Friday, 8 November 2019

बलगम बार-बार मुंह में आना फेफड़ों की समस्या का संकेत

6-7 लीटर बलगम - सामान्यत: दिनभर में 6-7 लीटर बलगम व्यक्ति के मुंह में बनता है। फेफडें स्वस्थ हैं तो यह बलगम सांसनली में आने के बाद सीधे पेट में चला जाता है। वहीं फेफड़ों में कोई खराबी होने पर यह ऊपर नहीं आ पाता। जिससे खांसी होने पर यह बार-बार मुंह में आता है।
15 दिनों से ज्यादा यदि खांसी की शिकायत हो तो सतर्क रहें।
10 में से 9 लोगों में होती है लंग कैंसर की आशंका जो लंबे समय से धूम्रपान करते हैं।
50 की उम्र के बाद स्मोकिंग करने वालों को हर वर्ष स्पाइरोमेट्री टेस्ट कराना चाहिए।
20 बीड़ी दिनभर में पीते हैं और अत्यधिक मात्रा में बलगम बनता है तो अलर्ट रहें।
लक्षणों की पहचान
फेफड़ों में किसी प्रकार की दिक्कत होने पर व्यक्ति को लक्षण के रूप में सबसे पहले खांसी आती है। फिर सांस फूलने व शरीर में ऑक्सीजन की कमी से शरीर शिथिल हो जाता है। कैंसर की स्थिति में लंबे समय तक खांसी की समस्या विशेषकर जो धूम्रपान करते हैं व उम्र 50 से अधिक हैं, उनमें खांसी के साथ रक्त आने, सीने में दर्द या सांस लेने में दिक्कत होने जैसे लक्षण सामने आते हैं।
पैसिव स्मोकिंग
ऐसे लोग जो धूम्रपान करते हैं और इस आदत से उनके आसपास के लोग (जो धूम्रपान नहीं करते) भी प्रभावित होते हैं, उनमें भी इस कैंसर की आशंका समान रूप से रहती है। खास बात है कि इस कैंसर के मामले पुरुष और महिला दोनों में समान रूप से देखे जाते हैं।
सही नहीं है वेपिंग
वे पिंग के तहत ई-सिगरेट या दूसरे उपकरणों से निकलने वाले धुएं को सांस के जरिए अंदर लेने और छोडऩे की गतिविधि होती है। ई-सिगरेट धूम्रपान छोडऩे का विकल्प तो है लेकिन यह स्वयं भी नुकसान पहुंचाता है। इसमें मौजूद निकोटिन व अन्य पदार्थ एक तरह की लत बनकर अन्य अंगों को धीरे-धीरे प्रभावित करने लगते हैं।
प्रमुख जांचें
विशेषज्ञ इन दिनों लो डोज सीटी स्कैन भी करते हैं। फेफड़ों की क्षमता का पता करने के लिए स्पाइरोमेट्री टेस्ट करते हैं। एक्सरे और सीटी स्कैन के आधार पर गांठ के स्थान के अनुरूप बायोप्सी के सही प्रकार का चयन होता है।
ऐसे करें बचाव
धूम्रपान छोड़ें, शुद्ध हवा लें व खानपान में पौष्टिक चीजें शामिल करें। निकोटिन रिप्लेसमेंट थैरेपी से तंबाकू व सिगरेट से निजात पाने के लिए निकोटिन च्युइंगम, गम, पेस्ट और एंटी डिप्रेसिंग दवाएं दी जाती हैं।
इलाज का तरीका
म रीज की उम्र, अवस्था व स्टेज, यदि कोई रोग है तो उसके आधार पर इलाज तय होता है। स्टेज-3 में रेडिएशन थैरेपी देते हैं। स्टेज -4 में टारगेट थैरेपी के तहत मरीज के जीन्स के अनुसार इलाज देकर लक्षणों को कम करने के साथ ही रोगी को आराम देते हैं। 18 प्रतिशत मरीज स्टेज-4 में इलाज लेने के बाद पांच साल तक जीवनयापन करने में सक्षम हैं।

एक्सपर्ट : डॉ. सुरेश कूलावल , वरिष्ठ श्वसन रोग विशेषज्ञ
एक्सपर्ट : डॉ. संदीप जसूजा, वरिष्ठ कैंसर रोग विशेषज्ञ
(दोनों एक्सपर्ट सवाई मानसिंह मेडिकल कॉलेज से जुड़े हैं)

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