Friday, 29 November 2019

जानिए हीमोफीलिया रोग से जुड़ी ये खास बातें

छोटे बच्चों को साइकिल चलाते या बाहर खेलते हुए चोट लगना कोई नई बात नहीं है, लेकिन हीमोफीलिया से पीड़ित बच्चों के लिए ये स्थिति जान जोखिम में डालने जैसी हो सकती है। इस डर से इन बच्चों को ऐसी गतिविधियों से दूर रखना माता-पिता को परेशान करती है। हीमोफीलिया से पीड़ित बच्चों के अभिभावकों की कोशिश होती है कि बच्चा घर के अंदर ही रहे।

हीमोफीलिया आनुवांशिक जेनेटिक रक्त रोगों में से एक है। ये खून के थक्के बनने की प्रक्रिया को धीमा करती है। इससे अत्यधिक रक्तस्त्राव हो सकता है और जोड़ों की क्षति से दिव्यांगता आ सकती है। यह रोग लड़कों में अधिक पाया जाता है। इसके लक्षण उम्र बढ़ने के साथ दिखने शुरू हो जाते हैं। हीमोफीलिया में पर्याप्त क्लॉटिंग फैक्टर नहीं बनता जो प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला प्रोटीन है। ये रक्तस्त्राव को नियंत्रित करता है। परिणामस्वरूप हल्की सी चोट से भी अत्यधिक रक्तस्त्राव, विशेष रूप से जोड़ों में हो सकता है। इससे जोड़ क्षतिग्रस्त व लगातार रक्तस्त्राव हो सकता है। हीमोफीलिया दो प्रकार के होते हैं। ए व बी। हीमोफीलिया ए प्रोटीन फैक्टर आठ की कमी से जबकि बी फैक्टर नौ प्रोटीन की कमी से होता है। चोट लगने पर पीड़ित की प्रतिरोधकता क्षमता को दवा से बढ़ाया जाता है।

इसमें रोगियों को नियमित व्यायाम करना चाहिए क्योंकि इससे शरीर का उचित वजन बनाए रखने में मदद मिलती है तथा फिजियोथैरेपी करवाने से मांसपेशियों व हड्डियों को ताकत मिलती है। मरीज की नियिमत स्वास्थ्य जांच करवानी चाहिए।

क्या है प्रोफाइलेक्सिस -
प्रोफाइलेक्सिस दो प्रकार का होता है। इंटरमिटेंट प्रोफाइलेक्सिस, जिसे कम समय अवधि के लिए जैसे सर्जरी से पहले या बाद में किया जाता है जबकि कंटीन्युअस प्रोफाइलेक्सिस का प्रयोग लम्बी अवधि के लिए किया जाता है। कंटीन्युअस प्रोफाइलेक्सिस तीन तरह की होती है। प्राइमरी प्रोफाइलेक्सिस जिसे दूसरे बड़े जोड़ रक्तस्त्राव से व 3 वर्ष की उम्र से पहले दिया जाता है। सेकंडरी प्रोफाइलेक्सिस जिसका प्रयोग 2 या अधिक बड़े जोड़ रक्तस्त्राव के बाद और टेरिटियरी प्रोफाइलेक्सिस जो जोड़ रोग की शुरुआत के बाद, आगे होने वाले नुकसान में प्रयोग की जाती है।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/37PrctB

No comments:

Post a Comment