ज्यादातर मरीज में कोई लक्षण दिखाई नहीं देते। जब मरीज डॉक्टर के पास पहुंचता है तो उसकी नजर का दायरा काफी कम हो चुका होता है।
आंखों पर असर कैसे पड़ता है?
आंखों के अंदर दबाव बढ़ता है और यह धीरे-धीरे कोशिकाओं को नष्ट करता है। एक बार नष्ट होने पर कोशिकाएं दोबारा निर्मित नहीं होती। सही समय पर उचित इलाज से शेष कोशिकाओं को बचाया जा सकता है।
ग्लूकोमा की समस्या किसे हो सकती है?
यह रोग किसी को भी हो सकता है लेकिन फैमिली हिस्ट्री होने पर, डायबिटीज, जिनका चश्मे का नंबर माइनस में हो, हाइपरटेंशन और 40 की उम्र के बाद इसका खतरा ज्यादा होता है।
ग्लूकोमा का इलाज क्या है?
इसके मरीज को आजीवन दवा लेनी पड़ती है। अगर दवाओं से असर नहीं होता तो ऑपरेशन व लेजर किया जाता है। यह सर्जरी सफल रहती है और अगले दिन मरीज काम पर लौट सकता है लेकिन उसे डॉक्टर के पास नियमित चेकअप के लिए जाना पड़ता है।
क्या करें कि आंखें सलामत रहें?
40 की उम्र के बाद आंखों के प्रेशर की जांच, नजर के दायरे की जांच, काली पुतली (कोर्निया) की मोटाई की जांच, आंखों से पानी निकलने के रास्ते की जांच व आंखों की नसों का टेस्ट करवा लेना चाहिए। कई बार लोग धूल या मिट्टी से एलर्जी होने पर मेडिकल स्टोर से दवा लेकर आंखों में डाल लेते हैं जिससे कालापानी या बच्चों में अंधापन हो सकता है। इसलिए बिना डॉक्टरी सलाह के कोई भी दवा ना लें।
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