Sunday, 15 November 2020

डायबिटीज रोगियों के लिए क्या सुरक्षित है आर्टिफिशियल स्वीटनर से बनी मिठाईयां?

जयपुर। डायबिटीज रोग आज हर उम्र के लोगों को शिकार बना रहा है। यह बीमारी बदलती जीवनशैली की ही देन है। मीठा खाना इसे और बढ़ाता है। डायबिटीज के मरीजों में अक्सर यही धारणा रहती है कि, चीनी की मिठास की बजाए आर्टिफिशियल स्वीटनर ज्यादा सुरक्षित है और त्यौहारों पर अक्सर यें आर्टिफिशियल स्वीटनर से बनी मिठाईयां खाते है मगर ऐसा करना सही नहीं है। आर्टिफिशियल स्वीटनर का ज्यादा सेवन मरीज की याददाश्त कमजोर करने से लेकर मोटापा और पेट, बीपी, हार्ट संबंधी रोगों का भी शिकार बना सकता है।

वर्ल्ड डायबिटीज डे के मौके पर नारायणा मल्टीस्पेशियलिटी हॉस्पिटल के डायबिटीज व हार्मोन रोग विशेषज्ञ डॉ. मुकुल गुप्ता ने इस बीमारी में आर्टिफिशियल स्वीटनर और इंसुलिन से जुड़ी धारणाओं व उनके वास्तविक तथ्यों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि, आर्टिफिशियल स्वीटनर सामान्य चीनी से 1000 से 3000 गुणा तक अधिक मिठास तो देते हैं, लेकिन इनका प्रयोग कई खतरनाक बीमारियों का शिकार भी बना सकता है।

मिठास कैसी भी हो, सुरक्षित नहीं
डॉ. मुकुल गुप्ता ने बताया कि डायबिटीज रोगी चीनी से परहेज करने के लिए अक्सर आर्टिफिशियल स्वीटनर या शुगर फ्री जैसे पदार्थों का सेवन करने लगते हैं, जो सुरक्षित नहीं हैं। इन पदार्थों में एसपारटेम, सैकरीन, सुक्रालोज, ऐसेसल्फेम-के आदि कई तत्व पाए जाते हैं, जो लगातार सेवन से नुकसानदेह साबित होते हैं। कई शोधों में यह सामने आया है कि, ऐसे आर्टिफिशियल स्वीटनर से कुछ समय के लिए याददाश्त चले जाने जैसी शिकायत हो सकती है और ज्यादा सेवन से ब्रेन की कोशिकाऐं भी नष्ट हो सकती है। कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि इन आर्टिफिशियल स्वीटनर को बंद करने पर ऐसे मरीजों की याददाश्त वापस आने लगी है। वहीं इंसुलिन संवेदनशीलता पर भी प्रभाव पड़ता है।

आर्टिफिशियल स्वीटनर से पेट व गट की बैकटिरियल फ्लोरा पर असर पड़ता है. आर्टिफिशियल स्वीटनर का सेवन पेट के अन्दर की नार्मल बैकटिरियल फ्लोरा पर बुरा असर डालता है जिससे पेट की बीमारी और मोटापे जैसी समस्याओं को बढ़ावा मिलता है। इनके सेवन से ब्रेन के उन सेन्टर्स को सिग्नल नहीं मिलती जो हमें बताते हैं कि हमारा पेट भर गया है। इसी कारणवश ऐसे व्यक्ति दिनभर कुछ खाते रहते है जिससे उनका मोटापा बढ़ जाता है। बच्चों के खाद्य पदार्थ जैसे- जैली, जेम्स, टॉफी, चॉकलेट, पेस्ट्री आदि में भी आर्टिफिशियल स्वीटनर पहले से ही मिले होते हैं, जिससे बच्चों में टाइप-2 डायबिटीज, मोटापा, पेट की बीमारियां आदि होने लगती है।
डॉ. मुकुल गुप्ता बताते हैं कि, इंसुलिन को लेकर भी मरीजों में धारणाएं हैं कि एक बार इसके इंजेक्शन लगाने लगें तो हमेशा के लिए जरूरी हो जाता है, मगर ऐसा नहीं है। बीमारी की स्थिति और रोग के कारणों को देखते हुए इंसुलिन दी जाती है, जो बाद में डॉक्टर की सलाह पर बंद भी की जा सकती है। सर्जरी, संक्रमण जैसी किसी बीमारी में इलाज के लिए भर्ती मरीज को जरूरत होने पर इंसुलिन देना होता है, जब ठीक हो जाता है तो बंद कर दी जाती है। किसी भी डायबिटीज की स्थिति में इंसुलिन सुरक्षित है, मगर इसे डॉक्टर्स के बताने व निर्देशन में ही देना चाहिए।



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