हाल ही इंग्लैंड की स्वेन्सा विवि के शोधकर्ताओं ने पांच लाख से ज्यादा नवजातों पर शोध कर पाया कि गर्भावस्था के दौरान पहले कुछ माह में महिलाएं डिप्रेशन दूर करने के लिए दवाएं लेती हैं। ऐसे में गर्भपात होने या बच्चे के अविकसित पैदा होने की आशंका बढ़ जाती है। इसमें मुख्य रूप से ऐसी दवाएं शामिल थीं जिन्हें डिप्रेशन और एंजाइटी की गंभीर अवस्था में लिया जाता है। जानें विशेषज्ञ की राय -
कई तरह की दिक्कतें
गर्भावस्था के दौरान पहली तिमाही में बच्चे के शरीर के अंगों का निर्माण हो रहा होता है। ऐसे में जो महिलाएं डिप्रेशन, मानसिक दिक्कत या तनाव दूर करने के लिए एंटीडिप्रेशन या एंटीसाइकोटिक दवाओं को नियमित रूप से लेती रहती हैं उनमें इन दवाओं का सीधा असर बच्चे के शरीर पर होता है। इससे वह हृदय संबंधी रोगों और बिहेवरल डिसऑर्डर के अलावा अविकसित पैदा हो सकता है। हर 100 में से 10 मामलों में जो बच्चे जन्मजात विकृतियों के साथ पैदा होते है उसका मुख्य कारण आनुवांशिक या जेनेटिक होता है। इसके अलावा 10 मामले ही ऐसे होते हैं जिनमें इसका कारण किसी रोग के लिए ली जाने वाली दवाएं हैं। इसमें एंटीडिप्रेशन दवाएं भी शामिल हैं।
इन्हें ध्यान में रखें :
ऐसी स्थिति न बने इसके लिए गर्भवती महिला को रोजाना मेडिटेशन करना चाहिए। साथ ही पौष्टिक खानपान लेने और खुश रहने की आदत डालनी चाहिए।
दूसरी तिमाही में देते दवा
यदि महिला पहले से डिप्रेशन के इलाज के लिए दवा ले रही है तो उसे गर्भधारण के समय से ही डॉक्टरी सलाह लेना जरूरी है। इसका कारण रुटीन में चल रही उन दवाओं को हटाना है जो गर्भस्थ शिशु को नुकसान पहुंचा सकती हैं। ऐसा गर्भावस्था की पहली तिमाही में करते हैं क्योंकि इस बीच बच्चे में अंगों का निर्माण होता है। दवाओं को दूसरी तिमाही से जारी करते हैं। लेकिन तीसरी तिमाही के अंत में फिर बंद करते हैं। इसका कारण प्रसव के दौरान महिला के शरीर में बदलाव व बच्चे का पूरी तरह विकसित होना है।
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