कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को झंकझोर कर रख दिया है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के अनुसार अप्रेल माह तक देश में 12करोड़ 20 हजार से ज्यादा लोग बेरोजगार हो गए। वहीं एक अन्य अनुमान के मुताबिक देश में कोरोना वायरस के संक्रमण की तुलना में गरीबी और भूख से अधिक मौतों का जोखिम है। दरअसल ये आंकड़े इसलिए भी डराने वाले हैं क्योंकि बेरोजगारी और गरीबी का सबसे ज्यादा असर अपने परिवार पर आश्रित बच्चों पर ही पड़ता है। हाल ही यूनिसेफ और बच्चों के लिए काम करने वाले एक सामाजिक संगठन सेव द चिल्ड्रन के नए अध्ययन में सामने आया कि कोरोना वायरस के कारण हाशिए पर पहुंची वैश्विक अर्थव्यवस्था के कारण साल 2020 के अंत तक निम्न और मध्यम आय वाले देशों में गरीबी रेखा वाले घरों में रहने वाले बच्चों की संख्या में 8.6 करोड़ (86 मिलियन) तक की वृद्धि हो सकती है।
यूनिसेफ के कार्यकारी निदेशक हेनरीटा फोर ने अध्ययन के हवाले से कहा कि नोवेल कोरोना वायरस के कारण उत्पन्न वित्तीय चुनौतियों से बेरोजगार और गरीब एवं निम्न आय वर्ग वाले परिवारों को बचाने के लिए तत्काल कार्रवाई ही एकमात्र उपाय है। अगर सरकारें ऐसा नहीं करेंगी तो इन निम्न और मध्यम आय वाले देशों में गरीबी रेखा वाले घरों में रहने वाले बच्चों की संख्या 67.2 करोड़ (672 मिलियन) तक पहुंच सकती है। इनमें से करीब दो-तिहाई बच्चे अकेले उप-सहारा अफ्रीका और दक्षिण एशिया में ही होंगे। जबकि यूरोप और मध्य एशिया के देशों में ऐसे बच्चों की आबादी में 44 फीसदी का उछाल आ सकता है।
वहीं बात करें लैटिन अमरीका और कैरिबियाई देशों की तो यहां भी 22 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है। हेनरीटा ने कहा कि कोरोनोवायरस ने एक वैश्विक सामाजिक-आर्थिक संकट पैदा कर दिया है जिससे दुनिया के सभी परिवारों के सामने जीवित रहने के लिए जरूरी संसाधनों की भारी कमी हो गई है।
यूनिसेफ और सेव द चिल्ड्रन ने चेतावनी देते हुए कहा कि इस महामारी के कारण वैश्विक आर्थिक संकट का प्रभाव दो गुना हो गया है। बेरोजगार होने का तत्काल नुकसान यह है कि परिवारों के सामने भोजन, पानी, चिकित्सा सहित अन्य मूल आवश्यकताओं को पूरा करने का यक्ष प्रश्न खड़ा है। इससे आने वाले समय में भारत समेत अन्य विकासशील देशों में बाल विवाह, हिंसा, शोषण और दुव्र्यवहार में वृद्धि होने की आशंका भी है।

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