Monday, 26 June 2023

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इलेक्ट्रोहोम्योपैथी या इलेक्ट्रोपैथी चिकित्सा पद्धति के अनुसार जब रक्त और रस (लिंफ) में असंतुलन होता है तो इससे रोग होते हैं। इनमें सुधार से ही रोग ठीक भी होते हैं। इलेक्ट्रोपैथी में पेड़-पौधों के अर्क का उपयोग होता है। पौधों में धनात्मक और ऋणात्मक ऊजाएं होती है। इसी आधार पर इस पैथी को इलेक्ट्रोपैथी कहते हैं। इसमें हर तरह की बीमारियों का इलाज हब्र्स से निकले अर्क से किया जाता है।

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इसकी दवा का कोई साइड इफेक्ट नहीं
इसमें केवल हर्बल दवाओं का इस्तेमाल होता है। इसलिए साइड इफेक्ट नहीं होते हैं। एक्सपर्ट की मानें तो बीमारी का जड़ से इलाज होता है क्योंकि यह दवा मरीज के प्रकृति के आधार पर दी जाती है जो कोशिकाओं के स्तर पर जाकर कार्य करती हैं। इलाज में मरीज को कुछ सावधानी भी बरतनी होती है। अधिकतर मरीजों को खट्टी चीजों का परहेज करना होता है। कुछ परहेज बीमारी की प्रकृति के आधार पर भी होते हैं। कोई भी दवा एक्सपर्ट की सलाह से ही लें।

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इसमें दवा बनाने का तरीका अलग होता है। जिस पौधे का अर्क निकालना होता है उस पौधे को एक कांच के जार में पानी के साथ रख देते हैं। हर सप्ताह पुराने पौधों को निकाल दिया जाता है और दूसरा नया पौधा उसमें डाल देते हैं। यह प्रक्रिया करीब 35-40 दिन तक चलती है। फिर उस पानी को फिल्टर किया जाता है। इसे स्पेजरिक एसेंस कहते हैं। जरूरत के अनुसार इसे डायल्यूट कर डायल्ूशन बनाए जाते हैं। दवा का मूल तत्व पौधों का रस ही होता है लेकिन इसको गोली, टेबलेट, सीरप, इंजेक्शन आदि में भी देते हैं।

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मुख्य रूप से दो प्रकृति
बीमारी की पहचान दो तरह से होती है जैसे संग्वेइन यानी रक्त प्रकृति और लिम्फैटिक यानी रस प्रकृति की होती है। कुछ मरीजों में मिश्रित प्रकृति भी होती है। इस पैथी में बीमारियों को दो वर्गों में बांटा गया है धनात्मक और ऋणात्मक बीमारियां। अगर बीमारी पॉजेटिव नेचर की है तो इलाज नेगेटिव दवा से करते हैं। ऐसे ही रोग यदि नेगेटिव है तो पॉजिटिव दवा देते हैं। पोलराइजेशन नियम अनुसार स्वभाव के विपरीत नेचर वाली दवा असर करती है।



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