धूल-मिट्टी के कणों व दूषित हवा से बचाव के लिए नाक के दोनों तरफ साइनस की चार जोड़ी होती हैं। मेक्सिलरी, स्फेनॉइड, इथमॉइड व फ्रंटल। ये सभी एक-एक जोड़ी में होते हैं।अाइए जानते हैं इसके बारे में :-
फेफड़ों को बचाते
साइनस विशेष म्यूकस का स्त्राव कर सांस के जरिए आने वाले नुकसानदेह कणों को चिपकाकर फेफड़ों में प्रवेश नहीं होने देते। इन कणों के बढ़ने पर म्यूकस अधिक निकलता है व प्रतिरक्षी तंत्र छींक के रूप में इन पदार्थों को नाक से बाहर निकालता है। साइनस का कार्य जरूरत से ज्यादा होने पर इनमें सूजन आ जाती है। यह साइनुसाइटिस की स्थिति है। ऐसे में कणों के न होने पर भी इनसे ज्यादा मात्रा में म्यूकस का स्त्राव होता है व शरीर उसे छींकों के माध्यम से बाहर निकालता रहता है। यह एलर्जी के कारण होता है।
लक्षण
बार-बार छींकना नाक बंद होना या पानी जैसा द्रव निकलते रहना सिरदर्द, सर्दी-खांसी, बुखार, बदन दर्द आंखों से आंसू आना और दांतों में दर्द।
कारण
- प्रदूषण एसी-कूलर का प्रयोग।
- इम्यूनिटी की कमी।
- संक्रमण।
- ठंडा पानी या कोल्ड ड्रिंक लगातार पीना।
- रीढ़ का कर्व (मुड़ाव) गड़बड़ाना।
सावधानियां
जिन चीजों से एलर्जी है उससे दूरी बनाना ही एकमात्र बचाव व सही इलाज है। एलर्जी की समस्या हो तो सर्दी-खांसी के रोगी के संपर्क में आने से बचें। ठंडा पानी व कोल्ड ड्रिंक न पीएं। दही, अचार और खटाई न लें। फल खाने के तुरंत बाद पानी न पीएं। प्रदूषण से बचें। एसी-कूलर का अधिक प्रयोग न करें। ठंडे पानी से न नहाएं। सुबह उठकर खाली पेट पानी न पीएं। गर्म पानी में नमक मिलाकर नहाएं व नहाते समय रोमछिद्रों को खोलने के लिए अच्छे से गीले तौलिए से बदन को रगड़ें। बैठने-उठने के दौरान कमर सीधी रखें। धूम्रपान न करें।
क्या है उपचार?
रोग का उपचार आधुनिक चिकित्सक में एंटीबायोटिक और एंटीएलर्जिक दवाओं से करते हैं लेकिन इनसे स्थायी इलाज नहीं होता। सर्जरी की मदद से केवल कुछ महीने या साल तक ही आराम मिलता है और फिर रोगी उसी समस्या से जूझने लगता है।
क्या करें?
आयुर्वेद में रोग का अच्छा और स्थायी उपचार है। नियमित प्राणायाम करें। नाक में सुबह-शाम गाय के शुद्ध घी की कुछ बूंद डालें। रीढ़ की हड्डी पर औषधियुक्त तेल जैसे बला या महानारायण तेल से मालिश करें।रात में सोते समय आग में भूने हुए अनार के रस में अदरक का रस मिलाकर पीएं।इसकी चिकित्सा के लिए किसी कुशल आयुर्वेद चिकित्सक से परामर्श लें।
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