Saturday, 30 November 2019

World AIDS Day 2019: ये सरल उपाय अपनाएं, एड्स पर लगाम लगाएं

World AIDS Day In Hindi: UNAIDS की एक रिपाेर्ट के अनुसार भारत में 2010 के बाद से एचआईवी संक्रमण के नए मामलों की संख्या में 46 फीसदी की कमी आई है और एड्स (एक्वायर्ड इम्युनो डेफिशिएन्सी सिन्ड्रोम) के कारण होने वाली मौतों की संख्या में भी 22 फीसदी की कमी दर्ज की गई है। विशेषज्ञाें के अनुसार हेल्दी लाइफस्टाइल, हेल्दी फूड के साथ कुछ सरल उपाय अपनाकर इस बीमारी पर लगाम लगाई जा सकती है। लाेगाें में एड्स के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए हर साल 1 दिसंबर काे विश्व एड्स दिवस ( World AIDS Day ) मनाया जाता है। World AIDS Day 2019 के अवसर पर जानते हैं AIDS से जड़ी कुछ खास जानकारी :-

क्या हाेता है एड्स ( What Is Aids )
एड्स, एचआईवी के कारण होता है। एचआईवी एक रेट्रोवायरस है जो शरीर के मुख्य अंगों को संक्रमित कर देता है। इसमें प्रतिरक्षा प्रणाली/ इम्यून सिस्टम की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचता है। इस सिन्ड्रोम में शरीर की बीमारियों से लड़ने की ताकत कमजोर हो जाती है, जिससे व्यक्ति बड़ी आसानी से किसी भी संक्रमण या अन्य बीमारी की चपेट में आ जाता है। सिन्ड्रोम के बढ़ने के साथ लक्षण और गंभीर होते चले जाते हैं। अलग-अलग मरीजों में वायरस के फैलने की दर अलग होती है, जो कई कारकों पर निर्भर करती है। जैसे मरीज की उम्र, एचआईवी से लड़ने की ताकत, स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, शरीर में अन्य संक्रमणों की मौजूदगी, व्यक्ति की वंशागत स्थिति, एचआईवी के किसी स्ट्रेन से लड़ने की क्षमता आदि।

एचआईवी संक्रमण के लक्षण ( AIDS symptoms )
कुछ लोगों में एचआईवी संक्रमण के बाद कई महीनों तक बीमारी के लक्षण नहीं दिखाई देते। हालांकि 80 फीसदी मामलों में दो से छह सप्ताह के भीतर फ्लू जैसे लक्षण दिखने लगते हैं। इसे एक्यूट रेट्रोवायरल सिन्ड्रोम कहा जाता है। एचआईवी संक्रमण के लक्षण हैं बुखार, ठंड लगना, जोड़ों में दर्द, मांसपेशियों में दर्द, पसीना आना (खासतौर पर रात में), ग्रंथियों का आकार बढ़ना, त्वचा पर लाल रैश, थकान, बिना किसी कारण के वजन में कमी। हालांकि कुछ सरल उपाय अपनाकर इस गंभीर बीमारी से बचा जा सकता है।

इस तरह से लगाएं एड्स पर लगाम ( How To Cure Aids Naturally )
बॉडी फ्लूड से बचें :
किसी भी अन्य व्यक्ति के खून या अन्य बॉडी फ्लूड से दूर रहें, अगर आप इसके संपर्क में आते हैं तो त्वचा को तुरंत अच्छी तरह धोएं। इससे संक्रमण की संभावना कम हो जाती है।

ड्रग के इन्जेक्शन और नीडल शेयर करना :
कई देशों में ड्रग्स के लिए इस्तेमाल की जाने वाली सीरीज को शेयर करना एचआईवी फैलने का मुख्य कारण है। यह एचआईवी के अलावा हेपेटाईटिस का भी कारण हैं। हमेशा साफ, नई नीडल इस्तेमाल करें।

असुरक्षित यौन संबंध :
बिना कंडोम के यौन संबंध बनाने से एचआईवी एवं अन्य यौन संचारी रोगों के फैलने की संभावना बढ़ जाती है।

गर्भावस्था :
एचआईवी संक्रमित गर्भवती महिला से उसके बच्चे में एचआईवी का संक्रमण हो सकता है। इसके अलावा स्तनपान कराने से भी एचआईवी का वायरस बच्चे में जा सकता है। हालांकि अगर मां उचित दवाएं ले रही है तो यह संभावना कम हो जाती है।

खून चढ़ाने/ रक्ताधान के दौरान सुरक्षा बरतना :
स्वयंसेवी रक्तदाताओं के खून की एनएटी जांच के बाद किसी को खून देना एचआईवी को फैलने से रोकने का सुरक्षित तरीका है।

दवाओं का सेवन ठीक से न करना :
एचआईवी के मामले में डॉक्टर की सलाह के अनुसार दवा लेना जरूरी है, अगर आप कुछ खुराकें छोड़ देते हैं तो इलाज में रुकावट आ सकती है इसलिए पूरी खुराक लें। एचआईवी से पीड़ित लोगों को अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए, नियमित रूप से व्यायाम करें, सेहतमंद आहार लें और धूम्रपान न करें तथा नियमित रूप से अपने डॉक्टर से मिलते रहें।

एचआईवी का निदान ( HIV Diagnosis )
एचआईवी का निदान ब्लड टेस्ट स्क्रीनिंग की मदद से किया जाता है। अगर इसमें एचआईवी पाया जाए तो टेस्ट का परिणाम 'पॉजिटिव' होता है। 'पॉजिटिव' परिणाम देने से पहले खून की कई बार जांच की जाती है। एचआईवी वायरस का संक्रमण होने के बाद यह तीन सप्ताह से छह महीने के अंदर जांच में स्पष्ट होता है। जितनी जल्दी इसका निदान हो जाए, उतना ही इलाज की संभावना अधिक होती है। एचआईवी का पता लगने पर व्यक्ति को तनाव या अवसाद होना बेहद आम है। अगर आप ऐसे लक्षणों से परेशान हैं तो तुरंत डॉक्टर की सलाह लें।



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ऊंची हील के कारण हर साल 20 लाख से ज्यादा अमरीकी महिलाएं करवाती हैं सर्जरी

'प्लांटर फेशिआइटिस' नाम की यह स्थिति तब बनती है जब प्लांटर फेशिया (एडिय़ों के पीछे मांसपेशियों का मुड़ा हुआ हिस्सा) जो एड़ी को पैर की उंगलियों से जोड़ता है और प्लांटर फेशिया को सहारा देता है, उसमें किसी तरह का खिंचाव या सूजन आ जाती है। यह परेशानी अचानक या पैर के मुड़ जाने से नहीं होती बल्कि लंबे समय तक ऊंची हील के फुटवियर पहनने के कारण पडऩे वाले दबाव या नियमित चहलकदमी से होती है। इससे उन लोगों को जोखिम ज्यादा है जो अधिक वजन वाले हों, बहुत ज्यादा चलना-फिरना पड़ता हो या जो कूदना या नृत्य करना जैसी गतिविधियों में हिस्सा लेते हों।

ऊंची हील के कारण हर साल 20 लाख से ज्यादा अमरीकी महिलाएं करवाती हैं सर्जरी

आर्क इन द जर्नल ऑफ पेन के अनुसार इससे ग्रसित 70 फीसदी लोगों को एड़ी और पंजों में तेज दर्द की शिकायत होती है। वहीं 61 फीसदी ने कहा कि उन्हें नियमित रूप से यह दर्द होता है जबकि 54 फीसदी ऐसे भी हैं जिन्हें इसके चलते सामान्य दिनचर्या के काम करने में भी परेशानी होती है। इससे बचने के लिए ऊंची हील पहनने से बचें, पैरों को सही तरीके से जमाकर बैठें, ऐसी गतिविधियों में हिस्सा कम लें जिससे पंजों और एड़ी पर अनावश्यक दबाव पड़े। डॉक्टरी चिकित्सा में कोताही न बरतें।

ऊंची हील के कारण हर साल 20 लाख से ज्यादा अमरीकी महिलाएं करवाती हैं सर्जरी

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सेहतमंद है ये नाश्ता, एनर्जी देकर, दिल के राेगाें से करता है सुरक्षा

healthy breakfast Diet: हैल्दी ब्रेकफास्ट के ताैर पर सूजी का उपयाेग भारतीय रसाेर्इयाें में पुराने समय से ही हाेता चला आया है। इसके प्रयाेग से हलवा, इडली या उपमा जैसी स्वादिष्ट व पाैष्टिक चीजें बनार्इ जाती हैं। खाने में हल्की व सुपाच्य सूजी गेहूं से बनी होती है। कई जगहों पर इसे रवा के नाम से भी जाना जाता है। जानते हैं इसके सेहत से भरपूर फायदों के बारे में -

ऊर्जा का स्रोत : सूजी से बना नाश्ता सुबह के समय करने से पूरे दिन शरीर में ऊर्जा बनी रहती है। नाश्ते में इसके साथ यदि सब्जियों का भी प्रयोग किया जाए तो यह अधिक पौष्टिक हो जाती है।

हृदय संबंधी रोगों में : सूजी दिल के लिए भी अच्छी है। हृदय संबंधी बीमारियों का खतरा कम करने के साथ हार्टअटैक से भी बचाती है व रक्तसंचार को सही रखती है।

पाचनतंत्र दुरुस्त : सूजी में मौजूद फाइबर पाचनक्रिया को दुुरुस्त रखने में मददगार है। इसमें कैल्शियम, सेलेनियम, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस, पोटेशियम जैसे कई मिनरल्स होते हैं जो पाचनतंत्र को सही रखने के लिए जरूरी हैं।

इम्युनिटी बढ़ाने में सहायक : सूजी में पाया जाने वाला सेलेनियम शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने का काम करता है। यह कई तरह के इंफेक्शन से बचाता है साथ ही प्रतिरोधक तंत्र को अनेक प्रकार की बीमारियों से लडऩे के लिए तैयार करता है।

एनीमिया में लाभकारी : सूजी में पर्याप्त मात्रा में आयरन होता है। इससे शरीर में खून की कमी नहीं होती व विभिन्न अंगों को भरपूर एनर्जी मिलती रहती है।

मजबूत नर्वस सिस्टम : सूजी में मौजूद फॉस्फोरस, जिंक, मैग्नीशियम नर्वस सिस्टम को सही रखने में मदद करते हैं। साथ ही प्रोटीन की भरपूर मात्रा त्वचा व मांसपेशियों के लिए लाभकारी है।

डाइट रहेगी नियंत्रित : सूजी की थोड़ी सी मात्रा खाने से ही पेट भर जाता है व जल्दी भूख नहीं लगती। ऐसे में ओवरईटिंग से बचा जा सकता है।



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तनाव काे दूर करने में प्रभावी है ये थैरेपी, जाने कैसे हाेता है फायदा

art therapy Beat Stress: अगर आप अपने जीवन से किसी भी तरह की मानसिक परेशानी को दूर करना चाहते हैं तो आर्ट थैरेपी अपना सकते हैं। शोध बताते हैं कि बच्चे, बुजुर्ग व महिलाओं के लिए यह थैरेपी काफी उपयोगी साबित हो रही है।

भावनाओं का चित्रण
आमतौर पर देखा गया है कि जो लोग डिप्रेशन या स्ट्रेस से घिरे रहते हैं वे आर्ट के माध्यम से अपनी भावनाओं को बेहतर तरीके से पेश कर पाते हैं। इससे मानसिक स्वास्थ्य में काफी सुधार होता है। आर्ट थैरेपी की जड़ें एंथ्रोपोसोफी में हैं। यह एक आध्यात्मिक अभ्यास है जिसे रुडोल्फ स्टीनर ने शुरू किया था। इसमें कई समूहों के बीच सत्रों का आयोजन किया जाता है, जिसमें थैरेपिस्ट स्ट्रक्चर्ड एक्सरसाइज करवाते हैं।

मानसिक सेहत में सुधार
यह इंसान की शारीरिक-मानसिक व इमोशनल वेल-बीइंग में सुधार के लिए रचनात्मक प्रक्रिया को महत्त्व देती है। इस प्रक्रिया में व्यक्ति की भावनाओं को सकारात्मक बनाने का सबसे ज्यादा प्रयास किया जाता है।

समस्या का समाधान
आर्ट थैरेपिस्ट शोध, अनुभव व आकलन के आधार पर व्यक्ति की समस्या के अनुरूप समाधान के रूप में उसे चित्र बनाने के लिए कहते हैं। इसके नियमित अभ्यास से नकारात्मक विचारों को सकारात्मक विचारों में बदला जा सकता है। इसके अलावा वे मन की दूसरी बातों को जानने के लिए कई तरह के टेस्ट भी करते हैं।

दिमाग पढ़ने की कोशिश
विशेषज्ञों का मानना है कि आर्ट थैरेपी कई मोर्चों पर सफल साबित हुई है। इंसान के खाने, सोने और सांस लेने से जुड़ी समस्याओं में भी इससे काफी फायदा देखा गया है। आप किस तरह से पेंटिंग करते हैं, यह बेहद महत्त्वपूर्ण है। आर्ट थैरेपिस्ट इसी आधार पर आपके व्यक्तित्व को समझने की कोशिश करता है। वह ब्रश स्ट्रोक, पेंटिंग के रंगों की क्वालिटी व टेक्स्चर के आधार पर आपके सब-कॉन्शियस माइंड में चल रहे विचारों को पढऩे की कोशिश करता है। पेंटिंग करना ध्यान की तरह है। पेंटिंग के दौरान इंसान खुद को बेहतर तरीके से पेश करने का पूरा प्रयास करता है।



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फ्रूट क्रीम शरीर के लिए है एनर्जी बूस्टर, एेसे बनाएं

क्रीम में कैल्शियम, प्रोटीन, विटामिन ए, बी2, बी12 और सी भरपूर मात्रा में होता है। ये शरीर को एनर्जी देता है। इससे दिनभर स्फूर्ति बनी रहती है। इसके साथ ही त्वचा के लिए ये फायदेमंद होता है।

सामग्री: एक बड़ी कटोरी क्रीम, दो बड़े चम्मच पिसी चीनी, एक बड़ी कटोरी मिक्स फल पपीता, आम, केला, अनानास चेरी आदि, सूखे मेवे काजू, बादाम, किशमिश, एक चुटकी इलायची पाउडर खूशबू के लिए ।

ऐसे बनाएं : क्रीम में हल्के हाथ से चीनी मिलाएं, बाद में इसमें बारीक कटे हुए फल, ड्राई-फूट, इलायची पाउडर को मिलाएं। अच्छे से मिलाने के बाद फ्रिज मे ठंडा करने के लिए रखें। ठंडा होने के बाद इसे सर्व किया जा सकता है। क्रीम मे कैल्शियम, प्रोटीन, विटामिन ए, बी2, बी12 और सी भरपूर मात्रा में होता है। ये शरीर को भी एनर्जी देता है। इससे दिनभर स्फूर्ति बनी रहती है। इसके साथ ही क्रीम त्वचा के लिए भी फायदेमंद है।



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Pomegranate Benefits: एक नहीं हजार फायदे देता है अनार, जानिए क्या

pomegranate Benefits: स्वाद में मीठे अनार के फायदों के बारे में आपने जरूर सुना होगा लेकिन आपको जानकर आश्चर्य होगा कि सिर्फ अनार ही नहीं, बल्कि इसका पूरा पेड़ औषधीय तत्त्वों से भरपूर होता है। एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर इस फल का जूस पीने से ब्लड प्रेशर का स्तर कम होता है। इस वजह से हार्टअटैक, स्ट्रोक और गुर्दे की बीमारियों का खतरा कम हो जाता है। यह कैंसर जैसी बीमारी से भी बचाव करता है। यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग के शोधकर्ताओं का मानना है कि अनार का जूस पीने से खून में फैटी एसिड की मात्रा कम होती है। आइए जानते हैं अनार के सेहत भरे फायदाें के बारे में :-

हृदय विकार ( Pomegranate for Heart)
अनार के 10 ग्राम ताजा पत्तों को 100 ग्राम पानी में पीस-छानकर सुबह-शाम पीने से धड़कन अनियंत्रित होने की समस्या में लाभ होता है।

दस्त होने पर ( Pomegranate Treat Diarrhea)
अनार के चारों ओर मिट्टी का लेप करें और भून लें। भूनने के बाद दाने निकालकर रस निकालें। इसमें शहद मिलाकर पीने से लाभ मिलेगा।

नकसीर आने पर ( Pomegranate Treat Nosebleed )
इसके आधा कप रस में दो चम्मच मिश्री मिलाकर दिन में एक बार पीने से गर्मी में नकसीर की समस्या दूर हो जाती है।

दांत में दर्द ( Pomegranate For Tooth Pain )
अनार व गुलाब के सूखे फूलों को पीसकर मंजन करने व अनार की कलियों के चूर्ण से दांत साफ करने से मसूड़ों से खून आना बंद हो जाता है।

अनिद्रा ( Pomegranate Sleep )
अनार के ताजा 20 ग्राम पत्तों को 400 ग्राम पानी में उबालें। जब 100 ग्राम शेष रह जाए, तो इसमें गर्म दूध मिलाकर पिएं। इससे अनिद्रा की शिकायत दूर हाेकर अच्छी नींद आती है।

बवासीर ( Pomegranate Treat Piles )
अनार के 8-10 पत्तों को पीस कर टिकिया बना लें। इसे गर्म घी में भूनकर बांधने से बवासीर के मस्सों में लाभ मिलेगा। अनार के पत्तों का 5-10 मिलिग्राम रस सुबह-शाम पीने से खूनी बवासीर में आराम मिलता है।



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गर्भावस्था और बढ़े वजन के लिए फायदेमंद है ये औषधि, एेसे बनाएं

विटामिन, प्रोटीन, बीटा कीरोटिन, आयरन, कैल्शियम से भरपूर सहजन वजन नियंत्रित करने में मददगार है। इसके सेवन से सेहत को बहुत फायदा होता है।

सामग्री: एक गुच्छी सहजन के पत्ते सुखाए, जीरा एक छोटा चम्मच, 5 से 7 लाल मिर्च, धुली चना दाल व उड़द दाल आधा छोटा चम्मच, एक चौथाई छोटा चम्मच सरसों, एक टुकड़ा इमली पानी में भीगा हुआ, कद्दूकस किया एक चौथाई नारियल, नमक स्वादानुसार, तेल 2 बड़़े चम्मच।

ऐसे बनाएं : कढ़ाई में एक बड़ा चम्मच तेल गर्म करके जीरा, लाल मिर्च, दालें को अच्छे से भूने। दूसरी कढ़ाई में एक चम्मच तेल में सहजन की पत्ती मिलाएं। अब इसे नरम होने दें और ठंडा कर लें। मिक्सी में मिर्च, सहजन, इमली, नरियल, और नमक डालकर दरदरा पीस ले। दालें और जीरा मिलाकर भी पेस्ट बना लें। सहजन की चटनी रोटी के साथ सर्व करने के लिए तैयार है। विटामिन, प्रोटीन, बीटा कीरोटिन, आयरन, कैल्शियम से भरपूर सहजन से वजन नियंत्रित रहता है।



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सुबह खाली पेट ज्यादा असर करता है काढ़ा

अक्सर छोटे-मोटी समस्याओं में ठीक होने के लिए हम घर पर ही काढ़ा बनाकर पी लेते हैं। आयुर्वेद में काढ़े को क्वाथ कहते हैं। इसे बनाने व प्रयोग में लेने के भी तय नियम हैं। विभिन्न रोगों में इन्हें लेने का समय भी भिन्न-भिन्न है। जानते हैं इनके बारे में-
पर्याप्त हो पानी की मात्रा:
काढ़ा बनाने के लिए द्रव्य (औषधि आदि) यदि सूखा है तो आठ गुना पानी की जरूरत होती है। वहीं द्रव्य यदि गीला या ताजा है तो बराबर मात्रा में पानी लेना चाहिए।
उपयोगी काढ़े : हाथ-पैरों में दर्द व अकडऩ के लिए रास्नादि क्वाथ, सर्दी, जुकाम में गोजिव्हादि क्वाथ, गले की तकलीफ व खांसी में मुलैठी क्वाथ, सूजन व दर्द के लिए दर्दनिवारक दशमूल क्वाथ लें।
ऐसे बनाएं : काढ़े का द्रव्य नियम के अनुसार पानी में उबालें। आधा शेष रहने पर छानकर गुनगुना पीएं।
ध्यान रखें : काढ़ा कभी भी पी सकते हैं। सुबह खाली पेट पीने से काढ़े के तत्व अंदरूनी अंगों से अवशोषित होकर लाभ करते हैं। दिन में भोजन के 2-3 घंटे बाद पीएं। फिर कुछ देर तक कुछ न खाएं-पीएं। दर्दनिवारक, खांसी-कफ का काढ़ा लेते हैं तो कफ कारक चीजें न खाएं।
एक्सपर्ट : डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा, आयुर्वेद विशेषज्ञ, डॉ. एसआर राजस्थान आयुर्वेद यूनिवर्सिटी, जोधपुर



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इन 5 हर्बल ड्रिंक्स से बढ़ाएं इम्युनिटी

इन दिनों वातावरण में बढ़ते प्रदूषण के स्तर के कारण लोगों में सांस लेने की तकलीफ बढ़ गई है। घर पर आप ऐसे कई हैल्दी व एनर्जी ड्रिंक बना सकते हैं जो प्राकृतिक रूप से सेहतमंद रखते हैं।

हल्दी-अदरक चाय : आधी चम्मच हल्दी के साथ एक छोटा टुकड़ा अदरक लेकर आधा गिलास पानी में उबालें। इसमें एक चम्मच नारियल तेल व एक चौथाई चम्मच पिसी कालीमिर्च डालकर थोड़ा गुनगुना कर पीने से इम्युनिटी बढऩे के साथ पाचनतंत्र दुरुस्त रहता है।
दालचीनी चाय : एक गिलास पानी में एक चम्मच पिसी दालचीनी या एक इंच दालचीनी का टुकड़ा ८-१० मिनट के लिए उबालें। रात को सोने से कुछ देर पहले इसे गुनगुना पीना फायदेमंद है। सुबह के लिए ताजगी रहेगी।
टमाटर का जूस : एंटीऑक्सीडेंट तत्वों से युक्त टमाटर फेफड़ों को स्वस्थ रखता है। एक छोटे टुकड़े अदरक को ५-६ टमाटर संग उबालें। महीन पीसकर गुनगुना पीने से गले को भी राहत मिलेगी।
गाजर-चुकंदर-अनार जूस : फेफड़ों के अलावा अंदरूनी अंगों को ताकत देता है इन चीजों को मिलाकर बनाया गया जूस। इसमें पालक के कुछ पत्ते मिला सकते हैं।
ग्रीन-टी : शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालती है गुनगुनी ग्रीन टी। पाचन को दुरुस्त रखने के साथ यह सांसनली साफ रखती है।
एक्सपर्ट : अनामिका सेठी, डाइटीशियन



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कुश्ती और मार्शल आर्ट की कॉम्बो प्रेक्टिस से फिट रहती हैं रेसलर ऋतु

3 बार दिनभर में दूध जरूर पीती हैं ऋतु। रात को सोने से पहले वे दूध पीना बिल्कुल नहीं भूलती हैं।
रेसलर ऋतु फोगाट ने हाल ही सिंगापुर में एज ऑफ चैम्पियनशिप के मुकाबले में कोरियाई खिलाड़ी को सिर्फ तीन मिनट में चित कर मिक्स्ड मार्शल आर्ट प्रोफेशन में जोरदार एंट्री ली है। जानते हैं उनकी फिटनेस के बारे में-
२५ वर्षीय ऋतु तड़के 4 बजे उठकर तीन घंटे वर्कआउट करती हैं। सुबह के बाद शाम को भी वे तीन घंटे का समय वर्कआउट को देती हैं। इसमें कार्डियो वर्कआउट (स्टेमिना बढ़ाने के लिए स्किपिंग व रनिंग) और वेट ट्रेनिंग (स्क्वैट्स व डेडलिफ्ट्स) शामिल हैं। उनकी कोशिश इन्हें रेसलिंग स्टाइल में करने की होती है। वेट ट्रेनिंग के साथ हाई इंटेंसिटी इंटरवल ट्रेनिंग (एचआइआइटी) करती हैं। इसे ज्यादातर स्पोट्र्स पर्सन व एथलीट करना पसंद करते हैं। ऋतु ने जिस दमखम के साथ मिक्स्ड मार्शल आर्ट के अखाड़े में कदम रखा है उसे बरकरार रखने के लिए एचआइआइटी की प्रेक्टिस जरूरी है। उन्होंने सिंगापुर में मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग ली है। वे ब्राजीलियन जियू-जित्सू और मुआई थाई (एक प्रकार की थाई बॉक्सिंग) की प्रेक्टिस दिन में दो बार करती हैं। ऋतु का मानना है कि इससे उनकी स्ट्रेंथ के साथ अटैकिंग व स्पीड भी बढ़ी है। इनसे कुश्ती के दावपेंच दिखाने में भी आसानी होती है। ऋतु के वर्कआउट रुटीन और डाइट चार्ट की जिम्मेदारी उनके पिता महावीर सिंह फोगाट की है।
डाइट चार्ट
उठते ही ताजा फलों का जूस व बादाम शेक पीती हैं। नाश्ते में 1-1 कटोरी ताजे फल व सब्जियों का सलाद, अंकुरित अनाज, किशमिश, एक गिलास दूध या सोयाबीन, सलाद, दही संग आलू का परांठा खाती हैं। लंच में चिकन, दाल, रोटी, दही व सलाद लेती हैं। शाम के समय एक गिलास दूध व फल लेती हैं। डिनर में सलाद, दाल, वेजीटेबल करी और रोटी पसंद है। वर्कआउट से पहले मौसमी फल, दूध और बाद में सोया प्रोटीन व फल लेती हैं।



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शरीर के कई रोगों के लिए फायदेमंद है छोटी सी चेरी

चेरी एक खट्टा-मीठा फल है जो लाल, काले और पीले रंगों की होती है। चेरी स्वाद में अच्छी होती है। इससे शरीर में पानी की मात्रा बढ़ती है जिससे डिहाइड्रेशन में राहत मिलती है।

पोषक तत्त्व : चेरी में कार्बोहाइड्रेट, विटामिन ए, बी और सी, बीटा कैरोटीन, कैल्शियम, लोहा, पोटेशियम, फॉस्फोरस होते हैं।

हृदय, गठिया रोगों में फायदेमंद: चेरी में एन्थोसियानिन होता है जो गठिया रोगी के लिए फायदेमंद है। चेरी में पोटैशियम, आयरन, जस्ता, मैगनीज जैसे मिनरल्स होते हैं जो हृदय रोग को रोकने में सक्षम माने जाते हैं।

चेरी पीले और लाल के आलावा कई अलग अलग रंगों में आती है लेकिन लाल रंग के चेरी में सबसे ज्यादा विटामिन्स होता है। चेरी में विटामिन A, B, C & E के अलावा मिनरल्स भी भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। चेरी वजन कम करने के साथ-साथ बहुत सी बीमारियों में भी मददगार है।

चेरी में याद्दाशत बढ़ाने वाले गुण भी होते हैं। जिन लोगों को भूलने की आदत होती है उनके लिए चेरी फायदेमंद है। चेरी में मेलाटोनिन की बहुत मात्रा होती है, जो अनिद्रा की समस्या से छुटकारा दिलाता है। रोजाना सुबह-शाम चेरी का जूस पीने से अच्छी नींद आती है।



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अलसी, अंजीर, केला खाने से पैरों में ऐंठन से मिलता आराम

15-20 मिनट नियमित रूप से वॉक करने से पैरों में रक्तसंचार बेहतर बना रहता है।
खानपान में पौष्टिक तत्वों की कमी और शारीरिक गतिविधियों के अभाव से शरीर के अंदरूनी अंग धीरे-धीरे कमजोर होने लगते हैं। पैरों में ऐंठन की समस्या ऐसी है जो न केवल महिलाओं बल्कि पुरुषों को भी परेशान करती है। रात में सोते समय एकदम से पैरों की नसों में खिंचाव होने लगता है। असल में यह कोई बीमारी नहीं बल्कि किसी रोग का एक लक्षण है। तुलनात्मक रूप से मांसपेशियां मोटी होने से पैरों में ऐसा ज्यादा होता है। जानें इलाज-
कई हैं कारण
शरीर में इलेक्ट्रोलाइट (विद्युतीय तरंगों के तत्व) व न्यूरोकैमिकल्स का असंतुलन, नसों की कमजोरी (न्यूरोपैथी), न्यूरोलॉजिकल विकार, पोषक तत्वों की कमी विशेषकर विटामिन-डी व बी 12 और अधिक उम्र में नसों व मांसपेशियों की कमजोरी मुख्य कारण हैं। कई बार थायरॉइड, डायबिटीज, अंत:स्त्रावी गं्रथियों से जुड़ी कोई समस्या, हृदय रोग और कैंसर के इलाज के लिए ली जाने वाली दवाओं को नियमित लेने से जो दुष्प्रभाव शरीर को पहुंचता है उसमें से ऐंठन एक लक्षण के रूप में उभरता है। फाइब्रोमाइलजिया रोग के कारण भी शरीर के विभिन्न अंग में ऐंठन होती है।
रात में ही क्यों...
व्यस्त दिनचर्या से समस्या पर ध्यान न जाने और शरीर की लगातार गतिविधियां होने से कमजोरी का अंदाजा नहीं लगता है। ऐसे में रात को आराम करने के दौरान इसपर ध्यान जाता है।
डाइट पर ध्यान दें
खानपान में विटामिन, कैल्शियम, मैग्नीशियम, ओमेगा-थ्री फैटी एसिड युक्त चीजें खाएं। जैसे बादाम, अलसी, अंजीर, केला, अखरोट, सोयाबीन प्रमुख रूप से डाइट में शामिल करें।
गर्म पानी से सिकाई करें
यदि समस्या बार-बार या लगातार हो तो इसे नजरअंदाज न करें। तत्काल डॉक्टर को दिखाएं और कारण को जानने के बाद सबसे पहले उसका इलाज किया जाता है जिससे इस तरह के लक्षण में कमी आती है। मरीज को वॉक नियमित रूप से करनी चाहिए ताकि पैरों में रक्तसंचार सामान्य बना रहे। शरीर में पानी की कमी भी न होने दें। लवण और पानी की कमी से भी यह समस्या हो सकती है। अगर समस्या हुई है तो तुरंत राहत के लिए जब भी पैरों में ऐंठन हो तो सहने योग्य गर्म पानी से प्रभावित हिस्से की सिकाई फायदेमंद हो सकती है।
एक्सपर्ट : डॉ. गौरव शर्मा, पेन एंड पेलिएटिव स्पेशलिस्ट, एसएमएस अस्पताल, जयपुर



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Friday, 29 November 2019

रोजाना व्यायाम व खानपान पर कंट्रोल करके रहे सकते हैं फिट

मोटापा कई बीमारियों की जड़ है। फैट बर्निंग कर हर कोई चर्बी कम करके फिट शरीर पाना चाहता है। लोगों की पहली पसंद फिट रहना होती है। जो लोग नियमित व्यायाम करते हैं उनके शरीर पर चर्बी कम रहती है और उनका वजन भी संतुलित रहता है। ऐसे लोग बीमारियों से दूर रहने के साथ ही स्वथ्य और तंदुरुस्त भी रहते हैं। चर्बी कम करने और शरीर को मजबूत बनाने के लिए आपको भोजन व एक्सरसाइज का चुनाव सोच समझकर करना चाहिए।

खाने का रखें खयाल -
खाने में गेहूं की बजाय जौ और चने के आटे की रोटी का सेवन करें। जौ और चने के सेवन से आप अतिरिक्त कॉर्बोहाइड्रेट लेने से बचेंगे। इससे आपके शरीर में अतिरिक्त कैलोरी जमा नहीं होगी। नारियल पानी का सेवन करें, यह शरीर को स्फूर्ति देता है और इसमें कैलोरी कम होती है। शक्कर कम मात्रा में लें, ग्लूकोज और कार्बोहाइड्रेट की जगह प्रोटीन लें। विटामिन सी युक्त आहार लें।



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बच्चे को पहले हो चुका है डेंगू तो दूसरी बार बढ़ सकती है दिक्कत, सावधानी बरतें

103 डिग्री फैरनहाइट से अधिक बुखार है तो मलेरिया, मेनिनजाइटिस, बोन व बैक्टीरियल इंफेक्शन की आशंका हो सकती है।
इस मौसम में बच्चे को बुखार आने के साथ गला खराब हो, सिर में दर्द, हाथ व पैरों में दर्द की शिकायत हो तो हल्के में न लें। अक्सर लोग इन्हें वायरल फीवर के लक्षण समझकर एंटीवायरल दवाएं देते हैं जिससे बुखार तो कम हो जाता है लेकिन डेंगू बुखार में जटिलता बुखार उतरने के बाद ही शुरू होती है। इस तरह समस्या धीरे-धीरे गंभीर हो जाती है और इलाज के लिए देरी से पहुंचने पर जान को जोखिम बढ़ जाता है।
बढ़ती गंभीरता
जिस बच्चे को पहले कभी डेंगू हो चुका हो तो उसमें दूसरे बार यदि डेंगू होता है तो गंभीरता अधिक हो जाती है। इसलिए सावधानी बरतने की जरूरत है। ऐसा ही कुछ होता है गर्भावस्था में। महिला को यदि प्रेग्नेंसी में डेंगू हुआ हो और जन्म लेने के बाद बच्चे को डेंगू होता है तो इसमें यह दूसरी बार होने वाला डेंगू माना जाएगा। पहली बार वह गर्भावस्था के दौरान डेंगू का सामना कर चुका होता है।
इलाज का तरीका
डेंगू में शरीर के अंगों को रक्त की पूर्ति नहीं होती है जिससे इनकी कार्यप्रणाली धीमी पड़ने लगती है। इलाज में आइवी फ्लूड के जरिए शरीर में तरल की मात्रा को संतुलित करते हैं। रोग की शुरुआत है तो बच्चे को पानी, ओआरएस, नींबू व नारियल पानी, छाछ आदि खूब पिलाएं। 6 माह से कम उम्र का शिशु है तो नियमित ब्रेस्टफीडिंग कराएं और पानी पिलाते रहें।
सिर गरम यानी बुखार नहीं ...

कई बार अभिभावक बच्चे का सिर हल्का गर्म देखकर उसे दवाई दे देते हैं जो कि गलत है। बुखार को मापें, 100 डिग्री फैरनहाइट तक या इससे नीचे बुखार है तो यह रोगों से लडऩे की क्रिया है। वहीं 100 डिग्री फैरनहाइट से ऊपर बुखार आने के साथ दौरे आएं तो प्लेन पैरासिटामॉल देकर उसके कपड़े ढीले कर पंखे के नीचे लेटा देने से बुखार में कमी आती है। डेंगू की स्थिति में बुखार उतरने का इंतजार न करें। बुखार उतरते ही जटिलताओं की आशंका बढ़ती हैं।
असल में बच्चे के दिमाग का विकास दो साल और बाकी पूरे शरीर का विकास 20 साल तक होता है। ऐसे में दिमाग का कार्य अधिक होने और यहां की हड्डियां कोमल होने से यहां का तापमान थोड़ा ज्यादा रहता है।
ऐसे करें बचाव
डेंगू से बचाव के लिए फिलहाल कोई वैक्सीन नहीं है। इसपर शोध चल रहा है। पुख्ता बचाव मच्छरों से दूरी है। इसके लिए बच्चों को ऐसे समय खेलने के लिए बाहर न भेजें जब आसपास मच्छर ज्यादा हों। पूरी बाजू के कपड़े और मोजे पहनाकर रखें। सोते समय मच्छर भगाने वाले क्रीम का प्रयोग करें। घर या आसपास पानी इकट्ठा न होने दें। पेड़ पौधों की छंटाई नियमित करते रहें।
ध्यान रखें
बुखार शरीर की प्राकृतिक प्रक्रिया है। इसलिए बुखार होने पर कभी भी कोल्ड स्पॉन्ज (ठंडी गीली पट्टी करना) न करें। यह शरीर पर विपरीत असर करता है।
डिजिटल थर्मामीटर से घर पर ही तुरंत बच्चे के शरीर का तापमान पता कर सकते हैं।
98.6 डिग्री फैरनहाइट शरीर का सामान्य तापमान है।
वायरल फीवर को हल्के में न लें।
एक्सपर्ट: डॉ. बी. एस. शर्मा, वरिष्ठ शिशु रोग विशेषज्ञ, जेके लोन अस्पताल, जयपुर



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थायरॉइड की दवाओं से हड्डियों में कैल्शियम की कमी, ये चीजें लें

थायरॉइड के दो प्रकार होते हैं हाइपर और हाइपो थायरॉइड। आंकड़ों की बात करें तो 80त्न हाइपो के मरीज होते हैं। इसमें वजन घटना, गर्मी न सह पाना, नींद न आना, प्यास और पसीना अधिक, हाथ कांपना, दिल का तेजी से धडकऩा आदि लक्षण होते हैं।
इसमें हार्मोन वाली दवाइयां खाने से मरीजों के शरीर में कैल्शियम की कमी होती है जिससे थकान और हड्डियों में फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है। इससे बचने के लिए खूबानी, खजूर, किशमिश, बादाम मलाई निकाला हुआ दूध, पनीर, प्याज, लहसुन, करी-पत्ता, अखरोट, नारियल, अंजीर, चुकंदर, पालक, टमाटर, गाजर, आंवला तथा दही का सेवन करना चाहिए। आयुर्वेद में इसके मरीज को ब्राह्मी, गुग्गुलु, मघ पीपल, कालीमिर्च, त्रिफला दशमूल आदि का नियमित सेवन करना चाहिए।
लाभकारी काढ़ा
काढ़े के लिए 50-50 ग्राम दशमूल, दाना मेथी, कलौंजी, अजवाइन, भुना जीरा, मीठी सौंफ, चपटी सौंफ और करी पत्ता को मिला लें और दरदरा कूटकर डिब्बे में रख लें। रात को दो गिलास पानी में दो चम्मच भर मात्रा में इस मिश्रण को भिगो दें। सुबह धीमी आग पर पकाएं। ध्यान रखें कि धीमी आंच हो और ढंके नहीं। जब पानी चौथाई (आधा गिलास) बच जाए तो उसे छानकर हल्का गर्म ही पीएं। यह तासीर में गर्म होता है इसलिए गर्मी न पीएं। इसे गर्भवती को भी न दें। इसे फ्रिज में भी न रखें।
इनका रखें ध्यान
प्याज, चुकंदर, कचनार, काला नमक, मूली, ब्राह्मी, कमल-ककड़ी, कमलनाल, ताजे फल, सिंघाड़ा, हरी-सब्जियां, हल्दी, फूल मखाने, अनार, सेब, मौसमी, आंवला, जामुन, अन्नानास, करेला, टमाटर, पालक, मटर, टिंडा, परवल, पनीर, दूध, दही, लस्सी लें। गोभी, ब्रोकोली, केला, काजू, सुपारी, सरसों का साग, पीला शलगम, मूंगफली का परहेज करें।
डॉ. अनुराग विजयवर्गीय, वरिष्ठ आयुर्वेद विशेषज्ञ, शिमला (हिमाचल प्रदेश)



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दोगुनी कैलोरी बर्न करने के लिए कौन सी एक्टिविटी है खास, जाने यहां

Fat Burner Exercise: अगर आप वर्कआउट के पुराने तरीकों से ऊब चुके हैं और अपने एक्सरसाइज शिड्यूल में कुछ ऐसे व्यायाम जोड़ने की सोच रहे हैं, जिनमें आपको बोरियत महसूस न हो तो अपनी जरूरत के मुताबिक आजमा सकते हैं दुनिया में प्रचलित ये अनूठे और मजेदार वर्कआउट्स। इन सभी प्रकार के व्यायाम को करने से पहले जरूरी है कि आप किसी योगा विशेषज्ञ की सलाह लें और उसकी देखरेख में ही इन्हें आजमाएं।

पैडल बोर्ड योगा
समुद्र के किनारे और पानी में सर्फिंग के लिए इस्तेमाल होने वाले बोर्ड पर अनेक प्रकार के योगासन करना पैडल बोर्ड योगा कहलाता है। यह योगा भारत में ऋषिकेश से चलन में आया था जो फिलहाल यूथ में काफी प्रचलित है। इससे एकाग्रता बढ़ती है और शरीर में संतुलन व लचीलापन आता है।


ट्रोगा योगा
यह वर्कआउट ट्रेडमिल वॉक (करीब ५ किमी प्रति घंटे की गति से) व रेगुलर योगा का फ्यूजन यानी ट्रोगा है। ट्रेडमिल वॉक से स्टेमिना बढ़ता है और हाथों की स्ट्रेचिंग होती है। योगा से पैरों की मांसपेशियां मजबूत और शरीर का ऊपरी हिस्सा लचीला होता है।


रेट्रो रनिंग
पीछे की ओर दौड़ लगाने वाली यह एक्सरसाइज यूरोप और जापान में लोकप्रिय है। विशेषज्ञ कहते हैं कि सामान्य दौड़ के 1000 कदम और बैकवार्ड रनिंग के 100 कदम बराबर असर करते हैं। इससे जितनी कैलोरी जलती है उतनी सामान्य रनिंग से नहीं। यह वॉक कमर व घुटने के दर्द में असरदार है। इससे घुटने की ऊपरी और निचली मांसपेशियां मजबूत होती हैं।


हुला-हूप
हॉलीवुड में हूप्नोटिका के नाम से मशहूर यह वर्कआउट वजन घटाने में लाभदायक है। इससे पूरे शरीर का वर्कआउट हो जाता है जिससे हाथ-पांव की मांसपेशियों को मजबूती मिलती है और लचीलापन आने से बॉडी टोंड हो जाती है। कैलारी बर्न करने और तनाव दूर करने में यह काफी मददगार है।



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हैल्थ टिप्स: योग मुद्राएं जो कई तरह के रोगों में राहत देतीं

आयुर्वेद के अनुसार शरीर पंच धातु आकाश, पृथ्वी, अग्नि, जल व वायु से बना है। इसलिए शारीरिक समस्याओं को इनसे जोडकऱ देखा जाता है। हठ योग प्रदीपिका के अनुसार 10 योग मुद्राएं होती हैं जो एक्यूप्रेशर की तरह काम करती हैं। ऐसी कुछ मुद्राओं की जानकारी-
प्राण मुद्रा : यह शक्ति और स्फूर्ति देने वाली मुद्रा है। इससे शारीरिक और मानसिक लाभ मिलता है। आंखों और फेफड़ों से जुड़े रोगों में लाभ होता है। इसे नियमित करने से कफ आदि की समस्या नहीं होती है।
शून्य मुद्रा : इसके रोजाना 4-5 मिनट अभ्यास करने से कान के दर्द में आराम मिलता है। जिन्हें कम सुनाई देता है उन्हें भी लाभ मिल सकता है। मान शांत होता है। निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है।
वायु मुद्रा : हार्ट के रोगी इस मुद्रा को रोजाना 20-25 मिनट करते हैं तो लाभ मिलेगा लेकिन एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें। ब्लड प्रेशर, गैस एवं शरीर की बेचैनी में भी इस वायु मुद्रा से आराम मिलता है।
पृथ्वी मुद्रा : इससे चेहरे की चमक और वजन दोनों ही बढ़ते हैं। सभी तरह की कमजोरी दूर करने के लिए इस मुद्रा को किया जा सकता है।
अपान मुद्रा : डायबिटीज, यूरिन संबंधी रोग, कब्ज, बवासीर और पेट संबंधी रोगों में आराम मिलता है। गर्भवती के लिए भी लाभकारी है।



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गैस-एसिडिटी की दवाओं से ज्यादा आदतों में बदलाव से फायदा

तीन मुख्य प्रकार
ये दवाइयां तीन प्रकार की होती हैं। पहली, पेट के एसिड न्यूट्रल करने वाली या ऐसी एंटीएसिड्स जो कम समय में तुरंत राहत दिलाती हैं। दूसरी, एच2 ब्लॉकर्स जो 12 घंटे तक हिस्टामीन को रोकर राहत दिलाती हैं और तीसरी, प्रोटोन पंप इनहिबिटर्स (पीपीआइ) जो कि एसिड को बड़ी मात्रा में रोकने वाली होती हैं और उन्हें पेट तक नहीं पहुंचने देती हैं।
कारण
इन समस्याओंं से बचने के लिए दवा नहीं बल्कि एसिडिटी बनने के कारणों पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। जैसे फास्ट व जंक फूड अधिक खाना, लिक्विड डाइट और नींद की कमी और व्यायाम न करना है। अधिक तनाव से भी पेट में जलन-गैस की समस्या होती है। कुछ दवाइयों से भी अधिक गैस बनती है।
कैसे नुकसान होता
भोजन को पचाने के लिए पेट में एसिड स्रावित होते हैं। इसे गैस्ट्रिक जूस कहते हैं। इनमें हाइड्रोक्लोरिक एसिड, पोटैशियम और सोडियम क्लोराइड होता है। यह न केवल पाचन ठीक रखते हैं बल्कि गैस्ट्रिक कैंसर के लिए जिम्मेदार बैक्टीरिया को भी खत्म करते हैं। ऐसे में जब बिना जरूरत के एंटीएसिडिक दवाइयां लेते हैं तो अच्छे बैक्टीरिया भी मरते हैं। किडनी को भी नुकसान होता है। आंकड़े बताते हैं कि पीपीआइ लेने वाला पांच में से एक व्यक्ति इसका आदी हो जाता है।
... तो दवाइयों की नहीं पड़ेगी जरूरत

रोज 3-4 लीटर पानी पीएं। पानी की कमी से कब्ज, गैस और एसिडिटी होती। तनाव से कई ऐसे हार्मोन स्रावित होते हैं जिनसे पाचन तंत्र खराब होता है। तनाव से प्रोस्टाग्लैंडिन्स नामक हार्मोन बढ़ता जिससे एसिडिटी होती है। व्यायाम से शरीर का मेटाबोलिक बैलेंस सही रहता है। स्ट्रेस हार्मोन भी घटते हैं। रोज 45 मिनट व्यायाम करें। कम नींद से एसिडिटी बढ़ाने वाले कारणों में बढ़ोत्तरी होती है। डाइट में मौसमी फल-सब्जियां भरपूर मात्रा में शामिल करें। रेशे वाली फाइबर डाइट अधिक उपयोगी है।
देसी उपाय
ठंडा दूध पीएं। एक टुकड़ा अदरक का चबाएं या उबाल कर पीएं। डाइट में केला और आंवला शामिल करें। सौंफ चबाना भी लाभकारी होता है।
डॉ. लोकेंद्र शर्मा, सीनियर फार्माकोलॉजिस्ट, सवाई मानसिंह मेडिकल कॉलेज, जयपुर



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गर्दन झुकाकर मोबाइल देखने से ब्लड सर्कुलेशन पर असर, बालों की जड़ें कमजोर होती

वात, पित्त और कफ तीन तरह की प्रकृति होती है। आयुर्वेद के अनुसार 45 वर्ष के बाद पित्त प्रकृति के लोगों में गंजापन सामान्य प्रक्रिया है। यह बीमारी नहीं है। कई बार इलाज से भी लाभ नहीं मिलता लेकिन वात, कफ प्रकृति के लोगों में इलाज से रोकना संभव होता है।
ज्यादा साबुन-शैंपू लगाकर धोने से बाल कुछ समय के लिए मुलायम होते हैं लेकिन डैमेज भी होते हैं। साबुन-शैंपू 7-15 दिन में लगाएं। बाल शिकाकाई, रीठा, त्रिफला, दूध या छाछ से धोएं। गर्म-ठंडे पानी की जगह सामान्य पानी का इस्तेमाल करना चाहिए।
बिस्तर पर या फिर नहाते समय बाथरूम में, कंघों में यदि बाल दिख रहे हैं तो सचेत हो जाएं। प्रतिदिन 10-20 बाल झड़ रहे हैं तो परेशान न हों। आयुर्वेद में कहा गया है कि पूरे शरीर से 100 बाल झडऩा सामान्य है। लेकिन इससे अधिक सिर के बाल झड़ रहे हैं तो एक्सपर्ट को दिखाकर इलाज लेना चाहिए।
बालों में अधिक शैंपू-तेल का इस्तेमाल, कलर और स्ट्रेट करवाने से भी बाल कमजोर होते हैं। अधिक मात्रा में नींबू-नमक का उपयोग, सुबह गरम पानी-शहद लेना, सिर की मालिश न करना, स्मोकिंग, नींद की कमी आदि। तेल लगाकर नहीं छोड़े, धूल आदि चिपकते हैं।
शीर्षासन उत्तम आसन है। इससे सिर वाले हिस्से को पर्याप्त ब्लड मिलता है। पैर छूकर प्रणाम करने के पीछे भी यह वजह है। इसके अलावा जो आसन ब्लड सर्कुलेशन सिर की तरफ बढ़ाते हैं उनसे लाभ मिलता जैसे पश्चिमोत्तासन, पवनमुक्तासन आदि।
मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल करने और नीचे देखकर काम करने वाले लोगों को यह समस्या अधिक होती है। इसकी वजह मोबाइल पर घंटों नीचे देखने से सिर में ब्लड सर्कूलेशन घटता है। बालों को पोषक तत्व नहीं मिल पाता है।
जब बाल झडऩा शुरू हों तबसे ही इलाज भी होना चाहिए क्योंकि एक बार बाल पूरी तरह से झडऩे के बाद दोबारा नहीं आते हैं। गंजापन होने के बाद इलाज लेते भी हैं तो बालों के आने की संभावना न्यूनतम रहती है। यह प्राण निकलने के बाद किसी को फिर से जिंदा करने की कोशिश करने जैसा होगा।
आयुर्वेद के अनुसार रोजाना केवल चार बूंद तेल ही लगाना चाहिए। इसको ऐसे सिर में लगाएं कि इसे धोने के लिए शैंपू-साबुन की जरूरत नहीं पड़े। तेल बालों पर नहीं बल्कि उनकी जड़ों में लगाना चाहिए। इससे ही मजबूती आती है। तेल रात में सोने से पहले या सुबह नहाने से आधा घंटे पहले भी लगा सकते हैं। तेल लगाकर घूमने से धूल आदि के संपर्क में आने से डैंड्रफ और बाल कमजोर होते हैं।
हर व्यक्ति को अपनी प्रकृति के अनुसार ही तेल का प्रयोग करना चाहिए। गलत तेल लगाने से भी बाल झड़ते हैं। अगर प्रकृति पता नहीं है तो शुद्ध नारियल का तेल लगाएं। बादाम, तिल, मूंगफली का तेल भी लगा सकते हैं। जिनकी स्किन ऑयली है, वे पतला तेल और जिनकी स्किन रूखी है वे गाढ़े तेल का प्रयोग करें।
1. नारियल (कच्चा बेहतर) का एक टुकड़ा रोज खाएं। गुड़, किशमिश, घी, खजूर भी खाएं।
2. डैंड्रफ की समस्या है तो छाछ से बालों को धोएं। फिर गुनगुने पानी से धो लें।
3. सफेद बाल काले करने के लिए काली मिट्टी को लोहे के बर्तन में डालें। फिर एक सप्ताह तक गन्ने का रस डालते रहें और मेहंदी के साथ मिलाकर लगाएं।
4. गुड़हल के फूल और तिल के तेल को एकसाथ उबालकर घर पर भी तेल बना सकते हैं।
5. पुरुषों में गंजापन है तो उस हिस्से पर अमरूद के पत्ते हल्के हाथों से रगड़ें, लाभ मिलेगा।
डॉ. हरीश पाटनकर, वरिष्ठ आयुर्वेद विशेषज्ञ, पुणे



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विंटर डायरिया में बच्चे को सबसे पहले ओआरएस व जिंक का घोल दें

डायरिया मुख्य रूप से वायरल व रोटावायरस के कारण होने वाली बीमारी है। आजकल वायरल के कारण डायरिया का प्रकोप अधिक देखने को मिल रहा है। साथ ही शिशुओं में सांस की समस्या भी बढ़ जाती है। इसकी वजह छोटे बच्चों की इम्युनिटी कमजोर होना है। जब शिशु संक्रमित दूध या कोई आहार लेता है तो उससे डायरिया का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए छह माह से छोटे शिशुओं को बाहरी चीजें देने से मना किया जाता है।
एंटीबायोटिक देने से बचें
विंटर डायरिया में शिशुओंं को एंटीबायोटिक दवाइयां नहीं देना चाहिए क्योंकि इस मौसम में बैक्टीरिया नहीं बल्कि वायरस के कारण ही इंफेक्शन अधिक होता है। वायरल में एंटीबायोटिक से बचाव नहीं होता है। वायरल में एंटीबायोटिक दवा देने से बच्चे के शरीर में रेसिस्टेंस डवलप हो जाता है और आगे चलकर दवाइयों का असर कम होता है। बचाव के लिए हाथों व शरीर की साफ सफाई का ध्यान रखें।
इनका रखें ध्यान
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विंटर डायरिया में केवल ओआरएस और जिंक का घोल ही देना चाहिए।
जो शिशु ऊपर की चीजें ले रहे हैं उन्हें दाल का पानी, मांड, केला, दही आदि सकते हैं। बार-बार पानी पिलाते रहें।
रोटावायस का वैक्सीन जरूर लगवाएं।
शिशु की खाने-पीने की चीजें बनाते समय सफाई का विशेष ध्यान रखें।
डॉ. आकाश शर्मा, शिशु रोग विशेषज्ञ, एम्स, नई दिल्ली



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अंकुरित दालें क्यों होती हैं ज्यादा सेहतमंद, जानें यहां

Sprouted Pulses Benefits: अंकुरित दालों में कैलोरी की मात्रा बहुत कम होती है इसलिए अगर आप वजन को लेकर चिंतित हैं और कैलोरीज घटाने का आसान तरीका ढ़ूंढ़ रहे हैं तो ये दालें आपकी मदद कर सकती हैं। ये फाइबर का एक प्राकृतिक स्रोत हैं। फाइबर पाचनतंत्र को स्वस्थ रखता है और नाश्ते व लंच के बीच के समय में आपको बार-बार भूख का अहसास नहीं होने देता। आइए जानते हैं अंकुरित दालें क्याें हाेती हैं ज्यादा फायदेमंद:-

- अंकुरित दालों में पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन होता है जो सेहत के लिए फायदेमंद होता है। ये दालें बढ़ते बच्चों के विकास के लिए भी उपयोगी होती हैं क्योंकि इनसे पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन मिल जाता है।

- ये दालें रक्त को शुद्ध करने में लाभकारी होती हैं और त्वचा से लेकर आपके बालों को निखारने में मदद करती हैं।

- अगर आप बाल झड़ने की समस्या से परेशान हैं तो एक कटोरी अंकुरित दाल रोजाना नाश्ते में लें।

- अंकुरित दालें ऑक्सीजन का एक बहुत अच्छा स्रोत हैं। ऑक्सीजन युक्तखाद्य पदार्थ शरीर में उपस्थित तरह-तरह के वायरस और बैक्टीरिया को खत्म करने में मदद करते हैं।

- मूंग, मोंठ और चने की दाल को अंकुरित कर प्रयोग किया जा सकता है। इनमें टमाटर, प्याज, धनिया, खीरा आदि को मिलाकर सलाद के तौर पर भी इस्तेमाल किया जा सकता है।



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घरेलू नुस्खों से लम्बी उम्र में कैसे करें जोड़ों काे मजबूत, जाने यहां

Home Remedies for Healthy Joints: जोड़ों और हड्डियों में दर्द व जलन आज आम शिकायत है, इसे आर्थराइटिस कहते हैं। हड्डियों के बीच के कार्टिलेज घिसने या ऊत्तकों की प्रतिरोधक क्षमता घटने से जोड़ों की कार्यक्षमता प्रभावित होने लगती है। आइए जानते हैं इन्हें दुरुस्त रखने के उपायों के बारे में:-

हल्दी ( turmeric )
हल्दी में शक्तिशाली ऑक्सीडेंट करक्यूमिन होता है जो जलन पैदा करने वाले एंजाइम्स का प्रतिरोधक है। दो कप पानी में आधा छोटा चम्मच हल्दी व इतनी ही मात्रा में अदरक का रस मिलाकर 10-15 मिनट के लिए उबालें और दिन में दो बार पिएं। ऐसा करने से कुछ दिनों में आराम मिलने लगेगा।

सेंधा नमक ( rock salt )
सेंधा नमक में मैगनीशियम सल्फेट होता है जो दर्द से राहत प्रदान करता है। एक कप गर्म पानी में आधा चम्मच सेंधा नमक मिलाएं और इसे तेल की तरह जोड़ों पर मलें। इसी तरह सेंधा नमक के पानी से नहाने से भी दर्द से राहत मिलती है।

सौंठ ( Dried Ginger )
सौंठ का पाउडर 1-3 ग्राम की मात्रा में भोजन करनेे के बाद पानी से लें। यदि डिनर के बाद इसे लेना चाहते हैं तो सोने से आधा घंटा पहले एक कप दूध के साथ लें। इस प्रयोग से जोड़ों के दर्द में फौरन राहत मिलती है।

इन्हें भी आजमाएं
- आयुर्वेद विशेषज्ञाें के अनुसार जब दर्द बहुत तेज हो और कारण का पता न हो तो शलाकी या हरसिंगार की पत्तियों से तैयार किए गए रस को 1-3 चम्मच की मात्रा में सुबह और शाम को लेने से लाभ होगा। ये पत्तियां आपको परचून की दुकान पर मिल जाएंगी।

- जोड़ों का दर्द होने पर नमक मिले पानी से सेक करें, इसके आधे घंटे के बाद सेंधवारी तेल से जोड़ों की मालिश करें। 5-10 मिनट के बाद उस हिस्से पर भाप लें और सूती पट्टी से इसे कवर कर लें। ध्यान रहे कि इस हिस्से पर हवा न लगे वर्ना सूजन आ सकती है।

- बिच्छू के काटने जैसा तेज दर्द हो तो सूती कपड़े पर गुनगुने पानी में भीगी हुई मिट्टी का लेप लगाएं और इसे दर्द वाले स्थान पर रखें। ऐसा दिन में दो बार करने से लाभ होगा।

- लहसुन की 6-7 कलियों का पेस्ट, एक चम्मच आटा और थोड़ी सी हल्दी को मिलाकर अरंडी के तेल से गूंथ लें। अब इसे दर्द वाले स्थान पर लगा लें। आधे घंटे बाद इसे हटा दें, दर्द में आराम मिलेगा।

- योगराज व सिंघनाद गुग्गल की दो-दो गोलियां असहनीय दर्द होने पर सुबह व शाम पानी के साथ लेने से राहत मिलती है। लेकिन इनका प्रयोग विशेषज्ञ की सलाह के बाद ही करें।

- जोड़ों का दर्द होने पर बासी, खट्टी व ठंडी चीजों से परहेज करना चाहिए क्योंकि इससे रोग गंभीर हो जाता है और सूजन बढ़ने लगती है।



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जानिए हीमोफीलिया रोग से जुड़ी ये खास बातें

छोटे बच्चों को साइकिल चलाते या बाहर खेलते हुए चोट लगना कोई नई बात नहीं है, लेकिन हीमोफीलिया से पीड़ित बच्चों के लिए ये स्थिति जान जोखिम में डालने जैसी हो सकती है। इस डर से इन बच्चों को ऐसी गतिविधियों से दूर रखना माता-पिता को परेशान करती है। हीमोफीलिया से पीड़ित बच्चों के अभिभावकों की कोशिश होती है कि बच्चा घर के अंदर ही रहे।

हीमोफीलिया आनुवांशिक जेनेटिक रक्त रोगों में से एक है। ये खून के थक्के बनने की प्रक्रिया को धीमा करती है। इससे अत्यधिक रक्तस्त्राव हो सकता है और जोड़ों की क्षति से दिव्यांगता आ सकती है। यह रोग लड़कों में अधिक पाया जाता है। इसके लक्षण उम्र बढ़ने के साथ दिखने शुरू हो जाते हैं। हीमोफीलिया में पर्याप्त क्लॉटिंग फैक्टर नहीं बनता जो प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला प्रोटीन है। ये रक्तस्त्राव को नियंत्रित करता है। परिणामस्वरूप हल्की सी चोट से भी अत्यधिक रक्तस्त्राव, विशेष रूप से जोड़ों में हो सकता है। इससे जोड़ क्षतिग्रस्त व लगातार रक्तस्त्राव हो सकता है। हीमोफीलिया दो प्रकार के होते हैं। ए व बी। हीमोफीलिया ए प्रोटीन फैक्टर आठ की कमी से जबकि बी फैक्टर नौ प्रोटीन की कमी से होता है। चोट लगने पर पीड़ित की प्रतिरोधकता क्षमता को दवा से बढ़ाया जाता है।

इसमें रोगियों को नियमित व्यायाम करना चाहिए क्योंकि इससे शरीर का उचित वजन बनाए रखने में मदद मिलती है तथा फिजियोथैरेपी करवाने से मांसपेशियों व हड्डियों को ताकत मिलती है। मरीज की नियिमत स्वास्थ्य जांच करवानी चाहिए।

क्या है प्रोफाइलेक्सिस -
प्रोफाइलेक्सिस दो प्रकार का होता है। इंटरमिटेंट प्रोफाइलेक्सिस, जिसे कम समय अवधि के लिए जैसे सर्जरी से पहले या बाद में किया जाता है जबकि कंटीन्युअस प्रोफाइलेक्सिस का प्रयोग लम्बी अवधि के लिए किया जाता है। कंटीन्युअस प्रोफाइलेक्सिस तीन तरह की होती है। प्राइमरी प्रोफाइलेक्सिस जिसे दूसरे बड़े जोड़ रक्तस्त्राव से व 3 वर्ष की उम्र से पहले दिया जाता है। सेकंडरी प्रोफाइलेक्सिस जिसका प्रयोग 2 या अधिक बड़े जोड़ रक्तस्त्राव के बाद और टेरिटियरी प्रोफाइलेक्सिस जो जोड़ रोग की शुरुआत के बाद, आगे होने वाले नुकसान में प्रयोग की जाती है।



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शरीर पर बिना खुजली वाले चकत्ते दिखें तो हो सकती है ये गंभीर बीमारी

स्क्रब टाइफस एक प्रकार का बैक्टीरियल इंफेक्शन है, जो पिस्सुओं (कीट)के काटने से होता है। इसकी शुरुआत तेज बुखार, ठंड, बेहोशी छाना, शरीर दर्द, तेज सिरदर्द, उल्टी आदि डेंगू-चिकनगुनिया जैसे लक्षण होना है, लेकिन स्क्रब टाइफस में बिना खुजली वाले गोल चकत्ते शरीर पर दिखाई देते हैं। ये पिस्सुओं के काटने से होते हैं। ऐसे लक्षण डेंगू-चिकनगुनिया, मलेरिया में नहीं दिखते हैं। इन्हें देखकर भी पहचान हो सकती है। इसमें प्लेट्स के साथ ब्लड काउंट भी तेजी से घटता है।

स्क्रब टाइफस होने पर कुछ जांचें डॉक्टर्स करवाते हैं। इसमें प्लेटलेट्स काउंट, सीबीसी, लिवर फंक्शन और किडन फंक्शन टेस्ट करवाई जाती हैं। बीमारी की गंभीरता के आधार पर अन्य जांचें जैसे एलाइजा व इम्यूटी से जुड़े टेस्ट भी करवाते हैं। इसमें मुख्य रूप से 7-10 दिन तक एंटीबायोटिक्स दी जाती हैं।

इलाज में देरी से दूसरे अंगों पर असर -
इलाज समय पर न होने से इसका असर ब्रेन, हार्ट, किडनी और फेफड़ों पर भी पड़ता है। मल्टी ऑर्गन फेल्योर का खतरा भी रहता है। सांस लेने में तकलीफ के साथ निमोनिया हो जाता है। मरीज को वेंटीलेटर पर रखना पड़ता है। इसमें देरी होने पर मरीज की जान जाने की आशंका रहती है।

ऐसे करें बचाव -
यह ग्रामीण क्षेत्रों में फैलने वाली बीमारी है, क्योंकि इसके कीट खेतों, जंगलों और झाड़ियों में रहते हैं। यहां पर पिस्सू बड़ी संख्या में रहते हैं। ऐसे में वहां जाने से बचें। यदि जा रहे हैं तो शरीर पर पूरे कपड़े हों। त्वचा को सुरक्षित रखने के लिए माइट रिपेलेंट क्रीम लगाएं। जिन क्षेत्रों में यह समस्या है वहां प्रिवेंटिव दवा ले सकते हैं।



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तलवे के इन पॉइंट्स को दबाने से स्वस्थ रहती है किडनी

कुछ खास पॉइंट्स को दबाने से किडनी को स्वस्थ्य रखा जा सकता है। रोजाना मालिश करते समय किडनी के पॉइंट्स को 5 मिनट दबा दिया जाए तो किडनी का बचाव हो सकता है। हाई ब्लड प्रेशर हो या डायीबिटिज इनका असर किडनी पर पड़ता है। किडनी शरीर का ऐसा महत्वपूर्ण अंग है, जिसके खराब होने पर जीवन खतरे में पड़ सकता है। इसलिए यदि प्रतिदिन सुबह नंगे पांव, ओंस वाली घास पर 5 और 10 मिनट मार्निंग वॉक किया जाए तो भी ये पॉइंट्स अपने आप दब जाते हैं। सुबह की वॉक से भी किडनी को फायदा होता है।

हानिकारक विषाक्त पदार्थों को शरीर से बाहर निकालने में किडनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। किडनी को स्वस्थ रखने के लिए शरीर में पैरों के तलवों के बीच वाले बिंदु पर दबाव डालें। इस बिंदु पर दबाव डालने से किडनी मजबूत होती है और डिटॉक्सीफिकेशन आसानी से हो जाता है। किडनी का स्वस्थ रहना सेहत के लिए बहुत जरूरी है।



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शरीर के तमाम रोगों के लिए रामबाण इलाज है देसी काढ़ा और अदरक, जानें इसके फायदे

अदरक रसोई में रोजाना इस्तेमाल में आता है। इसकी तासीर गर्म होती है। अदरक खाने से खांसी-जुकाम, बलगम जैसी परेशानियों से बचा जा सकता है। अदरक में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेटस, आयरन, कैल्शियम जैसे पोषक तत्त्व पाए जाते हैं, जो हमारे शरीर को स्वस्थ रखने का काम करते हैं। जी मिचलना व उल्टी की समस्या में अदरक औषधि की तरह का काम करता है। इसमें एंटी-इन्फ्लॉमेट्री प्रॉपर्टीज होती है जो जोड़ों के दर्द को खत्म करने में सहायक है। अदरक की चाय फायदेमंद होती है।

बुखार में फायदा करता देसी काढ़ा -
वायरल फीवर हमारे इम्यून सिस्टम को कमजोर कर देता है। इसमें गले में दर्द, खांसी, सिर दर्द थकान, जोड़ों में दर्द के साथ ही उल्टी और दस्त, आंखों का लाल होना और सिर गर्म रहना जैसे लक्षण दिखते हैं। अगर एक-एक चम्मच पिसी हुई काली मिर्च, हल्दी और सौंठ या अदरक को एक कप पानी में थोड़ी सी चीनी डालकर उबालें। पानी जब आधा रह जाए तो इसे ठंडा करके पीएं। तुलसी में एंटीबायोटिक गुण होते हैं। एक चम्मच लौंग चूर्ण व पंद्रह तुलसी के ताजे पत्ते उबालकर पानी पीने से भी लाभ मिलता है।



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हार्ट प्रॉब्लम व लो बीपी की समस्या के लिए फायदेमंद हैं ये योगासन

योग और मेडिटेशन के नियमित अभ्यास से हृदय रोगों में व तनाव में फायदा होता है। इसे योग विशेषज्ञ के निर्देशन में ही करें।

सूर्य नमस्कार : सूर्य नमस्कार से ब्लड सर्कुलेशन बढ़िया और हृदय रोगों का खतरा कम होता है। नियमित 12 मुद्राओं के अभ्यास से फायदा मिलता है।

भुजंगासन : पेट के बल लेटकर दोनों हाथ छाती के पास रखें। सांस पर ध्यान केंद्रित करते हुए शरीर को ऊपर उठाएं। फिर सांस छोड़ते हुए सामान्य मुद्रा में आ जाएं।

पश्चिमोत्तासन : सीधे बैठकर दोनों पैरों को फैलाएं। हाथ ऊपर की ओर उठाएं। झुककर पैरों के अंगूठों को पकड़ें। घुटने न मोड़ें। यह हृदय के लिए फायदेमंद है।

सर्वांगासन : पीठ के बल सीधा लेटकर पैरों को मिलाएं। हथेली जमीन से सटाकर रखें। सांस अन्दर भरते हुए हाथ-पैरों को 90 डिग्री तक उठाएं।

15 मिनट ध्यान : सीधे पीठ के बल लेट जाएं। आंखें बंद कर पैरों को फैलाकर घुटने, पंजे को आराम दें। हाथ सीधा रखें। हथेलियां आसमान की ओर फैलाएं। ध्यान शरीर के हर अंग पर ले जाएं।



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Thursday, 28 November 2019

पोषक तत्वों की पूर्ति के लिए असरदार होते हैं सप्लीमेंट्स

Supplement Therapy: शरीर में होने वाली पोषक तत्त्वों की कमी की पूर्ति के लिए हर चिकित्सा पद्धति में सप्लीमेंट्स दिए जाते हैं। ये मुख्यत: कैल्शियम और आयरन के होते हैं जिन्हें हर उम्र व वर्ग के व्यक्ति को देते हैं। प्राकृतिक जड़ी-बूटियों के अर्क से तैयार होने के कारण ये दुष्प्रभाव नहीं छोड़ते। आइए जानते इनके फायदाें के बारे में :-

बच्चों में उपयोगी : इनमें 4 माह बाद से दांत निकलने शुरू हो जाते हैं। कैल्केरिया फॉस की 1-1 गोली दिन में तीन बार एक चम्मच पानी में घोलकर देते हैं। वहीं बायो-21 दवा आठ माह से डेढ़ साल तक दो-दो गोली दिन में तीन बार चम्मच में घोलकर देते हैं। ये कम से कम एक साल तक चलती हैं। कमजोर हड्डियां, अधिक पसीना आने, चूना, मिट्टी खाने की आदत होने पर कैल्केरिया कार्ब दिन में 3 बार देते हैं।

गर्भावस्था में लाभदायक : प्रेग्नेंसी के दौरान महिला के शरीर में आयरन तत्त्व की कमी से एनीमिया रोग आम है। ऐसे में गर्भावस्था के दौरान चौथे माह से महिला को फैरम फॉस आठवें माह तक दिन में 4-4 गोली तीन बार लेने की सलाह देते हैं।

वृद्धावस्था : उम्र के इस पड़ाव पर 50-60 वर्ष की उम्र के बाद ज्यादातर पुरुष व महिलाओं की मांसपेशियां और हड्डियां कमजोर होने लगती हैं। ऐसे में कैल्शियम फॉस दिन में तीन बार 4-4 गोली और जोड़ों में होने वाले दर्द से राहत पाने के लिए कैल्केरिया फ्लोर देते हैं।

प्राकृतिक स्रोत से पूर्ति: जरूरी पोषक तत्त्वों की पूर्ति के लिए खाए जाने वाले सप्लीमेंट्स तभी असर करते हैं जब इनके प्राकृतिक स्रोतों को नियमित लेते रहें। जैसे कैल्शियम की पूर्ति के लिए दूध व आयरन के लिए हरी पत्तेदार सब्जियां रोज खानी चाहिए। कई बार इन्हें खाने के बावजूद आंतें इनमें मौजूद तत्त्वों को अवशोषित नहीं कर पाती। होम्योपैथी सप्लीमेंट इनके अवशोषण व कार्य को सही करने में मददगार है।



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विटामिन 'बी' व 'डी' की कमी से मांसपेशियों में आती है जकड़न

Muscle cramps: जाेर से बात करते हुए या हंसते हुए अचानक गर्दन की मांसपेशी में अकड़न आ जाना, कुछ देर बाद ठीक हाेना, अक्सर कमर की मांसपेशी और पैरों की पिंडलियों में खिंचाव व अकड़न अाना आदि क्रैम्प की निशानी हाेती है। इस समस्या से बच्चे, युवा व बुजुर्ग सभी परेशान हाे सकते हैं। शरीर में क्रैम्प आने के कर्इ कारण हाे सकते हैं। आइए जानते हैं इसके प्रमुख कारणाें के बारे में :-

डिहाइड्रेशन :
शरीर में पानी की कमी समस्या की प्रमुख वजह है। कम पानी पीने व ज्यादा गर्मी में कार्य या मेहनत करने वालों की नसों में नमी की कमी खिंचाव पैदा करती है।

विटामिन की कमी :
शरीर में विटामिन 'बी' व 'डी' की कमी से मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं। इस कारण चलने, बैठने व उठने के दौरान क्रैम्प होता है।

कमजोर लीवर :
शरीर में असंतुलित तरल का विभाजन न होने से क्रैम्प आते हैं जैसे लीवर के क्षतिग्रस्त होने पर पेट में पानी भरता है व मांसपेशी में पानी की कमी से क्रैम्प आने लगते हैं।

कैल्शियम का अभाव :
कैल्शियम या मैग्नीशियम की कमी नसों और मांसपेशियों को उत्तेजित करती है जो क्रैम्प का प्रमुख कारण है। ऐसा अक्सर प्रेग्नेंसी के दौरान, बार-बार उल्टियां होने या विटामिन-डी की कमी से होता है।

कम मात्रा में पोटेशियम :
रक्त में पोटेशियम की कमी से भी मांसपेशियों में कै्रम्प आते हैं। यूरिन संबंधी दिक्कत व मधुमेह रोगियों में दवाओं के कारण पोटेशियम की कमी हो जाती है जिससे परेशानी बढ़ती है।

दवाएं भी एक वजह
कई दवाएं क्रैम्प का कारण होती हैं। इनमें यूरिन में समस्या की दवा, अल्जाइमर, ओस्टियोपोरोसिस, पार्किन्सन, ब्लड प्रेशर और अस्थमा के इलाज के लिए ली जाने वाली दवा खास हैं।

हृदय की कमजोरी
हृदय की कमजोरी के कारण मसल्स को सही मात्रा में रक्तनहीं मिलता।

बचाव और उपचार
- स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज करें, रोजाना सुबह उठकर जैसे कि सभी पशु भी करते हैं।
- ज्यादा मात्रा में पानी पीएं ताकि डिहाइड्रेशन की समस्या न हो सके।
- लीवर की समस्या हो तो उपचार लें ताकि असंतुलित तरल के विभाजन को रोक सकें।
- कैल्शियम, मैग्नीशियम और पोटेशियम से भरपूर भोजन लें जैसे- कैला, चना, हरी पत्तेदार सब्जियां, अंकुरित अनाज आदि।
विटामिन 'ई' से भरपूर आहार लेने से भी क्रैम्प में कमी आती है।
- यदि आप क्रैम्प कम करने की दवा लेते हैं तो उसे छोड़ने या बदलने की कोशिश करें। धूप स्नान (सन बाथ) करें ताकि विटामिन 'डी' की कमी न रहे।
- हृदय की कमजोरी दूर करने के लिए अश्वगंधा, पीपल के पत्ते व शहद आदि लें।



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गर्भावस्था में आंखों पर असर, हार्मोनल बदलाव के संकेत

Eye Care: प्रेग्नेंसी में होने वाले हार्मोनल बदलाव शिशु के विकास में मदद करते हैं। लेकिन तीसरी तिमाही में अक्सर इस बदलाव से महिला की आंखें ज्यादा प्रभावित हो सकती हैं। ज्यादातर मामलों में ये प्रभाव प्रसव के बाद सामान्य हो जाते हैं। आइए जानते हैं हार्मोनल बदलाव से आंखाें पर पड़ने वाले प्रभावाें के बारे में :-

कॉर्निया की मोटाई बढ़ना
तीसरी तिमाही में महिला की आंखों का कॉर्निया अधिक संवेदनशील हो जाता है। ऐसे में कॉर्नियल इडिमा के कारण कॉर्निया की मोटाई बढ़ने से आंखों में जलन व ड्रायनेस की समस्या होती है। कॉन्टेक्ट लैंस के बजाय चश्मा पहनें।

आंखों में जलन
इस दौरान शरीर में आंसुओं का निर्माण कम होने से आंखों में लालिमा व प्रकाश के प्रति संवेदनशीलता बढ़ती है। सामान्य आई ड्रॉप के प्रयोग से रक्त नलिकाएं सिकुड़ जाती हैं और जलन होती है।

ग्लूकोमा
ग्लूकोमा में सुधारग्लूकोमा आंखों से जुड़ी समस्या है जिसमें आंखों की पुतलियों में दबाव अधिक हो जाता है। आमतौर पर गर्भावस्था के दौरान आंखों का दबाव कम हो जाता है, संभवत: यह दबाव इस दौरान होने वाले हार्मोन परिवर्तनों से होता हो। यह उन महिलाओं के लिए लाभदायक है जिन्हें पहले से ग्लूकोमा की शिकायत हो। क्योंकि इस वजह से ग्लूकोमा के लक्षणों में सुधार आ जाता है।

रेटिना में परिवर्तन
दृष्टि संबंधी समस्याएं और रेटिना में बदलाव, पहले से चल रही किसी बीमारी के कारण भी हो सकता है। जैसे डायबिटीज। इससे नजर धुंधली पड़ सकती है। इसलिए यदि मधुमेह रोगी हैं तो प्रेग्नेंसी प्लान करने से पहले डॉक्टरी सलाह जरूर लें और ब्लड में शुगर के स्तर को कंट्रोल करें।

तरल के जमाव से धुंधला दिखना
सेंट्रल सेरस कोराइडोपैथी में रेटिना के नीचे तरल के जमाव व रिसाव की दिक्कत होती है। जिससे धुंधला दिखाई देता है। ऐसे में तुरंत नेत्र रोग विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए।

नजर कमजोर पड़ना
गर्भवती लैंस के ठीक से काम न करने, इनके टाइट होने या नजर कमजोर होने से नियमित कार्य करने में परेशानी की शिकायत करती है। ऐसा तरल के बढ़ने पर कॉर्निया पर आई सूजन से होता है जो चिंता का विषय नहीं। प्रसव के बाद समस्या सामान्य हो जाती है।

घटता नजर का दायरा
पिट्यूटरी ग्रंथि सभी हार्माेन स्त्रावित करती है लेकिन जब ये सामान्य से अधिक स्त्रावित होते हैं तो ट्यूमर बनने से नजर का दायरा कम होने लगता है। इसके मामले बहुत कम हैं लेकिन प्रेग्नेंसी में यदि यह समस्या हो तो डॉक्टरी सलाह जरूर लें।



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कहीं आप तो नहीं है मेनिक डिप्रेसिव साइकोसिस के शिकार

Manic Depressive Psychosis: अक्सर बातचीत के दौरान व्यक्ति के स्वभाव में अचानक बदलाव आने से वह बढ़ाचढ़ाकर बात करने लगता और बेवजह गुस्सा करता है। ऐसा ज्यादातर लोगों के साथ होता है जिन्हें आमतौर पर उसके घरवाले, सहकर्मी या दोस्त नजरअंदाज ही करते हैं। कई मनोचिकित्सकों के अनुसार यह कोई आदत नहीं बल्कि एक तरह का मेनिया है जिसे मेनिक डिप्रेसिव साइकोसिस कहते हैं।

ऐसी आदतें
क्षमता से अधिक खर्च करना, बात-बात पर शेरो-शायरी या दोस्तों व घरवालों के सामने बड़ी-बड़ी डींगें हांकना, किसी बात या पद का घमंड जताना, बेमतलब नई-नई योजनाएं बनाना जैसी आदतें इस मेनिया के रोगी में होती है। व्यक्ति हर बात पर उत्साहित व ज्यादा प्रसन्न रहता है। साथ ही दिमाग में नई-नई योजनाएं बनाते हुए उन्हें शुरू तो करता है लेकिन समय पर पूरा नहीं कर पाता। ऐसे व्यक्ति नए व रंग-बिरंगे कपड़ों के प्रति आकर्षित होते हैं।

इसलिए बढ़ती दिक्कत
दिमाग में रासायनिक तत्त्व सिरोटोनिन व नोरेपीनेफ्रीन में गड़बड़ी से इस तरह के लक्षण दिखते हैं। इसे सीजनल इफेक्टिव डिसऑर्डर भी कहते हैं। क्योंकि कई बार मौसम के बदलाव से पीनियल ग्रंथि द्वारा निर्मित मेलाटोनिन हार्मोन या तो बढ़ जाता है या फिर इसकी असामान्यता मूड डिसऑर्डर का कारण बनती है। गर्मी की तुलना में सर्दी में इसके मामले ज्यादा हैं। ऐसे में आराम व काम के बीच बढ़ता तनाव डिप्रेशन का रूप लेकर खत्म होते-होते व्यक्ति को मेनिया का रोगी बना देता है।


इलाज का अभाव परेशानी की वजह
दिमाग में होने वाले इस रासायनिक परिवर्तन से व्यक्ति के विचारों व व्यवहार में स्वयं का नियंत्रण कम हो जाता है जिससे उसकी इच्छा हर किसी से बात करने की व डींकें हांकने की बनती है। इस समस्या से पीड़ित रोगी की पहचान आसानी से नहीं हो पाती। ऐसे में स्थिति गंभीर होने पर मरीज कभी कभार एक्सीडेंट, मारपीट, झगड़ा, हिंसा, पैसों की बेवजह बर्बादी, घर से भागने की प्रवृत्ति से गुजरता है। मूड स्टेब्लाइजर, एंटीसाइकोटिक व नींद की दवा से इस मनोरोग का इलाज संभव है।



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कॉग्निटिव बिहेवियर थैरेपी से बिना दवा के दूर करें अवसाद

Stress Treatment: आज की भागमभाग भरी जिंदगी में तनाव एक आम समस्या बन चुका है। प्राेढ़ व युवा ही नहीं, बच्चे भी तनाव का आसानीे से शिकार हाे रहे हैं। यदि अवसाद का समय पर इलाज न किया जाए ताे यह आगे चलकर गंभीर राेग काे कारण बन सकता है।ज्यादातर चिकित्सा पद्धति में टैस्ट, दवाओं व सर्जरी के जरिए रोगों का इलाज किया जाता है। लेकिन कुछ खास थैरेपी व उपायों से भी अवसाद व तनाव को कम कर सकते हैं। जानें एलोपैथी, नेचुरोपैथी व आयुर्वेद में किस तरह रोग के प्रभाव को कम सकते हैं।

प्रमुख थैरेपी
साइको थैरेपी: एलोपैथी में साइको थैरेपी के तहत रोग की जड़ समझकर इलाज होता है।

ब्रेन वॉश थैरेपी: इसमें बातचीत के दौरान मरीज की नकारात्मक सोच को सकारात्मकता में बदलते हैं। जिसके लिए रोगी के बचपन, परिवार, नौकरी, सामाजिक जुड़ाव आदि से जुड़े अनुभव को आधार बनाया जाता है।

कॉग्निटिव बिहेवियर थैरेपी : इलाज के लिए यह सबसे ज्यादा उपयोगी है। इसमें सोचने के तरीके और व्यवहार में बदलाव करते हैं।

फैमिली थैरेपी: परिवारजन को समझाते हैं कि वे रोगी की बातों को गंभीरता से लें। ध्यान से सुनें व समझे।

नेचुरल तरीके से इलाज
लाइट थैरेपी: मरीज को थोड़ी देर आंखें बंद कर सूरज की रोशनी या अलग-अलग तरह की रोशनी में बैठने के लिए कहते हैं। नकारात्मक सोच दूर होती है।
मैग्नेट थैरेपी: शरीर पर मौजूद अवसाद और तनाव से जुड़े प्रमुख बिंदुओं पर विभिन्न आकार के चुंबक को रखा जाता है। इनसे ऊर्जा का संचार बेहतर होने से शरीर रिलैक्स होता है।
लेपम: कुछ खास जड़ीबूटियों और औषधियों जैसे पुदीना, ग्वारपाठा, तुलसी को पीसकर लेप के रूप में माथे पर कुछ देर लगाते हैं। ठंडक मिलने के साथ अवसाद और तनाव कम होगा।

पंचकर्म: पंचकर्म चिकित्सा के तहत शिरोधारा कारगर है। इसमें जड़ी-बूटियां व औषधियों के तेल को माथे पर धार बनाकर डालते हैं।

जड़ी-बूटियां कारगर
- गाय के शुद्ध घी को सूंघने या इसकी 1-2 बूंद नाक में डाल सकते हैं।
- जटमांसी की जड़ को पीसकर एक चम्मच की मात्रा को ताजे पानी के साथ ले सकते हैं।
- दो चम्मच ब्राह्मी और अश्वगंधा के चूर्ण को मिलाकर एक गिलास दूध के साथ लेने से फायदा होता है। दिन में दो बार ले सकते हैं।



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Wednesday, 27 November 2019

हर्बल टिप्स अपनाएं, बढ़ती उम्र पर लगाम लगाएं

Anti-Aging Tips: एजिंग एक कुदरती प्रक्रिया है। उम्र बढ़ने के साथ-साथ शरीर के अंग भी धीरे-धीरे कमजोर होने लगते हैं। ऐसे में ऊपरी चमक-दमक बढ़ाने वाली क्रीम या लोशन लगाना व्यर्थ है। अगर हम कुछ हब्र्स ( Anti Aging herbs ) अपने खान-पान में शामिल करें तो भीतरी मजबूती बढ़ा कर एजिंग के लक्षणों पर ब्रेक लगाया जा सकता है। आइए जानते हैं उनके बारे में :-

जिनसेंग
यह हर्ब स्किन और मसल्स की टोनिंग करती है। इसके नियमित सेवन से पाचन प्रणाली दुरुस्त होती है और भूख खुल कर लगती है।

हल्दी
हल्दी शरीर के टिशू डैमेज होने से रोकती है। यह प्रभावशाली एंटी बैक्टीरियल एवं एंटी-डीजेनेरेटिव है। हल्दी झुर्रियों, दाग-धब्बों एवं एजिंग के अन्य संकेतों पर कंट्रोल रखती है।

अश्वगंधा
आयुर्वेद में इसे यौवनशक्ति बढ़ाने वाली जड़ी माना गया है। यह इम्यून सिस्टम को मजबूत करती है। मानसिक रोग दूर करके यह शरीर को स्वस्थ रखती है। एनर्जी लेवल बढाती है और जोड़ों-पीठ के दर्द से भी राहत दिलाती है।

तुलसी
तुलसी एंटी बैक्टीरियल, एंटीफंगल एवं एंटीइनफ्लेमेटरी हर्ब है। इसका इस्तेमाल कैंसर के इलाज में भी किया जाता है। इम्यून सिस्टम दुरुस्त रखने, डायबिटीज से बचने एवं स्वस्थ रहने के लिए इसका सेवन करना चाहिए।

बल्कुवारी
जिन्कगो यानि बल्कुवारी पर हुए शोध पुष्टि करते हैं कि यह जड़ी मष्तिष्क में रक्त का प्रवाह बढाने में सक्षम है। अल्जाइमर या डिमेंशिया जैसे स्मरण शक्ति से जुड़े रोगों में भी इसका सेवन फायदेमंद होता है।

दालचीनी
दालचीनी व्यापक रूप से आयुर्वेदिक चिकित्सा में इसके उपचार गुणों के लिए उपयोग की जाती है। इसे एंटी-एजिंग में भी कारगर है क्याेंकि यह कोलेजन टूटने से बचाता है और त्वचा की लोच को नुकसान नहीं हाेने देता है।एक अध्ययन कहता है कि यह कोलेजन संश्लेषण को भी बढ़ाता है और उम्र बढ़ने के संकेतों को रोकता है।

लाैंग
लौंग के बहुत स्वास्थ्य लाभ हैं। कई बीमारियों के इलाज के लिए आयुर्वेद में लौंग के तेल का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। एक अध्ययन में यह भी पाया गया है कि लौंग में फ्री रेडिकल स्कैवेंजिंग गुण होते हैं और इसमें एंटीऑक्सिडेंट होते हैं जो उम्र बढ़ने के संकेतों को धीमा कर देते हैं।



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डायबिटीज भी दूर करता है नीम, ऐसे करें प्रयोग

Neem Benefits: आयुर्वेद के अनुसार नीम की पत्तियां एंटीबायोटिक, एंटीबैक्टीरियल और एंटीएलर्जी होती हैं। ये हमें प्रदूषण के साथ अन्य कीटनाशक बीमारियों से भी बचाती हैं। जानते हैं कैसे :

त्वचा रोगों में : खुजली, घमोरियां, एग्जीमा, सोराइसिस और कुष्ठ आदि त्वचा संबंधी रोगों में नीम की पत्तियों का लेप बनाकर लगाने से लाभ होता है।

डायबिटीज में : मरीज को सुबह खाली पेट 6-7 नीम की पत्तियां व 8-10 निंबोली खानी चाहिए इससे शुगर लेवल कम होता है।

पेट के लिए : गैस, अल्सर व पेट की अन्य समस्याओं के साथ टीबी व यूरिन इंफेक्शन होने पर नीम की पत्तियों को खाली पेट चबाने से आराम मिलता है। पेट की सफाई के लिए नीम के रस का अनीमा भी दिया जाता है। बसंत ऋतु में नीम की 3-4 कोमल पत्तियां चबाने से टायफॅाइड, चेचक व पीलिया जैसे संक्रामक रोग दूर होते हैं।

बालों के लिए : नीम की सूखी पत्तियां पीसकर मेहंदी, आंवला, रीठा, शिकाकाई में मिलाकर बालों में एक घंटा लगाकर धोने से बाल काले व मुलायम होते हैं और डेंड्रफ भी दूर होता है।

शैंपू में प्रयोग : लोहे के बर्तन में आंवला, रीठा, शिकाकाई, एलोवेरा के साथ नीम की पत्तियां १-२ रात के लिए भिगोएं। इसके बाद उबालकर, छानकर व ठंडा करके शैंपू की तरह प्रयोग करें।

तेल में प्रयोग : लोहे के बर्तन में 200 ग्राम नारियल या सरसोंं केे तेल में 2 मुट्ठी नीम की पत्तियों का पेस्ट, आंवला, एलोवेरा और दानामेथी मिलाकर गर्म करें व ठंडा होने पर प्रयोग करें। हफ्ते में 2 बार इस तेल से सिर में मालिश करें।

परहेज : नीम की पत्तियों व निंबोली के उपयोग से एक घंटा पहले और एक घंटा बाद कुछ न खाएं वर्ना इनका उचित लाभ नहीं मिलता।

कीटनाशक उपयोग : नीम की पत्तियों को पानी में उबालकर नहाने से शरीर के कीटाणु दूर होते हैं। इन पत्तियों को फेंके नहीं, इनका पेस्ट बनाकर मुल्तानी मिट्टी, चंदन पाउडर और गुलाब जल के साथ 20-30 मिनट के लिए चेहरे पर लगाएं और फिर धो लें।

मच्छरों के लिए : एक मुट्ठी नीम की सूखी पत्तियों को गोबर के कंडे के साथ छोटे प्याले में जलाकर 15 मिनट तक धुआं करें, इस दौरान परिवार के लोग बाहर चले जाएं। बाद में खिड़की दरवाजे खोल दें।



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women's Health: 40 के बाद अपनी सेहत काे ऐसे बनाएं रखें महिलाएं

Women's Health After 40: चालीस साल की उम्र, जीवन का ऐसा पड़ाव है, जब हर महिला में कुछ शारीरिक परिवर्तन होते हैं। इस उम्र में मेनोपॉज के बाद कुछ दिक्कत हो सकती हैं जैसे चिड़चिड़ापन, थकान, वजन बढऩा, लगातार खाते रहने की आदत, बीपी की समस्या आदि। जानें ऐसी ही कुछ समस्याओं व उनके समाधान के बारे में -

ब्लड प्रेशर :
इस उम्र में बीपी घटने-बढ़ने की समस्या रहती है। यदि मधुमेह, हृदय व किडनी रोग से परेशान हैं तो बीपी चेक कराएं।
खानपान :
ओमेगा-3 फैटी एसिड युक्तचीजें खाएं। ये बीपी और हृदयगति नियमित करती हैं।
एक्सरसाइज :
रोज 45 मिनट वॉक करें। वॉक करते समय पहले 10 मिनट वॉर्मअप करें। सुबह वॉक न करने पर डिनर के बाद वॉक जरूर करेंं।

मधुमेह :
शुरुआती स्टेज में रोग की पहचान होने पर इसे नियंत्रित करें। वरना किडनी, हृदय व आंखों से जुड़ी दिक्कतें बढ़ सकती हैं।खानपान :
फाइबरयुक्तचीजें खाएं। ये रक्त में शुगर का स्तर नियंत्रित रखने में मददगार हैं।
एक्सरसाइज :
हमेशा एक जैसी वर्कआउट न करें। जैसे कार्डियो व योग को बदल-बदलकर करें। हफ्ते में 160 मिनट एक्सरसाइज करें।

कोलेस्ट्रॉल :
40 या इससे अधिक उम्र की महिलाएं कोलेस्ट्रॉल की जांच हर 5 साल में एक बार जरूर कराएं।
खानपान :
फायबरयुक्त चीजें जैसे दलिया, जौ, गेहूं, फल और सब्जियां ले सकती हैं।
एक्सरसाइज :
सप्ताह में कम से कम 30 मिनट एरोबिक एक्सरसाइज जरूर करें।

ऑस्टियोपोरोसिस :
कैल्शियम की कमी और मेनोपॉज के बाद ऑस्टियोपोरोसिस की आशंका बढ़ जाती है। ऐसे में डॉक्टरी सलाह लेनी जरूरी है।
खानपान :
कैल्शियम, फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट्स युक्त चीजें अधिक खाएं।
एक्सरसाइज :
स्विमिंग, एरोबिक, साइक्लिंग, जॉगिंग जैसे एक्सरसाइज कर सकती हैं। इन्हें 30 - 40 मिनट कर सकती हैं।

जरूरी टैस्ट: कुछ टैस्ट कराकर उम्र के इस पड़ाव पर होने वाली दिक्कतों को समय पर समझा व रोका जा सकता है।
मेमोग्राफी : इससे बे्रस्ट कैंसर का पता लगता है।
पैप टैस्ट : 40 के बाद हर तीन साल में पैप टैस्ट कराने की सलाह देते हैं। यह टैस्ट गर्भाशय के कैंसर की जांच के लिए कराया जाता है।
थायरॉयड टैस्ट : हर पांच साल में इसे एक बार कराना जरूरी होता है।
स्किन टैस्ट : यदि त्वचा पर मौजूद मस्से का रंग या आकार बदले, तुरंत डर्मेटोलॉजिस्ट को दिखाएं।
वजन : तेजी से बढ़ता शरीर का वजन कई रोगों की वजह बनता है। समय-समय पर वजन चेक कराती रहें। साथ ही खानपान में ऐसी चीजें शामिल करें जो वसारहित हों।



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Kidney Yoga: किडनी को स्वस्थ रखने के लिए करें ये याेगासन

Yoga For Healthy KIDNEY : किडनी हमारे शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग है, यह शरीर से दूषित पदार्थ बाहर निकाल कर रक्त शाेधन का काम करती है। इसलिए आवश्यक है कि इसे सेहतमंद रखा जाए। किडनी की कार्यक्षमता को बनाए रखने के लिए खानपान के साथ कुछ योगासन किए जा सकते हैं। इनमें अद्र्ध भेकासन, पासासन व परिघासन ऐसे आसन हैं जिनके अभ्यास के दौरान पेट पर दबाव पड़ने से किडनी का कार्य सुचारू होता है। साथ ही विषैले पदार्थ शरीर से बाहर निकल जाते हैं और व्यक्ति स्वस्थ रहता है। आइए जानते हैं उनके बारे में:-

अर्ध भेकासन
ऐसे करें : पेट के बल लेट जाएं। हथेलियों को कंधों के बराबर रखकर शरीर के अग्र भाग को धीरे-धीरे ऊपर 45 डिग्री तक उठाएं। इसके बाद दाएं पैर को घुटने से मोड़कर एड़ी कूल्हे पर लगाएं। फिर दाएं हाथ से दाएं पैर के पंजे को इस तरह पकड़ें कि पैर का अग्रिम भाग पकड़ में आए। क्षमतानुसार दबाव देते हुए पंजे को कूल्हे पर लगाएं। इस दौरान खासकर कंधे व कोहनी ढीला छोड़ें। संतुलन बनाते हुए कुछ देर गहरी सांस लेने व छोडऩे की प्रक्रिया के बाद पैर छोड़ें। हथेली व पैर को वापस जमीन पर टिक पाएं। इसे बाईं तरफ से भी दोहराएं।

ध्यान रखें: शरीर के दोनों तरफ इस आसन की अवधि समान रखें। ब्लड प्रेशर, माइग्रेन या कमर से जुड़ी कोई सर्जरी हुई हो या परेशानी हो तो इसे न करें।

परिघासन
ऐसे करें : दोनों घुटनों के बीच थोड़ी दूरी बनाते हुए इनके बल बैठ जाएं। अब दायां पैर दाईं ओर इस तरह फैलाएं कि पैर के तलवे जमीन पर और अंगुलियां दीवार की ओर हों। गहरी सांस लेते हुए बाएं हाथ को ऊपर उठाएं और दाएं हाथ को दाएं पैर पर रख दें। सांस छोड़ते हुए बायां हाथ दाईं ओर ले जाएं। सिर और शरीर का बाकी हिस्सा भी दाईं ओर झुकने दें। इस अवस्था में 5-10 मिनट के लिए रुककर गहरी सांस लेते व छोड़ते रहें। अब सांस लेते हुए बायां हाथ सीधा करें। दाएं पैर के घुटने को मोड़कर बाएं घुटने के पास रखें। इस अभ्यास को बाईं तरफ से भी दोहराएं।

ध्यान रखें: घुटने, पैर व कूल्हे के जोड़ या मांसपेशी में दर्द या परेशानी महसूस होने पर न करें।

पासासन
ऐसे करें : गहरी सांस लेते हुए ताड़ासन की मुद्रा में खड़े हो जाएं। फिर घुटनों को मोड़ते हुए सारा वजन पैर पर रखते हुए बैठ जाएं। अब धीरे-धीरे सांस छोड़ते हुए घुटनों को हल्का सा बाएं और शरीर को दाईं ओर मोड़ें। इस दौरान ध्यान रखें कि शरीर का ऊपरी हिस्सा दाईं जांघ को छुए। बायां हाथ ऊपर उठाएं और दाएं पैर के सामने की ओर लाएं। फिर दायां हाथ पीठ की तरफ से पीछे ले जाते हुए इससे बाईं हथेली पकडऩे की कोशिश करें। बाएं हाथ की मदद से शरीर को उलटी दिशा में घुमाने का प्रयास करें और सिर को दाईं ओर पीछे की तरफ घुमाएं। कंधे को घुटने की सीध में लाएं। कुछ समय के लिए इस मुद्रा में रुकने के बाद प्रारंभिक स्थिति में आ जाएं। दूसरी तरफ से भी इसे दोहराएं।

ध्यान रखें: घुटने, कमर, गर्दन या कंधों में दिक्कत है तो इस अभ्यास को न करें।



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वेट कंट्रोल के लिए डाइटिंग नहीं, डाइट प्लान है जरूरी

weight loss Diet Plan: स्लिम-फिट दिखने के लिए लोग डाइटिंग कर रहे हैं। इसमें वे खाना बंद कर देते हैं, या फिर भोजन में कुछ जरूरी खाद्य पदार्थों से दूरी बना लेते हैं। बस यहीं पर हुई चूक सेहत पर भारी पड़ती है। पतले या जीरो फिगर लुक के लिए खाना बंद करने से रक्त में शुगर की सामान्य मात्रा असंतुलित हो जाती है। ऐसे में शरीर लिवर, हड्डी, मांसपेशियों व फैट से ग्लूकोज लेना शुरू कर देता है। इस कारण मांशपेशियां टूटती हैं और व्यक्ति कमजोरी महसूस करता है। इम्युनिटी घटने से वह गंभीर रोगों की चपेट में आने लगता है।

ये होती दिक्कतें
खाना बंद करने से रक्त में कीटोन्स बनते हैं जिसे सिर्फ दिमाग प्रयोग में लेता है। इससे हृदय व ब्लड प्रेशर की गति धीमी होती है जिससे व्यक्ति की अचानक मौत हो सकती है। इसलिए विशेषज्ञ डाइटिंग न करने की सलाह देते हैं। ताकि शरीर को जरूरी पोषक तत्त्व मिल सकें।

गड़बड़ाता पाचन
संतुलित भोजन से फैट, कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन, विटामिन, मिनरल्स व एंटीऑक्सीडेंट्स मिलते हैं। खाना बंद होने पर इलेक्ट्रोलाइट इंबैलेंस की स्थिति बनती है। पोषक तत्त्वों की कमी से कोशिकाओं को पोषण नहीं मिलता और वे मरने लगती हैं। कुछ लोग दुबले पतले होते हैं लेकिन खाना बहुत खाते हैं। इसका मतलब है कि उनका पाचनतंत्र अच्छा हैं।

थायरॉइड से भी बढ़ता वजन
थॉयराइड की तकलीफ से वजन बढ़ने के साथ थकान, सुस्ती, कमजोरी, लंबाई न बढ़ने, पेट के रोग, कब्ज आदि परेशानियां होती हैं। ऐसे में डॉक्टरी सलाह लें। वजन बढऩे का कारण कुछ और है तो डाइटिंग से दिक्कत बढ़ भी सकती है।

ये नियम अपनाएं
अचानक खाना बंद करने की बजाय खाने की मात्रा कम करें। काम के अनुसार कैलोरी लें। सिटिंग जॉब है या घरेलू महिला हैं तो 1500 कैलोरी , मेहनत का काम है तो दिन में 2400 कैलोरी लें। वजन अधिक है तो खाने का प्रतिशत बॉडी मास इंडेक्स के आधार पर तय करते हैं। सुबह नाश्ता जरूर करें। एक बार में अधिक खाने के बजाय टुकड़ों में खाना फायदेमंद है। 7 बजे से पहले डिनर लें व टहलें।

इनका सेवन करें
फाइबरयुक्त डाइट लें जिसमें भुट्टा, ब्राउन राइस, बीन्स, अमरूद, ओट्स, मटर, सेब, बादाम, काजू, पत्ता गोभी शामिल करें। डाइटिंग न करें। इसके बजाय विशेषज्ञ की सलाह पर नियमित व्यायाम करें।



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पाइल्स में आराम पहुंचाता है हरड़ और छाछ का सेवन

Ayurvedic Treatment For piles : हमारे शरीर के गुदा भाग में रक्त नलिकाएं होती हैं। इन पर दबाव पड़ने या कब्ज के कारण इस भाग के अंदरूनी व बाहरी हिस्से में सूजन आने व मस्सा बनना ही बवासीर (पाइल्स) की समस्या कहलाती है। आयुर्वेद में इसे अर्श कहते हैं।

पाइल्स के अंदरुनी प्रकार
मलद्वार के अंदर होने के कारण कई बार रोग का पता नहीं चलता। इसकी चार स्टेज हैं-
पहली: इसमें गुदा के अंदर रक्त नलिकाओं में सिर्फ थोड़ी सूजन होती है। कभी- कभार कब्ज या अन्य किसी कारण से मलत्याग के समय दबाव डालने पर रक्त भी आता है।

दूसरी: इसमें सूजन थोड़ी ज्यादा व दर्द होता है। मलत्याग के समय मस्से बाहर आ जाते हैं जो स्वत: अंदर भी चले जाते हैं।

तीसरी: इस स्टेज में सूजन अधिक होती है और मलत्याग के समय खून अधिक आता है व मस्से बाहर आ जाते हैं जिन्हें अंगुली की मदद से अंदर करना पड़ता है।

चौथी: दर्द अधिक और मल त्याग के समय मस्से बाहर आ जाते हैं जो अंदर नहीं जाते।

बाहरी
मलद्वार के आसपास उसकी बाहरी परत पर छोटी-छोटी गांठें रहती हैं। कभी-कभी इनमें रक्त जमने से असहनीय दर्द होता है। ऐसे में लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए और डॉक्टरी सलाह लेनी चाहिए।

आयुर्वेद उपचार
- पाइल्स की पहली व दूसरी स्टेज में इन घरेलू दवाओं से इलाज करते हैं।
- मक्खन से निकली छाछ 4 लीटर, भुना जीरा पाउडर 50 ग्राम और थोड़ा नमक मिलाकर दिन में कई बार ले सकते हैं। 4 -5 दिन में काफी राहत मिलेगी।
- 10 ग्रा. किशमिश रात को पानी में भिगोएं। सुबह मसलकर उसका पानी 7-10 दिन तक पीएं।
- बकायन, निंबोली, हरड़ और रसौंत का चूर्ण एक माह तक लेना फायदेमंद है।
- नारियल की जटा का जला हुआ बुरादा एक चम्मच छाछ या मक्खन के साथ सुबह भूखे पेट 5-7 दिन तक लें।
- एलोवेरा, आंवला व त्रिफला जूस पीएं।
- इन उपायों के अलावा अग्नि कर्म चिकित्सा का प्रयोग भी करते हैं। इसमें विशेष अग्निकर्म के द्वारा बाहरी या छोटे पाइल्स वाले भाग को जलाते हैं।



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Tuesday, 26 November 2019

खानपान संतुलित रखें, जानें इसके फायदे

सुबह उठने के बाद सबसे पहले एक से दो गिलास गुनगुना पानी पीएं। रिफ्रेश होकर भीगे बादाम और अखरोट खाएं। सुबह उठने के 2-3 घंटे के अंदर कम वसा युक्त दूध के साथ उपमा, दलिया, इडली ब्रेकफास्ट लें। दोपहर से पहले मौसमी फू्रट, नारियल पानी लें। हर 2 माह में खाद्य तेल बदलें। लंच में सलाद, चपाती, दही, 2 कटोरी सब्जी, अंकुरित बीन्स व डिनर में वेजिटेबल सूप, चपाती ले सकते हैं। करी पत्ता, लहसुन, अदरक, राई, एवोकैडो, नट व चिया सीड हृदय के लिए सेहतमंद माने जाते हैं।

आयुर्वेद में आहार : चिकनाई युक्त व पचने में भारी से परहेज करें। सुबह-शाम अर्जुन की छाल का काढ़ा पीएं। नियमित शहद, लौकी का जूस, आंवला, कच्चा लहसुन, अश्वगंधा, गुग्गल, दूध के साथ अश्वगंधा चूर्ण या दूध में लहसुन उबालकर पीने से हृदय संबंधी तकलीफ में आराम मिल सकता है।

लाफिंग थैरेपी से हार्ट मजबूत : इससे हृदय का व्यायाम होता है। एंडोर्फिन रसायन निकलने से हृदय मजबूत बनता है। रात में लाफिंग थैरेपी से शुगर लेवल में भी फायदा मिल सकता है।



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तेजी से घटते वजन को न करें अनदेखा, सेहत काे हाे सकते हैं ये नुकसान

Rapid weight loss : स्वस्थ इंसान के वजन का निर्धारण उसके भोजन, उम्र, लंबाई आदि के आधार पर किया जाता है। अक्सर कई वजहों से वजन घटता-बढ़ता रहता है। लेकिन अगर ठीक खान-पान के बावजूद और बिना कोई कोशिश किए तेजी से वजन कम हो रहा है तो मामला गंभीर हो सकता है। खासतौर पर अगर छह महीने में पांच फीसदी से ज्यादा या फिर पांच किलो तक वजन कम हो गया हो तो फिर ये किसी गंभीर बीमारी का लक्षण हो सकता है।

डायबिटीज की आशंका ( diabetes )
अगर आपको बार-बार प्यास और भूख लगती है, शरीर भी थका-थका रहता है। पेशाब के लिए बार-बार जाना पड़ता है। तेजी से वजन भी घट रहा है तो आप डायबिटीज की समस्या से पीडि़त हो सकते हैं। इस बीमारी में ब्लड शुगर को शरीर ग्रहण नहीं कर पाता और यह शुगर पेशाब के जरिए शरीर से बाहर निकल आता है। इस क्रिया में काफी ऊर्जा खर्च होती है। जिससे वजन गिरने लग जाता है।

हाइपोथाइरॉयड के संकेत ( Hypothyroid )
कई बार हाइपोथाइरॉयड के मरीजों का वजन भी तेजी से गिरता है। थकान, सिरदर्द, बार-बार भूख लगना, ध्यान केंद्रित करने में परेशानी जैसे लक्षणों के साथ अगर तेजी से वजन भी गिर रहा हो तो ये हाइपोथाइरॉयड का लक्षण हो सकता है। हालांकि हाइपोथाइरॉयड के मरीजों में कई बार उल्टा भी होता है। यानी उनका वजन तेजी से बढ़ता है।

तनाव होना ( Stress )
कई बार तनाव की दशा में इंसान को भूख कम लगती है। कम खाने की वजह से शरीर को जरूरी ईंधन नहीं मिल पाता। ऐसे में शरीर में जमा फैट टूटकर ग्लूकोज में बदलता है और शरीर इसे ईंधन के रूप में इस्तेमाल करता है। इस वजह से भी वजन कम होने लग जाता है।

कैंसर होना ( cancer )
कैंसर के एक तिहाई मामलों में खासकर ज्यादा उम्र वालों में वजन तेजी से घटता है। इसकी वजह है कि कैंसर कोशिकाएं तेजी से बढ़ती है और इसके लिए उन्हें भारी मात्रा में ऊर्जा की जरूरत होती है।

मानसिक रूप से अस्वस्थ ( Mentally Unfit )
तेजी से वजन कम होने की वजहों में मानसिक रूप से कमजोर होना भी है। यदि कोई व्यक्ति मानसिक रूप से परेशान है या फिर उसका इलाज चल रहा हो तो भी ऐसे व्यक्ति का वजन तेजी से बढऩे लगता है या फिर गिरने लगता है।

आंतों की बीमारी ( intestine diseases )
कई बार पेट और आंत संबंधी बीमारियों में शरीर भोजन को पूरी तरह से ग्रहण नहीं कर पाता और जो भोजन शरीर में जाता भी है उसका प्रयोग जरूरत के मुताबिक नहीं हो पाता इसलिए तेजी से वजन घटता है।

किसी काम का दबाव होना ( Workload )
कई मामलों में दबाव या प्रेशर भी वजन गिरने का कारण बनते हैं। बुरे हालात या मुश्किलों में भी इंसान कम वजन की चपेट में आ जाता है। जब हम कम खाना खाते हैं तो शरीर को संपूर्ण कैलारी व ऊर्जा नहीं मिल पाती, ऐसे में पोषक तत्वों के अभाव से हमारी प्रतिरोधात्मक क्षमता कम हो जाती है। इसके अलावा लिवर या दिल की समस्याओं के कारण भी वजन कम हो सकता है। इसलिए जब भी वजन कम हो तो इसे नजरअंदाज मत कीजिए।



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ज्यादा खाने से नहीं, न्यूट्रिशन डाइट से बनती है सेहत

Nutrition Diet: स्वस्थ रहने के लिए शरीर को पोषक तत्वों की जरूरत होती है, जबकि लोग सोचते हैं कि ज्यादा खाने से इंसान स्वस्थ रह सकता है। ज्यादा खाने की बजाय सही खाना ज्यादा जरूरी है। आपको पता होना चाहिए कि क्या खाना सेहत के लिए सही होता है और क्या नुकसान दायक।

घेर लेंगी कई बीमारियां
आज के जमाने में सेहत को भरपेट भोजन से जोड़कर देखा जाता है, जबकि यह सच नहीं है। कुछ लोग दिनभर कुछ न कुछ खाते रहते हैं पर वे स्वस्थ नहीं रह पाते। ऐसा इसलिए है कि वे शरीर की जरूरत को ध्यान में रखे बिना बस खाते रहते हैं। उन्हें पता ही नहीं होता और वे बीमारियों को बुला लेते हैं। कम खाने से कोई नुकसान नहीं होता और ज्यादा खाने से आपकी सेहत खराब हो सकती है, पाचन तंत्र बिगड़ सकता है, मोटापा हो सकता है। इसलिए जरूरत से ज्यादा खाने की कोशिश न करें।


पेट में रखिए थोड़ी जगह
आपको जरूरत से ज्यादा खाने की बजाय जरूरत से कम खाने का प्रयास करना चाहिए। खाइए कम और तरल पदार्थों का ज्यादा सेवन कीजिए। आपको पानी, दूध और छाछ जैसी पदार्थों को भोजन में शामिल करना चाहिए। पेट को फुल करने की बजाय उसमें थोड़ी जगह बचनी चाहिए। अगर आप स्वाद के चक्कर में ठूंस-ठूंसकर खा लेंगे तो आप बाद में परेशान होंगे। आजकल स्नैक्स, कोल्ड ड्रिंक्स और पिज्जा-बर्गर के कारण भूख का तो पता ही नहीं लगता है और शरीर बीमारियों का घर बनता जाता है। इसकी बजाय आपको खाद्य पदार्थों में मौजूद पोषक तत्वों की जानकारी रखनी चाहिए और उसी के मुताबिक अपनी डाइट तय करनी चाहिए। इससे आपकी सेहत को ही फायदा होगा।

आलस्य छोड़ मेहनत करें
कुछ लोग स्वाद के चक्कर में दिनभर तरह-तरह की चीजें खाते रहते हैं। इसकी बजाय सुबह के नाश्ते, दिन के भोजन और रात्रि के आहार के बारे में एक निश्चित योजना बनानी चाहिए। दोपहर में हल्का-फुल्का खा सकते हैं, पर हर बार खाने को मिले तो पेट को फुल करना जरूरी नहीं है। अगर आप पेट को फुल करने में लगे रहेंगे तो शरीर की पाचन क्षमता कम होने लगेगी। अगर आप खाते रहेंगे और कड़ी मेहनत नहीं करेंगे तो आपको कई परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। अगर कोई स्वादिष्ट व्यंजन सामने रखे तो मना करना सीखिए, वरना आपकी सेहत खराब हाे सकती है।



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होम्योपैथी से भी हो सकता है गर्दन के दर्द का इलाज

सर्वाइकल स्पांडिलाइसिस की तकलीफ से लोग परेशान हैं। विशेषकर ऐसे लोग जो ज्यादा डेस्क वर्क करते हैं। वैसे तो यह आम समस्या है, लेकिन कुछ परिस्थितियों में यह गंभीर रूप भी ले सकती है। यह समस्या स्त्री-पुरुष दोनों को हो सकती है। 40 वर्ष की उम्र के बाद लगभग 60 प्रतिशत लोग इस बीमारी की गिरफ्त में आ जाते हैं लेकिन आजकल बच्चों से लेकर युवा इसकी चपेट में आ रहे हैं। बच्चों के गलत ढंग से बैठने, लेटकर टीवी देखने या बिस्तर पर लेटकर पढ़ने से लेकर खाने तक की आदत बन रही है।

बैठने का सही तरीका -
गर्दन के दर्द को अनदेखा ना करें, डॉक्टर की बिना परामर्श के एक्सरसाइज या इलाज ना करें, बॉडी का पोश्चर ठीक रखें। नियमित व्यायाम और योग कर शारीरिक रूप से सक्रिय रहें। विशेषज्ञ से बैठने का सही तरीका जान लें। लम्बे समय तक डेस्क वर्क और बिना ब्रेक के काम करने से भी सवाईकल स्पांडिलाइसिस हो सकता है। गलत तरीके से तकिया लगाने से भी दिक्कत होती है। गर्दन, बाजू व रीड की हड्डी में दर्द इसके प्रारम्भिक लक्षण होते हैं। डॉक्टर की परामर्श से राहत मिल सकती है।



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विटामिन डी, क्याें है हमारे लिए जरूरी, क्या है इसका काम, जानें यहां

Vitamin D deficiency: विटामिन डी की हमारे शरीर के लिए बेहद आवश्यक पाेषक तत्व है। यह शरीर में कैल्शियम के अवशोषण को बढ़ाकर हड्डियों को मजबूत व स्वस्थ रखता है। पर्याप्त विटामिन डी के बिना, शरीर केवल 10% से 15% डाइटरी कैल्शियम को अवशोषित कर सकता है, जबकि शरीर में 30% से 40% कैल्शियम का अवशोषण हड्डियों को मजबूत बनाएं रखने के लिए जरूरी है। विटामिन डी की कमी से बच्चों में रिकेट नामक हड्डी की बीमारी हो जाती है, यह तो आपने खूब सुना है लेकिन विटामिन डी की कमी से कई और बीमारियां हो सकती हैं। जाहिर है विटामिन डी के सेवन के ढेर सारे फायदे हैं। आइए जानते हैं विटामिन डी के फायदाें के बारे में :-

मसल्स फाइबर की ग्रोथ
विशेषज्ञाें के अनुसार कर्इ रिसर्च से पता चलता है कि गर्मियों में एथलीटों के परफॉर्मेंस सर्दियों की तुलना में काफी बेहतर होते हैं। विटामिन डी मसल्स फाइबर की ग्रोथ को स्टीमुलेट करता है। रक्त में इसके उच्च स्तर से संतुलन और प्रतिक्रिया की टाइमिंग भी इम्प्रूव होती है।

बीमारियों से सुरक्षा
वैज्ञानिकों को कई ऐसे प्रमाण मिले रहे हैं कि विटामिन डी के उच्च स्तर की मौजूदगी से जीवन में आगे चलकर डायबिटीज और हार्ट डिजीज जैसी जानलेवा बीमारियों से काफी हद तक सुरक्षा मिल सकती है। बीते साल टाइप-2 डायबिटीज के 90 मरीजों पर किए गए एक खास अध्ययन के अनुसार विटामिन डी वाला योगर्ट पीने वाले मरीजों में ब्लड शूगर व वजन सामान्य योगर्ट पीने वाले लोगों की तुलना में जल्दी कंट्रोल हुआ।

कहां मिलेगा विटामिन डी
वैसे तो सूर्य का प्रकाश विटामिन डी का आदर्श स्रोत है, लेकिन भारत में कुपोषण एवं सूर्य की रोशनी में पर्याप्त एक्जपोजर न होने से लोगों में इसकी कमी हो रही है। नियमित रूप से इसकी रेकमंडेड डोज लेने (10 से 20 माइक्रोग्राम) के लिए भोजन में दही, चीज, मछली, अंडे, मशरूम और फोर्टीफाइड अनाज शामिल करने चाहिए।

दर्द से राहत
एक अन्य अध्ययन से पता चला है कि विटामिन डी के अच्छे स्तर से धमनियों में कड़ापन आने की आशंका कम हो जाती है, जिससे हृदय रोग की संभावना घटती है।



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ये सुपरफूड खाएंगे तो बीमारियों से बचे रहेंगे, जानें इसके बारे में

सुंदर दिखने के लिए नौजवान क्या नहीं करते, जिम जाने, डायट का ध्यान रखते हैं। स्लिम रहने के लिए लड़कियां ही नहीं गृहणियां भी तरह-तरह के फूड आजमाती है।

किनुआ: दक्षिण अमरीका से किनुआ आयात होता है। अमरीका में इसे सभी अनाजों की मां कहा जाता है। यह धान से छोटे आकार का होता है। इसके छिलके के नीचे चावल जैसा एक अन्न होता है जिसे उबालकर खाया जाता है। इसमें वसा और ग्लूटन नहीं होते। इसके अलावा इसमें प्रोटीन, फाइबर, विटामिन, मैग्नीशियम, फॉसफोरस, आयरन और जस्ता भी होता है।

बेरीज: स्ट्राबेरी, ब्लूबेरी, कै्रनबेरी स्वास्थ्यवर्धक होती है। यह मैगनीज, विटामिन सी, विटामिन के और फाइबर से भरपूर है। डायबिटिज व वजन घटाने में फायदेमंद है। इसमें ऐंटीऑक्सिडेंट होते हैं, जिससे त्वचा निखरती है। यह कैंसर व हृदय रोगियों के लिए लाभदायक है।

नट्स: बादाम, अखरोट, पिस्ता, काजू में कई तरह के गुण होते हैं। बादाम खाने से याद्दाश्त बढ़ाती है। इनसे ब्लड प्रेशर भी सामान्य रहता है। इनमें विटामिन ई, विटामिन बी2, फोलेट, मैंगनीज तथा अन्य तरह के खनिज होते हैं।

बीन्स: ये प्रोटीन से भरपूर होते हैं और इनमें फैट नहीं होता। ये ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करते हैं तथा ट्राईग्लाइसराइड को घटाते हैं। इनमें पोटाशियम, आयरन और फॉसफोरस व ओमेगा फैट्टी एसिड भी होता है।

ग्रीन टी: इसमें ऐंटीऑक्सिडेंट होता है जो शरीर से जहरीले पदार्थों को बाहर निकालता है। यह कोलेस्ट्रल घटाने में मदद करता है। इसके सेवन से भूख कम लगती है।

ब्रॉकली : एक तरह की सब्जी है जो स्वास्थ्यवर्धक तो है ही, वजन भी नियंत्रित रखती है। इसमें कई तरह के विटामिन और खनिज होते हैं जो बीमारियों से बचाव करते हैं। यह कैंसर रोधी है। इसमें पोलिक एसिड भी है जो रक्त की कमी को दूर करता है।



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जानिए एक्यूट व क्रोनिक दर्द के बारे में, किससे कराना चाहिए इलाज

व्यस्त दिनचर्या के कारण लोग थकान व दर्द से परेशान हैं। इस कारण ऑफिस, घर और दैनिक क्रियाकलाप प्रभावित होता है। इसके लिए अक्सर पेन किलर टैबलेट, पेन रिलीफ क्रीम आदि का प्रयोग करते हैं। रीढ़ की हड्डी में पेसमेकर जैसा यंत्र लगाकर दर्द दूर करते हैं। स्पाइनल कॉर्ड का इलाज भी किया जाता है। इसके लिए चिकित्सकीय परामर्श लें। दर्द की जांच और इलाज के कुछ दिनों के बाद भी यदि वापस दिक्कत होती है या लंबे समय तक दर्द बना रहता है तो पेन फिजीशियन के पास जाते हैं।

दर्द क्यों होता : दर्द शरीर का सबसे महत्वपूर्ण संवेदन है। यह नर्व सिस्टम से जुड़ा होता है। हड्डियों, जोड़ों, स्किन, मांसपेशियों में दर्द के संवेदन के लिए फाइबर्स होते हैं। चोट लगने या पुरानी चोट की वजह से दर्द होता है।

दो तरह का होता दर्द-
एक्यूट पेन : चोट लगने व बीमारी से होने वाले दर्द को कहते हैं। यह कुछ समय बाद स्वत: या इलाज से ठीक हो जाता है। एक्यूट पेन क्रोनिक पेन में बदल सकता है।

क्रोनिक पेन : यह किसी पुरानी चोट के कारण होता है। इलाज के बाद दर्द शुरू होता है। कई बार चोट लगने के कारण लंबे समय तक दर्द बंद नहीं होता है।

जांचों से पता करते दर्द की जड़ : एक्यूट पेन के लक्षण के आधार पर संबंधित डॉक्टर के पास जाते हैं। यदि कुछ समय बाद वापस दर्द होता है तो पेन फिजीशियन के पास जाएं। वो सीटी स्कैन, एमआरआई, सोनोग्राफी और सियाम (विशेष प्रकार की एक्सरे जांच) जांच करते हैं।

दो तरह से करते इलाज-
मरीज का इलाज डायग्रोस्टिक और थैरेपेस्टिक होता है। ज्यादातर मरीजों को भर्ती करने की जरूरत नहीं पड़ती है। ओपीडी के आधार पर इलाज किया जाता है। इसमें आधे घंटे से एक घंटे का समय लगता है। इलाज के दौरान एनेस्थीसिया देते हैं। इसमें सर्जिकल रिस्क नहीं होता है। लेजर, इलेक्ट्रोमैग्रेटिक थैरेपी से इलाज होता है।

गर्भावस्था में दर्द की शिकायत -
गर्भावस्था में महिलाओं का वजन 10 से 12 किग्रा तक बढ़ता है। महिलाओं को गर्दन व कमर दर्द बढ़ जाता है। आराम न मिलने पर पेन फिजीशियन की परामर्श लें।

दर्द के कारण -
दर्द चार प्रमुख कारणों से होता है-
बैक पेन स्पाइन से संबंधित, गर्दन, कमर के निचले हिस्से में दर्द होता है। स्लिप्ड ***** के कारण भी दर्द होता है।
शरीर के हिस्सों में छूने से दर्द होता है। इसमें सिरदर्द, माइग्रेन और चेहरे के हिस्सों को छूने से भी दर्द होता है। कई बार सर्द हवा के कारण भी होता है। हाथ-पैरों में जकड़न रहती है।
कैंसर की वजह से भी दर्द होता है। दवा के बाद भी आराम नहीं मिलता है। कैंसर के 70-80 प्रतिशत मरीजों को कैंसर की वजह से ही दर्द होता है। सिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम की वजह से कोई अंग नीला, लाल पड़ता है। छूने अथवा हवा से भी दर्द होता है।

ऐसे बचेंगे दर्द से -
जीवनशैली और खानपान में सुधार करें।
वजन नियंत्रित रखें। प्रोटीनयुक्त आहार लें
ऑफिस में 15 मिनट में 2 मिनट और 45 मिनट में पांच मिनट का बे्रक लें।
एक ही मुद्रा में लंबे समय तक न बैठें।



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वजन घटाने के साथ मेटाबॉलिज्म बूस्ट करता है आंवला

Amla For weight loss : औषधीय गुणाें से भरपूर आंवला हमारी सेहत बनाए रखने के लिए बेहद उपयाेगी है। इसका सेवन कर्इ तरह के स्वास्थ लाभ प्रदान करता है। आंवले के सेवन से असमय बाल सफेद हाेने, बाल झड़ने जैसी समस्याएं नहीं हाेती, इसमें प्रचूर मात्रा में विटामिन सी, एंटीऑक्सिडेंट, पॉलीफेनोल्स जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं जो जल्दी बुढ़ापा नहीं आने देने के साथ इम्युनिटी सिस्टम काे भी मजबूत बनाते है। यदि आपका वजन बढ़ा हुआ है आैर माेटापा कम करने के सभी उपाय कर चुके हैं, लेकिन सफलता हासिल नहीं हुर्इ है ताे आंवला आपकी के लिए मददगार हाे सकता है। क्याेंकि आंवले में पाए जाने वाले पाेषक तत्व माेटापे काे घटाने में कारगर हाेते हैं। आइए जानते माेटापा घटाने के लिए आंवला का प्रयाेग कैसे करें :-

वजन घटाने के साथ मेटाबॉलिज्म बूस्ट करता है आंवला
आंवला में पाया जाने वाला विटामिन सी आपके शरीर से विषाक्त पदार्थ बाहर निकालने के साथ के साथ मेटाबॉलिज्म को बढ़ावा देता है। इसके अलावा, इसमें हाइपोलिपिडेमिक गुण भी होते हैं जो फैटी लिवर और कोलेस्ट्रॉल से जुड़े लक्षणों से लड़ते हैं और मोटापे को रोकने और आपके शरीर के वजन को बेहतर ढंग से प्रबंधित करने की दिशा में काम करते हैं।

Detox के लिए भी अच्छा है
फाइबर सामग्री से भरपूर आंवला शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने, पाचन को नियंत्रित करने, पेट को ठीक रखने और कब्ज से लड़ने में मददगार होता है। इससे आपको वजन तेजी से कम करने में मदद मिलती है। इसके अलावा, आंवला शरीर में रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करके मधुमेह-प्रेरित वजन बढ़ने से जुड़े लक्षणों से लड़ने के लिए भी अच्छा है।

इस्तेमाल कैसे करें
वजन कम करने के लिए 2-3 चम्मच आंवले का रस या पाउडर, पानी में मिलाकर प्रतिदिन सुबह खाली पेट सेवन करने से जल्द की मोटापा कम होता है।



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