अक्सर ऐसे मामले सामने आते हैं कि महिला में हर माह अंडे बनने की प्रक्रिया तो हो रही है लेकिन तब भी वह मां नहीं बन पाती। इसका कारण फैलोपियन ट्यूब का न होना या इसमें खराबी होना हो सकता है। इंफर्टिलिटी से पीड़ित 20 महिलाओं में से 10-12 में इस ट्यूब से जुड़ी परेशानी सामने आती है। चिकित्सा जगत में इलाज के कई नए तरीके ऐसे हैं जिनसे इस अवस्था के बावजूद महिला मां बन सकती है।
इसलिए जरूरी ट्यूब : ओवरी से अंडा फैलोपियन ट्यूब (यहीं स्पर्म व अंडे का फर्टिलाइजेशन होता है) के बाद गर्भाशय में जाता है। यहां शिशु का विकास शुरू होता है।
ट्यूब न होने पर: ज्यादातर मामलों में फैलोपियन ट्यूब के न होने पर अंडाशय व गर्भाशय में भी विकृति पाई जाती है। यह समस्या जन्मजात या फिर प्यूबर्टी के समय से उभरती है। इस कारण माहवारी के शुरू होने से लेकर इसके सुचारू बने रहने में भी दिक्कत आती है। ऐसे में 11-12 साल की उम्र के दौरान माहवारी से जुड़ी दिक्कतें होने लगती है। डॉक्टरी सलाह से सोनोग्राफी, ट्यूब टैस्ट, एक्सरे, क्रोमोपटर््यूबेशन जांच से इस समस्या का पता चलता है। फिर दवाओं या सर्जरी से इलाज शुरू होता है।
कारण-
जन्मजात इस ट्यूब की बनावट में खराबी या विकृति, इसका उचित रूप से विकसित न होना, सामान्य होने के बावजूद टीबी या अबॉर्शन के बाद संक्रमण से होने वाला ब्लॉकेज।
उपचार - फैलोपियन ट्यूब में यदि ब्लॉकेज पाया जाता है तो सबसे पहले दवाओं से इसे ठीक करते हैं। इसके बाद भी यदि ब्लॉकेज खत्म न हो तो कैन्यूलाइजेशन तकनीक के तहत एक पतले तार को सर्विक्स के जरिए ट्यूब में पहुंचाकर ब्लॉकेज को हटाते हैं। फैलोपियन ट्यूब की सामान्य लंबाई 8-10 सेंटीमीटर होती है। ऐसे में यदि ट्यूब में ब्लॉकेज यदि बड़ा पाया जाता है तो ट्यूब के प्रभावित हिस्से को हटाकर बाकी हिस्से को टांकें लगाकर जोड़ दिया जाता है।
रुकावट दूर न हो तो -
ट्यूब न खुले तो आईवीएफईटी (इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन एम्ब्रिओ ट्रांसप्लांट) प्रयोग में लेते हैं। इसमें ओवरी से अंडा बाहर निकालकर पुरुष के स्पर्म के साथ लैब में फर्टिलाइज करते हैं। यहां विकसित होने के 15-20 दिन बाद इसे यूट्रस में ट्रांसफर करते हैं। जिनमें ट्यूब के साथ गर्भाशय भी खराब हो उनके लिए सरोगेसी विकल्प हो सकता है।
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