पिस्सू के काटने से फैलता
पिस्सू के काटने से फैलता है यह रोग। इस दौरान पिस्सू की लार में मौजूद बैक्टीरिया (ओरेंसिया सुसुगामुशी) त्वचा के जरिए रक्त में मिलकर विभिन्न अंगों में पहुंचता है। ऐसे में लिवर, दिमाग और फेफड़े सबसे पहले प्रभावित होते हैं। गंभीर स्थिति में शरीर के कई अन्य अंग काम करना बंद कर देते हैं। यह रोग छूने, खांसने के दौरान सांस के माध्यम से नहीं फैलता। पहाड़ी इलाके, जंगल व खेतों के आसपास और बारिश के बाद इन पिस्सुओं की संख्या बढ़ जाती है।
दो हफ्ते में मरीज को तेज Fever आता
पिस्सू के काटने के दो हफ्ते में मरीज को तेज बुखार आता है। जो 102-103 डिग्री फारेनहाइट तक जा सकता है। शरीर पर लाल दाने और काटने वाली जगह पर फफोलेनुमा काली पपड़ी जैसा निशान उभरता है। Headache, खांसी, मांसपेशियों में दर्द व शरीर में कमजोरी रहती है। ये लक्षण सामान्यत: पिस्सू के काटने के 5-14 दिन तक बने रह सकते हैं। इलाज में देरी से रोग गंभीर होकर निमोनिया का रूप ले सकता है। रोग की गंभीर स्थिति में प्लेटलेट्स की संख्या भी कम होने लगती है।
प्लेटलेट काउंट ( Platelets count ) :
घटने से शरीर के किसी भी अंग में अंदरुनी तौर पर रक्तस्त्राव की आशंका बढ़ जाती है। ऐसे में संक्रमण शरीर के विभिन्न हिस्सों में फैल सकता है। यह स्थिति मरीज के लिए जानलेवा हो सकती है।
ब्लड टैस्ट ( Blood test ) व लिवर (Live ) की जांच करते
पिस्सू बेहद छोटा होता है जिसकी पहचान कर बचाव करना मुश्किल है। पिस्सू के काटने के निशान को देखकर ही रोग की पहचान होती है। ब्लड टैस्ट के जरिए CBC Count व लिवर की जांच करते हैं। एलाइजा टैस्ट व इम्युनोफ्लोरेसेंस टैस्ट भी करते हैं। इसके अलावा एंटीबॉडी टाइटर, सेरोलॉजिकल टैस्ट और पीसीआर तकनीक का इस्तेमाल करते हैं।
इन्हें अधिक खतरा
पहाड़ी इलाके, जंगल, गांव व शहर में रहने वाले वे लोग जिनके घर के आसपास बारिश के कारण जंगली पौधे या अत्यधिक घास उग गई हो। उन्हें पिस्सू के काटने का अधिक खतरा रहता है। साथ ही खेतों में काम करने वाले किसान जो फसल वगैरह के अधिक संपर्क में आते हैं, वे भी ज्यादा प्रभावित होते हैं।
कमजोर इम्युनिटी वालों को खतरा ज्यादा
पिस्सुओं के काटने का असर सबसे ज्यादा और तेज, कमजोर इम्युनिटी वालों पर होता है। ऐसे में शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को दवाओं के बजाय संतुलित भोजन लें। खाने में ऐसी चीजें शामिल करें जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाए।
7-14 दिनों तक दवाओं का कोर्स
इलाज के रूप में 7-14 दिनों तक दवाओं का कोर्स चलता है। मरीज को कम तला-भुना व लिक्विड डाइट दी जाती है। जिनके घर के पास रोग फैला है उन्हें हफ्ते में एक बार प्रिवेंटिव डोज देते हैं। इमरजेंसी की स्थिति में मरीज को अस्पताल में भर्ती भी करते हैं।
ये लापरवाही न बरतें
1- घर के आसपास पानी इकट्ठा न होने दें। इनमें म'छरों के अलावा कई सूक्ष्म कीटाणुओं की संख्या बढ़ जाती है।
2- पानी की टंकियों की सफाई नियमित तौर पर करें।
3- घर के आसपास घास या पेड़ पौधों की छंटनी करते रहें। ताकि इनके कारण कीड़े आदि की संख्या न बढ़ सके।
तुलसी, गिलोय लेने से फायदा
इम्युनिटी बढ़ाने के लिए तुलसी, गिलोय लें। कुमारी रस 5-10 एमएल सुबह-शाम लें। तेज बुखार में संजीवनी वटि या कस्तूरी भैरवरस देते हैं। सुदर्शन वटि की दो-दो गोली सुबह-शाम देते हैं। अमलतास का काढ़ा लक्षणों में कमी लाने में मददगार है।
होम्योपैथी से इलाज
लक्षणों के अलावा मरीज की स्थिति को देखते हुए दवाएं व उनकी डोज को तय करते हैं। इस रोग के लक्षणों को कम करने के लिए बेलेडोना, रस्टॉक्स, आर्सेनिक व ब्रायोनिया दवा देते हैं। इस बीमारी के लिए जीनस एपिडेमिकस दवा खासतौर पर दी जाती है।
एक्सपर्ट पैनल :
डॉ. विक्रमादित्य मीणा, फिजिशियन
डॉ. जागृति शर्मा, आयुर्वेद विशेषज्ञ
डॉ. हेमंत भारद्वाज, होम्योपैथिक विशेषज्ञ
from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2HbMV31
No comments:
Post a Comment