काइरोप्रैक्टिक में रीढ़ की हड्डियों या जोड़ों में आई खराबी को बिना दवा और सर्जरी के ठीक किया जाता है। इसमें हाथों से रीढ़ की हड्डियों में आए अंतर को सेट किया जाता है। जिससे मरीज को दर्द में राहत मिलती है। यह प्रैक्टिस अभी विदेशों में प्रचलित है लेकिन भारत में धीरे-धीरे बढ़ रही है। इसमें विदेशों में आठ साल की पढ़ाई के बाद काइरोप्रैक्टर बनते हैं। इसका अलग कोर्स होता है।
इनमें कारगर थैरेपी
स्पोट्र्स इंजरी, रीढ़ और हड्डियों से जुड़े सभी रोग जैसे स्पोंडलाइटिस, आर्थराइटिस, टेनिस एब्लबो, घुटनों का दर्द, गर्दन, कमर और लंबर पेन में आराम मिलता है।
रीढ़ की हड्डियों को दबाकर होता है इलाज
काइरोपै्रक्टर पहले मरीज की जांच करते हैं। वह हाथों से पता लगा लेते हैं कि मरीज की रीढ़ की कौन सी हड्डी खिसकी है जिससे कमर, गर्दन, पैरों या सिर में दर्द हो रहा है। इसको हाथों से एडजेस्ट (सेट) करते हैं। दो-तीन बार में ही मरीज को आराम मिलने लगता है।
आठ साल की होती है इसकी पढ़ाई
अभी विदेशों में ही इसकी पढ़ाई होती है। चार साल की बैचलर डिग्री मेडिकल स्टूडेंट्स के साथ लेते हैं। फिर चार-चार साल का मास्टर इन काइरोपै्रक्टिक या डॉक्टर्स ऑफ काइरोप्रैक्टिक की डिग्री होती है।
ऐसे अलग है फिजियोथैरेपी से
काइरोपै्रक्टर को बीमारी की जांच और बिना दवा-सर्जरी के इलाज का अधिकार है जबकि फिजियो में डॉक्टर की सलाह से व्यायाम करवाया जाता है। इस थैरेपी में भी फिजियो का काफी महत्त्व है।
विदेशों में इसकी मान्यता अधिक
काइरोप्रैक्टिक की मान्यता विकसित देशों अधिक है। केवल अमरीका में 70 हजार से अधिक इसके एक्सपर्ट हैं। भारत में इसके रजिस्टर्ड एक्सपर्ट 10-15 ही हैं।
डॉ.शिव बजाज, काइरोपै्रक्टर, नई दिल्ली
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