फिनलैंड में हुए एक नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने दावा किया है कि आज के बुजुर्ग युवाओं जितने ही फिट और एक्टिव हैं। शोधकर्ताओं ने तीन दशक पुराने बुजुर्गों के समूह के साथ 2017 में समान उम्र और शारीरिक अवस्था वाले बुजुर्गों की शारीरिक और कॉग्निटिव परफॉर्मेंस की तुलना करने पर पाया कि 30 साल पहले के बुजुर्गों की तुलना में आज के बुजुर्ग लगभग हर परीक्षण में बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। शोध के वैज्ञानिकों का कहना है कि यह इस बात का इशारा है कि एक सामान्य व्यक्ति के पूरे जीवन में स्वस्थ बने रहने की अवधि लगातार बढ़ रही है। यही वजह है कि आज हमारी जीवन प्रत्याशा पहले से ज्यादा है। बीती सदी से मानव की जीवन प्रत्याशा लगातार वृद्धि हो रही है। हालांकि, वैज्ञानिकों का एक समूह ने सुझाव दिया है कि हमें जीवन की लंबी अवधि की बजाय उसकी गुणवत्ता पर अधिक ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।
'हेल' है स्वास्थ्य गुणवत्ता की कसौटी
मानव जीवन को स्वस्थ्य की दृष्टि से और अधिक गुणवत्तापूर्ण बनाने के उद्देश्य से 2001 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation) ने अपने वैश्विक स्वास्थ्य विश्लेषणों में एक नई कसौटी शामिल की- हेल यानी स्वस्थ जीवन प्रत्याशा (Healthy Life Expectencyहैल्दी लाइफ एक्सपेंटेंसी)। यह एक नई स्वास्थ्य गणना है जो इस पर ध्यान लगाती है कि कोई व्यक्ति अपने पूरे जीवनकाल में कितनी लंबी अवधि तक स्वस्थ (Health Span) बना रहा। यह केवल जीवन काल नहीं बल्कि स्वास्थ्य काल यानी हैल्थ स्पैन पर भी नए सिरे से ध्यान केंद्रित करता है। यह सुझाव देता है कि मनुष्य 70 वर्ष की आयु के बाद कितनी स्वस्थ्य जिंदगी जीता है इस पर ध्यान दिए जाने की जरुरत है। इसलिए हमें उम्र के इन आखिरी सालों की गुणवत्ता पर ध्यान देना चाहिए।
दो पीढिय़ों की तुलना से जाना 'स्वास्थ्य'
फिनलैंड स्थित युवास्कुले विश्वविद्यालय (University of Jyväskylä) के शोधकर्ताओं ने दो अलग-अलग समय की समान आयु वर्ग के दो समूहों में शारीरिक और कॉग्निटिव परफॉर्मेंस (Cognitive Performence) की तुलना की है। दोनों पीढिय़ों के स्वास्थ्य की तुलना कर उन्होंने आज की बुजुर्ग पीढ़ी के दमखम का पता लगाया है। विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने 30 साल पहले के और आज के लगभग 500 बुजुर्गों की तुलना की। इसमें पहला अध्ययन 1989 में हुआ था जिसमें 1910 से 1914 के बीच पैदा हुए 75 से 80 साल के समूह वाले बुजुर्गों ने विभिन्न प्रकार के शारीरिक और संज्ञानात्मक परीक्षणों में भाग लिया था। ऐसे ही 1938 से 1943 के बीच पैदा हुए 75 से 80 साल के समूह वाले बुजुर्गों ने भी 2017 में ऐसे ही विभिन्न प्रकार के शारीरिक और संज्ञानात्मक परीक्षणों में भाग लिया था। शोध की मुख्य अन्वेषक तैं रांतनें का कहना है कि इस शोध ने एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक स्वास्थ्य की निरंतर प्रगति को मापने के लिए एक नया तरीका पेश किया है।
दूसरे समूह में दिखा गुणात्मक सुधार
मुख्य अन्वेषक तैं रांतनें का कहना है कि यह शोध बहुत-सी बातों की वजह से अद्वितीय है क्योंकि दुनिया में ऐसे गिने-चुने ही अध्ययन हैं जिसमें दो अलग-अलग युग में एक-समान उम्र के लोगों के बीच प्रदर्शन-आधारित स्वस्थ्य और गुणात्मक जीवन की तुलना की गई है। रांतनें का कहना है कि अध्ययन के प्रदर्शन-आधारित परिणाम बताते हैं कि कैसे बुजुर्ग अपने दैनिक जीवन का मैनेजमेंट करते हैं और अध्ययन साथ ही दोनों समूहों की कार्यात्मक आयु को भी दर्शाता है। अध्ययन में सामने आया कि 1938 से 1943 के बीच पैदा हुए 75 से 80 साल के समूह वाले बुजुर्गों ने लगभग सभी परीक्षणों में 1910 से 1914 के बीच पैदा हुए 75 से 80 साल के समूह वाले बुजुर्गों की तुलना में ज्यादा बेहतर प्रदर्शन किया था। 80 साल की उम्र में भी इनके चलने की गति तेज थी, पहले समूह के 5 फीसदी की तुलना में इस समूह ने 25 प्रतिशत की ताकत से अपनी मजबूत पकड़ का प्रदर्शन अपना दमखम दिखाया। ऐसे ही घुटने से जुड़ी समस्याओं में भी पहले ग्रुप की 20 फीसदी की तुलना में दूसरे समूह के बुजुर्गों ने 47 प्रतिशत के बीच सुधार दिखाया। फेफड़े भी पहले समूह से ज्यादा बेहतर काम कर रहे थे।
ये कारण गिनाए बेहतर प्रदर्शन के
इस शोध पर कार्य कर रहे पीएचडी स्कॉलर मैट्टी मनुक्का का कहना है कि 1938-43 के बीच के 75 से 80 साल के बुजुर्गों की तीन दशक पहले पैदा हुए उनके समकक्षों की तुलना में बेहतर परफॉर्मेंस के पीछे बहुत से कारण हैं। दोनों पीढिय़ों के बुजुर्गों के बीच कई अनुकूल बदलाव आ गए हैं। इनमें बेहतर पोषण और स्वच्छता, स्वास्थ्य देखभाल और स्कूल प्रणाली में सुधार, बेहतर शिक्षा तक पहुंच और कामकाजी जीवन में सुधार कुछ महत्त्वपूर्ण कारक हैं। यह 'कॉग्निटिव परफॉर्मेंस कम्पैरेटिव स्टडी' (The cognitive performance comparative study) एजिंग क्लिनिकल एंड एक्सपेरिमेंटल रिसर्च जर्नल (the journal Aging Clinical and Experimental Research) में प्रकाशित हुई है। जबकि 'फिजिकल परफॉर्मेंस कम्पैरेटिव स्टडी' (the physical performance comparative study) जेरोन्टोलॉजी: सीरीज ए जर्नल (The Journals of Gerontology: Series A) में प्रकाशित हुई है।
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