चिट्ठी, तार और लैंडलाइन से होते हुए आज लोगों को पास लाने और संचार के प्रमुख साधन के रूप में स्मार्टफोन यानी मोबाइल सबसे आगे निकल गया है। आज दुनिया सूचनाओं से चलती हैं और जो सबसे ज्यादा इन्फॉम्र्ड है वहीं सबसे ज्यादा पॉवरफुल भी है। लेकिन अब यही स्मार्टफोन हमारी सेहत का दुश््रमन बनता जा रहा है। इसका कारण भी हम ही हैं क्योंकि हमारी खराब आदतों की वजह से फोन हमारे स्वास्थ्य संबंधी मानकों पर हावी होता जा रहा है। अगर कुछ देर के लिए ही हमारा समार्ट फोन हमसे दूर हो जाए, स्विच ऑफ जाए या बैटरी खत्म हो जाए तो हम परेशान हो जाते हैं। कुछ लोग तो इसकी वजह से ही तनाव में जीवन जी रहे हैं। लेकिन हम इस छोटे से उपकरण के इस कदर गुलाम क्यों बनते जा रहे हैं?
अपडेट रहने की लत ने बिगाड़ा खेल
दरअसल आज सबसे आगे रहने की होड़, हमेशा अपडेट रहने और हर चीज के बारे में जानने की हमारी जिज्ञासा ने इस बुरी आदत को पोसने में महती भूमिका निभाई है। थ्रीव ग्लोबल और टेक जनरेशन के एक कार्यक्रम में लेखक माइक ब्रूक्स ने कहा कि सबको पीछे छोड़ देने की भावना ने ही आज हमें समार्टफोन का गुलाम बना दिया है। बार-बार फोन चेक करना इसी का एक उदाहरण है कि कोई हमसे आगे न निकल जाए इसलिए खुद को अपडेट करते रहें। इसमें इंटरनेट ने भी हमारी आदतों को बिगाडऩे का काम किया है। दरअसल वास्तविकता तो यह है कि इंटरनेट ने जिंदगी को आसान बनाने की जगह मुश्किल बना दिया है।
चार साल में ही दोगुना हुआ स्क्रीन टाइम
युवा पीढ़ी खासकर छोटे बच्चों में मोबाइल, लैपटॉप और वीडियो गेम्स पर बिताए जाने वाला समय केवल चार साल में दोगुना हो गया है। इसमें भी यूट्यूब पर देखे जाने वाले वीडियो पर स्क्रीन टाइम सबसे ज्यादा है। यह चार साल में प्रतिदिन एक घंटा हो गया है जबकि पहले 30 मिनट ही हुआ करता था। गैर-लाभकारी संगठन कॉमन सेंस मीडिया की ओर से किए गए एक हालिया सर्वे में इन बातों का खुलासा हुआ है। सर्वे के नतीजों के अनुसार 2015 के बाद से बच्चों में स्क्रीन टाइम में कोई खास बदलाव देखने को नहीं मिला है। औसतन 8 से 12 साल के बच्चे 4 घंटे 44 मिनट प्रतिदिन अपने गैजेट्स पर बिता रहे हैं। वहीं 13 से 19 साल के किशोर-किशोरी 7 घंटे 22 मिनट तक इन गैजेट्स पर समय बिता रहे हैं। इसमें स्कूल और होमवर्क के दौरान उपयोग किए गए स्क्रीन टाइम को शामिल नहीं किया गया है।
यूं समझिए स्मार्टफोन की समस्या को
-4 साल में दोगुना हो गया ऑनलाइन वीडियो देखने का समय
-12 महीने से कम उम्र के बच्चे को स्क्रीन के सामने नहीं लाएं (WHO)
-60 मिनट से ज्यादा नहीं हो 2से 4 साल के बच्चों का स्क्रीन टाइम (WHO)
-200 करोड़ से ज्यादा उपयोगकर्ता हैं यूट्यूब के दुनिया भर में
-2015 में लॉन्च किया था यूट्यूब ने बच्चों के लिए अलग चैनल
-1600 से ज्यादा 8 से 18 साल के बच्चे शामिल थे संगठन के सर्वे में
-53 फीसदी बच्चों को स्मार्टफोन मिल जाता है 11 साल की उम्र होने तक
-12 साल का होने तक यह आंकड़ा 69 फीसदी तक पहुंच जाता है
-31 फीसदी ट्वीन्स वीडियो गेम्स खेलना पसंद करते हैं अपने गैजेट्स पर
-02 फीसदी युवा वीडियो चैटिंग या पसंदीदा संगीत सुनना पसंद करते हैं
इन उपायों से बच सकते हैं परेशानी से
सबसे पहली बात तो ते है कि हम स्मार्टफोन का उपयोग अचानक से बंद नहीं कर सकते। यह सोचना होगा कि आपके लिए सबसे ज्यादा जरूरी कौन-सा काम है और कौन-सा काम रुक सकता है। आप कुछ ग्रुप को म्यूट कर सकते हैं और उन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को चुन सकते हैं जिसपे आप सक्रिय रहना चाहते हैं। ऐसे ही समय और तनाव से बचने के लिए अलग अलग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए अलग रिंगटोन रखें ताकि आपको ये पता चले कि सबसे आवश्यक सूचना कौन-सी है। इससे आप अपनी मर्जी से तय कर सकेंगे कि आपको किसे जवाब देना है किसे नहीं। इससे आपका समय, ऊर्जा और स्वास्थ्य तीनों सुरक्षित रहेंगे। एक और्र अहम बात यह है कि खुद को समझाएं कि हर सूचना से आप अपडेट ही रहें यह जरूरी नहीं है। अगर किसी एक समाचार के बारे में देर से पता लगे इससे जिंदगी रुक नहीं जाएगी। इसलिए लोगों से अपने रिश्ते को लेकर सीमाएं रखना जरूरी है। यह विकल्प मुश्किल जरूर है पर आपकी मुसीबत को आसान कर देगा।
स्मार्टफोन और उसके सोशल मीडिया ऐप्स से होने वाले स्ट्रैस को हम नकार नहीं सकते। फोमोबिया, स्ट्रेस और एंग्जायटी का कारण भी ये स्मार्टफोन ही है। लेकिन यह तो आपके हाथ और खुद के फैसले पर निर्भर करता है कि आप अपने स्ट्रेस को कैसे कम कर सकते हैं।
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