे वायरस लैब से निकला है या फिर इसे बनाया गया है। भारत में एक ही दिन में कोरोना के सर्वाधिक 55,079 मामले सामने आए हैं और इसी के साथ बीते 24 घंटे में 779 मौतें हुई हैं जिसके चलते अब देश में संक्रमितों का कुल आंकड़ा 16,38,871 तक पहुंच गया है और अब तक 35,747 की मौत हो चुकी है।



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त्वचा की 'सेहत' बनाए रखने के लिए बढ़ रहा है 'स्किन फास्टिंग' का ट्रेंड

आप कब तक अपने चेहरे को स्किन टोनिंग क्रीम, फेस मास्क और मॉइस्चराइजर से धोए बिना रह सकती हैं? एक दिन, एक सप्ताह, एक महीने या इससे भी ज्यादा समय तक? दरअसल यह त्वचा को प्राकृतिक रूप से अपनी भरपाई करने देने का एक तरीका है जो इन दिनों नवीनतम स्किन केयर ट्रेंड्स (Skin Care Trends) में से एक है। इटरनेट और सोशल मीडियाप्लेटफॉर्म्स पर वायरल इस ट्रेंड को विशेषज्ञ 'स्किन फास्टिंग' (Skin Fasting) कह रहे हैं। इसमें त्वचा को 'डिटॉक्स' (Detox) करने के लिए सभी स्किन केयर प्रोडक्ट्स से परहेज किया जाता है। जापानी ब्यूटी कंपनी हॉलिस्टिक ने इसे लोकप्रिय बनाया है। कंपनी के अनुसार जापान (Japan) की यह पारंपरिक 'मिराई क्लिनिकल तकनीक' परंपरागत उपवास को उपचार पद्धति के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है जिसे मॉडर्न भाषा में युवाओं के बीच लोकप्रिय करने के लिए इसे 'स्किन फास्टिंग' का नाम दिया गया है।

त्वचा की 'सेहत' बनाए रखने के लिए बढ़ रहा है 'स्किन फास्टिंग' का ट्रेंड

डिटॉक्स बना परेशानी
डिटॉक्सीफिकेशन या डिटॉक्स शब्द सुनते ही दिमाग में एक ही बात आती है नियमित दिनचर्या के तहत त्वचा को प्राकृतिक रूप से डिटॉक्स करने की बजाय दर्जनों ब्यूटी प्रोडक्ट्स (Beauty Products) के जरिए फटाफट समाधान ढूंढना। कैमिकल्स और त्वचा पर खतरनाक असर डालने वाले ये उत्पाद अब हमारे रुटीन में शामिल हो गए हैं। ऐसे में बहुत संवेदनशील त्वचा वाले लोगों के लिए यह सुनिश्चित करना कि वे अपनी त्वचा की सेहत बनाए रखने के लिए क्या करें, आसान काम नहीं है। संवेदनशील त्वचा और हानिकारक कैमिकल्स वाले ब्यूटी प्रोडक्ट्स के इस्तेमाल में समझदारी से काम लेना बहुत जरूरी है।

त्वचा की 'सेहत' बनाए रखने के लिए बढ़ रहा है 'स्किन फास्टिंग' का ट्रेंड

क्या है 'स्किन फास्टिंग'
हमारी स्किन 'सीबम' (Sebum) नामक एक तैलीय पदार्थ छोड़ती है जो त्वचा में नमी की कमी को रोकती है। 'स्किन फास्टिंग' के पीछे विचार यह है कि त्वचा को प्राकृतिक रूप से 'सांस' लेने दे। ब्यूटी विशेषज्ञों का कहना है कि नियमित रूप से उपयोग में लिए जाने वाले सौंदर्य उत्पादों में कटौती करने से त्वचा की चमक और जवां बने रहने की सीमा को बढ़ाया जा सकता है। त्वचा से निकलने वाला सीबम स्वाभाविक रूप से हमारी स्किन को मॉइस्चराइज कर उसे सेहतमंद बनाए रखता है। त्वचा पर एक दिन छोड़कर मेकअप करने, टोनर, मॉइस्चराइजर और फेस मास्क से मेकअप हटा लें। इससे त्वचा को न्यूट्रिलाइज होने का समय मिल जाता है। हफ्ते में एक दो दिन सिर्फ पानी और सनस्क्रीन का उपयोग करें ताकि धूप से पहुंचे नुकसान की भी भरपाई हो सके। पूरे दिन में कम से कम तीन लीटर पानी (Drink Water for Much Healthier Skin) पिएं। पानी त्वचा को प्राकृतिक रूप से डिटॉक्स कर शानदार बनाता है।

त्वचा की 'सेहत' बनाए रखने के लिए बढ़ रहा है 'स्किन फास्टिंग' का ट्रेंड

और भी तरीके हैं स्किन फास्टिंग के
अक्सर लोग सवाल करते हैं कि क्या स्किन फास्टिंग का समर्थन करने के लिए कोई और थ्योरी है? तो ऐसे लोगों को 'उन्मूलन आहार' (Elimination Diet) के जरिए त्वचा को स्वस्थ और खूबसरूत बनाने पर ध्यान देना चाहिए। अगर सौंदर्य उत्पादों में मौजूद रासायनिक तत्वों से कोई समस्या है, तो ऐसे उत्पादों से नियमित अंतराल पर परहेज करने से आपकी त्वचा को अपने आप ही संतुलित होने का मौका मिलेगा। हालांकि, विशेष रूप से स्किन फास्टिंग के लिए कोई अलग शोध या अध्ययन नहीं हैं। यही कारण है कि यह कुछ लोगों पर असर डालता है और बहुतों पर इसका कोई असर नहीं पड़ता। ऐसा इन संभावित कारणों से भी हो सकता है-

त्वचा की 'सेहत' बनाए रखने के लिए बढ़ रहा है 'स्किन फास्टिंग' का ट्रेंड

-त्वचा की प्रकृति (Skin Type) के विपरीत गलत उत्पादों का उपयोग करना
-ओवर-एक्सफोलिएटिंग (Over-Exfoliating) के बाद स्किन फास्टिंग आपकी त्वचा को ठीक होने में मदद करती है
-देती है।
-संवेदनशील त्वचा (Sensitive Skin) पर हार्श और जलन पैदा करने वाली सामग्री का उपयोग करना
-त्वचा के तेजी से विकसित होने के दौरान उसका सेल टर्नओवर (Cell Turnover) बढऩा भी एक कारण हो सकता है



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हॉरर और महामारी पर बनी फिल्में देखने वाले फैन कोरोना से लडऩे में ज्यादा सक्षम-शोध

कोविड-19 महामारी (Covid-19 Pandemic) के दौरान किए गए एक नए अध्ययन में सामने आया है कि डरावनी, भुतहा (Horror Movies), महामारी और सर्वनाश (apocalyptic gener) दिखाने वाली फिल्में देखने वाले दर्शकों को दूसरों की तुलना में कोविड-19 वायरस का संक्रमण होने का खतरा कम है और वे महामारी के इस दौर में भी सुरक्षित हैं। दशकों से शोधकर्ताओं के मन में यह सवाल कायम है कि आखिर भयावह और विनाश का चित्रण करने वाली फिल्में एक खास दर्शक वर्ग को क्यों पसंद आती हैं। हालांकि इसका कोई एक जवाब नहीं हो सकता।

हॉरर और महामारी पर बनी फिल्में देखने वाले फैन कोरोना से लडऩे में ज्यादा सक्षम-शोध

सामना करना सीखते
एक परीक्षण के अनुसार दर्दनाक काल्पनिक कहानियों पर बनीं फिल्में दर्शकों को एक सुरक्षित वातावरण में जीवन की चुनौतियों का सामना करने में सक्षम बनाती हैं। अध्ययन के प्रमुख लेखक कॉल्टन स्क्रिवनर का कहना है कि एक अच्छी फिल्म हमें आकर्षित करती है और हम फिल्म के पात्र में खुद के देखने लगते हैं। इस तरह हम फिल्म देखने के दौरान दृश्य-दर दृश्य उस काल्पनिक चुनौतियों का भी सामना कर रहे होते हैं जिससे वह पात्र जूझ रहा है। इस तरह लोग अनजाने ही ऐसे खतरों, महामारियों, विनाश और भुतहा हादसों से लडऩा सीख जाते हैं। इसे परखने के लिए कॉल्टन और उनकी टीम ने ऐसे 310 लोगों पर परीक्षण किया।

हॉरर और महामारी पर बनी फिल्में देखने वाले फैन कोरोना से लडऩे में ज्यादा सक्षम-शोध

हॉरर फिल्मों के शौकीनों को डर नहीं
कॉल्टन ने परीक्षण में भाग लेने वाले इन लोगों से प्रश्नावली आधारित साक्षात्कार में पूछा कि वे किस तरह की फिल्में देखना पसंद करते हैं? क्या उन्हें डरावनी, विनाश, एलियन आक्रमण (Alien Attack), युद्ध की त्रासदी और महामारियों के विषय पर बनीं फिल्में देखने पर आनंद महसूस होता है? कॉल्टन ने लोगों से यह भी पूछा कि वे कोरोना महामारी से लडऩे के लिए कितने तैयार थे? क्या कोरोना संक्रमण के दुनियाभर में फैल जाने के बाद उन्होंने मनोवैज्ञानिक रूप से कोई परेशानी (Psychological problems) महसूस की? इन सवालों के जवाब बहुत दिलचस्प थे। मसलन, डरावनी फिल्में देखने के शौकीन दर्शकों ने कहा कि उन्हें कोरोना महामारी के बाद किसी तरह का अवसाद या मनोवैज्ञानिक परेशानी नहीं हुई। हालांकि, उन्होंने इस दौरान महामारी से लडऩे की विशेष तैयाारी भी नहीं की थी।

हॉरर और महामारी पर बनी फिल्में देखने वाले फैन कोरोना से लडऩे में ज्यादा सक्षम-शोध

सर्वनाश और एलियन फिल्मों के दर्शक ज्यादा तैयार
लेकिन डरवानी और महामारी फिल्मों के दर्शकों की तुलना में सर्वनाश (Like Hollywood Movies 2012 and Independence Day) और पृथ्वी पर एलिएंस के आक्रमण (alien invasions like in Avengers Series and Armageddon) को पसंद करने वाले दर्शकों ने बताया कि वे किसी भी महामारी के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। वे ऐसी किसी भी परिस्थिति के लिए पूर्व में तैयारी करने पर जोर देते हैं और हमेशा खुद को ऐसे हालातों के लिए लचीला बनाए रखते हैं। खासकर वायरस (Virus) और परमाणु विकिरण (Nuclear Radiation) जनित महामारी के लिए उन्होंने सुरक्षात्मक तौर-तरीकों पर ज्यादा ध्यान देने की बात कही।

हॉरर और महामारी पर बनी फिल्में देखने वाले फैन कोरोना से लडऩे में ज्यादा सक्षम-शोध

कंटेजियन बनी सबसे लोकप्रिय ओटीटी फिल्म (Contagion became Most watched Movie)
मार्च के महीने में जब कोरोना संक्रमण तेजी से एक से दूसरे देश में फैल रहा था तब स्टीवन सोडरबर्गस की थ्रिलर फिल्म 'कंटेजियन' (Contagion-2011) अचानक ऑनलाइन स्ट्रमीमिंग प्लेटफॉर्म्स (streaming platforms) और ओटीटी (OTT Platforms) पर सबसे ज्यादा देखी जाने वाली (Most watched Movie) फिल्मों की सूची में शुमार हो गई। इस घटना ने लोगों को हैरान कर दिया। एक अन्य नए शोध पत्र में कॉल्टनर ने बताया कि लोग कोरोना महामारी के दौरान लोग इंटरनेट और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर ऐसी फिल्में ज्यादा खोज रहे थे जिनमें जनसंहार या महामारी के कारण लाखों लोगों की जान गई हो और पूरी दुनिया में व्यवधान पैदा हो गया हो।

हॉरर और महामारी पर बनी फिल्में देखने वाले फैन कोरोना से लडऩे में ज्यादा सक्षम-शोध

कॉल्टन के अनुसार अनियंत्रित चुनौतियों का सामना करने की इस अजीब प्रवृत्ति को 'मोरबिड क्यूरिओसिटी' (morbid curiosity) कहते हैं। ऐसे लोग महामारी और सर्वनाश में भी मनोरंजन ढूंढते हैं जबकि इस दौरान वास्तव में एक महामारी ने पूरी दुनिया को अपनी मुट्ठी में लिया हुआ है। कॉल्टन कहते हैं कि दरअसल यह कुछ लोगों के लिए खुद को एक सुरक्षित दूरी पर रखते हुए खतरनाक परिस्थितियों में खुद को उलझाने और सुरक्षित बाहर आने की कल्पना है। इस तरह वे ऐसी खतरनाक और नियंत्रित न किए जा सकने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार रहने और उन काल्पनिक अनुभवों से सीखने की क्षमता से लैस करता है।



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Thursday, 30 July 2020

दानामेथी कई रोगों में है सेहत के लिए फायदेमंद

दानामेथी में फॉस्फेट, लेसिथिन और न्यूक्लिओ अलब्यूमिन जैसे पोषक तत्व होते हैं जो इसे उपयोगी बनाते हैं।

दानामेथी की सब्जी में अदरक, व गर्म मसाला प्रयोग कर खाने से निम्न रक्तचाप और कब्ज में फायदा होता है।
इसमें मौजूद पाचक एंजाइम पेंक्रियाज को अधिक क्रियाशील बनाते हैं। इससे पाचन क्रिया आसान हो जाती है।

मेथी के दानों में मौजूद सॉल्यूबल फाइबर्स ब्लड शुगर को कंट्रोल करके डायबीटीज को नियंत्रित करता है।

रोजाना एक चम्मच दानामेथी पाउडर पानी के साथ फांकने से न केवल डायबिटीज में राहत मिलती है बल्कि जोड़ों के दर्द में भी लाभ होता है।
सुबह-शाम 1-3 ग्राम दानामेथी पानी में भिगोकर चबाकर खाने से जोड़ में दर्द नहीं होता।
हरी मेथी रक्त में शुगर को कम कर देती है। इसलिए डायबिटीज रोगियों के लिए भी यह फायदेमंद होती है।

बवासीर के लिए बवासीर एक गंभीर बीमारी है, जिससे रोगी को बहुत परेशानी होती है। मेथी और सोया को रात में भिगोकर अगले दिन सुबह इसका रस लें। इससे आपको बवासीर में फायदा मिलेगा।



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वजन कम करना चाहते हैं तो करें ये काम,तुरंत होगा फायदा

हर दिन आप जिम में घंटों एक्सरसाइज करते हैं। हैल्दी फूड खाते हैं और मीठे को ना कह चुके हैं। इसके बाद भी वेट कम नहीं हो रहा? तो जरा अपनी तकनीक और विशेषज्ञों की हिदायतों पर भी गौर फरमा लें। वजन कम करने की प्रक्रिया को डेली रुटीन में शामिल न करने और सही तकनीक का इस्तेमाल ना करने से आपकी सारी मेहनत बेकार चली जाती है। जानते हैं ऐसी प्रमुख वजहों के बारे में।

तनाव पड़ता है भारी-
किसी भी तरह का स्ट्रेस फिर चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक आपके वेट लॉस प्रोग्राम में सबसे बड़ी बाधा खड़ी कर सकता है। तनाव से हमारे शरीर में एक तरह का हॉर्मोन कॉर्टिसोल स्रावित होता है जो इंसुलिन रजिस्टेंस को कम करता है और बॉडी में फैट बढ़ाता है। इससे बचने के लिए जरूरी है कि आप अपनी बातें शेयर करें, किताबें पढ़ें और समय मिले तो कहीं घूम आएं।

डाइट में ये तो नहीं-
आप तली हुई और मसालेदार चीजों से तो परहेज करते हैं लेकिन डाइटिंग के नाम पर ब्रेकफास्ट या लंच ही स्किप कर जाते हैं। ऐसा करने पर जब आपको भूख लगती है तो आप एक समय में अपनी जरूरत के हिसाब से ज्यादा खा लेते हैं, नतीजन आपका वजन बढ़ता है। जरूरी है कि आप पूरे दिन के भोजन को थोड़े-थोड़े अंतराल में पांच से छह बार खाएं। इससे एक्सरसाइज के दौरान आपको जरूरी एनर्जी भी मिलेगी और ज्यादा थकान भी नहीं होगी।

कार्डियो एक्सरसाइज-
वजन कम करने के लिए कार्डियो एक्सरसाइज करने की सबसे ज्यादा सलाह दी जाती है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि रोजाना सिर्फ कार्डियो सेशन पर ही अटके रहना काफी नहीं है। हर दिन इसकी गति बढ़ानी चाहिए। अपने वर्कआउट की इंटेंसिटी अपने मैक्सिमम हार्ट रेट से 65-85 प्रतिशत तक बढ़ानी चाहिए।

लिक्विड एनर्जी से बचें-
चाय, कॉफी या मीठे जूस जैसी किसी भी तरह की लिक्विड कैलोरी आपका वेट कम करने की बजाय उसे बढ़ाने में मदद करेगी। ऐसे में इन पेय पदार्थों को कम से कम मात्रा में लें या इनकी बजाय कम मलाई वाले दूध या वेजिटेबल जूस प्रयोग में लाएं ताकि पर्याप्त ऊर्जा के साथ-साथ आपका वजन भी घटे।

मजबूत इरादे जरूरी-
अगर आप मोटिवेट नहीं रहेंगे तो वेट लॉस प्रोग्राम कभी सफल नहीं हो पाएगा क्योंकि जिम में सिर्फ पांच मिनट ही एक्सरसाइज करना काफी नहीं है। फिटनेस प्रोग्राम से आपको दिल और दिमाग से जुडऩा होगा।



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बारिश के मौसम में झड़ते बालों की समस्या के लिए करें ये आयुर्वेदिक उपाय

बारिश के मौसम में आमतौर पर बला झड़ने लगते हैं। गीले बालों को बांधने से डेंड्रफ व खुजली की समस्या होने लगती है। इससे बाल धीरे-धीरे जड़ों से कमजोर होकर टूटने लगते हैं। इस समस्या में ये उपाय किए जा सकते हैं।

ज्यादा से ज्यादा मात्रा में पानी पिएं। प्राणायाम करें, इससे शरीर में रक्त का संचार बढ़ता है और बाल मजबूत होते हैं।
100 ग्राम मुल्तानी मिट्टी में 10 ग्राम सफेद चंदन पाउडर मिला लें, बालों पर लगाने से पहले इसमें 20 मिलिग्राम गुलाब जल डाल लें। 15 मिनट बाद सिर धो लें। अगर डेंड्रफ की समस्या हो तो आप इस पेस्ट में नीम की पत्तियों को पीसकर भी प्रयोग कर सकते हैं।

शरीर को पोषण जरूरी -
पोषक तत्वों की कमी से बाल झड़ रहे हैं तो 4-5 अंजीर, 10-15 मुनक्के, 20-25 किशमिश, 2-4 बादाम एक गिलास पानी में रात को भिगोकर रख दें। सुबह इन्हें खा लें और उसी पानी को पी भी लें। डायबिटीज होने पर अंजीर(१) और मुनक्के (५-७) ही प्रयोग करें। शरीर को पोषण मिलते ही बाल टूटने बंद हो जाएंगे।



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18 किलो चीनी सालाना खा रहे हम, अहमदाबाद में पुरुष और मुंबई में महिलाएं चीनी खाने में आगे

चीनी जिसे शर्करा और शुगर भी कहते हैं प्राकृतिक रूप से बहुत सारे फलों, सब्जियों यहां तक कि दूध में भी पाई जाती है। वहीं स्वाद और इन्ग्रेडिएंट्स के मिश्रण के लिए एडेड शुगर (Added Sugar) केंडी, शीतल पेय, बेक किए हुए उत्पादों में भी मिलाई जाती है।हाल ही जारी एक नए अध्ययन के निष्कर्षों से पता चलता है कि देश के सभी मेट्रो शहरों में अतिरिक्त चीनी (एडेड शुगर) का दैनिक सेवन 19.5 ग्राम प्रतिदिन था। यह मात्रा इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रीसर्च (ICMR) की ओर से तय किए गए स्तर की तुलना में 30 ग्राम प्रतिदिन कम है। अध्ययन में यह भी सामने आया है कि आईसीएमआर द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत के मेट्रो शहरों में अतिरिक्त चीनी का सेवन प्रति दिन ग्राम में मापा गया जिसमें मुम्बई पहले स्थान पर और हैदराबाद सबसे निचले पायदान पर थे। राष्ट्रीय पोषण संस्थान (NIN) हैदराबादए और अंतर्राष्ट्रीय जीवन विज्ञान संस्थान (ILSI-India) के शोधदल ने यह अध्ययन किया है।

18 किलो चीनी सालाना खा रहे हम, अहमदाबाद में पुरुष और मुंबई में महिलाएं चीनी खाने में आगे

1 साल में 18 किलो चीनी खा रहे हम
आइसीएमआर, आइएलएसआइ-इंडिया और एनआइएन के अपनी तरह के इस पहले संयुक्त अध्ययन का उद्देश्य भारत के सात प्रमुख मेट्रो शहरों में रहने वाले शहरवासियों की एडेड शुगर की खपत के बारे में जानकारी हासिल करना था। यह अध्ययन सूक्ष्म रूप से कुपोषित, अति कुपोषित और कुपोषितों के बारे में जानकारी जुटाने और गैर-संचारी रोगों (एनसीडी) को रोकने में मदद करने के लिए भी काफी महत्त्वपूर्ण है। हालांकि भारत उन शीर्ष दस देशों में शामिल नहीं है, जो 18 मार्च, 2019 को जारी WORLD ATLAS के अनुसार सबसे अधिक चीनी खाने वाले देश हैं। लेकिन इसमें भी कोई दो राय नहीं कि भारत में तेजी से चीनी की खपत बढ़ रही है। उदाहरण के लिएए 2018-19 में, देश में चीनी की खपत लगभग 27.5 मिलियन (2.75 करोड़) मीट्रिक टन थी जो पिछले वर्ष में 26.5 मिलियन (2.65 करोड़) टन हो गई थी। एक शोध के अनुसार एक औसत भारतीय सालाना 18 किलो चीनी कन्ज्यूम करता है जो प्रतिदिन 10 चम्मच के बराबर है।

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हृदय रोगों में 25 फीसदी की वृद्धि
हालांकि अभी तक ज्यादातर शोध ने बहुत ज्यादा मात्रा में चीनी की खपत को टाइप-२ डायबिटीज का कारण नहीं माना है। लेकिन चिकित्सकों का कहना है कि तय मानक से ज्यादा मात्रा में चीनी का उपभोग हृदय रोगों संबंधी खतरों (कार्डियोवस्कुलर डिजीज या CVD) का जोखिम और जान का खतरा बढ़ा देता है। जो लोग अपनी दैनिक जरुरत की कैलोरी (ऊर्जा) का 25 फीसदी हिस्सा चीनी से हासिल कर रहे थे उनके हृदय रोग से मरने की संभावना दोगुने से भी अधिक थी। जबकि जो केवल 10 फीसदी ऊर्जा चीनी से प्राप्त कर रहे थे उनमें ऐसा होने की बहुत कम संभावना थी।

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वयस्क और बुजुर्ग सबसे आगे
विभिन्न आयु वर्ग पर किए परीक्षण में सामने आया कि भारत में बुजुर्ग और वयस्क युवाओं-किशोरों की तुलना में तय मानकोंसे ज्यादा चीनी खा रहे हैं। 36 से 59 वर्ष की आयु वर्ग के लोग 20.5 ग्राम प्रतिदिन, 60 वर्ष या इसे ज्यादा की उम्रके लोग 20.3 ग्राम प्रतिदिन चीनी का उपभोग कर रहे हैं। किशोरों में यह खपत 19.9 ग्राम प्रतिदिन और युवा वयस्कों की आयु वर्ग में प्रति दिन 19.4 ग्राम की खपत दर्ज की गई। वहीं देश के नौनिहालों की बात करें तो स्कूली बच्चों में यह दर 17.6 ग्राम प्रतिदिन और प्री-स्कूली बच्चों में 15.6 ग्राम प्रतिदिन चीनी की खपत दर्ज की गई।

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अहमदाबाद में पुरुष, मुम्बई में महिलाएं आगे
आमतौर पर माना जाता है कि पुरुषों को मीठा और महिलाओं को खट्टा या नमकीन पसंद होता है। लेकिन सर्वे में नतीजे इसके बिल्कुल उलट थे। चीनी खाने के मामले में महिलाओं ने यहां भी पुरुषों को पीछे छोड़ दिया। पुरुषों के 18.7 ग्राम प्रतिदिन की तुलना में भारतीय गृहिणियां और वर्किंग वुमन 20.2 ग्राम चीनी प्रतिदिन खा रही हैं। वहीं मेट्रो शहरों की बात करें तो सात बड़े शहरों में अहमदाबाद को छोड़कर सभी शहरों में एक ही सी प्रवृत्ति दिखाई दी। जहां पुरुष और महिलाएं लगभग बराबर मात्रा में चीनी का सेवन कर रहे थे। जबकि अहमदाबाद में पुरुषों की खपत 25.7 ग्राम प्रतिदिन है, वहीं महिलाएं 26 ग्राम प्रतिदिन से अधिक चीनी से बने व्यंजनों का स्वाद ले रही हैं। पुरुषों और महिलाओं के बीच अतिरिक्त चीनी की खपत में असमानता अन्य शहरों की तुलना में मुंबई में अधिक नजर आई। मुंबई में महिलाएं 28 ग्राम प्रतिदिन चीनी का उपभोग करती हैं जबकि पुरुषों का सेवन केवल 24.4 ग्राम प्रतिदिन है।

18 किलो चीनी सालाना खा रहे हम, अहमदाबाद में पुरुष और मुंबई में महिलाएं चीनी खाने में आगे

शोध में यह चौंकाने वाले तथ्य भी शामिल
-26.3 ग्राम प्रतिदिन मुंबई और 25.9 ग्राम प्रतिदिन चीनी की खपत के साथ दोनों शहर अन्य पांच महानगरों की तुलना में अधिक चीनी का उपभोग कर रहे हैं
-5 फीसदी ही ऊर्जा मिल रही है चीनी के उपभोग से कुल हासिल कैलोरी का प्रतिदिन
-35 से 59 आयु वर्ष की बुजुर्ग शहरी आबादी अन्य आयु वर्ग की तुलना में अधिक शक्कर का सेवन कर रही है
-18.3 ग्राम प्रतिदिन की दर से पेशेवर कर्मियों की तुलना में मजदूर वर्गमें चीनी का उपभोग अधिक था। ऐसे ही उच्च शिक्षित आबादी की तुलना में कम शिक्षित आबादी में अतिरिक्त चीनी का सेवन अधिक था
-ऐसे ही दूध, जई के साथ चावल, मकई और दूध के साथ ओट्स जैसे व्यंजनों में चीनी का सेवन अधिक पाया गया। वहीं मसाला चाय, सामान्य चाय, कॉफी, मिल्क शेक और लस्सीए आदि के साथ अधिक मात्रा में चीनी का सेवन किया जाता है
-5.1 फीसदी थी सभी राज्यों में कैलोरी की औसत खपत
-6.6 ग्राम प्रतिदिन की दर से मुम्बई पहले, 6.1 के साथ दिल्ली, 5.9 के साथ अहमदाबाद, 5.4 ग्राम प्रतिदिन की दर से हैदराबाद, 4.1 के साथ बैंंगलुरु, 3.9 की दर से चेन्नई और 3.5 ग्राम प्रतिदिन की दर से कोलकाता ने लिस्ट में जगह पाई है



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अगर बने रहना चाहते हैं जवां तो आज ही छोड़ दें खाने की ये चीज़ें (PART 02 )

हमारी त्वचा की उम्र बढऩे की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए धूप और उन्नत ग्लाइकेशन एंड प्रोडक्ट्स (एडवांस्ड ग्लाइकेशन एंड प्रोडक्ट्स या एजीई) उत्तरदायी होते हैं। जब हमारे शरीर में मौजूद प्रोटीन या फैट, शुगर के साथ घुल-मिल जाते हैं तब एजीई का निर्माण होता है। हालांकि उम्र बढऩे के लिण् जिम्मेदार इन दोनों ही कारणों को 100 फीसदी नियंत्रित नहीं किय जा सकता लेकिन सनस्क्रीन का उपयोग और आहार संबंधी आदतों में सुधार लाकर हम शरीर के बूढ़े होने की प्रक्रिया को धीमा जरूर कर सकते हैं। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि कुछ खाद्य पदार्थ हमारी त्वचा को प्रभावित करते हैं जिससे उनके झुर्रियों में बदलने की प्रक्रिया तेज हो जाती है। सभी पर एक जैसा डाइट प्लान काम नहीं करता। आइए जानते हैं कुछ ऐसे खाद्य पदार्थां के बारे में जो हमें जल्दी बूढ़ा करने के लिए जिम्मेदार हैं।

01. डेयरी उत्पाद: (Dairy Products)- बहुत से शोधों में शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन लोगों ने परीक्षण के दौरान डेयरी उत्पाद खाने छोड़ दिए उनकी त्वचा में सकारात्मक परिवर्तन आए। जबकि उनकी तुलना में दूसरे प्रतिभागियों की त्वचा में कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं आए। यह सब व्यक्ति पर निर्भर करता है। जैसे कुछ लोगों में डेयरी उत्पाद शरीर में सूजन (Inflammation) बढ़ा सकती है, जिससे ऑक्सीडेटिव तनाव होता है। ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस प्रीमेच्योर एजिंग के मुख्य कारणों में से एक है। ऐसे डेयरी उत्पादों का कम इस्तेमाल हमें सूरज के संपर्कमें आने पर त्वचा की झुर्रियों से बचा सकते हैं। डेयरी से मिलने वाले कैल्शियम के अन्य स्रोत के लिए बींस, सेम, बादाम, पत्तेदार साग और अंजीर खाएं।

02. सोडा और कॉफी: (Soda & COFFEE)- इन्हें पीने से पहले दो बार सोचें। दोनों में कैफीन की मात्रा बहुत ज्यादा होती है जो हमारी नींद में खलल डालने का काम करते हैं। इनके ज्यादा पीने से हमारी नींद का पैटर्न गड़बड़ा जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि खराब नींद हमारी त्वचा की उम्र के लिए सबसे खराब स्थिति है। आंखों के नीचे काले घेरे, मुरझाई त्वचा और झुर्रियों के कारण हम वक्त से पहले बूढ़े दिखाई देने लगते हैं। त्वचा महीन लकीरोंसे भर जाती है जो गहरी होकर झुर्रियों में बदल जाती हैं। इससे बचने का सीधासा उपाय है कि हम कैफीन और शुगर की मात्रा पर नियंत्रण रखें। सोडा-कॉफी के अन्य विकल्पों पर ध्यान लगाएं जैसे हल्दी मिला दूध। हल्दी का मुख्य घटक एंटीऑक्सिडेंट होता है जो एंटी-एजिंग कम्पाउंड्स के सबसे शक्तिशाली ट्रस्टेड सोर्स में से एक है।

03. शराब का सेवन: (Use of Alchohal)- अल्कोहल से कोलेजन पर प्रभाव पड़ता है जो अंतत: झुर्रियों का कारण बनता है। दरअसल अल्कोहल शरीर के पोषक तत्वों, हाइड्रेशन प्रक्रिया और विटामिन ए के स्तर को कम करता है, जिसका सीधा असर झुर्रियों पर पड़ता है। विटामिन ए विशेष रूप से शरीर में मृत सेल्स को रिप्लेस कर नई कोशिकाएं बनाने और कोलेजन के उत्पादन के संबंध में महत्वपूर्ण है। इसके कारण ही हमारी त्वचा चिकनी, चमकदार और लचीली होती है। अगर पीना भी है तो मॉडरेट करते हुए पीना सही है। विशेषज्ञों के अनुसार महिलाओं के लिए प्रति दिन एक और पुरुषों के लिए दो टोस्ट काफी हैं। इसके साथ यह भी सुनिश्चित करें कि आपने पानी अच्छी तरह से पिया है। कुछ मजेदार और रचनात्मक मॉकटेल व्यंजनों के साथ प्रयोग करें।

04. तेज आंच पर पकाना: (Avoid cooking in high heat)- कुछ पॉली-अनसेचुरेटेड तेलों में ओमेगा-6 फैटी एसिड की उच्च मात्रा होती है जैसे मकई या सूरजमुखी का तेल जो हानिकारक फ्री रैडिकल्स बनाते हैं। यह शरीर में सूजन (इनफ्लेमेशन) के स्तर को बढ़ा सकता है। अगर आप इनमें खानो की चीजें बहुत तेज आंच या अत्यधिक टेम्प्रेचर पर बनाते हैं तो ये शरीर पर खतरनाक असर डालते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सभी तेल खाने योग्य नहीं हैं। आप त्वचा को हाइड्रेटेड रखने के लिए मोनो-अनसैचुरेटेड वसा का चयन कर सकते हैं। वेजिटेबल ऑयल की जगह जैतून का तेल उपयोग करें। यह एंटीऑक्सिडेंट, विटामिन ई, और फाइटोस्टेरॉल में समृद्ध होते हैं जो इनफ्लेमेशन को कम करता है।

05. चावल उत्पद को कहें न: (Switch out rice cakes)- चावल से बने विभिन्न उत्पाद जैसे राइस केक आदि को आमतौर पर एक अच्छे स्नैक के रूप में देखा जाता है लेकिन जब बात त्वचा की हो तो ऐसा बिल्कुल नहीं है। राइस केक में एक उच्च ग्लाइसेमिक इंडेक्सट्रस्ट स्रोत होता है जो खून में शुगर के स्तर को बढ़ा सकता है। बढ़ा हुआ ब्लड शुगर लेवल एक 'एजिंग एक्सीलेटर ट्रस्ट सोर्स' के रूप में कार्य करता है जो झुर्रियों का कारण बन सकता है। इसकी जगह छोले,राजमा, चना और चीकू का उपयोग कर सकते हैं जो एंटीऑक्सीडेंट तत्वों से भरपूर हैं।

त्वचा को यूं बनाएं कोमल और जवां
ऊपर बताए गई जानकारी का मतलब यह कतई नहीं है कि आपइनका सेवन बिल्कुल ही बंद कर दें। भोजन एक सतत प्रक्रिया है जो आखिरी सांस तक जुड़ी हुई है। इसलिए इन खाद्य पदार्थों के इतर भी त्वचा को चमकदार बनाने और एजिंग प्रोसेस को धीमा करने के और भी तरीके मौजूद हैं। रेटिनॉल, विटामिन सी, माइक्रोनेडलिंग और फेस एसिड जैसे सामयिक उपचार झुर्रियों को रोकने और चिकना करने में मदद कर सकते हैं। अधिक विकल्पों के लिए चेहरे के एक्यूपंक्चर या चेहरे के व्यायाम को भी चुन सकते हैं।



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11 खाद्य पदार्थ जो हमारे शरीर की उम्र बढऩे की प्रक्रिया को और तेज करते हैं (PART-01)

हमारी त्वचा की उम्र बढऩे की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए धूप और उन्नत ग्लाइकेशन एंड प्रोडक्ट्स (advanced glycation end products (AGEs) उत्तरदायी होते हैं। जब हमारे शरीर में मौजूद प्रोटीन या फैट (fat), शुगर (sugar) के साथ घुल-मिल जाते हैं तब एजीई का निर्माण होता है। हालांकि उम्र बढऩे के लिए जिम्मेदार इन दोनों ही कारणों को 100 फीसदी नियंत्रित नहीं किय जा सकता लेकिन सनस्क्रीन (sunscreen) का उपयोग और आहार संबंधी आदतों में सुधार लाकर हम शरीर के बूढ़े होने की प्रक्रिया को धीमा जरूर कर सकते हैं। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि कुछ खाद्य पदार्थ हमारी त्वचा को प्रभावित करते हैं जिससे उनके झुर्रियों (rinkles) में बदलने की प्रक्रिया तेज हो जाती है।लेकिन ध्यान रखें की हर व्यक्ति के शरीर की खाद्य संबंधी जरुरतें अलग हैं। सभी पर एक जैसा डाइट प्लान काम नहीं करता। इसलिए लगातार कच्चा, साफ किया हुआ या भरपेट खाने से शरीर पर इसका बुरा असर भी पड़ सकता है आइए जानते हैं कुछ ऐसे खाद्य पदार्थों के बारे में जो हमें जल्दी बूढ़ा करने के लिए जिम्मेदार हैं।

01. फ्रेंच फ्राइज: (French Fries)- फ्रैंच फ्राइज एडवांस्ड ग्लाइकेशन एंड प्रोडक्ट्स होने के कारण हमारी उम्र बढऩे की प्रक्रिया को तेज कर देते हैं, क्योंकि वे तले हुए और नमकीन दोनों होते हैं। दरअसल उच्च तापमान पर तेल में तले हुए खाद्य पदार्थ फ्री रैडिकल्स छोड़ते हैंं जो त्वचा को सेलुलर क्षति पहुंचा सकते हैं। इन फ्री रैडिकल्स के संपर्क में आने से क्रॉस-लिंकिंग नामक क्रिया के कारण उम्र बढऩे की प्रक्रिया तेज हो जाती है। क्रॉस-लिंकिंग दरअसल हमारे शरीर के डीएनए में मौजूद अणुओं को प्रभावित करता है जिससे त्वचा का लचीलापन खत्म होने लगता है। फ्रेंच फ्राइज के साथ हम बहुत मात्रा में एडेड सॉल्ट खा जाते हैं जो हमारी त्वचा में मौजूद नमी को नष्ट कर सकता है। इससे त्वचा पर झुर्रियां उभरने लगती हैं जो बढ़ती उम्र की पहचान है। फ्रेंज फ्राइज की जगह शकरकंद (स्वीट पोटैटो फ्राइज) का इस्तेमाल करें क्योंकि यह एंटी-एजिंग होती हैं और कॉपरट्रेड का अच्छा स्रोत होती है। इससे त्वचा चमकदार और युवा बनी रहती है।

02. सफेद ब्रेड: (White Bread)- जब रिफाइंड काब्र्स प्रोटीन के साथ मिश्रित हो जाते हैं तो ये शरीर में एजीई प्रक्रिया को तेज कर देते हैं। उम्र बढ़ाने की प्रक्रिया के साथ ही एजीई का क्रॉनिक डिजीज पर भी सीधा प्रभाव पड़ता है। सफेद ब्रेड ऐसा ही एक उच्च ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाला खाद्य पदार्थ है। यह शरीर में सूजन पैदा कर सकते हैं जो उम्र बढऩे की प्रक्रिया से सीधे जुड़ा हुआ है। यदि आप इसका विकल्प चाहते हैं तो विशेषज्ञ इसे अंकुरित अनाज से बने ब्रेड काउपयोग करें जिसमें कोई aded शुगर भी नहीं होती। यह अंकुरित ब्रेड एंटीऑक्सिडेंट भी होते हैं। इनमें मौजूद पोषक तत्व त्वचा के लिए फायदेमंद होते हैं।

03. सफेद चीनी: (White Sugar)- चीनी कील-मुंहासों का कारण भी है। चीनी त्वचा के लिए हानिकारक एजीई के निर्माण में योगदान देती है। जब हमारे शरीर में शुगर की मात्रा ज्यादा हो जाती है तो यह एजीई प्रक्रिया के स्रोत को तेज कर देती है। ऐसे में अगर हम ज्यादा समय धूप में बिता रहे हों तो यह प्रक्रिया और भी तेज गति से होती है। इसलिए खाने में सफेद चीनी की बजाय फलों में मौजूद प्राकृतिक शुगर या शहद का उपयोग करें। जब मीठा खाने का बहुत मन करे तो ब्लू बैरीज और डार्क चॉकलेट भी अच्छे विकल्प हैं। ब्लूबेरी विशेष रूप से कोलेजन के नुकसान को रोकती है।

04. नमकीन मक्खन: (Yellow Butter)- पूर्व के अध्ययनों से पता चला है कि जो लोग नमकीन मक्खन का सेवन नहीं करते हैं, उनमें त्वचा की क्षति और झुर्रियों की समस्या कम होती हैं। वैज्ञानिक कहते हैं कि पीले रंग का यह नमकीन मक्खन जिसे हम बटर कहते हैं वह खालिस मक्खन की आधी मात्रा से भी बदतर है क्योंकि यह आंशिक रूप से हाइड्रोजनीकृत तेलों से बनाया जाता है। ये ट्रांस फैटी एसिड त्वचा को पराबैंगनी विकिरण के प्रति अधिक संवेदनशील बनाते हैं, जो त्वचा के कोलेजन और लचीलेपन को नुकसान पहुंचाते हैं। इसके विकल्प के रूप में जैतून या एवोकाडो का उपयोग करें जो एंटी-एजिंग एंटीऑक्सिडेंट से भरपूर होते हैं।

05. प्रोसेस्ड मीट: (Processed Meet)- हॉट डॉग, पेपरोनी, बेकन, सॉसेज और चिकन बर्गर जैसे उत्पाद प्रोसेस्ड मीट के उदाहरण हैं जो त्वचा के लिए हानिकारक हो सकते हैं। इनमें मांस नमक (सोडियम), सैचुरेटेड फैट और सल्फाइट की उच्च मात्रा होती है जो त्वचा को डिहाइड्रेड कर सकते हैं। इन्हें खाने से शरीर में सूजन आती है जो हमारी एंटी-एजिंग प्रक्रिया (कोलेजन) को कमजोर कर सकते हैं। सस्ते प्रोटीन विकल्पों के लिए अंडे या बीन्स का उपयोग करें। टर्की और चिकन जैसे लीनर मीट के विकल्प भी चुन सकते हैं। ये मीट प्रोटीन और अमीनो एसिड से भरे होते हैं जो कोलेजन के प्राकृतिक निर्माण में आवश्यक होते हैं।



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जानिए यूरेटर में होने वाली पथरी से जुड़ी ये खास बातें

इन दिनों किडनी स्टोन की बजाय यूरेटर में पथरी के मामले ज्यादा सामने आ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि खानपान की गलत आदतों के कारण किडनी स्टोन के प्रारूप में परिवर्तन आने से इस तरह की समस्याएं बढ़ रही हैं। इन दिनों ऐसा स्टोन देखने में आ रहा है जो बनता तो किडनी में है लेकिन फिर यूरेटर में चला जाता है। इससे मरीज को तेज दर्द के साथ उल्टी की समस्या हो जाती है।

खानपान है जिम्मेदार-
कार्बोनेटेड ड्रिंक, जंकफूड, वसा और अल्कोहल की अधिक मात्रा इसकी मुख्य वजह हैं। इन चीजों में पाया जाने वाला यूरिक एसिड शरीर में स्टोन का निर्माण करता है। यूरेट्रिक स्टोन सामान्य किडनी स्टोन से आकार में 5-8 एमएम या उससे भी छोटे होते हैं और तेज व असहनीय दर्द का कारण बनते हैं जिसे 'यूरेट्रिक पेनया 'यूरेट्रिक कॉलिक' भी कहते हैं। एक साथ कई स्टोन भी बन सकते हैं।
किडनी स्टोन के मामले पहले के समय में अधिक थे जो नमक इकट्ठा होने की वजह से होते थे। ज्यादातर ऐसा गर्मियों में होता था क्योंकि पेशाब कम आनेे पर मौजूद नमक जम जाता था।

इलाज: यूरेट्रिक स्टोन का इलाज दो चरणों में होता है। पहले दर्द की रोकथाम करते हैं फिर दर्द में राहत मिलने पर यूरिन टैस्ट, अल्ट्रासोनोग्राफी व सीटी स्कैन किया जाता है। इससे स्टोन की लोकेशन का पता चलता है जिसे लेजर बीम या होलमियम लेजर से नष्ट करते हैं।
सावधानी: रोजाना कम से कम पांच लीटर पानी पिएं व पालक, नट्स, डेयरी प्रोडक्ट आदि से परहेज करें।



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इस खास तरीके से मिलेगी तनाव से मुक्ति, जानें इसके बारे में

कई बार लोग इंटरव्यू या मीटिंग से पहले तनाव में आ जाते हैं। ऐसे में वे स्थिति को संभालने के लिए स्ट्रेस बॉल का प्रयोग करते हैं। हालांकि इससे तनाव की स्थिति खत्म होती है या यह सिर्फ एक भ्रम है इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं है। फिर भी लोगों को इससे लाभ मिलते देखा गया है।

ऐसे करता है काम-
तनाव के दौरान कार्टिसोल हार्मोन के स्त्राव से रक्त नलिकाएं सिकुड़ जाती हैं जिससे उन्हें पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती। बॉल को बार-बार दबाने से मांसपेशियों पर जोर पडऩे से वे उत्तेजित हो जाती हैं। ऐसे में उनमें ऑक्सीजन व रक्त का संचार बेहतर होने के कारण तनाव में कमी आती है ।

बॉल का प्रयोग -
ऐसी बॉल लें जो हथेली में समा जाए। इसे अंगुलियों की सहायता से दबाएं और 3 या 5 तक गिनती गिनें। फिर इसे धीरे-धीरे छोड़ दें। इस प्रक्रिया को दोनों हाथों से 8-10 बार दोहराएं। बॉल दबाते समय सांस अंदर लें व छोड़ते समय सांस को बाहर छोड़ें। यह एक्यूप्रेशर का काम करने के साथ दिमाग को उस स्थिति से हटा देगा जिसके कारण आप चिंतित हैं।

ऐसी बॉल लें जो हथेली में समा जाए। इसे अंगुलियों की सहायता से दबाएं और 3 या 5 तक गिनती गिनें। फिर इसे धीरे-धीरे छोड़ दें। इस प्रक्रिया को दोनों हाथों से 8-10 बार दोहराएं। बॉल दबाते समय सांस अंदर लें व छोड़ते समय सांस को बाहर छोड़ें। यह एक्यूप्रेशर का काम करने के साथ दिमाग को उस स्थिति से हटा देगा जिसके कारण आप चिंतित हैं।



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लहसुन और नीम के तेल से पाएं मच्छरों से छुटकारा, एेसे करें इस्तेमाल

इस मौसम में मच्छरों से बचने के लिए मॉस्कीटो कॉइल या क्रीम के बजाय नीम का तेल और लहसुन बेहतर विकल्प हैं। भोजन में रोजाना लहसुन खाने और त्वचा पर नीम के तेल के इस्तेमाल से कोई दुष्प्रभाव नहीं होता, समस्या से भी राहत मिलती है।

हालांकि सबसे अच्छा विकल्प तो मच्छरदानी ही है। इसके अलावा कॉइल का धुआं स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक होता है। इंडियन टैस्ट रिसर्च फाउंडेशन के एक सर्वे में यह खुलासा हुआ है कि एक मॉस्कीटो कॉइल से निकला धुआं सौ सिगरेट के धुएं के बराबर खतरनाक होता है।

ताइवान इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिसिन के एक शोध में भी फेफड़ों के कैंसर के 50 प्रतिशत मरीजों में रोग की वजह मॉस्कीटो कॉइल का धुआं पाया गया है। दरअसल मॉस्कीटो कॉइल में पिरेथ्रम रसायन होता है जो मच्छरों को अंधा बनाकर मार देता है। यह रसायन अस्थमा व अन्य सांस और फेफड़े संबंधी रोगों का खतरा बढ़़ाता है।



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Wednesday, 29 July 2020

घर पर इन 6 तरीकों से बच सकते खाने में ज्यादा नमक के उपयोग से

चिकित्सकों और डयटीशियन की ओर से सोडियम के इनटेक को सीमित करना एक वास्तविक आहार संबंधी चिंता है। चिकित्सक और विशेषज्ञ कहते हैं प्रोसेस्ड फूड न खाने से अतिरिक्त नमक खाने से बचने का सबसे सरल तरीका है। घर का बना खाना ही सबसे बेहतर है जहां हम अपनी जरुरत और बीमारियों के इतिहास को देखते हुए नमक को नियंत्रित कर सकते हैं। अतिरिक्त नमक (sodium intake) खाने से बचने के सबसे अच्छे तरीकों पर आइए डालते हैं एक नजर।


01. ऐसे खाद्य उत्पाद न खरीदें जिनमें एडेड साल्ट (Added Salt) हों। मानक पेंट्री सामग्री में सोडियम हो सकता है जिसके बारे में आप को तब तक नहीं पता लगता जब तक आप लेबलों की जांच नहीं करते। उन में डिब्बाबंद डाईटेड टमाटर, शोरबा, स्टॉक किए गए डिब्बाबंद बीन्स, टमाटर का पेस्ट और अन्य डिब्बाबंद सब्जियां शामिल हो सकती हैं।

घर पर इन 6 तरीकों से बच सकते खाने में ज्यादा नमक के उपयोग से

02. स्टोर से खरीदे गए डिब्बा बंद बींस, मटर, चने जैसे खाद्य पदार्थों को खाने से पहले धो लें या हाथों से रगड़ लें। ऐसा करने से सोडियम यानी एडेड नमक लगभग 100 मिलीग्राम प्रति 1/2 कप यानी करीब 25 प्रतिशत अतिरिक्त नमक से छुटकारा मिल सकता है।


03. ऐसे उत्पाद खाएं जिनमें एडेड सॉल्ट या कम नमक हो। सबसे अच्छा उदाहरण सोया सॉस है। इसमें 460 मिलीग्राम सोडियम प्रति चम्मच होता है। जबकि अन्य समान उत्पादों में नियमित सोया सॉस की मात्रा 960 मिलीग्राम प्रति चम्मच है।

घर पर इन 6 तरीकों से बच सकते खाने में ज्यादा नमक के उपयोग से

04. एक तरीका यह भी है कि किचन में इस्तेमाल के लिए खुद ही पेंट्री आइटम बनाएं। यदि आप कुछ सामग्रियों में सोडियम की मात्रा को नियंत्रित या समाप्त करना चाहते हैंए तो अपना खुद का सॉस, अचार, बींस या कैचअप बनाना सबसे अच्छा है।


05. अपनी सेहत का खयाल रखते हुए बुद्धिमानी से नमक का उपयोग करें। नमक के कम उपयोग का मतलब यह नहीं है कि हम कभी नमक का उपयोग ही न करें। लेकिन नमक को सही मात्रा में, सही समय पर सही मात्रा में खाने से ही यह सेहत के लिए फायदेमंद है। बींस, छोले, राजमा और ऐसी ही अन्य खाद्य सामग्री में नमक डालकर उन्हें उबाल लें या बनानेसे पहले नमक से प्रोसेस्ड कर दें इससे ज्यादा नमक मिलाने की जरुरत नहीं पड़ेगी।

06. प्राकृतिक रूप से जिन खाद्य पदार्थों में नमक मिल सकता है उन्हें भी विकल्प के रूप में शामिल करें। हालांकि नमक का कोई भी सटीक विकल्प नहीं हो सकता लेकिन कुछ लोग पोटेशियम क्लोराइड जैसे धातु के विकल्प भी खोजते हैं। इसके अलावा नमक की जगह हम खट्टे स्वाद वाले खाद्य पदार्थों जैसे सिरका, जड़ी बूटियों और मसालों के बारे में भी सोचें। विशेष रूप से खाना पकाने के बाद सिरका या नींबू का रस का खाने को जबरदस्त स्वाद दे सकता है। इससे आप अतिरिक्त नमक खाने से भी बच सकते हैं।



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इस तरीक से पाएं कमर और गर्दन के दर्द से छुटकारा

बिगड़ी जीवनशैली के कारण गर्दन व कमर में दर्द आम बात है। जानते हैं इनमें एक्यूप्रेशर तकनीक कितनी लाभदायक हो सकती है।

गर्दन दर्द : लंबे समय तक लेटे रहने या बैठने के गलत तरीके से गर्दन में अकडऩ या दर्द हो सकता है। ऐसे में हाथों से ज्यादा वजन न उठाएं व गर्दन को झटका न दें। तेजदर्द होने पर सेंक, मालिश या व्यायाम न करें बल्कि विशेषज्ञ से संपर्क करें।

क्या करें : गले के जिस पिछले भाग पर माला पहनी जाती है, वहां अंगूठे के आगे के भाग से प्रेशर डालें। ये बिंदु सर्वाइकल दूर करते हैं। ऐसा दिन में दो बार 30 सेकंड के अंतराल में करें।

कमरदर्द : लंबे समय तक कमर झुकाकर बैठने से दर्द व अकडऩ की दिक्कत होने लगती है। ऐसे में बिस्तर की बजाय जमीन या तख्त पर सोना ज्यादा बेहतर है, इससे रीढ़ की हड्डी एकदम सीधी रहती है।
क्या करें : हाथ की तर्जनी अंगुली और अंगूठे के बीच के भाग को दबाने से राहत मिलती है।



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सुरक्षित प्रसव और स्वस्थ शिशु के लिए गर्भवती महिलाओं के लिए योग है वरदान

कोरोना संक्रमण (Covid-19) के इस दौर में शारीरिक इम्यूनिटी (Immunity) बढ़ाने, बिना जिम जाए घर पर ही कम प्रयास में अधिक स्वास्थ्य लाभ पाने और लॉकडाउन (Lockdown) या महामारी (Pandemic) के कारण उपजे अवसाद (Depression), चिंता और तनाव को दूर करने में भी योग (Yoga) बेहद महत्त्वपूर्ण है। इतना ही नहीं गर्भवती महिलाओं (Yoga in pregnency) और होने वाले बच्चे के लिए तो इसके अनगिनत फायदे है। गर्भवती महिलाओं को ऐसे समय में बहुत ही एहतियात बरतनी पड़ती है और योग उन्हें शारीरिक और मानसिक शान्ति प्रदान करता है। अध्ययन बताते हैं कि गर्भाधारण के दौरान योग करने से प्रसव संबंधी जटिलताओं और खतरों को कम किया जा सकता है। लेकिन यह बहुत जरूरी है कि हम किसी योग्य एवं प्रशिक्षित योग गुरू के नेतृत्व में ही योग करें। आइए जानते हैं कि गर्भवती महिलाओं के लिए योग करने के क्या लाभ हैं-

सुरक्षित प्रसव और स्वस्थ शिशु के लिए गर्भवती महिलाओं के लिए योग है वरदान

प्रसव पीड़ा सहन करने की शक्ति देता है
गर्भ धारण के बाद बच्चे का संपूर्ण विकास महिला के शरीर के भीतर होता है। ऐसे में वजऩ कम करने और क्षमता बढ़ाने के लिए महिलाओं को अधिक ऊर्जा और ताकत की आवश्यकता होती है। गर्भवती महिलाओं के अनुकूल योगाभ्यास से महिलाओं के कूल्हों, पीठ, बाहों और कंधों को मजबूत होते हैं जो उन्हें प्रसव के दौरान होने वाली पीड़ा को सहन करने में सक्षम बनाते हैं। वैज्ञानिक कहते हें कि प्रसव के दौरान होने वाली पीड़ा शरीर की 22 हड्डियों के टूटने जितना होता है।

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शारीरिक संतुलन बनाने में मदद करता है
जैसे-जैसे गर्भावस्था का समय बगढ़ता जाता है वैसे-वैसे गर्भ में पल रहे बच्चे का वजन और आकार भी बढ़ता जाता है। ऐसे में शरीर को साधना और चलते, उठते या खड़े रहने के दौरान संतुलन बनाए रखना किसी चुनौती से कम नहीं है। भावनात्मक रूप से महिलाएं प्रोजेस्टेरोन और एस्ट्रोजेन हार्मोन में वृद्धि के कारण भी परेशान रहते हैं। जैसे-जैसे महिलाएं प्रत्येक योग मुद्रा के माध्यम से सांस रोकने और सांस लेने पर ध्यान केंद्रित करने का अभ्यास करती हैं, योग शारीरिक संतुलन को सुदृढ़ करने में सक्षम बनाता हैं।

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तनाव और दर्द से राहत दिलाए योग
गर्भ मेंभू्रण के विकसित होने पर गर्भवती महिलाओं के शरीर में कुछ विशिष्ट मांसपेशी समूहों पर अधिक तनाव पड़ता है। पेट के बढ़ते आकार के कारण महिलाओं के पास अधिक लॉर्डोटिक होती है। बच्चे के वजन के अतिरिक्त दबाव के कारण महिलाओं के कूल्हे की हड्डियों में तनाव उत्पन्न होने लगता है। महिलाओं के स्तनों का आकार बढऩे पर उनके शरीर के ऊपरी हिस्से और छाती के अलावा, गर्दन और कंधों पर भी तनाव बढ़ता है जिसके चलते हाथ-पांव में अकडऩ और दर्द रहता है। योग इन सभी समस्याओं से राहत देता है।

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नर्वस सिस्टम को शांत करने में मदद करे
योग की विभिन्न मुद्राएं सांस लेने और छोडऩे के अभ्यास एवं योग के माध्यम से, नर्वस सिस्टम रिलैक्स मोड में चला जाता है। जब शरीर विश्राम मुद्रा में होता हैं, तो पाचन ठीक से काम करता हैं, हम बेहतर नींद लेते हैं और हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली उच्च स्तर पर होती है।

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ब्लड सर्कुलेशन बढ़ाता है
योग करने से शरीर के जोड़ों के भीतर रक्त सर्कुलेशन बढ़ जाता है और योग अभ्यास के दौरान हमारी मांसपेशियों पर दबाव पड़ता है। हमारे शरीर के भीतर रक्त के संचलन से सूजन कम हो जाती है और हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत होती है। जिससे एक स्वस्थ बच्चे को जन्म देने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।

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डिस्क्लेमर- सलाह सहित यह पाठ्य सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है। यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें। राजस्थान पत्रिका इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है।



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अगर आप भी महसूस करते हैं ये लक्षण तो हो जाइये सावधान, यह डिप्रेशन हो सकता है

भारत में डिप्रेशन के मरीज़ों में तेज़ी से वृद्धि हो रही है। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16 से पता चलता है कि लगभग 15% भारतीय वयस्कों को एक या अधिक मानसिक स्वास्थ्य मुद्दों पर जूझ रहे हैं। इतना ही नहीं प्रत्येक 20 में से एक भारतीय अवसाद के किसी न किसी प्रकार से ग्रस्त है। डिप्रेशन से दुनियाभर में अनगिनत लोगों पीड़ित है, इसलिये प्रारंभिक चेतावनी, संकेतों और सूक्ष्म लक्षणों के बारे में बात करना महत्वपूर्ण हो जाता है जो अधिकतर अनदेखा किया जाता हैं। डिप्रेशन के दौरान, सामाजिक तौर पर अलग होना बीमारी को और बढ़ाता है। इसलिए यह एक लक्षण है जिसे प्राथमिकता के आधार पर पहचानना चाहिये और इलाज किया जाना चाहिये। डिप्रेशन के सात संकेत यहां दिए गए हैं जिन्हें आपको कभी अनदेखा नहीं करना चाहिए:

अगर आप भी महसूस करते हैं ये लक्षण तो हो जाइये सावधान, यह डिप्रेशन हो सकता है

सोने का असामान्य पैटर्न
नींद के दौरान होने वाली कठिनाई डिप्रेशन का प्रारंभिक संकेत है। नींद में कठिनाई, रात के दौरान बेचैनी और सुबह उठने की इच्छा नही होना शांतिपूर्ण दिमाग के लिए रोडब्लॉक हैं। निराश मरीजों के बीच अनिद्रा बहुत आम है। कई मामलों से पता चलता है कि अनिद्रा वाले लोगों के पास अच्छी तरह सोते लोगों की तुलना में अवसाद होने की दस गुना संभावना होती है। इसलिए, किसी के नींद के पैटर्न पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है।

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भ्रम और अनिश्चितता की स्थिति
हर कदम पर भ्रमित होने की प्रवृत्ति, धीमी सोच, और बार-बार भूलने भी डिप्रेशन के सूक्ष्म संकेत साबित हो सकते है। हालांकि यह सच है कि निर्णय लेने में असमर्थता एक सामान्य मानव विशेषता है, लेकिन कई बार यह चिंताजनक साबित हो सकती है। यह जानना महत्वपूर्ण है कि कोई संज्ञानात्मक तरीके से कैसे काम कर रहा है। हालांकि कोई अवसाद के भी बिना अनिश्चित हो सकता है, फिर भी हर छोटी घटना पर अचानक निराशा हो जाना धीरे धीरे अवसाद का कारण बन सकता है।

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लगातार उधेड़बुन में रहना और तनाव
अत्यधिक चिंता और अधिक सोचने हर समय कम आत्म-सम्मान का कारण बन सकता है। निरंतर तनाव के परिणामस्वरूप नकारात्मक दृष्टिकोण और आसपास के लोगों के प्रति प्रतिक्रिया के एक ऐसे भंवर में फंस जाता है। इस निरंतर निवास को अवसादग्रस्त रोमन कहा जाता है। यह लगातार होने की वजह से व्यक्ति अपने आप से प्रश्न पूछता है: “मैं ही क्यों?”, “मुझे इतना बुरा क्यों लगता है?”, “मैं ऐसा क्यों नहीं कर सकता?” “मैं इससे बेहतर क्यों नही हो सकता? ” “मुझ ही इस तरह से क्यों व्यवहार किया जाता है? ” आदि। इसलिए, अपने आप को शांत रखना जरूरी है और सोचना पर ज़ोर नही देना चाहिये।

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सोशल दूरी बनाना और अभिव्यक्ति न कर पाना
यदि व्यक्ति, जो पहले अत्यधिक सामाजिक रहे हैं और किसी भी कामों से अपने आप को वापस खींचना शुरू करते हैं, यह एक तरह का अलार्म हैं। अलगाव और सामाजिक वापसी अत्यधिक आम अवसादग्रस्त लक्षण हैं। डिप्रेशन के दौरान, सामाजिक तौर पर अलग होना बीमारी को और बढ़ाता है। इसलिए यह एक लक्षण है जिसे प्राथमिकता के आधार पर पहचानना चाहिये और इलाज किया जाना चाहिये।

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भूख न लगना और चिड़चिड़ापन 
डिप्रेशन के दौरान भूख बढ़ जाती है या कम हो जाती है यह आम बात है। यह एक व्यक्ति से दूसरे में भिन्न होता है. जबकि कुछ का वजन कम होने लगता है और कुछ का बढ़ने लगता है। जबकि कुछ स्थितियों में कई लोग पूरी तरह से भोजन से परहेज करते हैं, अन्य लोग पूरे दिन कुछ खाते रहते हैं। खासतौर पर उन खाद्य पदार्थों पर जो चीनी और वसा में उच्च होते हैं।

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लगातार स्वास्थ्य में गिरावट
डिप्रेशन सीधे तौर पर दर्द और स्वास्थ्य में गिरावट ला देता है। इन मामलों में, सिरदर्द, पेट या पीठ दर्द की जैसी कुछ शारीरिक बीमारियां सामने आती है। ये खराब मानसिक स्वास्थ्य के शुरुआती संकेत हो सकते हैं। यहां समस्या यह है कि कुछ लोग केवल शारीरिक पीड़ा के लिए अपने डॉक्टर के पास जाते हैं और इसलिए डिप्रेशन का निदान कभी नहीं हो पाता है।

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बेवजह गुस्सा आना
बिना किसी वैध कारण के अत्यधिक गुस्सा भी मानसिक स्वास्थ्य गिरने का एक बड़ा संकेत होता है। एक साथी, सहकर्मियों, परिवार और मित्र, या यहां तक कि अजनबियों में निरंतर स्नैपिंग भी एक संकेत है। चिड़चिड़ापन या क्रोध भी आधे से अधिक लोगों के लिए एक गंभीर और दीर्घकालिक अवसाद का सामना करने का एक लक्षण है। इसके अलावा, अनैच्छिक जिद्दीपर एक और संकेत है, जो वयस्कों और बच्चों दोनों में देखा जा सकता है।

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सोशल मीडिया पर राहत ढूँढना
विशेष रूप से सोशल मीडिया अपडेट के लिए लगातार देखना, इस उम्र और समय में सामान्य चीज़ की तरह लग सकती है। यह एक प्रमुख नकारात्मक पक्ष है। बगैर रुके सोशल मीडिया में रहना एक कारण है जो अनियंत्रित डिप्रेशन को बढ़ाता है। आज के समय को ध्यान में रखते हुए, यह दिखाई देता है कि हर बार जब कोई चीज़ अपडेट होती है तो एक निश्चित स्थिती पैदा होती है। हर किसी के लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि इन आदतों को सीमा में रखने में ही फायदा है और इससे चिंता को टाला जा सकता है।

आज के समय में युवा अपने बारे में बात करने में शर्मिंदगी महसूस नहीं करते है। हालांकि, अभी भी कुछ पहलुओं पर बात करने की आवश्यकता है और जब डिप्रेशन को काबू में करने की बात आती है तो भावनात्मक और मानसिक संकट के समय बात की जानी चाहिये। अवसाद को आज भी कई लोग एक तरह से गलत तौर पर देखते है और यही वजह है कि लोग इससे निपटने की कोशिश नही करते है। हम सभी दूसरों के बारे में अपना राय जल्दी बनाते है। इसलिये यह जरुरी है कि हम एक दूसरे की मदद करें क्योंकि वार्तालाप मदद करता है और स्थिती को सुधारता है।



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