Thursday, 31 October 2019

Stay Young: ओल्ड एज में थकान को यूं करें बाय-बाय

Stay Healthy: घर के बुजुर्ग अक्सर थकान की शिकायत करते हैं या कहीं आने-जाने में आनाकानी करते हैं तो हमें बुरा लगता है। लेकिन यह सच यह है कि अधिक उम्र होने पर खान-पान में लापरवाही की वजह से उनका एनर्जी लेवल काफी कम हो जाता है। वह थकने लगते हैं। कुछ उपाय अपनाकर उनका एनर्जी लेवल बढ़ाया जा सकता है -

इसलिए आते हैं बदलाव
फिजिकल एक्टीविटी में कमी आने से अक्सर बुजुर्ग सोचते हैं कि अब उन्हें पहले से कम कैलोरी की जरूरत है। इसलिए भोजन में कटौती कर देते हैं। सच यह है कि उन्हें सेहत को दुरुस्त रखने के लिए संतुलित आहार के साथ पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन की भी जरूरत होती है। फिजिकल एक्टीविटी में कमी से बुजुर्गों को रात में ठीक से नींद नहीं आती है। वे दिन भर सुस्ती और थकान महसूस करते हैं। दोपहर में उन्हें अक्सर झपकी आने की शिकायत होने लगती है।

फिजिकल एक्टिीविटी बढ़ाएं
- भोजन में कटौती की बजाय मॉर्निंग वॉक के साथ हल्का व्यायाम करें। बागवानी में समय बिताएं। घरेलू सामानों की खरीद-फरोख्त के लिए बाहर जाएं।

- दालें, हरी सब्जी, दही, सहित सभी पोषक तत्वों को अपने खानपान में शामिल करें। तला-भुना खाने से परहेज करें। ड्राइफ्रूट्स, फल और जूस आदि लें।

- भोजन में कार्बोहाइड्रेट की समुचित मात्रा शामिल करें, जो ऊर्जा देने का काम करता है। बिना डॉक्टरी सलाह दवा न लें। बच्चों के साथ इंडोर गेम्स खेलना चाहिए।

- बढ़ती हुई उम्र के साथ न्यूट्रिशनल डेफिशिएंसी बढ़ जाती है। संतुलित आहार की जरूरत होती है। हाई प्रोटीन डाइट लेनी जरूरी है।

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गुणों की खान है शहद, अनिद्रा दूर कर लाता त्वचा में निखार

Health Benefits Of Honey: गुणों से भरपूर मीठा शहद स्वास्थ्य और दवाइयों के रूप में भी काम में लिया जाता है। शहद ऊर्जा बढ़ाने के साथ अनिद्रा, पाचन, मधुमेह और वजन घटाने में फायदेमंद है। शहद का इस्तेमाल त्वचा और बालों की देखभाल के लिए भी किया जाता है। रोजाना सुबह खाली पेट गुनगुने पानी में नींबू और शहद मिलाकर पीने से शरीर से विषाक्त पदार्थ बाहर निकलते हैं।

पोषक तत्त्व
शहद में एंटी ऑक्सिडेंट्स होते हैं। मोनोसेकेराइड, फ्रुक्टोज, लोहा, फॉस्फेट, कैल्शियम, सोडियम, पोटैशियम, क्लोरीन, मैग्नीशियम, ग्लूकोज और विटामिन बी1, बी2, बी3, बी5,और बी6 पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। इसमें एंटीसेप्टिक और जीवाणुरोधी गुण भी होते हैं।

इस्तेमाल
अदरक के रस में शहद मिलाकर लेने से खांसी में, पके आम के रस में लेने से पीलिया, पोदीने के रस के साथ लेने से उल्टी में आराम मिलता है।

फायदे
एसिडिटी, कब्ज, त्वचा, आंखों और पीलिया संबंधी रोगों में फायदेमंद है। पेट दर्द में एक चम्मच शहद के साथ आधा चम्मच दालचीनी पाउडर को एक गिलास गर्म पानी में मिलाकर इसका उपयोग फायदेमंद है। त्वचा को मॉइस्चराइज करने, झुर्रियों को रोकने में शहद का उपयोग लाभकारी है।

ध्यान रखें : गर्म पानी, गर्म दूध में शहद का उपयोग न करें। शहद-घी की समान मात्रा प्रयोग विष की तरह काम करता है। एलर्जी होने पर बिना डॉक्टर की सलाह के उपयोग न करें।

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रोटा एबलेशन तकनीक से दूर हाेती है हार्ट ब्लॉकेज की समस्या

Rotablation: जिन मरीजों की नसों में अधिक कैल्शियम जमा होने और लंबे ब्लॅाकेज होने की वजह से एंजियोप्लास्टी नहीं हो पाती है, उन मरीजों में रोटा एबलेशन तकनीक कारगर है। इस तकनीक की खास बात यह है कि ये नसों से कैल्शियम के ब्लॉकेज को निकालकर एंजियोप्लास्टी करने का रास्ता खोलती है।

हृदय तक स्टेंट ले जाना मुश्किल
एंजियोग्राफी के बाद अधिकांश मामलों में एंजियोप्लास्टी की जरूरत पड़ती है। लेकिन मरीज की नसों में लम्बे ब्लॉकेज या कैल्शियम अधिक जमा होता है तो उस स्थिति में एंजियोप्लास्टी करते समय हृदय तक स्टेंट ले जाना मुश्किल होता है। ऐसे में रोटा एबलेशन तकनीक का प्रयोग कर बायपास सर्जरी से बचाते हैं।

यूं खोलते ब्लॉकेज
रोटा एबलेशन तकनीक का प्रयोग भी एंजियोप्लास्टी की तरह ही होता है। फर्क यह है कि एंजियोप्लास्टी में नस के अंदर जाने वाले वायर में बलून व स्टेंट लगा होता है। इस तकनीक में डायमंड के छर्रे वाली ड्रिल होती है जो तेज रफ्तार से घूमती है। डॉक्टर इसकी सहायता से नस में जमा कैल्शियम को हटा देते हैं। इस तरह नसों के लंबे ब्लॉक को पूरी तरह खोल दिया जाता है।

लोकेशन जानना अहम
जिन मरीजों की नसों में कैल्शियम जमा होता है या लम्बे ब्लॉकेज होते हैं। उनकी एंजियोप्लास्टी की बजाय बायपास सर्जरी की जाती थी लेकिन रोटा एबलेशन तकनीक आने के बाद से अधिकांश मामलों में बायपास सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ती है। ऐसे मरीजों में यह तकनीक कारगर है। हालांकि इसके लिए ब्लॉकेज कहां पर है काफी कुछ इसपर भी निर्भर करता है।

धूम्रपान से नसों में जमा होता कैल्शियम
सबसे ज्यादा केस 50-60 की उम्र में आते हैं। जो धूम्रपान करते हैं उनकी नसों में कैल्शियम जमा होने की आशंका होती है। बड़े ब्लॉकेज खोलने में रोटा एबलेशन तकनीक कारगर है।

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करेले का जूस मधुमेह और मोटापा घटाने में कारगर

Bitter Melon Benefits : करेला सब्जी, जूस, अचार और बीमारी में औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है। यह मधुमेह और वजन घटाने में काफी कारगर माना जाता है। गुणों से भरपूर करेला पित्त, कफ,रक्त विकार व यूरिन संबंधी बीमारियों में भी लाभदायक है। इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है।

पोषक तत्त्व :
करेले में एंटीऑक्सीडेंट, प्रोटीन, फाइबर, कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, आयरन, फॉस्फोरस, मैग्नीशियम, मैगनीज और विटामिन ए, बी और सी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।

प्रयोग : करेले का रस पीने से पथरी में लाभ मिलता है। करेले का जूस रोजाना सुबह आधा कप लेने से शुगर का स्तर नियंत्रित हो सकता है। करेले की जड़ का पेस्ट बवासीर की तकलीफ में लगाने से भी राहत मिलती है।

ये हैं फायदे : करेला खाने से कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित होने के साथ थकान, हृदय, सिर दर्द, पाचन, पीलिया, लिवर और त्वचा संबंधी रोगों में बेहद लाभकारी है। सुबह के समय 2 चम्मच करेले का जूस लेने से खून साफ करता है। स्किन संबंधी बीमारियों को दूर करने में मददगार है। शरीर के अंदर के विकार नष्ट हो जाते हैं।

सावधानी : गर्भवती को बिना डॉक्टरी सलाह के करेला नहीं खाना चाहिए। करेले के अधिक प्रयोग से पेट संबंधी दिक्कत हो सकती है। महिलाएं माहवारी के समय डॉक्टर की सलाह से करेले का जूस लें।

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जानिए, खून का कौन हिस्सा कब तक प्रयोग हो सकता

Blood Donation: जब कोई व्यक्ति रक्तदान करता है तो रक्त के एक - एक कतरे का प्रयोग करने के लिए ब्लड बैंक स्पेशलिस्ट व पैथोलॉजिस्ट की टीम बैग (450 एमएल) का वजन करती है। इसके बाद ब्लड को लैब में लगी सेंट्रीफ्यूज मशीन में डालते हैं जिससे प्लाज्मा और प्लेटलेट ऊपर की ओर आ जाता है। पैक्ड रेड ब्लड सेल्स (पीआरबीसी) नीचे की तरफ जाता है। किसी व्यक्ति को पूरा ब्लड चढ़ाया जाए तो ब्लड में मौजूद प्लाजमा और प्लेटलेट उसके काम का नहीं होता है।

रक्त में क्या-क्या :
किसी रोगी को हीमोग्लोबिन की कमी है तो पीआरबीसी चढ़ाते हैं। कार्डियक या बर्न रोगी को प्लाज्मा, प्लेटलेट काउंट कम होने पर प्लेटलेट्स चढ़ाए जाते हैं। पीआरबीसी को 42 दिनों तक, प्लेटलेट्स पांच दिन और प्लाज्मा एक साल तक रखे जा सकते हैं।

स्टोरेज टेंपरेचर अलग-अलग :
ब्लड कंपोनेंट पीआरबीसी को 2 से 8 डिग्री तो प्लाज्मा को माइनस 40 डिग्री, प्लेटलेट को 22 डिग्री सेल्सियस पर सुरक्षित रखते हैं। किसी को जरूरत होती है तो इन्हें 37 डिग्री सेल्सियस तापमान पर सामान्य करके दिया जाता है।

इसलिए कम करते ल्यूकोसाइट्स ब्लड कंपोनेंट को सेंट्रीफ्यूूज करते समय उसमें से ल्यूकोसाइट्स को कम कर देते हैं, जिससे मरीज को ब्लड चढ़ाते वक्त होने वाले रिएक्शन का कम किया जा सके।

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Healthy Teeth: ब्रिज व डेंचर से भी लगते हैं नए दांत

Healthy Teeth: तेजी से बदल रही लाइफस्टाइल और हादसों की वजह से दांत संबंधी तकलीफें बढ़ रही हैं। दांत चेहरे की खूबसूरती के साथ खानपान लिए भी जरूरी हैं। पर जब इनमें कोई खराबी आ जाती है या टूट जाते हैं दांत बदलवाने के लिए डेंटल इंप्लांट के अलावा ब्रिज या डेंचर तकनीक भी विकल्प हैं।

दूसरे दांत मजबूत तब लगा सकते हैं ब्रिज
दांत के गिरने या खराब होने पर उसके आगे-पीछे के दांत को छोटा कर ब्रिज लगाते हैं। इसके आसपास के दांतों को ग्राइंड कर नए दांत के लिए सपोर्ट तैयार कर ब्रिज दांत लगाते हैं। यह दांत असली जैसे ही काम करते हैं। ब्रिज तकनीक से ऊपर नीचे का दांत भी लग सकता है। ये प्रक्रिया तभी संभव है जब आगे पीछे और ऊपर नीचे के दांत मजबूत हों। ब्रीज से टूटे हुए दांत की विकृति को भी दूर किया जा सकता है।

दांत लगाने से पहले होती ये जांच
दांत लगाने से पहले रोगी की कोन बीन कंप्यूटराइज्ड टोमोग्राफी (सी.एम.सी.टी) जांच करवाते हैं। इससे देखते हैं कि रोगी को जो दांत लगना है उसका आकार यानि लंबाई, चौड़ाई और ऊंचाई का पता करते हैं। दांत लगाने के दौरान किन बातों का ध्यान रखना है जिससे प्रोसीजर के दौरान रोगी को कोई परेशानी न हो इसका पता भी करते हैं। प्रोसीजर से पहले रक्त की सभी जांचें करवाते हैं। हड्डी की स्थिति जानने के लिए एक्स-रे जांच भी कराई जाती है।

इन मरीजों में लगाते हैं डेंचर (बत्तीसी)
तंबाकू, पान मसाला और सिगरेट पीने वालों के दांत एक-एक कर खराब होने लगते हैं। तंबाकू और जर्दे की लत से मसूड़े कमजोर हो जाते हैं, जिससे दांत हिलने लगते हैं। इसके बाद एक-एक कर गिर जाते हैं। सभी दांत एकसाथ गिर गए हैं तो कंप्लीट डेंचर लगवाते हैं। इसमें पूरी बत्तीसी एकसाथ बदल जाती है। खाना खाने के बाद या सोते वक्त निकालना पड़ता है। राजस्थान के सरकारी डेंटल मेडिकल कॉलेज में वरिष्ठ नागरिकों को मुफ्त में डेंचर लगाने की सुविधा है।

ध्यान रखें
आर्टिफिशियल दांत की साफ-सफाई का खास खयाल रखें। रात के समय दांत निकालकर सोएं, जिससे मसूड़ों को पूरा आराम मिल सके।

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Wednesday, 30 October 2019

सेहतमंद रहने के लिए 7-8 घंटे नींद लेना क्यों जरूरी?

शरीर में आंतरिक मरम्मत का काम सोने के दौरान रात में होता है। जब हम गहरी नींद में होते हैं तो शरीर क्लीनिंग का कार्य करता है। इससे शरीर अगले दिन काम करने के लिए तैयार होता है। आप जिम या घर में मसल्स वर्कआउट करते हैं तो फिर उन्हें रिकवर और रिपेयर होने के लिए आराम देना भी जरूरी है। एक्सपर्ट कहते हैं कि इसलिए कम से कम 8 घंटे की नींद लेनी चाहिए और नियमित वर्कआउट में भी बदलाव करते रहना चाहिए।
भूख भी लगती है, पाचन तंत्र अच्छे से काम करता
अक्टूबर से मार्च तक मसल्स बनाने के लिए सबसे अच्छा समय होता है। इस दौरान भूख खूब लगती है। हाजमा अच्छा रहता है। ऊर्जा बनी रहती है। थकान नहीं लगती है। स्केलेटन मसल्स शरीर का सबसे एडोप्टेबल टिश्यू कहा जाता है।
इसलिए सर्दी होती है बेहतर
सर्दी में जैतून का तेल, पनीर, शहद, मूंगफली, आंवला, बेसन का लड्डू, अखरोट, चॉकलेट, छुहारे, किशमिश, च्यवनप्राश आदि डाइट में शामिल करें। आहार में काबुली चने, पनीर, टोफू, सोयाबीन, सोया मिल्क, विभिन्न फलियां व दालों को शामिल कर सकते हैं।

गतिविधि अनुसार लें प्रोटीन
मसल्स पॉवर बढ़ाने के लिए डाइट में प्रोटीन तय मात्रा में लेना चाहिए। सामान्यत: प्रति किलोग्राम वजन पर एक ग्राम प्रोटीन की जरूरत होती है। प्रोटीन की जरूरत व्यक्ति की गतिविधि और वजन के हिसाब से होती है। प्रोटीन को लेकर सर्टीफाइड हैल्थ कोच की मदद ले सकते हैं। एक्सपर्ट बताते हैं कि सामान्य डाइट में कार्बोहाइड्रेट व फैट की मात्रा ज्यादा होती है लेकिन मसल्स के लिए कार्बोहाइड्रेट व फैट की मात्रा संतुलित होनी चाहिए। प्रोटीन की मात्रा बढ़ानी होती है।
एक्सपर्ट : डॉ. ए.के. चौरसिया, न्यूरो सर्जन, भोपाल

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वायरल इंफेक्शन से भी हो सकती है रीढ़ की हड्डी में सूजन

Transverse Myelitis In Hindi: शरीर में स्पाइनल कॉर्ड की भूमिका अहम होती है। इससे पूरा शरीर कंट्रोल होता है। कई बार इसमें किसी बीमारी या अन्य समस्या के कारण चलना-फिरना बंद हो जाता है। इसमें ट्रांसवर्स माईलाइटिस भी एक प्रमुख बीमारी है। इस बीमारी के कारण स्पाइनल कॉर्ड के किसी भी हिस्से में सूजन आने से उसकी कार्यप्रणाली पूरी तरह से बाधित हो जाती है। मरीज दिव्यांग हो सकता है। उसका अपने यूरिन और स्टूल से नियंत्रण पूरी तरह खत्म हो जाता है।

टीबी के कारण भी होती बीमारी
ट्रांसवर्स माईलाइटिस ( Transverse Myelitis ) के होने का स्पष्ट कारण पता नहीं चला है। यह रीढ़ की हड्डी को क्षति पहुंचाने वाले वायरल इंफेक्शन और रीढ़ की हड्डी में ब्लड सप्लाई सही न होने से भी हो सकता है। कई वायरस जैसे मीजल्स (खसरा), छोटी चिकन पॉक्स वायरस, मल्टीपल स्केलेरोसिस, न्यूरोमालाइटिस ओपटिका, मम्स आदि से भी यह समस्या हो सकती है। दूसरा प्रमुख कारण टीबी है। टीबी के संक्रमण से रीढ़ की हड्डी में सूजन आने से ट्रांसवर्स मायलाइटिस का खतरा बढ़ जाता है। विटामिन बी-12 की कमी, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार में जंगली मटर की दाल से होने वाली लेथरियाजम से भी यह बीमारी हो सकती है। एचआईवी से पीडि़त मरीजों में भी इस बीमारी की आशंका अधिक रहती है।

पैरों में तेज दर्द है लक्षण
इसमें हाथ-पैरों में कमजोरी के साथ तेज दर्द होता है। धीरे-धीरे प्रभावी हिस्से में संवेदन की कमी आने लगती है। यूरिन से कंट्रोल खत्म हो जाता है। कमर से नीचे का हिस्सा काम नहीं करता है। बीमारी पैरों से शुरू होकर गर्दन तक पहुंच जाती है। वह हिस्सा अतिसंवेदनशील होता है कि अंगुली से छूने पर भी दर्द होता है। इस स्थिति को एंड्रोडाइनिया कहते हैं। इस बीमारी से शरीर के इस हिस्से में अतिसंवेदनशीलता के कारण त्वचा का तापमान परिवर्तित हो जाता है।

जांचें
इसमें एमआरआई टैस्ट ज्यादा कारगर है। जांच में देखा जाता है कि किस हिस्से में सूजन है। ब्लड टैस्ट से खून में विटामिन बी-12 की जांच होती है। इससे बचने के लिए नियमित व्यायाम करें। अपनी दिनचर्या सही रखें। पर्याप्त नींद लें। हरी पत्तेदार सब्जियां और मौसमी फल खूब खाएं। चीनी और नमक कम मात्रा में लें। तेल को गर्म करने के बाद से दोबारा इस्तेमाल करने से बचें। अगर नशा करते हैं तो छोड़ दें। तनाव से बचें। कोई दवा अपने मन से न लें।

इलाज
शुरुआती इलाज ज्यादा अहम होता है। इससे तंत्रिका तंत्र ठीक रहता है। इलाज के शुरू होने 2 से 12 हफ्तों में लाभ मिलता है। इलाज करीब दो साल चल सकता है। फिजियोथैरेपी से इसका दर्द कम करते हैं। अगर शुरू के 6 महीने में कोई सुधार नहीं होता है तो समस्या बढ़ सकती है। इसके लक्षण दिखते ही डॉक्टर से संपर्क करें।

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Milk Benefits: खाना खाने के इतनी देर बाद दूध पीने से मिलता है दाेगुना फायदा

Milk Benefits In Hindi: दूध एक सम्पूर्ण आहार है। शरीर को लगभग 30 से अधिक तत्त्वों की आवश्यकता होती है। अकेला दूध ही है जो इन सभी की पूर्ति करता है। इसको हर उम्र के लोग पी सकते हैं। आसानी से पचता भी है। खाने के एक घंटे बाद ही दूध लेना ठीक रहता है। मां के दूध के बाद गाय के ताजे दूध को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

किसको लेना चाहिए कितना दूध
दूध में प्रोटीन, कैल्शियम, राइबो-फ्लेविन, विटामिन बी-2, ए, डी, के और ई सहित फॉस्फोरस, मैग्नीशियम, आयोडीन भरपूर मात्रा में होता है। इसमें कई तरह के मिनरल्स, वसा और कार्बोहाइडे्रट होते हैं। गर्भवती महिलाएं 250 ग्राम से 1 लीटर, 5 साल तक के बच्चे 100-250 ग्राम, 5 से 10 वर्ष के बच्चे 250-500 ग्राम, व्यस्क व्यक्ति 500 ग्राम से 1 लीटर तक दूध रोज पी सकते हैं।

अच्छी नींद के लिए डिनर के बाद लें दूध
ताजा दूध गर्म करके पीना अमृत की तरह होता है। रात में डिनर के एक घंटे बाद दूध लेना अधिक फायदेमंद है। इस समय दूध लेने से अच्छी नींद आती हैं और पाचन सही रहता है। पाचन में दिक्कत, दस्त, दमा, बुखार, सर्दी-जुकाम, सिरदर्द, निमोनिया मेनिनजाइटिस में दूध से परहेज करें। दूध के साथ खट्टी चीजें आचार, फल, दही, छाछ, जूस, नमकीन प्याज और लहसुन का इस्तेमाल न करें।

याद्दाश्त बढ़ाता है गाय का दूध
नवजात शिशु के लिए मां का दूध पर्याप्त होता है। एक साल से अधिक उम्र के बच्चों एवं गर्भवती के लिए गाय का दूध, वजन बढ़ाने और अच्छी नींद के लिए भैंस का दूध, पेट की बीमारी के लिए ऊंटनी का दूध, टीबी में बकरी का दूध और याद्दाश्त व आंखों की रोशनी बढ़ाने के लिए गाय का दूध फायदेमंद रहता है।

दूध के औषधीय गुण
गर्मी में दूध शक्कर मिलाकर गर्म करें। फिर ठंडा करने के बाद पाचन शक्ति के अनुसार ले सकते हैं। दूध और चावल की खीर बनाकर लेने से गर्मी में राहत मिलती है। ड्राइफ्रूट्स जैसे बादाम, काजू आदि भी मिलाकर ले सकते हैं। इस मौसम में दूध में पीपली, अदरक, सौंठ न मिलाएं। इससे गर्मी बढ़ेगी। हृदय रोग या कैल्शियम संबंधी परेशानी में दूध को अर्जुन की छाल के साथ उबालकर क्षीरपाक बनाकर लें। त्वचा पर निखार लाने के लिए भी दूध का इस्तेमाल किया जाता है।

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Stay Healthy Tips: इन 5 तरीकों से मिलेगी कब्ज से राहत, पाचनतंत्र हाेगा मजबूत

Stay Healthy Tips: देश की एक चौथाई वयस्क आबादी कब्ज (कॉन्सटिपेशन) से परेशान है। इसकी वजह खराब लाइफ स्टाइल, नशे की लत और फिजिकल एक्सरसाइज का अभाव है। डॉक्टर्स की मानें तो पहले की तुलना में खानपान बदल गया है जिससे पेट में मौजूद अच्छे किटाणु मर जाते हैं और कब्ज होती है। साथ ही अन्य समस्याएं भी हैं जिनको नजरअंदाज करने से यह परेशानी होती है। जानते हैं उन 5 तरीकों के बारे में जिन्हें अपनाकर कब्ज से राहत पा सकते हैं।

1. हर घंटे में पीएं एक गिलास पानी
अपच/कब्ज की समस्या है तो ज्यादा पानी पीएं। हर एक घंटे में एक गिलास पानी अवश्य पीएं। अगर आपका वजन ज्यादा नहीं है तो मिश्री और सौंफ मिलाकर लें। इससे जल्द डकार आती है और स्वाद अच्छा रहता है। पानी में नमक, चीनी और भुना जीरा मिलाकर लेना भी ठीक रहता है। पीपली, नमक को नींबू पर लगाकर चूसने से भी कब्ज में आराम मिलता है। भुनी हुई अजवायन को सेंधा नमक के साथ मिलाकर लेने से पाचन संबंधी समस्या में आराम मिलता है।

2. सुबह उठते ही पीएं दो गिलास पानी
सुुबह उठने के बाद समय से फ्रेश होने जाएं। इसको टालते हैं तो इससे धीरे-धीरे कब्ज होने लगती है। इससे बचने के लिए सुबह उठते ही 2-3 गिलास पानी पीएं। इससे बड़ी आंत पर दबाव पड़ेगा और पेट आसानी से साफ होगा। अगर पानी गुनगुना हो तो ज्यादा अच्छा रहता है। जब भी महसूस होता है कि फ्रेश होना है तो उस समय दूसरा काम न करें क्योंकि तब आंतें अधिक सक्रिय रहती हैं।

3. भरपूर मात्रा में ले फायबर डाइट
पेट के लिए फायबर डाइट बहुत जरूरी है। यह आंतों का संकुचन करने में सहायक होती है। इसके लिए जौ, चना और गेंहू की रोटी खाएं। चोकर और बेजड़ की रोटियां ही खाएं। रिफाइंड या मैदे की रोटी न खाएं। हरी पत्तेदार सब्जियों में भी फायबर ज्यादा होता है। फलों का छिलका हटाकर न खाएं। छिलका हटाने से फायबर की मात्रा कम हो जाती है। फायबर युक्त दलिया नाश्ते में जरूर शामिल करें।

4. 100 ग्राम चना रोज खाएं
चना पेट के लिए बहुत अच्छा होता है। गर्मी में इसको भूनकर या सत्तु बनाकर लेना चाहिए। अपच में भी इसको ले सकते हैं। 100 ग्राम चना रोजाना खाना चाहिए। इसमें भरपूर मात्रा में प्रोटीन और कैलोरी होती है। इससे शरीर को पर्याप्त मात्रा में ऊर्जा भी मिलती है। इससे कब्ज में भी तत्काल आराम मिलता है।

5. 7 घंटे की नींद जरूरी
कब्ज से बचने के लिए अच्छी नींद जरूरी है। रोजाना कम से कम 7 घंटे की नींद समय से लें। सुबह जल्दी उठें। देरी से उठने परे व्यायाम नहीं हो पाता है। इससे भी कब्ज होती है। तनाव से भी कब्ज होता है। इसलिए ऐसा काम करें जिससे तनाव न हो। अगर नशा करते हैं तो तत्काल छोड़ दें। इससे भी हाजमा बिगड़ता है।

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इस तरह खाएंगे तो कभी नहीं बढ़ेगा मोटापा

जब बात शरीर को हैल्दी रखने की आती है तो उसमें हमारी ईटिंग हैबिट्स का बहुत बड़ा हाथ होता है। ऐसे में फिट और हैल्दी रहना है तो आयुर्वेद के अनुसार जानें कि हमें क्या खाना चाहिए, कब खाना चाहिए और कैसे खाना चाहिए।

तेल, चीनी व नमक थोड़ा कम

फूड सेफ्टी एंड स्टैण्डर्ड अथॉरिटी ऑफ इण्डिया (एफएसएसएआइ) की ओर से इट राइट इंडिया कैम्पेन के तहत तेल, चीनी व नमक थोड़ा कम-थोड़ा कम खाने को लेकर नारा दिया गया। विशेषज्ञों के अनुसार बदलती हुई दिनचर्या के बीच हमें खानपान में इन तीन चीजों तेल, चीनी व नमक का उपयोग दिन-प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा कम करना होगा वर्ना बीमारियों की आशंका बढ़ जाएगी। हम सुबह से शाम तक जो कुछ भी खाते-पीते हैं उनमें मुख्यत: इन्हीं तीन खाद्य पदार्थों का मिश्रण होता है।

शरीर की प्रकृति के अनुसार करें भोजन
हम दिनभर में जो भी खाते-पीते हैं, जरूरी नहीं कि वह शरीर के लिए फायदेमंद ही हो। आयुर्वेद में हर चीज के खाने-पीने का समय मौसम व शरीर की प्रकृति के अनुसार तय किया गया है।

आहार के छह रस
आयुर्वेद के अनुसार, भोजन में 6 रस शामिल होने चाहिए। ये 6 रस हैं- मधुर (मीठा), लवण (नमकीन), अम्ल (खट्टा), कटु (कड़वा), तिक्त (तीखा) और कषाय (कसैला)। शरीर की प्रकृति अनुसार भोजन करें। इससे शरीर में पोषक तत्वों का संतुलन नहीं बिगड़ता है। कुछ लोग मिली हुई प्रकृति के होते हैं। ऐसे लोगों को आयुर्वेद विशेषज्ञ की परामर्श से आहार लेना चाहिए।
गुड़ और शहद का ज्यादा प्रयोग करें
चीनी एक प्रकार का कार्बोहाइड्रेट है। शरीर में इसकी जरूरत फलों, सब्जियों और रेशेदार चीजों से भी पूरी हो जाती है। इसके अलावा चीनी को आहार में लेने की बजाय गुड़ व शहद का प्रयोग किया जा सकता है। यह सेहत के साथ बीमारियों से बचाव भी करता है। आहार में 40 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट की जरूरत होती है। कार्बोहाइड्रेट शरीर के लिए ऊर्जा का मुख्य स्रोत है। इसकी अधिक मात्रा से वजन बढ़ता है।
ऐसे रखें ध्यान: चाय, कॉफी, दूध में जो शुगर डाली जाती है उसे आधा कर दीजिए। प्रोसेस्ड फूड, केन ज्यूस, जैम, जैली, टमौटो सॉस आदि कम से कम उपयोग में लेें क्योंकि ऐसे खाद्य पदार्थों में चीनी की मात्रा कई गुना अधिक पाई जाती है। बच्चों को चीनी युक्त कैंडीज, चॉकलेट, आइसक्रीम, केक, पेस्ट्री जहां तक संभव हो कम दें क्योंकि इससे बच्चों में मोटापा व नॉन कम्युनिकेबल बीमारियों के होने की आशंका बढ़ती है।
32 बार क्यों चबाएं
अगर आप अपना वजन कम करना चाहते हैं तो खाना चबा-चबाकर खाएं। आयुर्वेद में 32 बार चबाकर खाने का नियम बताया गया है। इससे पाचन अच्छा रहता है और पोषक तत्व शरीर को लगते हैं। देर रात खाने से पाचन तंत्र निष्क्रिय होता है, जिससे भोजन पचने में दिक्कत होती है। इसलिए अपच, गैस और कब्ज की समस्या बढ़ती है।
कभी-कभी खाएं
पनीर सप्ताह में दो बार खाएं। स्प्राउट्स हफ्ते में दो बार लें। स्प्राउट को रातभर पानी में भिगोने के बाद एक बार उबालें और उसमें नमक, नींबू मिलाकर खा सकते हैं। दही हफ्ते में दो या तीन बार ही प्रयोग करें क्योंकि रोजाना इसे खाने से मोटापा, जोड़ों में दर्द व मधुमेह की शिकायत हो सकती है। बेहतर होगा दही में शहद या मिश्री मिलाकर खाएं।

ये भी है जरूरी
घर के 4 सदस्यों के परिवार में 2 लीटर खाद्य तेल ही पर्याप्त माना जाता है। यदि आप एक कचोरी खा लेते हैं तो इसमें लगभग 15 मिलीग्राम तेल होता है जिससे प्रतिदिन की जरूरत पूरी हो जाती है। इसके अतिरिक्त तैलीय चीजों को लेने से शरीर में फैट जमना शुरू होता है। घर पर तैयार भोजन में भी तेल की मात्रा नियंत्रित करनी चाहिए। बाहर की डीप फ्र्राइड चीजों से बचना चाहिए। कचौरी, समोसा, पकौड़ी, फ्रेंच फ्राइज, मठरी शरीर में फैट की मात्रा बढ़ाते है। बाजार में तैयार इन चीजों में स्मोक पॉइंट से अधिक तापमान पर गर्म करने से पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। ट्रांसफैट की मात्रा बढ़ती है। शरीर में टॉक्सिन, फ्री रेडिकल्स बनते हैं।
खाने से जुड़ी जरूरी बातें
सब्जियों को ज्यादा न पकाएं। सब्जियां न तो ज्यादा पकी होनी चाहिए और न ही कच्ची।
अदरक का टुकड़ा तवे पर भूनकर सेंधा नमक के साथ लें। इससे भूख बढ़ती है।
जंकफूड में सोडियम, ट्रांसफैट और शर्करा की भरमार होती है। इन्हें खाने से परहेज करें।
खाना हमेशा ताजा और गर्म होना चाहिए। यह पाचन के लिए बेहतर होता है।

एक्सपर्ट : डॉ. सर्वेश अग्रवाल, आयुर्वेद विशेषज्ञ एनआइए, जयपुर

 

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Yoga Pranayama: त्वचा में नेचुरल निखार पाने के लिए करें ये योगासन

Yoga Pranayama: समय से पहले चेहरे पर झुर्रियां, काले धब्बे, युवावस्था में कील मुंहासे आदि महिलाओं और युवाओं में आम समस्या है। संतुलित पौष्टिक आहार के साथ-साथ इन योगासनों का अभ्यास नियमित किया जाए तो चेहरे और सिर के भाग में रक्त का संचार ठीक रहता है और त्वचा प्राकृतिक रूप से सुंदर रहती है। कोई भी आसन करने से पहले अपने योग विशेषज्ञ से सही तरीका व समय जरूर जान लें।

हस्तपादासन Hastapadasana
स आसन को नियमित करने से मोटापा नियंत्रित रहता है। पेट व पाचन तंत्र सही रहता है। रीढ़ की हड्डी, पैर, सुडौल शरीर के साथ मांसपेशियां मजबूत होती हैं। शरीर में कसावट आने के साथ त्वचा की सुंदरता बढ़ती है। एक बार में पांच से छह बार हस्तपादासन का अभ्यास कर सकते हैं। स्पाइन, हर्निया, हृदय, बीपी, अल्सर और चक्कर की समस्या है तो इसे करने से बचें।

हलासन Halasana
शवासन की मुद्रा में लेट जाएं। कमर को ऊपर उठाते हुए पैरों को सिर के पीछे ले जाएं। पैर के पंजे बाहर की ओर निकालकर रखें। सांस छोड़ दें। धीरे-धीरे कमर को नीचे लाकर अर्ध हलासन की मुद्रा में आएं फिर शवासन में आ जाएं। नियमित करने से पेट की चर्बी कम होती है। थायरॉइड में आराम मिलता है और कई तरह के दूसरे रोग नहीं होते हैं।

मत्स्यासन Matsyasana
तीन से चार बार करना चाहिए। उदर, दमा, कमरदर्द, थायरॉइड, मधुमेह, श्वास रोग में आराम मिलता है। आंखों की रोशनी बढ़ती है। गला साफ रहता है। छाती और पेट संबंधी रोग में लाभदायक है। गर्भाशय, जननांगो की तकलीफ से बचाता है। पेट और गर्दन की चर्बी कम होती है। चेहरे पर चमक आती है। घुटनों में दर्द, बीपी, स्लिप Disk है तो इसे न करें। योग करने से पहले इसका तरीका जान लें।

सर्वांगासन Sarvangasana
सर्वांगासन से वजन कम होता है। दुर्बलता खत्म होने के साथ थकान नहीं रहती है। पीठ मजबूत होती है और अपच व कब्ज की समस्या में आराम मिलता है। थायरॉइड ग्रंथि की वृद्धि, सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस और हृदय रोगी इसे न करें।

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Pregnancy Care Tips: बाएं करवट सोने से शिशु को मिलता हैं पोषण

Pregnancy Care Tips: गर्भावस्था के दौरान बायीं करवट से सोना चाहिए। इससे प्लेसेंटा में ब्लड और दूसरे पोषक तत्त्व भरपूर मात्रा में जाते हैं जो शिशु को फायदा करते हैं। इस दौरान पैरों और घुटनों को मोड़कर रखना चाहिए और पैरों के बीच में तकिया लगाना चाहिए। इससे कमर दर्द में आराम मिलता है। पीठ के बल सोने से पीठदर्द के साथ सांस व पाचनतंत्र की समस्याएं होने के साथ ब्लड प्रेशर कम होने का खतरा रहता है।

नियमित जांच इसलिए जरूरी
गर्भावस्था में नियमित जांच जरूरी है। इसमें हीमोग्लोबिन और ब्लड प्रेशर महत्त्वपूर्ण है। मां का हीमोग्लोबिन और ब्लड प्रेशर ठीक रहेगा तो गर्भ में पल रहा शिशु स्वस्थ होगा। हीमोग्लोबिन लेवल बारह से कम नहीं होना चाहिए। हाई रिस्क प्रेगनेंसी में मां का एचबी कम है, ब्लड प्रेशर असंतुलित है और प्लेसेंटा नीचे की ओर है तो गर्भवती को समय-समय पर डॉक्टरी सलाह लेते रहना चाहिए।

दिन में भी नींद लें
गर्भावस्था के दौरान दिन में कम से कम दो घंटे जबकि रात में आठ घंटे की नींद स्वस्थ मां और शिशु के लिए बहुत जरूरी है। इससे गर्भ में पल रहे शिशु की सेहत ठीक रहने के साथ मां को भी गर्भावस्था के दौरान कोई स्वास्थ्य संबंधी परेशानी नहीं होती है।

आयुर्वेद में सलाह
आयुर्वेद में गर्भवती को माह के हिसाब से दवा और खानपान की सलाह देते हैं। फलगृत नाम की दवा का प्रयोग करने से एमनॉटिक फ्लूड और बच्चे का वजन भी ठीक रहता है। बिना डॉक्टरी सलाह के कोई दवा न लें।

खानपान ऐसा हो
गर्भवती को अपनी सेहत को बेहतर रखने के लिए पौष्टिक आहार लेना चाहिए। इसमें दाल, रोटी, चावल, मौसमी सब्जी के साथ फल, मेवे, गुड़ और गुड़ से बनी चीजें खानी चाहिए। शरीर में आयरन, कैल्शियम और प्रोटीन की मात्रा का ध्यान देना होगा। कमी अधिक है तो डॉक्टर की राय से आयरन, कैल्शियम की गोली लेनी चाहिए। इससे जच्चा-बच्चा दोनों स्वस्थ रहते हैं।

न करें लापरवाही
- 80 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं नींद पर ध्यान नहीं देतीं जिससे उन्हें परेशानी होती है।
- 3 लीटर पानी जरूर पीना चाहिए जिससे शरीर में तरलता बनी रहे।
- 10 प्रतिशत गर्भवती नियमित जांचें नहीं कराती हैं जिससे प्रसव के दौरान मुश्किल हो सकती है।

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हीमोग्लोबिन के अधिक स्तर से हो सकती हैंं कई दिक्कतें

हीमोग्लोबिन की मात्रा पुरुषों में 15-16 प्रति डेसिलीटर और महिलाओं में 14-15 प्रति डेसिलीटर होती है। यह अधिकतम सीमा से भी ज्यादा हो तो रक्त में गाढ़ापन बढऩे लगता है। इससे होने वाली दिक्कत को पॉलिसाइथीमिया कहते हैं।

शरीर में रक्त बनाने की प्रक्रिया में गड़बड़ी
रक्त में हीमोग्लोबिन बढऩे की वजह बोनमैरो यानी अस्थिमज्जा में रक्त बनने में गड़बड़ी होना है। इसमें हीमोग्लोबिन बढऩे को प्राइमरी पॉलिसाइथीमिया कहते हैं। कोई अन्य रोग से जब यह समस्या होती है तो इसे सेकेंडरी पॉलिसाइथीमिया कहते हैं। इससे हार्ट व ब्रेन स्ट्रोक जैसी दिक्कतें हो सकती हैं।

नाक और आंतोंं में ब्लीडिंग भी हो सकती
हीमोग्लोबिन बढऩे से गाल, चेहरा लाल होना, स्नान के बाद हाथ-पैरों में खुजली, सिर घूमना, थकान, पेट दर्द भी हो सकता है। नाक व आंतों से ब्लीडिंग हो सकती है। इसकी पहचान के लिए रक्त की जांच करते हैं।
इस तरह से शरीर को दिक्कत करता है
कई बीमारियों में शरीर को आवश्यकतानुसार ऑक्सीजन नहीं मिलती है तो इससे सायनोटिक हार्ट डिजीज, सीओपीडी (क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज), क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एप्निया जैसी दिक्कतें शुरू हो सकती हैं। इस स्थिति में शरीर अधिक हीमोग्लोबिन तैयार कर ऑक्सीजन की आपूर्ति करने की कोशिश करता है। यह दिक्कत कई बार किडनी, लिवर कैंसर में भी होती है। साथ ही कई बार धूम्रपान, प्रदूषण, कम ऑक्सीजन वाली जगहों पर काम करने से दिक्कत होती है।
एक्सपर्ट : डॉ. एम वली, वरिष्ठ फिजिशियन, नई दिल्ली

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Tuesday, 29 October 2019

वायु प्रदूषण से से हार्ट, ब्रेन और फेफड़ों की बढ़ रही बीमारी

श्वांस संबंधी परेशानियों से बचाव के लिए नीम का पेड़ वरदान होता है। जो भी पेड़ जिनकी पत्तियां छोटी होती हैं उनके भीतर प्रदूषण को कम करने की क्षमता अधिक रहती है। घर के आसपास हरे-भरे पेड़ रहेंगे तो प्रदूषण का स्तर कम रहेगा और बीमारियां फैलने का खतरा भी कम होगा।

मॉर्निंग वॉक करते समय बरतें सावधानी
सुबह के समय टहलना फायदेमंद होता है लेकिन प्रदूषण्, धुंध या कोहरे में टहलना सेहत को नुकसान पहुंचाता है। इसलिए सुबह के समय टहलने से बचना चाहिए विशेषकर उन लोगों को जो अस्थमा या सीओपीडी के रोगी हैं। इसके बाद भी टहलने या किसी अन्य काम से बाहर जाते हैं तो सावधानी के तौर पर एन-95 मास्क पहनकर ही निकलना चाहिए क्योंकि इस मास्क से प्रदूषित कणों को शरीर के भीतर जाने से रोका जा सकता है।

हवन से कम होता प्रदूषण से नुकसान
हवन सामग्री में ऐसे एंटीबैक्टीरियल तत्व होते हैं जो प्रदूषण से बचाव में सहायक हैं। तुलसी इम्युनिटी बूस्टर होता है। एक गिलास पानी में पत्ता डाल दें और दिनभर थोड़ा-थोड़ा पिएं आराम मिलेगा। प्रदूषण का स्तर बहुत अधिक है तो पानी में नीम का पत्ता डाल उसे हल्का गरम कर गरारा करने से भी संक्रमण का खतरा कम रहता है। च्यवनप्राश का सेवन करना चाहिए इससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता संतुलित रहती है।

ऐसे निकालते विषैले तत्व
शरीर के भीतर जमा हो चुके विषैले तत्वों को बाहर निकालकर भी रोगी को आराम पहुंचाया जाता है। इसमें पंचकर्म के साथ वमन रोगी को उल्टी कराते हैं। विरेचन में रोगी को घी-पिलाकर आंतों और दूसरे अंगों की सफाई की जाती है। शरीर की तिल्ली या सरसों तेल से मसाज कर भाप दिया जाए तो लाभ होता है।

मिट्टी में बच्चों को खेलने दें
मिट्टी में बच्चों को खेलने से नहीं रोकना चाहिए। मिट्टी में खेलने से बच्चों की इम्युनिटी मजबूत होती है। जो भी फल और सब्जी है उसे अच्छे से धोने के बाद ही पकाए या खाएं क्योंकि केमिकल युक्त होने से शरीर की कोशिकाओं पर बुरा प्रभाव पड़ता है। हर व्यक्ति को फिट और सेहतमंद रहने के लिए योग और प्राणायाम के साथ हल्की-फुल्की एक्सरसाइज जरूर करनी चाहिए।
एक्सपर्ट : डॉ. गोपेश मंगल, आयुर्वेद विशेषज्ञ

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वायु प्रदूषण से से हार्ट, ब्रेन और फेफड़ों की बढ़ रही बीमारी

शरीर को चलाने के लिए जितना जरूरी खाना और पानी है उससे कहीं अधिक जरूरी है हवा। क्योंकि पानी और खाना न मिले तो व्यक्ति कुछ दिन तक जिंदा रह सकता है। जबकि हवा के बिना व्यक्ति कुछ सेकंड ही जीवित रह सकता है। हवा के माध्यम से जब शरीर में दूषित तत्व जाते हैं तो शरीर की भीतरी कोशिकाओं में संक्रमण की वजह से कई बदलाव आते हैं। इसमें प्रमुख रूप से सांस फूलने, घबराहट और चिड़चिड़ान की समस्या अधिक रहती है। कुछ समय के भीतर व्यक्ति अस्थमा, एलर्जी या सीओपीडी का रोगी हो जाता है। समय के साथ वायु प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है जिससे बचाव के लिए जरूरी सावधानियां बरतनी होंगी। समय रहते सावधानी न बरती गई और जरूरी बचाव के जरूरी इंतजाम नहीं किए तो फेफड़ों को अधिक नुकसान हो सकता है।

दस माइक्रोन्स से कम के कण से होता नुकसान
दस माइक्रोन्स से कम के पार्टीकुलेट मैटर नाक के माध्यम से सांस और फिर थ्रोट के जरिए फेफड़े के पिन एयरवेज (महीन छिद्रो) में पहुंच जाते हैं। अगर इन माइक्रोन्स का आकार 2.5 से कम है तो ये सांस के जरिए ब्लड में जाने वाले ऑक्सीजन में मिल जाते हैं जिसके बाद फेफड़े के आसपास संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। इन्हीं कणों में कुछ अल्ट्रा फाइन माइक्रोन्स (सूक्ष्म कण) होते हैं जो फेफड़े की सबसे अहम परत झिल्ली तक पहुंच जाते हैं। इससे वे कण खून के रास्ते दिल और दिमाग तक पहुंचकर उन्हें नुकसान पहुंचाते हैं। ऐसा होने पर अचानक से हार्ट अटैक या ब्रेन हैमरेज होने के मामले रिपोर्ट किए जाते हैं। ये कण लंबे समय से शरीर के भीतर जा रहे हैं तो फेफड़े के साथ किडनी, लिवर और शरीर की दूसरी कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाते हैं।

इनसे होता अधिक नुकसान
वायु प्रदूषण का सबसे अधिक खतरा सर्दियों में इसलिए होता है क्योंकि ओजोन गैस कोहरे और ठंड की वजह से उपर नहीं उठ पाती है। ऐसी स्थिति में छोटे कण हवा में तैरते रहते हैं जो सांस के माध्यम से शरीर के भीतर चले जाते हैं। प्रदूषण के मुख्य कारक डीजल, पेट्रोल गाडिय़ों और फैक्ट्रियों से निकलने वाला धुंआ प्रमुख होता है। ये कण उन लोगों के लिए अधिक खतरनाक होते हैं जिन्हें अस्थमा, सीओपीडी की समस्या पहले से है। बच्चों और बुजुर्गों के फेफड़े सामान्य की तुलना में बेहद नाजुक होते हैं जिस वजह संक्रमण फैलने का खतरा अधिक रहता है।
एक्सपर्ट : डॉ. नरेंद्र खिप्पल, चेस्ट फिजिशियन, जयपुर

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ऑर्गेनिक फूड मोटापे सहित कई बीमारियों से कैसे बचाता है

जैविक आहार में मिलने वाले पोषक तत्व ब्लड प्रेशर, माइग्रेन, मधुमेह और कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों से बचाते हैं। इस आहार में फैट की मात्रा संतुलित होती है, जिससे मोटापे का खतरा भी कम रहता है। इसके निरंतर इस्तेमाल से त्वचा में निखार रहने के साथ व्यक्ति हर वक्त तरोताजा महसूस करता है।

डेयरी प्रोडक्ट भी हैं ऑर्गेनिक
डेयरी प्रोडक्ट्स में ओमेगा-थ्री फैटी एसिड्स का मात्रा अधिक होने के साथ आयरन और विटामिन-ई भी प्रचुर मात्रा में रहता है। इसके अलावा ऑर्गेनिक मांस में भी ओमेगा फैटी एसिड की मात्रा अधिक होने के साथ फैट की मात्रा संतुलित होती है। ऑर्गेनिक मिल्क और ऑर्गेनिक मीट के लिए जानवरों को ऑर्गेनिक चारा खिलाया जाता है और इनको किसी तरह का इंजेक्शन नहीं दिया जाता है।

ऑर्गेनिक फूड खरीदते समय रखें ये ध्यान
जैविक आहार का पूरा लाभ शरीर को तभी मिलता है जब इसका प्रयोग सही तरीके से किया जाए। जैविक आहार को पकाने में किसी तरह की लापरवाही इसमें मौजूद मिनरल्स और विटामिन्स की मात्रा को नष्ट कर देती है। ऐसे में जैविक खाद्य पदार्थ को पकाते वक्त अधिक ध्यान रखना चाहिए। जैविक खाद्य पदार्थ सर्टिफाइड स्टोर से खरीदें और ध्यान रखें कि इन खाद्य पदार्थो पर स्टीकर लगा होता है।

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शरीर की रोग प्रतिरोधकता बढ़ाना चाहते हैं तो खाएं ये फूड

ऑर्गेनिक फूड (जैविक आहार) रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल होने वाले खाद्य पदार्थ जैसे हरी सब्जी, फल, दूध और अनाज को रसायनिक तत्वों से सुरक्षित रखकर तैयार किया जाता है। जैविक आहार प्राकृतिक रूप से शुद्ध एवं ताजा होता है। इस आहार में प्रचुर मात्रा में प्रोटीन, विटामिन, लवण और पोषक तत्वों की भरमार होती है। ऑर्गेनिक फूड स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है जिसमें किसी तरह का कोई भी रसायनिक तत्व नहीं होता है। इस प्रक्रिया से खाद्य पदार्थो के उत्पादन से प्रकृति को भी कोई नुकसान नहीं होता है। जैविक खेती से पैदा होने वाले खाद्य पदार्थो में प्रचुर मात्रा में बायो फ्लैवोनॉयड्स मिलते हैं जिससे कैंसर समेत अल्जाइमर और कार्डियोवैस्कुलर संबंधी रागों से बचाव होता है। बायो फ्लैवोनॉयड्स मुख्य रूप से फलों, सब्जियों और आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों में पाए जाते हैं। इसके प्रयोग से रक्त संचार बेहतर रहता है। जैविक आहार में 50 फीसदी ज्यादा विटामिन होता है। वैज्ञानिकों का दावा है कि जन्म के बाद से ही बच्चे को जैविक आहार दिया जाए तो उसका मानसिक विकास तेजी से होगा और रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होगी जिससे वे कई तरह की गंभीर बीमारियों की चपेट में आने से बच सकता है।

ऑर्गेनिक फूड से ऐसे होता फायदा
जैविक आहार में एंटीऑक्सीडेंट और माइक्रो न्यूट्रिएंट्स की मात्रा अधिक होती है जिसमें विटामिल सी, जिंक और आयरन की मात्रा शामिल है। इस आहार में एंटीऑक्सीडेंट की मात्रा 69 फीसदी अधिक होती है। जैविक खेती से पैदा होने वाले जामुन और भुट्टे में 48 फीसदी अधिक एंटीऑक्सीडेंट और 52 फीसदी से अधिक विटामिन सी की मात्रा होती है। इसके अलावा जैविक खेती से पैदा हो रही सब्जी में भी विटामिन-ए समेत अन्य पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में होते हैं जिससे शरीर को फायदा होता है।
ऐसे करते हैं ऑर्गेनिक फॉर्मिंग
एक्सपर्ट बताते है कि ऑर्गेनिक फॉर्मिंग यानि जैविक खेती ऐसे खाद्य पदार्थो के उत्पादन की प्रक्रिया है जिसमें रसायनिक तत्वों का प्रयोग नहीं होता है। इस प्रक्रिया के तहत खाद्य पदार्थो के उत्पादन से मिट्टी की उर्वक क्षमता बढिय़ा रहती हैं जिससे फसलों का उत्पादन बढिय़ा होता है। खास बात ये होती है कि इस प्रक्रिया के तहत पैदा किए जाने वाले खाद्य पदार्थो स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाला कोई तत्व नहीं होता है। जैविक खेती करने वाले किसानों का लाभ भी दोगुना हो जाता है क्योंकि रसायनिक खाद का प्रयोग करने से खेती करना महंगा हो रहा था। इस विधि का प्रयोग बढऩे से जमीन के भीतर होने वाले प्रदूषण को भी काफी हद तक रोका जा सकता है। इस खेती में पशुओं के गोबर और कचरे से खाद बनाकर फसलों का उत्पादन किया जाता है।

 

 

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प्रोटीन युक्त नाश्ते से दूर हाेती है बार-बार की थकान

Stay Active Tips: कई लोग अक्सर शिकायत करते हैं कि यार मैं तो थक गया। बार-बार और बिना काम के ही होने वाली थकान से बचना चाहते हैं तो इन बातों पर ध्यान दें:-

- शारीरिक ऊर्जा को बरकरार रखने के लिए प्रोटीन युक्त नाश्ता जरूरी होता है। प्रोटीनयुक्त व रेशेदार नाश्ते से ब्लड शुगर संतुलित रहता है और शरीर में ऊर्जा बनी रहती है। सुबह का नाश्ता अच्छा हो तो दिन की शुरुआत भी अच्छी होती है।

- दिन भर थोड़ा-थोड़ा पानी या कोई भी तरल पदार्थ पीते रहें। पानी शरीर से हानिकारक तत्वों को बाहर निकालकर शारीरिक प्रणाली में नई ऊर्जा भरता है। शर्बत, फलों का रस, छाछ व नारियल पानी आदि पीना चाहिए।

- कार्बोहाइड्रेट से शरीर को ऊर्जा मिलती है। ऐसे फल जरूर खाएं, जिसमें ग्लूकोज पर्याप्त मात्रा में हो, जैसे संतरा, मौसमी, लीची आदि। चीनी का प्रयोग न करें। दूध में शहद डालकर पिएं या फिर केले का शेक पीना भी बेहतर विकल्प है। दिन में कम से कम 10 मिनट तक टहलना सेहत के लिए बहुत जरूरी होता है।

पर्याप्त नींद लें
7-8 घंटे की नींद जरूर लें ताकि अगले दिन के लिए आपको पर्याप्त ऊर्जा मिले। जब भी थकान महसूस हो तो 15-20 मिनट की झपकी जरूर लें। नींद पूरी न होने से वजन भी बढ़ता है और थकान भी जल्दी होती है।

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बहुत गुणकारी है हल्दी, पर फायदे के लिए परहेज जरूरी

Turmeric Benefits: हल्दी एंटीसेप्टिक, एंटीऑक्सीडेंट, एंटीवायरल व शोथ (सूजन) नाशक गुणों से भरपूर होती है। इसलिए इससे बनी दवाओं का उपयोग करते समय तली, ठंडी व खट्टी चीजें ना लें।आइए जानते हैं हल्दी के सेहत भरे फायदाें के बारे में :-

- 1-2 ग्राम या जरूरत के अनुसार हल्दी का चूर्ण गर्म दूध के साथ लेने से खांसी, जुकाम, दमा और चोट के दर्द में आराम मिलता है।

- हल्दी का बाह्य व आंतरिक दोनों प्रकार से उपयोग होता है। आंतरिक रूप में हल्दी से बनी आयुर्वेदिक दवा हरिद्राखंड उपयोगी है। बाह्य प्रयोग में चेहरे से फुंसियां-मुंहासे, झाइयां हटाने व रंगत निखारने के लिए हल्दी को बेसन,चंदन पाउडर, गुलाब जल व दूध के साथ लेप बनाकर 20-25 मिनट तक लगाने से लाभ होता है।

सावधानी बरतें
जुकाम, खांसी व साइनस होने पर हल्दी से बना हरिद्रा आद्रक अवलेह उपयोगी होता है। यह चटनी व पाउडर के रूप में होता है जिसे चाट भी सकते है व सूखे आंवले की तरह खा भी सकते हैं।

ध्यान रहे : हल्दी के ज्यादा उपयोग से एसिडिटी हो सकती है इसलिए इसका प्रयोग डॉक्टरी सलाह से ही करें।

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अलसी के बीज खाने से सही रहता है कोलेस्ट्रॉल व शुगर का लेवल

Flaxseed Benefits In Hindi: सोसायटी फॉर इंटिग्रेटिव रिसर्च इन ऑन्कॉलोजी ने अपनी स्टडी में पाया कि जो महिलाएं अलसी के बीज का प्रयोग नियमित खाने में करती हैं उन्हें पीरियड्स में गड़बड़ी का सामना नहीं करना पड़ता है। स्टडी के मुताबिक जैसे हार्मोन रिप्लेसमेंट थैरेपी काम करती है, अलसी का बीज भी उसी तरह असर दिखाता है। जो अलसी के बीज का प्रयोग करते हैं उनमें कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कम होती है।आइए जानते हैं अलसी खाने के फायदाें के बारे में :-

- अलसी के बीज में प्रचुर मात्रा में फाइबर होता है, जो वजन को संतुलित रखने में मदद कर सकता है। इसके अलावा, इसमें ओमेगा-3 फैटी एसिड होता है, जोकि लाभदायक फैट होता है। यह भूख को कम कर सकता है, जिससे आपका वजन कम होने में मदद मिल सकती है।

- खाने में अलसी के बीज को शामिल करें। इसमें लिनोलिक एसिड, लिगनेन व फाइबर होते हैं, जो कुछ हद तक ब्लड प्रेशर को कम करने में मदद करते हैं।

- मधुमेह में अगर अलसी का सेवन किया जाए, तो ब्लड शुगर का स्तर कुछ प्रतिशत तक कम हो सकता है। इसमें म्यूसिलेज होता है, जो एक प्रकार का फाइबर होता है। यह पाचन को नियंत्रित कर खून में ग्लूकोज कम करता है।इसके अलावा, कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों से यह भी पता चला है कि फ्लैक्ससीड्स में एसडीजी नामक एक यौगिक होता है, जो टाइप-1 मधुमेह के जोखिम को कम कर सकता है और टाइप-2 डायबिटीज होने की आशंका को कम कर सकता है।

- सर्दी-जुकाम होने पर अलसी के पाउडर की चाय पिएं या फिर आप दो चम्मच अलसी को एक कप पानी में तब तक उबालें, जब तक वो गाढ़ा न हो जाए। अब इसको छान लें और इसमें तीन चम्मच शहद और नींबू का रस मिलाकर पिएं। आप अलसी के बीज को अपने सूप, स्मूदी या अन्य खाद्य पदार्थ में भी शामिल कर सकते हैं। अलसी में एंटी-इन्फ्लेमेटरी और एंटी-ऑक्सीडेंट गुण मौजूद हैं। इसे प्राचीन काल से सर्दी-जुकाम के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।

एक्सपर्ट : अलसी के बीज में कई तरह के जरूरी पोषक तत्त्व होते हैं जिनसे सेहत पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। पर नियमित सेवन डॉक्टर से पूछकर करें।

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Healthy Fruit Juice: फलों के रस से पाएं ताजगी और ताकत

Healthy Fruit Juice: सेहतमंद रहने के लिए ताजे फलों का जूस, शेक, आदि लेने चाहिए। ध्यान रहे जूस या शेक घर पर बनाते हैं तो सेहत को अधिक फायदा होगा और कई तरह की संक्रामक बीमारियां दूर रहेंगी। इसके साथ ताजा फल जैसे केला, तरबूज, नाशपाती, खाने से शरीर में ऊर्जा बनी रहती है । आइए जानते किस जूस से मिलेगा क्या फायदा...

बच्चों के लिए बनाना शेक
बच्चों के लिए बनाना (केला) शेक अच्छा रहता है है। इसमें कैलोरी, पोटैशियम, एंटीऑक्सीडेंट, कार्बोहाइड्रेट्स होते हैं जिनसे इम्युनिटी बढ़ती है। बच्चों को बाहर जाने से पहले दें, उनका पेट भी भरा रहेगा।

भागदौड़ करने वालों के लिए कीवी स्मूथी
धूप में भागदौड़ करने वाले लोग ऊर्जा बनाए रखने के लिए कीवी स्मूथी (दही के साथ बनाते हैं) ले सकते हैं। इसमें प्रोटीन, मिनरल्स, विटामिन सी ,फोलिक एसिड, पोटैशियम होता है। इसके साथ नींबू पानी, पुदीने का रस पी सकते हैं।

गर्भवती के लिए ऑरेंज जूस
गर्भवती को सभी को पोषक तत्त्व जरूरी होते हैं। गर्भवती को पानी की कमी से घबराहट, थकान न हो इसके लिए संतरे का जूस पीना चाहिए। इससे शरीर की इम्युनिटी बढ़ती है। इसमें विटामिन सी होता है पर खाली पेट कभी न लें।

बुजुर्गों के लिए पपीता शेक
पपीते का शेक बुजुर्गो के लिए लाभकारी है। इसमें एंटीऑक्सीडेंटस्, विटामिन ए, विटामिन- सी जैसे पोषक तत्त्व होते हैं। प्रचुर मात्रा में फाइबर होने से आंत मजबूत होती है। इसे पीने से इम्युनिटी बढ़ती है। शरीर में ऊर्जा बनी रहती है।

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World Stroke Day: चीनी-नमक से भी खतरा, हरी सब्जियाें से मिलती है राहत

World Stroke Day: 29 अक्टूबर को दुनियाभर में वर्ल्ड स्ट्रोक डे मनाया जाता है। इसका मकसद इस बीमारी के बढ़ते मरीज और इसकी गंभीरता को लेकर जागरुकता फैलाना है ताकि लोग इस बीमारी के बारे में जानें और इससे बचने के तरीके खोजे जा सकें। स्ट्रोक यानी लकवा ब्रेन से जुड़ी एक ऐसी गंभीर बीमारी है जिसका शिकार कोई भी, कहीं भी हो सकता है। अगर समय पर इलाज न मिले तो इंसान जीवन भर के लिए विकलांग हो सकता है। आइए जानते हैं किन कारणाें से बढ़ता है स्ट्रोक का खतरा :-

ज्यादा चीनी-नमक भी जिम्मेदार
एक शाेध के अनुसार रिफाइंड ऑइल, चीनी, नमक और फ्राइड फूड ज्यादा मात्रा में खाने वाले लोगों को भी स्ट्रोक का खतरा अधिक रहता है। इसके साथ ही आप अगर डायबीटीज, कलेस्ट्रॉल,हाइपरटेंशन यानी हाई ब्लड प्रेशर के मरीज हैं और मोटापे के ग्रसित हैं तो ये सारी दिक्कतें सिर्फ हार्ट डिजीज की ओर इशारा नहीं करतीं बल्कि स्ट्रोक यानी लकवे का भी सबसे बड़ा कारण हो सकती है।

सीधे सिर पर न डाले पानी
अगर आप सोचते हैं कि जैसे मन करे वैसे नहा सकते हैं ताे आप गलत हैं। खाने-पीने और सोने की ही तरह नहाने का भी एक सही तरीका है जिसे अगर फॉलो न किया जाए तो नहाते वक्त लकवा मारने या फिर ब्रेन स्ट्रोक का खतरा बना रहता है। बहुत से लोगों को आदत होती है कि वे बाथरूम में पहुंचते ही सीधे शावर के नीचे खड़े हो जाते हैं या फिर बाल्टी और मग से सीधे सिर पर पानी उड़ेलने लग जाते हैं। यह नहाने का पूरी तरह से गलत तरीका है और इससे ही स्ट्रोक समेत कई दूसरे खतरे सामने आ सकते हैं।

दरअसल, हमारे शरीर में खून का प्रवाह ऊपर से नीचे की तरफ होता है। ऐसे में अगर आप सीधे सिर पर ठंडा पानी डालकर नहाएंगे तो सिर में मौजूद खून की नलिकाएं सिकुड़ने लगेंगी या खून के थक्के जमने लगेंगे। जिससे हार्ट को सिर की तरफ ज्यादा तेजी से खून भेजना पड़ता है, इससे हार्ट अटैक या दिमाग की नस फटने की दिक्कत हो सकती है। इसलिए नहाते वक्त सिर से पानी डालने की शुरुआत न करे। नहाने की शुरुआत पैरों से करें। पैर के पंजो पर पानी डालने से शुरुआत करें। इसके बाद जांघ, पेट, हाथ, कंधे से होते हुए सबसे आखिर में सिर पर पानी डालें। इतना सब करने के बाद आप चाहें तो शावर के नीचे खड़े होकर या बाल्टी से पानी सिर पर उड़ेलकर नहा सकते हैं।

सर्दी से करें बचाव
न्यूरो सर्जन और ब्रेन स्ट्रोक विशेषज्ञों की मानें तो सर्दी के मौसम में ब्रेन स्ट्रोक के मरीजों की संख्या दो गुनी बढ़ जाती है। कड़ाके की ठंड में होने वाली मौतों की एक वजह ब्रेन स्ट्रोक भी है। ठंड के मौसम में हमारे शरीर में खून गाढ़ा हो जाता है। खून की पतली नलिकाएं संकरी हो जाती हैं, जिससे खून का दबाव बढ़ जाता है, जिसकी वजह से खून की धमनियों में क्लॉटिंग होने से स्ट्रोक होने का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए सर्दी में शरीर का तापमान मेंटेन रखना चाहिए।

पाेषक आहार लें
अपनी डायट में एंटी-ऑक्सिडेंट, विटमिन ई, सी और ए से भरपूर खाने को शामिल करें। फाइबरयुक्त साबुत अनाज खाएं। अदरक का सेवन करें, क्योंकि इससे रक्त पतला रहता है। अखरोट, सोयाबीन,जामुन, गाजर, टमाटर और हरी पत्तेदार सब्जियां खाएं।

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World Stroke Day: हर साल जाती है लाखों लाेगाें की जान, बचाव के लिए उठाएं ये कदम

World Stroke Day In Hindi: स्ट्रोक यानी लकवा ब्रेन से जुड़ी एक ऐसी गंभीर बीमारी है जिसका शिकार कोई भी, कहीं भी हो सकता है। अगर समय पर इलाज न मिले तो इंसान जीवन भर के लिए विकलांग हो सकता है। वर्ल्ड स्ट्रोक कैंपेन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हर साल करीब डेढ़ करोड़ लोग लकवे के शिकार होते हैं। इनमें से करीब 55 लाख लोगों की मौत इसी गंभीर बीमारी की वजह से होती है। दुनियाभर में अब तक करीब 8 करोड़ लोगों में इस बीमारी की पुष्टि हो चुकी है। हालांकि इस बीमारी की सही पहचान कर इलाज किया जाए तो रोगियों को ठीक भी किया जा सकता है। लिहाजा इसके लक्षणों को जानकर तुरंत कार्रवाई करना बेहद जरूरी है।

29 अक्टूबर को दुनियाभर में वर्ल्ड स्ट्रोक डे ( World Stroke Day ) मनाया जाता है। इसका मकसद इस बीमारी के बढ़ते मरीज और इसकी गंभीरता को लेकर जागरुकता फैलाना है ताकि लोग इस बीमारी के बारे में जानें और इससे बचने के तरीके खोजे जा सकें।

स्ट्रोक के लक्षण ( Stroke Symptoms )
स्ट्रोक जिसे कभी-कभी ब्रेन अटैक भी कहते हैं, ये तब होता है जब दिमाग तक ब्लड पहुंचने में रुकावट आ जाती है। ऐसा होने पर दिमाग की कोशिकाएं मरने लगती हैं क्योंकि उन्हें काम करने के लिए जो ऑक्सिजन और पोषण मिलना चाहिए, वो नहीं मिल पाता। स्ट्रोक की अवस्था में इंसान का मुंह तिरछा होना, हाथ-पैर या शरीर के किसी हिस्से का बेजान हो जाना, जुबान लड़खड़ाना या ठीक से न बोल पाने जैसे लक्षण देखने को मिलते हैं। इस परिस्थिति में जल्द से जल्द डॉक्टर की सलाह लेकर इलाज कराना चाहिए।

स्ट्रोक से बचने के तरीके ( Tips To Prevent Stroke )
- अपना ब्लड प्रेशर (बीपी) कंट्रोल रखें और इसकी नियमित रूप से जांच करवाएं।
- धूम्रपान और नशीले पदार्थों का सेवन करने से बचें और अपनी सेहत का ख्याल रखें।
- कॉलेस्ट्रॉल युक्त खाने से बचें। इससे स्ट्रोक की संभावनाएं ज्यादा हो सकती हैं।
- रोजाना सैर करें और सप्ताह में 5 दिन करीब 30 मिनट वर्कआउट जरूर करें।
- फल और हरी सब्जियों का ज्यादा से ज्यादा सेवन करें।
- शरीर में बढ़ने वाली कैलोरी को बर्न करने के लिए किसी न किसी फिजिकल एक्टिविटी में जरूर हिस्सा लें।

तुरंत इलाज मिल जाए तो बचना आसान ( Stroke Treatment )
स्ट्रोक एक इमर्जेंसी कंडिशन है। अगर स्ट्रोक को शुरुआत में ही पहचान कर इलाज दे दिया जाए तो इससे प्रभावित लोग सामान्य जीवन जी सकते हैं क्योंकि इसका असरदार इलाज मौजूद है। हालांकि स्ट्रोक के लक्षणों को पहचानकर तुरंत हॉस्पिटल ले जाना बेहद जरूरी है। लक्षण दिखने के शुरुआती साढ़े चार घंटे के अंदर अगर इलाज शुरू हो जाए तो बड़े नुकसान से बचा जा सकता है। जितनी जल्दी क्लॉट खत्म करने की दवा दे दी जाएगी उतना ही बेहतर परिणाम मिलेगा।

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Monday, 28 October 2019

क्यों वजन घटाने से ज्यादा मुश्किल है वजन बढ़ाना

वजन बढ़ाने के लिए नाश्ते और खाने में प्रचुर मात्रा में विटामिन, मिनरल्स, प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट का लेना जरूरी है। जो लोग अंडरवेट हैं उन्हें 500-750 कैलोरी ज्यादा लेना होगा। इससे शरीर में ऊर्जा बनेगी और पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्व मिलते रहेंगे। सुबह का नाश्ता और दिन का खाना समय पर लेना बहुत जरूरी है। कैलोरी की मात्रा बढ़ाने के लिए दाल, दूध केले के साथ दूसरे पौष्टिक खाद्य पदार्थ का प्रयोग अधिक होना चाहिए। वजन बढ़ाना है तो 24 घंटे के भीतर कब क्या खा रहे हैं इसका पूरा खाका तैयार करना होगा।

प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट का इनटेक बढ़ाएं
वजन बढ़ाने के लिए प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फैट, विटामिन्स और मिनरल्स की मात्रा बढ़ानी होगी। इसके लिए सबसे अधिक ध्यान कार्बोहाइड्रेट पर देना होगा जिसके लिए साबुत अनाज, ओट्स, चावल, आलू, अरबी और सकदकंद का इस्तेमाल अधिक करना होगा। इससे शरीर में उर्जा बनेगी जो फैट में बदलकर वजन बढ़ाने में मदद करेगी। प्रोटीन के लिए दूध, दही, दाल, पनीर, छेना और अन्य डेयरी प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल बढ़ाना होगा। जिसका वजन 45 से 50 किलो के बीच है उसे रोजाना कम से कम 80 ग्राम प्रोटीन हर हाल में लेना होगा। साबुत दाल, चना, राजमा, सोयाबीन, का इस्तेमाल भी अधिक करना होगा। घी, बटर, ऑलिव ऑयल, और सलाह लेने से भी शरीर को मजबूती मिलने के साथ फायदा होता है। अंकुरित दालें जिसमें मूंग, मोठ, छोला, सोयाबीन, राजमा, गेंहू, जौ को अंकुरित रूप में खाने से फायदा होता है।

हर शरीर की होती अपनी अलग बनावट
हर शरीर की अपनी अलग बनावट होती है और उसका अपना अलग मेटाबॉलिक रेट (पाचन क्षमता) होती है। मेटाबॉलिज्म रेट कंट्रोल नहीं हो सकता है। ऐसे में वजन बढ़ाने के लिए हर बार खाने में दस ग्राम बटर का इस्तेमाल करना चाहिए। घर का बना सफेद मक्खन या रोटी पर घी लगाकर खाने से सेहत सुधरती है। 50 से 60 ग्राम मक्खन रोज खाने से कैलोरी की मात्रा बढ़ेगी। कोशिश करें कि थोड़ी-थोड़ी देर में खाना खाएं। जो लोग नॉन-वेजेटेरियन हैं वे लोग रोज चार से पांच अंडे का सफेद भाग खाएंगे तो शरीर को प्रचुर मात्रा में प्रोटीन मिलेगा। अधिक दुबले पतले हैं तो सोयाबीन, मूंगफली, नारियल का दूध का इस्तेमाल करने से फायदा होगा।

एक्सपर्ट : मेधावी गौतम, डायटीशियन

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क्या आपको पता है किस उम्र में कितनी बढ़ती है बच्चों की हाइट

बच्चे को आठ से नौ घंटे की नींद बहुत जरूरी है। बच्चा को इनडोर की जगह आउटडोर गेम खिलाएं जिससे उसके शरीर में खिंचाव आए और हाइट बढऩे की प्रक्रिया ठीक रहे।

चार चरणों में बढ़ती है हाइट
हाइट चार चरणों में विभाजित होती है। इसमें पहला स्टेज फीटल, दूसरा इन्फैन्टाइल, तीसरा चाइल्डहुड और चौथा एडोलेसेंट एज होती है। बच्चा जब गर्भ में होता है तब उसे अलग तरह के हॉर्मोन की जरूरत होती है जिसे आईजीएफ-वन और आईजीएफ टू कहा जाता है। ऐसी अवस्था में शिशु को ग्रोथ हॉर्मोन की जरूरत नहीं होती है। गर्भ में पल रहे बच्चे को ह्यूमन प्लेसेंटा लैक्टोजन (एचपीएल) और इंसुलिन हॉर्मोन मां से मिलता है जो उसके विकास के लिए पर्याप्त होता है। इस स्टेज को फीटल स्टेज कहा जाता है। इस अवस्था में गर्भ में पल रहे भ्रूण को इसुंलिन हॉर्मोन नहीं मिल रहा है तो उसकी ग्रोथ पर असर होगा। इस वजह से जब बच्चे का जन्म हो तो उसकी लंबाई सामान्य बच्चों की लंबाई से कम होगी। दूसरा है इन्फैंट स्टेज जिसमें जन्म के बाद बच्चे में ग्रोथ हॉर्मोन और थॉयराइड हॉर्मोन बनते हैं जिससे उसका शारीरिक विकास बेहतर ढंग से होता है। तीसरा फेज चाइल्डहुड फेज (बचपन) होता है जिसमें थॉयराइड और ग्रोथ हॉर्मोन के साथ न्यूट्रीशियन यानि खानपान से मिलने वाले पोषक तत्वों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। चौथा फेज होता है किशोरावस्था यानि एडोलेसेंट एज का जिसमें पुरूष और महिला में कई तरह के हॉर्मोन बनते हैं जिससे युवक या युवती की लंबाई तेजी के साथ बढ़ती है। अगर इनका सीक्रेशन नहीं हो रहा है तो बच्चे के विकास में परेशानी आती है। बच्चे की लंबाई माता-पिता की लंबाई से मिलती जुलती ही होगी, बहुत कुछ असामान्य नहीं हो सकता है।

बच्चों का वजन बढ़ना बड़ी समस्या
जंक और फास्ट फूड का इस्तेमाल करने वाले लोगों का वजन तेजी से बढ़ता है। बॉडी मास इंडेक्स 95 परसेंटाइल से अधिक है तो मोटापा तेजी से बढ़ेगा। अगर ये 90 तक है तो ठीक है। इससे अधिक है तो भविष्य में हृदय रोग, मधुमेह और हाइपरटेंशन जैसी समस्या हो सकती है। जिन लोगों का वजन अधिक कम होता है उनमें इसका कारण न्यूट्रिशियन हॉर्मोन डेफिसिएंसी का होना या कॉर्टिकल हॉर्मोन के न बनने से भी ये परेशानी निकलकर सामने आती है।

डॉ. संजय सारण, हार्मोन रोग विशेषज्ञ, एसएमएस अस्पताल, जयपुर

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बच्चों की हाइट नहीं बढ़ रही तो 14 की उम्र से पहले ये लक्षण पहचानें

हाइट बढ़ने का सीधा संबंध हड्डियों के विकास (स्केलप्टल ग्रोथ) से जुड़ा होता है। शरीर की हड्डियों के अंत में एफिफाइसिल ग्रोथ प्लेट होती है जो बढ़ती रहती है। बीस साल की उम्र के बाद ये प्लेट फ्यूज हो जाती है यानि ग्रोथ बंद हो जाती है। इसी के साथ लंबाई बढ़ने का सिलसिला बंद हो जाता है। ऐसे में चौदह साल की उम्र तक हाइट में बड़ा अंतर दिख रहा है तो तुरंत डॉक्टर से मिलकर इलाज करवाएं।
समय से पहले ऐसे पहचानें
चबी चाइल्ड उम्र के हिसाब से छोटे नजर आते हैं और गोल मटोल दिखते हैं। बच्चे की हाइट मां-बाप की हाइट पर निर्भर करती है। माता-पिता की हाइट कम है तो बच्चे की हाइट बहुत अधिक नहीं बढ़ सकती है। अगर बच्चा माता-पिता की हाइट के बराबर भी नहीं है या उस हिसाब से नहीं बढ़ रहा है तो बिना देर किए डॉक्टरी सलाह लेनी चाहिए।
ग्रोथ हॉर्मोन थैरेपी हाइट बढ़ाने में कारगर
ग्रोथ हॉर्मोन थैरेपी हाइट बढ़ाने में कारगर है। ये इंजेक्टेबल थैरेपी है जिसकी डोज वजन, स्वास्थ्य संबंधी समस्या और बॉडी रिस्पॉन्स के आधार पर तय किया जाता है। ये थैरेपी पूरी तरह सुरक्षित है और जितनी जल्दी शुरू हो उतना बेहतर रहता है। लड़कियों में माहवारी शुरू होने और लड़कों में प्यूबेरिटी आने के बाद हाइट बढऩा थोड़ा मुश्किल होता है। माहवारी शुरू होने के बाद औसतन अधिक से अधिक 5 से 6 सेमी. जबकि लड़कों में 6 से 7 सेमी. हाइट बढ़ सकती है।

जांचें जिनसे पता चलता क्यों नहीं बढ़ रही हाइट
हाइट नहीं बढ़ रही है तो आइजीएफ-वन, थॉयराइड और पोषक तत्त्वों से संबंधित जांचें करवाई जाती हैं। इससे भी कुछ पता नहीं चलता है तो पीयूष ग्रंथि की एमआरआई जांच करवाते हैं जिससे कई कारणों के बारे में सटीक जानकारी मिलती है। जिन बच्चों को बार-बार संक्रमण होता है। खांसी जुकाम-बुखार और दस्त की शिकायत होती है तो उसका सीधा असर उसकी हाइट पर भी पड़ता है।

पाउडर और कैप्सूल से नहीं बढ़ती है हाइट
हाइट बढ़ाने के लिए किसी भी तरह का पाउडर और कैप्सूल का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। जिम जाते हैं तो सप्लीमेंट्स का इस्तेमाल नहीं करें। इससे कई बार लड़कों के छाती में उभार आ जाता है। जबकि लड़कियों में कई तरह की दूसरी समस्याएं हो सकती हैं।
डॉ. बलराम शर्मा, हार्मोन रोग विशेषज्ञ, एसएमएस मेडिकल कॉलेज, जयपुर

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18 साल की उम्र के बाद क्यों नहीं बढ़ती बच्चों की हाइट

इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के अनुसार 46 की जगह 45 गुणसूत्र होने से भी बच्चे का विकास नहीं हो पाता है। इसका सीधा असर उसकी हाइट पर पड़ता है। दो साल बाद बच्चे की हाइट को चाइल्डहुड ग्रोथ के तौर पर देखते हैं। दूसरे साल में बच्चे की लंबाई 82 से 83 सेमी. जबकि 3 से 4 साल की उम्र के बाद हर साल 6 से 7 सेमी. बढऩी चाहिए। बच्चों को फास्ट फूड न दें क्योंकि फास्ट फूड से भूख तो मिट जाती है पर शरीर के विकास के लिए जरूरी पोषक तत्व नहीं मिल पाते हैं।

बोन फ्यूज होने के बाद नहीं बढ़ती लंबाई
हाइट बढऩे का सीधा संबंध हड्डियों के विकास (स्केलप्टल ग्रोथ) से जुड़ा होता है। शरीर की हड्डियों के अंत में एफिफाइसिल ग्रोथ प्लेट होती है जो बढ़ती रहती है। बीस साल की उम्र के बाद ये प्लेट फ्यूज हो जाती है यानि ग्रोथ बंद हो जाती है। इसी के साथ लंबाई बढऩे का सिलसिला बंद हो जाता है। ऐसे में चौदह साल की उम्र तक हाइट में बड़ा अंतर दिख रहा है तो तुरंत डॉक्टर से मिलकर इलाज करवाएं।

इसलिए नहीं बढ़ती है हाइट
लंबाई आमतौर पर पर सोलह साल की उम्र तक तेजी से बढ़ती है। इसके बाद लंबाई बढऩे की प्रक्रिया बहुत तेजी से कम होती है। सोलह साल की उम्र के बाद दाढ़ी मूंछ आने के साथ लैरिंग्स गले का हिस्सा (साउंड बॉक्स) बाहर निकल जाता है। इसी तरह लड़कियों में माहवारी शुरू होने के बाद लंबाई बढऩे का प्रतिशत बहुत कम होता है। 18 से 20 साल की उम्र के बीच पांच से छह सेंटीमीटर ही लंबाई बढ़ सकती है। बीस वर्ष की उम्र सीमा पार होने के बाद लंबाई बढऩा बेहद मुश्किल होता है।

बच्चे के इन अंगों को ध्यान से देखें
बच्चे जिनकी हाइट नहीं बढ़ती है उनमें इसके साथ दूसरे लक्षण भी दिखते हैं। इसमें बच्चे के नाखून और बाल भी धीरे-धीरे बढ़ते हैं। पैरों और हाथों के साथ अंगुलियों भी छोटी दिखती हैं। इससे पता किया जा सकता है कि बच्चे की लंबाई प्रभावित हो रही है। डॉक्टरी भाषा में इसे चबी चाइल्ड कहते हैं। ऐसे बच्चे उम्र के हिसाब से छोटे नजर आते हैं और गोल मटोल दिखते हैं। बच्चे की हाइट मां-बाप की हाइट पर निर्भर करती है। माता-पिता की हाइट कम है तो बच्चे की हाइट बहुत अधिक नहीं बढ़ सकती है। अगर बच्चा माता-पिता की हाइट के बराबर भी नहीं है या उस हिसाब से नहीं बढ़ रहा है तो बिना देर किए डॉक्टरी सलाह लेनी चाहिए।
एक्सपर्ट : डॉ. संजय सारण, हार्मोन रोग विशेषज्ञ, एसएमएस अस्पताल, जयपुर

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कैंसर के लक्षणों को ऐसे पहचानकर बच सकते हैं

लंबे समय से खांसी, किसी मस्से के रंग व आकार में बदलाव या उसमें खून आना, घाव ठीक न होना, वजन कम होना और मल-मूत्र की आदतों में बदलाव होने व महिलाओं में असामान्य रक्तस्राव होने से कैंसर की आशंका बढ़ती है। पुरुषों में सबसे ज्यादा फेफड़े, मुंह, गले, आंत व आमाशय का कैंसर होता है। महिलाओं में बच्चेदानी के मुंह का कैंसर, ब्रेस्ट, गॉलब्लैडर व भोजन नली का कैंसर होता है।
मुंह का कैंसर
मुंह से खून आना, होठ के आसपास या मुंह में गांठ बनना, कुछ भी खाने पर निगलने में तकलीफ, मुंह के छाले लंबे समय तक ठीक न होना या जीभ का कोई हिस्सा सुन्न हो जाना। देशभर में इस कैंसर के मामले सबसे अधिक पुरुषों में पाए जाते हैं।
फेफड़ों का कैंसर
अत्यधिक कफ बनना या कफ के साथ खून आना, लंबे समय तक गला खराब रहना, सांस लेने में तकलीफ, सीने में दर्द, बिना कारण वजन घटना। यदि दवा के बावजूद फायदा न हो या हर बार कफ के साथ खून आए तो तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए।
कोलोन (पेट/बड़ी आंत) का कैंसर
लंबे समय से कब्ज, दर्द या ऐंठन व पेट भरा हुआ महसूस होना, मल में खून आना व धीरे-धीरे इसमें रक्त का अधिक आना लक्षण हैं। धूम्रपान, रेड मीट व जंक फूड खाना भी खतरे को बढ़ाता है।
प्रोस्टेट कैंसर
यह पेपीलोमा वायरस के कारण होता है। पुरुषों में होने वाला प्रमुख कैंसर है जो पौरुष ग्रंथि में होता है और यूरिनरी सिस्टम को प्रभावित करता है। यूरिन में रक्त या सीमेन आना, कमर के निचले हिस्से में दर्द होना आदि इसके लक्षण हो सकते हैं। यह 40 वर्ष की उम्र के बाद अधिक होता है।
दिमाग का कैंसर
यह कैंसर लगातार गले में खराश, मुंह से बदबू, आवाज में खरखराहट या बदलाव, गले में सूजन, बिना दर्द उभार-गांठ, मुंह में सफेद या लाल निशान, लंबे समय तक नाक बंद रहना जैसे लक्षण हैं।
ब्रेस्ट कैंसर
यह महिलाओं में होने वाला प्रमुख कैंसर है। बे्रस्ट के आसपास गांठ होना या सूजन, आकार में बदलाव होना इसके लक्षण हैं। यह 40 वर्ष की उम्र के बाद अधिक होता है।
ब्लड कैंसर (ल्यूकीमिया)
यह खून व बोनमैरो (अस्थिमज्जा) का एक प्रकार का कैंसर है। हड्डियों के अंदर मज्जा ब्लड स्टेम सेल (अपरिपक्व कोशिकाएं) पैदा करता है। जो विकसित हो संक्रमण से लड़ती हैं।
बोन कैंसर
यह बच्चों में अधिक होता है। हड्डी में होने पर वहां सूजन, त्वचा का लाल होना, छूने पर गर्म, वजन घटने लगता है। पैर की हड्डी में होने पर चलने में, कुछ भी उठाने में दिक्कत होती
इन जांचों से पहचानते हैं
रोग की पहचान के लिए ऊतकों, कोशिकाओं का नमूना लेते हैं। पैप स्मियर टैस्ट इसके तहत महिलाओं में सर्विक्स (गर्भाशय) कैंसर की जांच के लिए सम्बंधित हिस्से से कोशिकाएं लेकर कैंसर सेल की पहचान की जाती है। मेमोग्राम यह जांच महिलाओं में बे्रस्ट कैंसर की पहचान के लिए कराया जाता है।
एमआरआइ टेस्ट
एमआरआइ मस्तिष्क, हड्डियों आदि के कैंसर की पहचान के लिए किया जाता है। इससे ट्यूमर की सटीक जानकारी मिलती है। यह शरीर के अंदरूनी अंगों की विस्तृत तस्वीर तैयार करती है। सीबीसी इसे कंप्लीट ब्लड काउंट टेस्ट भी कहते हैं। इस जांच से रक्त कैंसर और संबंधित रक्त विकारों की पहचाना करते हैं।
सिम्टोमैटिक टेस्ट
आनुवांशिक कैंसर की पहचान के लिए स्वस्थ लोगों की जांच करते हैं। जीन्स म्यूटेशन की जानकारी करते हैं। इसक विश्लेषण कर कैंसर कब-कहां होगा की जानकारी करते हैं।

एक्सपर्ट : डॉ. संदीप जसूजा, कैंसर रोग विशेषज्ञ

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लो फिजिकल एक्टिीविटी व हाई कैलोरी फूड से बढ़ रहा मोटापा

किडनी, आंख व हार्ट संबंधी दिक्कतें बढ़ रही हैं। नसों की कमजोरी (पैरों में झनझनाहट बढऩा), जोड़ों में दर्द, हाई ब्लड प्रेशर, हाई कोलेस्ट्रॉल बढ़ रहा है।
क्या कहते हैं आंकड़े
इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन (आइडीएफ) की रिपोर्ट के अनुसार पिछले 20 वर्षों में बच्चों में 20 प्रतिशत टाइप टू डायबिटीज बढ़ी है। वहीं, देश में आने वाले 15 सालों में डायबिटीज के मरीजों की संख्या दोगुनी हो जाएगी।
व्यस्त दिनचर्या
1- बच्चे रात में देर सोते हैं और स्कूल जाने के लिए सुबह जल्दी उठते हैं। नींद पूरी नहीं होती है।
2- दोपहर बाद आने के कारण खाने व होमवर्क के बाद अक्सर खेलने का समय नहीं मिलता है।
3- माता-पिता सेफ्टी व सिक्यूरिटी की वजह से बच्चों को आउटडोर एक्टिीविटी में भेजने से बचते हैं।
4- अच्छे मार्क लाने के दबाव में बच्चों में तनाव बढ़ रहा है। इससे उनका पाचन प्रभावित होता है। यह भी मोटापा का एक कारण है।
ग्रोथ भी रुक रही
बच्चों को फास्टफूड, जंक फूड, प्रोसेस्ड चीजें खाना ज्यादा पसंद है। इसमें कैलोरी कई गुना ज्यादा होती है। कार्ब व फैट शरीर में चर्बी के रूप में जमता है। इससे मोटापा बढ़ता है। इसके लिए पै्रंक्रियाज को ज्यादा इंसुलिन रिलीज करने की जरूरत होती है। जिससे वे डायबिटीज के मरीज बन जाते हैं। इसके अलावा हार्मोन का असंतुलन बढऩे से बच्चों के रिप्रोडक्टिव ऑर्गन पूरी तरह से विकसित नहीं हो रहे हैं। इससे बच्चों की हाइट बढऩे में भी दिक्कत आती है।
ऐसे समझें मोटापा
बीएमआइ चार्ट से बच्चों की फिटनेस कैलकुलेट करें। यदि बीएमआई चार्ट ८५ प्रतिशत से ज्यादा परसेंटाइल है तो बच्चा ओबीज कैटेगरी में है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
बच्चों में मोटापे के लिए माता-पिता जिम्मेदार होते हैं। उन्हें ऐसा लगता है कि उसे अच्छी सेहत के लिए और खिलाएं। इससे वह जरूरत से ज्यादा खिलाते हैं। जबकि बच्चों का खाना फीडिंग ऑन डिमांड होना चाहिए। जब मांगें तभी खिलाना चाहिए। आहार में फल व सलाद जरूर खिलाएं। नियमित खेलने के लिए पार्क आदि में भेजें।
- डॉ. संजय सारण, असिस्टेंट प्रोफेसर, हॉर्मोन विभाग, एसएमएस मेडिकल, जयपुर

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Fastfood : अपने बच्चों के साथ कहीं ये गलती आप तो नहीं कर रहे हैं?

अगर कोई बच्चा दिनभर में एक बार भी स्टूल पास न करे या एक बार जाए लेकिन वो बहुत सख्त हो और बच्चे को स्टूल पास करने के दौरान काफी परेशानी हो तो उसे कब्ज की शिकायत हो सकती है।
सामान्यत: इस रोग के दो कारण होते हैं-
1. नॉन ऑर्गेनिक : 90 प्रतिशत कब्ज से पीडि़त मरीजों में यह कारण होता है। इसमें बिगड़ी लाइफस्टाइल और खानपान में लापरवाही जैसी आदतें शामिल होती हैं।
2. ऑर्गेनिक : यह कारण 10 प्रतिशत मामलों में देखा जाता है। इसमें किसी शारीरिक या पैथोलॉजिकल परेशानी जैसे - सीलियक डिजीज, थायरॉइड हार्मोन की कमी आदि के कारण बनने वाला मल सख्त होता जाता है जिस वजह से स्टूल पास करने के दौरान मल के रास्ते में कट लग जाता है और बच्चे को काफी दर्द होता है। ऐसे में बार-बार स्टूल पास करने के दौरान होने वाले अधिक दर्द से वह डरने लगता है और उसमें मल को रोकने की प्रवृत्ति पैदा हो जाती है। इस सख्त मल की वजह से ये दिक्कत धीरे-धीरे बढऩे लगती है जो आगे चलकर गंभीर रोग का कारण भी बनती है। ऐसे में पैरेंट्स को बच्चों की खानपान से जुड़ी आदतों का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
खानपान व जीवनशैली में बदलाव जरूरी
कब्ज के इलाज में दवा से कहीं अधिक खान-पान और दिनचर्या के अलावा शारीरिक गतिविधियां भी जरूरी हैं। कब्ज जितना पुराना होगा, उतना ही अधिक समय इसे ठीक होने में लगेगा। कई बार पुराना कब्ज ठीक होने में 2 से 6 महीने तक लग जाते है।
कब्ज से बचाव के लिए ये काम करें
अधिक से अधिक हरी-पत्तेदार सब्जियां और फलों को डाइट का हिस्सा बनाएं। मौसमी सब्जियों का सलाद खाएं। बच्चों को जंकफूड व मैदा उत्पाद से दूर रखें। दूध की मात्रा को कम करके अन्य ठोस चीजें व सलाद खिलाएं (दस वर्ष की उम्र के बच्चे के लिए रोजाना 400-600 एमएल दूध पर्याप्त है)। चावल बच्चों को अधिक न खिलाएं। कोल्ड ड्रिंक, चॉकलेट कम खाएं व खिलाएं। आटे को छानते समय जो चोकर निकलता है उसे थोड़ी मात्रा में आटे में फिर से मिला दें या मोटा आटा अधिक काम में लेंं। अंकुरित बीज डाइट में शामिल करें। बच्चे को आउटडोर गेम खेलने के लिए प्रेरित करें। बच्चे को सुबह टहलाने साथ लेकर जाएं। साथ में एक बड़ी बोतल पानी भी रखें। इस दौरान बच्चे को डिहाइडे्रशन की समस्या से बचाने के लिए बीच-बीच में पानी पिलाते रहें।
जंकफूड-मैदा उत्पाद से ज्यादा प्यार
मैदा के बने हुऐ जंकफूड जैसे - मैगी, पास्ता, ब्रेड, बर्गर, पिज्जा, नूडल्स, पावभाजी के अलावा कोल्डड्रिंक, चॉकलेट को बच्चे आजकल अधिक खाते हैं। यह रोग होने का बड़ा कारण है। हरी सब्जियों और फलों से दूरी बनाना। आउटडोर खेलों से दूरी बनाने से शारीरिक गतिविधि कम होती है। इससे बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता पर भी असर पड़ता है। माता-पिता रात में देर तक जागते हैं और देर से उठते हैं।

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दिमाग नहीं, दिल से मुस्कुराइए, तभी मिलेगा पूरा फायदा

इमोशनल स्माइल : दिमाग नहीं, दिल से मुस्कुराएं। इसे इमोशनल स्माइल कहते हैं। इससे शरीर में कॉर्टिसॉल हॉमोन की मात्रा घटती है और शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है।
तनाव घटता
मुस्कुराने से दिमाग के न्यूरॉन्स सिंक्रोनाइज होते हैं। इसलिए यदि किसी बात कर रहें है तो सामने वाला भी मुस्कुराने लगता है। मुस्कुराने से तनाव घटता है। मूड अच्छा रहता है। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है। इससे ब्लड प्रेशर भी सामान्य रहता है। फील गुड होता है। डिप्रेशन की आशंका घटती है। जब मुस्कराते हैं तो शरीर में कुछ ऐसे हॉमोन भी स्रावित होते हैं जो एंटी एजिंग का काम करते हैं।
अच्छा रहता है
स्माइल से चेहरे की मांसपेशियां (जाइको मेटिकस मेजर-माइनर) की एक्सरसाइज होती है। तेज हंसने से गले की मांसपेशियों की भी एक्सरसाइज होती है। इससे रक्त संचार बढऩे से त्वचा चमकदार रहती है।
इसलिए पड़ते हैं डिम्पल

जब चेहरे की मांसपेशियां (जाइको मेटिकस मेजर-माइनर) दो भागों में डिवाइड होती हैं तो इस कारण मुस्कुराते समय गाल में डिम्पल पड़ते हैं। यह बचपन में ही दो भागों में डिवाइड हो जाती है। आर्टिफिसियल डिंपल के लिए लोग सर्जरी भी कराते हैं।
एक्सपर्ट : डॉ. लीनेश्वर हर्षवर्धन, सीनियर फिजिशियन, जयपुर

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Sunday, 27 October 2019

Diwali 2019: सुरक्षित रह कर मनाएं दिवाली, जलने पर रखें इन बाताें का ध्यान

Diwali 2019: आतिशबाजी के दौरान बर्न इंजरी के केस सामान्य दिनों की तुलना में चार गुना सामने आते हैं। इसका कारण सावधानी रखते हुए पटाखे या दीए न जलाना या रसोई में खाना बनाते समय लापरवाही बरतना है। जानें त्वचा संबंधी चोट लगने पर कैसे रखें खयाल-

मामूली घाव के लिए प्राथमिक चिकित्सा
- हाथ-पैर या शरीर के किसी भी हिस्से पर जलने की स्थिति में कम से कम 5-10 मिनट के लिए प्रभावित हिस्से को नल के नीचे बहते पानी में तब तक रखें जब तक कि जलन थोड़ी कम न हो जाए। ध्यान रखें कि पानी ज्यादा ठंडा नहीं होना चाहिए।प्रभावित हिस्से को रगड़े नहीं

- किसी भी घाव को ठीक करने के लिए बर्फ का प्रयोग न करें वर्ना घाव को ठीक होने में समय लग सकता है।

- गर्म तेेल, पटाखे की चिंगारी आदि से लगी चोट में प्रभावित हिस्से पर हुए घाव पर घी, तेल, मक्खन, टूथपेस्ट या किसी भी तरह का मरहम न लगाएं। इससे संक्रमण या फफोले होने की आशंका रहती है।
- किसी भी घाव को छोटा न समझें। आधे से एक घंटे के बीच तुरंत त्वचा रोग विशेषज्ञ से मिलकर इलाज लें।

गंभीर स्थिति में...
- आपातकालीन चिकित्सा के लिए कॉल कर सहायता लें। जब तक मदद न मिले तब तक इनका पालन करें-
- आग बुझाने के बाद सुनिश्चित करें कि पीडि़त किसी सुगंधित सामग्री, धूम्रपान या गर्मी के सम्पर्क में न आए। जले हिस्से पर कपड़ा चिपक जाए तो उसे हटाने का प्रयास न करें।
- ध्यान रखें कि जले हिस्से पर न तो किसी प्रकार की पट्टी बांधें न ही कपड़ा ढकें। रोगी को कंबल में लपेटकर अस्पताल ले जाएं।

क्या करें
- पटाखे या अन्य आग पकड़ने वाली चीजों से बच्चों को दूर रखें। पटाखे खुले स्थान या मैदान में चलाएं।
- उपयोग की गई आतिशबाजी को स्टील की पानी से भरी बाल्टी में नष्ट करें। वर्ना जमीन पर फेंकने से पैर में चोट लग सकती है। पटाखे जलाते समय मोटे सूती कपड़े पहनें। वाहनों के पास पटाखे न चलाएं।

- 10 मिनट के लिए जले हुए हिस्से को नल के नीचे पानी में रखें। फिर अस्पताल जाएं।
- 01 घंटे या आधे घंटे के बीच छोटा घाव ही सही, त्वचा रोग विशेषज्ञ से संपर्क कर इलाज लें।

ये न करें
पटाखे या अन्य चिंगारी वाली चीजों को रसोई से दूर रखें। हाथ में पकड़कर पटाखे न जलाएं।

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Diwali Celebration: धूमधाम से मनाएं दिवाली, लेकिन फर्स्ट एड बॉक्स की भी रखें तैयारी

Diwali Celebration: दीयों और पटाखों के त्योहार का आनंद तभी है जब थोड़ी सावधानी बरती जाए। इस दिन दीयों या पटाखों से कोई अनहोनी न हो इसके लिए जरूरी है कि फर्स्ट एड बॉक्स ( Diwali first aid Box ) पहले से ही तैयार रखें। ताकि जरूरत होने पर तुरंत प्रभावी कदम उठा सकें।

ऐसा हो किट
फर्स्ट एड किट ( Diwali first aid Kit ) में डॉक्टर की सलाह से एंटीसेप्टिक लोशन व क्रीम, पट्टी, बैंडेज, रुई, कैंची आदि रखें। इसके अलावा पेनकिलर दवा भी रख सकते हैं ताकि जरूरत पड़ने पर दे सकेंं।

आंखों का खयाल
पटाखे जलाते समय आंख में कोई टुकड़ा या चिंगारी चली जाए तो आंखों को तुरंत पानी से साफ करें। राहत न मिले तो डॉक्टर से मिलें। कॉन्टैक्ट लेंस पहनते हैं तो आंखें साफ करने से पहले इन्हें हटाएं।

एंटीसेप्टिक लोशन : जले हुए पर संक्रमण न फैले इसके लिए एंटीसेप्टिक लोशन व क्रीम लगाएं। इससे प्रभावित हिस्सा ड्राई न होगा। डॉक्टर की सलाह पर इसे साथ रखें।

घरेलू उपाय
हल्दी: इसका पेस्ट बनाकर जले हुए हिस्से पर लगाने से जलन में राहत मिलेगी।
शहद: इसकी ठंडी तासीर से भी जले हुए हिस्से पर राहत मिलती है। इसे सीधे लगाएं।
एलोवेरा: इसका गूदा जले हुए हिस्से पर सीधा लगाने से जलन कम व फफोले नहीं पड़ेंगे।
नारियल तेल: एंटीफंगल व एंटी बैक्टीरियल गुण होने के कारण यह राहत देता है।

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Diwali Celebration: ये खास ड्रिंक्स पींए और पिलाएं, दिवाली फेस्टिवल को स्पेशल बनाएं

Diwali Celebration In Hindi: त्योहार के दिन विभिन्न तरह की मिठाई, नमकीन, समोसा आदि सभी बनाते हैं। यदि आप डिश के रूप में हैल्दी ड्रिंक्स भी तैयार कर लेंगी तो बात ही कुछ और होगी। इनसे घर आने वाले मेहमान तो खुश होंगे साथ ही मार्केट के केमिकलयुक्त ड्रिंक्स से भी बचा जा सकेगा। आइए जानते है त्याैहारी सीजन में एनर्जी देने वाले हाेममेड हैल्दी ड्रिंक्स ( Homemade Drinks on Diwali ) के बारे में :-

बादाम शेक
बच्चों और बड़ों के लिए यह ड्रिंक सेहत के अनुसार काफी हैल्दी है। इसकी खास बात है कि इसे बनाने में ज्यादा समय नहीं लगता व पौष्टिक है।

ऐसे बनाएं
सामग्री: दूध 400 मिली., 20-25 बादाम, 2 छोटी इलायची, 2 चम्मच चीनी, बर्फ के टुकड़े।

विधि : यदि सुबह बादाम शेक बनाना है तो आप रात में ही बादाम को पानी में भिगो दें। अब भिगोए हुए बादाम को छीलकर ब्लेंडर में चीनी, इलायची और थोड़े दूध के साथ अच्छे से पीस लें। अब अलग से फ्रिज में रखे दूध में पिसी हुई सामग्री को मिलाएं। इसके बाद छलनी से छान लें। अब इस मिश्रण को गिलास में डालकर ऊपर से बर्फ डालें। थोड़ी सी बादाम की कतरनें भी ऊपर से सजाने के तौर पर डालकर ठंडा सर्व करें।

चॉकलेट शेक
चॉकलेट सभी को पसंद होती हैं। ऐसे में आप मेहमानों के लिए भी इससे शेक बना सकती हैं। बच्चे भी खुश हो जाएंगे।
ऐसे बनाएं
सामग्री : एक गिलास ठंडा दूध, ड्रिंकिंग चॉकलेट पाउडर एक चम्मच, आधा चम्मच कोको पाउडर, एक चम्मच डार्क चॉकलेट, 2 चम्मच चीनी।
विधि : चॉकलेट शेक बनाने के लिए सबसे पहले डार्क चॉकलेट के छोटे टुकड़े करके उसे माइक्रोवेव में रखकर पिघला लें और फिर इसे मिक्सी के जार में डाल लें। साथ में 2-3 चम्मच दूध डालकर इसे पीसें ताकि इनका पेस्ट बन जाए। फिर इसमें कोको पाउडर, ड्रिंकिंग चॉकलेट पाउडर व चीनी डालें। साथ में लगभग 1/4 कप दूध डालकर मध्यम स्पीड पर मिक्सी में इसे अच्छे से फेंट लें। आखिर में बचा हुआ दूध डालें और लगभग 2 मिनट तक या इसमें झाग आने तक तेज स्पीड पर मिक्सी में फेंटें। चॉकलेट शेक तैयार है।

पान शॉट्स
सामग्री : कुछ पान के पत्ते, मीठी सौंफ, गुलकंद और वनीला आइसक्रीम।
विधि : जार में पान के पत्तों को तोड़कर डालें, एक चम्मच सौंफ, चार चम्मच गुलकंद, थोड़े बर्फ के टुकड़े, दो कप वनीला आइसक्रीम डालकर मिक्स करेेंं। इस मिश्रण को गिलास में डालें। चाहें तो इसपर मेवों को बारीक कर डालें।

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Diwali Celebration: होममेड मिठाई खाएं और सेहतमंद दिवाली मनाएं

Diwali Celebration In Hindi: मिठाई के बिना दिवाली का मतलब ही नहीं है। हालांकि मार्केट में मिलने वाली मिठाइयों में कई बार मिलावट की समस्या भी सामने आती है। ऐसे में कई लोग मार्केट की मिठाइयों को खरीदने से बचते हैं। लेकिन आप चाहें तो ऐसी स्थिति से बच सकते हैं। घर पर ही आसान तरीकों और चीजों से पौष्टिक व सेहतमंद मिठाई बना सकते हैं। आइए जानते हैं घर पर तैयार की जा सकने वाली सेहतमंद मिठाइयाें के बारे में :-

नारियल के लड्डू
आसानी से बनने वाले नारियल के लड्डू सेहत के लिहाज से काफी पौष्टिक होते हैं।

सामग्री
एक कप ताजा नारियल (कद्दूकस किया), चीनी आधा कप, दूध 3 कप, चुटकीभर इलायची पाउडर, 7-8 कतरन केसर, 7-8 किशमिश सजाने के लिए।

बनाने की विधि
इसे बनाने के लिए भारी कढ़ाही का प्रयोग करें। ताजा नारियल का भूरा हिस्सा चाकू से हटाकर अच्छे से कद्दूकस कर लें। अब कढ़ाही में दूध व कद्दूकस किया हुआ नारियल मिलाएं व उबाल आने के बाद गैस कम कर दें। मिश्रण को गाढ़ा होने तक बीच-बीच में चलाते रहें। वर्ना जल सकता है। इसमें चीनी डालने के बाद इलायची व केसर की कतरनें डालें। थोड़ी देर चाश्नी जलाने व मिश्रण गाढ़ा होने के लिए इसे धीमी अांच पर पकाएं। गैस बंद कर ठंडा कर लड्डू का आकार दें।

फायदा
विटामिन, कैल्शियम व आयरन की पूर्ति।

अखरोट की बर्फी
अखरोट पौष्टिक मेवा है। इससे दिमाग को मजबूती मिलती है।

सामग्री
400 मिलीलीटर कन्डेंस्ड मिल्क, एक चम्मच कोको पाउडर, 100 ग्राम सूखा कसा हुआ नारियल व 250 ग्रा. पिसा हुआ अखरोट।

बनाने की विधि
एक कढ़ाही में कन्डेंस्ड मिल्क गर्म कर उसमें कोको पाउडर डालकर चलाते हुए उबालें। जैसे ही उबलना शुरू हो जाए इसमें कसा हुआ नारियल व पिसा हुआ अखरोट मिक्स करें। इसमें स्वाद के अनुसार चीनी डालें। कुछ देर गाढ़ा होने तक पकाएं। इस मिश्रण को थोड़ा घी लगी ट्रे में निकालकर समान रूप से फैलाकर ठंडा होने पर मनचाहे आकार में काटें।

फायदा
ओमेगा-थ्री फैटी एसिड से युक्त अखरोट की बर्फी दिमाग को ताकत देती है।

गुलाब जामुन
सामग्री
250 ग्रा. मावा (खोया), 100 ग्रा. पनीर, 2-3 चम्मच मैदा, एक चम्मच बारीक कटे काजू, 8-10 किशमिश, थोड़ी पिसी इलायची, चीनी 3 कप, घी तलने के लिए।

चाशनी बनाने की विधि
एक बर्तन में चीनी और इसकी मात्रा से आधा पानी मिलाकर पकाएं। चीनी घुलने के बाद 2-3 मिनट और उबालें। इस घोल में से 1-2 बूंदे लेकर प्लेट में टपकाएं और अंगूठे व अंगुली के बीच चिपका कर देखें। यदि यह अंगुली व अंगूठे के बीच चिपक रही हो तो समझिए कि चाशनी तैयार है।

गुलाब जामुन ऐसे बनाएं
बड़े बर्तन में मावा, पनीर व मैदा डालकर नरम आटा गूथें। एक कटोरी में सूखे मेवों को बारीक काटकर किशमिश संग रखें। अब मावे के मिश्रण से छोटी लोई बनाकर बीच में सूखे मेवे की फिलिंग करें। ऐसी कई लोइयां बनाकर कढ़ाही में देसी घी गर्म कर अच्छे से तलें। इस दौरान कल्छी न लगाएं वर्ना ये फट जाएंगे। ठंडा कर गुलाबजामुन को चाशनी में कुछ देर रखें। सोखने के बाद इन्हें निकालकर सर्व करें।

फायदा
200 कैलोरी ऊर्जा मिलती है एक गुलाबजामुन से।

बेसन व मक्की के आटे का नमकीन
जरूरी नहीं कि आप नमकीन भी मार्केट से खरीदें। इनमें पुराना मसाला और खराब तेल हो सकता है। आप बेसन या मक्की के आटे से मठरी या नमकीन बना सकते हैं। साथ ही चिवड़ा भी सूखे मेवों और मूंगफली के दानों के साथ भून सकते हैं। यह कम मसाले वाला होता है। इसमें काजू, बादाम, पिस्ता या मूंगफली को रोस्ट कर नमक के साथ मिक्स कर सकते हैं। दाल को पीसकर भी उससे नमकीन बना सकते हैं।

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Saturday, 26 October 2019

Diwali celebration Tips: दिवाली मनाएं पर शुगर चकरी, वजन बम, बीपी रॉकेट से बचें

Diwali celebration Tips In Hindi: फेस्टिवल सेलिब्रेशन के दौरान खाने-पीने में लापरवाही आपकी सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकती है। अक्सर देखा जाता है कि साल-भर अपनी हैल्थ को लेकर सचेत रहने वाले लोग त्योहारों पर लापरवाह हो जाते हैं, जिसका नतीजा शुगर लेवल, वजन, ब्लड प्रेशर व अन्य चीजों पर दिखाई देता है। अगर आप इस बार
हैल्दी तरीके से दिवाली मनाना चाहते हैं इन चीजों पर जरा ध्यान देने की जरूरत है...

चीनी कम ही लें
मधुमेह रोगी इस दौरान मिठाइयों से दूरी बनाए रखने के साथ ही शुगर व स्टार्च इनटेक पर नजर रखें। शुगर लेवल सिर्फ मीठी चीजों से ही नहीं, ज्यादा तली हुई चीजों से भी बढ़ता है। सल्फर की मात्रा अधिक होने से सफेद चीनी दिमाग, हृदय व अन्य अंगों के लिए हानिकारक है। इसके बजाय ब्राउन शुगर या गुड़ प्रयोग में लें। खाली पेट या कसरत के बाद मिठाई खाएं। क्योंकि इस दौरान शरीर में कैलोरी कम होने पर कार्ब फैट में नहीं बदलता है।

बेकिंग अच्छा विकल्प
मार्केट में मिलने वाली चकली, चिवड़ा या अन्य चीजों में ट्रांस फैट होता है, जो कोलेस्ट्रॉल का स्तर व वजन बढ़ाने के साथ हृदय रोगों को बढ़ाता है। ऐसे में मिठाइयां या अन्य चीजों को तलने की बजाय बेक करें। मार्केट में नमकीन या अन्य स्नैक्स को तलने के लिए एक ही तेल बार-बार प्रयोग होता है। इस कारण इसमें फ्री रेडिकल्स बनते हैं जो स्वस्थ कोशिकाओं से जुड़कर हमें बीमार करते हैं। इससे एसिडिटी, जलन आदि होती है।

पानी की कमी न होने दें
त्योहार के दौरान हम अटरम शटरम ज्यादा लेते हैं। हालांकि पेय पदार्थ लेते हैं लेकिन पानी पीना लगभग भूल ही जाते हैं। यह सेहत के लिए गलत है। स्वस्थ रहने व अन्य रोगों से बचाव के लिए खुद को हाइडे्रट रखना बहुत जरूरी है।

ओवरईटिंग न करें
कईस्वादिष्ट चीजों के खयाल से भोजन के बजाय लोग चटपटी चीजें खाकर पेट भर लेते हैं। यह स्थिति ओवरइटिंग की है जिसका असर लिवर पर पड़ता है।

मैदा नहीं, गेहूं सही
दिवाली के दौरान स्नैक्स में मिलने वाली ज्यादातर चीजें मैदा की बनी होती हैं जो हृदय की धमनियों में बाधा पहुंचा सकती हैं। इसमें कम न्यूट्रीशन और ज्यादा कैलोरी होती है। मैदा की जगह गेहूं के आटे का प्रयोग बेहतर है। इसमें ग्लाइसीमिक इंडेक्स कम होता है जिससे ब्लड ग्लूकोज का स्तर प्रभावित नहीं होता।

व्यायाम जरूरी
त्योहार का बहाना बनाकर वर्कआउट से दूरी न बनाएं। दिवाली या इसके बाद वर्कआउट के लिए थोड़ा वक्त जरूर निकालें ताकि खाने-पीने के जरिए इस दौरान आपने जो भी कैलोरी बढ़ाई है वह बर्न हो सके।

सावधानी जरूरी
सिंथेटिक की बजाय सूती कपड़े पहनें। अच्छी गुणवत्ता के पटाखे खरीदें। साथ ही उन्हें जलाने के निर्देश पहले से पढ़ लें। जरूरत से ज्यादा खाने से बचें। पुरानी खाद्य सामग्री प्रयोग में न लें वर्ना फूड पॉइजनिंग की समस्या हो सकती है।

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Eco Friendly Diwali: इस बार इको-फ्रेंडली तरीके से मनाएं दिवाली

Eco Friendly Diwali: दिवाली रोशनी का त्योहार है जाे अंधकार पर प्रकाश की जीत का प्रतीक है। देश के हर हिस्से में बड़े पैमाने पर दिवाली काे उल्लास के साथ सेलिब्रेट किया जाता है। लेकिन इस दाैरान पटाखाें, प्लास्टिक के सामान का ज्यादा उपयाेग प्रदूषण काे बढ़ावा देता है जाे कर्इ लाेगाें की सेहत के लिए खतरा बन जाता है। यदि आप चाहे ताे इस बार इकाे फ्रेंडली दिवाली मनाकर प्रदूषण की समस्या काे कम करने में सहायता कर सकते हैं। आइए जानते हैं इकाे फ्रेंडली दिवाली मनाने के टिप्स के बारे में :-

समुदाय / समाज में संगठित हाेकर जश्न मनाएं
व्यक्तिगत समारोह की अपेक्षा सामुदायिक समारोह अधिक खुशी देने वाला हाेता है। साथ यह कम खर्चीला हाेता है। एक निश्चित स्थान पर समाराेह का आयाेजन करने से जगह-जगह पटाखाें का प्रदूषण नहीं फैलता हैं। कम पटाखाें में भी दिवाली का भरपूर आनंद लिया जा सकता है।

समय का रखें ध्यान
दिवाली सेलिब्रेशन रात 10 बजे से आधी रात तक करना ठीक रहता है। क्याेंकि नवजात शिशुओं , बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों की सेहत काे अत्यधिक शोर और वायु प्रदूषण से खतरा हाे सकता है। इसलिए जरूरी हाे जाता है निश्चित समय के बाद पटाखाें आदि का प्रयाेग ना करें। आपका यह कदम किसी कि सेहत सलामत रखने में सहायक हाे सकता है।

पर्यावरण के अनुकूल करें सजावट
घर सजाने के लिए प्लास्टिक के फूलों के बजाय असली फूलाें का उपयाेग करें। रंगोली में भी कैमिकल युक्त पाउडर का उपयाेग न करके जैविक फूल पत्तियाें का उपयाेग करना सेहत के लिए अच्छा हाेता है। फूल से आने वाली खुशबू से घर महकता रहता है। साथ ही प्रदूषण का खतरा भी कम हाे जाता है।

पटाखाें में करें कटौती
रासायनिक पटाखे के बजाय केवल पर्यावरण के अनुकूल पटाखे खरीदें। पर्यावरण के अनुकूल पटाखे पुनर्नवीनीकरण कागज से बने होते हैं। इन पटाखों से उत्पन्न ध्वनि की सीमा प्रदूषण बोर्ड के दिशा निर्देश के अंतर्गत हाेती है। जाेकि ध्वनि प्रदूषण कम रखने में सहायक हाेते हैं।

मिट्टी के दीये
बिजली / चीनी के बजाय "मिट्टी के दीपक या दीये" से घर को सजाएं। मिट्टी के दीपक को रोशनी के लिए तेल की आवश्यकता होती है, लेकिन ये प्रदूषण नगण्य है। दीए जलाना माैसमी बैक्टीरिया का खत्म करने में सहायक हाेता है। यह बिजली के बिल में भी कटाैती करता है साथ ही घर की सुंदरता भी बढ़ता है।

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Diwali Diet Tips: दिवाली पर अपनाएं ये हैल्दी डाइट टिप्स

Diwali Diet Tips in Hindi: दीवाली त्याैहार यानि मिठार्इयाें का त्याैहार। दिवाली आते ही बाजार तरह−तरह की मिठाइयों से गुलजार हाे जाते हैं। इसके साथ ही घर में भी तरह-तरह के मीठे पकवान बनाएं जाते हैं ताकि त्याैहार के दाैरान खानेपीने में काेर्इ कमी ना रहेंं, लेकिन ये बेहिसाब खाना आपकी सेहत पर विपरित प्रभाव भी डाल सकता है। अगर आप दिवाली के माैके पर सेहतमंद रहना चाहते हैं ताे इन खानपान काे लेकर इन बाताें का ध्यान रखें :-

कम कैलाेरी का करें सेवन
दीवाली के त्याैहार पर एेसा ताे कम ही हाेता है कि लोग तला हुआ, मीठा या हाई कैलोरी फूड न खाएं। अगर आप भी इन चीजाें के शाैकिन है ताे आप खाने की आदत में कुछ बदलाव कर अपनी कैलोरी इनटेक को नियंत्रित कर सकते हैं। बस जरूरत है कि आप एक साथ बहुत सारा न खाकर, टुकड़ाें-टुकड़ाें में खाएं। इससे आपकी सेहत बनी रहेगी।

हेल्दी चीज ही खाएं
कम खाने के साथ ध्यान रखें कि जाे भी खाएं वाे हैल्दी हाे। बाजार की मिठार्इयाें में मिलावट की बहुत आशंका रहती है, बेहतर हाेगा की घर पर बनी मिठार्इयां ही खाएं। मावे की जगह बेसन, सूखे मेवाें से बनी मिठार्इयाें का सेवन करें। डाईफ्रूट्स खाना भी मीठा खाने का अच्छा ऑप्शन साबित होगा।

वर्कआउट जरूरी
त्याैहारी सीजन में अक्सर लाेग वर्कआउट रूटीन काे छाेड़ देते हैं जिससे उनकी सेहत काे नुकसान हाेता है। क्याेंकि त्याैहार के दाैरान लाेगाें का कैलोरी इनटेक अधिक होता है, एक्सरसाइज रूटीन ब्रेक हाेने से माेटापा बढ़ने की समस्या हाे सकती है। इसलिए जरूरी है की वर्कआउट रेगूलर रखा जाए।

पानी जरूर पीएं
दीवाली के त्याैहार पर खाते रहने से पेट भरा हुआ रहता है एेसे में कर्इ लाेग पानी पीना कम कर देते हैं जाेकि सही नहीं है। इससे डिहाइड्रेशन की समस्या हाे सकती है। इसलिए पर्याप्त मात्रा में पानी पीएं इससे आप अतिरिक्त कैलोरी लेने से भी बच सकते हैं। पेय पदार्थों के ताैर पर पानी, नींबू पानी, नारियल पानी व छाछ आदि को अपनी डाइट में शामिल करें।

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Diwali 2019: दिवाली पर इन बाताें का रखें ध्यान, अच्छी रहेगी सेहत

Diwali 2019 In Hindi: दिवाली का त्यौहार खुशियाें का त्यौहार है।और इस खुशी काे बरकरार रखने के लिए जरूरी है कि आप अपनी सेहत का ध्यान भी रखें। अक्सर देखा जाता है कि त्याैहारी सीजन में लाेग अपनी सेहत की परवाह नहीं करते जिससे उन्हें दिक्कत का सामना करना पड़ता हैं। आइए जानते हैं दिवाली के इस माैके पर कैसे सेहत का अच्छा रखकर त्याैहार का आनंद लें :-

मिठार्इ पर रखें केंट्राेल
दिवाली के त्याैहार पर देखा जाता है कि लाेग कैलोरी और फैट की अधिक मात्रा वाले आहार काे जमकर खाते हैंं। जिससे उनमें डायबिटीज का स्तर बढ़ने का खतरा रहता हैं। खासकर डायबिटीज के राेगी मीठा खाना चाहते हैं तो कोशिश करें की मिठाई शक्कर वाली न हाेकर खजूर की चाशनी, ब्राउन राइस सिरप, स्टीविया, शहद, गुड़ आदि से तैयार की गर्इ हाे।इस तरह की मिठार्इ से सेहत का नुकसान नहीं हाेता है।

धुंए से रखे दूरी
अस्थमा के राेगियाें काे दिवाली के माैके पर विशेष ताैर पर सजग रहने की जरूरत है। अस्थमा, सीओपीडी सरीखी सांस की समस्याओं से पीड़ित लोग धुएं और प्रदूषण भरे पर्यावरण से बचने के लिए घर की चारदीवारी में ही रहें ताे अच्छा है। बाहर जाना भी पड़े तो सर्जिकल मास्क लगाकर ही जाएं। अगर ऐसे लोग पटाखों का लुत्फ लेना चाहते हैं तो मास्क के साथ काफी ऊंचाई की जगह से दूर से जलते हुए पटाखों का आनंद लें, क्योंकि ऊंचाई पर प्रदूषण का स्तर कुछ कम रहता है।

दिल और रक्तचाप का रखे ध्यान
दिल और रक्तचाप के मरीजाें काे अपनी सेहत काे लेकर सजग रहना जरूरी है। दिवाली के माैके पर तेज आवाज के पटाखे, धुआं, बदला हुआ खान-पान, ये सभी दिल और रक्तचाप से पीड़ित लोगों की समस्याओं में इजाफा करते हैं। उन्हें तेज आवाज सोने नहीं देती। अनिद्रा के चलते रक्तचाप बढ़ता है, साथ ही घबराहट होती है, जिसका सीधा असर दिल पर पड़ता है। तला-भुना-चिकना खान-पान भी अधिक काबाेर्हाइड्रेट का होने के कारण रक्तचाप पर असर डालता है। चीनी भी रक्तचाप को बढ़ाती है। इसके लिए जरूरी है कि आप अपनी खुराक और नींद का खास ख्याल रखें। इस दिवाली तले पकवानों के बजाय रोस्टेड पकवानों को मैन्यू में शामिल करें। नमक और मसालों का प्रयोग कम करें।

प्रदूषण एलर्जी से बचें
दिवाली के माैके पर बढ़ा हुआ प्रदूषण ढेर सारी समस्याओं के साथ एलर्जी की सौगात भी लेकर आता है। इसमें कुछ लोगों को आंखों में जलन होती है तो कुछ की आंखें लाल हो जाती हैं। एलर्जी के मरीजों को त्वचा की समस्याएं भी हो जाती हैं। उल्टी, दस्त, खांसी, जुकाम आदि भी एलर्जी के प्रकार होते हैं। आंखों की समस्या से बचने के लिए जब भी आप बाहर जाएं तो आंखों पर सर्जिकल चश्मा लगा लें।

पटाखों की तेज आवाज से हाे सकती है दिक्कत
पटाखों की तेज आवाज और जगमगाती तेज रोशनी माइग्रेन से परेशान लोगों की परेशानी में इजाफा कर जाती हैं। समस्या को बढ़ाने वाले ये वो कारण हैं, जिन्हें आप चाह कर भी कम नहीं कर सकते। सामान्य तौर पर माइग्रेन के रोगी दवाओं का सेवन तब करते हैं, जब वे सिरदर्द से दो-चार हो रहे होते हैं। पहले से पूरी सावधानी बरतें।

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Anxiety: मन का उदास रहना, बेचैनी, घबराहट, पसीना आना एंजायटी के लक्षण

अक्सर लोगों की शिकायत रहती है कि रात में नींद नहीं आती है। काम करने का मन नहीं करता है। उदास रहते हैं। बातें जल्द भूल जाते हैं। वहीं स्टूडेंट्स को याद न रहने की समस्या रहती है। दिमागी उलझन,याददाश्त कम क्यों? जानिए इसके बारे में।

मनोरोगों के कई लक्षण -
एक लक्षण के आधार पर मानसिक रोग नहीं तय होता है। रोने का मन करना, मन उदास रहना, काम की अनिच्छा, एकाग्रता की कमी, दूसरों से कम आंकना आदि जैसे लक्षण दो सप्ताह से अधिक समय तक हैं तो मनोरोग हो सकता है। एक-दो लक्षण हैं तो वह मनोरोग नहीं है। डिप्रेशन या एंजायटी हो सकते हैं। जीवनशैली सही रखें। इनका इलाज संभव है।

ऐसे काम करता है दिमाग -
मस्तिष्क में याद रखने की प्रक्रिया तीन स्टेप्स में होती है। सूचना को रजिस्टर(दर्ज), संग्रहित (स्टोर) और याद (रिकॉल) करना। इनमें कहीं भी गड़बड़ी होने पर याद्दाश्त की समस्या होती है। विचारों में खोए रहने से याद नहीं रहता है। जैसे कोई बच्चा शरीर से कक्षा में और दिमाग से कक्षा से बाहर है तो टीचर की बातें याद नहीं रहेंगी। क्योंकि बातें न तो रजिस्टर और न ही स्टोर हुई हैं।

जरूरी बातें याद रखता है दिमाग -
मस्तिष्क इकोनॉमिक्स की तरह हमारे शरीर के लिए नफा-नुकसान के अनुरूप काम करता है। वह उन्हीं बातों को याद रखता है जो आपके लिए जरूरी है जैसे आपको अपनी शादी की हरेक बात याद रखनी है, लेकिन दूसरों की शादी की नहीं। याद्दाश्त बढ़ाने के लिए बातों को याद करते रहें। नियमित उसका ध्यान करें। एंजायटी, डिप्रेशन, थकान, नशे, नींद व एकाग्रता की कमी से भी याद्दाश्त की मस्या होती है।

जब मन हो तो ही पढ़ें -
पढ़ना एक एक्टिव प्रक्रिया है। मन लगाकर पढ़ें। अगर मन नहीं कर रहा है तो उस समय आराम और एक्सरसाइज करें। पढ़ाई के समय केवल पढ़ाई ही करें। पढ़ने के समय भविष्य की प्लानिंग न करें। दूसरी गतिविधियों पर ध्यान न दें। ब्रेन की क्षमता 50-55 मिनट तक लगातार काम करने की होती है। एक सिटिंग में इतना ही पढ़ें। फिर 15 मिनट का ब्र्रेक लें। इसमें कुछ खाएं, व्यायाम या चहलकदमी करें। केवल कोर्स पूरा करने के चक्कर में न रहें। आधा समय रिविजन पर दें। रटने की जगह समझने को प्राथमिकता दें। इससे भी याद्दाश्त बढ़ती है। नोट्स बनाकर पढ़ें। इससे मुख्य-मुख्य बिंदुओं को दोहरा सकते हैं। पढ़ाई के लिए डिस्कशन करें। इससे मेमोरी तेज होती है।

बच्चे सुस्त हों तो ध्यान दें -
बच्चा अगर ज्यादा सुस्त है। पढ़ाई में मन नहीं लगता है, चिड़चिड़ा है। उसका परफॉर्मेंस घट रहा है तो डिप्रेशन हो सकता है। पैरेंट्स और टीचर उसे डांटने और दूसरों से तुलना करने से बचें। कभी-कभी एकाग्रता की कमी से भी बच्चे अधिक चंचल होते हैं, ऐसे में डॉक्टर को दिखाना चाहिए।

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जानिए पंचगव्य और शहद से होने वाले फायदे

चरक संहिता में पंचगव्य यानी गाय का मूत्र, दूध, घी, दही और गोबर से कई रोगों के इलाज के बारे में बताया है। वहीं गोबर व गोमूत्र शरीर के शुद्धीकरण के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। पांचों चीजें ना सिर्फ रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती हैं बल्कि खुजली, दाद, पेट दर्द, कब्ज और बवासीर जैसे रोगों का इलाज भी करती हैं। एक शोध में गोबर और दही को कैंसर के इलाज में उपयोगी माना है।

एक्सपर्ट: पंचगव्य विशेष रूप से मानसिक रोग जैसे उन्माद, मिर्गी में काफी लाभदायक है। इसके अलावा इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है जिससे कई रोगों से बचाव होता है। व्यक्ति को समस्या के आधार पर डॉक्टरी सलाह पर इसका नियमित प्रयोग करने से काफी फायदा मिलता है।

कफ दूर करता शहद -
एक अध्ययन के अनुसार 1 से 5 साल के बच्चों को सोने से पहले एक या दो छोटे चम्मच शहद देने पर खांसी कम होगी और नींद भी अच्छी आएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि शहद गले के पीछे एक गाढ़ी परत बना देता है, जिससे गले में खिंचाव कम हो जाता है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं। इसकी मिठास से लार ज्यादा बनती है, जो म्यूकस को पतला करती है।

एक्सपर्ट: आयुर्वेद में कफ के लिए शहद को सर्वश्रेष्ठ औषधि माना गया हैं। पुराने शहद का प्रयोग डॉक्टरी सलाह पर नियमित एक चम्मच लेने से फायदा होता है। बच्चों को इससे बहुत जल्द राहत मिलती है।

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सौंफ के शरबत से मिलते हैं ये लाभ

ये हैं सामग्री
4 टेबल स्पून सौंफ, 12 टेबल स्पून मिश्री, 1 टेबल स्पून काली मिर्च और खसखस, 2 टेबल स्पून साबुत इलायची एकसाथ रख लें।

ऐसे बनाए शरबत
मिक्सी के जार में सौंफ, मिश्री, काली मिर्च और खसखस, साबुत इलायची डालकर पीस लें। पीसे हुए मिश्रण को छलनी से छान लें। पानी में दो चम्मच मिश्रण मिला दें। शरबत को ठंडा करने के लिए उसमेें बर्फ के टुकड़े डालकर शरबत सर्व करें। यह शरबत लू से बचाता है। सौंफ में कॉपर, आयरन, कैल्शियम, पौटेशियम, मैग्नीशियम और जिंक प्रचुर मात्रा में होता है। ये सेहत के लिए फायदेमंद है।
मिलते हैं कई लाभ, पाचन ठीक रहता है
गर्मी में इसका नियमित प्रयोग करने से गर्मी से बचाव होता है। पाचन ठीक रहता है। धूप में बाहर जा रहे हैं तो सौंफ के शरबत को बोतल में रखकर ले जा सकते हैं। बच्चे जब बाहर से खेलकर आते हैं तो इसे पिला सकते हैं। इससे उन्हें ऊर्जा मिलेगी।

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युवाओं की फिटनेस के लिए फायदेमंद हैं ये योगासन

युवा अपनी भागदौड़ भरी जिंदगी में थोड़ा समय योग के लिए निकालेंगे तो वे पूरी तरह फिट और एक्टिव रह सकते हैं। पढ़ाई और नौकरी करने वाले युवा रोजाना 15 से 20 मिनट योग करें तो ध्यान केंद्रित करने की क्षमता बढ़ेगी और शरीर मजबूत होगा। इससे वे अपने काम को भी बेहतर ढंग से कर सकते हैं। उत्कट आसन, अर्धमतसेंद्र आसन और भुंजग आसन फायदेमंद आसन हैं। जानते हैं योग विशेषज्ञ से कैसे युवा कर सकते हैं ये तीन योगासन।

उत्कट आसन -
इसे चेयर पोज भी कहते हैं। पहले सीधे खड़े हो जाएं। दोनों घुटनों को मोड़ते हुए दोनों हाथों को ऊपर उठाएं। हाथों को टाइट रखें और हाथों को देखने की कोशिश करें। इसे नियमित करने से पैर की मांसपेशी मजबूत होगी। कमर दर्द ठीक होगा। नियमित करने से ध्यान एकाग्रित रहेगा।

भुजंगासन - सीने के बल लेट जाएं। दोनों हाथों को सीने के पास रखें और पैरों को मिलाकर रखें। गहरी लंबी सांस लेते हुए अपने आप को आगे की तरफ सीने से उठाएं। कमर को मोड़े। कोहनी को सीधा रखना होगा। इससे ऑफिस में देर तक कुर्सी पर बैठकर काम करने वाले लोगों को कमर दर्द से बचाव होगा और ऊर्जा भी मिलेगी।

अर्धमतसेंद्र आसन -
पहले जमीन पर बैठ जाएं। दाहिने पैर से बाएं पैर को क्रॉस करें। दाहिने पैर को हिप्स के पास लगाएं। बाएं हाथ को जमीन पर लगाएं। दाएं हाथ से पैर को धक्का देते हुए कमर को घुमाने की कोशिश करें। इससे मोटापा, डायबिटीज, हॉर्मोन असंतुलन और तनाव से दूर रहेंगे।

सुबह का समय बेहतर -
युवाओं के लिए योग करने का बेहतर समय सुबह पांच से सात बजे का है। खुली हवा या पार्क में योग करने से फायदा होता है।

इसका रखें ध्यान -
इंटरनेट या यू-ट्यूब से देख योग न करें
योग विशेषज्ञ की निगरानी में योग करें
योग करने की समय सीमा भी तय करें
योग करते वक्त शरीर में दर्द है तो न करें
ऑपरेशन या चोट लगी है तो योग न करें
क्षमता से अधिक योग करने से बचें
गर्मी में खाने के बाद योग न करें।

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