क्लबफुट बीमारी क्या है?
यह जन्मजात शारीरिक विकृति है। इसमें शिशु के पैरों के पंजे जन्म से ही अन्दर की ओर मुड़े होते हैं। इसमें स्थिति थोड़ी व ज्यादा गंभीर भी हो सकती है। जिसमें पंजों का सामान्य से आकार में छोटा होना, नीचे की ओर ज्यादा मुड़ा होना व कई मामलों में एड़ी थोड़ी नोकदार भी हो सकती है। यह समस्या एक या दोनों पंजों में हो सकती है। इससे जुड़े 50 फीसदी मामलों में दोनों पैरों पर असर होता है।
इस बीमारी के मुख्य कारण क्या हैं?
ज्यादातर कारण आनुवांशिक (जेनेटिक) होते हैं। कुछ मामलों में यह महिला के गर्भाशय में दो बच्चे होना, शिशु के लिए पर्याप्त जगह का न होना या गर्भाशय में पानी की कमी भी इसके अहम कारण हैं। जिनके परिवार में पहले से यदि किसी को यह समस्या हो, अन्य जन्मजात समस्या (दिमागी रूप से विकृत या रीढ़ की हड्डी से जुड़ा स्पाइना बाइफिडा रोग), महिला को यदि स्मोकिंग की आदत है और या फिर गर्भावस्था के दौरान पेट में पानी की कमी हो तो इस बीमारी की आशंका बढ़ जाती है।
क्या जन्म पूर्व इसका पता लगाकर इलाज संभव है?
हां, इसका पता जन्म के पहले 16-18 हफ्ते की गर्भावधि के दौरान सोनोग्राफी करके लगाया जा सकता है। परन्तु इसका उपचार शिशु के जन्म के बाद ही संभव है।
क्या इस बीमारी का संपूर्ण इलाज संभव है?
अंधविश्वास के चलते प्राचीन समय में इसे एक अभिशाप मानते थे। लेकिन ऐसा नहीं है। इन दिनों इस विकृति को पॉन्सेटी तरीके (पंजों पर प्लास्टर बांधना) से बिना सर्जरी के सही कर सकते हैं।
क्या रोग के इलाज के बाद बच्चे के बड़े होने पर उसके खेलने-कूदने या अन्य शारीरिक विकास पर दुष्प्रभाव पड़ता है?
समय पर यानी जन्म के बाद के कुछ दिन या हफ्तों में ही यदि इलाज ले लिया जाए तो बच्चा अन्य साधारण बच्चों की तरह ही जीवनयापन कर सकता है। इसका कारण इस दौरान उनकी हड्डियों का लचीला होना है जो सही पॉजिशन में आ जाती है। वह फुटबॉल, डांस से लेकर अन्य किसी भी प्रकार का खेल व शारीरिक गतिविधि कर सकता है।
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