पैलिएटिव केयर में रोगी को इस तरह से रखा जाता है और उसका साथ निभाते हैं जिससे वे अच्छा महसूस कर सके। इसमें उसका रोग तो ठीक नहीं होता है लेकिन दर्द में उसे मानसिक रूप से काफी आराम मिलता है। इससे उसके जीवन की गुणवत्ता भी बेहतर होती है। रोगी की परेशानी के आधार पर उसकी शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक समस्याओं का हल निकाला जाता है। पैलिएटिव केयर टीम के साथ परिवार और समाज के अन्य लोगों का व्यवहार रोगी के कष्ट को दूर करने में अहम भूमिका निभाता है।
परिवार इसका रखे ध्यान -
अस्पताल या घर में बिस्तर पकड़ चुके रोगी को पैलिएटिव केयर देनी है तो परिवार के लोगों को कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। रोगी का शरीर साफ रखने के लिए उसे नहलाना चाहिए। यदि संभव नहीं है तो गीले कपड़े से उसका शरीर साफ करें। रोगी के कपड़े भी बदलते रहें। उसका कमरा साफ रखें और बैडशीट बदलते रहें। बिस्तर गीला है तो तुरंत बदलें। डॉक्टर के बताए अनुसार खाना दें ताकि शरीर में ऊर्जा बनी रहे। रोगी को बार-बार एक से दूसरी जगह शिफ्ट न करें।
इन बीमारियों में होती मददगार -
पैलिएटिव केयर कैंसर, एड्स, हृदय, गुर्दा फेल या कोमा के मरीजों में अधिक अपनायी जाती है। कुछ रोगियों में उनकी देखरेख के साथ कुछ दवाएं भी चलती हैं जिससे उन्हें आराम मिलता है। ये प्रक्रिया रोगी के घर पर, अस्पताल, हॉसपाइस सेंटर पर पूरी की जा सकती हैं। संक्रमण से बचाने के लिए कुछ एंटीबायोटिक दवाएं भी नियमित चलाई जाती हैं जिससे उसकी परेशानी समय के साथ न बढ़े।
डॉक्टरों का पैनल करता निगरानी -
असहनीय पीड़ा से गुजर रहे रोगी की देखभाल के लिए नर्सिंग स्टाफ 24 घंटे उसकी सेवा में रहता है। मनोचिकित्सक, योग विशेषज्ञ, डायटीशियन, धार्मिक गुरु, कलाकारों की टीम रोगी के जीवन को सरल और पीड़ा को कम करने का काम करती है। रोगी घर पर है तो परिवार के सदस्यों को डॉक्टरों की बात मानना जरूरी है।
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